दि गुड, दि बैड एंद दि अग्ली : सिनेमा 2017 पर ‘विशेष टिप्पणी’

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यह आलेख तनिक संशोधित रूप में 31 दिसंबर 2017 के ‘प्रभात खबर’ में यहाँ प्रकाशित हुआ

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मेरे लिए फ़िक्शन में साल की सबसे खूबसूरत फ़िल्म ‘ए डेथ इन दि गंज’ तथा नॉन-फ़िक्शन में ‘एन इनसिग्निफ़िकेंट मैन’ रहीं। पर पता नहीं आलोचक इन्हें हिन्दी फ़िल्में मानेंगे भी या नहीं। लेकिन इन दोनों फ़िल्मों ने आधुनिक भारतीय समाज आैर उसकी दो सबसे आधारभूत संरचनाअों ‘परिवार’ आैर ‘चुनाव’ में छिपी क्षुद्रताअों आैर संभावनाअों, वादों आैर छलनाअों को जिस खूबसूरती से खोला, कोई अन्य हिन्दी फ़िल्म ऐसा नहीं कर पाई।

एक असहज करनेवाले ट्रेंड में इस साल कई ‘रेप रिवेंज ड्रामा’ फ़िल्में देखी गईं। हिन्दी में ‘काबिल’, ‘भूमि’, ‘मॉम’ आैर ‘मातृ’ जैसी फ़िल्में देखी गईं, ‘अज्जी’ पर फ़ेस्टिवल सर्किल्स में जमकर बहस हुई। यह फ़िल्में सकारात्मक संकेत हैं कि दिसम्बर 2012 के बाद स्त्री स्वातंत्र्य आैर सुरक्षा के प्रश्न भारतीय जनमानस की चिन्ताअों के केन्द्र में आए हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में स्त्री अधिकार आैर बराबरी पर बहस को बदले की अापराधिक कहानियों तक सीमित कर देना अन्तत: कल्पनाशीलता की हार है। इसके बरक्स ‘अनारकली आॅफ़ आरा’ आैर ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरका’ जैसी फ़िल्में ‘पिंक’ की खींची उजली लकीर को लम्बा करने वाली साबित हुईं।

पहली बार फ़िल्म निर्देशित कर रहे अविनाश दास आैर अलंकृता श्रीवास्तव ने अपनी फ़िल्मों में गज़ब के आत्मविश्वास के साथ मुखरता से अपनी बात रखी। स्वतंत्र प्रयासों से बनी ‘अनारकली आॅफ़ आरा’ तथा रिलीज़ के लिए सीबीएफ़सी की मध्ययुगीन सोच से लड़नेवाली ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरका’ असहज करनेवाली फ़िल्में हैं। वे अपनी भाषा में लाउड लगती हैं, बेशक बहसतलब फ़िल्में हैं। लेकिन दोनों ही बिना किसी अपराधबोध के अपनी कथा नायिकाअों की आकांक्षाअों आैर अधिकारों को सामने रखती हैं। बताती हैं कि स्त्री के लिए हर व्यक्तिगत ‘ना’ भी राजनैतिक लड़ाई है आैर हर निजी ‘हाँ’ भी। पर्सनल इज़ आॅलवेज़ पॉलिटिकल।

इन्हीं दोनों फ़िल्मों से सबसे शानदार अभिनय की सूची में सबसे ऊपर रत्ना पाठक शाह आैर स्वरा भास्कर का नाम चमकता रहेगा। इससे इतर अभिनय में ये साल राजकुमार राव का रहा। संयोग कुछ ऐसा बना कि इस कैलेंडर इयर में आश्चर्यजनक रूप से उनकी सात फ़िल्में रिलीज़ हुईं। इनमें आॅल्ट बालाजी की महत्वाकांक्षी डिज़िटल सीरीज़ ‘बोस – डेड आॅर अलाइव’ को भी जोड़ लें तो राजकुमार छाए रहे हैं। लेकिन इस क्वांटिटी ने उनके काम की क्वालिटी पर ज़रा भी आँच नहीं आने दी।

