साल सदियों पुराना पक्का घर है
साल, दिखता नहीं पर पक्का घर है हवा में झूलता रहता है तारीखों पर पाँव रख के घड़ी पे घूमता रहता है बारह महीने और छह मौसम हैं आना जाना रहता है एक ही कुर्सी है घर में एक उठता है इक बैठता है जनवरी फ़रवरी बचपन ही से भाई बहन से लगते हैं ठण्ड बहुत लगती है उन को कपड़े गर्म ...
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January 1, 2011
राँझा राँझा
प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए... बड़ा मज़ेदार किस्सा है... शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट भी जैसे स्त्री रूपा है. रेखा अपनी आवाज़ ...
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June 17, 2010
ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी
ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता ...
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November 13, 2009


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