सिनेमा का नमक

phalke at work

बीते महीने हमारा सिनेमा अपने सौंवे साल में प्रवेश कर गया। यह मौका उत्सव का है। किसी भी विधा के इतना जल्दी, जीवन में इतना गहरे समाहित हो जाने के उदाहरण विरले ही मिलते हैं। सिनेमा हमारे ’लोक’ का हिस्सा बना और इसीलिए उसमें सदा आम आदमी को अपना अक्स नज़र आता रहा। कथाएं चाहे अन्त में समझौते की बातें करती रही हों, और व्यवस्था के हित वाले नतीजे सुनाती रही हों, उन कथाओं में मज़लूम के विद्रोह को आवाज़ मिलती रही। लेकिन इस उत्सवधर्मी माहौल में हमें उस नमक को नहीं भूलना चाहिए जिसे इस सिनेमा के अंधेरे विस्तारों में रहकर इसके सर्जकों ने बहाया। के आसिफ़ जैसे निर्देशक जिनका सपना उनकी ज़िन्दगी बन गया और उस एक चहेते सपने का साथ उन्होंने नाउम्मीदी के अकेले रास्तों में भी नहीं छोड़ा। शंकर शैलेन्द्र जैसे निर्माता जिन्होंने अपने प्यारे सपने को खुद तिनका-तिनका जिया और उसके असमय टूटने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

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द आर्टिस्ट : ज़िन्दगी का गीत

The Artist movie posterकई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म ’द आर्टिस्ट’ जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस सौ बीस के दशक की किसी फ़िल्म की तरह. प्रामाणिकता का आग्रह ऐसा कि फ़िल्म उन्हीं संवादपट्टों द्वारा बात करती है जिन्हें आप चार्ली चैप्लिन की फ़िल्मों में देखते थे. वो सिर्फ़ एक वाकया है जहां फ़िल्म में ध्वनि आपको सुनाई देती है, और मैं वादा करता हूँ कि वो क्षण आपको सालों याद रहने वाला है. किसी कविता की हद को छूता यह प्रसंग एक ख़त्म होते हुए दौर को आपके नंगा कर रख देता है और अचानक यह समझ आता है कि उस बीते कल की तमाम खूबियां, खूबसूरती और मासूमियत उस दौर के साथ ही चली गई हैं और अब कभी वापिस नहीं आयेंगी.

’द आर्टिस्ट’ का चमत्कार शायद उसकी कहानी में नहीं. यह मूक फ़िल्मों के दौर के एक ऐसे महानायक की कहानी है जिसे सवाक फ़िल्मों का नया दौर अचानक अप्रासंगिक बना देता है. साथ ही यह एक ऐसी प्रेम कहानी भी है जिसे सिनेमा में कई बार दोहराया गया है. लेकिन ’द आर्टिस्ट’ दरअसल हमें उस मासूमियत की याद दिलाती है जिसे हम मूक फ़िल्मों की तरह अपने विगत में कहीं भूल आए हैं. यह सिनेमा से प्रेम की कहानी है. ’सनसेट बुलिवार्ड’ का फ़ीलगुड वर्ज़न जिसे देखकर आपका मन चार्ली चैप्लिन की वो तमाम फ़िल्में फिर से देखने का करता है जिन्हें आपने ख़रीदने के बाद अपनी दराज़ के किसी निचले ख़ाने में धीरे से सरका दिया था.

और यह संयोग नहीं है कि ’द आर्टिस्ट’ देखते हुए चार्ली याद आते हैं. याद कीजिए उनकी आत्मकथा में आया ’सिटी लाइट्स’ वाला प्रसंग,

“किसी भी अच्छी मूक फ़िल्म में विश्वव्यापी अपील होती थी जो बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता को एक जैसे पसन्द आती थीं. अब ये सब खो जाने वाला था. लेकिन मैं इस बात पर अड़ा हुआ था कि मैं मूक फ़िल्में ही बनाता रहूंगा क्योंकि मेरा ये मानना था कि सभी तरह के मनोरंजन के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. इसके अलावा, मैं मूक अभिनेता, पेंटोमाइमिस्ट था और उस माध्यम में मैं विरल था और अगर इसे मेरी खुद की तारीफ़ न माना जाये तो मैं इस कला में सर्वश्रेष्ठ था. इसलिए मैंने एक और मूक फ़िल्म द सिटी लाइट्स के लिए काम करना शुरु कर दिया.”

लेकिन चार्ली चैप्लिन को ’सिटी लाइट्स’ बनाने के दौरान सवाक फ़िल्मों की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा. उनकी आत्मकथा में उस दौरान हुए कई मज़ेदार अनुभवों की चर्चा है. सवाक फ़िल्में उस दौर का चढ़ता हुआ सूरज थीं और चार्ली धारा के विपरीत तैरने की कोशिश कर रहे थे. फ़िल्म के पहले प्रिव्यू शो को याद करते हुए चार्ली उसके लिए ’भयानक’ जैसा शब्द काम में लेते हैं. वे लिखते भी हैं कि वजह फ़िल्म खराब होना नहीं बल्कि देखनेवालों का ओरियंटेशन बदल जाना है. अब वे सिनेमा के परदे पर ड्रामा देखने आते हैं और मूक कॉमेडी उन्हें असहज कर देती है.


