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	<title>आवारा हूँ...</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>नर्तकियाँ और पृथ्वियाँ</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Jan 2012 20:43:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[कथादेश]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा,

Pina (3D)
Wim Wenders, Germany, 2011.


“रस भी अर्थ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा,</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1440266/" target="_blank"><strong>Pina (3D)</strong></a><br />
<strong>Wim Wenders, Germany, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/pina-image.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1008" title="pina image" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/pina-image-235x300.jpg" alt="pina image" width="235" height="300" /></a>“रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!” – ’देवदारु’ से.</p>
<p style="text-align: justify;">जब Pina Bausch के नर्तकों की टोली रंगमंच की तय चौहद्दी से बाहर निकल शीशे की बनी ख़ाली इमारतों, फुटपाथों, सार्वजनिक परिवहन, कॉफ़ी हाउस और औद्योगिक इकाइयों को अपनी काया के छंद की गिरफ़्त में ले लेती है, मुझे आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का निबंध ’देवदारु’ याद आता है. यह जीवन रस का नृत्य रूप है. आचार्य द्विवेदी के शब्दों में, यह नृत्य ’जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न’ करता है. निरंतर एक मशीनी लय से बंधे इस समय में किताबों की याद, कविताओं की बात, कला का आग्रह.</p>
<p style="text-align: justify;">कॉफ़ी हाउस की अनगिनत कुर्सियों के बीच अकेले खड़े दो प्रेमी एक-दूसरे को बांहों में भर लेते हैं. लेकिन व्यवस्था का आग्रह है कि उनका मिलन तय सांचों में हो. उनके प्रतिकार में छंद है, ताल है, लय है. यहाँ नृत्य जन्म लेता है. पीना बाउश के रचे नृत्यों में विचारों का विहंगम कोलाहल है. उनके रचना संसार में मनुष्य प्रकृति का विस्तार है. इसलिए उनके नृत्यों में यह दर्ज़ कर पाना बहुत मुश्किल है कि कहाँ स्त्री की सीमा ख़त्म होती है और कहाँ प्रकृति का असीमित वितान शुरु होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">वे नाचते हैं. नदियों में, पर्बतों पर, झरनों के साथ. वे नाचते हैं. शहर के बीचोंबीच. जैसे शहर के कोलाहल में राग तलाशते हैं. यह रंगमंच की चौहद्दी से बाहर निकल शहर के बीचोंबीच कला का आग्रह आज के इस एकायामी बाज़ार में खड़े होकर विचारों के बहुवचन की मांग है. विम वेंडर्स का वृत्तचित्र ’पीना’ सिनेमाई कविता है. किसी तरुण मन स्त्री की कविता. उग्र, उद्दाम, उमंगों से भरी.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1440266/" target="_blank"><strong>’पीना’</strong></a> पहली बार हमें थ्री-डी में छिपी असल संभावनाओं और उसके सही रचनात्मक इस्तेमाल का रास्ता भी दिखाती है. बे-सिर-पैर की फ़िल्मों पर अंधाधुंध हो रहे इसके इस्तेमाल ने बीते दिनों में मुख्यधारा सिनेमा का वही हाल किया है जो आई.पी.एल. नामक असाध्य रोग ने मेरे प्रिय खेल क्रिकेट का किया. इसके उलट ’पीना’ ने थ्री-डी तकनीक के माध्यम से रंगमंच द्वारा सिनेमा की ओर सदा उठाए जाते उस आदिम सवाल का मुकम्मल जवाब दिया है. रंगमंच वाले सदा कहते आए कि हमारे पास तीसरा आयाम है, गहराई है, depth of field. जबकि सिनेमा का परदा सपाट है और चाहकर भी वो गहराई पाना उसके लिए संभव नहीं. यहीं सिनेमा पिछड़ जाता था. लेकिन अब विम वेंडर्स ने ’पीना’ में थ्री-डी तकनीक के माध्यम से वही रंगमंच की गहराई को सिनेमा के परदे पर जीवित कर दिया है. यह थ्री-डी के माध्यम से पैदा किया गया कोई ’गिमिक’ नहीं, बल्कि सिनेमा से छूटे हुए जीवन यथार्थ को फिर से पाने सरीखा है. यही थ्री-डी तकनीक के लिए भविष्य की राह भी है, अगर हमारी मुख्यधारा समझना चाहे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस बीच एक मज़ेदार घटना हुई. पता हो कि अब कोरियन थ्रिलर में कल्ट का दर्जा पा चुकी 2008 की फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1190539/" target="_blank"><strong>’द चेज़र’</strong></a> के निर्देशक Hong-Jin-Na इस साल फ़ेस्टिवल जूरी में थे और उनके प्रेमी हमारे कई दोस्त उद्घाटन वाले दिन ही उनसे बात-मुलाकात कर चुके थे. इस बीच इस तथ्य को जानकर सबमें कोफ़्त का भाव भी था कि उनकी क्लासिक फ़िल्म की एक घटिया नकल <a href="http://www.imdb.com/title/tt1918965/" target="_blank"><strong>’मर्डर 2’</strong></a> नाम से बनाने वाले हमारे मुकेश भट्ट साहब भी समारोह की एक समांतर जूरी में मौजूद थे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">उनकी नई फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1230385/" target="_blank"><strong>’द येलो सी’</strong></a> की स्क्रीनिंग वाले दिन उन्हें सीढ़ियों से उतरता देख हमारे दो मित्रों सुधीश कामत और मेरे ’नेमसेक’ मिहिर फड़नवीस ने एक पुण्य कार्य करने का मन बनाया. उन्होंने बड़ी इज़्ज़त से जाकर Hong-Jin-Na साहब से पहले पूछा कि क्या उन्हें अपनी फ़िल्म की हिन्दुस्तान में बनी भौंडी नकल ’मर्डर 2’ के बारे में खबर है. जैसी उम्मीद थी, निर्देशक साहब ने अनभिज्ञता जताई. जानकर सुधीश और मिहिर ने तुरंत यह महती कार्य किया कि सामने वाली डीवीडी शॉप से ’मर्डर 2’ की नई डीवीडी खरीदकर लाए और उसे निर्देशक साहब को गिफ़्ट कर दिया. आखिर हमारे ’बॉलीवुड’ के यह अजब कारनामे दुनिया भी तो जाने. इस पुण्य कार्य के बाद मुख्यधारा फॉर्म्यूला हिन्दी सिनेमा की ख्याति सात समन्दर पार फ़ैलाने में उनका योगदान सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया जाएगा!</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1549572/" target="_blank"><strong>Another Earth</strong></a><br />
<strong>Mike Cahill, USA, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/another-earth.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1007" title="another earth" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/another-earth.jpg" alt="another earth" width="180" height="269" /></a>अमेरिका से आई स्वतंत्र फ़िल्मों की परम्परा में एक और नया नाम <a href="http://www.imdb.com/title/tt1549572/" target="_blank"><strong>’अनॉदर अर्थ’</strong></a> बीते सालों में आई ’प्राइमर’, ’मून’, ’द डार्क नाइट’ और मेरी पसन्दीदा ’डिस्ट्रिक्ट नाइन’ जैसी फ़िल्मों की परम्परा को आगे बढ़ाती फ़िल्म है. दूसरी पीढ़ी की ये साइंस फ़िक्शन फ़िल्में अन्य मुख्यधारा sci-fi फ़िल्मों की तरह तकनीकी चमत्कार पर कम, दार्शनिकता की ओर जाते अनन्तिम सवालों की खोज पर ज़्यादा केन्द्रित होती हैं. कहने को साइंस फ़िक्शन, लेकिन किसी हार्डकोर ड्रामा की तरह कहानी कहना. ठीक इसी वक़्त दूसरी स्क्रीन पर लार्स वॉन ट्रायर की ’मैलेंकॉलिया’ दिखाई जा रही थी जो इसी परम्परा की एक ज़्यादा जटिल और थोड़ी ज़्यादा दार्शनिक फ़िल्म है.  कहना न होगा कि यह मेरा लगातार आती इन फ़िल्मों के साथ पसन्दीदा जॉनर बनता जा रहा है. ’अनॉदर अर्थ’ में भी स्पेशल इफ़ेक्ट के नाम पर बस आकाश में सदा टंगी दिखाई देती एक और हूबहू पृथ्वी है, अनॉदर अर्थ.</p>
<p style="text-align: justify;">एक और खूबसूरत कथा आधारित साइंस फ़िक्शन फ़िल्म ’द मैन फ्रॉम अर्थ’ की तरह ’अनॉदर अर्थ’ भी अनेक विस्मयकारी किस्से अपने भीतर समेटे है और वही किस्से इस फ़िल्म के सबसे खूबसूरत हिस्से हैं. जैसे उस पहले रूसी अंतरिक्षयात्री का किस्सा कौन भूल सकता है जिसे व्योम में निरंतर होती ’ठक-ठक’ ने पागल कर दिया था. अपनी ही तरह की अन्य फ़िल्मों की तरह ’अनॉदर अर्थ’ भी उसी पल बड़ी फ़िल्म बनती है जहाँ इसकी फंतासी यथार्थ के लिए रचे गए एक प्रतीक में बदल जाती है. एक झटके में अचानक समझ आता है कि कोई दूसरी हूबहू पृथ्वी नहीं, यह अपना ही अक्स है जिसे पहचानना लगातार असंभव हुआ जाता है.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“इस बात की कल्पना करना भी मुश्किल है कि ’मैं वहाँ हूँ’. क्या मैं वहाँ जाकर उस ’मैं’ से मिल सकता हूँ. और क्या वो ’मैं’, इस मैं से बेहतर होगा. क्या मैं उस दूसरे ’मैं’ से सीख सकता हूँ. क्या उस दूसरे ’मैं’ ने भी वही गलतियाँ की होंगी जो मैंने की हैं. क्या मैं उस दूसरे ’मैं’ के साथ बैठकर तसल्ली से बातें कर सकता हूँ? क्या यह मज़ेदार होगा? वैसे एक और सच्चाई यह है कि हम यह रोज़ करते हैं. लोग बस इसे समझते नहीं या स्वीकार नहीं करना चाहते. सच यह है कि लोग रोज़-ब-रोज़ खुद से बातें करते हैं. &#8220;देखो वो क्या कर रहा है”, “उसने ऐसा क्यों किया”, “वो मेरे बारे में क्या सोचती है”, “क्या मैंने सही कहा” जैसे सवाल. इस मामले में बस एक और ’मैं’ आपके पीछे है.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">और किसी भी अच्छी विज्ञान फंतासी की तरह यह फ़िल्म भी अपने अंत को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की व्याख्याओं के लिए खुला छोड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;">समारोह अपने अंत की ओर बढ़ रहा था और हमने तमाम विदेशी फ़िल्मों की छटाओं के बीच बुद्धवार दो पुरानी हिन्दुस्तानी फ़िल्मों को देना तय किया. सुधीर मिश्रा की पहली फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0369063/" target="_blank"><strong>’ये वो मंज़िल तो नहीं’</strong></a> और शाजी करुण की <a href="http://www.imdb.com/title/tt0095872/" target="_blank"><strong>’पिरावी’</strong></a> दो ऐसी कलाकृतियाँ हैं जिनको असली 35mm प्रिंट पर सिनेमा हाल के अंधेरे में देख पाना दुर्लभ ही कहा जाएगा. अनुराग कश्यप ने अगले ही दिन रात के खाने पर बताया था कि उनके मुताबिक ’ये वो मंज़िल तो नहीं’ आज भी सुधीर मिश्रा की सबसे ईमानदार फ़िल्म है. कथा संरचना के स्तर पर यही वो फ़िल्म है जिससे आगे चलकर ’रंग दे बसन्ती’ और ’लव आजकल’ जैसी फ़िल्मों ने प्रेरणा पाई. अस्सी के दशक का मोहभंग जिसे हम ’जाने भी दो यारों’ से लेकर ’न्यू डेल्ही टाइम्स’ तक उस दौर की तमाम फ़िल्मों में देखते हैं, वही सुधीर की इस पदार्पण फ़िल्म का मूल स्वर है. दिल किसी दिन इस फ़िल्म और साथ उस पूरे दौर पर लम्बी चर्चा करने का होता है, करूँगा किसी अगले अंक में. हाँ, ’पिरावी’ देखते हुए रह रहकर गोविन्द निहलाणी की महाश्वेता देवी के उपन्यास पर बनी फ़िल्म ’हज़ार चौरासी की माँ’ याद आती रही. वहाँ माँ थीं, यहाँ पिता हैं. एक जवान पीढ़ी है जिसका अस्तित्व सत्ता मिटा देती है और रह जाती है कुछ बूढ़ी आँखें, इंतज़ार करती हुईं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1827487/" target="_blank"><strong>Once Upon a Time In Antolia</strong></a><br />
<strong>Nuri Bilge Ceylan, Turkey, 2011</strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">समारोह समाप्ति पर था और हम फिर एक लम्बी लाइन में थे. यह लाइन थी ’थ्री मंकीज़’ के निर्देशक की नई फ़िल्म देखने के लिए जिसने इस साल कान फ़िल्म समारोह का प्रतिष्ठित ’ग्रैंड-प्रिक्स’ सम्मान हासिल किया है. और अगर आपको केयलान का सिनेमा पसन्द है तो फिर यह फ़िल्म आपके ही लिए है. लम्बे पसरे बियाबान में एक अपराधी जोड़े को लेकर घूमती पुलिस और सरकारी अधिकारियों की एक टोली के साथ जैसे आप भी सशरीर एंटोलिया पहुँचा दिए जाते हैं. केयलान की फ़िल्मों का सबसे बड़ा कारक है उनका माहौल. यह माहौल की सही स्थापना और फिर उनमें कुछ चुने हुए किरदारों के साथ कुछ दुर्लभ से दिखते क्षणों की पहचान के सहारे ही अपनी कथा कहती हैं. किरदारों की कथाएं आपस में टकराती हैं. आत्म-स्वीकार हैं और आत्म साक्षात्कार भी हैं. जैसा हमारे दोस्त और केयलान की फ़िल्मों के अनन्य प्रशंसक नीरज घायवन ने कहा, ’वन्स अपॉन ए टाइम इन एंटोलिया’ सिनेमाई संचरण है. एक ऐसा अनुभव जिसे बोलकर नहीं बताया जा सकता, सिर्फ़ स्वयं अनुभव किया जा सकता है. या जैसा मेरे पिता मुहावरे में कहते हैं, “आप मरे से ही स्वर्ग दीखता है.”</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे क्या यह किसी भी अच्छे सिनेमा की पहली पहचान नहीं कि उसे पूर्णत: पाने के लिए खुद ही ’मरना’ पड़ता है!</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के जनवरी अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>2011 : सिनेमा</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2011/12/2011-review/</link>
