मनोरंजन का बदला चेहरा

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पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है. Continue reading

विकल्प की नई राह

IMG_4997नैनीताल फ़िल्मोत्सव (29 से 31 अक्टूबर, 2010) के ठीक पिछले हफ़्ते मैं बम्बई में था, मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (मामी) में. हम वहाँ युद्ध स्तर पर फ़िल्में देख रहे थे. कई दोस्त बन गए थे जिनमें से बहुत सिनेमा बनाने के पेशे से ही किसी न किसी रूप में जुड़े हुए थे. जिसे भी बताता कि “यहाँ से निकलकर सीधा नैनीताल जाना है.” सवाल आता… क्यों? “क्योंकि वहाँ भी एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल है.” ..सुनने वाला भौंचक. नैनीताल में फ़िल्म समारोह.. ये कैसे? पूरी बात बताओ. और जान लिया तो फिर एक इत्मिनान की साँस.. बढ़िया. और फिर हर पुराने आदमी के पास एक कहानी होती सुनाने को. कहानी जिसमें भारत के हृदयस्थल में बसा कोई धूल-गुबार से सना कस्बा होता. कुछ जिगरी टाइप दोस्त होते, कस्बे का एक सिनेमाहाल होता और पिताजी की छड़ी होती. “भई हमारे ज़माने में ये ’क्वालिटी सिनेमा-विनेमा’ था तो लेकिन बड़े शहरों में. हमें तो अमिताभ की फ़िलम भी लड़-झगड़कर नसीब होती थी. पिताजी जब हमारी हरकतें देखते तो कहते लड़का हाथ से निकल गया..”

तब समझ आता है कि गोरखपुर से शुरु हुए फ़िल्मोत्सवों के इस क्रमबद्ध और प्रतिबद्ध आयोजन का कितना दूरगामी महत्व होनेवाला है. जन संस्कृति मंच के ’द ग्रुप’ के बैनर तले ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम के साथ साल-दर-साल उत्तर भारत के विभिन्न छोटे-बड़े शहरों में आयोजित होते यह फ़िल्म समारोह सार्थक सिनेमा दिखाने के साथ-साथ उन शहरों के सांस्कृतिक परिदृश्य का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं. बिना किसी कॉर्पोरेट मदद के आयोजित होने वाला यह अपनी तरह का अनूठा आयोजन है. इस मॉडल की सफ़लता से कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी हावी होती जा रही बाज़ार की ताक़तों से इतर एक विकल्प तैयार करने की कई नई राहें खुल रही हैं. इसीलिए कहना न होगा कि पिछले साल के सफ़ल आयोजन के बाद इस साल नैनीताल के लोग ’युगमंच’ तथा ’जसम’ द्वारा सम्मिलित रूप से आयोजित ’दूसरे नैनीताल फ़िल्म समारोह’ के इंतज़ार में थे. लोगों में सिनेमा को लेकर इस उत्सुकता को फिर से जगा देने के लिए ’द ग्रुप’ के संयोजक संजय जोशी और ’युगमंच’ के अध्यक्ष ज़हूर आलम विशेष बधाई के पात्र हैं. इन्हीं दोनों प्रतिबद्ध समूहों द्वारा आयोजित नैनीताल फ़िल्म समारोह सिर्फ़ फ़िल्मोत्सव न होकर अनेक प्रदर्शन-कलाओं से मिलकर बनता एक सांस्कृतिक कोलाज है. गिर्दा और निर्मल पांडे की याद को संजोये इस बार के आयोजन में भी कई विचारोत्तेजक वृत्तचित्रों और कुछ दुर्लभ फ़ीचर फ़िल्मों के साथ उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा पर जयमित्र बिष्ट के फ़ोटो-व्याख्यान ’त्रासदी की तस्वीरें’, ’युगमंच’ द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति और बच्चों द्वारा खेला गया नाटक ’अक़्ल बड़ी या शेर’ भी शामिल थे.

इस बार नैनीताल आए डॉक्यूमेंट्री सिनेमा के गुल्दस्ते में शामिल कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्में थीं सूर्य शंकर दाश की ’नियमराजा का विलाप’, अजय टी. जी. की ’अंधेरे से पहले’, देवरंजन सारंगी की ’फ़्राम हिन्दू टू हिन्दुत्व’, अजय भारद्वाज की ’कित्ते मिल वे माही’, अनुपमा श्रीनिवासन की ’आई वंडर’ तथा संजय काक की ’जश्न-ए-आज़ादी’. इसके अलावा वृत्तचित्र निर्देशक वसुधा जोशी पर विशेष फ़ोकस के तहत उनकी तीन फ़िल्मों, ’अल्मोड़ियाना’, ’फ़ॉर माया’ तथा ’वायसेस फ़्रॉम बलियापाल’ का प्रदर्शन समारोह में किया गया. शानदार बात यह रही कि ज़्यादातर फ़िल्मों के साथ उनके निर्देशक खुद समारोह में उपस्थित थे. फ़िल्मकारों के बीच का आपसी संवाद और दर्शकों से उनकी बातचीत फ़िल्म को कहीं आगे ले जाती हैं. इससे देखनेवाला खुद उन फ़िल्मों में, उनमें कही बातों में, उसके तमाम किरदारों के साथ एक पक्ष की तरह से शामिल होता है और उन परिस्थितियों से संवाद करता है. बीते सालों में यही ख़ासियत इन फ़िल्मोत्सवों की सबसे बड़ी उपलब्धि बनकर उभर रही है.

