यथार्थ की उलटबांसियाँ : मटरू की बिजली का मंडोला

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” बड़ी प्रार्थना होती है। जमाखोर अौर मुना़फाखोर साल-भर अनुष्ठान कराते हैं। स्मगलर महाकाल को नरमुण्ड भेंट करता है। इंजीनियर की पत्नी भजन गाती हैं – ‘प्रभु कष्ट हरो सबका’। भगवन्‌, पिछले साल अकाल पड़ा था तब सक्सेना अौर राठौर को अापने राहत कार्य दिलवा दिया था। प्रभो, इस साल भी इधर अकाल कर दो अौर ‘इनको’ राहत कार्य का इंचार्ज बना दो। तहसीलदारिन, नायबिन, अोवरसीअरन सब प्रार्थना करती हैं। सुना है विधायक-भार्या अौर मंत्री-प्रिया भी अनुष्ठान कराती हैं। जाँच कमीशन के बावजूद मैं ऐसा पापमय विचार नहीं रखता। इतने अनुष्ठानों के बाद इन्द्रदेव प्रसन्न होते हैं अौर इलाके के तरफ से नल का कनेक्शन काट देते हैं।

हर साल वसन्त !

हर साल शरद !

हर साल अकाल !  ” — हरिशंकर परसाई, ‘अकाल-उत्सव’ से।

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

Gangs Of Wasseypur 2

फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में ‘नया’ क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा सिनेमा में क्या बदला?

क्या कथा बदली? इसका शायद ज़्यादा ठीक जवाब यह होगा कि यह कथ्य में पुनरागमन का दौर है। ‘पान सिंह तोमर’ देखते हुए जिस निस्संगता अौर बेचैनी का अनुभव होता है, वह अनुभव गुरुदत्त की ‘प्यासा’ के एकालाप ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’ तक जा पहुँचता है। ‘गैंग्स अॉफ वासेपुर’ की कथा में वही पुरानी सलीम-जावेद की उग्र भंगिमा है जिसके सहारे अमिताभ ने अपना अौर हिन्दी सिनेमा का सबसे सुनहरा दौर जिया। ‘विक्की डोनर’, ‘लव शव ते चिकन खुराना’, ‘अइय्या’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’ अौर ‘तलाश’ जैसी फिल्में दो हज़ार के बाद की पैदाईश फिल्मों में नई कड़ियाँ हैं जिनमें अपनी अन्य समकालीन फिल्मों की तरह कुछ गंभीर लगती बातों को भी बिना मैलोड्रामा का तड़का लगाए कहने की क्षमता है। लेकिन अगर कथा नहीं बदली अौर न ही उसे कहने का तरीका थोड़े ताम-झाम अौर थोड़े मैलोड्रामा को कम करने के बावजूद ज़्यादा बदला, तो फ़िर ऐसे में अाखिर वो क्या बात है जो हमारे इस समकालीन सिनेमा को कुछ पहले अाए सिनेमा से भिन्न अनुभव बना रही है?

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केंचुल उतारता शहर

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हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म ‘शाहिद’ के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म ‘दिल पे मत ले यार’ पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे के लिए लिखा अालेख, पिछले दिनों मैंने ‘कथादेश’ के दोस्तों से शेयर किया। वही अाज यहाँ अापके लिए। हंसल की ‘दिल पे मत ले यार’ अाज भी मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में शुमार है, अौर कहीं न कहीं इसकी भी अप्रत्यक्ष भूमिका रही है मुझे मेरे वर्तमान शोध तक पहुँचाने में।

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“रामसरन हमारी खोई हुई इन्नोसेंस है. वो इन्नोसेंस जो हम सबमें कहीं है लेकिन जिसे हमने कहीं छिपा दिया है क्योंकि मुझे एक बड़ा बंगला चाहिए, तुम्हें एक अच्छी सी नौकरी चाहिए. लेकिन रामसरन को इनमें से कुछ नहीं चाहिए. उसका काम सिर्फ़ इंसानियत से चल जाता है…

एंड फ़ॉर मी, दैट्स माय स्टोरी!” – महेश भट्ट, ’दिल पे मत ले यार’ में अपना ही किरदार निभाते हुए.