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		<pubDate>Sat, 31 Dec 2011 18:21:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[धोबी घाट]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
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		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” &#8211; फ़राज़

 


’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’
फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><em>“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर</em><em><br />
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” &#8211; फ़राज़<br />
</em></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’रॉकस्टार’</strong></p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है. मुझे बहुत साल पहले प्रसून जोशी की ’फिर मिलेंगे’ के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं. यहाँ अस्वीकार का साहस है. उस मासूमियत को बचाने की तड़प जिसे आप epic बन जाने को बेचैन इस पूरी फ़िल्म के दौरान सिर्फ़ रनबीर कपूर की उदंड आँखों में पढ़ पाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’भूमिकाओं का बदलाव’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>&#8216;डेल्ही बेली&#8217;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इस दृश्य की तुलना सत्यजित राय की ’चारुलता’ से की और साल की सबसे ज़्यादा गालियाँ यहीं खाईं. भूमिकाओं का यह बदलाव विस्मित करने वाला था. और इसे भूलकर भी नायक के ’नायकत्व’ का हास न समझें. सिंघमों और बॉडीगार्डों के दौर में ’डेल्ही बेली’ का ताशी दोरज़ी लहाटू लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में देखा गया सबसे मज़बूत नायकीय चरित्र है. नैतिक, ईमानदार और सच्चा. ऐसा नायक जिसका यकीन बोलने से ज़्यादा कर दिखाने में है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’मेरिट बनाम आरक्षण’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’आई एम कलाम’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”</p>
<p style="text-align: justify;">“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”</p>
<p style="text-align: justify;">“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’कर्ता ने, कर्म को&#8230;’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’जो डूबा सो पार’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ,</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण&#8230;”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ.  करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था. दो हज़ार ग्यारह में यहीं मेरे लिए हिन्दी सिनेमा यथार्थ के सबसे निकट आया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>“अकरम, ओए अकरम&#8230;”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’चिल्लर पार्टी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”</p>
<p style="text-align: justify;">“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए&#8230;”</p>
<p style="text-align: justify;">“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साल की सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग. सीधे बच्चों की दुनिया की नब्ज़ पकड़ लेती है फ़िल्म. निकनेम्स से बनी दुनिया जहाँ बड़ों की दुनिया से धकिआया हुआ बच्चा अपनी असल पहचान पाता है. वो अनजान बच्चों की दुनिया जहाँ वे अपने लिए खुद भूमिकाएं चुनते हैं और उनमें खरे उतरने के लिए बड़ों से ज़्यादा गंभीरता से प्रयासरत होते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>दो हज़ार ग्यारह के नवरस : किरदार जिनकी छाप गहरी पड़ी </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/shor_in_the_city.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-997" title="shor_in_the_city" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/shor_in_the_city-207x300.jpg" alt="shor_in_the_city" width="207" height="300" /></a>पूर्णा जगन्नाथन</strong> – ’मेनका’ | फ़िल्म -<strong> ’डेल्ही बेली’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>रनवीर हुड्डा</strong> – ’ललित/बबलू’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>परिणिति चोपड़ा</strong> – ’डिम्पल चड्ढ़ा’ | फ़िल्म -<strong> ’लेडीज़ वर्सेस रिकी बहल’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>पित्तोबाश</strong> – ’मंडूक’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’शोर इन द सिटी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>नमन जैन</strong> – ’जांघिया’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’चिल्लर पार्टी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राहुल बोस</strong> – ’जय’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’आई एम’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>रनबीर कपूर</strong> – ’जनार्दन जाखड़/जॉर्डन’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’रॉकस्टार’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>जिमी शेरगिल</strong> – ’आदित्य प्रताप सिंह’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>दीपक डोबरियाल</strong> – ’पप्पी’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’तनु वेड्स मनु’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>सर्वश्रेष्ठ पांच : 2011</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’डेल्ही बेली’</strong> – फ़िल्म देखते हुए मैं बार-बार सोचता हूँ कि क्या पटकथा में यह भी लिखा गया होगा कि कौनसे दृश्य में किस पुरुष किरदार की टीशर्ट पर क्या चित्रकला होनी है. यह फ़िल्म उसी बारीकी से बनाई गई है जिस बारीकी से मेरे प्रिय योगेन्द्र यादव चुनाव नतीजों का असल मतलब समझाते हैं. ठीक वहाँ जहाँ नायक नायक अपने फांसी से लटके दोस्त को मुक्त करवाने के लिए पिस्तौल का प्रयोग करता है और फिर शायद जैसा उसने फ़िल्मों में देखा होगा, पिस्तौल को अपनी पैंट में घुसेड़ता है. हाँ, ठीक वहाँ जहाँ उसे एक अभी-अभी चली पिस्तौल की तपती नली का झटका लगता है. ठीक वहीं यह फ़िल्म अपने साथ की अन्य औसत फ़िल्मों से आगे निकल जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong> – साल की सबसे उम्मीदों भरी फ़िल्म. गुरु-गंभीरता के सघन दौर में रूहानी सच्चाइयों को रागदरबारी सी बेपरवाही से कहने का साहस रखने वाली. शहर की विभिन्न लयों को अपने में समेटे, और उन तमाम ख़रोचों को भी जिन्हें हम अक्सर रूबरू देखने से बचते हैं. साथ ही ’शोर इन द सिटी’ साल का सबसे संभावनाओं से भरा किरदार अपने भीतर समेटे है. बेस्टसेलर किताबों की पाइरेसी करता ’तिलक’ जिसे अचानक ’एलकेमिस्ट’ पढ़कर लगता है कि उसके हाथ किसी खज़ाने की चाबी लग गई है. यह किरदार जैसे दो दुनियाओं को आपस में जोड़ता है. ठीक संचरण की अवस्था में इसे पढ़ना जैसे सम्पूर्ण लोकप्रिय संस्कृति को किसी इंसान में पढ़ना है. इस किरदार के द्वारा हम कामकाजी वर्ग में अदृश्य से दृश्य होने की आकांक्षा का पहला बीज अंकुरित होते देखते हैं. दुर्लभ.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ </strong>– कई मायनों में एक सम्पूर्ण फ़िल्म जो कुछ बड़ा कहने से बचती है. ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पूरी तरह अपने दोनों मुख्य पुरुष किरदारों के कांधों पर खड़ी है जो ’बीवी’ की भूमिका में माही गिल के अत्यन्त बचकाने अभिनय के बावजूद इसे बखूबी किनारे निकाल ले जाते हैं. काफ़ी हद तक एक प्रदर्शन आधारित फ़िल्म जिसकी ताक़त रणवीर हुड्डा और जिम्मी शेरगिल की दमदार संवाद अदायगी और अभिनय है. फ़िल्म छोटे वादे करती है लेकिन उन्हें पूरा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>‘धोबी घाट’</strong> – अगर ’शोर इन द सिटी’ मुम्बई का रागदरबारी तर्जुमा है तो ’धोबी घाट’ में शहर शास्त्रीयता पाता है. जैसे-जैसे इस महानगर में जगह कम होती जाती है, कहानियों को भी आपस में सटकर बैठना पड़ता है. चार कहानियों में चार भिन्न ज़िन्दगियाँ आपस में रगड़ खाती हैं. लेकिन बड़ी बात यह है कि फ़िल्म हमें चारों कहानियों के उन अंधेरे कोनों तक लेकर जाती है जहाँ इस शहर की तमाम शास्त्रीयता का मुलम्मा छूट जाता है. बड़ी बात यह है कि उन अंधेरे कोनों में भी फ़िल्म शहर को नकारती नहीं, बल्कि एक साथी की तरह कांधे पर हाथ रख कहती है कि आज भी एक रास्ता अच्छाई की ओर जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’आई एम’</strong> – क्योंकि यह फ़िल्म एक आत्मस्वीकार है. क्योंकि यह फ़िल्म एक अनुभव है. क्योंकि खुद के साथ हुई हर नाइंसाफ़ी से जो सीख मिलती है वो यही है कि फिर कहीं किसी और काल, किसी और दुनिया में जब हम ताक़तवर हों तो अनजाने में वो ही नाइंसाफ़ी न कर बैठें. क्योंकि यह फ़िल्म गांधी की याद दिलाती है, जिन्होंने कहा था कि आँख के बदले आँख का सिद्धांत अंतत: सबको अंधा कर देगा. क्योंकि अंतत: खलनायक बाहर नहीं, खुद हमारे भीतर है जिसका मुकाबला एक निरंतर चलती प्रक्रिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>छोटा है लेकिन तलवार है</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-vijay-raaz.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1001" title="delhi belly vijay raaz" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-vijay-raaz-300x128.jpg" alt="delhi belly vijay raaz" width="300" height="128" /></a>पूजा स्वरूप</strong> – ’माया’ aka फ़ोन वाली रिसेप्शनिस्ट</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “दैट गर्ल इन येलो बूट्स”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>कुमुद मिश्रा</strong> – ’खटाना’ aka कैंटीनवाले अंकल</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “रॉकस्टार”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>विजयराज</strong> – ’सोमयाज़ुलु’ aka दार्शनिक डॉन</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “डेल्ही बेली”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-rahul-singh.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1004" title="delhi belly rahul singh" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-rahul-singh-300x128.jpg" alt="delhi belly rahul singh" width="300" height="128" /></a>स्वरा भास्कर</strong> – ’पायल’</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “तनु वेड्स मनु”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राहुल सिंह </strong>– ’राजीव खन्ना’ aka Delhi boy with a gun</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “डेल्ही बेली”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राजेश शर्मा</strong> – ’एन. के.’ aka दिल्ली पुलिस</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “नो वन किल्ड जेसिका”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साल दो हज़ार ग्यारह का विश्व सिनेमा का सबसे विलक्षण अनुभव था <strong>’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ </strong>जिसे कोरी फ़िल्म भर कहना मुश्किल है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ मनुष्य के भीतर पहली बार ईर्ष्याभाव जन्म लेता है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ पहली बार जीवन ’देना’ सीखता है. यह मनोभावों के जन्म की कथा है. इस फ़िल्म ने वही किया जो साल दो हज़ार ग्यारह में मेरे प्रिय राहुल द्रविड़ ने किया. साल की सबसे बेहतरीन लेखनियाँ इन्हीं दो मानसरोवरों से निकलीं. मेरे तीन सबसे पसन्दीदा ब्लॉगकार अपनी दुनियाओं में वापस गए और यह मोती निकालकर लाए –यहाँ &#8211; <strong><a href="http://thesinglescreen.wordpress.com/2011/08/01/%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81/" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong>, यहाँ &#8211; <strong><a href="http://positivelybright.blogspot.com/2011/08/of-irretrievable-memories-and-tree-of.html" target="_blank">अपराजिता सरकार</a></strong>, यहाँ &#8211; <strong><a href="http://moifightclub.wordpress.com/2011/07/31/tree-of-life-we-live-in-deeds-and-meditate-in-grief/" target="_blank">फ़ाइट क्लब</a></strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">क्या यह व्यक्तिगत कहानियाँ भर हैं? नहीं, क्योंकि ठीक उस जगह जहाँ व्यक्तिगत राजनैतिक से मिलता है, रचना का जन्म होता है. मैं हमेशा से मानता हूँ कि गल्प और कथेतर सिर्फ़ कथा कहने के भिन्न रूप भर हैं. हमारी सच्चाईयाँ सदा इन तय खांचों से आगे निकल जाती हैं. सिनेमा हो या उपन्यास, यही चाबी है. फन्तासियों में सदा सत्य पैठा होता है. आपबीतियों से सदा सर्वोत्तम कथाएं जन्म लेती हैं.</p>
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		<title>एक बुढ़ाता सेल्समैन और हक़ मांगती सत्रह लड़कियाँ</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Dec 2011 03:07:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[MAMI]]></category>
		<category><![CDATA[कथादेश]]></category>
		<category><![CDATA[डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म]]></category>
		<category><![CDATA[वरुण ग्रोवर]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने से पहले अधिक जानकारी जुटाना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने से पहले अधिक जानकारी जुटाना एक समझदारी भरा उपाय लगता है लेकिन व्यावहारिकता में देखो तो इसमें काफ़ी पेंच हैं. जैसे आमतौर पर अमेरिकी और यूरोपीय मुख्यधारा से इतर सिनेमा के बारे में जानकारियाँ हम तक पहली दुनिया के चश्मे से छनकर आती हैं. इन जानकारियों पर अति-निर्भरता नज़रिया सीमित कर सकती है. फ़ेस्टिवल कैटेलॉग पर भी ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता, कई बार तो यही दस्तावेज़ सबसे भ्रामक साबित होता है. इन्हें तैयार करने वाले बहुधा ऐसे प्रशिक्षु सिनेमा विद्यार्थी होते हैं जिन्होंने खुद भी इनमें से कम ही फ़िल्में देखी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">बड़े नामों या निर्देशकों के पीछे अपना पैसा लगाने वाले हमेशा उस खूबसूरत सिनेमा अनुभव को खो बैठते हैं जिसकी सुंदरता अभी वृहत्तर सिने-समाज द्वारा रेखांकित की जानी बाक़ी है. और फिर प्रतिष्ठित सिनेमा महोत्सव में, जहाँ सिनेमा का स्तर इस क़दर ऊँचा हो कि हर देखी फ़िल्म के साथ समांतर चलती और हाथ से छूटने वाली फ़िल्मों के लिए अफ़सोस गहराता ही चला जाए, किसी फ़िल्म का ’प्लॉट’ भर जान लेना आख़िर कहाँ पहुँचाएगा?</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे ऊपर और सबसे महत्वपूर्ण यह कि एक अनजाने से देश से आई किसी नई फ़िल्म को देखने से जुड़ा वो अनछुआ अहसास इन तमाम जानकारियों की भीड़ में कुचल जाता है. हमारे नज़रिए का कोरापन पहले ही नष्ट हो चुका होता है और सिनेमा अपना इत्र खो देता है. सूचना विस्फोट के इस अराजक समय में बिना किसी पूर्व निर्मित कठोर छवि के एक नई, कोरी फ़िल्म को देखने का विकल्प तो जैसे हमसे छीन ही लिया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे दोस्त वरुण ग्रोवर इस मान्य विचार को चुनौती देने का प्रण करते हैं. वो अपनी बनते किसी फ़िल्म के बारे में कोई पूर्व जानकारी हासिल नहीं करते और उनके synopsis तो भूलकर भी नहीं पढ़ते. कुछ भरोसेमंद दोस्तों की सलाह पर हम किसी अनदेखी फ़िल्म के लिए थिएटर में घुस जाते हैं. और तभी हाल में अंधेरा होने से ठीक पहले परदे के सामने एक कमउमर लड़का आता है और पहले अपने सिनेमा अध्ययन करवाने वाले संस्थान का नाम ऊंचे स्वर में बताकर बतौर परिचय फ़िल्म की कहानी सुनाने लगता है. मैं वरुण की ओर देखता हूँ. वरुण अपने कानों में उंगलियाँ दिए बैठे हैं और माइक पर आती उसकी बुलन्द आवाज़ को अनसुना करने की भरसक, लेकिन असफ़ल कोशिश कर रहे हैं. मेरे सामने फिर एक बार यह साबित होता है कि इस सूचना विस्फोट के युग में जहाँ अनचाही सूचना का अथाह समन्दर सामने हिलोरें मारता है, हमारे भविष्यों में सिर्फ़ डूबना ही बदा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/The_Turin_Horse1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-987" title="The_Turin_Horse" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/The_Turin_Horse1.jpg" alt="The_Turin_Horse" width="137" height="195" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1316540/" target="_blank">The Turin Horse</a></strong><br />
<strong>Bela Tarr, Hungary, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भागते हुए सिनेमा हाल के गलियारों में पहुँचे और हम सीधे धकेल दिए जाते हैं बेला टार के विज़ुअल मास्टरपीस ’द तुरिन हॉर्स’ के सामने. सिर्फ़ विज़ुअल, क्योंकि परदे पर आवाज़ तो है लेकिन सबटाइटल्स गायब हैं. लेकिन बिना शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ जाने भी यह अनुभव विस्मयकारी है. एक तक़रीबन घटना विरल कथा में परदा श्वेत-श्याम दृश्य गढ़ रहा है. मैं देखने लगता हूँ. अन्दर तक भर जाता हूँ, साँस फूलने लगती है, लेकिन दृश्य में ’कट’ नहीं होता. धीरे-धीरे इन फ्रेम दर फ्रेम चलते अनन्त के साधक, सघन दृश्यों के ज़रिए वह सारा वातावरण और उसकी सारी ऊब, थकान मेरे भीतर भरती जाती है. मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में सिनेमा के उस विशाल परदे पर ऐसा विस्मयकारी कुछ होता कम ही देखा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन ठीक वहीं, हमें अभिभूत अवस्था में छोड़ फ़िल्म दोबारा न शुरु होने के लिए रोक दी जाती है. वादा किया जाता है रात का, लेकिन रात आती है उसी फ़िल्म के किसी घटिया डीवीडी प्रिंट के साथ. मैं पहले पन्द्रह मिनट की फ़िल्म देखकर उठ जाता हूँ. वह सुबह का उजला अनुभव अब भी मेरे पास है, मैं उसे यूं मैला नहीं होने दे सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.youtube.com/watch?v=hPXY2-A04qU" target="_blank"><strong>The Salesman</strong></a><br />
<strong>Sebastien Pilote, Canada, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह हमारे वक़्तों का सिनेमा है. एक कस्बा है और उसके केन्द्र में उसकी तमाम अर्थव्यवस्था का सूत्र संचालक एक संयंत्र है. एक संयंत्र जो मंदी की ताज़ा मार में घायल है और अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है. यह उस संयंत्र की तालेबन्दी के बाद के कुछ निरुद्देश्य असंगत दिनों की कथा है. लेकिन यहाँ एक पेंच है. यहाँ कथा जिस व्यक्ति के द्वारा कही जाती है वह एक बुढ़ाता कार सेल्समैन है जिन्हें बीते खुशहाल सालों में अपने काम में सर्वश्रेष्ठ होने के कई तमगे मिले हैं. लेकिन आज कस्बे में मरघट सा सन्नाटा है और संयंत्र बंद होने के बाद अब उससे जुड़ी तमाम उम्मीदें भी धीरे-धीरे कर दम तोड़ रही हैं. संकट यह है कि सेल्समैन को आज भी अपना काम करना है. सच-झूठ कैसे भी हो, उस शोरूम में खड़ी नई-नवेली कार का सौदा पटाना है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे सीन पेन की क्लासिक फ़िल्म ’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ याद आती है. यह एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में बयान है जिसमें इंसान का दोगलापन उसका तमगा और उसकी ईमानदारी उसके करियर के लिए बाधा समान है. यहाँ इंसान को आगे बढ़ने के लिए पहले अपने भीतर की इंसानियत को मारना पड़ता है. व्यवस्था बदली नहीं है, बस हुआ यह है कि इस वैश्विक महामंदी ने इस व्यवस्था के दोगले मुखौटे को उतार दिया है. अगर आप सुनने की चाहत रखते हों तो इस फ़िल्म के मंदीमय बर्फ़ीले सन्नाटे में भविष्य में होनेवाले ’ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट’ की आहटें सुन सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1906426/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/michael.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-984" title="michael" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/michael.jpg" alt="michael" width="240" height="139" /></a></strong>Michael</strong><br />
<strong>Markus Schleinzer, Austria, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले ही बता दिया गया था कि यह फ़िल्म इस समारोह की बहुप्रतिक्षित ’डार्क हॉर्स’ है. निर्देशक मार्कस तोप जर्मन निर्देशक माइकल हेनेके के लम्बे समय तक कास्टिंग डाइरेक्टर रहे हैं और ’दि व्हाइट रिबन’ के लिए तमाम बच्चों की चमत्कारिक लगती कास्टिंग उन्हीं का करिश्मा थी. ’माइकल’ का प्लॉट विध्वंसक है. यह फ़िल्म घर के तहखाने में कैद किए एक बच्चे और उसके यौन शोषक नियंता की दैनंदिन जीवनी को किसी रिसर्च जर्नल की तरह निरपेक्ष भाव से दर्ज करती अंत तक चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’माइकल’ का चमत्कार उसकी निर्लिप्त भाव कहन में है. फ़िल्म कहीं भी निर्णय नहीं देती. कहीं भी फ़ैसला सुनाने की मुद्रा में नहीं आती और यथार्थ को इस हद तक निचोड़ देती है कि परिस्थिति का ठंडापन भीतर भर जाता है. असहज करती है, लेकिन किसी ग्राफ़िकल दृश्य से नहीं, बल्कि अपने कथानक के ठंडेपन से. घुटन महसूस करता हूँ, मेरा अचानक बीच में खड़े होकर चिल्लाने का मन करता है. कहीं यह हेनेके की शैली का ही विस्तार है. ’माइकल’ एक सामान्य आदमी है. नौकरीपेशा, छुट्टियों में दोस्तों के साथ हिल-स्टेशन घूमने का शौकीन, त्योंहार मनाने वाला. दरअसल उसका ’सामान्य’ होना ही सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि हम ऐसे अपराधियों की कल्पना किसी विक्षिप्त मनुष्य के रूप में करने के आदी हो गए हैं. निर्देशक मार्कस उसे यह सामान्य चेहरा देकर जैसे हमारे बीच खड़ा कर देते हैं. सच है, यह यथार्थ है. और यह भयभीत करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1658851/" target="_blank"><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Toast1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-991" title="Toast" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Toast1.jpg" alt="Toast" width="158" height="160" /></a></strong>Toast</strong><strong> </strong></a><br />