daayen-ya-baayenमुख्यधारा सिनेमा द्वारा बेदखल की गई दो दुर्लभ फ़ीचर फ़िल्मों का यहाँ प्रदर्शन हुआ. परेश कामदार की ’खरगोश’ तथा बेला नेगी की ’दाएं या बाएं’. इनमें बेला नेगी की ’दाएं या बाएं’ पर यहाँ लिखना ज़रूरी है. क्योंकि एक अनचाहे संयोग के तहत जिस दिन फ़िल्म को नैनीताल में दिखाया और पसंद किया जा रहा था ठीक उसी दिन यह फ़िल्म सिर्फ़ दो महानगरों के कुछ गिने हुए सिनेमाघरों में रिलीज़ हो ’बॉक्स ऑफ़िस’ पर अकाल मृत्यु के गर्भ में समा गई. कई बार फ़िल्म उसकी मुख्य कथा में नहीं होती. उसे आप उन अन्तरालों में पाते हैं जिनके सर मुख्य कथा को ’दाएं या बाएं’ भटकाने का इल्ज़ाम है. ठीक ऐसे ही बेला नेगी की फ़िल्म में बस की खिड़की पर बैठी एक विवाहिता आती है. दो बार. पहली बार सपने की शुरुआत है तो दूसरी बार इस प्रसंग के साथ मुख्य कथा वापिस अपनी ज़मीन पकड़ती है. परदे पर इस पूरे प्रसंग की कुल लम्बाई शायद डेढ़-दो मिनट की होगी. इन्हीं दो मिनट में निर्देशक ऐसा अद्भुत कथा कोलाज रचती हैं कि उसके आगे हिन्दी सिनेमा की तमाम पारंपरिक लम्बाइयाँ ध्वस्त हैं. खांटी उत्तराखंडी आबो-हवा अपने भीतर समेटे इस फ़िल्म को नैनीताल फ़िल्मोत्सव के मार्फ़त उसके घर में दर्शकों ने देखा, मानो फ़िल्म अपनी सही जगह पहुँच गई.

मल्लीताल के मुख्य बाज़ार से थोड़ा सा ऊपर बनी शाही इमारत ’नैनीताल क्लब’ की तलहटी में कुर्सियाँ फ़ैलाकर बैठे, बतियाते संजय काक ने मुझे बताया कि संजय जोशी अपने साथ विदेशी फ़िल्मों की साठ से ज़्यादा कॉपी लाए थे, ज़्यादातर ईरानी सिनेमा. सब की सब पहले ही दिन बिक गईं. शायद यह सुबह दिखाई ईरानी फ़िल्म ’टर्टल्स कैन फ़्लाई’ का असर था. संजय ने खुद कहा कि लोग न सिर्फ़ फ़िल्में देख रहे हैं बल्कि पसन्द आने पर उन्हें खरीदकर भी ले जा रहे हैं. इसबार फ़ेस्टिवल में वृत्तचित्रों की बिक्री भी दुगुनी हो गई है. उस रात पहाड़ से उतरते हुए मेरे मन में बहुत अच्छे अच्छे ख्याल आते हैं. नैनीताल से पहाड़ शुरु होता है. नैनीताल फ़िल्मोत्सव के साथी सार्थक सिनेमा को पहाड़ के दरवाज़े तक ले आए हैं. और अब नैनीताल से सिनेमा को और ऊपर, कुछ और ऊँचाई पर इसके नए-नए दर्शक ले जा रहे हैं. पहाड़ की तेज़ और तीख़ी ढलानों पर जहाँ कुछ भी नहीं ठहरता सिनेमा न सिर्फ़ ठहर रहा है बल्कि अपनी जड़ें भी जमा रहा है, गहरे.

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इस आलेख का संशोधित संस्करण आज के ’जनसत्ता’ रविवारीय में प्रकाशित हुआ.

हिन्दी सिनेमा इतिहास की पंद्रह सर्वश्रेष्ठ हास्य फ़िल्में

Chashme Buddoor 1981

व्यंग्य हिन्दी सिनेमा का मूल स्वर नहीं रहा है. इसीलिए हजारों फ़िल्मों लम्बे इस सिनेमाई सफ़र में बेहतरीन कहे जा सकने लायक सटायर कम ही बने हैं. फिर भी हिन्दी सिनेमा ने समय-समय पर कई अच्छी कॉमेडी फ़िल्में दी हैं जिन्हें आज भी देखा पसंद किया जाता है. अच्छी कॉमेडी फ़िल्म की सफ़लता आज भी यही है कि उसे हम अपनी ज़िन्दगी और उसकी उलझनों के कितना करीब पाते हैं. और जो फ़िल्म ऐसा कर पाती है वो आज भी हमारा दिल जीत लेती है और क्लासिक का दर्जा पाती है.

कोई भी चयन अपने आप में पूर्ण नहीं होता और ठीक इसी तरह यहाँ भी यह दावा नहीं है. जैसे आलोचक पवन झा मानते हैं कि किशोर और मधुबाला की ’हाफ़ टिकट’ में दोनों की कैमिस्ट्री और हास्य ’चलती का नाम गाड़ी’ से भी आला दर्जे का है. इसी तरह नम्रता जोशी का कहना है कि पंकज पाराशर की ’पीछा करो’ एक बेहतरीन हास्य फ़िल्म थी जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए. कई सिनेमा के चाहनेवाले पंकज आडवानी की अब तक अनरिलीज़्ड फ़िल्म ’उर्फ़ प्रोफ़ेसर’ को कल्ट क्लासिक मानते हैं तो बहुत का सोचना है कि कमल हासन की ’पुष्पक’, ’मुम्बई एक्सप्रेस’ और ’चाची 420’ के ज़िक्र के बिना कॉमेडी फ़िल्मों का कोई भी चयन अधूरा है. फिर भी, तमाम संभावनाओं और सही प्रतिनिधित्व पर विचार के बाद मेरी ’टॉप टेन’ कॉमेडी फ़िल्में हैं…

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ताजमहल पटाखे की लड़ी सी : फंस गए रे ओबामा

phas gaye re obamaमेरे लिए ’फंस गए रे ओबामा’ का सबसे पहला परिचय यह है कि यह मनु ऋषि की दूसरी फ़िल्म है. आपको याद होना चाहिए कि शहरी जीवन के उस असहज कर देने वाले लेकिन अविस्मरणीय अनुभव ’ओये लक्की लक्की ओये’ को परदे पर साकार करने का जितना श्रेय इंडी सिनेमा के ’पोस्टर बॉय’ अभय देओल को जाता है उतना ही श्रेय उस धूसर किरदार ’बंगाली’ को भी जाता है. ज़िन्दगी की निहायत गैरबराबर लड़ाई रोज़ लड़ता और उसमें हारता आम आदमी या मौका देखकर पाला बदलने वाला पालतू कुत्ता, ’बंगाली’ जैसे किरदार के चलने के लिए रास्ता बहुत संकरा था और मनु के लिए पीछे देखने पर पूर्व संदर्भ बहुत कम. लेकिन मनु ऋषि इस मुश्किल किरदार को जिस खूबसूरती से निकाल ले जाते हैं वो क़ाबिलेगौर था. कई अदाकार हैं जिनका अब भी हिन्दी सिनेमा पर बड़ा उधार बाक़ी है, उनका दिया हमने अब तक वापस नहीं लौटाया है. दीप्ति नवल, पवन मल्होत्रा, दीपक डोबरीयाल के साथ ही इस लिस्ट में मनु ऋषि का नाम आता है.

