भोलेपन के बियाबान में भटके: अजब प्रेम की गजब कहानी
स्याह व्यंग्य वाली समझदार फ़िल्मों के दौर में (पढ़ें ’डार्क कॉमेडी’ जैसे 'संकट सिटी', 'ओये लक्की लक्की ओये') ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ एक पुराने ज़माने की भोली और भली कॉमेडी है. इतनी भली कि कई बार आपको उसका नायक मंदबुद्धि लगने लगता है. माना रणवीर कपूर में एक चार्म ...
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November 10, 2009
बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने
उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले ...
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August 21, 2009
ख़ामोशी के उस पार : विदेश
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ********** दीपा मेहता की ’विदेश’ परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की ...
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April 4, 2009
सिद्धार्थ- द प्रिजनर : महानगरीय सांचे में ढली नीतिकथा
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ***** बचपन में पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियाँ सुनकर बड़ी हुई हिन्दुस्तान की जनता के लिए ’सिद्दार्थ, द प्रिज़नर’ की कहानी अपरिचित नहीं है. सोने का अंडा देने वाली मुर्गी और व्यापारी की कहानी के ज़रिये ’लालच बुरी बला है’ का ...
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March 4, 2009
बिल्लू: अब फिर से राज कपूर नहीं
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ***** बहुत दिन हुए देखता हूँ कि हमारे मनमोहन सिंह जी की सरकार अपना हर काम किसी ’आम आदमी’ के लिए करती है. मैं देखता कि जब विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुजरात से कर्नाटक तक अल्पसंख्यकों को छांट-छांट ...
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February 18, 2009
लक बाय चांस: उड़ती तितली को पकड़ने की कोशिश
मूलत: तहलका हिन्दी के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित * * * * * * * * * * * * * "यह बॉलीवुड का असल चेहरा है. ’लक बाय चांस’ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए वही है जो ’सत्या’ मुम्बई अन्डरवर्ल्ड के लिए थी." - ’पैशन फ़ॉर सिनेमा’ ...
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February 9, 2009
सल्मडॉग मिलेनियर: बॉलीवुड मसाले का फ़िरंगी तड़का. बोले तो ’जय हो!’
स्ल्मडॉग मिलिनेयर देखते हुए मुझे दो उपन्यास बार-बार याद आते रहे. एक सुकेतु मेहता का गल्पेतर गल्प ’मैक्सिमम सिटी: बाँबे लॉस्ट एंड फ़ाउन्ड’ और दूसरा ग्रेगरी डेविड रॉबर्टस का बेस्टसेलर ’शान्ताराम’. हाल-फ़िलहाल इस बहस में ना पड़ते हुए कि स्लमडॉग क्या भारत की वैसी ही औपनिवेशिक व्याख्या है जैसी अंग्रेज़ ...
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January 19, 2009
सारे शहर की जगमग के भीतर है अँधेरा
बहुत दिनों बाद थियेटर में अकेले कोई फ़िल्म देखी. बहुत दिनों बाद थियेटर में रोया. बहुत दिनों बाद यूँ अकेले घूमने का मन हुआ. बहुत दिनों बाद लगा कि जिन्हें प्यार करता हूँ उन्हें जाकर यह कह दूँ कि मैं उनके बिना नहीं रह पाता. माँ की बहुत याद आयी. ...
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November 20, 2008
यहाँ से शहर को देखो : हल्ला
"शहरों को फूको के शब्दों में 'दौर-ए-हमवक्ती' (इपॉक ऑफ़ सायमाल्टेनिटी) कहा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग कालखंड एकसाथ विद्यमान होते हैं. शहर, ख़ासतौर पर उत्तर-औपनिवेशिक शहर, अपनी ज़द में विभिन्न गतियों और लयों को समेटे रखता है और इससे विरोध और प्रतिस्पर्धा का निहायत गतिशील माहौल पैदा होता है." -आदित्य निगम. किसी ...
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September 21, 2008
सरकार राज: आग से तो बेहतर है!
" Idea! लेकिन अभी पूरी तरह आया नहीं है." सरकार राज में उपस्थित कैरीकैचर खलनायकों की पूरी जमात में से एक गोविन्द नामदेव (जिनकी मूँछें इतनी अजीब हैं कि आप उन्हें कम और उनकी मूंछों को ज़्यादा देखते हैं. पेंसिल से बनाई हैं क्या!) का यह संवाद ही सरकार राज ...
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June 15, 2008


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