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ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9′ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?

यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन ...

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March 7, 2010

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परदे पर प्यार के यादगार लम्हें

हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा ...

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February 15, 2010

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हरिश्चंद्राची फैक्टरी

यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे? अच्छा ...

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January 30, 2010

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देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा

महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. ...

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January 20, 2010

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एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.

यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. 'लगे रहो मुन्नाभाई' के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा ...

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January 13, 2010

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’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप

“प्यारे बार्नस्टीन, तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” --'द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत. एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं ...

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November 21, 2009

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ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी

ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता ...

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November 13, 2009

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भोलेपन के बियाबान में भटके: अजब प्रेम की गजब कहानी

स्याह व्यंग्य वाली समझदार फ़िल्मों के दौर में (पढ़ें ’डार्क कॉमेडी’ जैसे 'संकट सिटी', 'ओये लक्की लक्की ओये') ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ एक पुराने ज़माने की भोली और भली कॉमेडी है. इतनी भली कि कई बार आपको उसका नायक मंदबुद्धि लगने लगता है. माना रणवीर कपूर में एक चार्म ...

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November 10, 2009

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“शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार कहा जा सकता है.” -गुलज़ार.

इस बार के ओशियंस में प्रस्तुत गुलज़ार साहब का पर्चा “हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन (1930-1960)” बहुत ही डीटेल्ड था और उसमें तीस और चालीस के दशक में सिनेमा के गीतों से जुड़े एक-एक व्यक्ति का उल्लेख था. वे बार-बार गीतों की पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में पेश करते थे ...

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October 29, 2009

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इसे कहते हैं धमाकेदार शुरुआत!

इस बार के ओशियंस में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित हुए गुलज़ार साहब समारोह के डायरेक्टर जनरल मणि कौल के हाथों तैयार किया प्रशस्ति पत्र ग्रहण कर बैठने को हुए ही थे कि अचानक मंच संचालक रमन पीछे से बोले, “गुलज़ार साहब, हमने आपके लिए कुछ सरप्राइज़ रखा है!” ...

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October 25, 2009