’तेरे बिन लादेन’ के स्मार्ट आइडिया में ’इश्किया’ के भदेस की छौंक है ’फंस गए रे ओबामा’. लेकिन इस दौर की कई अन्य सफल कॉमेडी फ़िल्मों की तरह निर्देशक सुभाष कपूर की ’फंस गए रे ओबामा’ सिर्फ़ एक चमत्कारिक आइडिया भर नहीं. सिर्फ़ आइडिया से आगे निर्देशक के पास बाकायदा पूरी कथा-संरचना है जो एक चेन-रिएक्शन की तरह आगे बढ़ती है. बहुत हद तक प्रत्याशित लेकिन मज़ेदार यह अनुभव दीवाली पर चलाए जाने वाले लड़ी-बम जैसा है. एनआरआई किरदार ओम शास्त्री (रजत कपूर) के दिमाग की उपज यह आइडिया पूरी फ़िल्म में एक के बाद एक अवतरित होती बड़ी मछली को टोपी की तरह पहनाया जाता है. पटकथा में आगे बढ़ने का यह एक साफ़ और सुरक्षित रास्ता है जिसे ’फंस गए रे ओबामा’ बड़े अच्छे तरीके से संभव बनाती है. इंटरवैल के ठीक पहले मुन्नी मैडम के रोल में एक ’ऑल वुमन’ गैंग लीड करती नेहा धूपिया आती हैं और मैं फ़िल्म के भविष्य को लेकर थोड़ा आशंकित होता हूँ. लेकिन इंटरवैल के बाद भी कमान मुख्य रूप से रजत कपूर और मनु ऋषि के सधे हुए हाथों में ही रहती है और मेरी आशंकाएं काफ़ी हद तक निराधार साबित होती हैं.

अच्छी बात यह है कि ’फंस गए रे ओबामा’ ऊपर उद्धृत दोनों ही फ़िल्मों का बेहतर लेती है और जहाँ पिछली फ़िल्मों ने गलती की उस हिस्से को छोड़ आगे बढ़ जाती है. इसीलिए उद्धृत दोनों फ़िल्मों की तरह ’फंस गए रे ओबामा’ का दूसरा भाग निराश नहीं करता और फ़िल्म को सम्पूर्णता देता है. कई बार ऐसा भी होता है कि यथार्थ फ़िल्म में खींची गई व्यंग्य की सीमा को पार करता दिखता है (जैसे बकरी की बलि वाले दृश्य में हत्या के तुरंत बाद मिनिस्टर साहब के चेहरे और कलाई पर खून लगा दिखाना) लेकिन फिर लगता है कि शायद इस सीमा को खींचकर लम्बी-और लम्बी बनाने वाला खुद हमारा वर्तमान नागर समाज है. फ़िल्म में भदेस का आलम यह है कि किडनैपिंग पर गए भाईसाहब के तीन गुर्गे खून करने से पहले गाड़ी में बैठे तबीयत से टट्टी और पाद की बातें करते दिखाए गए हैं. बाकायदा एक फ़िरौती जमा करने का दफ़्तर खुला है जहाँ संतोषजनक भावों पर फ़िरौती लेकर अगले एक साल तक की गारंटी के साथ पावती रसीद दी जाती है, सारा काम सरकारी स्तर पर पूरी लिखा-पढ़ी के साथ. शुक्र है कि फ़िल्म के डॉयलॉग इंस्टैंट कॉफ़ी नहीं हैं, हँसने से पहले क्षण भर रुकने की, समझने की मोहलत देते हैं. आप उस दृश्य को भूल नहीं सकते जहाँ हिन्दुस्तान के एक पहाड़ी कस्बे के कुछ टटपूँजिए किडनैपर हाथ पर हाथ धरे दुनिया का महानतम नारा दोहरा रहे हैं, “yes we can, yes we can, yes we can!”

संजय मिश्रा के फ़ैन हम पहले से हैं. इस तरह के रोल वे आँख बन्द कर भी निभाएं तो निकाल ले जायेंगे.  ब्रिजेन्द्र काला फिर एक  बार मेरा दिल जीत लेते हैं. हाँ अमोल गुप्ते ज़रूर यथार्थ की अति के चलते कुछ मिसफ़िट किरदार से लगते हैं फ़िल्म में. और मुन्नी उन तमाम कार्यकलापों के दौरान ’मिट्टी के माधव’ सा वो क्या बनाती/बिगाड़ती रहीं मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा. फिर भी फ़िल्म के असली हीरो हैं अन्नी की हरदिल अज़ीज़ भूमिका में मेरे नायक मनु ऋषि. उनका और सदुपयोग कर पाए हमारा यह नामुराद हिन्दी सिनेमा इसी कामना के साथ फ़िल्म देखने की सिफ़ारिशी चिठ्ठी साथ नत्थी है.

ख़रगोश

‘ख़रगोश’ एक अद्भुत चाक्षुक अनुभव है. मुख्यधारा के सिनेमा से अलग, बहुत दिनों बाद इस फ़िल्म को देखते हुए आप परदे पर निर्मित होते वातावरण का रूप, रंग, गंध महसूस करते हैं. इसकी वजह है फ़िल्म बेहतरीन कैमरावर्क और पाश्वसंगीत. निर्देशक परेश कामदार की बनाई फ़िल्म ’ख़रगोश’ कथाकार प्रियंवद की एक हिन्दी कहानी पर आधारित है. काम इच्छाओं की किशोर जीवन में पहली आमद का एक व्यक्तिगत दस्तावेज़. जैसा परेश कामदार अपने निर्देशकीय वक्तव्य में लिखते हैं,

“ख़रगोश एक दस साला लड़के के साथ ऐसा सफ़र है जिसमें वह इंद्रियबोध के नए बियाबान में कदम रख रहा है. कहीं यह कथा कामना के भंवर से उपजे तनावों की भी बात करती है. सिनेमाई भाषा के संदर्भ में यह एक ’सादा कविता’ जैसी है. कथा के भौतिक वातावरण में से उठाए चित्र और ध्वनियाँ एक ऐसा अनुभव संसार रचते हैं जो लड़के के अनुभव की जटिलता और आवेग हमारे सामने खोलता है.”