<strong>J S Clarkson, UK, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">ब्रिटिश फ़िल्म ’टोस्ट’ की शुरुआत मुझे रादुँगा प्रकाशन, मास्को से आई हमारे घर के बच्चों की खानदानी किताब ’पापा जब बच्चे थे’ की किसी कहानी की याद दिलाती है. लेकिन अंत में नीति कथा बन जाती उन स्वभाव से उद्दंड रूसी बाल-कथाओं से उलट ’टोस्ट’ सदा उस बच्चे के नज़रिए से कही गई कथा ही बनी रहती है. इसे देखते हुए लगातार विक्रमादित्य मोटवाने की ’उड़ान’ याद आती है और मैंने इसे कुछ सोचकर ’फ़ीलगुड’ उड़ान का नाम दिया. कहानी में कायदा सिखाने वाले, बाहर से सख़्त, भीतर से नर्म पिता हैं. ममता की प्रतिमूर्ति साए सी माँ हैं, और हमारा कथानायक आठ-दस साल का नाइज़ेल है. और सबसे महत्वपूर्ण यह कि रोज़ नाइज़ेल के सामने घर का डब्बाबंद खाना है जिसे अधूरा छोड़ वह असली, लजीज़ पकवानों के ख्वाब देखा करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे कहानी में माँ की मौत से लेकर सौतेली माँ तक के तमाम ट्विस्ट हैं. स्त्रियों का वही परम्परा से चला आया स्टीरियोटाइप चित्रण है जो खड़ूस सौतेली माँ की भूमिका में हेलेना कार्टर की अद्भुत अदाकारी की वजह से और उभरकर सामने आता है. ’टोस्ट’ कथा धारा के परम्परागत ढांचे को तोड़ती नहीं है. लेकिन उसे एक मुकम्मल कथा की तरह ज़रूर कहती है. हाँ, बचपन में नाइज़ेल के उस दोस्त का किरदार कमाल का है जो उसे हमेशा ज्ञान देता रहता है. सच कहूँ, यह भी एक स्टीरियोटाइप ही है लेकिन ऐसा जिसका सच्चाई से सीधा वास्ता है. मुझे अपने बचपन का साथी दीपू याद आता है जो मुझसे एक साल सीनियर हुआ करता था और मुझे हर आनेवाली क्लास के साथ अगली क्लास की अभेद्य चुनौतियों के बारे में बताया करता था. यहाँ भी उसका दोस्त वक़्त-बेवक़्त ’नॉर्मल फ़ैमिलीज़ आर टोटली ओवररेटेड’ जैसे वेद-वाक्य सुनाता चलता है. कथा का अंत फिर इसे ’उड़ान’ से कहीं गहरे जोड़ता जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1124035/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/ides-of-march-movie.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-968" title="ides-of-march-movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/ides-of-march-movie-202x300.jpg" alt="ides-of-march-movie" width="202" height="300" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1124035/" target="_blank"><strong>The Ides of March</strong></a><br />
<strong>George Clooney, USA, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह वो महत्वाकांक्षी हॉलीवुड थ्रिलर है जिसके लिए स्क्रीन के बाहर लम्बी लाइनें लगीं और संभवत: जिस फ़िल्म की गूंज आप आनेवाले ऑस्कर पुरस्कारों में सुनेंगे. सत्ता है, हत्या है, महत्वाकांक्षाएं हैं, फ़रेब है, ऊपर दिखती खूबसूरती है, बदनुमा अतीत है. लेकिन जॉर्ज क्लूनी निर्देशित ’द आइड्स ऑफ़ मार्च’ की जान फ़िल्म के नायक रेयान गॉसलिंग हैं. पता हो, यह लड़का पिछले साल ’ब्लू वेलेंटाइन’ जैसी घातक रूप से अच्छी फ़िल्म दे चुका है. जॉर्ज क्लूनी और मेरे पसन्दीदा फ़िलिप सिमोर हॉफ़मैन जैसे खेले-खाए अदाकारों के सामने इस तीस साल के लड़के की धमक सुनने लायक है. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों से ठीक पहले डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के चुनाव के लिए मतदान के दौरान की इस कथा में हमारे समय के हालिया वर्तमान से निकले अनेक स्वर सुनाई देते हैं. किसी पर्फ़ेक्ट राजनैतिक थ्रिलर की तरह कथा आपको बांधे रखती है और जहाँ होना चाहिए वहाँ मोहभंग भी होता है, लेकिन परेशानी यही है कि फ़िल्म जहाँ बनती है ठीक वहीं ख़त्म हो जाती है.<strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस बीच दोस्तों की चर्चाओं में लौट-लौटकर <a href="http://www.imdb.com/title/tt1906426/" target="_blank"><strong>’माइकल’</strong></a> आती रही. एक दोस्त ने कहा कि वह अपराधी का मानवीकरण है. मुझे याद आया कि ’सत्या’ के बाद उसे भी स्थापित करते हुए आलोचकों ने यही कहा था कि यहाँ पहली बार एक ’डॉन’ का मानवीकरण होता है, उसके भी बीवी-बच्चे हैं. वो दोस्त की शादी की बरात में नाचता है. वो भी चाहता है कि उसकी बच्ची स्कूल में अंग्रेज़ी पोएम सीखे. तो क्या ’माइकल’ भी ’सत्या’ की तरह अपराधी का मानवीकरण करती है? यह भी एक नज़रिया है जिससे मैं असहमत हूँ. उसकी निर्पेक्षता मेरे भीतर और ज़्यादा सिहरन भर देती है. यह अहसास कि एक भयानक अपराधी भी कितने ही मामलों में ठीक हमारे जैसा है, उसके और हमारे बीच की दूरी एकदम कम कर देता है. और सच्चाई यह है कि इस दूरी के मिटने से ज़्यादा डरावना किसी भी ’सभ्य समाज’ के नागरिक के लिए कुछ और नहीं हो सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1704619/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Tabloid1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-980" title="Tabloid" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Tabloid1.jpg" alt="Tabloid" width="250" height="132" /></a></strong>Tabloid</strong><br />
<strong>Errol Morris, USA, 2010.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह संयोग ही था कि हम एरॉल मोरिस की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ’टैबलॉयड’ देखने घुसे. और यह फ़िल्म तुरंत इस साल देखे गए कुछ दुर्लभ वृत्तचित्रों की लम्बी होती लिस्ट में शामिल हो गई. बहुत की रोचक अंदाज़ और आर्ट डिज़ाइन के साथ बनाई गई इस फ़िल्म की असल तारीफ़ इस बात में छिपी है कि निर्देशक ने कैसे मामूली से दिखते एक ’अखबारी कांड’ में इस गैर-मामूली फ़िल्म को देखा और बनाया. कैसे किसी की व्यक्तिगत ज़िन्दगी को मौका आने पर पीत-पत्रकारिता सरेराह उछालती है और खुद ही न्यायाधीश बन फ़ैसले करती है. और ब्रिटेन के टैबलॉयड जर्नलिज़्म को समझने के लिए यह फ़िल्म दस्तावेज़ सरीख़ी है. इसके तीस साल पुराने घटनाचक्र में आप आज बन्द हुए ’न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड’ की तमाम कारिस्तानियाँ सुन सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1860152/" target="_blank"><strong>17 Girls</strong></a><br />
<strong>Muriel Coulin and Delphine Coulin, France, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ये कुछ ऐसा था जैसे सत्रह लड़कियाँ आकर हमारे समाज से अपना शरीर, उस पर उनका अपना हक़ हमसे वापस मांगे. दोनों निर्देशक बहनों ने फ़िल्म से पहले आकर बताया था कि यह घटना भले ही कहीं और घटी और उन्होंने इसका ज़िक्र उड़ता हुआ अखबार के किसी पिछले पन्ने पर पढ़ा था, लेकिन कहानियाँ वे अपने घर, अपने कस्बे की ही सुनाती हैं. कैसे खुद उनके लड़कपन उन सीखों से भरे हुए थे जो लड़कियों को हमारे इन ’सभ्य’ समाजों में विरासत में मिलती हैं और कैसे वे नया जानने की, कुछ कर गुज़रने की बेचैनी से भरी थीं.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/17_fillesA.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-978" title="17_fillesA" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/17_fillesA.jpg" alt="17_fillesA" width="162" height="220" /></a>मेरी राय में ’17 गर्ल्स’ के कथाकेन्द्र में मौजूद ’गर्भधारण’ सिर्फ़ एक कथायुक्ति भर है. इसकी जगह कोई और युक्ति भी होती, अगर इतनी ही कारगर तो भी यह कथा संभव थी. क्योंकि यह मातृत्व के बारे में नहीं है. न ही यह सेक्स लिबरेशन जैसे किसी विचार के बारे में है. दरअसल यह कथा सामूहिकता के बारे में है. उस युवता के बारे में है जो जब साथ होती है तो दुनिया बदलने की बातों वाले किस्से अच्छे लगते हैं, सच्चे लगते हैं. आकाश के सितारे कुछ और पास लगते हैं. हमउमर साथ खड़े होते हैं, बाहें फ़ैलाते हैं और एक दूसरे को अपनी बाहों में समेट लेते हैं. बस, फिर किसी और पीढ़ी की, उनकी सीखों की, उनकी समझदारियों की ज़रूरत नहीं रहती. अजीब लगेगा, लेकिन इस फ़िल्म को देखते हुए मुझे भगतसिंह और उनके साथी याद आते हैं. उनकी तरुणाई और उनके अदम्य स्वप्न याद आते हैं. आज यह ’व्यक्तिगत ही राजनैतिक’ है वाला ज़माना है और इन लड़कियों की आँखों में भी मुझे वही सुनहले सपने दिखाई देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">दर्जन से ज़्यादा किशोरवय लड़कियों का सामुहिक गर्भधारण का यह फ़ैसला उनके घरवालों को, स्कूल को हिला देता है. उनके लिए इसे समझ पाना मुश्किल है. वाजिब है, उन्हें ’नैतिकता’ खतरे में दिखाई देती है. लेकिन उन लड़कियों के लिए यह मृत्यु ज्यों शान्ति से भरे उस कस्बे के ठंडे पानी में एक पत्थर मारने सरीख़ा है. यह उन तमाम परम्पराओं का अस्वीकार है जिन्हें हमारे स्कूलों में बड़े होते नागरिकों पर एक अलिखित ’नैतिक शिक्षा’ के नाम पर थोपा जाता है. एक पिता के झिड़ककर कहने पर कि “तुम्हें क्या लगता है तुम दुनिया बदल सकती हो?” उसकी बेटी जवाब में कहती है, “कम से कम हम कोशिश तो कर ही सकती हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के दिसम्बर अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>द आर्टिस्ट : ज़िन्दगी का गीत</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Nov 2011 13:50:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म ’द आर्टिस्ट’ जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस सौ बीस के दशक की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/The-Artist-movie-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-962" title="The Artist movie poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/The-Artist-movie-poster-300x199.jpg" alt="The Artist movie poster" width="300" height="199" /></a>कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस सौ बीस के दशक की किसी फ़िल्म की तरह. प्रामाणिकता का आग्रह ऐसा कि फ़िल्म उन्हीं संवादपट्टों द्वारा बात करती है जिन्हें आप <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Charlie_Chaplin" target="_blank"><strong>चार्ली चैप्लिन</strong></a> की फ़िल्मों में देखते थे. वो सिर्फ़ एक वाकया है जहां फ़िल्म में ध्वनि आपको सुनाई देती है, और मैं वादा करता हूँ कि वो क्षण आपको सालों याद रहने वाला है. किसी कविता की हद को छूता यह प्रसंग एक ख़त्म होते हुए दौर को आपके नंगा कर रख देता है और अचानक यह समझ आता है कि उस बीते कल की तमाम खूबियां, खूबसूरती और मासूमियत उस दौर के साथ ही चली गई हैं और अब कभी वापिस नहीं आयेंगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> का चमत्कार शायद उसकी कहानी में नहीं. यह मूक फ़िल्मों के दौर के एक ऐसे महानायक की कहानी है जिसे सवाक फ़िल्मों का नया दौर अचानक अप्रासंगिक बना देता है. साथ ही यह एक ऐसी प्रेम कहानी भी है जिसे सिनेमा में कई बार दोहराया गया है. लेकिन ’द आर्टिस्ट’ दरअसल हमें उस मासूमियत की याद दिलाती है जिसे हम मूक फ़िल्मों की तरह अपने विगत में कहीं भूल आए हैं. यह सिनेमा से प्रेम की कहानी है. ’सनसेट बुलिवार्ड’ का फ़ीलगुड वर्ज़न जिसे देखकर आपका मन चार्ली चैप्लिन की वो तमाम फ़िल्में फिर से देखने का करता है जिन्हें आपने ख़रीदने के बाद अपनी दराज़ के किसी निचले ख़ाने में धीरे से सरका दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और यह संयोग नहीं है कि <a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> देखते हुए चार्ली याद आते हैं. याद कीजिए उनकी आत्मकथा में आया <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/City_Lights" target="_blank"><strong>’सिटी लाइट्स’</strong></a> वाला प्रसंग,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“किसी भी अच्छी मूक फ़िल्म में विश्वव्यापी अपील होती थी जो बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता को एक जैसे पसन्द आती थीं. अब ये सब खो जाने वाला था. लेकिन मैं इस बात पर अड़ा हुआ था कि मैं मूक फ़िल्में ही बनाता रहूंगा क्योंकि मेरा ये मानना था कि सभी तरह के मनोरंजन के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. इसके अलावा, मैं मूक अभिनेता, पेंटोमाइमिस्ट था और उस माध्यम में मैं विरल था और अगर इसे मेरी खुद की तारीफ़ न माना जाये तो मैं इस कला में सर्वश्रेष्ठ था. इसलिए मैंने एक और मूक फ़िल्म द सिटी लाइट्स के लिए काम करना शुरु कर दिया.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन चार्ली चैप्लिन को <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/City_Lights" target="_blank"><strong>’सिटी लाइट्स’</strong></a> बनाने के दौरान सवाक फ़िल्मों की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा. उनकी आत्मकथा में उस दौरान हुए कई मज़ेदार अनुभवों की चर्चा है. सवाक फ़िल्में उस दौर का चढ़ता हुआ सूरज थीं और चार्ली धारा के विपरीत तैरने की कोशिश कर रहे थे. फ़िल्म के पहले प्रिव्यू शो को याद करते हुए चार्ली उसके लिए ’भयानक’ जैसा शब्द काम में लेते हैं. वे लिखते भी हैं कि वजह फ़िल्म खराब होना नहीं बल्कि देखनेवालों का ओरियंटेशन बदल जाना है. अब वे सिनेमा के परदे पर ड्रामा देखने आते हैं और मूक कॉमेडी उन्हें असहज कर देती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong><br />
