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ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं

मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल ‘घर’ को इतना क्यों याद करता हूँ. ‘घर’ के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त को दिख जाते हैं. मेरी चिट्ठियाँ राह भटक जाती हैं. लेकिन मुझे भरोसा है कि इस वक्त वो आयेंगे और मुझे संभाल लेंगे. वो जहाँ कहीं भी हैं, सोचेंगे और उनका सोचना ही काफ़ी है. डर हैं, और डर किस मन में नहीं होते लेकिन मैं सपने देखना नहीं छोडूंगा. सपनों में उन्हें देखना नहीं छोडूंगा. एक कुतुबनुमा मेरे पास भी है…

“हम सबका एक ‘घर’ होता है. बहुत प्यारा, संपूर्ण, सुरक्षित और स्वस्तिदायक… फिर हम ‘बड़े’ होते हैं और घर ‘छोटा’ होता जाता है, छूट जाता है. ज़िंदगीभर हम उसी की तलाश में भटकते रहते हैं. कभी सोच में, कभी सपनों में, कभी रचनाओं में, भौतिक उपलब्धियों में, प्रशस्तियों में, विद्रोह और समझौतों में, कभी निष्क्रियाताओं में तो कभी कर्म की दुनिया में… मगर उम्र का, स्थान का, विश्वासों का, मूल्य और मान्यताओं का, भावनाओं और सुरक्षाओं का वह घर हमें कभी नहीं मिलता. लौटकर जाएँ तो भी पीछे छूटा हुआ न तो घर वही रह जाता है, न हम… जो कुछ मिलता है वह ‘अपना घर’ नहीं होता और हम सोचते हैं : कहीं कोई घर होता भी है? इस सच्चाई का सामना करने से भी हम डरते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि सचमुच कोई घर हो ही नहीं और हम एक भ्रम को जीते रहे हों… क्या है यह ‘घर’ का भ्रम जो हमेशा खींचता रहता है? यह भी तो तय करना मुश्किल है कि घर की तलाश आगे की ओर है या पीछे की ओर? यह स्मृति है या स्वप्न? विज़न या नास्टेल्जिया? या फैलकर बेहतर दुनिया के लिए आस्था? कभी भी अधूरी छूट जाने के लिए अभिशप्त एक अंतहीन यात्रा ही क्या हमारी नियति है? उपलब्धियों के नाम पर कुछ पड़ाव, कुछ नखलिस्तान… चंद तसवीरें… अनेक पात्रों के नाम से की जानेवाली कुछ आत्म-स्वीकृतियां.

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या दुनिया की सारी सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ उन्हीं लोगों ने तो नहीं रचीं जो विस्थापित थे और पीछे छूटे घर की याद में निरंतर वर्तमान और भविष्य की रचना करते रहे? हमें ऐसे वर्तमान में फेंक दिया गया है जो लगातार हमें भविष्य में धकेल रहा है ओर हर ‘है’ को अनुक्षण अतीत बना रहा है. इस प्रक्रिया में हम अपने ‘अब’ को सिर्फ़ ‘था’ में बदलते जाने के निमित्तभर नहीं हैं? जो ‘था’ वो कभी नहीं ‘होगा’, मगर हम उसे ही याद करेंगे, यानी उस स्मृति के किसी न किसी अंश को अपना सपना बनाते रहेंगे… वर्तमान और भविष्य चाहे जितने समृद्ध, संपन्न और महान बन जाएँ, मगर हमें हमेशा लगेगा कि जो बात पीछे थी वो आज नहीं है. होगी भी नहीं. शव पर चढ़े या सिंहासन पर, गले में हों या शीश पर, फूल तो हम पीछे छूटे हुए किसी पेड़ के ही हैं. हम आज जहाँ हैं वहाँ के हैं नहीं, बिलोंग कहीं और करते हैं. -कहाँ, यह भी हमें पता नहीं. एक भटका हुआ बच्चा जिसे अपने घर-बार, माँ-बाप किसी का नाम पता मालूम नहीं. मगर रोता उन्हीं के लिए है और हम समझाते हैं कि जहाँ हम उसे ले जा रहे हैं वहीं उसके घर-बार, माँ-बाप सभी हैं. इस झूठ की रचना या पीछे छूटे हुए को वापस दे देने के आश्वासन का नाम ही सभ्यता-संस्कृति नहीं है? तब फ़िर हम क्या ऐसे शाश्वत-शिशु ही हैं जो हर कहीं, हर किसी में अपना घर देखता है. बहुत कुछ बनाता और तोड़ता है और हर समय जानता रहता है कि यह उसका घर नहीं है.

