बंजारा नमक लाया
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है. प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं ...
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February 6, 2010
एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.
यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. 'लगे रहो मुन्नाभाई' के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा ...
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January 13, 2010
समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए
"मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत-से लोग भी हैं. हम लोगों में और टोपी में केवल एक अन्तर है. हम लोग कहीं-न-कहीं ...
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October 19, 2009
“मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!” ~पीयूष मिश्रा.
पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक 'स्केलेटन वुमन' था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए - साहित्य, राजनीति और ...
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June 3, 2009
नौकर की कमीज पढ़ते हुए…
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए... यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने ...
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April 8, 2009
बीत चुके हैं अब युग शहरों के
पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में फ़िल्म दर फ़िल्म दिल्ली शहर की संरचना को परखते हुए रिल्के की कविताओं से मुलाकात हुई. साहित्य अकादेमी से प्रकाशित अपने अनुवाद में अनामिका उन्हें ’औरतों की मेज़ का कवि’ कहती हैं. यहाँ दर्ज कविता अब मेरे शोध प्रबंध का हिस्सा है. रिल्के ...
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February 27, 2009
‘आप उसे फोन करें’: बद्री नारायण
बद्री नारायण की कविताएं मेरे जीवन में एक घटना की तरह आती हैं. मैं उन्हें व्यवस्थित रूप से नहीं पढ़ता. वे आती हैं, अनिश्चितता और तनाव के क्षणों में वे एक छोटी सी उदास खुशी की तरह आती हैं. अचानक, जैसे हृषिकेश मुखर्जी की 'बावर्ची' में रघु भैया आते हैं. ...
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October 1, 2008
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं
मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल 'घर' को इतना क्यों याद करता हूँ. 'घर' के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे ...
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September 5, 2008
मोहनदास
विचित्र प्रोसेशन, गंभीर क्विक मार्च ... कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने चमकदार बैंड-दल- अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप,उदर-आकृति आँतों के जालों-से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर गंभीर गीत-स्वन-तरंगें ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर. बैंड के लोगों के चेहरे मिलते हैं मेरे देखे हुओं से, लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार इसी नगर के ! ! बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए ...
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July 18, 2008
कितने शहरों में कितनी बार
फिराक साहब की विनोदप्रियता और मुंहफटपन के कई किस्से अनिता और शशि को जुबानी याद थे. दोनों उनसे मिलने जाती रहती थीं. अनिता ने ही बताया कि एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब और अनिता दोनों बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकानों में रहते ...
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April 14, 2008


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