उन्होंने हिन्दी सिनेमा के सबसे रौबदार हीरो वाला नाम पाया है, ‘राजकुमार’। ‘राजकुमार’ से याद आता है “चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के होते हैं..” वाला दुस्साहसी अकेला नायक। लेकिन घर में उनके दोस्त उन्हें ‘राजू’ नाम से पुकारना पसन्द करते हैं। राजू, हमारे सिनेमा में हुआ सबसे सच्चा चैप्लिन अवतार। राज कपूर का बनाया ‘आम आदमी’ नायक। इस साल उन्होंने अपनी भूमिकाअों में सिनेमाई नायक के ये दोनों एक्सट्रीम सफ़लतापूर्वक छू लिए हैं।

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‘ट्रैप्ड’ आैर ‘बरेली की बर्फ़ी’ दोनों ही फ़िल्मों में उनके किरदार ने जो सम्पूर्ण कैरेक्टर ग्राफ़ जिया है, उसके लिए नामी अभिनेता सालों तरसते हैं। साल की सबसे उल्लेखनीय फ़िल्म ‘न्यूटन’ में वह नायक रहे आैर परदे पर उनकी पंकज त्रिपाठी के साथ जुगलबन्दी इस साल की सबसे बेहतरीन अभिनय प्रदर्शनी थी। पंकज त्रिपाठी को भी याद रखा जाएगा। स्टारपुत्रों से भरी इस फ़िल्मी नगरी में उन्होंने अनुभवों की घोर तपस्या से हासिल हुई अपनी अभिनय की पूंजी को स्टार बनाया है।

हॉलीवुड की चुनौती लगातार बड़ी होती जा रही है। इस साल भी कई बेसिरपैर की हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर्स ने भारतीय बॉक्स आॅफ़िस पर करोड़ों रुपए कमाए। इस साल यह आकर्षण दीपिका पादुकोण आैर प्रियंका चोपड़ा जैसी सेल्फ़मेड मुख्यधारा नायिकाअों को भी ‘रिटर्न आॅफ़ जेंडर केज’ आैर ‘बेवाच’ जैसी वाहियात फ़िल्मों की अोर ले गया। तकनीक आैर पैसे के बल पर इससे जीतना मुश्किल है। यह ऐसी चुनौती है जिसका मुकाबला हिन्दी सिनेमा मौलिक कंटेंट के द्वारा ही कर सकता है, करता आया है। अपनी जड़ों की आैर बेहतर पहचान तथा ज़मीन से निकली मौलिक कहानियाँ ही इस हॉलीवुड के हमले से बचा सकती हैं।

इधर इंडस्ट्री में बहुत से लोग ‘नेटफ़्लिक्स’ आैर ‘अमेज़न’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को बहुत उम्मीद की नज़र से देख रहे हैं। प्रचार के लिए बड़े पैसे के खेल में फंसे बॉलीवुड के बरक्स मौलिक कंटेंट के लिए इन्हें सबसे मुफ़ीद माना जा रहा है। साल 2017 में इनकी पहली धमक भारतीय बाज़ार में सुनायी दी। ‘अमेज़न’ ने रिचा चड्ढा आैर विवेक आेबराय अभिनीत ‘इनसाइड ऐज़’ के साथ मौलिक कंटेंट की दुनिया में कदम रखा। अगले साल नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, इरफ़ान ख़ान आैर सैफ़ अली ख़ान जैसे सितारा अभिनेता स्पेशली डिज़िटल मीडियम के लिए तैयार सीरीज़ में नज़र आनेवाले हैं। लेकिन यहाँ भी सावधान रहने की ज़रूरत है। भारतीय सिनेमा की ताक़त इसकी विविधता आैर कुछ हद तक अराजक लगती अव्यवस्थित उर्वर ज़मीन है। उस तमाम रचनाशीलता को किसी एक हाथ में दे देना भविष्य में घातक भी साबित हो सकता है। कहीं हमारे सिनेमा का भी वही हश्र ना हो, जो आज नई सदी में हमारे टेलिविज़न का हुआ है।

क्या राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबोये बिना स्पोर्ट्स बायोपिक बनाना संभव नहीं?

