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	<title>आवारा हूँ...</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9&#8242; सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 17:32:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">यह <strong>ऑस्कर</strong> भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे <strong>’अवतार’</strong> और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा <strong>’दि हर्ट लॉकर’</strong> के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म <strong>’डिस्ट्रिक्ट 9’</strong> को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूँ. नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं. कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से&#8230;</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-412" title="avatar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster-200x300.jpg" alt="avatar" width="200" height="300" /></a>अवतार </strong>: मेरी नज़र में इस फ़िल्म की खूबियाँ और कमियाँ दोनों एक ही विशेषता से निकली हैं. वो है इसकी युनिवर्सल अपील और लोकप्रियता. यह दरअसल जेम्स कैमेरून की ख़ासियत है. उनकी पिछली फ़िल्में ’टाइटैनिक’ और ’टर्मिनेटर 2 : जजमेंट डे’ इसकी गवाह हैं. मुझे आज भी याद है कि ’टर्मिनेटर 2’ ही वो फ़िल्म थी जिसे देखते हुए मुझे बचपन में भी ख़ूब मज़ा आया था जबकि उस वक़्त मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्में कम ही समझ आती थीं. तो ख़ूबी ये कि इसकी कहानी सरल है, आसानी से समझ आने वाली. जिसकी वजह से इसे विश्व भर में आसानी से समझा और सराहा जा रहा है. और कमी भी यही कि इसकी कहानी सरल है, परतदार कहानियों की गहराईयों से महरूम. जिसकी वजह से इसके किरदार एकायामी और सतही जान पड़ते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म की अच्छी बात तो यही कही जा सकती है कि यह नष्ट होती प्रकृति को इंसानी लिप्सा से बचाए जाने का ’पावन संदेश’ अपने भीतर समेटे है. लेकिन यह ’पावन संदेश’ ऐसा मौलिक तो नहीं जिसे सारी दुनिया एकटक देखे. सच्चाई यही है कि ’अवतार’ का असल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है. किरदारों और कहानी के उथलेपन को यह तकनीक द्वारा प्रदत्त गहराई से ढकने की कोशिश करती है. यही वजह है कि फ़िल्म की हिन्दुस्तान में प्रदर्शन तिथि को दो महीने से ऊपर बीत जाने के बावजूद कनॉट प्लेस के ’बिग सिनेमा : ओडियन’ में सप्ताहांत जाने पर हमें टिकट खिड़की से ही बाहर का मुँह देखना पड़ता है. मानना पड़ेगा, थ्री-डी अनुभव चमत्कारी तो है. पैन्डोरा के उड़ते पहाड़ और छूते ही बंद हो जाने वाले पौधे विस्मयकारी हैं. और एक भव्य क्लाईमैक्स के साथ वो मेरी उम्मीदें भी पूरी करती है. लेकिन मैं अब भी नहीं जानता हूँ कि अगर इसे एक सामान्य फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसमें कितना ’सत्त’ निकलेगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-413" title="the-hurt-locker" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker-193x300.jpg" alt="the-hurt-locker" width="193" height="300" /></a>दि हर्ट लॉकर</strong> : बहुत उम्मीदों के साथ देखी थी शायद, इसलिए निराश हुआ. बेशक बेहतर फ़िल्म है. लेकिन ’आउट ऑफ़ दि बॉक्स’ नहीं है मेरे लिए. कुछ खास पैटर्न हैं जो इस तरह की हॉलिवुडीय ’वॉर-ड्रामा’ फ़िल्में फ़ॉलो करती हैं, हर्ट लॉकर भी वो करती है. फिर भी, मेरी समस्याएं शायद इससे हैं कि वो जो दिखा रही है, आखिर बस वही क्यों दिखा रही है? लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि वो जिस पक्ष की कहानी दिखाना चाहती है उसे असरदार तरीके से दिखा रही है. एक स्तर पर ’दि हर्ट लॉकर’ की तुलना स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ से की जा सकती है. लेकिन यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि एक महिला द्वारा निर्देशित होने के बावजूद यह बहुत ही मर्दवादी फ़िल्म है. बेशक युद्ध-फ़िल्मों में एक स्तर पर ऐसा होना लाज़मी भी है. इसका नायक एक ’सम्पूर्ण पुरुष नायकीय छवि’ वाला नायक है. तुलना के लिए बताना चाहूँगा कि ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ में जिस तरह टॉम हैंक्स अपने किरदार में एक फ़ेमिनिस्ट अप्रोच डाल देते हैं उसका यहाँ अभाव है.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरी नज़र में हर्ट लॉकर का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है उसका ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’. और तनाव निर्माण का इससे बेहतर सांचा और क्या मिलेगा, फ़िल्म का नायक एक बम निरोधक दस्ते का सदस्य है और इराक़ में कार्यरत है. मुझे न जाने क्यों हर्ट लॉकर बार-बार दो साल पहले आई हिन्दुस्तानी फ़िल्म ’आमिर’ की याद दिला रही थी. कोई सीधा संदर्भ बिन्दु नहीं है. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों का मुख्य आधार तनाव की सफ़ल संरचना है और दोनों ही फ़िल्मों में विपक्ष का कोई मुकम्मल चेहरा कभी सामने नहीं आता. और गौर से देखें तो हर्ट लॉकर में वही अंतिम प्रसंग सबसे प्रभावशाली बन पड़ा है जहाँ अंतत: ’फ़ेंस के उधर’ मौजूद मानवीय चेहरा भी नज़र आता है. ’दि हर्ट लॉकर’ आपको बाँधे रखती है. और कुछ दूर तक बना रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-415" title="inglourious-basterds" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds-205x300.jpg" alt="inglourious-basterds" width="205" height="300" /></a>इनग्लोरियस बास्टर्ड्स</strong> : मैं मूलत: टैरेन्टीनो की कला का प्रशंसक नहीं हूँ. मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्त उसके गहरे मुरीद हैं. इस ज़मीन पर खड़े होकर मेरी टैरेन्टीनो से बात शुरु होती है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ शुद्ध एतिहासिक संदर्भों के साथ एक शुद्ध काल्पनिक कहानी है. ख़ास टैरेन्टीनो की मोहर लगी. इस फ़िल्म को आप टैरेन्टीनो के पुराने काम के सन्दर्भ में पढ़ते हैं. ’पल्प फ़िक्शन’ के संदर्भ में पढ़ते हैं. पिछली संदर्भित फ़िल्म ’दि हर्ट लॉकर’ की तरह ही ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ भी अपनी कथा-संरचना में ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’ को अपना आधार बनाती है. फ़िल्म का शुरुआती प्रसंग ही देखें, उसमें ’तनाव निर्माण’ और उसके साथ बदलता इंसानी व्यवहार देखें. आप समझ जायेंगे कि टैरेन्टीनो इस पद्धति के साथ हमारा परिचय इंसानी व्यव्हार की कमज़ोरियों, उसकी कुरूपताओं से करवाने वाले हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">और इस शुरुआती प्रसंग के साथ ही क्रिस्टोफर वॉल्टज़ परिदृश्य में आते हैं. मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रैड पिट का काम भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वॉल्टज़ यहाँ निर्विवाद रूप से बहुत आगे हैं. उनका लोकप्रियता ग्राफ़ इससे नापिए कि अपने क्षेत्र में (सहायक अभिनेता) आई.एम.डी.बी. पर उन अकेले को जितने वोट मिले हैं वो बाक़ी चार नामांकितों को मिले कुल वोट के दुगुने से भी ज़्यादा है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ को सम्पूर्ण फ़िल्म के बजाए अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर पढ़ा जाना चाहिए. यह टैरेन्टीनो को पढ़ने का पुराना तरीका है, उन्हीं का दिया हुआ. हिंसा की अति होते हुए भी उनकी फ़िल्म कुरूप नहीं होती, बल्कि वह एक दर्शनीय फ़िल्म होती है. जैसा मैंने पहले भी कहा है, वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे हैं. यह फ़िल्म उस किताब का अगला पाठ है. कई सारे उप-पाठों में बँटा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-416" title="up in the air" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster-202x300.jpg" alt="up in the air" width="202" height="300" /></a>अप इन दि एयर</strong> : जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. और ढेर सारा स्टाइल. इस फ़िल्म का सबसे बड़ा बिन्दु मेरी नज़र में यही है. यह एक बेहतर तरीके से बनाई, सेंसिबल कहानी है जिसकी जान इसके ट्रीटमेंट में छिपी है. तुलना के लिए फ़रहान अख़्तर की फ़िल्में देखी जा सकती हैं. शहर दर शहर उड़ती इस फ़िल्म के किरदार कॉर्पोरेट में काम करने वाले मेरे दोस्तों को बहुत रिलेटेबल लग सकते हैं. फ़िल्म में बहुत से तीखे प्रसंग हैं जिन्हें कसी स्क्रिप्ट में पेश किया गया है. और वो बहन-साढू की तसवीर के साथ एयरपोर्ट-एयरपोर्ट घूमना तो बहुत ही मज़ेदार है. क्या पुरस्कार मिलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सुना है कि यह कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों की दौड़ में दूसरे नम्बर पर भाग रही है. अगर आप इस रविवार एक ’अच्छी’ फ़िल्म देखकर अपनी शाम सुकून से बिताना चाहते हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-417" title="district 9" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster-203x300.jpg" alt="district 9" width="203" height="300" /></a>डिस्ट्रिक्ट 9</strong> : नामांकनों की लम्बी सूची में यह सबसे चमत्कारी फ़िल्म है. जी हाँ, यह मैं बहुचर्चित ’अवतार’ थ्री-डी में देखने के बाद कह रहा हूँ. दरअसल मैं इसी फ़िल्म पर बात करना चाहता हूँ. ‘डिस्ट्रिक्ट 9’ आपको हिला कर रख देती है. ध्वस्त कर देती है. यह दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है. इस विज्ञान-फंतासी को इसका तकनीकी पक्ष नहीं, इसका विचार अद्भुत फ़िल्म बनाता है. ऐसा विचार जो आपको डराता भी है और आपकी आँखे भी खोलता है.</p>
<p style="text-align: justify;">जिस तरह पिछले साल आयी फ़िल्म ’दि डार्क नाइट’ सुपरहीरो फ़िल्मों की श्रंखला में एक पीढ़ी की शुरुआत थी उसी तरह से ’डिस्ट्रिक्ट 9’ विज्ञान-फंतासी के क्षेत्र में एक नई पीढ़ी के कदमों की आहट है. ’डार्क नाइट’ एक सामान्य सुपरहीरो फ़िल्म न होकर एक दार्शनिक बहस थी. यह उस शहर के बारे में खुला विचार मंथन थी जिसकी किस्मत एक अनपहचाने, सिर्फ़ रातों को प्रगट होने वाले, मुखौटा लगाए इंसान के हाथों में कैद है. क्या उस शहर को किसी भी अन्य सामान्य शहर की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? ठीक उसी तरह, ’डिस्ट्रिक्ट 9’ भी एक सामान्य ’एलियन फ़िल्म’ न होकर एक प्रतीक सत्ता है. हमारी धरती पर घटती एक ’एलियन कथा’ के माध्यम से यह आधुनिक इंसानी सभ्यता की कलई खोल कर रख देती है. विकास की तमाम बहसें, उसके भोक्ता, उसके असल दुष्परिणाम, हमारे शहरी संरचना के विकास की अनवरत लम्बी होती रेखा और हाशिए पर खड़ी पहचानों से उसकी टकराहट, भेदभाव, इंसानी स्वभाव के कुरूप पक्ष, सभी कुछ इसमें समाहित है. और इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अपनी उस पूर्ववर्ती की तरह ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को भी ऑस्कर में नज़रअन्दाज़ कर दिया जाएगा. ’सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ की दौड़ में उसका शामिल होना भी सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो पाया है कि अकादमी ने इस बार नामांकित फ़िल्मों की संख्या 5 से बढ़ाकर 10 कर दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी शुरुआत से ही ’डिस्ट्रिक्ट 9’ एक प्रामाणिक डॉक्युड्रामा का चेहरा पहन लेती है. मेरे ख़्याल से यह अद्भुत कथा तकनीक फ़िल्म के लिए आगे चलकर अपने मूल विचार को संप्रेषित करने में बहुत कारगर साबित होती है. शुरुआत से ही यह अपना मुख्य घटनास्थल (जहाँ स्पेसशिप आ रुका है) अमरीका के किसी शहर को न बनाकर जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) को बनाती है और केन्द्रीकृत विश्व-व्यवस्था के ध्रुव को हिला देती है. एलियन्स का घेट्टोआइज़ेशन और उनका शहर से उजाड़ा जाना हमारे लिए ऐसा आईना है जिसमें हमारे शहरों को अपना विकृत होता चेहरा देखना चाहिए. और इस ’रियलिटी चैक’ के बाद कहानी जो मोड़ लेती है वो आपने सोचा भी नहीं होगा. फ़िल्म का अंतिम दृश्य एक कभी न भूलने वाला, हॉन्टिंग असर मेरे ऊपर छोड़ गया है. नए, बेहतरीन कलाकारों के साथ इस फ़िल्म का चेहरा और प्रामाणिक बनता है लेकिन तकनीक में यह कोई ओछा समझौता नहीं करती.</p>
<p style="text-align: justify;">मैं आश्चर्यचकित हूँ इस बात से कि क्यों इस फ़िल्म के निर्देशक को हम इस साल के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में नहीं गिन रहे? और शार्लटो कोप्ले (Sharlto Copley) जिन्होंने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है को क्यों नहीं इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता गिना जा रहा? क्या, हिंसा की अति? इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की समूची यात्रा (फ़िल्म की शुरुआत से आखिर तक का कैरेक्टर ग्राफ़) इतनी बदलावों से भरी, अविश्वसनीय और हृदय विदारक है कि उसका सर्वश्रेष्ठ की गिनती में न होना उस सूची के साथ मज़ाक है.</p>