कहानी के केन्द्र में है बंटू, एक दल साल का लड़का, याने हमारा कथानायक. उसकी दुनिया घर, स्कूल, माँ के चूल्हे की रोटियों, कटपुतली वाले के तमाशे के बीच फैली है. उस फ़ीके से कस्बाई माहौल में, बंटू के घर और स्कूल के बीच के अनमने चक्करों के बीच उसके सबसे अच्छे साथी हैं अवनीश भैया. वो उनके साथ पतंग उड़ाता है. एक दिन बंटू भैया उसे अपने साथ बाज़ार ले जाते हैं. बंटू उनकी आवेगभरी प्रेम-कहानी का अकेला गवाह है. उनके संदेसे लाना, चिठ्ठियाँ पहुँचाना, मिलने के अवसरों को सुलभ बनाना बंटू को उत्सुक्ता से भर देता है.

लेकिन बंटू भी उमर के नाज़ुक दौर में है. केवल संदेसेवाला बने रह जाना उसे अख़रने लगता है. किशोरमन अब अवनीश में दोस्त और बड़े भाई की जगह प्रतिद्वंद्वी देखने लगा है. वो इस प्रेम-कहानी का एक सहायक किरदार नहीं, कथानायक होना चाहता है. एक विचारोत्तेजक अंत में परेश हमें किशोरमन के अनछुए पहलुओं से परिचित कराते हैं. ये ऐसे अंधेरे कोने हैं जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने कम ही छुआ है. ’ख़रगोश’ चाक्षुक बिम्बों और रेखांकित करने योग्य घ्वनि संकेतों द्वारा किशोर मन के नितांत व्यक्तिगत अनुभवों से तैयार हुआ एक विहंगम कोलाज रचती है.

’नैनीताल फ़िल्म उत्सव’ की स्मारिका के लिए लिखा गया ’ख़रगोश’ फ़िल्म का परिचय.

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फ़िल्म की सफ़लता को हम कैसे आँकें?

IMG_3401अभिनव कश्यप की सलमान ख़ान स्टारर ’दबंग’ की रिकॉर्डतोड़ बॉक्स-ऑफ़िस सफ़लता की ख़बरों के बीच यह सवाल अचानक फिर प्रासंगिक हो उठा है कि आखिर किसे हम ’सुपरहिट फ़िल्म’ कहें? बाज़ार में खबरें हैं कि ’दबंग’ ने ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के रिकॉर्ड्स को भी पीछे छोड़ दिया है और सबूत के तौर पर फ़िल्म के शुरुआती दो-तीन दिन के बॉक्स-ऑफ़िस कमाई के आंकड़े दिखाए जा रहे हैं. यहाँ यह भी एक सवाल है कि सिनेमा के लिए एक ’युनिवर्सल हिट’ के क्या मायने होते हैं? क्या सबसे ज़्यादा पैसा कमाने वाली फ़िल्म ही सबसे बड़ी फ़िल्म है? या उसके लिए फ़िल्म का एक विशाल जनसमूह की साझा स्मृतियों का हिस्सा बनना भी ज़रूरी माना जाना चाहिए? वक़्त भी एक कसौटी होता है और किसी फ़िल्म का सफ़ल होना वक़्त की कसौटी पर भी कसा जाना चाहिए या नहीं?

हिन्दी सिनेमा इस बहु सँस्कृतियों से मिलकर बनते समाज को एक धागे में पिरोने का काम सालों से करता आया है. और इस ख़ासियत को हमेशा उसकी एक सकारात्मक उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया है. पचास का दशक हिन्दी सिनेमा का वो सुनहरा दशक है जहाँ इसने कई सबसे बेहतरीन फ़िल्मों को बड़ी ’युनिवर्सल हिट’ बनते देखा. ’मुगल-ए-आज़म’ जैसी फ़िल्म अपने दौर की सबसे महंगी फ़िल्म होने के साथ-साथ एक कलाकृति के रूप में भी सिनेमा इतिहास में अमर है. ’मदर इंडिया’ से लेकर ’गाइड’ तक कई मुख्यधारा की फ़िल्मों ने देखनेवाले पर अमिट प्रभाव छोड़ा. सत्तर के दशक का ’एंग्री यंग मैन’ नायक भी समाज के असंतोष से उपजा था और एक बड़े समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता था. लेकिन अस्सी का दशक ख़त्म होते न होते हिन्दी सिनेमा की यह ’युनिवर्सल अपील’ बिखरने लगती है.

समांतर सिनेमा ने अपनी राह उस दौर में बनाई जब हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा सस्ती लोकप्रियता की गर्त में जा रही थी. यहीं कुछ फ़िल्मकार ऐसी फ़िल्में बनाने लगे जिनकी भव्यता विदेशों में बसे भारतीय को आकर्षित करती. दर्शक की पहचान बदल रही थी, उसके साथ ही सिनेमा की ’युनिवर्सल अपील’ बदल रही थी. नब्बे के दशक में आई मल्टीप्लैक्स कल्चर ने अनुभव को और बदला. अब सिनेमा ’सबका, सबके लिए’ न रहकर ज़्यादा पर्सनल, ज़्यादा एक्सक्लूसिव होता गया. लेकिन बाद के सालों में इसी और ज़्यादा क्लासीफ़ाइड होते जा रहे सिनेमा में से कुछ अनोखे फ़िल्मकारों ने बेहतर सिनेमा के लिए रास्ता भी निकाला. विशाल भारद्वाज ने ’मक़बूल’ बनाई और अनुराग कश्यप ने ’ब्लैक फ़्राइडे’. आज के समय में सिर्फ़ पैसे के बलबूते नापकर किसी फ़िल्म को ’युनिवर्सल हिट’ का दर्जा देना तो सिक्के का सिर्फ़ एक पहलू देखना हुआ. ’थ्री ईडियट्स’ से कहीं कम पैसा कमाने के बाद भी राजकुमार हिरानी की ही ’लगे रहो मुन्नाभाई’ कहीं बड़ी फ़िल्म है क्योंकि उसका असर ज़्यादा दूर तक जाने वाला है. ’गज़नी’ कुछ साल बाद भुला दी जाएगी लेकिन ’खोसला का घोंसला’ को हम याद रखेंगे.

