पित्तृसत्ता का प्रेत : क़िस्सा

Qissa

स्त्री = इज्ज़त

स्त्री की इज्ज़त = परिवार की इज्ज़त

परिवार की इज्ज़त = समुदाय की इज्ज़त

इस तरह के सूत्रों के सहारे हमारे समाज में ‘व्यवस्था’ की स्थापना की जाती है अौर कई बार इनके सहारे ही समाज में स्त्री के सम्मान का बख़ान भी किया जाता है. लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा के हर दौर में यही सूत्र एक विध्वंसक पलटवार करता है. यहाँ विरोधी समुदाय की ‘इज्ज़त’ लूटने का सबसे सीधा अौर अासान ज़रिया समुदाय की स्त्री पर हमला बन जाता है. साम्प्रदायिक हिंसा का यौनिक विश्लेषण बताता है कि इस हिंसा की एक बड़ी वजह उसी सम्मानित सूत्र में छिपी है जिसमें स्त्री बराबरी पर खड़ी सामान्य इंसान न रहकर वंश की, समुदाय की ‘इज्ज़त’ का पर्याय बन जाती है. कभी वोदूसरे समुदाय का ‘शीलभंग’ करने के लिए मारी जाती है,तो कभी वो अपने ही पिता-भाई-बेटे द्वारा स्वयं के अौर समुदाय के ‘सम्मान की रक्षा’ के नाम पर क़त्ल की जाती है, अौर उस हत्या को ‘शहीद’ से लेकर ‘जौहर’ तक न जाने कितने नाम दिये जाते हैं. समानता एक ही है, कि होती वो हमेशा अौरत ही है.

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हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद

Garam Hawa

सथ्यू साहेब की ‘गरम हवा’ का यह परिचय दो महीने पहले हुए पहले ‘उदयपुर फिल्म फेस्टिवल’ के पहले अाई फेस्टिवल स्मारिका लिए लिखा था, जहाँ की यह समापन फिल्म थी. 

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मामी – एक

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कल शहर में कदम रखते ही पहले अॉटोवाले ने मीटर से चलने से इनकार किया. अौर अाज सुबह फिर टैक्सी वाले ने चलने से ही इनकार कर दिया. राखी-वरुण का कहना है कि हम दिल्लीवाले अपने साथ दिल्ली के अॉटो-टैक्सीवालों को भी उनके भले शहर में ले अाये हैं. इस बीच मैं मुम्बई में ‘अॉथेंटिक’ वड़ा पाव की तलाश में दो अौर तरह के पाव (दाबेली पाव, मंचूरियन पाव) खा चुका हूँ अौर तयशुदा रूप से अभी दो-तीन तरह के अौर खाने वाला हूँ.

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सुंदर का स्वप्न : शिप अॉफ थिसियस

Ship Of Theseus

शायद किराये के मकानों में ऐसा अक्सर होता है। जिस घर में हम रहने अाये, उसकी दीवारों पर पिछले रहनेवालों के निशान पूरी तरह मिटे नहीं थे। ख़ासकर बच्चों की उपस्थिति के निशान। कमरे की दीवारों पर रंग बिरंगी पेंसिल की कलाकारियाँ अौर अलमारियों पर सांता क्लाज़ के स्टिकर। अौर उससे भी कमाल था बाथरूम की एक अलमारी पर अनगिनत स्टिकर से बना एक कोलाज जिसमें एक बच्चे की कल्पना की उड़ान में अानेवाली तमाम तरह की चीज़ें थीं। नए रंग रोगन ने दीवार की कलाकारियों को तो मिटा दिया। लेकिन अलमारी का कोलाज हमने उतारा नहीं। एक स्कूलबस, कुछ जोड़ी जूते, एक लम्बी दूरबीन, बहुत सारी मछलियाँ। थोड़ा सा उन अनदेखे बच्चों को वहाँ रहने दिया। अौर शायद थोड़ा खुद को। अपना बचपन भी तो मैं शहरी अाबादी से बहुत दूर एक बड़े से चौक वाले मकान के किसी शांत कोने में छोड़ अाया था किन्हीं अौर अनदेखे लोगों द्वारा संभाले जाने के लिए।