<p style="text-align: justify;">पोस्ट ’क्योटो’ और ’कोपनहेगन’ काल में यह कोरा संयोग नहीं है कि दो ऐसी विज्ञान फंतासियाँ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की दौड़ में हैं जिनमें मनुष्य प्रजाति खलनायक की भूमिका निभा रही है. यह और भी रेखांकित करने लायक बात इसलिए भी बन जाती है जब पता चले कि बीते सालों में अकादमी विज्ञान-फंतासियों को लेकर आमतौर से ज़्यादा नरमदिल नहीं रही है. असल दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है कि अब ’साइंस-फ़िक्शन’ सिनेमा अपनी सही राह पहचान गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-418" title="up" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar-202x300.jpg" alt="up" width="202" height="300" /></a>अप </strong>: वाह, क्या फ़िल्म है. एक खडूस डोकरा (बूढ़ा) अपने घर के आस-पास फैलते जाते शहर से परेशान है. और वो अपने घर में ढेर सारे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है, अपने सपनों की दुनिया की ओर! क्या कमाल की बात है कि यह एनिमेशन फ़िल्म भी हमारे यांत्रिक होते जा रहे शहरी जीवन और शहरी विकास के मॉडल पर एक तीखी टिप्पणी है. ’अप’ एनीमेशन फ़िल्म होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए नामांकित हुई है. इससे ही आप उसके चमत्कार का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ख़ास बात देखने की है कि पिछले साल की विजेता ’वॉल-ई’ की तरह ही यह भी इंसानी सभ्यता के अंधेरे मोड़ की तरफ़ जाने की एक कार्टूनीकृत भविष्यवाणी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या आपको मालूम है </strong>:</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- इस साल पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के दो सबसे बज़बूत दावेदार जेम्स कैमेरून (अवतार) और कैथेरीन बिग्लोव (दि हर्ट लॉकर) पूर्व पति-पत्नी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- तमाम अन्य पूर्ववर्ती पुरस्कार तथा सिनेमा आलोचक इस बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मुकाबला इन्हीं दोनों पूर्व पति-पत्नी जोड़े के बीच गिन रहे हैं. लेकिन आम दर्शक के बीच आप क्वेन्टीन टैरेन्टीनो (इनग्लोरियस बास्टर्ड्स) की लोकप्रियता और प्रभाव का अन्दाज़ा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि आई.एम.डी.बी. वेबसाइट पर पब्लिक पोल में ऑस्कर की पिछली रात तक भी वे दूसरे स्थान पर चल रहे थे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- ऑस्कर के पहले मिलने वाला इंडिपेंडेंट सिनेमा का ’स्पिरिट पुरस्कार’ बड़ी मात्रा में ’प्रेशियस’ ने जीता है. कई सिनेमा आलोचक इस फ़िल्म में माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा मोनिक्यू (Mo’nique) की भूमिका को इस साल का सर्वश्रेष्ठ अदाकारी प्रदर्शन गिन रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- अगर कैथरीन बिग्लोव ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता (और जिसकी काफ़ी संभावना है.) तो वे यह पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला होंगी. इससे पहले केवल तीन महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए नामांकित हुई हैं. लीना वार्टमुलर (Lina Wertmuller) ’सेवन ब्यूटीज़’ के लिए (1976), जेन कैम्पियन (Jane Campion) ’दि पियानो’ (1993) के लिए और बहुचर्चित ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ (2003) के लिए सोफ़िया कोपोला (Sofia Coppola).</p>
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		<title>परदे पर प्यार के यादगार लम्हें</title>
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		<pubDate>Mon, 15 Feb 2010 17:45:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
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		<description><![CDATA[हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न पाए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2741.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-404" title="IMG_2741" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2741-196x300.jpg" alt="IMG_2741" width="196" height="300" /></a>हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न पाए हों लेकिन प्यार का इज़हार तो बेशक उन्हीं से सीखा है. हिन्दी सिनेमा इस मायने में भी एक अनूठी दुनिया रचता है कि यह हमारी उन तमाम कल्पनाओं को असलियत का रंग देता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के छोटे कस्बों और बीहड़ शहरों में जवान होते पूरा करना हमारे जैसों के लिए मुमकिन नहीं. सिनेमा और उसके सिखाए प्रेम के इस फ़लसफ़े का असल अर्थ पाना है तो इस महादेश के भीतर जाइए, अंदरूनी हिस्सों में. व्यवस्था के बँधनों के विपरीत जन्म लेती हर प्रेम कहानी पर सिनेमा की छाप है. किसी ने पहली मुलाकात के लिए मोहल्ले के थियेटर का पिछवाड़ा चुना है तो किसी ने एक फ़िल्मी गीत काग़ज़ पर लिख पत्थर में लपेटकर मारा है. हम सब ऐसे ही बड़े हुए हैं, थोड़े से बुद्धू, थोड़े से फ़िल्मी. पेश हैं एक चयन हिन्दी सिनेमा से, प्रेम में गुँथा. हिन्दी सिनेमा के दस प्रेम दृश्य, जिन्हें देखकर हमारी मौहब्बत की परिभाषाएं बनती- बदलती रहीं हैं. बेशक चयन है और चयन हमेशा विवादास्पद होते हैं, लेकिन साथ यहाँ कोशिश उस प्रभाव को पकड़ने की भी है जिसे हम वक़्त-बेवक़्त ’सिनेमा हमारे जीवन में’ कहकर चिह्नित करते रहे हैं&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>1. प्यासा.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सिगरेट का धुआँ उड़ाते गुरुदत्त और दूर से उन्हें तकती वहीदा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/pyaasa.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-391" title="pyaasa" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/pyaasa-150x150.jpg" alt="pyaasa" width="150" height="150" /></a>यह एक साथ हिन्दी सिनेमा का सबसे इरॉटिक और सबसे पवित्र प्रेम-दृश्य है. अभी-अभी नायिका गुलाबो (वहीदा रहमान) को एक पुलिसवाले के चंगुल से बचाने के लिए नायक विजय (गुरुदत्त) ने अपनी पत्नी कहकर संबोधित किया है. नायिका जो पेशे से एक नाचनेवाली तवायफ़ है अपने लिए इस ’पवित्र’ संबोधन को सुनकर चकित है. न जाने किस अदृश्य बँधन में बँधी नायक के पीछे-पीछे आ गई है. नायक छ्त की रेलिंग के सहारे खड़ा सिगरेट का धुआँ उड़ा रहा है और नायिका दूर से खड़ी उसे तक रही है. कुछ कहना चाहती है शायद, कह नहीं पाती. लेकिन बैकग्राउंड में साहिर का लिखा, एस.डी. द्वारा संगीतबद्ध और गीता दत्त का गाया भजन ’आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफ़ल हो जाए’ बहुत कुछ कह जाता है. इस ’सभ्य समाज’ द्वारा हाशिए पर डाल बार-बार तिरस्कृत की गई दो पहचानें, एक कवि और दूसरी वेश्या, मिलकर हमारे लिए प्रेम का सबसे पवित्र अर्थ गढ़ते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>2. मुग़ल-ए-आज़म.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मधुबाला को टकटकी लगाकर निहारते दिलीप.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/mughal-e-azam1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-394" title="mughal-e-azam1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/mughal-e-azam1.jpg" alt="mughal-e-azam1" width="150" height="150" /></a>कहते हैं कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में डाइरेक्टर से लेकर स्पॉट बॉय तक हर आदमी के पास सुनाने के लिए ’मुग़ल-ए-आज़म’ से जुड़ी एक कहानी होती है. के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म हिन्दुस्तान में बनी पहली मेगा फ़िल्म थी जिसने आगे आने वाली पुश्तों के लिए फ़िल्म निर्माण के पैमाने ही बदल दिए. लेकिन मुग़ल-ए-आज़म कोरा इतिहास नहीं, हिन्दुस्तान के लोकमानस में बसी प्रेम-कथा का पुनराख्यान है. एक बांदी का राजकुमार से प्रेम शहंशाह को नागवार है लेकिन वो प्रेम ही क्या जो बंधनों में बँधकर हो. चहुँओर से बंद सामंती व्यवस्था के गढ़ में प्रेम की खुली उद्घोषणा स्वरूप ’प्यार किया तो डरना क्या’ गाती अनारकली को कौन भूल सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">यही याद बसी है हम सबके मन में. शहज़ादा सलीम (दिलीप कुमार) एक पँखुड़ी से हिन्दी सिनेमा की अनिन्द्य सुंदरी अनारकली (मधुबाला) के मुखड़े को सहला रहे हैं और बैकग्राउंड में तानसेन की आवाज़ बनकर ख़ुद उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ’प्रेम जोगन बन के’ गा रहे हैं. मुग़ल-ए-आज़म सामंती समाज में विरोध स्वरूप तन-कर खड़े ’प्रेम’ का अमर दस्तावेज़ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>3. दिल चाहता है.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एक बार घूँसा, दूसरी बार इक़रार.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/dil-chahta-hai1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-395" title="dil chahta hai" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/dil-chahta-hai1.jpg" alt="dil chahta hai" width="150" height="150" /></a>एक ही डायलॉग ’दिल चाहता है’ के दो सबसे महत्वपूर्ण अंश रचता है. वो डायलॉग है एक कवितामय सा प्यार का इज़हार. पहली बार कॉलेज की पार्टी में यह फ़िल्म का सबसे हँसोड़ प्रसंग है तो दूसरी बार आने पर यह आपकी आँखें गीली कर देता है. बेशक आकाश (आमिर ख़ान) को शालिनी (प्रीटि ज़िन्टा) से प्यार है लेकिन बकौल समीर कौन जानता था कि उसे यह प्यार का इज़हार किसी दूसरे की शादी में दो सौ लोगों के सामने करना पड़ेगा! लेकिन क्या करें कि इस भागती ज़िन्दगी में रुककर प्यार जैसे मुलायम अहसास को समझने में अक़्सर ऐसी देर हो जाया करती है. ’दिल चाहता है’ ट्रेंड सैटर फ़िल्म थी. नई पीढ़ी के लिए आज भी नेशनल एंथम सरीख़ी है और यह ’इज़हार-ए-दिल’ प्रसंग उसके भीतर जड़ा सच्चा हीरा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>4. मि. एण्ड मिसेस अय्यर.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एक हनीमून की कहानी जो कभी मनाया ही नहीं गया.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/mr-mrs-iyer1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-396" title="mr &amp; mrs iyer" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/mr-mrs-iyer1.jpg" alt="mr &amp; mrs iyer" width="150" height="150" /></a>कल्पनाएं हमेशा हमारे सामने असलियत से ज़्यादा रूमानी और दिलकश मंज़र रचती हैं. ख्वाब हमेशा ज़िन्दगी से ज़्यादा दिलफ़रेब होते हैं. एक दक्षिण भारतीय गृहणी मीनाक्षी अय्यर (कोंकणा सेन) ने अपने मुस्लिम सहयात्री (राहुल बोस) की दंगाइयों से जान बचाने के लिए उन्हें अपना पति ’मि. अय्यर’ घोषित कर दिया है और अब पूरी यात्रा उन्हें इस झूठ को निबाहना है. और इसी कोशिश में ’मि. अय्यर’ साथ सफ़र कर रही लड़कियों को अपने हनीमून की कहानी सुनाते हैं. नीलगिरी के जगलों में एक पेड़ के ऊपर बना छोटा सा घर. पूरे चाँद वाली रात. यह एक फोटोग्राफ़र की आँख से देखा गया दृश्य है. और पीछे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का धीमे-धीम ऊँचा उठता संगीत. नायिका को पता ही नहीं चलता और वो इस नयनाभिराम मंज़र में डूबती जाती है. सबसे मुश्किल वक़्तों में ही सबसे मुलायम प्रेम कहानियाँ देखी जाती हैं. ’मि. एंड मिसेस अय्यर’ ऐसी ही प्रेम कहानी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>5. स्पर्श.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">प्रेम की सुगंध-आवाज़-स्पर्श का अहसास.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/sparsh1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-397" title="sparsh" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/sparsh1.jpg" alt="sparsh" width="150" height="150" /></a>सई परांजपे की ’स्पर्श’ इस चयन में शायद थोड़ी अजीब लगे, लेकिन उसका होना ज़रूरी है. फ़िल्म के नायक अनिरुद्ध (नसीरुद्दीन शाह) जो एक ब्लाइंड स्कूल के प्रिसिपल हैं देख नहीं सकते. वे हमारी नायिका कविता (शबाना आज़मी) से जानना चाहते हैं कि वे दिखती कैसी हैं? अब कविता उन्हें बोल-बोलकर बता रही हैं अपनी सुंदरता की वजहें. अपनी आँखों के बारे में, अपनी जुल्फ़ों के बारे में, अपने रंग के बारे में. लेकिन इसका याद रह जाने वाला हिस्सा आगे है जहाँ अनिरुद्ध बताते हैं कि यह रूप रंग तो मेरे लिए बेकार है. मेरे लिए तुम इसलिए सुंदर हो क्योंकि तुम्हारे बदन की खुशबू लुभावनी है, निषिगंधा के फूलों की तरह. तुम्हारी आवाज़ मर्मस्पर्शी है, सितार की झंकार की तरह. और तुम्हारा स्पर्श कोमल है, मख़मल की तरह. यह प्रसंग हिन्दी सिनेमा में ’प्रेम’ को एक और आयाम पर ले जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>6. सोचा न था.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ईमानदार दुविधाओं से निकलकर इज़हार-ए-इश्क.