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अपने अपने रिचर्ड पारकर

कुछ महीने पहले ‘चकमक’ के दोस्तों के लिए यह परिचय लिखा था ‘Life Of Pi’ किताब/ फिल्म का. साथ ही किताब से मेरा पसन्दीदा अंश, यात्रा बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब के हिन्दी अनुवाद ‘पाई पटेल की अजब दास्तान’ से साभार यहाँ.

पिछले दिनों जब लंदन से लौटी हमारी दोस्त हमारे लिए मशहूर जासूस शरलॉक होम्स के बहुचर्चित घर ’221-बी, बेकर स्ट्रीट’ वाले म्यूज़ियम से उनकी यादगार सोवेनियर लाईं, तो इसमें पहली नज़र में कुछ भी अजीब नहीं था। शरलॉक होम्स की कहानियाँ पढ़ते तो हम बड़े हुए हैं अौर उनके देस से उनकी याद साथ लाना एक मान्य चलन है। ख़ास तरह की माचिस की डिब्बी, जैसी शरलॉक इस्तेमाल करते थे। विशेष तौर पर तैयार करवाया गया चमड़े का बुकमार्क, जिसपर शरलॉक की एक मशहूर उक्ति लिखी है, “Life is infinitely stranger than the mind of man could invent”. अब इसमें मज़ेदार बात जो है वो यही है कि कहानी के मुकाबले असल ज़िन्दगी की विचित्रता को कहीं बढ़कर मानने वाला यह दुनिया का सबसे मशहूर जासूस खुद सिर्फ एक कहानी है। कथा लेखक ‘सर अॉर्थर कॉनन डायल’ के दिमाग़ की उपज। न तो इतिहास में कोई ऐसा अादमी हुअा अौर न लंदन में ’221-बी, बेकर स्ट्रीट’ जैसा कोई पता मौजूद है। लेकिन कॉनन डायल का सौ साल पहले लिखा गया यह जासूसी पात्र अपने पाठकों की स्मृति में ऐसा बसा कि उसकी लोकप्रियता जीवित इंसानों को भी पार कर गई। अाज शरलॉक होम्स के मूल रचयिता की मौत को भी सालों बीत चुके हैं, लेकिन शरलॉक की कहानियाँ सिनेमा में, टीवी पर, कॉमिक्स के पन्नों पर अनगिनत बार लौट-लौटकर अाती रहती हैं।  उनके घर का पता बाकायदा अाज के इंग्लैंड में मौजूद है उनके म्यूज़ियम के रूप में।

Life Of Pi येन मारटेल के उपन्यास ‘लाइफ अॉफ़ पाई’ पर मेरे पसन्दीदा निर्देशक एंग ली द्वारा बनाई फ़िल्म को देखते हुए इस किस्से की याद अाना स्वाभाविक था। कथाओं के असल ज़िन्दगी की सच्चाइयों से बड़े हो जाने की बहुत सी वजहें हो सकती हैं। एक वजह ऊपर हमने शरलॉक होम्स की लोकप्रियता में देखी। ऐसी ही एक वजह हमारे कथा नायक ‘पिसीन मॉलिटार’ उर्फ पाई के पास भी है। लेकिन वो वजह जानने से पहले पाई की कथा – पिसीन दक्षिण भारत के पौंडिचेरी में बड़ा हुअा बच्चा है। उसके नाम की भी अजब कहानी है। तैराकी के शौकीन उसके एक अंकल नें उसका नाम यूरोप के सबसे शानदार स्विमिंग पूल पर रख दिया था। लेकिन जब बचपन में स्कूल में उसका मज़ाक उड़ाया जाता था तो पिसीन ने खुद ही एक दिन अपना नाम छोटा कर ‘पाई’ घोषित कर दिया। उसके पिता पौंडिचेरी में एक चिड़ियाघर चलाते हैं। अौर उनके चिड़ियाघर का सबसे शानदार, अौर साथ ही सबसे खतरनाक जानवर है ‘रिचर्ड पारकर’ – एक रॉयल बंगाल टाइगर। परिस्थितियाँ कुछ यूं बनती हैं कि पूरे परिवार को (पाई, उसका भाई, उनकी माँ अौर पिता) समूचे चिड़ियाघर के जानवरों के साथ सात समन्दर पार कनाडा की यात्रा पर निकलना पड़ता है। किस्मत देखिये कि समन्दर के ऐन बीचोंबीच उनका जहाज़ डूबता है अौर बदहवास अपनी माँ को अावाज़ लगाते पाई को एक लाइफ बोट पर फैंक दिया जाता है।

