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Things we lost in the fire

’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ - थियोडोर अडोर्नो. जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने ...

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March 27, 2010

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इस रात की सुबह नहीं

’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए. मैं नर्क में हूँ. यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ...

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March 23, 2010

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ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9′ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?

यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन ...

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March 7, 2010

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बंजारा नमक लाया

प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है. प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं ...

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February 6, 2010

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एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.

यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. 'लगे रहो मुन्नाभाई' के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा ...

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January 13, 2010

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’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप

“प्यारे बार्नस्टीन, तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” --'द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत. एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं ...

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November 21, 2009

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“मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!” ~पीयूष मिश्रा.

पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक 'स्केलेटन वुमन' था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए - साहित्य, राजनीति और ...

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June 3, 2009

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फ़िराक के शहर में सिनेमा का मेला : गोरखपुर फ़िल्म उत्सव

"हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश, हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं." -फ़िराक़ गोरखपुरी. गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ...

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April 12, 2009

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नौकर की कमीज पढ़ते हुए…

विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए... यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने ...

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April 8, 2009

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अँधियारा है, अश्वत्थामा है, संजय है : गुलाल

गान्धारी~ "तो सुनो कृष्ण ! प्रभु हो या परात्पर हो कुछ भी हो सारा तुम्हारा वंश इसी तरह पागल कुत्तों की तरह एक-दूसरे को परस्पर फाड़ खायेगा तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद किसी घने जंगल में साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे प्रभु हो पर मारे जाओगे पशुओं की तरह." कृष्ण-ध्वनि~ "माता ! प्रभु हूँ या परात्पर पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम ...

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March 23, 2009