</strong></a></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> में ऐसी तमाम रेखाएं हैं जो लौटकर आती हैं और अपना घेरा पूरा करती हैं. फ़िल्म के बीच में कहीं अचानक आपको उसका पहला दृश्य याद आता है और आप उसमें छिपे उस अद्भुत प्रतीक को समझ मन ही मन खिलखिलाते हैं. मूक फ़िल्मों का नायक हमेशा सीढ़ियां उतरता हुआ दिखाई देता है और सवाक फ़िल्मों की सितारा नायिका हमेशा सीढ़ियां चढ़ती हुई. और साथ में मौजूद कुत्ता अपनी सिर्फ़ एक अदा से आपको सितारों के अभिनय की तमाम ऊँचाइयाँ भुला देता है. ’द आर्टिस्ट’ ज़िन्दगी से प्यार की कहानी है और यहां आकर सिनेमा और ज़िन्दगी में फर्क बहुत कम रह जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>&#8216;कथादेश</strong>&#8216; के नवम्बर अंक में आया.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Nov 2011 11:27:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><em>पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक एक बार देखे जाने लायक है, देख आएं. फिर साथ मिल चर्चा-ए-आम होगी.</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-953" title="Rockstar2011" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011-225x300.jpg" alt="Rockstar2011" width="225" height="300" /></a>बीस के सालों में जब अंग्रेज़ी रियासत द्वारा स्थापित ’नई दिल्ली योजना समिति’ के सदस्य जॉन निकोल्स ने पहली बार एक सर्पिलाकार कुंडली मारे बैठे शॉपिंग प्लाज़ा ’कनॉट प्लेस’ का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, उस वक़्त वह पूरा इलाका कीकर के पेड़ों से भरा बियाबान जंगल था. ’कनॉट सर्कस’ के वास्तुकार रॉबर्ट रसैल ने इन्हीं विलायती बबूल के पेड़ों की समाधि पर अपना भड़कीला शाहकार गढ़ा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ अली की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rockstar_(2011_film)" target="_blank"><strong>’रॉकस्टार’</strong></a> में इसी कनॉट प्लेस के हृदयस्थल पर खड़े होकर जनार्दन जाखड़ उर्फ़ ’जॉर्डन’ जब कहता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“जहाँ तुम आज खड़े हो, कभी वहाँ एक जंगल था. फिर एक दिन वहाँ शहर घुस आया. सब कुछ करीने से, सलीके से. कुछ पंछी थे जो उस जंगल के उजड़ने के साथ ही उड़ गए. वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए. मैं उन्हीं पंछियों को पुकारता हूँ. बोलो, तुमने देखा है उन्हें कहीं?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो मेरे लिए वो फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पल है. एक संवाद जिसके सिरहाने न जाने कितनी कहानियाँ अधलेटी सी दिखाई देती हैं. तारीख़ को लेकर वो सलाहियत जिसकी जिसके बिना न कोई युद्ध पूरा हुआ है, न प्यार. लेकिन ऐसे पल फिर फ़िल्म में कम हैं. क्यों, क्योंकि फ़िल्म दिक-काल से परे जाकर कविता हो जाना चाहती है. जब आप सिनेमा में कहानी कहना छोड़कर कोलाज बनाने लगते हैं तो कई बार सिनेमा का दामन आपके हाथ से छूट जाता है. यही वो अंधेरा मोड़ है, मेरा पसन्दीदा निर्देशक शायद यहीं मात खाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे की कथा आने से पहले ही उसके अंश दिखाई देते हैं, किरदार दिखाई देते हैं. और जहाँ से फ़िल्म शुरु होती है वापस लौटकर उस पल को समझाने की कभी कोशिश नहीं करती. रॉकस्टार में ऐसे कई घेरे हैं जो अपना वृत्त पूरा नहीं करते. मैं इन्हें संपादन की गलतियाँ नहीं मानता. ख़ासकर तब जब शम्मी कपूर जैसी हस्ती अपने किरदार के विधिवत आगमन से मीलों पहले ही एक गाने में भीड़ के साथ खड़े ऑडियो सीडी का विमोचन करती दिखाई दे, यह अनायास नहीं हो सकता. ’रॉकस्टार’ यह तय ही नहीं कर पाई है कि उसे क्या होना है. वह एक कलाकार का आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन बाहर इतना शोर है कि आवाज़ कभी रूह तक पहुँच ही नहीं पाती. वह एक साथ एक कलाकृति और एक सफ़ल बॉलीवुड फ़िल्म होने की चाह करती है और दोनों जहाँ से जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ईमानदारी नहीं दिखाई देती. कैंटीन वाले खटाना भाई के रोल में कुमुद मिश्रा ने जैसे एक पूरे समय को जीवित कर दिया है. जब वो इंटरव्यू के लिए कैमरे के सामने खड़े होते हैं तो उस मासूमियत की याद दिलाते हैं जिसे हम अपने बीए पास के दिनों में जिया करते थे और वहीं अपने कॉलेज की कैंटीन में छोड़ आए हैं. अदिति राव हैदरी कहानी में आती हैं और ठीक वहीं लगता है कि इस बिखरी हुई, असंबद्ध कोलाजनुमा कहानी को एक सही पटरी मिल गई है. लेकिन अफ़सोस कि वो सिर्फ़ हाशिए पर खड़ी एक अदाकारा हैं, और जिसे इस कहानी की मुख्य नायिका के तौर चुना गया है उन्हें जितनी बार देखिए यह अफ़सोस बढ़ता ही जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ढाई-ढाई इंच लम्बे तीन संवादों के सहारे लव आजकल की ’हरलीन कौर’ फ़िल्म किसी तरह निकाल ले गई थीं, लेकिन फ़िल्म की मुख्य नायिका के तौर गैर हिन्दीभाषी नर्गिस फ़ाखरी का चयन ऐसा फ़ैसला है जो इम्तियाज़ पर बूमरैंग हो गया है. शायद उन्होंने अपनी खोज ’हरलीन कौर’ को मुख्य भूमिका में लेकर बनी ’आलवेज़ कभी कभी’ का हश्र नहीं देखा. फिर ऊपर से उनकी डबिंग इतनी लाउड है कि फ़िल्म जिस एकांत और शांति की तलाश में है वो उसे कभी नहीं मिल पाती. बेशक उनके मुकाबले रणबीर मीलों आगे हैं लेकिन फिर अचानक आता, अचानक जाता उनका हरियाणवी अंदाज़ खटकता है. फिर भी, ऐसे कितने ही दृश्य हैं फ़िल्म में जहाँ उनका भोलापन और ईमानदारी उनके चेहरे से छलकते हैं. ठीक उस पल जहाँ जनार्दन हीर को बताता है कि उसने कभी दारू नहीं पी और दोस्तों के सामने बस वो दिखाने के लिए अपने मुंह और कपड़ों पर लगाकर चला जाता है, ठीक वहीं रणबीर के भीतर बैठा बच्चा फ़िल्म को कुछ और ऊपर उठा देता है. ’वेक अप सिड’ और ’रॉकेट सिंह’ के बाद यह एक और मोती है जिसे समुद्र मंथन से बहुत सारे विषवमन के बीच रनबीर अपने लिए सलामत निकाल लाए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-955" title="rockstar_hindi_movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg" alt="rockstar_hindi_movie" width="300" height="225" /></a>फ़िल्म के कुछ सबसे खूबसूरत हिस्से इम्तियाज़ ने नहीं बल्कि ए आर रहमान, मोहित चौहान और इरशाद कामिल ने रचे हैं. तुलसी के मानस की तरह जहाँ चार चौपाइयों की आभा को समेटता पीछे-पीछे आप में सम्पूर्ण एक दोहा चला आता है, यहाँ रहमान के रूहानी संगीत में इरशाद की लिखी मानस के हंस सी चौपाइयाँ आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p>’कुन फ़ाया कुन’ में&#8230;</p>
<p>“सजरा सवेरा मेरे तन बरसे, कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ,<br />
क़तरा मिला जो तेरे दर बरसे &#8230; ओ मौला.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’नादान परिंदे’ में&#8230;<br />
कागा रे कागा रे, मोरी इतनी अरज़ तोसे, चुन चुन खाइयो मांस,<br />
खाइयो न तू नैना मोरे, खाइयो न तू नैना मोरे, पिया के मिलन की आस.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यही वो क्षण हैं जहाँ रणबीर सीधे मुझसे संवाद स्थापित करते हैं, यही वो क्षण हैं जहाँ फ़िल्म जादुई होती है. लेकिन कोई फ़िल्म सिर्फ़ गानों के दम पर खड़ी नहीं रह सकती. अचानक लगता है कि मेरे पसन्दीदा निर्देशक ने अपनी सबसे बड़ी नेमत खो दी है और जैसे उनके संवादों का जावेद अख़्तरीकरण हो गया है. और इस ’प्रेम कहानी’ में से प्रेम जाने कब उड़ जाता है पता ही नहीं चलता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सच कहूँ, इम्तियाज़ की सारी गलतियाँ माफ़ होतीं अगर वे अपने सिनेमा की सबसे बड़ी ख़ासियत को बचा पाए होते. मेरी नज़र में इम्तियाज़ की फ़िल्में उसके महिला किरदारों की वजह से बड़ी फ़िल्में बनती हैं. नायिकाएं जिनकी अपनी सोच है, अपनी मर्ज़ी और अपनी गलतियाँ. और गलतियाँ हैं तो उन पर अफ़सोस नहीं है. उन्हें लेकर ’जिन्दगी भर जलने’ वाला भाव नहीं है, और एक पल को ’जब वी मेट’ में वो दिखता भी है तो उस विचार का वाहियातपना फ़िल्म खुद बखूबी स्थापित करती है. उनकी प्रेम कहानियाँ देखकर मैं कहता था कि देखो, यह है समकालीन प्यार. जैसी लड़कियाँ मैं अपने दोस्तों में पाता हूँ. हाँ, वे दोस्त पहले हैं लड़कियाँ बाद में, और प्रेमिकाएं तो उसके भी कहीं बाद. और यही वो बिन्दु था जहाँ इम्तियाज़ अपने समकालीनों से मीलों आगे निकल जाते थे. लेकिन रॉकस्टार के पास न कोई अदिति है न मीरा. कोई ऐसी लड़की नहीं जिसके पास उसकी अपनी आवाज़ हो. अपने बोल हों. और यहाँ बात केवल तकनीकी नहीं, किरदार की है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ की फ़िल्मों ने हमें ऐसी नायिकाएं दी हैं जो सच्चे प्रेम के लिए सिर्फ़ नायक पर निर्भर नहीं हैं. किसी भी और स्वतंत्र किरदार की तरह उनकी अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगियाँ हैं जिन्हें नायक के न मिलने पर बरबाद नहीं हो जाना है. बेशक इन दुनियाओं में हमारे हमेशा कुछ कमअक़्ल नायक आते हैं और प्रेम कहानियाँ पूरी होती हैं, लेकिन फ़िल्म कभी दावे से यह नहीं कहती कि अगर यह नायक न आया होता तो इस नायिका की ज़िन्दगी अधूरी थी. इम्तियाज़ ने नायिकायों को सिर्फ़ नायक के लिए आलम्बन और उद्दीपन होने से बचाया और उन्हें खुद आगे बढ़कर अपनी दुनिया बनाने की, गलतियाँ करने की इजाज़त दी. इस संदर्भ को ध्यान रखते हुए ’रॉकस्टार’ में एक ऐसी नायिका को देखना जिसका जीवन सिर्फ़ हमारे नायक के इर्द गिर्द संचालित होने लगे, निराश करता है. और जैसे जैसे फ़िल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है नायिका अपना समूचा व्यक्तित्व खोती चली जाती है, मेरी निराशा बढ़ती चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इम्तियाज़ की फ़िल्मों में हमेशा ऐसी लड़कियों को पाया है जिनकी ज़िन्दगी ’सच्चे प्यार’ के इंतज़ार में तमाम नहीं होती. वे सदा सक्रिय अपनी पेशेवर ज़िन्दगियाँ जीती हैं. कभी दुखी हैं, लेकिन हारी नहीं हैं और ज़्यादा महत्वपूर्ण ये कि अपनी लड़ाई फिर से लड़ने के लिए किसी नायक का इंतज़ार नहीं करतीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और हाँ, पहला मौका मिलते ही भाग जाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैं खुश होता अगर इस फ़िल्म में भी नायिका ऐसा ही करती. तब यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में उस रास्ते जाती जिस रास्ते को इम्तियाज़ की पूर्ववर्ती फ़िल्मों ने बड़े करीने से बनाया है.</p>
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		<title>सभ्यता का मर्दवादी किला</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Nov 2011 18:09:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शी मंकीज़
लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011.

दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ दुश्चिंताओं को अपने भीतर समेटे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/she_monkeys_alt.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-940" title="she_monkeys" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/she_monkeys_alt-209x300.jpg" alt="she_monkeys" width="209" height="300" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1827358/" target="_blank">शी मंकीज़</a></strong></p>
<p><strong>लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ दुश्चिंताओं को अपने भीतर समेटे है. छोटी सी बच्ची जिसे स्विमिंग पूल पर यह समझाया जा रहा है कि उसे अब पूरे कपड़े पहन पूल में उतरना चाहिए. गौर से देखिए, यही वो क्षण है जहां एक बच्ची को उसके स्त्री होने और उससे जुड़े ’कर्तव्यों’ का पहला पाठ पढ़ाया जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">सबक बहुतेरे हैं. उसे मज़बूत होना है, दुनिया का सामना करना है. ठीक उस क्षण जब वह चीते से दिखने वाले अंत:वस्त्रों का जोड़ा पसन्द करती है और साथ में अपने चेहरे पर किसी चीते सी धारियां बना लेती है, ठीक उस क्षण हमारी सभ्यता का मर्दवादी किला भरभराकर ढह जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के नवम्बर अंक में प्रकाशित.</p>
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		<title>उमेश विनायक कुलकर्णी की ’देऊल’</title>
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		<pubDate>Tue, 08 Nov 2011 20:18:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[उमेश विनायक कुलकर्णी हमारे दौर के सबसे उम्मीदों से भरे निर्देशक का नाम है. मेरे लिए वह गिरीश कासरवल्ली की परम्परा में आते हैं जिन्होंने व्यंग्य को ठोस मूल्यों की धरती पर खड़े होकर परखा है और इस मायने में वे हमारे पारम्परिक रूप से बनने वाले क्षेत्रीय सिनेमा में हमेशा कुछ नया जोड़ते हैं. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/deool1.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-930" title="deool" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/deool1-225x300.jpg" alt="deool" width="225" height="300" /></a><strong>उमेश विनायक कुलकर्णी</strong> हमारे दौर के सबसे उम्मीदों से भरे निर्देशक का नाम है. मेरे लिए वह गिरीश कासरवल्ली की परम्परा में आते हैं जिन्होंने व्यंग्य को ठोस मूल्यों की धरती पर खड़े होकर परखा है और इस मायने में वे हमारे पारम्परिक रूप से बनने वाले क्षेत्रीय सिनेमा में हमेशा कुछ नया जोड़ते हैं. ख़ास बात है कि उनके रचे गांव हमारी हिन्दुस्तानी गांवो के बारे में बनी ’कृषि दर्शन’ और ’चौपाल’ वाली दूरदर्शन छाप इकहरी पहचान को तोड़ते हैं. नई बाज़ार आधारित संस्कृति का अगला ठिकाना अब हिन्दुस्तान के गांव और कस्बे हैं और इसी की कहानी है उमेश की नई फ़िल्म ’देऊल’.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’देऊल’</strong> में वर्तमान विकास की अवधारणा पर बहस बार-बार लौटकर आती है और गांव &#8211; शहर विभेद के विभिन्न आयाम भी सामने खुलते चलते हैं. फ़िल्म के एक प्रसंग में एक किरदार भाऊ दूसरे किरदार कुलकर्णी अन्ना को कहता है कि शहर तो बदल गए, गांव ही क्यों वैसे रहें जैसे वो पहले थे. भाव कुछ ऐसा है कि हम भी ’बिगड़ना’ चाहते हैं और हमें यह हक़ है. आखिर किन्हीं और लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी कष्ट में कोई नहीं बिताना चाहता. यह एक बड़ा सच है जिसे उमेश की फ़िल्म बड़ी लापरवाही से कहकर निकल जाती है. बेशक फ़िल्म विकास की वैकल्पिक अवधारणा के साथ खड़ी है जिसमें इंसान का लालच केन्द्र में न होकर प्रकृति केन्द्र में हो. लेकिन उमेश की ख़ासियत यही है कि वह स्याह सफ़ेद में बंटी कहानियां रचते हुए भी स्याह को अपनी बात कहने का पूरा मौका देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’देऊल’ </strong>उनकी पहली फ़िल्म ’वेलू’ की तरह व्यंग्य को अपना आधार बनाती है. लेकिन यह ’विहिर’ की तरह भी है और इसने अनन्तिम सवालों की खोज करना छोड़ा नहीं है. फ़िल्म के टाइटल क्रेडिट्स जिस तरह की रचनात्मक शुरुआत फ़िल्म को देते हैं, हालिया सिनेमा में दुर्लभ है. ’विहिर’ के चाहनेवालों के लिए यह फ़िल्म कुछ ज़्यादा वाचाल है. लेकिन क्या करें कि स्वयं यथार्थ का चेहरा इतना ही बेहुदा हुआ जाता है. गांव में बनने वाले एक मंदिर के चारों ओर घूमती इसकी कहानी हमारे गांवों में घुस आते उस बाज़ार की कहानी है जिसकी सबसे सुलभ साझीदार धर्म की पताका है. यह उदारीकरण के दूसरे चरण में प्रवेश कर गए हिन्दुस्तान की कथा है, एकदम ख़ालिस.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">इसका संशोधित संस्करण साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के नवम्बर अंक में प्रकाशित.</p>
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		<title>Pina</title>
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		<pubDate>Tue, 18 Oct 2011 21:40:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[&#8220;रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!&#8221; – ’देवदारु’ से.
जब Pina Bausch के नर्तकों की टोली रंगमंच की तय [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote style="text-align: justify;"><p>&#8220;रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!&#8221; – ’देवदारु’ से.</p></blockquote>
<p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/pina-image.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-924" title="pina image" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/pina-image-235x300.jpg" alt="pina image" width="235" height="300" /></a>जब Pina Bausch के नर्तकों की टोली रंगमंच की तय चौहद्दी से बाहर निकल शीशे की बनी ख़ाली इमारतों, फुटपाथों, सार्वजनिक परिवहन, कॉफ़ी हाउस और औद्योगिक इकाइयों को अपनी काया के छंद की गिरफ़्त में ले लेती है, मुझे आचार्य द्विवेदी याद का निबंध ’देवदारु’ याद आता है. यह जीवन रस का नृत्य रूप है. आचार्य द्विवेदी के शब्दों में, यह नृत्य ’जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न’ करता है. निरंतर एक मशीनी लय से बंधे इस समय में किताबों की याद, कविताओं की बात, कला का आग्रह.</p>
<p>कॉफ़ी हाउस की अनगिनत कुर्सियों के बीच अकेले खड़े दो प्रेमी एक-दूसरे को बांहों में भर लेते हैं. लेकिन व्यवस्था का आग्रह है कि उनका मिलन तय सांचों में हो. उनके प्रतिकार में छंद है, ताल है, लय है. यहाँ नृत्य जन्म लेता है. पीना बाउश के रचे नृत्यों में विचारों का विहंगम कोलाहल है. उनके रचना संसार में मनुष्य प्रकृति का विस्तार है. इसलिए उनके नृत्यों में यह दर्ज कर पाना बहुत मुश्किल है कि कहाँ स्त्री की सीमा ख़त्म होती है और कहाँ प्रकृति का असीमित वितान शुरु होता है.</p>
<p>वे नाचते हैं. नदियों में, पर्बतों पर, झरनों के साथ. वे नाचते हैं. शहर के बीचोंबीच. जैसे शहर के कोलाहल में राग तलाशते हैं. यह रंगमंच की चौहद्दी से बाहर निकल शहर के बीचोंबीच कला का आग्रह आज के इस एकायामी बाज़ार में खड़े होकर विचारों के बहुवचन की मांग है.</p>
<p>Wim Wenders का वृत्तचित्र ’पीना’ सिनेमाई कविता है. किसी तरुण मन स्त्री की कविता. उग्र, उद्दाम, उमंगों से भरी.</p>
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		<title>अराजकता के आकाश में उड़ता सिनेमा का जनतंत्र &#8211; 2</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Oct 2011 00:42:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हम रीगल के बाहर खड़े थे. भीतर से ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ का आदमकद पोस्टर झांक रहा था. हाँ, एक और डीएसएलआर कैमरे पर बनी फ़िल्म सिनेमाघरों में आने वाली थी. बम्बई की बरसात सुबह से इस बे-छतरी दिल्लीवाले से लुका-छिपी खेल रही थी. तय हुआ लिओपोल्ड चलेंगे. पहुंचने ही वाले थे कि ठीक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/IMG_7072.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-908" title="gateway" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/IMG_7072-300x200.jpg" alt="gateway" width="300" height="200" /></a>हम रीगल के बाहर</strong> खड़े थे. भीतर से ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ का आदमकद पोस्टर झांक रहा था. हाँ, एक और डीएसएलआर कैमरे पर बनी फ़िल्म सिनेमाघरों में आने वाली थी. बम्बई की बरसात सुबह से इस बे-छतरी दिल्लीवाले से लुका-छिपी खेल रही थी. तय हुआ लिओपोल्ड चलेंगे. पहुंचने ही वाले थे कि ठीक लिओपोल्ड के पहले बाएं हाथ को एक रास्ता खुलता दिखा समन्दर की ओर. मैं ठहर गया. सामने गेटवे था. समन्दर देख दिल्लीवाले का मन मचल गया. मैंने रास्ता बदल लिया. स्वेतलाना और जगन्नाथन दूर खड़े मुझे घूर रहे थे. लेकिन मेरे पीछे मेरा घर था जिसकी याद हमेशा मुझे पानी की ओर धकेलती है. आसमान बरसने को था और मैं अपने डीएसएलआर को पानी से बचाता इन घनेरे बादलों को समन्दर में घुल जाने से पहले अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहता था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन पानी को कभी कोई बांध पाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दो कॉफ़ी के प्यालों और एक बियर मग के बीच, उस दीवार के एकदम नज़दीक बैठे जहां गोलियों से बने निशानों को मेडल की तरह सजाया गया है, लियोपोल्ड की उस टेबल पर जगन्नाथन मुझे बम्बई को कुछ और पास से देखने के लिए ग्रांट रोड के सिंगल स्क्रीन थियेटर्स देखने जाने की सलाह देता है और मैं उसे अपनी टूटी-फ़ूटी याद्दाश्त से वीरेन डंगवाल की कविता ’पी टी ऊषा’ सुनाता हूँ. पिछले तीन दिन से मैं उसे हम सबकी बातें सुनते, कोरे कागज़ों पर स्कैच बनाते और अनवरत जेम्स हेडली चेज़ पढ़ते देख रहा हूँ. क्या कोई मानेगा कि मेरी और जगन्नाथन की दोस्ती के पीछे जिस लड़के का हाथ है उससे मैं आजतक नहीं मिला. “सगई राज मेरी फ़िल्म का केन्द्रीय चरित्र होगा यह पहले से तय नहीं था. बल्कि वो तो मेरा सहायक कैमरामैन था.” जगन बताता है. (आप ’वीडियोकारन’ में आज भी उसका नाम ’सिनैमेटोग्राफी’ के क्रेडिट्स में पढ़ सकते हैं) पिछले दो महीने में मैं अपने कम से कम दर्जन भर दोस्तों को उस विस्मयकारी सगई राज से मिलवा चुका हूँ. मैं जगन से कहता हूँ कि जो बनाने वो निकला था, वहां से खड़े होकर देखें तो उसने अपनी फ़िल्म की नरैशन स्टाइल और मैसेज से बहुत समझौता किया है, लेकिन बदले में जो चीज़ बचाई है वो कहीं ज़्यादा कीमती है. ईमानदारी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/videokaaran4small.