यहीं से असली कहानी जैसे शुरु होती है।  होश अाता है तो पता चलता है कि इस नाव पर वो अकेला नहीं। एक घायल ज़ेबरा, एक मादा अौरांगउटान अौर एक लकड़बग्घा भी हैं जो अापस में एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। लकड़बग्घा पहले घायल ज़ेबरा को मार देता है, फिर मादा अौरांगउटान को। अगला निशाना खौफ़ खाया पाई हो सकता था, लेकिन तभी नाव की पाल के पीछे छुपा रिचर्ड पारकर बाहर अाता है अौर उस लकड़बग्घे का काम-तमाम कर देता है। अब उस छोटी सी नाव पर दो ही जीव हैं, एक सोलह साल का लड़का पाई अौर दूसरा एक रॉयल बंगाल टाइगर ‘रिचर्ड पारकर’। अागे की कथा इन्हीं दो नितांत विपरीत प्राणियों के उस छोटी सी नाव पर साथ बिताये दो सौ सत्ताईस दिन की कथा है, जिसमें डर, निराशा, बेचैनी, उकताहट, उम्मीद, संघर्ष, जीजिविषा, दोस्ती सब गहरे घुले-मिले हैं। कैसे रिचर्ड पारकर हमारे कथानायक पाई का दुश्मन से दोस्त बनता है। कैसे साथ किसी अंधेरी मौत की सुरंग में जाते दोनों प्राणी एक-दूसरे में अपना सबसे असंभाव्य साथी पाते हैं। इसीलिए इतनी लम्बी अवधि नाव पर साथ बिताने के बाद जब मौत के मुँह से ज़िन्दा निकलकर पाई अौर रिचर्ड पारकर किनारे लगते हैं अौर रिचर्ड पारकर बिना एक भी बार पाई की अोर मुड़कर देखे समन्दर किनारे के जंगल में गायब हो जाता है, पाई के दिल को एक कभी न भूलने वाली ठेस लगती है। बताया था पाई के पिता ने बचपन में उसको कि शेर अंत में एक हिंसक स्वभाव का जानवर भर है अौर उसकी अाँखों में कभी जो भावनात्मक लगाव दिखता है अपने मालिक के लिए, वह अौर कुछ नहीं सिर्फ देखनेवाले की अाँखों का प्रतिबिम्ब भर होता है। लेकिन पाई ने इन दो सौ सत्ताईस दिनों में जो देखा, जो जिया रिचर्ड पारकर के साथ, उसे यूँ झूठ भी वो कैसे मान ले।

life of pi hindi“डर के बारे में एक बात कहूँगा. यह जिंदगी का इकलौता सच्चा दुश्मन है. डर के हारे हार है. यह चालाक, धोखेबाज़ दुश्मन है, यह मुझसे बेहतर कौन जानेगा! इसमें ना शालीनता है, न नियमों और रीति-रिवाज के प्रति कोई आस्था, यह ज़रा भी दया नहीं दिखाता. यह सबसे बड़ी कमजोरी पर हमला बोलता है, जिसे वह आसानी से पहचान लेता है. यह खेल हमेशा दिमाग में ही शुरू होता है. जब आप शांति, आत्मविश्वास से भरे और खुश होते हैं, तभी डर शक का जामा पहने चुपचाप एक जासूस की तरह मन में घुस जाता है. शक की लड़ाई होती है अविश्वास से, अविश्वास शक को भगाना चाहता है. मगर अविश्वास के हथियार कमज़ोर हैं, वह मात्र एक प्यादा है. डर बड़ी आसानी से उसे हरा देता है. आप परेशान हो जाते हैं. बुद्धि और तर्क आपका साथ देते हैं. हिम्मत बढ़ती है. बुद्धि के पास तो नई से नई तकनीक के हथियार हैं. पर आश्चर्य, उत्तम चालों और पहले की अनेक जीतों के बावजूद तर्क-बुद्धि हार जाती है. आप कमज़ोर हो जाते हैं, लड़खडाने लगते हैं. बैचेनी और बढ़ जाती है.

अब डर आपके शरीर पर हमला बोल देता है, शरीर को पहले से ही आभास है कि कुछ गड़बड़ चल रही है. फूलती साँस उड़ती चिड़िया की तरह साथ छोड़ने लगती है और आंतें सांप की तरह सरकने लगती हैं. ज़बान सूखी व बेजान हो जाती है, जबड़े हिलते हैं, दंात बजने लगते हैं. कान बहरे हो जाते हैं. देह कंपकंपाने लगती है जैसे जूड़ी बुखार चढ़ आया हो. घुटने ऐसे कांपते हैं मानो नाच रहे हों. दिल पर दबाव बढ़ जाता है. सारी रुकावटें ढीली पड़ जाती हैं. अंग-अंग अपने तौर पर बिखर जाता है. बस आँखें खुली रहती हैं. डर पर उनका पूरा ध्यान रहता है.

