साल सदियों पुराना पक्का घर है
साल, दिखता नहीं पर पक्का घर है हवा में झूलता रहता है तारीखों पर पाँव रख के घड़ी पे घूमता रहता है बारह महीने और छह मौसम हैं आना जाना रहता है एक ही कुर्सी है घर में एक उठता है इक बैठता है जनवरी फ़रवरी बचपन ही से भाई बहन से लगते हैं ठण्ड बहुत लगती है उन को कपड़े गर्म ...
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January 1, 2011
हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’
यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. ***** एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा ...
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June 3, 2010
बंजारा नमक लाया
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है. प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं ...
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February 6, 2010
हरिश्चंद्राची फैक्टरी
यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे? अच्छा ...
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January 30, 2010
कितने आदमी थे! उर्फ़ हिन्दी सिनेमा का अजब-गजब संवाद लेखन
यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. काश वे भी इसे पूरा पढ़ पाते... जब हमारे दोस्त सुशील ने मुझे हिन्दी फ़िल्मों में आए मेरे पसंदीदा संवादों के बारे में लिखने के लिए कहा तो पहले तो मैं खुश हो गया. मैंने उनसे भिड़ते ही कहा.. अरे इसमें कौनसी बड़ी ...
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September 11, 2009
मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर.
यह कहानी उन लड़कों की है जो 'शहर' नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. ...
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August 12, 2008


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