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/socha-na-tha1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-398" title="socha na tha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/socha-na-tha1.jpg" alt="socha na tha" width="150" height="150" /></a>आज की पीढ़ी के पसंदीदा ’लव गुरु’ इम्तियाज़ अली की वही अकेली प्रेम-कहानी को अपने सबसे प्रामाणिक और सच्चे फ़ॉर्म में आप उनकी पहली फ़िल्म ’सोचा न था’ में पाते हैं. नायक आधी रात नायिका की बालकनी फाँदकर उसके घर में घुस आया है और पूछ रहा है, “आखिर क्या है मेरे-तुम्हारे बीच अदिति?” दरअसल यह वो सवाल है जो उस रात वीरेन (अभय देओल) और अदिति (आयशा टाकिया) एक-दूसरे से नहीं, अपने आप से पूछ रहे हैं. और जब उस निर्णायक क्षण उन्हें अपने दिल से वो सही जवाब मिल जाता है तो देखिए कैसे दोनों सातवें आसमान पर हैं! इस इज़हार-ए-मोहब्बत के पहले नायिका जितनी मुख़र है, बाद में उतनी ही ख़ामोश. बरबस ’मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ याद आती है. इम्तियाज़ की प्रेम-कहानियों में प्यार को लेकर वही संशय भाव मिलता है जिसे हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ’कसप’ में पाते हैं. उनकी इन दुविधाग्रस्त लेकिन हद दर्जे तक ईमानदार प्रेम-कहानियों ने हमारे समय में ’प्रेम’ के असल अर्थ को बचाकर रखा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>7. दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पलट&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/ddlj1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-399" title="ddlj" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/ddlj1.jpg" alt="ddlj" width="150" height="150" /></a>“राज, अगर ये तुझे प्यार करती है तो पलट के देखेगी. पलट&#8230; पलट&#8230;” और बनती है मेरे दौर की सबसे चहेती प्रेम कहानी. उस पूरे दौर को ही ’डीडीएलजे’ हो गया था जैसे. हमारी प्रेमिकाओं के कोडनेम ’सिमरन’ होने लगे थे और हमारी पीढ़ी ने अपना बिगड़ैल नायक पा लिया था. हम लड़कपन की देहरी पर खड़े थे और अपनी देहभाषा से ख़ुद को अभिव्यक्त करने वाला शाहरुख़ हमारे लिए प्यार के नए फ़लसफ़े गढ़ रहा था. हर दौर की अपनी एक प्रेम-कहानी होती है. परियों वाली प्रेम-कहानी. मेरे समय ने अपनी ’परियों वाली प्रेम कहानी’ शाहरुख़ की इस एक ’पलट’ के साथ पाई.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>8. दिल से.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ढाई मिनट की प्रेम कहानी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/dil-se1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-400" title="dil se" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/dil-se1.jpg" alt="dil se" width="150" height="150" /></a>हिन्दी सिनेमा में आई सबसे छोटी प्रेम-कहानी. नायक (शाहरुख़ ख़ान) रेडियो पर नायिका (मनीषा कोईराला) से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा एक गीतों भरी कहानी में पिरोकर सुना रहा है और नायिका अपने कमरे में बैठी उस किस्से को सुन रही है, समझ रही है कि ये उसके लिए ही है. इस किस्से में सब-कुछ है, अकेली रात है, बरसात है, सुनसान प्लेटफ़ॉर्म है, दौड़ते हुए घोड़े हैं, बिखरते हुए मोती हैं. यही वो दृश्य है जिसके अंत में रहमान और गुलज़ार द्वारा रचा सबसे खूबसूरत और हॉन्टिंग गीत ’ए अजनबी’ आता है. नायक अभी नायिका का नाम तक नहीं जानता है लेकिन ये कमबख़्त इश्क कब नाम पूछकर हुआ है भला.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>9. तेरे घर के सामने.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कुतुब के भीतर ’दिल का भँवर करे पुकार’.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/tere-ghar-ke-samne1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-401" title="tere ghar ke samne" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/tere-ghar-ke-samne1.jpg" alt="tere ghar ke samne" width="150" height="150" /></a>दिल्ली की कुतुब मीनार के भीतर नूतन देव आनंद से पूछती हैं कि क्या तुम्हें ख़ामोशी की आवाज़ सुनाई देती है? और देव आनंद अपने चुहल भरे अंदाज़ में नूतन से कहते हैं कि हमें तो बस एक ही आवाज़ सुनाई देती है, ’दिल की आवाज़’. और हसरत जयपुरी का लिखा तथा एस. डी. बर्मन का रचा गीत आता है ’दिल का भँवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो’. यह आज़ाद भारत की सपने देखती नई युवा पीढ़ी है. बँधनों और रूढ़ियों से मुक्त. इस प्रसंग में आप एक साथ दो प्रेम कहानियों को बनता पायेंगे. और गौर से देखें तो ये दोनों ही प्रेम-कहानियाँ सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली हैं. नए-नए आज़ाद हुए मुल्क की नई बनती राजधानी इस प्रेम का घटनास्थल है और कुतुब से देखने पर इस प्यार का कद थोड़ा और ऊँचा उठ जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>10. शोले.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">माउथॉरगन बजाते अमिताभ और लैम्प बुझाती जया.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/sholay1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-402" title="sholay" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/sholay1.jpg" alt="sholay" width="150" height="150" /></a>क्या ’शोले’ के बिना लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से जुड़ा कोई भी चयन पूरा हो सकता है? वीरू और बसंती की मुँहफट और मुख़र प्रेमकहानी के बरक़्स एक साइलेंट प्रेमकहानी है जय और राधा की जिसके बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. हिन्दी सिनेमा की सबसे ख़ामोश प्रेमकहानी. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: नवभारत टाइम्स के संडे<a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5569713.cms" target="_blank"> ’स्पेशल स्टोरी’</a> में प्रकाशित. चौदह फरवरी 2010 याने वैलेंटाइन डे के दिन.</p>
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		</item>
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		<title>बंजारा नमक लाया</title>
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		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 09:14:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>
		<category><![CDATA[गाँव]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>

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		<description><![CDATA[
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है.

प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं प्रभात की उन कविताओं को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रभात</strong> की कविताओं की नई किताब <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> आई है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-368" title="IMG_2656" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg" alt="IMG_2656" width="306" height="501" /></a>प्रभात </strong>हमारा दोस्त है.<strong> प्रभात</strong> की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में <strong>’एकलव्य’</strong> पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं <strong>प्रभात</strong> की उन कविताओं को ख़ास नोटिस करता हूँ जहाँ वह हमारे साहित्य में ’क्रूर, हत्यारे शहर’ के बरक्स गाँव की रूमानी लेकिन एकतरफ़ा बनती छवि को तोड़ते हैं. यहाँ मेरी पसंदीदा कविता <strong>’मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में’</strong> आपके सामने है. उनका गाँव हिन्दुस्तान का जीता-जागता गाँव है, अपनी तमाम बेइंसाफ़ियों के साथ. लेकिन इससे उनका गाँव बेरंग नहीं होता, बेगंध नहीं होता. तमाम बेइंसाफ़ियों के बावजूद उसका रंग मैला नहीं होता. एक ’सत्तातंत्र’ गाँव में भी है और उसका मुकाबला भी उतना ही ज़रूरी है. <strong>प्रभात</strong> जब ’गाँव’ की बेइंसाफ़ियों पर सवाल करते हैं तो यह उस ’सत्तातंत्र’ पर सीधा सवाल है. <strong>प्रभात</strong> की कविता ’गाँव’ का पक्ष नहीं लेती, बल्कि गाँव के भीतर जाकर ’सही’ का पक्ष लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा हमारे दोस्त <strong>प्रमोद</strong> ने भूमिका में लिखा है कि ’पानी’ <strong>प्रभात</strong> की कविता का सबसे मुख्य किरदार है. होना भी चाहिए, राजस्थान पानी का कितना इंतज़ार करता है, पानी हमारे मानस का मूल तत्व हो जैसे. और उनकी कविता ’या गाँव को बंटाढार बलमा’ मैं यहाँ न समझे जाने का जोख़िम उठाते हुए भी दे रहा हूँ, ऐसा गीत विरले ही लिखा जाता है. कितना सीधा, सटीक. फिर भी कितना गहरा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और वजह से यह किताब ख़ास है. इस किताब में दोस्ती की मिठास है. कैसे एक दोस्त कविताएं लिखता है, दूसरा दोस्त उन कविताओं को एक बहुत ही ख़ूबसूरत किताब का रूप देता है और तीसरा दोस्त अपना लाड़ लड़ाता है एक प्यारी सी भूमिका लिख कर. मैंने बचपन में अपनी छोटी-छोटी, मिचमिचाई आँखों से इन दोस्तियों को बड़े होते देखा है. कभी ये सारे अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, कोई चित्रकार है तो कोई मास्टर. कोई संपादक हो गया है तो कोई बड़ा अफसर. कोई किसी अख़बार में काम करती है तो कोई दिखाई ही नहीं देता कई-कई साल तक. लेकिन फिर अचानक किसी दिन ये मिलकर <strong>’वितान’</strong> हो जाते हैं. और इन्हें जोड़ने का सबसे मीठा माध्यम हैं <strong>प्रभात</strong> की कविताएं. इन सारे दोस्तों को थोड़ा सा कुरेदो और <strong>प्रभात</strong> की एक कविता निकल आती है हरेक के भीतर से.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आप <strong>प्रभात</strong> की कविताएं पढ़ना और सहेजना चाहें तो इस सुंदर सी किताब को <strong>विश्व पुस्तक मेले</strong> में <strong>’एकलव्य’</strong> की स्टॉल <strong>(हॉल न.12A/ स्टॉल न.188)</strong> से सिर्फ़ साठ रु. देकर ख़रीद सकते हैं. यहाँ इस किताब से मेरी पसंदीदा कविताओं के अलावा मैं <strong>प्रमोद</strong> की लिखी भूमिका भी उतार रहा हूँ.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>ज़मीन की बटायी</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">सिर्फ़ चार के खाते है सैंकड़ो बीघा ज़मीन<br />
कुछ छह-छह बीघा में हैं बाकी सारे भूमिहीन<br />
भूमिहीन हैं जो मज़दूर मज़लूम हैं<br />
ज़िन्दा हैं मगर ज़िन्दगी से महरूम हैं<br />
जीना क्या है जीना दुखदायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ठसक रुपैये की किसी में ऎंठ लट्ठ की<br />
बड़ी पूछ बाबू तेरे गाँव में मुँहफट्ट की<br />
बड़ी पूछ उनकी जो कि छोटे काश्तकार हैं<br />
शामिल जो ज़मींदारों के संग अनाचार में<br />
चारों खण्ड गाँव घूमा पाया यही घूम के<br />
सबके हित एक से सब बैरी मज़लूम के<br />
दुखिया की नहीं सुनवायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में<br />
ऋण लेर सेर घी छँडायौ तो पै रामजी<br />
अन्न का दो दाणा भी तो दै रै म्हारा रामजी</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का<br />
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का<br />
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं<br />
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं<br />
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं<br />
जानेवाले जाने कैसी पीर छोड़ जाते हैं<br />
परदेसी तेरी अटारी राँय-बाँय रहती है<br />
मौत के सन्नाटे जैसी साँय-साँय रहती है<br />
ऎसी ना हो किसी की रुसवायी मेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी मेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>भाई रे</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ऋतुओं की आवाजाही रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खजूरों को लू में ही<br />
पकते हुए देखा<br />
किसानों को तब मेघ<br />
तकते हुए देखा<br />
कुँओं के जल को<br />
उतरते हुए देखा<br />
गाँवों के बन को<br />
झुलसते हुए देखा<br />
खेतों को अगनी में<br />
तपते हुए देखा<br />
बर्फ़ वाले के पैरों को<br />
जलते हुए देखा<br />
गाते हुए ठंडी-मीठी बर्फ़<br />
दूध की मलाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">जहाँ से उठी थी पुकारें<br />
वहाँ पर पड़ी हैं बौछारें<br />
बैलों ने देखा<br />
भैंस-गायों ने देखा<br />
सूखें दरख़्तों की<br />
छावों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">नीमों बबूलों से ऊँची-ऊँची घासें<br />
ऎसी ही थी इनकी गहरी-गहरी प्यासें<br />
सूखे हुए कुँए में मरी हुई मेंढकी<br />
ज़िन्दा हुई टर-टर टर्राई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आल भीगा पाल भीगा<br />
भरा हुआ ताल भीगा<br />
आकाश पाताल भीगा<br />
पूरा एक साल भीगा<br />
बरगदों में बैठे हुए<br />
मोरों का शोर भीगा<br />
आवाज़ें आई घिघियाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">गड़रियों ने देखा<br />
किसानों ने देखा<br />
ग्वालों ने देखा<br />
ऊँट वालों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बारिश की अब दूर<br />
चली गई झड़ियों को<br />
खेतों में उखड़ी<br />
पड़ी मूँगफलियों को<br />
