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पान सिंह तोमर वाया साहिब, बीवी अौर गैंग्स्टर

ज़्यादा पुरानी बात नहीं है। 'पान सिंह तोमर' बनकर तैयार थी अौर उसे मठाधीशों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन के अयोग्य ठहराकर डिब्बे में बंद किया जा चुका था। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया अंतिम उम्मीद हारकर अब नए काम की तलाश में थे अौर नायक इरफ़ान, फिल्म के लेखक संजय चौहान के शब्दों ...

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April 1, 2013

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अपने अपने रिचर्ड पारकर

कुछ महीने पहले 'चकमक' के दोस्तों के लिए यह परिचय लिखा था 'Life Of Pi' किताब/ फिल्म का. साथ ही किताब से मेरा पसन्दीदा अंश, यात्रा बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब के हिन्दी अनुवाद 'पाई पटेल की अजब दास्तान' से साभार यहाँ. पिछले दिनों जब लंदन से लौटी हमारी दोस्त हमारे लिए ...

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March 13, 2013

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यथार्थ की उलटबांसियाँ : मटरू की बिजली का मंडोला

" बड़ी प्रार्थना होती है। जमाखोर अौर मुना़फाखोर साल-भर अनुष्ठान कराते हैं। स्मगलर महाकाल को नरमुण्ड भेंट करता है। इंजीनियर की पत्नी भजन गाती हैं - 'प्रभु कष्ट हरो सबका'। भगवन्‌, पिछले साल अकाल पड़ा था तब सक्सेना अौर राठौर को अापने राहत कार्य दिलवा दिया था। प्रभो, इस साल ...

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January 21, 2013

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में 'नया' क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा सिनेमा में क्या बदला? क्या कथा बदली? इसका शायद ...

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January 2, 2013

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केंचुल उतारता शहर

हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म 'शाहिद' के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म 'दिल पे मत ले यार' पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे ...

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December 21, 2012

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कितने बाजू, कितने सर

एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ...

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November 30, 2012

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

पिछले दिनों रिलीज़ हुई ‘आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया था। न जाने क्या हुआ कि हमने उसके बाद सौरभ ...

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October 22, 2012

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बच्चन

वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद ...

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October 11, 2012

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’बरफ़ी’ का रेलगाड़ी वाला शहर

"हर भले आदमी की एक रेल होती है जो माँ के घर की ओर जाती है सीटी बजाती हुई धुआँ उड़ाती हुई" ~ आलोक धन्वा अनुराग बासु की ’बरफ़ी’ कुछ मायनों में चुनौतीपूर्ण फ़िल्म है और बहुत से मामलों में बहुत पारम्परिक। पारम्परिक इन मायनों में कि यह एक ख़ास समय, स्थान और ...

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September 29, 2012

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खुले सिरों वाला सिनेमा और व्याख्याकार की दुविधा

प्रेमचंद की अंतिम कहानियों में से एक ’कफ़न’, जितनी प्रसिद्ध कथा है उतनी ही विवादास्पद भी रही है। मूलरूप से विवाद की जड़ में रहा है कहानी के मुख्य दलित पात्रों ’धीसू’ और ’माधव’ का चित्रण। अपनी मरती हुई पत्नी और बहु के कफ़न के पैसों को उड़ा नाच रहे ...

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August 11, 2012