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साझी विरासत का दोअाबा

ajay bhradwaj

पंजाब से अाया बुलावा अजय की फिल्मों को देखने अौर उन पर बात करने का था। अजय भारद्वाज की पंजाब की पृष्ठभूमि पर बनी दो वृत्तचित्र फिल्में ‘रब्बा हुणं की करिये’ अौर ‘मिलांगे बाबे रतन ते मेले ते’ साथ देखना अौर साथी कॉमरेडों से बातचीत मेरे लिए एक नए अनुभव का हिस्सा थी। इससे पहले अजय पंजाब की ही पृष्ठभूमि पर वृत्तचित्र ‘कित्थे मिल वे माही’ भी बना चुके हैं अौर इन तीन फिल्मों को साथ उनकी पंजाब-पार्टीशन ट्रिलॉजी के रूप में देखा जा सकता है। जहाँ ‘रब्बा हुणं की करिये’ रौशन बयानों से मिलकर बनती फिल्म है वहीं ‘मिलांगे बाबे रतन ते मेले ते’ जैसे अपना कैनवास बड़ा कर लेती है अौर उसमें पंजाब का तमाम खालीपन अौर उस खालीपन में गहरे पैठा सूफ़ी संगीत शामिल होकर हमारे सामने अाज के पंजाब की प्रचलित तस्वीरों के मुकाबले एक निहायत ही भिन्न तस्वीर पेश करता है।

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पान सिंह तोमर वाया साहिब, बीवी अौर गैंग्स्टर

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ज़्यादा पुरानी बात नहीं है। ‘पान सिंह तोमर’ बनकर तैयार थी अौर उसे मठाधीशों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन के अयोग्य ठहराकर डिब्बे में बंद किया जा चुका था। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया अंतिम उम्मीद हारकर अब नए काम की तलाश में थे अौर नायक इरफ़ान, फिल्म के लेखक संजय चौहान के शब्दों में रातों को फोन पर रोया करते थे अौर कहते थे कि कैसे भी करो यार, लेकिन अपनी यह फिल्म रिलीज़ करवाअो। इस फिल्म से उम्मीद खोकर अाखिर फिल्म के लेखक-निर्देशक ने कोई नई फिल्म पर काम शुरु करने की सोची। ऐसी फिल्म जिसका कैनवास ‘पान सिंह तोमर’ से छोटा हो, अौर जिसे रिलीज़ करवाने में शायद इतनी मशक्कत न करनी पड़े। अौर ऐसे ‘साहेब, बीवी अौर गैंगस्टर’ अस्तित्व में अाई। फिल्म बनती है अौर रिलीज़ होती है। याद होगा, मैंने लिखा था इस फिल्म के लिए कि क्यों यह फिल्म मुझे पसन्द अाती है, “क्योंकि यह छोटे वादे करती है अौर उन्हें पूरा करती है”।

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अपने अपने रिचर्ड पारकर

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कुछ महीने पहले ‘चकमक’ के दोस्तों के लिए यह परिचय लिखा था ‘Life Of Pi’ किताब/ फिल्म का. साथ ही किताब से मेरा पसन्दीदा अंश, यात्रा बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब के हिन्दी अनुवाद ‘पाई पटेल की अजब दास्तान’ से साभार यहाँ.

पिछले दिनों जब लंदन से लौटी हमारी दोस्त हमारे लिए मशहूर जासूस शरलॉक होम्स के बहुचर्चित घर ‘221-बी, बेकर स्ट्रीट’ वाले म्यूज़ियम से उनकी यादगार सोवेनियर लाईं, तो इसमें पहली नज़र में कुछ भी अजीब नहीं था। शरलॉक होम्स की कहानियाँ पढ़ते तो हम बड़े हुए हैं अौर उनके देस से उनकी याद साथ लाना एक मान्य चलन है। ख़ास तरह की माचिस की डिब्बी, जैसी शरलॉक इस्तेमाल करते थे। विशेष तौर पर तैयार करवाया गया चमड़े का बुकमार्क, जिसपर शरलॉक की एक मशहूर उक्ति लिखी है, “Life is infinitely stranger than the mind of man could invent”.