हल्दी के रंग वाले<br />
तितली के पर वाले<br />
अरहर के फूलों को<br />
कोसों तक जंगल में<br />
ज्वार के फूलों को</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">दूध जैसे दानों से<br />
जड़े हुए देखा<br />
खड़े हुए बाजरे को<br />
पड़े हुए देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">चूहों ने देखा<br />
बिलावों ने देखा<br />
साँपों ने देखा<br />
सियारों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आते हुए जाड़े में<br />
हरेभरे झाड़ों की<br />
कच्ची सुगंध महमहायी रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>बंजारा नमक लाया</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">साँभर झील से भराया<br />
भैंरु मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बर्फ़ जैसी चमक<br />
चाँद जैसी बनक<br />
चाँदी जैसी ठनक<br />
अजी देसी नमक<br />
देखो ऊँटगाड़ी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कोई रोटी करती भागी<br />
कोई दाल चढ़ाती आई<br />
कोई लीप रही थी आँगन<br />
बोली हाथ धोकर आयी<br />
लायी नाज थाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">थोड़ा घर की खातिर लूँगी<br />
थोड़ा बेटी को भेजूँगी<br />
महीने भर से नमक नहीं था<br />
जिनका लिया उधारी दूँगी<br />
लेन देन की मची है धूम<br />
घर गुवाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कब हाट जाना होता<br />
कब खुला हाथ होता<br />
जानबूझ कर नमक<br />
जब ना भूल आना होता<br />
फ़ीके दिनों में नमक डाला<br />
मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>या गाँव को बंटाढार बलमा</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">याकी कबहुँ पड़े ना पार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">इसकूल कू बनबा नाय देगौ<br />
बनती इसकूल को ढाय देगौ<br />
यामैं छँट-छँट बसे गँवार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या कू एक पटैलाँई ले बैठी<br />
काँई सरपंचाई ले बैठी<br />
बोटन म लुटाया घरबार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">छोरी के बहयाव म लख देगौ<br />
छोरा के म दो लख लेगौ<br />
छोरा-छोरी कौ करै ब्यौपार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या की छोरी आगे तक रौवै है<br />
पढबा के दिनन कू खोवै है<br />
चूल्हा फूँकै झकमार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या का छोरा बिंगड़ै कोनी पढै<br />
दस्सूई सूँ आगै कोनी बढै<br />
इनकू इस्याई मिल्या संस्कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">पैलाँई कमाई कम होवै<br />
ऊपर सूँ कुरीति या ढोवै<br />
बात-बात म जिमावै बामण चार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कुटमन की काँई चलाई लै<br />
भाई कू भाई देख जलै<br />
यामै पनपै कैसे प्यार बलमा<br />
या गाँव कौ बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बनती कोई बात बनन ना दे<br />
करै भीतर घात चलन ना दे<br />
यामै कैसै सधै कोई कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">यामै म्हारी कोई हेट नहीं<br />
दिनरात खटूँ भरै पेट नहीं<br />
या गाँव म डटूँ मैं काँई खा र बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-379" title="IMG_2652" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg" alt="IMG_2652" width="247" height="430" /></a>इस किताब का नाम <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> नहीं होता तो क्या हो सकता था? शायद <strong>’प्रिय पानी’</strong> हो सकता था. इसका एक बड़ा हिस्सा है जो पानी की कथा कहता है, पानी को याद करता है. पानी वहाँ एक स्मृति है, पानी वहाँ जीवन है, पानी अपने आप में संगीत है. उसकी अपनी ध्वनियाँ हैं. गिरने की, बरसने की. फिर ऎसा क्या रहा होगा जो किताब का नाम सिर्फ़ एक गीत के नाम पर रख दिया गया होगा. दरअसल यह भी एक कहानी जैसा है कि कोई गीत अपनी ही किताब पर भारी पड़े. मगर गीत में यह वज़न आया कहाँ से है? तो वह आया है इसकी प्रसिद्धि से. दरअसल प्रभात का यह गीत लिखे जाने के दिन से ही इतना प्रसिद्ध हुआ है कि इसे नज़र अंदाज करना किसी भी किताब में किन्हीं भी गीतों के बीच मुश्किल होता. राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के जिन-जिन इलाकों में इसे किसी ने गा दिया यह तुरंत ही वहाँ के लोगों की ज़बान पर चढ़ गया और उन्होंने इसे अपनाकर प्यार देना शुरु कर दिया. यह बात इस ओर भी संकेत करती है कि उदार बाज़ारवाद के इन दिनों में इन सभी इलाकों में कहीं ना कहीं जीवन इतना ही संघर्षमय है कि उन्हें नमक जैसी चीज़ पर लिखा गया गीत अपनी ज़रूरत महसूस होता है. इस गीत की खूबसूरती है कि इसमें एक तरफ़ तो नमक के इतने सुन्दर बिम्ब हमें मिलते हैं और दूसरी तरफ़ उसी नमक के लिए ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पूरी जटिलता के साथ उपस्थित है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस किताब में दो-तीन तरह के मिजाज़ के गीत हैं. एक वे जो सीधे-सीधे प्रकृति की सुन्दरता को प्रगट करते हैं. दूसरे वे जो प्रतिरोध की आवाज़ बन जाते हैं, तीसरे वे जो जीवन को उसकी वास्तविकता में बहुत ही मार्मिक ढंग से कहते हैं और चौथे वे जो पारंपरिक मिथक कथाओं को लेकर एक ख़ास शैली में लिखे गए हैं. इस शैली को ’पद गायन’ की शैली कहते हैं और यह राजस्थान के माळ, जगरौटी इलाके (करौली, सवाईमाधोपुर व दौसा ज़िले) में मीणा व अन्य जातियों द्वारा गाए जाते हैं. यही कारण है कि किताब को इस शैली के प्रसिद्ध कवि एवं लोक गायक धवले को समर्पित किया गया है. किताब में दो भाषाएं हैं जो हमारी बहुभाषिक संस्कृति की बानगी हैं. कुछ गीत खड़ी बोली हिन्दी में हैं, कुछ उस माळ की भाषा में जो प्रभात की संवेदनात्मक ज़मीन है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह किताब इस बात की गवाह है कि काव्य किस भाषा में है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह किस चेतना के साथ है. <strong>’सीता वनवास’</strong> पद की काव्य चेतना वह सारे सवाल हमारी मनुष्य सभ्यता के सामने खड़े करती है जिनकी अपेक्षा हम आज की किसी भी कविता से करना चाहेंगे. इसी तरह चाहे वह खड़ी बोली हिन्दी में लिखा <strong>’धरती राजस्थानी है’</strong> हो या माळ की भाषा में लिखा <strong>’काळी बादळी’</strong>. दोनों में ही सूखे व अकाल की विभीषिका को व्यक्त करने वाली काव्य चेतना बहुत नज़दीक की है. इस किताब से गुज़रते हुए दो-तीन तरह की अनुभूतियाँ हो सकती हैं. एक स्थिति है जब आप नई भाषा व उसमें आए प्रकृति के नए बिम्बों के काव्य रसास्वादन से कुछ खुश व समृद्ध महसूस करते हैं. दूसरी स्थिति है जब वास्तविकता के वर्णन में काव्य की मार्मिकता आपको अन्दर तक भर देती है और आप उदास महसूस करते हैं. और तीसरी स्थिति है जब आप अपने समय पर किए जा रहे सवालों में शामिल हो जाते हैं, स्थितियों के प्रतिरोध के स्वर में शामिल हो जाते हैं, और अपने भीतर बदलाव की कोशिश करने की एक ताकत महसूस करने लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जब सपनों को सच में बदलने की ज़िद की जाती है तो वे विचार या कला की शक्ल लेते हैं. यह किताब देखे गए सपनों में से कुछ का सच में बदलना है. सपनों का वह हिस्सा जिसे आप अपने दम पर पूरा करने की कोशिश भर कर सकते हैं. <strong>&#8211;प्रमोद</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-375" title="Book cover" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg" alt="Book cover" width="650" height="495" /></a></strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>हरिश्चंद्राची फैक्टरी</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jan 2010 12:51:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.


इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे?
अच्छा जब तक तुम अपने मन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify; "><strong>यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.</strong></p>
<p style="text-align: justify; ">
<p style="text-align: justify; "><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/harishchandrachi-factory.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-326" title="harishchandrachi factory" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/harishchandrachi-factory-224x300.jpg" alt="harishchandrachi factory" width="224" height="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify; ">इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे?</p>
<p style="text-align: justify; ">अच्छा जब तक तुम अपने मन का जवाब सोचो तब तक मैं तुम्हें बताता हूँ कि जब ऐसे ही आज से तकरीबन सौ साल पहले धुंडीराज गोविन्द फालके को मूवी कैमरा मिला तो उन्होंने किस चीज़ का वीडियो बनाया? अब तुम पूछोगे कि ये अजीब से नाम वाले ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ कौन हुए? अरे बताऊँगा, लेकिन पहले किस्सा तो पूरा सुनो. उन्होंने पहला वीडियो बनाया एक उगते हुए पौधे का. अब तुम कहोगे कि उगते हुए पौधे का कोई वीडियो कैसे बना सकता है. अरे भई पौधा कोई एक दिन में थोड़े न उग आता है कि बस कैमरा लगाया और बन गया वीडियो. पहले बीज डालो, फिर पानी डालो और लगातार उसकी देखभाल करो. तब हफ़्तों में कहीं जाकर एक बीज से पौधा तैयार होता है.</p>
<p style="text-align: justify; ">ठीक कहा तुमने. लेकिन फालके भी इतनी आसानी से हार मानने वाले कहाँ थे. उन्होंने इसके लिए एक अद्भुत तरकीब खोजी. उन दिनों हाथ से हैंडल घुमाकर चलाने वाले फ़िल्म कैमरा आते थे. तो फालके साहब ने क्या किया कि कैमरा गमले के ठीक सामने रख दिया और बिना उसे अपनी जगह से हिलाए वो रोज़ एक तय समय पर उसका हैंडल घुमा देते थे. ऐसा उन्होंने एक महीने तक लगातार लिया. फिर उस पूरी रील को धोकर एक साथ प्रोजेक्टर पर चलाया. और चमत्कार! ऐसा लगा जैसे हमने अपनी आँखों के सामने एक पौधा उगते देखा हो.</p>
<p style="text-align: justify; ">और यही थी हिन्दुस्तान में बनी पहली चलती-फिरती फ़िल्म. और इसे बनानेवाले थे ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ या दादासाहब फालके.</p>
<p style="text-align: justify; ">मुझे भी यह सब पहले से कहाँ पता था. हिन्दुस्तान में बनी पहली फ़िल्म की यह कहानी और उसके साथ जुड़ी दादा साहब फालके की कहानी का मुझे पता चला नई मराठी फ़िल्म <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishchandrachi_Factory" target="_blank">’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ </a></strong>से. निर्देशक परेश मोकाशी की बनाई यह फ़िल्म दादा साहब फालके के जीवन पर आधारित है. दादा साहब फालके हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक थे. उन्होंने ही हिन्दुस्तान में फ़िल्म निर्माण की शुरुआत की और उन्हें हिन्दुस्तानी फ़िल्म उद्योग का पितामह माना जाता है. आज भी भारत सरकार फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदान के लिए जो सबसे बड़ा सम्मान देती है उसे ’दादा साहब फालके’ सम्मान कहा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify; ">लेकिन यह इतना आसान नहीं था. फ़िल्म बनाना तब नई-नई कला थी. हिन्दुस्तान में उस वक़्त फ़िल्म बनाने के बारे में कोई भी ठीक से नहीं जानता था. तरह तरह की अफ़वाहें फैली हुई थीं सिनेमा के बारे में. कोई कहता था यह आदमी से उसकी शक्ति छीन लेती है और कोई इसे अंग्रेज़ों का जादू-टोना बताता था. लेकिन गोविन्द फालके हमेशा से विज्ञान में रुचि रखते थे. विज्ञान से इसी गहरे लगाव के चलते उन्होंने फोटोग्राफी का व्यवसाय भी किया था और खुद जादू भी सीखा था. पहली बार अंग्रेज़ों के थियेटर में फ़िल्म देखकर वे इतने चमत्कृत हुए कि उन्होंने ऐसी ही फ़िल्म भारत में भी बनाने की ठान ली. क्योंकि यहाँ कोई इस कला के बारे में जानता नहीं था इसलिए उन्होंने अपने घर का सामान बेचा और जहाज़ से इंग्लैंड की यात्रा पर निकल पड़े. इंग्लैंड में रहकर उन्होंने फ़िल्म बनाने की पूरी कला सीखी. जब भारत वापस आये तो अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मिलकर फ़ैसला कर लिया कि हिन्दुस्तान की पहली फ़िल्म बनायेंगे. उन्हें उनके दोस्त अपनी ’घर फूँक, तमाशा देख’ प्रवृत्ति के कारण सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहते थे. तो उन्होंने भी तय किया कि पहली फ़िल्म सत्यवादी ’राजा हरिश्चन्द्र’ पर ही बनायेंगे.</p>
<p style="text-align: justify; ">फ़िल्म बनाते हुए भी बहुत सी मुश्किलें आईं. उस दौर में महिलाओं का नाटकों में काम करना बुरा माना जाता था और फ़िल्म तो वैसे भी एकदम नया माध्यम थी, कोई महिला फ़िल्म में काम करने को तैयार न हुई. ऐसे में पुरुषों को ही स्त्रियों के कपड़े पहन कर उनके रोल निभाने पड़े. और भी मुसीबतें थीं. फ़िल्म में स्त्रियों का रोल करने वाले पुरुष अपनी मूँछे मुंडवाने को तैयार नहीं थे. ऐसी मान्यता जो है कि मूँछें सिर्फ़ पिता की मौत के बाद मुंडवाते हैं. बड़ी मुश्किल से अभिनेता माने. फिर भी समाज में फ़िल्म में काम करने वालों को बुरी नज़र से देखा जाता था. इस मुश्किल के हल के लिए फालके ने कहा कि सारे लोग ये कहा करें कि वे ’फ़ैक्टरी’ में काम करते हैं, फ़िल्म बनाने वाली फ़ैक्टरी!</p>
