सिनेमा के सौ बरस
हिन्दी सिनेमा आधुनिक भारत का सबसे प्यारा बच्चा है. उसमें आपको खिलखिलाकर हंसाने की क्षमता है तो गहरे प्यार से निकली एक पल में रुला देने वाली कुव्वत भी. और आनेवाली मई में हम इसके जन्म के सौवें साल में प्रवेश कर जायेंगे. दादासाहेब फ़ालके से दिबाकर बनर्जी तक, कैसा ...
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April 22, 2012
जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर
“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, ...
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March 29, 2012
सिनेमाई संगीत में प्रामाणिकता की तलाश
“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.” पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं ...
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March 12, 2012
अधूरेपन में प्रामाणिकता की तलाश
साल ख़त्म होता है और आप अपने झोले में बेहतर फ़िल्में जुटाने फिर हालिया इतिहास में बह निकलते हैं. लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ होता यह है कि सम्भाले जाने लायक अनुभव तमाम फ़िल्मों में बिखरे मिलते हैं. आप ’स्टेनली का डब्बा’ के पार्थो को सहेजकर रखना चाहते हैं, लेकिन ...
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February 13, 2012
नर्तकियाँ और पृथ्वियाँ
और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा, Pina (3D) Wim ...
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January 9, 2012
2011 : सिनेमा
“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” - फ़राज़ ’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’ फ़िल्म – ’रॉकस्टार’ “पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ ...
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December 31, 2011
एक बुढ़ाता सेल्समैन और हक़ मांगती सत्रह लड़कियाँ
फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने ...
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December 12, 2011
द आर्टिस्ट : ज़िन्दगी का गीत
कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म ’द आर्टिस्ट’ जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस ...
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November 19, 2011
रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था
पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा ...
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November 11, 2011
सभ्यता का मर्दवादी किला
शी मंकीज़ लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011. दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ ...
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November 9, 2011


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