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नितेश तिवारी की ‘दंगल’ हमारे सिनेमा की वो पहली स्पोर्ट्स बायोपिक नहीं है, जिसका अन्त राष्ट्रगान पर हुआ हो। इससे पहले बॉक्सर मैरी कॉम पर बनी बायोपिक भी इसी रास्ते पर चलकर चैम्पियन मैरी कॉम की कहानी को भारतीय राष्ट्रवाद की प्रतीक यात्रा बना चुकी है। कह सकते हैं कि बॉक्स आॅफिस पर सफ़ल ‘भाग मिल्खा भाग’ ने इस कथा संरचना का आधार तैयार किया आैर बाद में फ़िल्मों ने इसे फॉलो किया।

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सच है कि आज़ादी वाले दशक से ही हिन्दी सिनेमा भारतीय राष्ट्रवाद के विचार को जनता के बीच पहुँचाने का सबसे लोकप्रिय माध्यम रहा है। आज पचास के दशक की फ़िल्मों में नेहरुवियन आधुनिकता को पढ़ा जाना मान्य विचार है। पर अभी का माहौल देखें तो यह भी अद्भुत संयोग है कि जिस दौर में हमारे सिनेमा में खिलाड़ियों के संघर्षों पर बनी बायोपिक खासी लोकप्रिय हो रही हैं, यही दौर लोकप्रिय सिनेमा में उग्र राष्ट्रवाद की वापसी का भी है। हालाँकि नब्बे के दशक के अन्त वाले समय की तरह, जहाँ ‘गदर’, ‘ज़मीन’ आैर ‘एलअोसी कारगिल’ जैसी फ़िल्मों के साथ सिनेमा में इस उग्र राष्ट्रवाद का पहला दौर नज़र आता है, यह सिनेमा उतना फूहड़ नहीं है।

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न्याय के बिना कोई बराबरी संभव नहीं है : अलीगढ़

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निर्देशक ‘हंसल मेहता’ की ‘अलीगढ़’ इस साल का सबसे गहरे पानी में डूबा मोती है. उनींदे से उत्तर भारतीय शहर के हृदय में बसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में मराठी पढ़ाने वाले विदुर प्रोफेसर के घर देर रात सनसनीखेज़ स्टिंग होता है. विश्वविद्यालय फौरन क़दम उठाता है. लेकिन स्टिंग करनेवालों की धरपकड़ के बजाए वो खुद प्रोफेसर को बरख़ास्त कर देता है. कारण, प्रोफेसर की समलैंगिक पहचान का उजागर होना.

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‘अलीगढ़’ हमें लड़ाई को अनिच्छुक, लेकिन अद्भुत जीवट वाले इस प्रोफेसर श्रीनिवासन रामचंद्र सिरस की अकेली लेकिन निहायत ही कोमल दुनिया के भीतर लेकर जाती है. साथ ही उस ‘सभ्य समाज’ का असल चेहरा भी हमारे सामने उजागर करती है, जिसे अपने से भिन्न कोई असहज करती पहचान बर्दाश्त तक नहीं. यह बहुमत नहीं, भीड़ है. आतताती भीड़. हत्यारी भीड़. कमाल की संवेदनशीलता के साथ बनाई गई ’अलीगढ़’ की चिंताअों का दायरा बड़ा है. यह फिल्म दरअसल हर उस अल्पसंख्यक पहचान के बारे में है, जिसकी रक्षा के वादे पर ही हमारा संविधान, हमारा लोकतंत्र आैर हमारा देश टिका है.

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