आज फ़िल्म की सफ़लता नापने के पैमाने सिरे से बदल गए हैं. नए उभरते बाज़ार में नया सूत्र यह है कि फ़िल्म रिलीज़ होने के पहले तीन दिन में ही अधिकतम पैसा वसूल लिया जाए. आक्रामक प्रचार और बहुत सारे प्रिंट्स के साथ फ़िल्म रिलीज़ कर इस उद्देश्य को हासिल किया जाता है. यह बड़ी पूंजी के साथ बनी फ़िल्मों के लिए फ़ायदे का सौदा है, ज़्यादा माध्यमों द्वारा प्रचार का सीधा मतलब है शुरुआती सप्ताहांत में टिकट खिड़की पर ज़्यादा भीड़. यहाँ तक कि फ़िल्म से जुड़े तमाम तरह के विवाद भी इस शुरुआती प्रचार में भूमिका निभाते हैं. इसके बरक़्स उच्च गुणवत्ता वाली ऐसी फ़िल्में जो ’माउथ-टू-माउथ’ पब्लिसिटी पर ज़्यादा निर्भर हैं, इस व्यवस्था में घाटे में रहती हैं. ’दबंग’ एडवांस में हाउसफ़ुल के साथ रिलीज़ होती है वहीं ’अन्तरद्वंद्व’ जैसी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म गिने-चुने सिनेमाघरों में लगकर भी दर्शकों को तरसती है. हमें अपनी ’युनिवर्सल हिट’ की परिभाषा पर फिर से विचार करना चाहिए. अकूत पैसा कमाना ही अकेली कसौटी न हो, बल्कि वह फ़िल्म देखनेवाले की स्मृति का हिस्सा बने. यह बड़ी सफ़लता है.

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मूलत: नवभारत टाइम्स के रविवारीय कॉलम ’रोशनदान’ में उन्नीस सितंबर को प्रकाशित.

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

peepli live posterशाहरुख़ ख़ान और अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारों को ’आम आदमी’ कहकर देखते-दिखाते हिन्दी सिनेमा में बरस बीते. इन्हीं सितारों की चकाचौंध में पहले हिन्दी सिनेमा से गाँव गायब हुआ और उसके साथ ही खेती-किसानी की तमाम बातें. मल्टीप्लैक्स के आगमन के साथ सिनेमा देखने के दाम इतने बढ़े कि हमारा मुख्यधारा का सिनेमा इस महादेश के गाँवों और छोटे कस्बों में रहने वाले असल ’आम इंसान’ से और दूर होता गया. देखिए, जिस समय में हम जी रहे हैं ’पीपली लाइव’ जैसी फ़िल्म का होना एक घटना है. यह फ़िल्म बेहतरीन कास्टिंग का उदाहरण है. जैसे सिनेमा से निष्कासित ’आम आदमी’ अपना हक़, अपना हिस्सा माँगने खुद सिनेमा के परदे पर चला आया है. सिनेमा के पटल पर अन-पहचाने लेकिन बरसों के अनुभवी दसियों कलाकार जैसे एक साथ आते हैं और ’पीपली लाइव’ को एक हंगामाखेज़ अनुभव बना देते हैं.

एक रघुवीर यादव और नसीरुद्दीन शाह को छोड़कर यहाँ नए कलाकारों की पूरी फ़ौज है. हिन्दी सिनेमा से ’आम आदमी’ के निष्कासित होने का रोना रोते मेरे जैसे बहुत से आलोचक ’पीपली लाइव’ देखकर हतप्रभ हैं. फ़िल्म में ’नत्था’ की मुख्य भूमिका निभाने वाले ओंकार दास माणिकपुरी को शायद अब तक आप उनके छोटे परदे पर हुए तमाम साक्षात्कारों द्वारा पहचान चुके होंगे. लगता है जैसे ’नत्था’ के रूप में हिन्दुस्तान के सुदूर हाशिए पर छूटा ’आम आदमी’ मुख्यधारा में अपनी दावेदारी जताने चला आया है. लेकिन उनके अलावा मंझे हुए कलाकारों की पूरी फ़ौज दिखाई देती है ’पीपली लाइव’ में जिन्हें आप सिनेमा के परदे पर इस तरह पहली बार देख रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर हबीब तनवीर के थियेटर ग्रुप ’नया थियेटर’ के स्थापित कलाकार हैं जो अपने फ़न के माहिर हैं. इनमें से बहुत से कलाकार ऐसे हैं जिनके नाम आपको पूरा दिन गूगल खँगालने के बावजूद हासिल नहीं होंगे. इसलिए यह और ज़रूरी है कि इन सभी रत्नों की नाम लेकर तारीफ़ की जाए. तारीफ़ कीजिए ’धनिया’ की भूमिका निभाने वाली शालिनी वत्स की. गाँव की कामकाजी औरत की जिजीविषा को जे.एन.यू. में पढ़ी शालिनी ने परदे पर बखूबी साकार किया है. और अम्मा की भूमिका में फ़ारुख़ ज़फ़र ने पूरा मुशायरा लूट लिया है. टीवी रिपोर्टर ’कुमार दीपक’ बने विशाल शर्मा अपनी भूमिका और उसमें छिपे व्यंग्य के लिए चहुँओर तारीफ़ पा रहे हैं.

तारीफ़ कीजिए लोकल थानेदार बने अनूप त्रिवेदी की जो फ़िल्म में अपने ख़ालिस मुहावरे खींचकर मारते थे बुधिया और नत्था के मुंह पर. अनूप एन.एस.डी रिपर्टरी के प्रॉडक्ट हैं. और फ़िल्म में दलित नेता पप्पूलाल का किरदार इतनी प्रामाणिकता से निभाने वाले रविलाल सांगरे को कौन भूल सकता है. रविलाल भी हमें ’नया थियेटर’ की देन हैं. मुझे ख़ासतौर पर नत्था को सरकारी योजना के तहत ’लालबहाद्दुर’ देने आए बी.डी.ओ. दत्ता सोनवने तथा नत्था के दोस्त ’गोपी’ बने खड़ग राम याद रहेंगे. जिस तरह खड़ग राम मीडिया के सामने वो ’आत्मा बहुते घबड़ाए रही है’ बोलते हैं, मैं तो उनपर फ़िदा हो गया.