कहते हैं आदमी हर क्षण अपने पीछे छूटे हुए किसी ‘स्वर्ग’ में लौटना चाहता है जहाँ वह सुरक्षित और सुखी था. व्यक्तिगत स्तर पर माँ के गर्भ में लौटने की ललक है. छूटा हुआ असली ‘घर’ तो वही था. मगर वह यह भी जानता है कि वहाँ या किसी भी स्वर्ग में वह कभी नहीं लौटेगा. उसे अपना स्वर्ग ख़ुद बनाना पड़ता है. इकबाल की तरह या स्वर्ग से निष्कासित नहुष की तरह; किसी विश्वामित्र के मंत्रों पर सवार होकर… हमारी उस बैचनी को समझकर न जाने कितने विश्वमित्रों ने हमें ‘घर’ या स्वर्ग देने के आश्वासन दिए हैं, सपने दिखाए हैं और वहाँ जाकर हमने पाया है कि न तो वह हमारा घर है, न वायदे का स्वर्ग. इस विश्वासघात से क्षुब्ध हम स्वयं उस घर और स्वर्ग को तोड़ते हैं. फ़िर से नए सपने के निर्माण के लिए. कितना थका देनेवाला, लेकिन कितना अनिवार्य है यह सिलसिला. हर बार किसी पैगम्बर, किसी गुरु या अवतार के दिए हुए सपनों का हिस्सा बनने की छलना, वहाँ पहुँचकर फ़िर एक नए नरक में पहुँचने का अहसास और फ़िर एक नए अवतार की प्रतीक्षा. फ़िर इस दुष्चक्र में धर्म, राजनीति या विज्ञान, तकनीक के नए-नए सम्प्रदायों को बनाते चले जाना, जो इसमें बाधक हैं उन्हें हटाते या समाप्त करते चले जाना ताकि अपने सपने को साकार किया जा सके. यानि सब मिलाकर हमेशा एक उम्मीद, संक्रमण, और यात्रा में बने रहने की नियति… युग-युग धावित यात्री. किंतु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं… चरैवेति… चरैवेति…”

राजेंद्र यादव. “अभी दिल्ली दूर है” की भूमिका से.

12 Responses to “ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं”

  1. Dear Mihir,

    We are waiting for the stories from your friend in Mumbai.

    Love

    g’raj

  2. munna k says:

    dear mihir
    bahut dino pahle ek kavita kahi padhi thi tum bhi padho
    ‘APNE SHAHAR MEIN HUM APNE GHAR MEIN RAHTE HAIN/DOOSRE SHAHAR MEIN HAMAARA GHAR HAMAARE BHEETAR’
    ye parayapan is shahar ka kabhi kuch adhik hi saalta hai samasya sirf tumhari nahi hai,kal ki baat yaad nahi jab maine kaha tha ki yaar koi bas mere shahar tak bhi chalni chahiye,

  3. आपका स्वागत है.. अब नियमित लिखें. शुभकामनाऐँ.

  4. shobha says:

    बहुत सुंदर लिखा है. स्वागत है आपका.

  5. शुभकामनाएं मित्र. आशा है कलाम तेज़ रखेंगे…क्योंकि आज फिर इसकी जरूरत आन पढी है.

    कुछ और भी है मगर
    कोई देखता नहीं उसे
    देखता है तो कुछ कहता नहीं उसे…

  6. sajeev says:

    नए चिट्टे की बहुत बहुत बधाई, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करते रहें.

    आपका मित्र
    सजीव सारथी
    आवाज़

  7. Tarun says:

    आपका स्वागत है, अब नियमित लिखें, शुभकामनाऐँ.

  8. Tarun says:

    यह भी तो तय करना मुश्किल है कि घर की तलाश आगे की ओर है या पीछे की ओर?

    Waqai me

  9. Varun says:

    Pata hai 2 din pahle hi yeh triveni likhi…..

    शहर का आलम ना पूछो इस मिज़ाज़ में,
    क्या नहीं पीते हैं अब तो एक साँस में.
    घर से निकलते हैं जब घर की तलाश में.

    Aur ab yeh lekh padh ke kuchh aur paratein khul si gayin.

    Shukriya!

  10. बहुत सटीक लिखा है हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है निरंतरता की चाहत है समय नकाल कर मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें

  11. mahima says:

    naya blog bahut sundar h.jitna abhi padh pai hu,aur jitna samajh aaya achha laga.

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