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2010 : पांच किरदार

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  • विद्या बालन – इश्किया

    जवान होती शीलाओं और बदनाम होती मुन्नियों के समय में हो सकता है कि आप विद्या बालन की ठीक-ठीक जगह न पहचान पाएं. लेकिन बीस-तीस साल बाद जब इतिहास के पन्नों में यह धुंध छंट चुकी होगी, उनका नाम उसी क्रम में होगा जहाँ ऊपर मधुबाला, वहीदा रहमान और नूतन का नाम लिखा है. हिन्दी सिनेमा की वर्तमान नायिका के लिए यह एक असल ’गैर-परंपरागत’ रोल था. और जैसा काम उन्होंने कर दिखाया है, सुंदरता/ मादकता/ यौवन/ आकर्षण के तमाम मापदंड उलट-पलट जाते हैं. इश्किया की ‘कृष्णा’ इंसान के भीतर बसे भगवान और शैतान दोनों को एक साथ जगा देती है.

    • रोनित रॉय – उड़ान

    यह आकाशवाणी जयपुर है. अब आप सुनेंगे प्रायोजित कार्यक्रम ’युववाणी’. तक़रीबन पन्द्रह साल हुए उस बात को जब ’जान तेरे नाम’ का वो गाना दादा ने मेरी विशेष फ़रमाइश पर रेडियो पर सुनवाया था. और इसीलिए आज यहाँ ‘भैरव सिंह’ का नाम लिखते हुए मुझे बखूबी मालूम है कि रोनित रॉय के लिए यह कितना लम्बा फ़ासला है. हम जैसे नास्तिकों के लिए शायद यही ’पुनर्जन्म’ है. यह साल का सबसे उल्लेखनीय पुरुष किरदार है, और सबसे ज़्यादा कोसा गया भी.

    • रघुबीर यादव – पीपली लाइव

    वजह वही जो दिबाकर की “ओये लक्की लक्की ओये” में ‘लक्की सिंह’ से ज़्यादा ‘बंगाली’ की तरफ़दारी करने की है. आपके पास कोई तय दिशा-निर्देश नहीं होता ऐसा किरदार निभाते वक़्त. यह करतब/कलाबाज़ी है. धार पर चलने बराबर. न आप उतने भोले हैं कि दुनिया के झमेले न समझें, न आप उतने चालाक/ताक़तवर हैं कि उन्हें धता बताते हुए बचकर निकल जाएं. आप ऐसे शिकार हैं जो अपने शिकारी की सूरत तो पहचानता है, लेकिन उससे बचने का कोई रास्ता उसके पास नहीं. और ‘बुधिया’ के किरदार में रघुबीर इस मुश्किल को ऐसे निकाल ले जाते हैं जैसे इसमें और बीड़ी सुलगाने में कोई अंतर ही न हो.

    • daayen-ya-baayenAदीपक डोबरियाल – दायें या बाएं

    मक़बूल, ओमकारा, 1971, शौर्य, दिल्ली6, 13B, गुलाल.. दीपक डोबरियाल हमारे दौर के सबसे प्रामाणिक अभिनेता हैं. और ’रमेश मजीला’ की भूमिका निभाते हुए उनकी उलझनों में गज़ब की सच्चाई है. ’नायक’ होने की तमाम मान्य परिभाषाओं को झुठलाते दीपक इस छोटी मगर खूबसूरत फ़िल्म के सबसे बड़े सितारे हैं. सहेजने के किए झोली भर के चमत्कारी क्षण दे जाते हैं.

    • राजकुमार यादव – लव, सेक्स और धोखा

    इनमें से चुनाव कठिन है. लेकिन श्रुति, राहुल या रश्मि होने के मुकाबले ’आदर्श’ होना मुझे ज़्यादा मुश्किल लगता है. इस किरदार के लिए रचा गया घटनाचक्र पूरी तरह नकारात्मक था. लेकिन इसे ’नकारात्मक’ नहीं होना था. इस किरदार को निभाना इसलिए मुश्किल था क्योंकि इसे व्यवस्था का ’शिकार’ दिखाना सबसे मुश्किल था. ज़रा सी चूक और ’आदर्श’ हिन्दी सिनेमा का आदर्श विलेन होता और हमारी नज़रों के सामने से वो आईना ओझल हो जाता जो उस किरदार ने हमें दिखाया. राज कुमार यादव साल के इस सबसे मुश्किल इम्तिहान में पूरे खरे उतरते हैं.

    5 Responses to “2010 : पांच किरदार”

    1. प्रवीण पाण्डेय says:

      पाँचों सशक्त किरदार।

    2. … bahut khoob !!

    3. [...] This post was mentioned on Twitter by Svetlana Naudiyal. Svetlana Naudiyal said: RT @miyaamihir: After pissed off by TV channels 'farji lists' on new year eve, I wrote this on FB, 31st evening http://goo.gl/reNYP My m … [...]

    4. Ashish says:

      Udaan ka kirdaar wakai kathin tha…..

    5. Vivek says:

      भाई साहेब,
      जो बात आपने विद्या बालन के बारे में लिखी है, इतने कम शब्दों में इतना शशक्त विवरण .. कुछ ऐसा है जो मैं हमेशा से सोचता था पर बयां नहीं कर पता था. दिल गदगद हो गया पढ़कर :)
      बहुत खूब !

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