विशेष उल्लेख ’होरी महतो’ की भूमिका में फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण रोल निभाने वाले एल. एन. मालवीय का. आपको हिन्दी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कितने किरदार याद हैं जिनका फ़िल्म में सिर्फ़ एक ही संवाद हो लेकिन वो एक ही संवाद बरसों तक आपके स्मृति पटल पर अंकित रहे? ’होरी महतो’ के उस एक संवाद का असर कुछ ऐसा ही होता है दर्शक पर. और ’राकेश’ की भूमिका में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी एक बार फ़िर चमत्कारिक है. उनका चेहरा जैसे आईना है, उनके मन की सारी दुविधाएं उनका चेहरा बयाँ करता है.

’पीपली लाइव’ देखकर प्रेमचंद की याद आती है. हिन्दी के इस महानतम कथाकार की रचनाओं का सा विवेक और वही साफ़ दृष्टि ’पीपली लाइव’ की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है. फ़िल्म के निर्देशक अनुषा रिज़वी और महमूद फ़ारुकी बधाई के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने बाज़ार के दबाव के आगे अपनी फ़िल्म की प्रामाणिकता से समझौता नहीं किया. और आमिर का भी शुक्रिया इस असंभव प्रोजेक्ट को संभव बनाने के लिए.

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रविवार के ’नवभारत टाइम्स’ के कॉलम ’रोशनदान’ के लिए लिखा गया. बाइस अगस्त को प्रकाशित.

The ugliness of the indian male : Udaan

Udaan wallpaperअगर आप भी मेरी तरह ’तहलका’ के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ’स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज़ ऑन इंडियन मैन’ नाम की उस सीरीज़ पर ज़रूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ़्ते के अंतर से आती है और किसी ख़ास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिन्दुस्तानी मर्द का एक रफ़ सा, थोड़ा मज़ाकिया ख़ाका हमारे सामने खींचती है. वो बाहरी पहचानों से मिलाकर एक स्कैच तैयार करती है, मैं भीतर की बात करता हूँ… ’हिन्दुस्तानी मर्द’. आखिर क्या अर्थ होते हैं एक ’हिन्दुस्तानी मर्द’ होने के? क्या अर्थ होते हैं अपनी याद्दाश्त की शुरुआत से उस मानसिकता, उस सोच को जीने के जिसे एक हिन्दुस्तानी मर्द इस समाज से विरासत में पाता है. सोचिए तो, हमने इस पर कितनी कम बात की है.


सही है, इस पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री होना एक सतत चलती लड़ाई है, एक असमाप्त संघर्ष. और हमने इस निहायत ज़रूरी संघर्ष पर काफ़ी बातें भी की हैं. लेकिन क्या हमने कभी इस पर बात की है कि इस पुरुषसत्तात्मक समाज में एक पुरुष होना कैसा अनुभव है? और ख़ास तौर पर तब जब वक़्त के एक ख़ास पड़ाव पर आकर वो पुरुष महसूस करे कि इस निहायत ही एकतरफ़ा व्यवस्था के परिणाम उसे भी भीतर से खोखला कर रहे हैं, उसे भी इस असमानता की दीवार के उस तरफ़ होना चाहिए. इंसानी गुणों का लिंग के आधार पर बँटवारा करती इस व्यवस्था ने उससे भी बहुत सारे विकल्प छीन लिए हैं. क्या कोई कहेगा कि जैसे बचपन में एक लड़की के हाथ में गुड़िया दिया जाना उसके मूल चुनाव के अधिकार का हनन है ठीक वैसे ही लड़के के हाथ में दी गई बंदूक भी अंतत: उसे अधूरा ही करती है.


और फिर ’उड़ान’ आती है.


जैसी ’आम राय’ बनाई जा रही है, मैं उसे नकारता हूँ. ’उड़ान’ पीढ़ियों के अंतर (जैनरेशन गैप) के बारे में नहीं है. यह एक ज़ालिम, कायदे के पक्के, परंपरावादी पिता और अपने मन की उड़ान भरने को तैयार बैठे उसके लड़के के बीच पनपे स्वाभाविक तनाव की कहानी नहीं है जैसा इसका प्रचार संकेत करता रहा. किसी भी महिला की सक्रिय उपस्थिति से रहित यह फ़िल्म मेरे लिए एक नकार है, नकार लड़कपन की दहलीज़ पर खड़े एक लड़के का उस मर्दवादी अवधारणा को जिसे हमारा समाज एक नायकीय आवरण पहनाकर सदियों से तमाम लोकप्रिय अभिव्यक्ति माध्यमों में बेचता आया है. नकार उस खंडित विरासत का जिसे लेकर उत्तर भारत का हर औसत लड़का पैदा होता है. विरासत जो कहती है कि वीरता पुरुषों की जागीर है और सदा पवित्र बने रहना स्त्रियों का गहना. पैसा कमाकर लाना पुरुषों का काम है और घर सम्भालना स्त्रियों की ज़िम्मेवारी.


उड़ान एक सफ़र है. निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने के रचे किरदार, सत्रह साल के एक लड़के ’रोहन’ का सफ़र. जिसे त्रिआयामी बनाते हैं फ़िल्म में मौजूद दो और पुरुष किरदार, ’भैरव सिंह’ और ’अर्जुन’. शुरुआत से नोटिस कीजिए. जैसे भैरव सिंह रोहन पर अपना दबदबा स्थापित करते हैं ठीक वैसे ही रोहन सिंह अर्जुन पर अपना दबदबा स्थापित करता है. अर्जुन के घर की सीढ़ियों पर बार-बार ऊपर नीचे होने के वो दृश्य कौन भूल सकता है. वो अभी छोटा है, दो ’मर्दों’ के बीच अपनी मर्दानगी दिखाने का ज़रिया, एक शटल-कॉक. बेटा सीढ़ियों पर बैठा अपने पिता को इंतज़ार करवाता है और पिता अपने हिस्से की मर्दानगी भरा गुस्सा दिखाता उन्हें पीछे छोड़ अकेला ही गाड़ी ले जाता है. नतीजा, बेचारा बीमार अर्जुन पैदल स्कूल जाता है. रास्ते में वो रोहन का हाथ थामने की कोशिश करता है. वो अकेला बच्चा सिर्फ़ एक नर्म-मुलायम अहसास की तलाश में है. लेकिन रोहन कोई उसकी ’माँ’ तो नहीं, वो उसे झिड़क देता है.