<p style="text-align: justify; ">मई उन्नीस सौ तेरह में ’राजा हरिश्चन्द्र’ प्रदर्शित हुई और खूब सराही गई. सन उन्नीस सौ चौदह में फालके को फिर लंदन जाने का मौका मिला और वहाँ उनकी फ़िल्में बहुत सराही गईं. उन्हें वहाँ रहकर फ़िल्म बनाने के प्रस्ताव भी दिये गए लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तान में फ़िल्म उद्योग की स्थापना का जो सपना देखा था उसे पूरा करना उनका सबसे मुख्य ध्येय था. उन्होंने हिन्दुस्तान में ही रहकर सौ से ज़्यादा फ़िल्में बनाईं और भारत में फ़िल्म उद्योग की विधिवत शुरुआत की.</p>
<p style="text-align: justify; ">‘हरिश्चन्द्र फ़ैक्टरी’ के निर्देशक परेश मोकाशी ने फ़िल्म में दादा साहब फालके को एक ऐसे जुझारू इंसान के रूप में पेश किया है जिसने हर परेशानी का हँसकर सामना किया. फ़िल्म में एक घटना का ज़िक्र आता है. लगातार फ़िल्में देखते हुए एक रोज़ उन्हें आँखों में बहुत तकलीफ़ हुई और डॉक्टर को दिखाने पर उसने आँखों की रौशनी जाने की आशंका व्यक्त की. फालके यह सुनकर उदास हो गए. इसलिए नहीं कि आँखों की रौशनी चली जायेगी बल्कि इसलिए कि अगर उनकी आँखों की रौशनी चली गई तो फिर उनका फ़िल्म बनाने का सपना अधूरा जो रह जायेगा. ऐसे थे दादा साहब फालके!</p>
<p style="text-align: justify; ">*****</p>
<p style="text-align: justify; ">क्या तुम जानते हो:-</p>
<ul style="text-align: justify; ">
<li><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dadasaheb-phalke1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-332" title="dadasaheb-phalke" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dadasaheb-phalke1.jpg" alt="dadasaheb-phalke" width="196" height="340" /></a>फालके ने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की थी. उन्होंने कला भवन, बड़ौदा से मूर्तिकला और फोटोग्राफी सीखी. फिर उन्होंने गुजरात के गोधरा में एक फोटोग्राफी स्टूडियो खोला. लेकिन वो चला नहीं, लोगों में यह अफ़वाह जो फैल गई थी कि फोटो खिंचवाने से आदमी की ताक़त नष्ट हो जाती है.</li>
<li>वे प्रक्षिशित जादूगर भी थे. वे ’केल्फा’ नाम से जादू दिखाते थे. केल्फा मतलब समझे? अरे उनके नाम फालके का उल्टा केल्फा!</li>
<li>उन्होंने आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए भी काम किया. फिर उन्होंने अपनी प्रिटिंग प्रेस भी खोली. यहाँ उन्होंने महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के लिए भी काम किया.</li>
<li>जो पहली फ़िल्म दादा साहब फालके ने देखी थी वो थी ’लाइफ़ ऑफ़ क्राइस्ट’ और साल था उन्नीस सौ बारह.</li>
<li>दादासहब फालके की बनाई फ़िल्म ’राजा हरिश्चन्द्र’ जो हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म थी प्रदर्शित हुई 3 मई 1913 को और थियेटर था कोरोनेशन थियेटर, मुम्बई.</li>
<li>आगे चलकर उन्होंने अपनी फ़िल्म निर्माण कम्पनी स्थापित की जिसका नाम रखा ’हिन्दुस्तान फ़िल्म कम्पनी’.</li>
<li>भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले धुंडीराज गोविन्द फालके के सम्मान में उनके नाम पर भारत सरकार ने सन 1969 में ’दादा साहब फालके’ पुरस्कार की शुरुआत की. यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष था. यह पुरस्कार किसी व्यक्ति को सिनेमा के क्षेत्र में जीवन भर के अविस्मरणीय योगदान के लिए प्रदान किया जाता है. पहले साल इस पुरस्कार को गृहण करने वाली अभिनेत्री थीं देविका रानी. साल 2007 के लिए यह पुरस्कार गायक मन्ना डे को दिया गया है. और इस साल गुरुदत्त की फ़िल्मों के लाजवाब सिनेमैटोग्राफर  वी. के. मूर्ति को.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify; ">*****</p>
<p style="text-align: justify; ">अरे जिस सवाल से बात शुरु की थी वो तो अधूरा ही रह गया. वही वीडियो बनाने वाला. चलो मैं तुम्हें अपने मन की बात बताता हूँ. जब मैं छोटा था तो हर बरसात के मौसम में हमारे बगीचे में एक कुतिया छोटे-छोटे पिल्ले देती थी. पहले-दूसरे दिन तो वो इतने छोटे होते कि उनके मुँह भी ठीक से नज़र नहीं आते. वे बिलकुल गुलाबी होते. मुझे उनसे बहुत ही प्यार था. फिर तेज़ी से वो बड़े होने लगते. इधर-उधर भागते. मैं उन्हें एक के ऊपर एक रख देता और वो फिसल-फिसलकर नीचे गिरते. वे अलग-अलग पहचान में आने लगते. मैं उनके अलग-अलग नाम रख देता. चिंटू, प्यारू, भूरू, कालू. उनके साथ खेलने में बहुत मज़ा आता. इस पूरे दौर में उनमें से कुछ मर भी जाते. अगर मुझे कोई उस वक़्त वीडियो कैमरा दे देता तो मैं उनकी वीडियो ज़रूर बनाता. छोटे पिल्लों से बड़े होने की यात्रा. खूब सारी मस्ती और मज़ा. कितना मज़ेदार ख्याल है न! तुम बताओ, किसका वीडियो बनाते?</p>
<p style="text-align: justify; ">**********</p>
<p style="text-align: justify; "><strong>एकलव्य की बाल-विज्ञान पत्रिका ’चकमक’ के दिसंबर अंक में प्रकाशित.</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 19:35:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-308" title="luck-by-chance-wallpaper-1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1-225x300.jpg" alt="luck-by-chance-wallpaper-1" width="225" height="300" /></a>महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. <strong><a href="http://www.tehelkahindi.com/" target="_blank">’तहलका’</a></strong> से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी है और अंक जाना है इसलिए किसी एक फ़िल्म की समीक्षा कर रात तक हमें भेज दें. अगले हफ़्ते हमें <strong><a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank">गोरखपुर फ़िल्म उत्सव</a></strong> के लिए निकलना था और हम उसकी ही तैयारियों में जुटे थे. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Victory_(film)" target="_blank">’विक्टरी’</a></strong> का हश्र मैं पहले से जानता था, तय हुआ कि ज़ोया अख़्तर की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Luck_By_Chance" target="_blank">’लक बाय चांस’</a></strong> देखी जाएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आज मैं इस घटना से तक़रीबन एक साल दूर खड़ा हूँ लेकिन इस साल आए लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा पर बात शुरु करते हुए बार-बार मेरा ध्यान इसी फ़िल्म पर जाता है. हाँ यह मेरे लिए इस साल की पहली उल्लेखनीय फ़िल्म है क्योंकि रोहन सिप्पी और कुणाल रॉय कपूर की बनाई बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य कथा <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_President_Is_Coming" target="_blank">’दि प्रेसिडेंट इज़ कमिंग’</a></strong> मैं बहुत बाद में देख पाया. बहरहाल ’लक बाय चांस’ इस साल की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म नहीं है. शायद मैं इस जगह<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D" target="_blank"> ’देव डी’</a></strong> को रखूँगा. हद से हद उसे हम औसत से थोड़ा ऊपर गिन सकते हैं. लेकिन ’देव डी’ तक पहुँचने का रास्ता इसी फ़िल्म से होकर जाता है. शायद इसके माध्यम से वो कहना संभव हो पाए जिसे मैं हिन्दी सिनेमा के एक बड़े बदलाव के तौर पर चिह्नित कर रहा हूँ.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक <strong>’लक बाय चांस’</strong> को एक ख़ास मल्टीप्लेक्स-यूथ श्रंखला की फ़िल्मों वाले खांचे में फ़िट किया जा सकता है और इसकी पूर्ववर्ती फ़िल्मों में <strong>’दिल चाहता है’</strong> से <strong>’रॉक ऑन’</strong> तक सभी को गिना जाता है लेकिन एक मूल अंतर है जो ’लक बाय चांस’ को अपनी इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों से अलग बनाता है और वो है इसका अंत. जैसा मैंने अपनी समीक्षा में लिखा था,</p>
<blockquote style="text-align: justify;"><p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-317" title="zoya akhtar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1-150x150.jpg" alt="zoya akhtar" width="150" height="150" /></a>“लेकिन वो इसका अन्त है जो इसे ’दिल चाहता है’ और ’रॉक ऑन’ से ज़्यादा बड़ी फ़िल्म बनाता है. अन्त जो हमें याद दिलाता है कि बहुत बार हम एक परफ़ैक्ट एन्डिंग के फ़ेर में बाक़ी ’आधी दुनिया’ को भूल जाते हैं. याद कीजिए ’दिल चाहता है’ का अन्त जहाँ दोनों नायिकायें अपनी दुनिया खुशी से छोड़ आई हैं और तीनों नायकों के साथ बैठकर उनकी (उनकी!) पुरानी यादें जी रही हैं. या ’रॉक ऑन’ का अन्त जहाँ चारों नायकों का मेल और उनके पूरे होते सपने ही परफ़ैक्ट एन्डिंग बन जाते हैं. अपनी तमाम खूबियों और मेरी व्यक्तिगत पसंद के बावजूद ये बहुत ही मेल-शॉवनिस्टिक अन्त हैं और यहीं ’लक बाय चांस’ ख़ुद को अपनी इन पूर्ववर्तियों से बहुत सोच-समझ कर अलग करती है. ’लक बाय चांस’ इस तरह के मेल-शॉवनिस्टिक अन्त को खारिज़ करती है. फ़िल्मी भाषा में कहूं तो यह एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का महिला-प्रधान अन्त है. ज़्यादा खुला और कुछ ज़्यादा संवेदनशील. एक नायिका की भूली कहानी, उसका छूटा घर, उसके सपने, उसका भविष्य. आखिर यह उसके बारे में भी तो है. यह अन्त हमें याद दिलाता है कि बहुत दिनों बाद इस पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री में एक लड़की निर्देशक के तौर पर आई है!”</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का एक महिला-प्रधान अन्त. यहाँ एक और गौर करने की बात है, मेरी इस समीक्षा को पढ़कर एक पाठक ने टिप्पणी की थी कि जिस अन्त की आप तारीफ़ कर रहे हैं वो तो फ़िल्म में अलग से जोड़ा हुआ लगता है. कहना होगा कि ख़ामी के बावजूद यह एक ईमानदार टिप्पणी है. सच है कि फ़िल्म की बाकी कहानी से फ़िल्म का अन्त अलग है. लेकिन यही ’जोड़े हुए अन्त’ वाला तरीका हमें एक झटके के साथ समझाता है कि हमारी मुख्यधारा सिनेमा की कहानियाँ कितनी ज़्यादा पुरुष केन्द्रित होती हैं. और हम इस सांचे में इतना गहरे ढल चुके हैं कि इससे परेशानी होना तो दूर की बात है, हमें यह अजीब भी नहीं लगता. हमारे सिनेमा में बीती हुई कहानियाँ (पास्ट स्टोरीज़) सिर्फ़ नायकों के पास होती हैं, नायिकाओं के पास नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-311" title="gulaalposter" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg" alt="gulaalposter" width="140" height="200" /></a>और इसी अंत की वजह से ’लक बाय चांस’ इस साल की दो सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्मों अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gulaal" target="_blank">’गुलाल’</a></strong> और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a> </strong>की पूर्वपीठिका बनती है. पहले बात <strong>’गुलाल’</strong> की. ’गुलाल’ इतनी आसानी से हजम होनेवाली फ़िल्म नहीं है. इस पर मेरी दोस्तों से लम्बी बहसें हुई हैं. गुलाल का समाज कैसा है? उसे क्या मानकर पढ़ा जाए – यथार्थ या फंतासी? लेकिन इन सवालों से अलग शुरुआत में मेरा फ़िल्म को लेकर मुख्य आरोप यह रहा कि मुख्य किरदार के साथ-साथ चलते हुए बीच में कहीं फ़िल्म भी यह समझ खो देती है कि इस व्यवस्था की असली शिकार आखिर में स्त्री है. तो क्या ’गुलाल’ स्त्री विरोधी फ़िल्म है और <strong>मधुर भंडारकर </strong>की फ़िल्मों की तरह क्या वो भी जिस समस्या के खिलाफ़ बनाई गई है उसे ही बेचने लगती है?