’द आर्टिस्ट’ में ऐसी तमाम रेखाएं हैं जो लौटकर आती हैं और अपना घेरा पूरा करती हैं. फ़िल्म के बीच में कहीं अचानक आपको उसका पहला दृश्य याद आता है और आप उसमें छिपे उस अद्भुत प्रतीक को समझ मन ही मन खिलखिलाते हैं. मूक फ़िल्मों का नायक हमेशा सीढ़ियां उतरता हुआ दिखाई देता है और सवाक फ़िल्मों की सितारा नायिका हमेशा सीढ़ियां चढ़ती हुई. और साथ में मौजूद कुत्ता अपनी सिर्फ़ एक अदा से आपको सितारों के अभिनय की तमाम ऊँचाइयाँ भुला देता है. ’द आर्टिस्ट’ ज़िन्दगी से प्यार की कहानी है और यहां आकर सिनेमा और ज़िन्दगी में फर्क बहुत कम रह जाता है.

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साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश‘ के नवम्बर अंक में आया.

तारे ज़मीं पर : कान फ़िल्मोत्सव

कान फ़िल्मोत्सव का संक्षिप्त परिचय पत्र दोस्त दुष्यंत के आग्रह पर.
आज ही  सुबह डेली न्यूज़ के रविवारीय ’हम लोग’ में प्रकाशित हुआ.

Midnight_in_Parisवैसे तुलनाएं हमेशा ही नाजायज़ कोशिश होती हैं लेकिन फिर भी समझने के लिहाज से कहा जाए तो जैसे ऑस्कर विश्व सिनेमा के ’फ़िल्मफ़ेयर’ हैं वैसे ही कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल की जीत ’राष्ट्रीय पुरस्कार’ जैसे किसी सम्मान सरीख़ी है. ऑस्कर जहाँ मूलत: अमेरिकन पुरस्कार हैं और उनमें ज़्यादा बोलबाला हमेशा हॉलीवुड की फ़िल्मों का ही होता है, कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल हमारे सामने विश्व सिनेमा की विविधरंगी और कुछ ज़्यादा लोकतांत्रिक तस्वीर प्रस्तुत करता है. लेकिन कान फ़िल्मोत्सव का अर्थ सिर्फ़ इतना भर नहीं. यह सारे संसार की बहु-भाषा भाषी सिनेमाई दुनिया को एक मंच पर इकठ्ठा करता एक ऐसा बहुरंगी मेला है जिसका जोड़ कायनात में कहीं और मिलना मुश्किल है. फ्रांस के दक्षिणी किनारे पर बसे छोटे से शहर कान को हर साल मई के महीने में होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह ने विश्व पटल पर अविस्मरणीय पहचान दिलवाई है. द्वितीय विश्व युद्ध के ख़ात्मे के साथ ही साल 1946 में इस सालाना समारोह की शुरुआत हुई थी और धीरे-धीरे इसने न केवल यूरोपीय सिनेमा जगत में बल्कि विश्व सिनेमा परिदृश्य पर अपनी अमिट जगह बनाई.

इस साल भी भूमध्यसागर किनारे सिनेमा का यह मेला अपनी पूरी रंगत बिखेरता चल रहा है. इस वर्ष मुख्य स्पर्धा के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष रॉबर्ट डि नीरो हैं. प्रेम कहानियों के मास्टर वुडी एलन की ’मिडनाइट इन पेरिस’ से शुरु हुए इस सालाना जलसे में स्पेनिश पैद्रो अल्मोदोवार की ’द स्किन आई लिव इन’, लार्स वॉन ट्रायर की ’मैलेंकॉलिया’ तथा सीन पेन और ब्रैड पिट जैसे अभिनेताओं से सजी अमेरिकन फ़िल्म ’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ मुख्य स्पर्धा वर्ग में शामिल हैं. इनके अलावा कोरिया के जाने माने निर्देशक किम-की-डुक और अमेरिकन गस वान सांत की नई फ़िल्में Un Certain regard खंड में दिखाई जायेंगी. कान फ़िल्मोत्सव इस बार विशेष पहल के तहत उन दो ईरानियन फ़िल्मकारों को सम्मानित कर रहा है जिन्हें ईरान की सरकार ने एक तानाशाही फ़रमान सुनाकर कैद में डाल रखा है. इसी सम्मान के तहत जफ़र पनाही और मोहम्मद रसूलोव की फ़िल्में ’गुडबाय’ और ’दिस इज़ नॉट ए फ़िल्म’ महोत्सव में दिखाई जायेंगी. यह एक गैर लोकतांत्रिक सत्ता के विपक्ष को रचता कलात्मक प्रतिरोध है. यह याद दिलाता है 2004 की उस शाम की जब क्वेन्टिन टेरेन्टीनो की अध्यक्षता वाली निर्णायक समिति ने माइकल मूर की ’फ़ेरेनहाइट 9/11’ को समारोह की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुनकर तत्कालीन अमानवीय अमेरिकन सत्ता और उनके उदंड सिपहसालार को प्रतिरोध का रचनात्मक काला झंडा दिखाया था.