लेकिन फिर धीरे से किरदार का ग्राफ़ घूमने लगता है. जहाँ एक ओर भैरव सिंह अब एक खेली हुई बाज़ी हैं, तमाम संभावनाओं से चुके, वहीं रोहन में अभी अपार संभावनाएं बाक़ी हैं. इस लड़के की ’एड़ी अभी कच्ची है’. बदलाव का पहिया घूमने लगता है. हम एक मुख़र मौन दृश्य में रोहन और अर्जुन के किरदारों को ठीक एक सी परिस्थिति में खड़ा पाते हैं. शायद फ़िल्म पहली बार वहीं हमें यह अहसास करवाती है. अर्जुन का किरदार अनजाने में ही रोहन के भीतर छिपे उस ज़रा से ’भैरव सिंह’ को हमारे सामने ले आता है जिसे एक भरा-पूरा ’भैरव सिंह’ बनने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगने वाला. लेकिन शायद तभी… किसी अदृश्य कोने में छिपा रोहन भी ये दृश्य देख लेता है.


चक्का घूम रहा है. रोहन लगातार तीन दिन तक अर्जुन की तीमारदारी करता है. उसे कविताएँ सुनाता है. उसके लिए नई-नई कहानियाँ गढ़ता है. उसे अपना प्यारा खिलौना देता है और खूब सारी किताबें भी. उससे दोस्तों के किस्से सुनता है, उसे दोस्तों के किस्से सुनाता है. उसके बदन पर जब चमड़े की मार के निशान देखता है तो पलटकर बच्चे से कोई सवाल नहीं करता. सवाल मारनेवाले से करता है और तनकर-डटकर करता है. पहचानिए, यह वही रोहन है जो ’कोई उसकी माँ तो नहीं’ था.


मध्यांतर के ठीक पहले एक लम्बे और महत्वपूर्ण दृश्य में भैरव सिंह रोहन को धिक्कारता है, धिक्कारता है बार-बार ’लड़की-लड़की’ कहकर. धिक्कारता है ये कहकर कि ’थू है, एक बार सेक्स भी नहीं किया.’ यह भैरव सिंह के शब्दकोश की गालियाँ हैं. एक ’मर्द’ की दूसरे ’मर्द’ को दी गई गालियाँ. लेकिन हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा की उम्मीदों से उलट, फ़िल्म का अंत दो और दो जोड़कर चार नहीं बनाता. रोहन इन गालियों का जवाब क्लाइमैक्स में कोई ’मर्दों’ वाला काम कर नहीं देता. या शायद यह कहना ज़्यादा अच्छा हो कि उसके काम को ’असली मर्दों’ वाला काम कहना उसके आयाम को कहीं छोटा करना होगा.


एक विशुद्ध काव्यात्मक अंत की तलाश में भटकती फ़िल्मों वाली इंडस्ट्री से होने के नाते तो उड़ान को वहीं ख़त्म हो जाना चाहिए था जहाँ अंतत: रोहन के सब्र का बाँध टूट जाता है. वो पलटकर अपने पिता को उन्हीं की भाषा में जवाब देता है. और फिर एक अत्यंत नाटकीय घटनाक्रम में उन्हें उस ’जैसे-सदियों-से-चली-आती-खानदानी-दौड़’ में हराता हुआ उनकी पकड़ से बचकर दूर निकल जाता है.


udaan wallpaperलेकिन नहीं, ऐसा नहीं होता. फ़िल्म का अंत यह नहीं है, हो भी नहीं सकता. रोहन वापस लौटता है. ठीक अंत से पहले, पहली बार फ़िल्म में एक स्त्री के होने की आहट है. वो स्त्री जिसका अक़्स पूरी फ़िल्म में मौजूद रहा. पहली बार उस स्त्री का चेहरा दिखाई देता है. वो स्त्री जो रोहन के भीतर मौजूद है. अंत जो हमें याद दिलाता है कि हर हिन्दुस्तानी मर्द के DNA का आधा हिस्सा उसे एक स्त्री से मिलता है. और ’मर्दानगी’ की हर अवधारणा उस भीतर बसी स्त्री की हत्या पर निर्मित होती है. यह अंत उस स्त्री की उपस्थिति का स्वीकार है. न केवल स्वीकार है बल्कि एक उत्सवगान है. क्या आपको याद है फ़िल्म का वो प्रसंग जहाँ अर्जुन और रोहन अपनी माँओं के बारे में बात करते हैं. रोहन उसे बताता है कि मम्मी के पास से बहुत अच्छी खुशबू आती थी, बिलकुल मम्मी वाली. अर्जुन उस अहसास से महरूम है, उसने अपनी माँ को नहीं देखा.


हमें पता नहीं कि रोहन ने उन तसवीरों में क्या देखा. लेकिन अब हम जानते हैं कि रोहन वापस आता है और अर्जुन को अपने साथ ले जाता है. उस रौबीली शुरुआत से जहाँ रोहन ने अर्जुन से बात ही ’सुन बे छछूंदर’ कहकर की थी, इस ’माँ’ की भूमिका में हुई तार्किक परिणिति तक, रोहन के लिए चक्का पूरा घूम गया है. एक लड़के ने अपने भीतर छिपी उस ’स्त्री’ को पहचान लिया जिसके बिना हर मर्द का ’मर्द’ होना कोरा है, अधूरा है. फ़िल्म के अंतिम दृश्य में रास्ता पार करते हुए रोहन अर्जुन का हाथ थाम लेता है. गौर कीजिए, इस स्पर्श में दोस्ती का साथ है, बराबरी है. बड़प्पन का रौब और दबदबा नहीं.