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे खुशी है कि मैं यहाँ गलत था. <strong>’गुलाल’</strong> की बहुत सी समस्याएं तो उसे एक फंतासी मानकर पढ़ने से हल होती हैं. इस मायने में ’गुलाल’ का पुरुष-प्रधान समाज <strong>मुक्तिबोध</strong> की कविता <strong>’अंधेरे में’</strong> के डरावने अंधेरे की याद दिलाता है. यह निरंकुश व्यवस्था का चरम है. लेकिन मेरे आरोप का जवाब यहाँ भी फ़िल्म के अन्त में छिपा है. मेरे मित्र पल्लव ने ऐसी ही किसी उत्तेजक बहस के बीच में कहा था कि ’गुलाल’ का असल अर्थ वहाँ खुलता है जहाँ फ़िल्म के आखिरी दृश्य में नायिका गुलाल पुते चेहरों की भीड़ में खड़ी है और उसके भाई की ताजपोशी हो रही है. नायिका की आँख से बह निकले एक आँसू में सम्पूर्ण ’गुलाल’ का अर्थ समाहित है. व्यवस्था परिवर्तन होता है और एक स्त्री को माध्यम बनाकर होता है लेकिन इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद इस पुरुष-प्रधान समाज का ढांचा ज़रा नहीं बदलता. माना कि ’गुलाल’ में स्त्री का दृष्टिकोण फ़िल्म में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं है लेकिन आपको गुलाल के असल अर्थ तभी समझ आयेंगे जब आप उस स्त्री के नज़रिए को अपने साथ रख फ़िल्म देखेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-304" title="dev-d" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d-200x300.jpg" alt="dev-d" width="200" height="300" /></a>अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a></strong> पारंपरिक चरित्रों की नई व्याख्या के लिए मील का पत्थर मानी जानी चाहिए. अगर देवदास उपन्यास और उस पर बनी पहले की फ़िल्में (विशेष तौर से संजय लीला भंसाली का अझेल मैलोड्रामा) सिर्फ़ देवदास की कहानी हैं तो अनुराग की ’देव डी’ देवदास के साथ-साथ चंदा और पारो की भी कहानी है. देवदास दरअसल हिन्दी सिनेमा का सतत कुंठित नायक है. उसमें एक ’शहीदी भाव’ सदा से मौजूद रहा है. कभी उसके हाथ पर ’मेरा बाप चोर है’ लिख दिया गया है (दीवार में अमिताभ) तो कभी उसके पिता को उनके ही दोस्त ने धोखे से मार दिया है (बाज़ीगर में शाहरुख़). हिन्दुस्तानी सिनेमा का महानायक हमेशा ऐसी ’पास्ट लाइफ़ स्टोरीज़’ अपने साथ रखता है जिससे उसके आनेवाले सभी कदम जस्टीफाइड साबित हों. और नायिकाएं होती हैं जिनकी कोई पिछली कहानियाँ नहीं होती. लेकिन ’देव डी’ में चंदा की भी कहानी है और पारो की भी. और यही ’अन्य कहानियाँ’ हमारी ’मुख्य कथा’ को आईना दिखाती हैं. अपनी व्याख्या को ही अकेली व्याख्या मानकर चलने वाला हमारा फ़िल्मी नायक आखिर ’ख़ामोशी के उस पार’ की आवाज़ सुन पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’देव डी’</strong> में जब चंदा देव को कहती है कि ’तुम किसी और से प्यार नहीं करते. तुम सिर्फ़ अपने आप से प्यार करते हो’ तो दरअसल वो यहाँ हिन्दुस्तानी सिनेमा के सबसे चहेते नायकीय किरदार को आईना दिखा रही है. यही अंतर है देवदास और ’देव डी’ में. अनुराग देव के पिता का किरदार इसीलिए बदल देते हैं. देव के पिता यहाँ एक नरम मिजाज़ लिबरल बाप की भूमिका में हैं ताकि कोई गलतफ़हमी न बाकी रहे. हमें यह मालूम होना चाहिए कि देव और पारो के न मिल पाने की वजह देव के पिता का सामंती व्यवहार नहीं था. देव द्वारा पारो को चाहने और उसकी याद में अपनी ज़िन्दगी जला लेने के दावे के बावजूद सच यह है कि देव के भीतर भी एक ऐसा पुरुष बैठा है जो अंत में पारो को उन्हीं कसौटियों पर कसता है जो इस सामंती और पुरुषसत्तात्मक समाज ने एक लड़की के लिए बनाई हैं. इस देवदास का थोड़ा सा हिस्सा हर हिन्दुस्तानी पुरुष के भीतर कहीं है. आपके भीतर भी, मेरे भीतर भी. जब <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Aaj_Kal" target="_blank">’लव आजकल’</a></strong> में जय, वीर सिंह से सवाल करता है कि ’अब मीरा किसी और के साथ है और जब वो किसी और के साथ है तो फिर उनके बीच ’वो सब’ भी होगा, फिर मुझे बुरा क्यों लग रहा है?’ तो यह उसके भीतर कहीं बचा रह गया वही ’देवदास’ है जिसके लिए स्त्री एक ऑबजेक्ट पहले है और बाद में कुछ और. और जब फ़िल्म के आखिर में वो वापस मीरा के पास लौटता है तो उसका एक शादीशुदा लड़की को पहले हुए ’वो सब’ के बारे में पूछे बिना प्रपोज़ करना उसी ’देवदास’ पर एक छोटी सी जीत है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमारी लड़ाई भी अपने भीतर के ’देवदासों’ से ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-318" title="Khargosh-Hindi" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg" alt="Khargosh-Hindi" width="225" height="143" /></a>मुख्यधारा से अलग हटकर मैंने दो हज़ार नौ में जो सबसे बेहतरीन फ़िल्में देखी उनमें से ज़्यादातर आपके लिए दो हज़ार दस की फ़िल्में होने वाली हैं. इन्हीं में से एक <strong>’खरगोश’</strong> को मैं हिन्दी सिनेमा के सबसे संभावनापूर्ण प्रयासों में से एक गिन रहा हूँ. <strong>’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’</strong> अपने विज़ुअल टेक्स्ट में चमत्कार पैदा करती है और इस सिनेमा माध्यम की असल विज़ुअल ताक़त का अहसास करवाती है. मराठी फ़िल्म <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishchandrachi_Factory" target="_blank">’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’</a></strong> तो अपने ऑस्कर नामांकन के साथ अभी से चर्चा में आ गई है. इस फ़िल्म में ’लगे रहो मुन्नाभाई’ की ज़िन्दादिली और ’गांधी’ की सी प्रामाणिकता एक साथ मौजूद है. उम्मीद करें कि नए साल में परेश कामदार की ’खरगोश’, अमित दत्ता की ’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’ और परेश मोकाशी की ’हरिशचंद्राची फैक्ट्री’ को बड़ा परदा नसीब हो और हमें इन फ़िल्मों को विशाल सार्वजनिक प्रदर्शन में देखकर एक बार फिर इस सिनेमा नामक जादुई माध्यम के जादू से चमत्कृत होने का मौका मिले.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: मासिक पत्रिका <strong>समकालीन जनमत </strong>के कॉलम <strong>’बायस्कोप’</strong> में प्रकाशित. <strong>जनवरी 2010</strong>.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-313" title="love-aaj-kal-saif-deepika" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg" alt="love-aaj-kal-saif-deepika" width="744" height="322" /></a></p>
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		<title>एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 09:23:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-290" title="3-idiots" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots-207x300.jpg" alt="3-idiots" width="207" height="300" /></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-297" title="fivepoint1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11-182x300.jpg" alt="fivepoint1" width="182" height="300" /></a>यूँ देखें तो मेरा <strong>राजकुमार हीरानी</strong> के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा लड़की को उसका जीवन साथी चुनने में मदद करते हैं. ये ’आम आदमी’ के गांधी हैं. यहाँ ज़ोर उनके एतिहासिक व्यक्तित्व पर नहीं उनके जीवन जीने के तरीके पर है. ’गांधीगिरी’ यहीं से निकली. राजू की फ़िल्म उन्हें इतिहास के ’महावृतांतों’ की कैद से आज़ाद करवाती है. कई मायनों में मुन्नाभाई श्रृंखला की फ़िल्में जेनर डिफ़ाइनिंग फ़िल्में हैं क्योंकि वे हिन्दी सिनेमा से ते़ज़ी से गायब होते जा रहे तत्व ’स्वस्थ्य हास्य’ को सिनेमा में सफलता के साथ वापस लेकर आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन कहना होगा कि यहाँ वे गलती पर हैं. और अगर मैं अब तक के उनके सिनेमा को थोड़ा भी समझ पाया हूँ तो उसी तर्क पद्धति का सहारा लेकर कहूँगा कि यहाँ मेरे लिए सिर्फ़ दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं. एक यह कि उनकी फ़िल्म एक लेखक की किताब पर आधारित है और दूसरा यह कि उन्होंने उसी लेखक का नाम ले जाकर सबसे कोने में कहीं पटक दिया है. काग़ज़, पैसा, कितने प्रतिशत कहानी किसकी, किसने कब क्या बोला, ये सारे सवाल बाद में आते हैं. सबसे बड़ा सवाल है अच्छाई, बड़प्पन और ईमानदारी जो हमने उनकी ही रची ’गांधीगिरी’ से सीखी हैं. यह तो वे भी नहीं कह रहे कि उनकी फ़िल्म का <strong>चेतन भगत</strong> के उपन्यास से कोई लेना-देना नहीं. बाकायदा उपन्यास के अधिकार खरीदे गए हैं और कुल-मिलाकर ग्यारह लाख रु. का भुगतान भी हुआ है. तकनीकी रूप से उनपर इतनी बाध्यता थी कि वे फ़िल्म के क्रेडिट रोल में चेतन भगत का नाम दें और फ़िल्म के आखिर में उनकी किताब का नाम देकर उन्होंने उसे पूरा भी कर दिया है. लेकिन सहायकों, तकनीशियनों और स्पॉट बॉयज़ की भीड़ में कहीं (मैं तो तलाश भी नहीं पाया) चेतन का नाम छिपाकर उन्होंने अपनी ईमानदारी खो दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“हमारी फ़िल्म एक उपन्यास पर आधारित है.” यह कहने से आपकी फ़िल्म छोटी नहीं होती है. मेरी नज़र में तो उसकी इज़्ज़त कुछ और बढ़ जाती है. विधु विनोद चोपड़ा ने चेतन भगत के सामने अभिजात जोशी को खड़ा करने की कोशिश की है और कहा है कि वे फ़िल्म के असल लेखकों का हक़ मारना चाहते हैं. यह छद्म प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना है. चेतन भगत ने कभी भी फ़िल्म की पटकथा पर अपना हक़ नहीं जताया जिसे अभिजात जोशी और राजू हीरानी ने मिलकर काफ़ी मेहनत से तैयार किया है. ’थ्री इडियट्स’ की पटकथा इस साल आए सिनेमा की सबसे बेहतरीन और कसी हुई पटकथाओं में से एक है जिसमें हर कथा सूत्र अपने मुकम्मल अंजाम तक पहुँचता है चाहे वो एक छोटा सा फ़ाउंटन पेन ही क्यों न हो. इस कसी हुई पटकथा के लिए उन्हें भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के पटकथा लेखक साइमन बुफॉय को ऑस्कर से नवाज़ कर दिया गया था. सवाल तो विधु विनोद चोपड़ा से पूछा जाना चाहिए जो कहानी लेखन में दो लेखकों का नाम पहले से होते ’को-राइटर’ के तौर पर अलग से फ़िल्म के टाइटल्स में नज़र आते हैं. और सवाल उन सभी निर्देशकों से पूछा जाना चाहिए जो अपनी फ़िल्म में लेखक का नाम पहले से मौजूद होते शान से अपने नाम के आगे ’लेखक और निर्देशक’ की पदवी लगाते हैं. सलीम-जावेद के हाथ में पेंट का डब्बा लेकर अपनी फ़िल्मों के पोस्टरों पर अपना ही नाम लिखते घूमने के किस्से इसी सिनेमा जगत के हैं. चेतन सिर्फ़ फ़िल्म की शुरुआत में अपनी किताब का नाम चाहते हैं. इसके अलावा वो अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी करते हों, मुझे उससे मतलब नहीं. इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूँ. यहाँ सवाल व्यक्ति का नहीं, सही और गलत का है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और बात है. एक व्यापक संदर्भ में हमारे लिए यह खतरे की घंटी है. इस प्रसंग में ’सबका फ़ायदा हुआ’ कहने वाले यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस सारे ’मीडिया हाइप्ड’ प्रसंग के गर्भ में एक अदृश्य लेखक छिपा है. डरा, सहमा सा. वो लेखक न तो चेतन की तरह मीडिया का चहेता लेखक है और न ही उसकी भाषा इतनी ताक़तवर है कि सत्ता के बड़े प्रतिष्ठान उसकी किसी भी असहमति पर ध्यान दें. उसके पास बस उसके शब्द हैं, उसकी कहानियाँ. उसकी क़लम, उसकी रचनात्मकता जिससे वह इस बहरूपिए वर्तमान के मुखौटे की सही पहचान करता है. अपने जीवन की तमाम ऊर्जा को बाती में तेल की तरह जलाकर इस समय और समाज की उलझी जटिलताओं को अपने पाठकों के लिए थोड़ा और गम्य बनाता है. हिन्दुस्तान की क्षेत्रीय भाषाओं का यही ईमानदार लेकिन गुमनाम लेखक है जिसका इस सारे तमाशे में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यहाँ सबसे मुख्य बिन्दु यह है कि आज भी हिन्दी सिनेमा किसी किताब से, रचना से अपना नाम जोड़कर कोई खुशी, कोई गर्व नहीं महसूस करता. यहाँ तो जिस किताब का ज़िक्र है वो अंग्रेज़ी भाषा की एक बेस्टसेलर पुस्तक है. यहाँ यह हाल है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों का क्या हाल होगा जिनके नाम के साथ चेतन भगत के नाम जैसा कोई ग्लैमर भी नहीं जुड़ा है. अगर हमारे सिनेमा का अपने देश के साहित्य और कला से ऐसा और इतना ही जुड़ाव रहा तो हिन्दी सिनेमा विदेशी सिनेमा (पढ़ें हॉलीवुड) की घटिया नकल बनकर रह जाएगा जिसके पास अपना मौलिक कुछ नहीं बचेगा. अपनी ज़मीन के कला-साहित्य से जुड़ाव से सिनेमा माध्यम हमेशा समृद्ध होता है. मल्टीपलैक्स का दौर आने के बाद से मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा वैसे भी अपने देश के गांव-देहात से, उसके आम जनमानस से कटता जा रहा है. ऐस में उसका अपने देश के लेखन और ललित कलाओं से भी असहज संबंध खुद सिनेमा के लिए भी अच्छा नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आपको ऐसी कितनी हिन्दी फ़िल्में याद हैं जिनकी शुरुआत में किसी किताब का नाम शान से लिखा आता हो? मैं ऐसी फ़िल्मों का इंतज़ार करता हूँ. राजकुमार हीरानी से मुझे इसकी उम्मीद थी. <strong>’थ्री इडियट्स’</strong> हमारे लिए वो फ़िल्म होनी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो क्या यह भविष्य के लिए सभी उम्मीदों का अंत है? क्या यह साहित्य सर्जक के लिए सिनेमा माध्यम में बंद होते दरवाजों में आखिरी दरवाजा था?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">नहीं, कुछ छोटे-छोटे टिमटिमाते तारे हैं. कुछ मुख्यधारा में और कुछ हाशिए पर कहीं. एक <strong>परेश कामदार</strong> हैं जो अपनी फ़िल्म <strong>(खरगोश)</strong> के पीछे मौजूद मूल कहानी के लेखक को फ़िल्म के पहले सार्वजनिक शो पर मुख्य अतिथि की तरह ट्रीट करते हैं और उनके साथ आए तमाम दोस्तों को अपनी जेब से कॉफ़ी पिलवाते हैं. एक <strong>विशाल भारद्वाज</strong> हैं जो अपनी नई फ़िल्म <strong>(कमीने)</strong> में टाइटल्स की शुरुआत होते ही पहले किन्हीं केजतान बोए साहब का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने युगांडा की एक फ़िल्म वर्कशॉप में उन्हें पहली बार यह स्टोरी आइडिया सुनाया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा राजू हीरानी ने ’लगे रहो मुन्नाभाई’ में बताया था, एक-एक गांधी हम सबके भीतर हैं. बस हमारे आँखें बंद करने की देर है.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: <strong>’डेली न्यूज़’</strong> के <strong>’हम लोग’ </strong>में प्रकाशित. <strong>10 जनवरी 201</strong><strong>0<span style="font-weight: normal;">.</span></strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 14:47:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“प्यारे बार्नस्टीन,
तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.

एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG"><img class="alignleft size-full wp-image-281" title="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG" alt="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" width="200" height="298" /></a><strong>“प्यारे बार्नस्टीन,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी बेल बजती रहती है और कोई उसे रिसीव नहीं करता. एक घर जिसमें अब एक कुत्ते की जगह खाली है. रिचर्ड निक्सन किसी व्यक्ति का नाम नहीं. रिचर्ड निक्सन सिर्फ़ एक विचार है, सत्ता का विचार जो तेज़ी से हमारे चारों ओर अपनी जड़ें जमा रहा है. समाज तय साचों में ढल चुका है और शक करने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. यह <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie" target="_blank">डेल कारनेगी</a></strong> को पढ़कर सफलता के सात सोपान सीखने वाले उत्साही वीरों का समय है. ऐसा समय जिसमें शंका करने वाले, चुप्पा से, ईमानदारी का अपना ही तर्जुमा जीने की चाहत रखने वाले इंसानों की कोई ज़रूरत नहीं. उन्हें अब ख़त्म हो जाना चाहिए. वे सफलता के उत्सव में बाधक हैं. ईमानदारी की नई परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं जिनकी गंगोत्री अब सफलता नामक वृहत ग्लेशियर से निकलती है. दुनिया में कहीं युद्ध नहीं है. दुनिया में कहीं भूख नहीं है. जो ऐसा बोलते है उन्हें भी अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. अब दुनिया एक ऐसा खुशियों से भरा बगीचा है जिसमें हर बिकता सामान एक नया खिलता फूल है. असल फूलों को अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. उनके ज़्यादा अच्छे और आग्याकारी प्रतिरूप गढ़ लिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक इस वक़्त जब आप जब इस चालाक बक्से के पर्दे पर सुबह-शाम ऊधम मचाते <strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=l7LLlymgJJE&amp;feature=channel" target="_blank">’रॉकेट सिंह – सेल्समैन ऑफ़ दि इयर’</a></strong> को निरख रहे हैं मैं देख रहा हूँ दूर कहीं उन्नीस सौ तिहत्तर में बिखरते अमेरिकी सपने की राख़ में बेचैन भटकते सैमुअल बाइक को. और क्या खूब है कि इस उत्सवधर्मी समय में मुझे बार बार सैमुअल बाइक याद आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Assassination_of_Richard_Nixon" target="_blank">’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’</a></strong> हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sean_Penn" target="_blank">सीन पेन</a></strong> की सघन अदाकारी से निर्मित बेहतरीन फ़िल्म होने के साथ-साथ हमारे समाज के लिए ज़रूरी फ़िल्म भी है. यह उस जन्नत की हक़ीक़त है जिसमें हमारा समय और समाज धीरे-धीरे पैठ रहा है. यह उन लोगों की कहानी है जो सत्ता द्वारा बेचे जा रहे सफलता और समृद्धि के सपने को मनचाहे दामों पर ख़रीदने से इनकार कर देते हैं. यह बहुत गहरे अर्थों में ’नौकर की कमीज़’ के स्वर को दोहराती फ़िल्म है. सच है कि हमारे दौर के सबसे बड़े सेल्समैन हमारे नीति-नियंता हैं. वे हमें बार-बार वही सुख-समृद्धि और न्याय के सपने बेचते हैं और तय करते हैं कि वे कभी पूरे न हों जिससे उन्हें आगे फिर से उन्हीं लोगों को बेचा जा सके. वे सबसे बड़े सेल्समैन हैं क्योंकि वे उन्हीं सपनों को बार-बार बेचने में सफल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म में कहानी का मूल कथ्य सैमुअल के अपने प्यारे संगीतकार बार्नस्टीन को लिखे लम्बे एकालापों से आगे बढ़ता है. यही इस कहानी का सार हैं. सैमुअल एक असफल सेल्समैन है क्योंकि वो सच बोलता है. उसके बॉस लोग उसे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Norman_Vincent_Peale" target="_blank">’दि पॉवर ऑफ़ पॉज़िटिव थिंकिंग’</a> जैसी किताबें पढ़ने के लिए देते हैं. नौकरी से निकाले जाने के बाद एक दिन वो रिवाल्वर लेकर अपने बॉस को मारने भी जाता है लेकिन उससे गोली नहीं चलाई जाती. हाँ वो असफल है. हर काम में असफल. उसकी पत्नी एक कैफ़े में नौकरी करती है जहाँ उसके मालिक उसे छोटी स्कर्ट पहनकर ड्रिंक सर्व करने के लिए कहते हैं. सैमुअल इस जैसे तमाम कैफ़े’स को जला देना चाहता है. उसे लगता है कि उसके साथ समाज नस्लवादी व्यवहार करता है. लेकिन वो किसी को यह समझा नहीं पाता कि नौकरी नाम की यह बला आवरण में लिपटी नस्लीय गुलामी है.</p>
<p style="text-align: justify;">जो जितना बड़ा झूठा है वो उतना बड़ा सेल्समैन है. इस दौर का सबसे बड़ा सेल्समैन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Nixon" target="_blank">रिचर्ड निक्सन</a></strong> है. जिसने दो बार अमरीकी जनता को वियतनाम युद्ध ख़त्म होने का सपना बेचा और दोनों बार उसे पूरा किए बिना वो सत्ता में बना रहा. आखिर उससे बड़ा सेल्समैन इस दुनिया में और कौन हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">उसे समझ आता है कि यह समाज सिर्फ़ उन्हें ही याद रखता है जो अपने काम से अपना नाम रौशन करते हैं. बाकी सब इस दुनिया में रेत के दाने के बराबर हैं जिनका कोई मोल नहीं, जिनकी कोई अहमियत नहीं. हाँ वो रिचर्ड निक्सन को मार देगा. दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन को मार देगा. लेकिन वो एक असफल इंसान है. शक करने वाला और संशयवादी. ऐसे इंसानों की तक़दीर में लक्ष्य की प्राप्ति के उत्सवगान नहीं होते. वे तो सुरक्षित रख छोड़े गए हैं मज़बूत, निश्चयवादी, वसुंधरा को भोगने वाले वीरों के लिए. अंत में यह नाचीज़ रेत का दाना एक चिंगारी सा चमककर वापस समन्दर के पानी में मिल जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">सैमुअल की बेचैनियाँ हमारे दौर की बेचैनियाँ हैं. पिछले साल आई जयदीप वर्मा की आधुनिक क्लासिक <strong><a href="http://hulla.bigflix.com/" target="_blank">’हल्ला’</a></strong> की बेचैनियाँ हैं. एम.बी.ए. का गुब्बारा हमारे यहाँ क्या खूब फूल रहा है. लेकिन उसमें हवा भरते फैंफड़ों का अनवरत चलती धौंकनी बनते जाना क्यों हमारी नज़रों से ओझल है? यह फ़िल्म पुणे-बैंगलोर से गुड़गाँव-नोयडा तक विकास के जयगान में पिसती कोमल संवेदनाओं की कसक है. वैसे आत्महत्या से इतर वे रास्ते हैं जिनपर चलने वालों को हमारा समाज या तो असफलता के ठप्पे से नवाजता है या फिर उन्हें ’पागल’ श्रेणी में डाल देता है. गुड़गाँव और पुणे के संवेदनाहीन कंक्रीट के जंगलों से भागे गौरव या वरुण इसलिए बच जाते हैं क्योंकि उनके पास ’मैं’ वाला आत्मविश्वास है. लेकिन उनका क्या जिन्हें अपने होने की वजह पर ही शक हो? बताओ तो दोस्तों, क्या हमने उन अनिश्चय में घिरे, अकेले पड़े नाकुछों के लिए कोई रास्ता छोड़ा है?</p>
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		<title>ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी</title>
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		<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 23:05:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता है. वहीं गुलज़ार ने यह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/kuch-aur-nazmein.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-268" title="kuch aur nazmein" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/kuch-aur-nazmein-225x300.jpg" alt="kuch aur nazmein" width="225" height="300" /></a>ओशियंस में <strong>गुलज़ार</strong> और <strong>विशाल भारद्वाज</strong> साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता है. वहीं गुलज़ार ने यह भी बताया कि अब पंचम के बाद उनके साथ सबसे ज़्यादा गीत बनाने वाले विशाल ही हैं. इन गीतों में <strong>’छोड़ आये हम वो गलियाँ</strong><strong>’</strong> का नॉस्टेल्जिया भी शामिल है और <strong>’जंगल जंगल बात चली है’</strong> का बचपना भी. <strong>&#8220;धम धम धड़म धड़ैया रे&#8221;</strong> की गगन गुंजाती ललकार भी और <strong>’एश्ट्रे’</strong> की नश्वरता और मृत्युबोध भी.<strong> ’रात के ढाई बजे</strong><strong>’</strong> की उत्सवप्रिय निडरता से <strong>’कश लगा’</strong> की ’घर फूँक, तमाशा देख&#8217; प्रवृत्ति भी. यह जोड़ी मिलकर मेरी नज़र में पिछले दशक के कुछ सबसे यादगार गीतों के लिए ज़िम्मेदार है. कुछ झलकियाँ पेश हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>गुलज़ार</strong> साहब की एक किताब है <strong>“कुछ और नज़्में”</strong>. एक दौर था जब मुझे इस किताब की सारी नज़्में ज़बानी याद हुआ करती थीं और आप बीच में कहीं से भी कोई लाइन बोल दें और मैं आगे की पूरी नज़्म सुना दिया करता था. मेरे पिता बार-बार मेरे सामने गुलज़ार साहब की आलोचना करते थे. बाद में मुझे समझ आया कि इस तरह वो मुझे छेड़ा करते थे. मैं मुम्बई आया ही यह सोचकर था कि बस गुलज़ार साहब के साथ एक बार काम कर पाऊँ और मेरा करियर पूरा हो जाएगा.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>विशाल</strong> के साथ मेरे शुरुआती काम “चड्डी पहन के फूल खिला है” की बहुत तारीफ़ हुई है. उसके लिए भी मुझे तब बहुत-कुछ सुनना पड़ा था. कहा गया कि गाने में ये ’चड्डी’ शब्द का इस्तेमाल कुछ ठीक नहीं. यहाँ तक सलाह दी गई कि इस चड्डी को बदल कर ’लुंगी’ कर लीजिए! मैंने वो करने से इनकार कर दिया. अरे भई मोगली की एक इमेज है और उसके हिसाब से ही गाना लिखा गया है. उस वक़्त जया जी चिल्ड्रंस फ़िल्म सोसायटी की अध्यक्ष हुआ करती थीं. आखिर उनके अस्तक्षेप से वो गाना आगे बढ़ा.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">
<ul>
<li style="text-align: justify;">उस दौर में ही हमने साथ एक एनीमेशन “टॉम एंड जैरी” के लिये भी गाने किए थे. उसका एक गाना बहुत ख़ास है. हमारे यहाँ माँ के लिए तो बहुत गाने लिखे गए लेकिन पापा के लिए गाने ढूँढे से भी नहीं मिलते. <strong>गुलज़ार</strong> साहब के लिखे उस गाने के बोल शायद कुछ यूँ थे, “पापा आओ मैं तुम्हारे पास हूँ, पापा आओ मैं बहुत उदास हूँ. लाल कॉपी में तुम्हारी हिदायतें, नीली कॉपी में मेरी शिकायतें. पापा आओ और हिसाब दो.”</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">
<ul>
<li><strong>विशाल</strong> मेरे गाने ख़ारिज भी कर देते हैं. कुछ जम नहीं रहा, कुछ और, कुछ और कह कहकर. और ये अपने गाने भी ख़ारिज करते रहते हैं. बोरी भर नहीं तो कम से कम तकिया भर गाने तो मेरे इनके यहाँ पड़े मिल ही जायेंगे!</li>
</ul>
<ul>
<li>मुझे सेलेब्रेशन के गाने बनाने में बहुत दिक्कत होती है. उस वक़्त भी हुई थी और आज भी होती है. शायद मेरी तबियत ही उदास है तो उदास गाने ही बनते हैं! (चप्पा चप्पा का संदर्भ आने पर विशाल ने कहा)</li>
</ul>
<ul>
<li>अभी तीन-चार दिन से ’इश्किया’ के लिए एक ऐसे ही मूड का गाना बनाने की कोशिश में लगा था लेकिन कुछ बनता ही नहीं था. फिर <strong>गुलज़ार</strong> साहब ने कहा, “तुम हिट गाना बनाने की कोशिश करोगे तो नहीं बनेगा. लेकिन तुम गाना बनाने की कोशिश करोगे तो बन जाएगा.”</li>
</ul>
<ul>
<li style="text-align: justify;">चप्पा चप्पा के दौरान तो यह बार-बार हुआ कि मैं डमी लिरिक्स देता था और <strong>विशाल</strong> उन्हें ही लिरिक्स में बदल देता था. ’चप्पा चप्पा’ गीत में ऐसे ही आया. मैंने कहा कि गाने की शुरुआत तो कुछ ऐसी होनी चाहिए जैसे ’चप्पा चप्पा चरखा चले’ और विशाल ने कहा कि बस आप तो यही दे दीजिए. यूँ ही मेरा कहा “गोरी, चटख़ोरी जो कटोरी से खिलाती थी” इसने गीत के बोल में बदल दिया.</li>
</ul>
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		<title>भोलेपन के बियाबान में भटके: अजब प्रेम की गजब कहानी</title>
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		<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 16:06:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[फ़िल्म समीक्षा]]></category>