वैसे इस बार का समारोह एक बड़े विवाद के भी नाम रहा जब ’मैलेंकॉलिया’ के निर्देशक लार्स वॉन ट्रायर की हिटलर को लेकर कही गई कुछ विवादित टिप्पणियों ने उन्हें समारोह से निष्कासित करवा दिया. यह कान में अपनी तरह का पहला मामला है. हालांकि आयोजकों द्वारा कहा गया कि उनकी फ़िल्म मुख्य स्पर्धा में बनी रहेगी.

हिन्दुस्तानी सिनेमा विश्व पटल पर अब भी अपनी सही जगह और पहचान की तलाश में है, और कान फ़िल्मोत्सव भी इसका अपवाद नहीं है. लेकिन मज़ेदार बात यह जानना है कि कान फ़िल्मोत्सव के पहले ही साल भारतीय सिनेमा ने वहाँ अपनी धमक सुनवाई थी. ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी और चेतन आनंद द्वारा निर्देशित ’नीचा नगर’ को उन्नीस सौ छियालीस में हुए कान फ़िल्मोत्सव में ’ग्रैंड प्रिक्स’ पुरस्कार से नवाजा गया था. आगे भी सत्यजित राय और एम. एस. सथ्यू जैसे निर्देशकों ने सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म सम्मान के लिए नामांकन पाया, लेकिन ’पाल्म डे’ओर’ (Palme d’Or) या कहें गोल्डन पाल्म भारतीय निर्देशकों से कुछ दूरी पर ही रहा. वैसे कान के गोल्डन पाल्म का इतिहास सिनेमा के पुराने धुरंधरों फ़ेलिनी, कुरोसावा और कोपोला से लेकर आधुनिक सिनेमाई उस्तादों सोडरबर्ग, लार्स वॉन ट्रायर और माइकल हनेके के नामों से जगमगाता रहा है.

Piraviउन्नीस सौ अठत्तर में कान फ़िल्मोत्सव में एक नया वर्ग Un Certain regard नाम से शुरु किया गया. यह विश्व सिनेमा में हो रहे नए और चुनौतीपूर्ण काम को उत्सव के पटल पर रेखांकित करने का प्रयास था. इस वर्ग में हिन्दुस्तानी सिनेमा ने लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है. मणि कौल की फ़िल्म ’सतह से उठता आदमी’, मृणाल सेन की ’खंडहर’, शाजी करुण की ’पीरावी’ और ’वानप्रस्थम’, गौतम घोष की ’गुड़िया’ तथा पिछले साल आई विक्रमादित्य मोटवाने की ’उड़ान’ जैसी कई फ़िल्मों ने इस खंड में स्थान पाया.

कान जैसे उत्सवों में हिन्दुस्तानी सिनेमा अपनी ठोस पहचान क्यों नहीं बना पाता? अडूर गोपालकृष्णन (जिनकी फ़िल्म ’इलिप्पाथायम’ 1982 के कान फ़िल्मोत्सव के लिए चुनी गई थी) इस कथन को आलोचनात्मक नज़र से देखते हैं. उनका कहना है, “कान जैसे फ़िल्मोत्सव का सिनेमाई नज़रिया बड़ा यूरोपीय-अमेरिकी झुकाव वाला होता है जो हमारे सिनेमा से काफ़ी अलग है. न तो हम जापान जैसे ’सुदूर-पूर्व’ वाले देश हैं और न ही पश्चिम. हम कहीं बीच में अटके हैं उनकी नज़र में. हमारी संस्कृति की सही समझ पश्चिम में अब भी काफ़ी कम है. और सिनेमा की तारीफ़ तो उस देश की संस्कृति और लोगों के बारे में समझ से ही निकलती है.”

अनुराग कश्यप का कहना है कि विश्व सिनेमा पटल पर हिन्दी सिनेमा की ऐसी छवि बनी हुई है जैसे वो कोई मसखरा हो. लेकिन सच में ऐसा है नहीं. और अब हिन्दी सिनेमा भी केवल ’नाच-गाने’ वाला सिनेमा नहीं रहा. वैसे इस छवि को पोषित करने में कुछ गलती हमारी भी है. जैसे इस साल कान में दिखाई गई शेखर कपूर द्वारा बनाई फ़िल्म “बॉलीवुड : ग्रेटेस्ट लव स्टोरी एवर टोल्ड” हिन्दी सिनेमा की कुछ ऐसी ही स्टीरियोटाइप छवि प्रस्तुत करती है और इस वजह से उसे काफ़ी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है.