सात फ़िल्में, सात संस्कार
सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, ...
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July 10, 2010
बुला रहा है कोई मुझको, लुभा रहा है कोई.
बात पुरानी है, नब्बे का दशक अपने मुहाने पर था. अपने स्कूल के आख़िरी सालों में पढ़ने वाला एक लड़का राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में कैसेट रिकार्ड करने की दुकान खोलकर बैठे दुकानदार से कुछ अजीब अजीब से नामों वाले गाने माँगा करता. जो उम्मीद के मुताबिक उसे ...
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April 4, 2010
Things we lost in the fire
’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ - थियोडोर अडोर्नो. जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने ...
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March 27, 2010
इस रात की सुबह नहीं
’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए. मैं नर्क में हूँ. यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ...
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March 23, 2010
हरिश्चंद्राची फैक्टरी
यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे? अच्छा ...
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January 30, 2010
देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा
महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. ...
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January 20, 2010
इसे कहते हैं धमाकेदार शुरुआत!
इस बार के ओशियंस में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित हुए गुलज़ार साहब समारोह के डायरेक्टर जनरल मणि कौल के हाथों तैयार किया प्रशस्ति पत्र ग्रहण कर बैठने को हुए ही थे कि अचानक मंच संचालक रमन पीछे से बोले, “गुलज़ार साहब, हमने आपके लिए कुछ सरप्राइज़ रखा है!” ...
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October 25, 2009
बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने
उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले ...
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August 21, 2009
’तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं’, कमीने संगीत समीक्षा.
मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया... और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की ...
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August 8, 2009
“मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!” ~पीयूष मिश्रा.
पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक 'स्केलेटन वुमन' था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए - साहित्य, राजनीति और ...
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June 3, 2009


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