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		<description><![CDATA[स्याह व्यंग्य वाली समझदार फ़िल्मों के दौर में (पढ़ें ’डार्क कॉमेडी’ जैसे &#8216;संकट सिटी&#8217;, &#8216;ओये लक्की लक्की ओये&#8217;) ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ एक पुराने ज़माने की भोली और भली कॉमेडी है. इतनी भली कि कई बार आपको उसका नायक मंदबुद्धि लगने लगता है. माना रणवीर कपूर में एक चार्म है और वो ’मेरा नाम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/Ajab-Prem-Ki-Ghazab-Kahani.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-262" title="Ajab-Prem-Ki-Ghazab-Kahani" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/Ajab-Prem-Ki-Ghazab-Kahani-229x300.jpg" alt="Ajab-Prem-Ki-Ghazab-Kahani" width="229" height="300" /></a>स्याह व्यंग्य वाली समझदार फ़िल्मों के दौर में (पढ़ें ’डार्क कॉमेडी’ जैसे &#8216;संकट सिटी&#8217;, &#8216;ओये लक्की लक्की ओये&#8217;) <strong><a href="http://www.imdb.com/title/tt1252596/" target="_blank">’अजब प्रेम की गजब कहानी’</a></strong> एक पुराने ज़माने की भोली और भली कॉमेडी है. इतनी भली कि कई बार आपको उसका नायक मंदबुद्धि लगने लगता है. माना रणवीर कपूर में एक चार्म है और वो ’मेरा नाम जोकर’ में आये अपने पिता के भोलेपन की याद दिलाते हैं लेकिन यहाँ तो नायक के साथ समस्त समाज और वातावरण ही एक अजब/गजब के भोलेपन से ग्रस्त है. और अगर आप उसे एक कॉमेडी न मानकर प्रेम कहानी मानकर भी पढ़ें तो भी समस्या हल नहीं होती क्योंकि ’लव आजकल’ जैसी स्मार्ट प्रेम कहानियों के दौर में ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ एक अजायबघर से आयी चीज़ ही ज़्यादा नज़र आती है. गौर करें, नायक का जब दिल भर आता है तो वो हकलाने लगता है. और नायिका का जब दिल भर आता है तो वो भी हकलाने लगती है! ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ देख कर एक बार फिर यह समझ आता है कि <strong><a href="http://www.imdb.com/name/nm0764316/" target="_blank">राजकुमार संतोषी</a></strong>, <strong><a href="http://www.imdb.com/name/nm0007131/" target="_blank">सुभाष घई</a></strong>, <strong><a href="http://www.imdb.com/name/nm0151504/" target="_blank">एन चन्द्रा</a></strong> जैसे लेट एट्टीज़ और अर्ली नाइंटीज़ के धुरंधर अभी तक अपने पुराने चोले से बाहर नहीं निकल पाये हैं. शायद इसकी वजह यह है कि दुनिया इन्हें अपने फॉर्मूलों और बड़े स्टार पुत्रों के साथ पीछे छोड़कर कहाँ आगे निकल गई है इन्होंने कभी आँख खोलकर देखना ज़रूरी ही नहीं समझा.</p>
<p>कुल कहानी का लब्बोलुबाब यह है कि प्रेम <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ranvir_kapoor" target="_blank">(रणवीर कपूर)</a></strong> पिता की नज़रों में बेकार, आवारा लेकिन दिल का हीरा और बहुत ही अच्छा लड़का है. और अगर आपको नायक की अच्छाई में कोई शक हो तो निर्देशक संतोषी शुरुआत के आधे घंटे नायक की इस अच्छाई को स्थापित करने में पूरा ज़ोर लगाते हैं. शुद्ध हिन्दी फ़िल्मों में पाई जाने वाली टिपिकल ’धर्मनिरपेक्षता’ की स्थापना के तहत हमारा आवारा लेकिन उच्च कुल का हिन्दू नायक नायक अपने मुस्लिम दोस्त को अपने प्यार से मिलवाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाता है. इसी बीच नायक टकराता है नायिका <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Katrina_Kaif" target="_blank">(कैटरीना कैफ़)</a></strong> से और उसे पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है. इंटरवेल के ठीक पहले ट्विस्ट आता है और इंटरवेल के ठीक बाद एक नयनाभिराम लोकेशन पर फ़िल्माया दुख भरा गीत. लेकिन हमारा नायक इतना अच्छा है कि वो अपनी प्रेमिका को भी उसके प्यार से मिलवाने के लिए जान की बाज़ी लगा देता है. और आप दुखी भी नहीं होते क्योंकि ’कहानी में ट्विस्ट’ के रूप में आये ’ऑल बॉडी, नो ब्रेन’ उपेन पटेल को देखते ही आप समझ जाते हैं कि अन्तत: इस फ़िल्म की हैप्पी एंडिंग होनी है.</p>
<p>पिछले दिनों <strong><a href="http://www.imdb.com/name/nm0440604/" target="_blank">अनुराग कश्यप</a></strong> ने ओशियंस में कहा कि मेरे लिए आधी फ़िल्म तब पूरी हो जाती है जब मैं अपनी कहानी के लिए सही लोकेशन ढ़ूँढ़ लेता हूँ. लोकेशन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण किरदार है. ’देव डी’ और ’आमिर’ के इस दौर में आई ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ में आरे कॉलानी के किसी कोने में बने कार्डबोर्ड के गिरजे के आस-पास बसे इस नकली कस्बे को देख कर गुस्सा नहीं आता बल्कि तरस आता है. एक अदद प्यार करने वाली माँ, एक अदद मुस्लिम दोस्त, एक अदद अनाथ क्रिश्चियन नायिका, एक अदद मिमिक्री करने वाला गरीब डॉन और अंत में सब अच्छा. तरस इसलिए क्योंकि इस तरह की फ़िल्मों को तो अब लुप्तप्राय: की प्रजाति में डाल देना चाहिए. हमारे यहाँ इस तरह की फ़िल्मों के लिए एक ख़ास शब्द प्रचलित है, ’फर्जी’. आप असहमत हो सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि आने वाले कुछ सालों में हम इस तरह के सिनेमा को हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे. आपका पता नहीं, लेकिन मैं गिलास को हमेशा आधा भरा देखना पसन्द करता हूँ.</p>
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		<title>&#8220;शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार कहा जा सकता है.&#8221; -गुलज़ार.</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 13:04:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इस बार के ओशियंस में प्रस्तुत गुलज़ार साहब का पर्चा “हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन (1930-1960)” बहुत ही डीटेल्ड था और उसमें तीस और चालीस के दशक में सिनेमा के गीतों से जुड़े एक-एक व्यक्ति का उल्लेख था. वे बार-बार गीतों की पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में पेश करते थे और जैसे उस दौर का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/poet-gulzar1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-254" title="poet-gulzar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/poet-gulzar1-261x300.jpg" alt="poet-gulzar" width="261" height="300" /></a>इस बार के ओशियंस में प्रस्तुत गुलज़ार साहब का पर्चा “हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन (1930-1960)” बहुत ही डीटेल्ड था और उसमें तीस और चालीस के दशक में सिनेमा के गीतों से जुड़े एक-एक व्यक्ति का उल्लेख था. वे बार-बार गीतों की पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में पेश करते थे और जैसे उस दौर का चमत्कार फिर से जीवित कर देते थे. पेश हैं गुलज़ार साहब के व्यख्यान की कुछ झलकियाँ :-</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<ul>
<li style="text-align: justify;">एक पुराना किस्सा है. एक बार ओम शिवपुरी साहब ने अपने साहबज़ादे को एक चपत रसीद कर दी. अब कर दी तो कर दी. साहबज़ादे ने जवाब में अपने पिता से पूछा कि क्या आपके वालिद ने भी आपको बचपन में चपत रसीद की थी? तो उन्होंने जवाब में बताया हाँ. और उनके पिता ने भी.. फिर जवाब मिला हाँ. और उनके पिता ने भी? शिवपुरी साहब ने झल्लाकर पूछा आखिर तुम जानना क्या चाहते हो? तो जवाब में उनके साहबज़ादे ने कहा, “मैं जानना चाहता हूँ कि आख़िर यह गुंडागर्दी शुरु कहाँ से हुई!” तो इसी तरह मैं भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जो काम आजकल करता हूँ इसकी असल शुरुआत कहाँ से हुई इसे जानने के लिए मैं सिनेमा के सबसे शुरुआती दौर की यात्रा पर निकल पड़ा&#8230;</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>आप शायद विश्वास न करें लेकिन सच यह है कि हिन्दी सिनेमा में गीतों की शुरुआत और उनका गीतों से अटूट रिश्ता बोलती फ़िल्मों के आने से बहुत पहले ही शुरु हो गया था. साइलेंट सिनेमा के ज़माने में ही सिनेमा के पर्दे के आगे एक बॉक्स में एक उस्ताद साहब अपने शागिर्दों के साथ बैठे रहते थे और पूरे सिनेमा के दौरान मूड के मुताबिक अलग-अलग धुनें और गीत-भजन बजाया-गाया करते थे. इसकी दो ख़ास वजहें भी थीं. एक तो पीछे चलते प्रोजैक्टर का शोर और दूसरा सिनेमा के आगे दर्शकों में ’पान-बीड़ी-सिगरेट’ बेचने वालों की ऊँची हाँक. लाज़मी था कि गीत-संगीत इतने ऊँचे स्वर का हो कि ये ’डिस्टरबिंग एलीमेंट’ उसके पीछे दब जाएं. इतनी सारी अलग-अलग आवाज़ें सिनेमा हाल में एक साथ, वास्तव में यह साइलेंट सिनेमा ही असल में सबसे ज़्यादा शोरोगुल वाला सिनेमा रहा है.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>इन्हीं साज़ बजाने वालों में एक हुआ करते थे मि. ए.आर. कुरैशी जिन्हें आज आप और हम उस्ताद अल्लाह रक्खा के नाम से और ज़ाकिर हुसैन के पिता की हैसियत से जानते हैं. उन्होंने मुझे कहा था कि मैंने तो कलकत्ता में सिनेमा के आगे चवन्नी में तबला बजाया है. यूँ ही जब ये सिनेमा के आगे बजने वाले गीत लोकप्रिय होने लगे तो आगे से आगे और गीतों की फरमाइश आने लगीं. सिनेमा दिखाने वालों को भी समझ आने लगा कि भई उस सिचुएशन में वहाँ पर तो ये गीत बहुत जमता है. इस तरह गीत सिचुएशन के साथ सैट होने लगे. इसी बीच किसी फरमाइश के वशीभूत मुंशी जी को किसी लोकप्रिय मुखड़े का सिचुएशन के मुताबिक आगे अंतरा लिख देने को कहा गया होगा, बस वहीं से मेरी इस रोज़ी-रोटी की शुरुआत होती है.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>साल उन्नीस सौ सैंतालीस वो सुनहरा साल था जिस साल आधा दर्जन से ज़्यादा सिनेमा के गीतकार खुद निर्देशक के रूप में सामने आए. इनमें केदार शर्मा और मि. मधोक जैसे बड़े नाम शामिल थे.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>केदार शर्मा जितने बेहतरीन निर्देशक थे उतने ही बेहतरीन शायर-गीतकार भी थे. अफ़सोस है कि उनके इस रूप की चर्चा बहुत ही कम हुई है. उनकी इन पंक्तियों, “सुन सुन नीलकमल मुसकाए, भँवरा झूठी कसमें खाए.” जैसा भाव मुझे आज तक कहीं और ढूँढने से भी नहीं मिला. उस कवि में एक तेवर था जो उनके लिखे तमाम गीतों में नज़र आता है.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>कवि प्रदीप चालीस के दशक का मील स्तंभ हैं. उनके गीतों में हमेशा नेशनलिज़्म का अंडरटोन घुला देखा जा सकता है. इसका सबसे बेहतर उदाहरण है आज़ादी से पहले आया उनका गीत “दूर हटो ए दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है.” और इसके अलावा उनके लिखे गीत “ए मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” से जुड़ा किस्सा तो सभी को याद ही होगा. जिस गीत को सुनकर पंडित जी की आँखों में आँसू आ गए हों उसके बारे में और क्या कहा जाये.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>ग़ालिब के कलाम का हिन्दी सिनेमा में सर्वप्रथम आगमन होता है सन 1940 में और नज़्म थी, “आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक”. चालीस के दशक में ही हिन्दी सिनेमा फ़ैज़ की नज़्म को और टैगोर की कविता को गीत के रूप में इस्तेमाल कर चुका था.</li>
</ul>
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<li>बिना शक शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का आज तक का सबसे बड़ा लिरिसिस्ट कहा जा सकता है.  <span style="font-family: &quot;Mangal&quot;,&quot;serif&quot;;">उनके गीतों को खुरच कर देखें और आपको सतह के नीचे दबे नए अर्थ प्राप्त होंगे. उनके एक ही गीत में न जाने कितने गहरे अर्थ छिपे होते थे. </span></li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>जैसे सलीम-जावेद को इस बात का श्रेय जाता है कि वो कहानी लेखक का नाम सिनेमा के मुख्य पोस्टर पर लेकर आये वैसे ही गीत लेखन के लिए यह श्रेय साहिर लुधियानवी को दिया जाएगा.</li>
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<li><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/gulzar.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-248" title="gulzar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/gulzar-113x300.jpg" alt="gulzar" width="113" height="300" /></a>साहिर भी अपने विचार को लेकर बड़े कमिटेड थे. वो विचार से वामपंथी थे और वो उनके गीतों में झलकता है. गुरुदत्त की “प्यासा” उनके लेखन का शिखर थी.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>एक गीत प्रदीप ने लिखा था “देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान” और इसके बाद इसी गाने की पैरोडी साहिर ने लिखी जो थी, “देख तेरे भगवान की हालत क्या हो गई इंसान”!</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li>इस पूरे दौर में राजेन्द्र कृष्ण को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. तक़रीबन तीन दशक तक दक्षिण भारत के स्टूडियोज़ से आने वाली हर दूसरी फ़िल्म में उनके गीत होते थे. उनके गीत सीधा अर्थ देने वाले होते थे, जैसे संवादों को ही गीतों में ढाल दिया हो.</li>
</ul>
<ul style="text-align: justify;">
<li style="text-align: justify;">मेरा प्रस्ताव यह है कि जहाँ हम पचास के दशक को हिन्दी सिनेमा के गीतों का सुनहरा समय मानते हैं तो वहाँ हमें इस सुनहरे दौर में तीस के दशक और चालीस के दशक को भी शामिल करना चाहिए. यही वह दौर है जब इस सुनहरे दौर की नींव रखी जा रही थी. तेज़ी से नए-नए बदलाव गीत-संगीत में हो रहे थे और तमाम नए उभरते गीतकार-संगीतकार-गायक अपने पाँव जमा रहे थे. लता आ रहीं थीं, बर्मन आ रहे थे, साहिर आ रहे थे. यह पूरा चालीस का दशक एक बहुत ही समृद्ध परम्परा है जिसे हमारे हाथ से छूटना नहीं चाहिए.</li>
</ul>
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