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यथार्थ की उलटबांसियाँ : मटरू की बिजली का मंडोला

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” बड़ी प्रार्थना होती है। जमाखोर अौर मुना़फाखोर साल-भर अनुष्ठान कराते हैं। स्मगलर महाकाल को नरमुण्ड भेंट करता है। इंजीनियर की पत्नी भजन गाती हैं – ‘प्रभु कष्ट हरो सबका’। भगवन्‌, पिछले साल अकाल पड़ा था तब सक्सेना अौर राठौर को अापने राहत कार्य दिलवा दिया था। प्रभो, इस साल भी इधर अकाल कर दो अौर ‘इनको’ राहत कार्य का इंचार्ज बना दो। तहसीलदारिन, नायबिन, अोवरसीअरन सब प्रार्थना करती हैं। सुना है विधायक-भार्या अौर मंत्री-प्रिया भी अनुष्ठान कराती हैं। जाँच कमीशन के बावजूद मैं ऐसा पापमय विचार नहीं रखता। इतने अनुष्ठानों के बाद इन्द्रदेव प्रसन्न होते हैं अौर इलाके के तरफ से नल का कनेक्शन काट देते हैं।

हर साल वसन्त !

हर साल शरद !

हर साल अकाल !  ” — हरिशंकर परसाई, ‘अकाल-उत्सव’ से।

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

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फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में ‘नया’ क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा सिनेमा में क्या बदला?

क्या कथा बदली? इसका शायद ज़्यादा ठीक जवाब यह होगा कि यह कथ्य में पुनरागमन का दौर है। ‘पान सिंह तोमर’ देखते हुए जिस निस्संगता अौर बेचैनी का अनुभव होता है, वह अनुभव गुरुदत्त की ‘प्यासा’ के एकालाप ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’ तक जा पहुँचता है। ‘गैंग्स अॉफ वासेपुर’ की कथा में वही पुरानी सलीम-जावेद की उग्र भंगिमा है जिसके सहारे अमिताभ ने अपना अौर हिन्दी सिनेमा का सबसे सुनहरा दौर जिया। ‘विक्की डोनर’, ‘लव शव ते चिकन खुराना’, ‘अइय्या’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’ अौर ‘तलाश’ जैसी फिल्में दो हज़ार के बाद की पैदाईश फिल्मों में नई कड़ियाँ हैं जिनमें अपनी अन्य समकालीन फिल्मों की तरह कुछ गंभीर लगती बातों को भी बिना मैलोड्रामा का तड़का लगाए कहने की क्षमता है। लेकिन अगर कथा नहीं बदली अौर न ही उसे कहने का तरीका थोड़े ताम-झाम अौर थोड़े मैलोड्रामा को कम करने के बावजूद ज़्यादा बदला, तो फ़िर ऐसे में अाखिर वो क्या बात है जो हमारे इस समकालीन सिनेमा को कुछ पहले अाए सिनेमा से भिन्न अनुभव बना रही है?

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केंचुल उतारता शहर

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हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म ‘शाहिद’ के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म ‘दिल पे मत ले यार’ पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे के लिए लिखा अालेख, पिछले दिनों मैंने ‘कथादेश’ के दोस्तों से शेयर किया। वही अाज यहाँ अापके लिए। हंसल की ‘दिल पे मत ले यार’ अाज भी मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में शुमार है, अौर कहीं न कहीं इसकी भी अप्रत्यक्ष भूमिका रही है मुझे मेरे वर्तमान शोध तक पहुँचाने में।

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“रामसरन हमारी खोई हुई इन्नोसेंस है. वो इन्नोसेंस जो हम सबमें कहीं है लेकिन जिसे हमने कहीं छिपा दिया है क्योंकि मुझे एक बड़ा बंगला चाहिए, तुम्हें एक अच्छी सी नौकरी चाहिए. लेकिन रामसरन को इनमें से कुछ नहीं चाहिए. उसका काम सिर्फ़ इंसानियत से चल जाता है…

एंड फ़ॉर मी, दैट्स माय स्टोरी!” – महेश भट्ट, ’दिल पे मत ले यार’ में अपना ही किरदार निभाते हुए.

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