फ़िराक के शहर में सिनेमा का मेला : गोरखपुर फ़िल्म उत्सव
"हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश, हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं." -फ़िराक़ गोरखपुरी. गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ...
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April 12, 2009
हम बड़े हुए, शहर बदल गए…
तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप ...
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November 5, 2008
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं
मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल 'घर' को इतना क्यों याद करता हूँ. 'घर' के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे ...
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September 5, 2008
मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर.
यह कहानी उन लड़कों की है जो 'शहर' नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. ...
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August 12, 2008
विम्बलडन में बजता संगीत
टेनिस का महानतम मैच देखा अभी. और उगते सूरज को सलाम किया. फ़िर उगते सूरज से सुना कि बादशाह अभी भी फेडरर ही है. हारने के बावजूद मुझे उसके वो शॉट्स हमेशा याद रहेंगे जो उसने चैम्पियनशिप पॉइंट बचाने के लिए खेले थे. कुछ अदभुत ही था... मैच में रह ...
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July 8, 2008
सचिन नामक मिथक की खोज उर्फ़ सुनहरे गरुड़ की तलाश में.
सचिन हमारी आदत में शुमार हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक मिथक हैं? हमारे तमाम भगवान मिथकों की ही पैदाइश हैं. क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारे भगवान. यह सराय में शाम की चाय का वक्त है. रविकांत और संजय बताते हैं कि वे चौबीस तारीख़ ...
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May 30, 2008
जब वी मेट : ‘किस्सा-ऐ-कसप’
आज फ़िल्मफेयर देखते हुए लगा कि यह पुरानी पोस्ट (13 नवम्बर) जो मैंने अपने ब्लॉग कबाड़ में डाल दी थी पोस्ट कर दी जानी चाहिए. आख़िर 'गीत' को एक के बाद एक पुरस्कार मिल रहे हैं! अब तो यह मुझ अकेले की तमन्ना का बयान नहीं. इससे identify करने वाले ...
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March 2, 2008
अच्छर मन को छरै बहुरि अच्छर ही भावै
रवीश ने अपने ब्लॉग पर यह चर्चा शुरू की है कि किसने पुस्तक मेले से क्या खरीदा यह शेयर किया जाए. तो मुझे लगा कि 'सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए' की परम्परा पर चलते हुए मुझे भी यह 'पुण्य कर्म' कर ही देना चाहिए! मेरे लिए यह ...
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February 19, 2008
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी
मीडियानगर 03 पर बातचीत फ़रवरी की शाम छ: बजे, ऑक्सफ़र्ड बुक स्टोर, कनॉट प्लेस, दिल्ली. फिज़ाओं में क्या था:- वक्ताओं के पीछे एक नारंगी रंग की दीवार थी जिसपर बहुत सारे शब्द बिखरे हुए थे. ये मुझे 'तारे ज़मीन पर' के शुरूआती दृश्य की याद दिला रहा था जिसमें हमारा कुल-ज़मा लिखा पढ़ा ...
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February 1, 2008
प्रेम के पक्ष में…
साल 1986. राजीव गाँधी ने ये दाँव खेला था. मुस्लिम कट्टरपंथियों को फायदा पहुँचाने के लिये शाहबानो केस में फैसला पलटा गया और हिंदु कट्टरपंथियों को अयोध्या में ताला खोल चुप कराया गया. कुछ दोस्त शाहबानो केस को मुस्लिम तुष्टीकरण कहते हैं और ये भूल जाते हैं कि आधी मुस्लिम ...
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November 24, 2007


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