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-909" title="videokaaran4small" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/videokaaran4small.jpg" alt="videokaaran4small" width="295" height="150" /></a>’टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सांइसेस’ की जिस छोटी सी ग्रांट के दम पर <strong>जगन्नाथन कृष्णन</strong> ने <strong>’वीडियोकारन’</strong> बनाई है, आमतौर पर उसे वहां शॉर्ट फ़िल्म के लिए ही उपयुक्त माना जाता है. शायद यह भी कि यह हिन्दुस्तान में अपनी पसन्द की फ़िल्में बनाने का ज़्यादा पारम्परिक तरीका है. लेकिन एक ऐसे दौर में जहां योजनाबद्ध तरीके से तमाम संस्थानों और प्रक्रियाओं का निजीकरण ’विकास’ के नाम पर किया जा रहा हो, वहां संस्थागत मदद का सही और जनतांत्रिक मूल्यों के हक में उपयोग दरअसल इस रास्ते को वापिस ज़िन्दा करने की लड़ाई में एक कदम है. संस्थागत मदद में अपनी वाजिब हिस्सेदारी मांगना उसके ’उदारीकरण’ के नाम पर कुछ हाथों में गैर-लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सीमित होने के खतरे का जवाब भी होता है. आज भी जगन्नाथन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो अपनी डॉक्यूमेंट्री में आए तमाम फ़िल्मों के दृश्यों के अधिकार खरीद सके, और शायद इसी वजह से अनेक विदेशी फ़ेस्टिवल्स में वह प्रतियोगिता से बाहर हो जाती है. जगन अब ’वीडियोकारन’ से आगे बढ़ना चाहता है. उसके पास कहानी है लेकिन उसे बनाने के लिए पैसा नहीं. फिर एक बार फ़िल्म बनाने का संघर्ष उसे बनाने का सही आर्थिक मॉडल तलाश करने में छिपा है. लेकिन इस बार जगन को यह मालूम है कि वो अपनी दूसरी फ़िल्म बनाएगा. जल्द ही बनाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/leavinghome-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-910" title="INDIANOCEAN POSTER FINAL" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/leavinghome-poster-226x300.jpg" alt="INDIANOCEAN POSTER FINAL" width="226" height="300" /></a>कुछ लड़ाइयां जैसे अब अनवरत हैं. पिछले दिनों <strong>जयदीप वर्मा</strong> दिल्ली में थे. राष्ट्रपति से अपनी फ़िल्म <strong>’लीविंग होम’</strong> के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार लेने. कुछ महीने पहले इसी कॉलम में हमने ’लीविंग होम’ की बात की थी. उनसे मुलाकात में फिर वो सारी कहानियां याद हो आईं जिनसे होकर यह दुर्लभ फ़िल्म यहां तक पहुँची है. वैसे एक नज़रिया यह भी हो सकता है कि ’लीविंग होम’ को हम हिन्दुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा की सफलता की कहानी के तौर पर पढ़ें. तमाम संघर्षों के साथ बनकर तैयार हुई यह संगीतमय डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ़ सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई बल्कि साढ़े पांच घंटे के अनकट वर्ज़न के साथ अपने चाहनेवालों के घरों में, दिलों में पहुँची. राष्ट्रीय पुरस्कार इसकी कहानी को एक ’हैप्पी एंडिंग’ भी देता है. लेकिन इस नज़रिए में वो बहुत सारी पीड़ाएं कहीं छिप जाती हैं जिन्हें अब हमने एक स्वतंत्र फ़िल्मकार का भाग्य मान लिया है. उस दिन से जोड़कर जब अखबारवालों ने उनसे उनकी फ़िल्म के प्रदर्शन वाले हफ़्ते में उसकी अपने अखबार में लिस्टिंग भर के पैसे मांगे थे, उन पुरस्कारों तक जहां वाजिब हकदारों के सही नाम पुकारने में गलतियां हुईं, यह लिस्ट बहुत लम्बी है. यहां एक फ़िल्मकार है जिसे अपने काम में गुणवत्ता से ज़रा सा भी समझौता मंज़ूर नहीं, जिसकी रचनाशीलता सदा कुछ नया गढ़ती रहती है. लेकिन जिसे अपने हिस्से का पूरा मान, पूरी इज़्ज़त चाहिए. सवाल हमसे है कि क्या हम इन जैसे स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए एक ऐसा सिस्टम खड़ा कर सकते हैं जिसमें इन्हें अपना काम ईमानदारी और गुणवता के साथ पूरा करने का मौका मिले?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन हिन्दी सिनेमा में स्वतंत्र प्रयास अब एकाकी नहीं रहे. मैं कहानियों की तलाश में हूँ. आधी रात <strong>हेमंत गाबा</strong> को फोन करता हूँ. हेमंत की कहानी कुछ-कुछ ’द अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्ट’ के नायक से मिलती है. विदेश में बैठे सॉफ़्टवेयर कोड लिखते-लिखते एक दिन अचानक यह लड़का तय करता है कि इसे फ़िल्म बनानी है. बाकायदा एक फ़ीचर फ़िल्म. सच में यह दुस्साहसियों का ज़माना है. लौटकर हिन्दुस्तान आता है और मानिए या न मानिए, कैसे न कैसे कर अपनी फ़िल्म बना डालता है. इधर हेमंत अपनी कहानी सुना रहा है, वही फ़िल्म के प्रदर्शन से जुड़े ’डिस्ट्रीब्यूटर-पब्लिसिटी’ के गोरखधंधे, और मुझे उसकी बातें सुनते हुए एक पुरानी कहानी, एक पुराना दोस्त याद आता है. अचानक मैं जयदीप वर्मा की ’लीविंग होम’ का नाम लेता हूँ और हेमंत मुझे बताता है कि उसने ’लीविंग होम’ ख़ास कनॉट प्लेस के सिनेमाहॉल में इसीलिए देखी थी क्योंकि ऐसा हर स्वतंत्र प्रयास उसकी लड़ाई का हिस्सा है. अलग-अलग भाषा और परिवेश से आए यह सभी स्वतंत्र फ़िल्मकार अब साथ खड़े होने का महत्व और ज़रूरत समझ रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/SB_Poster-2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-911" title="SB_Poster 2" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/SB_Poster-2-208x300.jpg" alt="SB_Poster 2" width="208" height="300" /></a>हेमंत बताता है कि उसकी फ़िल्म बनकर तैयार है लेकिन किसी भी किस्म का वितरक उसके प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं. उन्हें पैसा चाहिए. उसे ’आपकी पैंतीस लाख की फ़िल्म में हम अपना सत्तर लाख क्यों डालें’ जैसे जवाब इस संघर्ष की बहुत शुरुआत में ही मिल चुके हैं. वो उस दिन को याद करता है जब एक बड़ी फ़िल्म प्रोसेसिंग लैब ने उसकी बरसों की मेहनत को लगभग नष्ट करने के बाद उससे पहला सवाल यही पूछा था कि कहीं आप किसी फ़िल्मी खानदान से तो नहीं? इन्हीं सारे वितरण से जुड़े झमेलों को याद कर वो लिखता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“अब तो यह जाना-पहचाना तथ्य है कि आज फ़िल्म बनाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल उसका वितरण है. मुझे यह फ़िल्म<strong> ’शटलकॉक ब्वॉयज़’</strong> पूरा करने में दो साल से ज़्यादा लगे हैं और अब भी मुझे यह नहीं पता कि आखिर कब यह फ़िल्म इसके असल दर्शकों तक पहुँचेगी. वितरकों से तो मिलना ही मुश्किल है, शायद इसलिए कि मैं इस इंडस्ट्री के लिए एक बाहरी व्यक्ति हूँ और मेरे पीछे कोई फ़िल्मी बैकग्राउंड नहीं. लगातार प्रयास के बाद जिन कुछ मीडिया कॉर्पोरेट्स से मैं मिल पाया, उन्होंने भी बड़ी विनम्रता से मेरी कोशिश को यह कहकर किनारे कर दिया कि न तो इसमें कोई स्टार है और न ही सिर्फ़ पैंतीस लाख में बनी फ़िल्म के वितरण में पैसा डालना कोई समझदारी है. स्वतंत्र वितरक भी चाहते हैं कि प्रिंट और पब्लिसिटी का पैसा मैं खुद करूं, जो इन हालातों में मेरे लिए संभव नहीं. तो हाल-फ़िलहाल फ़िल्म को एक सीमित स्तर पर भी प्रदर्शित कर पाने की लड़ाई जारी है.” हेमंत अपनी अमरीका की नौकरी से जो कुछ बचाकर लाया था वो तो इस फ़िल्म में लगा दिया. दोस्तो, घरवालों का भी मन और धन यहां अटका है. लेकिन वो कोई धन कुबेर नहीं. उसका अगली फ़िल्म बनाने का सपना पूरी तरह इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर टिका है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऐसे में देश भर में होने वाले तमाम छोटे-बड़े फ़िल्म महोत्सव हेमंत के लिए उम्मीद की किरण हैं. और ऐसे फ़िल्मोत्सवों की संख्या हिन्दी की लघु पत्रिकाओं की तरह लगातार बढ़ रही है. यहां उसकी फ़िल्म को अपने दर्शक मिल सकते हैं. बेशक यहां पैसा नहीं है लेकिन यहां दर्शक फ़िल्म देखेगा और पसन्द करेगा तो उससे फ़िल्म का नाम और आगे जाएगा. रास्ते ऐसे ही निकलते हैं. फिर हमें समझ आता है कि फ़िल्म दिखाने का कोई ठीक-ठाक मॉडल खड़ा कर पाना हिन्दुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा के भविष्य की राह में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है. वो हिमाचल का ज़िक्र करता है, यमुनानगर में फ़िल्म फ़ेस्टिवल की बात बता आश्चर्य मिश्रित खुशी ज़ाहिर करता है. मैं उसे गोरखपुर का पता बताता हूँ. दोस्तियां कुछ और गाढ़ी होती हैं. कुछ हंसी-ठठ्ठों भर में हम फ़िल्म को उसके दर्शक तक पहुँचाने के इस अनवरत चलते संघर्ष को साझा लड़ाई में बदल देते हैं.</p>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/Delhi-film-archive.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-912" title="Delhi film archive" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/10/Delhi-film-archive.jpg" alt="Delhi film archive" width="200" height="152" /></a>डॉक्यूमेंट्री वाले इसका रास्ता अब वितरण भी अपने हाथ में लेकर निकाल रहे हैं. <a href="http://www.delhifilmarchive.org/" target="_blank"><strong>’डेल्ही फ़िल्म आर्काइव’</strong></a> जैसा प्रयास दिल्ली के वृत्तचित्र निर्देशकों का एक ऐसा ही सम्मिलित प्रयास है जो सिनेमा की शहर में उपलब्धता सुनिश्चित करने का माध्यम है. ’मैजिक लैंटर्न फ़ाउंडेशन’ भी <a href="http://www.ucfilms.in/" target="_blank"><strong>’अंडर कंस्ट्रक्शन’</strong></a> के बैनर तले सिनेमा के वितरण का काम शुरु कर चुकी है. खुद <a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank"><strong>गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल</strong></a> की टीम के पास अब पचास से ज़्यादा फ़िल्मों के वितरण अधिकार हैं. अब तो फ़िल्मस डिविजन भी अपने अधिकार की फ़िल्मों का वितरण करने लगा है. कई दुर्लभ फ़िल्में फिर सामने आई हैं. मान्य धारणा है कि हिन्दुस्तान में डॉक्यूमेंट्री में जो पैसा है वो बनाने के पहले है, बनाने के बाद उसे दिखाकर कोई पैसा नहीं कमाया जा सकता. शायद इस कारण भी यहां नए वितरण तंत्र को खड़ा करना मुश्किल तो है लेकिन जटिल नहीं. यह नए प्रयास अब इस प्रचलित धारणा को कुछ अंशों में बदल भी रहे हैं. लेकिन फ़ीचर फ़िल्म का सिनेमाघरों में प्रदर्शन आज भी टेढ़ी खीर है. वहां खेल बड़े पैसे और पहचान का है. और इसके बिना कोई सेटेलाइट राइट्स भी खरीदने को तैयार नहीं. कई अच्छी फ़िल्में जैसे <strong>’खरगोश’</strong>, <strong>’कबूतर’</strong> सिनेमाघरों का कभी मुंह नहीं देख पाईं. और <strong>’दाएं या बाएं’</strong>, <strong>’हल्ला’</strong> जैसी फ़िल्में सही प्रचार और शो टाइमिंग न मिलने के अभाव में किस अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं ये हम सब जानते हैं.</p>
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<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह अनेक संभावनाओं वाला समय है. बहुवचन समय. यहां नकारात्मक बंजर ज़मीनों पर ज़िन्दगी और सिनेमा को चाहनेवाले उम्मीदों के पौधे लगा रहे हैं. उन्हें बढ़ने के लिए खाद-पानी की ज़रूरत है. और उस पानी का सोता हम दर्शकों से होकर गुज़रता है. तो आएं, अपने-अपने डीएसएलआर कैमरे निकालें और शाश्वत नियमों को झुठलाएं और इस कलकल पानी को उम्मीदों की क्यारियों में कैद करना शुरु करें.</p>
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<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के अक्टूबर अंक में प्रकाशित. इस आलेख की पहली किश्त आप <a href="http://mihirpandya.com/2011/09/independent-cinema-in-india/" target="_blank"><strong>यहाँ</strong></a> पढ़ सकते हैं. फ़िल्मकार <strong>हेमंत गाबा</strong> से <a href="http://mohallalive.com/" target="_blank"><strong>मोहल्ला लाइव</strong></a> के लिए की गई मेरी विस्तृत बातचीत आप <a href="http://mohallalive.com/2011/10/08/an-interview-with-hemant-gaba/" target="_blank"><strong>यहाँ</strong></a> पढ़ सकते हैं.</p>
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		<title>अराजकता में जनतन्त्र</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Sep 2011 21:11:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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“वे उन दिनों को याद करते हैं जब उनके पास एक जोड़ा जींस खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे और मज़ाक में वे घर आए मेहमानों से घर में घुसने का दाम लिया करते थे. रिज़वी बताती हैं कि दरअसल वो इस फ़िल्म के द्वारा कहीं पहुँचना नहीं चाहते थे, ये कोई ’कैरियर चॉइस’ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“वे उन दिनों को याद करते हैं जब उनके पास एक जोड़ा जींस खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे और मज़ाक में वे घर आए मेहमानों से घर में घुसने का दाम लिया करते थे. रिज़वी बताती हैं कि दरअसल वो इस फ़िल्म के द्वारा कहीं पहुँचना नहीं चाहते थे, ये कोई ’कैरियर चॉइस’ नहीं थी &#8211; ये बस एक फ़िल्म थी जिसे हम बनाना चाहते थे. औए कुछ न होता तो हमने इसे वीडियो पर बनाया होता.” – <strong>अनुषा रिज़वी</strong> और <strong>महमूद फ़ारुक़ी</strong>. <strong><a href="http://www.tehelka.com/story_main46.asp?filename=hub240710thelongest.asp" target="_blank">24 जुलाई 2010</a></strong> के ’तहलका’ में.</p>