हड़बड़ी में जल्दबाज़ी भरे फैसले लेते हैं. अपने आखिरी दोस्त आशा और विश्वास से आप पल्ला झाड़ लेते हैं. बस, आपने ख़ुद अपने को हरा दिया. डर जो  सिर्फ आपका एक वहम है, जीत जाता है.

इसे शब्दों में कहना मुश्किल काम है. डर, सच्चा डर, ऐसा डर जो आपकी बुनियाद हिला दे, ऐसा डर जो मौत को सामने देखकर उठता है, यह डर याददाश्त में गैंगरीन की तरह बस जाता है. सब कुछ सड़ा डालता है, यहाँ तक कि शब्द भी. इसे बताने के लिए बहुत कोशिश करनी होगी. उसका सामना करना होगा ताकि शब्दों से वह रोशन हो जाए. अगर ऐसा नहीं करेंगे, अगर आपका डर ऐसा शब्दहीन अँधेरा बन गया जिससे आप बचते हैं, शायद भुला भी देते हैं, तो आप डर के भावी हमलों के लिए सहज उपलब्ध होते हैं, क्योंकि हकीक़त में आपने तो अपने विजेता दुश्मन का मुकाबला किया ही नहीं.”

Life_Of_Pi_Wallpaperलेकिन पेंच कहानी में नहीं, उसके बाहर है। उस डूबे हुए जहाज़ की इंश्योरेंस कंपनी के कर्मचारी जब यही कहानी अस्पताल में पड़े पाई के मुँह से सुनते हैं, तो विश्वास नहीं करते। एक इंसान अौर शेर छोटी सी लाइफबोट पर बिना एक-दूसरे को कोई नुकसान पहुँचाए दो सौ सत्ताईस दिन कैसे ज़िन्दा रह सकते हैं अाखिर। वे कहते हैं कि पाई उन्हें ‘सच’ बताए। सच, याने कोई ऐसी कहानी जिस पर विश्वास किया जा सके। पाई मजबूरन उन्हें एक दूसरी कहानी सुनाता है जिसमें कोई जानवर नहीं। इस कथा में नाव पर पाई है अौर उसकी माँ हैं, एक घायल जहाज़ी है अौर एक खूंखार शिकारी। वो चौथा अादमी अपनी भूख मिटाने के लिए एक एक कर घायल जहाज़ी अौर पाई की माँ दोनों को अपना निशाना बनाता है। पाई से यह देखा नहीं जाता अौर वो अंतत: उस शिकारी को मार गिराता है। इश्योरेंस कंपनी के कर्मचारी इस कथा को सुन दहल जाते हैं। लेकिन फिर उनके मन में यह बात अाती है, कि अाखिर दोनों कथाअों में घटनाअों की कैसी अद्भुत समानता है। पहली कथा में लकड़बग्घा जो हत्याएं करता है, दूसरी कथा में वह शिकारी अादमी करता है। वहाँ घायल ज़ेबरा अौर मादा अौरांगउटान मारे जाते हैं अौर यहाँ घायल जहाज़ी अौर पाई की माँ। वहाँ रिचर्ड पारकर अंत में लकडधबग्घे को मार गिराता है, अौर यहाँ पाई। तो क्या पाई ही…???

पाई का अंत में यही सवाल है हमसे। कि हमें कौनसी कहानी ज़्यादा पसन्द होगी। जिसमें एक लड़का अपनी अाँखों के सामने अपनी माँ को मरते देखता है अौर खुद हथियार उठाता है, या फिर वो जिसमें एक रॉयल बंगाल टाइगर जिसका नाम ‘रिचर्ड पारकर’ है, पहले अपने स्वभावानुसार शिकार करता है अौर फिर समय के साथ एक सोलह साल के लड़के का सबसे सच्चा दोस्त बनता है? इश्योरेंस कंपनी वालों का तो जवाब है कि उन्हें वो कहानी पसन्द है जिसमें शेर है, अौर अापको?

One Response to “अपने अपने रिचर्ड पारकर”

  1. Madan Lal Grover says:

    Hain aur bhi duniya mein critics bahut achhey
    par Aapka jawab nahin MIHIR Ji.
    may GOD bless YOU.

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