समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए
"मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत-से लोग भी हैं. हम लोगों में और टोपी में केवल एक अन्तर है. हम लोग कहीं-न-कहीं ...
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October 19, 2009
नौकर की कमीज पढ़ते हुए…
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए... यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने ...
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April 8, 2009


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