रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था
पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा ...
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November 11, 2011
’राष्ट्रवाद’ का सिनेमाई उत्सवगान
“ यह दीप अकेला स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता पर, इसको भी पंक्ति दे दो ” - अज्ञेय बीते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। ...
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May 9, 2011
Things we lost in the fire
’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ - थियोडोर अडोर्नो. जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने ...
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March 27, 2010
’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप
“प्यारे बार्नस्टीन, तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” --'द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत. एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं ...
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November 21, 2009
“मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!” ~पीयूष मिश्रा.
पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक 'स्केलेटन वुमन' था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए - साहित्य, राजनीति और ...
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June 3, 2009
नौकर की कमीज पढ़ते हुए…
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए... यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने ...
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April 8, 2009
ख़ामोशी के उस पार : विदेश
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ********** दीपा मेहता की ’विदेश’ परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की ...
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April 4, 2009
आधी दुनिया का कच्चा-’चिट्ठा’
तात्कालिक आग्रह पर लिखा गया समसामयिक चर्चा से रचा आलेख. अप्रकाशित रह जाने की वजह से अपने चिट्ठे पर लगा रहा हूँ. महिला दिवस पर कहीं गहरे बनस्थली को याद करते हुए जहाँ आज भी मुझे मेरा पीछे छूटा हुआ माइक्रोकॉस्म दीखता है. ********** "मैं दरवाज़ा थी,मुझे जितना पीटा गया,मैं उतना ही ...
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March 9, 2009
हम बड़े हुए, शहर बदल गए…
तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप ...
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November 5, 2008
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं
मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल 'घर' को इतना क्यों याद करता हूँ. 'घर' के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे ...
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September 5, 2008


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