<p style="text-align: justify;">“अब मुझे एक कहानी की जरूरत थी, जिस पर मैं काम कर सकूं और जिसे शूट करने के लिए शायद कुछ पैसा जुटा सकूं. मैंने अपनी स्क्रिप्टों पर नजर दौड़ाने का काम शुरू किया. इनमें से ‘से चीज’ मुझे सबसे ठीक लगी. यह उस खांचे में फिट बैठती थी, जो मैंने सोचा था. यानी एक कैरेक्टर बेस्ड फिल्म, जिसका दायरा इतना हो कि उसे किसी की मदद के बगैर भी बनाया जा सके.“ – <strong>अक्षत वर्मा</strong>. <a href="http://www.tehelka.com/story_main50.asp?filename=hub300711cinema.asp" target="_blank"><strong>30 जुलाई 2011</strong></a> के ’तहलका’ में.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन इन्हें आमिर ख़ान मिले. ’पीपली लाइव’ और ’डेल्ही बेली’ दोनों ही फ़िल्में एक-दूसरे से विषय और स्वभाव में नितांत भिन्न होते हुए भी इस मायने में समान हैं कि अपनी-अपनी तरह से यह हिन्दी सिनेमा के प्रचलित व्याकरण में कुछ नया जोड़ती हैं. संयोग से दोनों ही फ़िल्मों को आमिर ख़ान का साथ मिला और बहुत का मानना है कि इसी वजह से यह फ़िल्में लोकप्रियता के ऊँचे मुकाम तक पहुँच पाई हैं. बात में सच्चाई भी है. वैसे पिछले साल तक़रीबन इसी वक़्त हमने महमूद और अनुषा को ’पीपली लाइव’ बनाने के दौरान हुए अनुभवों को बांटते जनतंत्र / मोहल्ला की सेमीनार में सुना था और इस साल के उन्हीं दिनों अक्षत को ’डेल्ही बेली’ लिखने से लेकर बनाने तक के किस्से सुनाते मोहल्ला द्वारा आयोजित परिचर्चा में सुना. संयोग से मैं दोनों ही कार्यक्रमों का संचालक था और जिस दौरान हम ’इन्हें तो आमिर मिले’ कह-कहकर उनकी किस्मतों पर रश्क़ कर रहे थे, मैंने उन्हें यह कहते सुना कि अगर आमिर न मिले होते तो भी हम अपनी फ़िल्म बनाकर रहते.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बात मज़ेदार है. हम इसे बड़बोलापन कहकर टाल सकते हैं क्योंकि एक बार जब आपने आमिर के सहारे अपनी मर्ज़ी की फ़िल्म बना ली, फिर इस तरह के बयान देना आसान हो जाता है. लेकिन फिर, ऊपर लिखी बातों की सच्चाई मुझे कचोटती है. वो क्या बात है जिसने इन फ़िल्मकारों को यह विश्वास दिया है कि वे कह पाएं,  “अगर आमिर न मिले होते तो भी हम अपनी फ़िल्म बना लेते.”? यहीं से मेरा सोचने का रुख़ पलटता है और मैं हिन्दी सिनेमा की उस अराजक लेकिन रोमांचकारी दुनिया में प्रवेश करता हूँ जहाँ आपकी फ़िल्म के पीछे पैसा लगाने को और खड़े होने को आमिर खान भले न हों, फिर भी कैसे न कैसे आप अपने हिस्से की फ़िल्म बना लेते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/The_Untitled_Kartik_Krishnan_Project_Poster1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-901" title="The_Untitled_Kartik_Krishnan_Project" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/The_Untitled_Kartik_Krishnan_Project_Poster1.jpg" alt="The_Untitled_Kartik_Krishnan_Project" width="220" height="311" /></a>स्वागत है नई तकनीक के साथ बदलते नए सिनेमा की दुनिया में. मुख्यधारा सिनेमा की बड़बोली दुनिया से अलग, यह दुनिया अराजक ज़रूर दिखती है, थोड़ी मुश्किल भी. लेकिन अपना रास्ता तलाशकर फ़िल्में बनाना अब यहाँ लोग सीखने लगे हैं. श्रीनिवास सुंदरराजन की फ़िल्म ’<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Untitled_Kartik_Krishnan_Project" target="_blank"><strong>दि अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्ट’</strong></a> (जिस पर हम पहले दिसंबर 2010 वाले आलेख में बात कर चुके हैं) को ही लें. मैं कार्तिक कृष्णन से दिल्ली में हुई एक मुलाकात में उन्हें किसी नए दोस्त को अपनी फ़िल्म के बारे में बताते हुए सुनता हूँ, “हमारी फ़िल्म, जिसे हमने कुल-जमा चालीस हज़ार रुपए में बनाया है.” कुछ यह हुआ है फ़िल्म बनाने की तकनीक में समय के साथ आए बदलाव से और कुछ इसका श्रेय हिन्दी सिनेमा में आई नई पीढ़ी को जाता है जिसे ज़्यादा इंतज़ार करना शायद पसंद नहीं. श्रीनिवास बताते हैं कि वे तो दरअसल ’ज़ीरो बजट’ फ़िल्म बनाना चाहते थे लेकिन ना ना करते भी चालीस हज़ार रुपए लग ही गए! हाँ, फ़िल्म बनाने के दौरान खाने के नाम पर पूरे दस्ते ने वड़ा पाव और कटिंग चाय पर गुज़ारा किया. फ़िल्म के तमाम कलाकार नौकरीपेशा थे इसलिए शूटिंग सिर्फ़ सप्ताहांत में ही हो पाती थी. कई बार पैसा खत्म हो जाने के कारण भी काम रोकना पड़ता था. इसीलिए जब श्रीनिवास से पूछा गया कि फ़िल्म की शूटिंग कितने दिनों में पूरी हुई तो उन्होंने बताया – सत्ताईस. लेकिन फिर साथ में जोड़ा कि शूटिंग के ये सत्ताईस दिन एक साल से ज़्यादा की लम्बी अवधि में फ़ैले हुए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक तकनीक में आए बदलाव में इसकी चाबी छिपी है. हिन्दुस्तान में वृत्तचित्र निर्माण में बीते सालों में आया जन उभार इस बदलती तकनीक के समांतर चलता है. गोरखपुर से फ़िल्मोत्सवों की एक श्रंखला शुरु करने वाले हमारे दोस्त संजय जोशी जो खुद एक वृत्तचित्र फ़िल्मकार हैं, अपने एक लेख में इस तकनीकी परिवर्तन को समझाते हुए उससे बदलते वृत्तचित्र संसार का खाका खींचते हैं, “वीडियो तकनीक के आने से पहले फ़िल्म निर्माण का सारा काम सेल्यूलाइड पर होता था. सेल्यूलाइड यानि सिल्वर ब्रोमाइड की परत वाली प्लास्टिक की पट्टी को रोशनी से एक्सपोज़ करवाने पर छवि का अंकन नेगेटिव पर होता. फिर यह फ़िल्म लैब में धुलने (रासायनिक प्रक्रिया) के लिए जाती. यह समय लेने वाली और तमाम झंझटों से गुज़रने वाली प्रक्रिया थी. आज से पन्द्रह साल पहले तक 11 मिनट की शूटिंग के लिए फ़िल्म रोल और धुलाई का खर्चा ही आठ से दस हज़ार रुपए था. अब इसमें किराया भाड़ा भी शामिल करें तो खर्चा और बढ़ जाएगा. गौरतलब है कि यह अनुमान 16 मिलिमीटर के फ़ॉरमैट के लिए लगाया जा रहा है. सेल्यूलाइड के प्रचलित फ़ॉरमैट 35 मिमी में यह खर्चा दुगुने से थोड़ा ज़्यादा होगा. फिर शूटिंग यूनिट में कैमरापर्सन, कम से कम दो सहायक और साउंड रिकार्डिस्ट की ज़रूरत पड़ती और सारे सामान के लिए एक मंझोली गाड़ी और ड्राइवर.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/GFF4-090.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-902" title="GFF4" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/GFF4-090-300x225.jpg" alt="GFF4" width="300" height="225" /></a>इसके उलट वीडियो में आज की तारीख में आप 100 रु. में 40 मिनट की रिकार्डिंग कर सकते हैं. दोनों माध्यमों में एक बड़ा फ़र्क यह भी है कि जहाँ सेल्यूलाइड में आप सिर्फ़ एक बार छवियों को अंकित कर सकते हैं वहीं वीडियो के मैग्नेटिक टेप में आप अंकित हुई छवि को मिटाकर कई बार नई छवि अंकित कर सकते हैं. वीडियो की यूनिट सिर्फ़ एक व्यक्ति भी संचालित कर सकता है. 1990 के दशक के मध्य तक न सिर्फ़ वीडियो कैमरे सस्ते हुए, बल्कि कम्प्यूटर पर एडिटिंग करना भी आसान और सस्ता हो गया. वीडियो तकनीक ने बोलती छवियों की विकासयात्रा में एक क्रांतिकारी योगदान, प्रदर्शन के लिए सुविधाजनक और किफ़ायती प्रोजेक्टर को सुलभ करवाकर किया. संभवत: इन्हीं सारे तकनीकी बदलावों के कारण 1990 के बाद भारतीय डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म जगत में लम्बी छलांग दिखाई देती है.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">संजय जोशी का यह उद्धरण यहाँ इसलिए भी समीचीन है क्योंकि इस बदलती तकनीक के सहारे ही उन्होंने उत्तर भारत के आधा दर्जन से ज़्यादा शहरों में <a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank"><strong>’प्रतिरोध का सिनेमा’</strong></a> शीर्षक से होने वाले सालाना फ़िल्म समारोहों की एक श्रृंखला खड़ी कर दी है. 2006 मार्च में गोरखपुर से शुरु हुआ यह सफ़र अब लखनऊ, पटना, बलिया, नैनीताल, भिलाई जैसे विभिन्न शहरों में अपने पैर जमा चुका है. इसने अपने विकास के साथ विश्व सिनेमा और बेहतर डॉक्यूमेंट्री सिनेमा देखने की जो समझदारी अपने दर्शक वर्ग के बीच विकसित की है वह अद्वितीय है. तकनीक ने फ़िल्म निर्माण के साथ-साथ फ़िल्म को देखा जाना-दिखाया जाना भी सुलभ बनाया है. यह मुख्यधारा के उस एकछत्र एकाधिकार से बिल्कुल अलग है जहाँ तकनीक का इस्तेमाल सिनेमा के और ज़्यादा केन्द्रीकरण के लिए हो रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/bhobhar1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-903" title="bhobhar1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/09/bhobhar1-300x168.jpg" alt="bhobhar1" width="300" height="168" /></a>एक और उदाहरण देखें हमारे जयपुर के मित्रों का. गजेन्द्र शोत्रिय और रामकुमार सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक राजस्थानी फ़िल्म बनाई है <a href="http://www.imdb.com/title/tt1876259/" target="_blank"><strong>’भोभर’</strong></a>. उनके लिए फ़िल्म बनाना खुद एक ऐसा अभ्यास था जिसकी कहानी फ़िल्म से कम मज़ेदार नहीं. खुद रामकुमार के गांव में फ़िल्म की शूटिंग हुई और मुम्बई फ़िल्म उद्योग से बिना कोई सीधी मदद के (फ़िल्म के कलाकार और तकनीशियन भी ज़्यादातर स्थानीय ही थे) उन्होंने सफ़लतापूर्वक फ़िल्म का निर्माण पूरा किया. उनके आलेख के इस हिस्से को देखकर समझें कि फ़िल्म बनाने का अनुभव आपकी सोच से कितना अलग हो सकता है, “फिल्म का सैट<strong> </strong>गांव में मेरा अपना घर था. उससे लगा खेत था. मम्मी-पापा को इतने मेहमानों की आवभगत को मौका मिला था लिहाजा चूल्हा कभी ठंडा नहीं रहा. रातभर चाय उबलती और दिन में गांव से मटके भरकर छाछ आ जाती. पूरी टीम ने मां से सीधा रिश्ता बनाया और जिसको जिस चीज की जरूरत होती किचन में घुसा पाया जाता. घर में हमारे परिवार के बाकी सब लोग भी टीम की जरूरतों को खास ध्यान रखने लगे और जब देखा कि चौबीसों घंटे सब लोग काम में जुटे हैं, तो गांव वालों ने भी आखिर मान ही लिया कि फिल्म बनाना आसान काम नहीं है.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म बनाने के इस मॉडल की सफ़लता इस तथ्य में छिपी है कि गजेन्द्र और रामकुमार जल्दी ही अपनी अगली फ़िल्म पर काम शुरु करने जा रहे हैं. आज फ़िल्म बनाने की कोशिश अपने आप में उसे बनाने का सही रास्ता ढूंढने में छिपी है. तकनीकी क्रांति ने इसे थोड़ा सरल बनाया है तो उसे दिखाए जाने के गोरखधंधे को थोड़ा उलझाया भी है. लेकिन इस बियाबान में अब भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें इस स्वतंत्र हिन्दुस्तानी सिनेमा के क्षेत्र में एक मॉडल की तरह गिना जा सकता है. अगली बार मेरा ऐसे कुछ और उदाहरणों पर बात करने का इरादा है. संयोग की बात है कि जिस <a href="http://mihirpandya.com/2011/07/videokaaran/" target="_blank"><strong>’वीडियोकारन’</strong></a> फ़िल्म की चर्चा हमने दो महीना पहले की थी, उसके निर्देशक से जल्द ही मेरी मुलाकात होने वाली है. उनकी कहानी भी सुनेंगे. क्योंकि मुझे यकीन है कि जितनी दिलचस्प उनकी फ़िल्म है, उतनी ही दिलचस्प उसके बनने की कहानी होगी.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका<strong> ’कथादेश’ </strong>के सितम्बर अंक में प्रकाशित</p>
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