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कितने बाजू, कितने सर

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एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ज़्यादा बातें करने वाले, हमारे तमाम जुलूसों में सबसे आगे रहने वाले उन युवाओं में गज़ब का एका था। उन दिनों पंजाब में उग्र वाम फिर से लौट रहा था और वहाँ एम-एल की छात्र इकाई सबसे मज़बूत हुआ करती थी। वे लड़के बाहर से शान्त दिखते थे, लेकिन उनका जीवट प्रदर्शनों में निकलकर आता था और उन्हें देखकर हम भी जोश से भर जाते थे। सलवार-कुरते वाली कई लड़कियाँ थीं जो हमसे कम और आपस में ज़्यादा बातें करती थीं लेकिन सार्वजनिक स्थान पर किसी भी तनावपूर्ण क्षण के आते ही सबसे आगे डटकर खड़ी हो जाती थीं और कभी नहीं हिलती थीं। उन्हीं के माध्यम से मैं जाना था कि हमारे पडौसी इस ’धान के कटोरे’ में कैसी गैर-बराबरियाँ व्यापी हैं और कैसे वहाँ के दलित अब अपने हक़ के लिए खड़े होने लगे हैं। इस राजनैतिक चेतना के प्रभाव व्यापक थे। जब शोषित अपने हिस्से का हक़ मांगता है तो पहले से चला आया गैरबराबरी वाला ढांचा चरमराता है और इससे तनाव की षृष्टि होती है। बन्त सिंह आपको याद होंगें। यह बन्त सिंह की राजनैतिक चेतना ही थी जिसने उन्हें अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया और यही बात उनके गाँव के सवर्ण बरदाश्त न कर सके। उन्होंने बन्त के हाथ-पैर काट उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। लेकिन न वो बन्त को खामोश कर पाए, न उनके क्रान्तिकारी लोकगीतों को।

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

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पिछले दिनों रिलीज़ हुई आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया था। न जाने क्या हुआ कि हमने उसके बाद सौरभ शुक्ला की लेखकीय काबिलियत को सिरे से भुला दिया और उनपर से, उनके कामपर से अपनी निगाह हटा ली।

सौरभ शुक्ला ने अपनी निर्देशकीय पारी की शुरुआत जिस फ़िल्म से की थी, वो मुझे अभी तक याद है। दो घंटे की वो टेलिफ़िल्म उन्होंने नाइन गोल्ड के ’डाइरेक्टर्स कट’ के लिए बनाई थी और नाम था ’मिस्टर मेहमान’। छोटे कस्बे के जड़ सामाजिक संस्कारों के बीच बहुत ही खूबसूरती से पुराने रिश्तों में नएपन की, आज़ादी की बात करती ’मिस्टर मेहमान’ में नायक रजत कपूर थे और वहाँ से चला आता रजत कपूर और सौरभ शुक्ला का यह साथ ’आई एम 24’ तक जारी है। लेकिन सच यह भी है कि इसके आगे सौरभ शुक्ला ने जो फ़िल्में निर्देशित कीं, उनमें किसी को भी उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता। शायद वह समय ही ऐसा था। ’सत्या’ का एक लेखक अपनी रचनात्मक प्रखरता से समझौता न करने का प्रण लिए बार-बार प्रतिबंधित होता रहा और शराब के नशे में डूब गया, और दूसरे लेखक को उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाए, ऐसा कोई मौका दे ही नहीं पाया हमारा सिनेमा।

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बच्चन

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वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद है, उनकी आवाज़ को मानक सांचों से ’भिन्न’ पाया गया था। जल्द ही उन्होंने वे ’मानक सांचे’ बदल दिए।

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खुले सिरों वाला सिनेमा और व्याख्याकार की दुविधा

