नर्तकियाँ और पृथ्वियाँ
और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा, Pina (3D) Wim ...
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January 9, 2012
एक बुढ़ाता सेल्समैन और हक़ मांगती सत्रह लड़कियाँ
फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने ...
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December 12, 2011
द आर्टिस्ट : ज़िन्दगी का गीत
कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म ’द आर्टिस्ट’ जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस ...
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November 19, 2011
सभ्यता का मर्दवादी किला
शी मंकीज़ लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011. दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ ...
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November 9, 2011
तारे ज़मीं पर : कान फ़िल्मोत्सव
कान फ़िल्मोत्सव का संक्षिप्त परिचय पत्र दोस्त दुष्यंत के आग्रह पर. आज ही सुबह डेली न्यूज़ के रविवारीय ’हम लोग’ में प्रकाशित हुआ. वैसे तुलनाएं हमेशा ही नाजायज़ कोशिश होती हैं लेकिन फिर भी समझने के लिहाज से कहा जाए तो जैसे ऑस्कर विश्व सिनेमा के ’फ़िल्मफ़ेयर’ हैं वैसे ही कान फ़िल्म ...
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May 23, 2011
चपलताएं और ईमानदारियाँ : द व्हाइट बलून
यह एक छोटी बच्ची की नज़र से देखी गई दुनिया है. ईरानियन निर्देशक ज़फ़र पनाही की ’द व्हाइट बलून’ हमें अच्छाई में यकीन करना सिखाती है. ईरान से आयी इन फ़िल्मों में कोई ’विलेन’ नहीं होता. बस औसत जीवन की उलझनें होती हैं और उनसे निकली विडम्बनाएं. किसी मितकथा सी ...
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April 1, 2011
पहुँचना ’127 आर्स’ तक बारास्ते ’आमिर’ के
यह तुलना जैसे चांद और सूरज की जोड़ी बनाने जैसी है. एक दूसरे का विलोम होते हुए भी जहाँ से हम उन्हें देखते हैं, वे एक-दूसरे के पूरक नज़र आते हैं. दूसरा पहले से जितना दूर है उतना ही बड़ा भी है. पहला जब दूसरे के सामने आ ...
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March 24, 2011
यह परिवार तो जाना-पहचाना है
यह गलती कई बार होती है. पुरुषसत्तात्मकता को कोसते हुए हम कई बार सीधे परिवार के मुखिया पुरुष को कोसने लगते हैं. जैसे उसके बदलते ही सब ठीक हो जाना है. लेकिन गलत उसका पुरुष होना नहीं, गलत वह विचार है जिसे उसका व्यक्तित्व अपने साथ ढोता ...
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March 21, 2011
देवदास का वर्ज़न 2.0
उमर अभी पच्चीस हुई ही है और अपनी संगत में ठीक-ठाक स्मार्ट गिना जाता हूँ. मैं ’द सोशल नेटवर्क’ देखते हुए अपने को कुछ पुराना महसूस करता हूँ. मेरा छोटा भाई, जिसमें और मुझमें उमर के दो साल और शायद उतनी ही पीढ़ियों का फ़ासला है, जब भी पलटकर ...
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March 20, 2011
मेरी शुभकामनाएं ’ब्लैक स्वॉन’ के साथ हैं, उम्मीदें भी.
एक और सोमवार सुबह का जागना, एक और ऑस्कर की रात का इंतज़ार. उस सितारों भरी रात से पहले उन फ़िल्मों की बातें जिनका नाम उस जगमगाती रात बार-बार आपकी ज़बान पर आना है. पेश हैं इस साल ऑस्कर की सरताज पाँच ख़ास फ़िल्में मेरी नज़र से. 1. दि किंग्स स्पीच इस ...
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February 28, 2011


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