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2011 : सिनेमा

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” - फ़राज़ ’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’ फ़िल्म – ’रॉकस्टार’ “पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ ...

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December 31, 2011

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उमेश विनायक कुलकर्णी की ’देऊल’

उमेश विनायक कुलकर्णी हमारे दौर के सबसे उम्मीदों से भरे निर्देशक का नाम है. मेरे लिए वह गिरीश कासरवल्ली की परम्परा में आते हैं जिन्होंने व्यंग्य को ठोस मूल्यों की धरती पर खड़े होकर परखा है और इस मायने में वे हमारे पारम्परिक रूप से बनने वाले क्षेत्रीय सिनेमा में ...

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November 9, 2011

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Pina

"रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!" – ’देवदारु’ से. जब Pina Bausch के नर्तकों ...

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October 19, 2011

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अराजकता के आकाश में उड़ता सिनेमा का जनतंत्र – 2

हम रीगल के बाहर खड़े थे. भीतर से ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ का आदमकद पोस्टर झांक रहा था. हाँ, एक और डीएसएलआर कैमरे पर बनी फ़िल्म सिनेमाघरों में आने वाली थी. बम्बई की बरसात सुबह से इस बे-छतरी दिल्लीवाले से लुका-छिपी खेल रही थी. तय हुआ लिओपोल्ड चलेंगे. पहुंचने ...

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October 8, 2011

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अराजकता में जनतन्त्र

“वे उन दिनों को याद करते हैं जब उनके पास एक जोड़ा जींस खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे और मज़ाक में वे घर आए मेहमानों से घर में घुसने का दाम लिया करते थे. रिज़वी बताती हैं कि दरअसल वो इस फ़िल्म के द्वारा कहीं पहुँचना नहीं चाहते ...

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September 18, 2011

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वीडियोवाला

“हमारी फ़िल्में यहाँ आएंगी. जब भी हम अच्छी फ़िल्में बनायेंगे, वो आएंगी. ऐसा नहीं है कि हमारे मुल्क में अच्छे फ़िल्मकार नहीं हैं. असली वजह है निर्माताओं का न होना. मान लीजिए मैं कोई फ़िल्म बनाना चाहता हूँ. लेकिन योजना बनते ही बहुत सारी चिंताएं उसके साथ पीछे-पीछे चली ...

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July 11, 2011

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डेल्ही बेली

जिस तुलना से मैं अपनी बात शुरु करने जा रहा हूँ, इसके बाद कुछ दोस्त मुझे सूली पर चढ़ाने की भी तमन्ना रखें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. फिर भी, पहले भी ऐसा करता रहा हूँ. फिर सही एक बार... सत्यजित राय की ’चारुलता’ के उस प्रसंग को हिन्दुस्तानी सिनेमा के ...

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July 5, 2011

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सिकंदर का मुकद्दर

दृश्य एक :- फ़िल्म – धोबी घाट (2011) निर्देशक – किरण राव हरे रंग की टीशर्ट पहने अकेला खड़ा मुन्ना शाय की उस लम्बी सी गाड़ी को अपने से दूर जाते देख रहा है. असमंजस में है शायद. ’क्लास’ की दूरियाँ इतनी ज़्यादा हैं मुन्ना की नज़र में कि वह कभी वो कह ...

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June 10, 2011

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बड़े नसीबों का शहर है ये, जो इसकी किस्मतों में हम हैं लिखे

“यह शहर सिर्फ़ एक बहाना भर है आपके अच्छे या बुरे होने का. ज़्यादातर मामलों में बुरे होने का.” लुटेरों की गोली खाकर घायल पड़ा साठ साला बैंक का वॉचमैन हमारे नायक सावन द्वारा पूछे जाने पर कि “हॉस्पिटल फ़ोन करूँ?”, डूबती हुई आवाज़ में जवाब देता है, “पहले ये पैसे ...

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May 5, 2011

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अभिनेता के अवसान का साल

पिछला साल खत्म हुआ था ’थ्री ईडियट्स’ के साथ, जिसे इस साल भी लगातार हिन्दी सिनेमा की सबसे ’कमाऊ पूत’ के रूप में याद किया जाता रहा. इस साल आई ’दबंग’ से लेकर ’राजनीति’ तक हर बड़ी हिट की तुलना ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के आंकड़ों से की जाती रही. ...

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January 5, 2011