Gangs-of-Wasseypur

प्रेमचंद की अंतिम कहानियों में से एक ’कफ़न’, जितनी प्रसिद्ध कथा है उतनी ही विवादास्पद भी रही है। मूलरूप से विवाद की जड़ में रहा है कहानी के मुख्य दलित पात्रों ’धीसू’ और ’माधव’ का चित्रण। अपनी मरती हुई पत्नी और बहु के कफ़न के पैसों को उड़ा नाच रहे इन कथापात्रों को ’शोषित’ के रूप में देख पाना बहुत से पाठकों को कठिन लगता है। “क्या ’कफ़न’ एक दलित विरोधी कथा है?” यह सवाल साहित्य की समकालीन बहसों से अछूता नहीं। दरअसल यह इस कथा तक सीमित सवाल नहीं। यह गल्प को, उसके पात्रों को और उसके परिवेश को समझने की दो भिन्न आलोचना दृष्टियों से जुड़ा सवाल है। यह भेद तब और बढ़ जाता है जब इस कहानी की तुलना प्रेमचंद की ही कुछ पुरानी कहानियों से की जाती है जहाँ कथाकार अपने पात्रों से इतना निरपेक्ष नहीं और उनसे उसका ही नहीं पाठकों का भी एक भावनात्मक रिश्ता सा जुड़ जाता है। ’कफ़न’ जैसे इन पूर्व कथाओं की नेगेटिव है। उसके पात्र ’शोषित’ होते हुए भी भोले नहीं। आधुनिक आलोचना की भाषा में कहूँ तो उनमें ’ग्रे’ शेड्स दिखाई देते हैं। लेकिन क्या ’घीसू’ और ’माधव’ के चित्रण को आधार बनाकर प्रेमचंद की सामाजिक प्रतिबद्धता को खारिज किया जा सकता है।

यही तमाम बहस के मुद्दे पिछले दिनों आई कुछ फ़िल्मों और उनपर चली विस्तृत बहसों के संदर्भ में रह-रहकर याद आते रहे।

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सिनेमा का नमक

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बीते महीने हमारा सिनेमा अपने सौंवे साल में प्रवेश कर गया। यह मौका उत्सव का है। किसी भी विधा के इतना जल्दी, जीवन में इतना गहरे समाहित हो जाने के उदाहरण विरले ही मिलते हैं। सिनेमा हमारे ’लोक’ का हिस्सा बना और इसीलिए उसमें सदा आम आदमी को अपना अक्स नज़र आता रहा। कथाएं चाहे अन्त में समझौते की बातें करती रही हों, और व्यवस्था के हित वाले नतीजे सुनाती रही हों, उन कथाओं में मज़लूम के विद्रोह को आवाज़ मिलती रही। लेकिन इस उत्सवधर्मी माहौल में हमें उस नमक को नहीं भूलना चाहिए जिसे इस सिनेमा के अंधेरे विस्तारों में रहकर इसके सर्जकों ने बहाया। के आसिफ़ जैसे निर्देशक जिनका सपना उनकी ज़िन्दगी बन गया और उस एक चहेते सपने का साथ उन्होंने नाउम्मीदी के अकेले रास्तों में भी नहीं छोड़ा। शंकर शैलेन्द्र जैसे निर्माता जिन्होंने अपने प्यारे सपने को खुद तिनका-तिनका जिया और उसके असमय टूटने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

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’शांघाई’ के सर्वहारा

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हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी महिला चाहती हैं कि स्पीकर पर बज रहे फ़िल्म के गाने की आवाज़ थोड़ी बढ़ा दी जाए। लेकिन अब विश्वविद्यालय के अपने कायदे हैं और प्रकाश उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। वे महिला चाहती हैं कि दिबाकर और टीम जब आएं ठीक उस वक़्त अगर “भारत माता की जय” बज रहा हो और वो भी बुलन्द आवाज में तो कितना अच्छा हो। मैं यह बात हेमंत को बताता हूँ तो वह कहता है कि समझो, वे पीआर से हैं, यही उनका ’वन पॉइंट एजेंडा’ है। हेमन्त, जिनकी ’शटलकॉक बॉयज़’ प्रदर्शन के इन्तज़ार में है, जेएनयू के लिए नए हैं। मैं हेमन्त को कहता हूँ कि ये सामने जो तुम सैंकड़ों की भीड़ देख रहे हो ना, ये भी भीड़ भर नहीं। यहाँ भी हर आदमी अपने में अलग किरदार है और हर एक का अपना अलग एजेंडा है।

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