अंत में रोहन की भैरव सिंह को लिखी वो चिठ्ठी बहुत महत्वपूर्ण है. आपने गौर किया – वो अर्जुन को अपने साथ ले जाने की वजह ये नहीं लिखता कि “नहीं तो आप उसे मार डालेंगे”, जैसा स्वाभाविक तौर पर उसे लिखना चाहिए. वो लिखता है कि “नहीं तो आप उसे भी अपने जैसा ही बना देंगे. और इस दुनिया में एक ही भैरव सिंह काफ़ी हैं, दूसरा बहुत हो जाएगा.” क्या आपने सोचा कि वो ऐसा क्यों लिखता है? दरअसल खुद उसने अभी-अभी, शायद सिर्फ़ एक ही रात पहले वो लड़ाई जीती है. ’वो लड़ाई’… ’भैरव सिंह’ न होने की लड़ाई. अब वो फ़ैंस के दूसरी तरफ़ खड़ा होकर उस किरदार को बहुत अच्छी तरह समझ पा रहा है जो शायद कल को वो खुद भी हो सकता था, लेकिन जिसे उसने नकार दिया. वो अर्जुन को एक भरपूर बचपन देगा. जैसा शायद उसे मिलना चाहिए था. और बीते कल में शायद कहीं भैरव सिंह को भी.


udaan wallpaper1रोहन उस चिठ्ठी के साथ वो खानदानी घड़ी भी भैरव सिंह को लौटा जाता है. परिवार के एक मुखिया पुरुष से दूसरे मुखिया पुरुष के पास पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचती ऐसी अमानतों का वो वारिस नहीं होना चाहता. यह उसकी परंपरा नहीं. होनी भी नहीं चाहिए. यह उसका अंदाज़ है इस पुरुषवर्चस्व वाली व्यवस्था को नकारने का. वो और उसकी पीढ़ी अपने लिए रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ेगी. ऐसे रिश्ते जिनमें संबंधों का धरातल बराबरी का होगा.


किसी भी महिला किरदार की सचेत अनुपस्थिति से पूरी हुई उड़ान हमारे समय की सबसे फ़िमिनिस्ट फ़िल्म है. अनुराग कश्यप की पिछ्ली फ़िल्म ’देव डी’ के बारे में लिखते हुए मैंने यह कहा था – दरअसल मेरे जैसे (उत्तर भारत के भी किसी शहर, गाँव कस्बे के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास से निकलकर आया) हर लड़के की असल लड़ाई तो अपने ही भीतर कहीं छिपे ’देवदास’ से है. अगर हम इस दुनिया की बाकी आधी आबादी से बराबरी का रिश्ता चाहते हैं तो पहले हमें अपने भीतर के उस ’देवदास’ को हराना होगा जिसे अपनी बेख़्याली में यह अहसास नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था कहीं और से नहीं, उसकी सोच से शुरु होती है. ’उड़ान’ के रोहन के साथ हम इस पूरे सफ़र को जीते हैं. यह एक त्रिआयामी सफ़र है जिसके एक सिरे पर भैरव सिंह खड़े हैं और दूसरे पर एक मासूम सा बच्चा. रोहन के ’भैरव सिंह’ होने से इनकार में दरअसल एक स्वीकार छिपा है. स्वीकार उस आधी आबादी के साथ समानता के रिश्ते की शुरुआत का जिससे रोहन भविष्य के किसी मोड़ पर टकराएगा.


और सिर्फ़ रोहन ही क्यों. जैसा मैंने पहले लिखा था, “उड़ान हमारे वक़्तों की फ़िल्म है. आज जब हम अपने-अपने चरागाहों की तलाश में निकलने को तैयार खड़े हैं, ’उड़ान’ वो तावीज़ है जिसे हमें अपने बाज़ू पर बाँधकर ले जाना होगा. याद रखना होगा.” ठीक, याद रखना कि हम सबके भीतर कहीं एक ’लड़की’ है, और उसे कभी मिटने नहीं देना है.

सात फ़िल्में, सात संस्कार

सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, कोई एक ही बात, कोई एक नुस्खा असर कर जाए. पिछले सालों में आई ऐसी ही कुछ फ़िल्में और उनकी वजह से समाज में आया बदलाव इस बार हमारी नज़र में है. सात अलग-अलग फ़िल्मों के ज़रिए हम उन सात संस्कारों को समझने की कोशिश करेंगे जिनके समाज में आगमन के पीछे कहीं इन्हीं फ़िल्मों से निकली कोई बात, कोई घटना, कोई विचार था.


कैन्डल लाइट मार्च

(रंग दे बसंती)

rang de basantiकोई फ़िल्म कैसे एक फ़िनोमिना में बदल जाती है, ’रंग दे बसंती’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. ’रंग दे बसंती’ का होना शहरी युवा वर्ग के लिए एक बड़ी घटना थी. लम्बे समय बाद किसी फ़िल्म का ऐसा प्रभाव देखा गया कि उसे आधार बनाकर लोग अपने आस-पास के माहौल को बदलने का प्रयास शुरु कर दें. शहरी युवा वर्ग में कैन्डल लाइट मार्च विरोध के एक सर्वमान्य तरीके के रूप में उभरा. आखिर यह शहरी युवा को न्याय की मांग से जुड़ने का मौका उपलब्ध कर रहा था. जेसिका लाल हत्याकांड से लेकर रुचिका की आत्महत्या के मामले तक इस माध्यम से न्याय की आवाज़ बुलन्द की गई. हालांकि बाद के दिनों में इस ’कैन्डल लाइट मार्च’ की बार-बार पुनरावृत्ति पर इसकी आलोचना भी हुई और इसे ’भद्रजनों की कैन्डल लाइट मार्च पार्टी’ जैसे नाम भी दिए गए.

विरोध के इन तरीकों से अलग ’रंग दे बसंती’ भ्रष्टाचार की समस्या के खिलाफ़ आम युवा में जागरुकता लाई. बहुत से लोग सत्येन्द्र दुबे और मंजुनाथ जैसे नायकों की कुर्बानी के आलोक में इस फ़िल्म के असर का विश्लेषण करते हैं. युवा ने सवाल करना सीखा. आज हमारे पास भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो ’सूचना के अधिकार’ जैसा हथियार है उसे हासिल करने के पीछे एक लम्बा जन आन्दोलन है. ’रंग दे बसंती’ ने इस चेतना को समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलवाने में मदद की.


बच्चे मन के सच्चे

(तारे ज़मीन पर)

taare zameen parएक जोड़ा पति-पत्नी (अमोल गुप्ते और दीपा भाटिया) की लिखी एक छोटी सी कहानी से शुरु हुआ इस फ़िल्म का सफ़र कई आयामों से होता हुआ गुज़रा. सचेत अभिनेता आमिर ख़ान ने इसे इसके मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाया. लेकिन जिस तरह यह फ़िल्म हमारे समाज के सबसे मुलायम और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से – ’बच्चे’ के मन की गहराईयों को हमारे सामने लाई, यह देखना एक विहंगम अनुभव था. सिर्फ़ एक डिस्लेक्सिया रोग के प्रति चेतना की ही बात नहीं, इस फ़िल्म ने हमारे समाज को अपनी नई पौध को देखने और उनके हुनर को पहचानने का नया नज़रिया दिया. ’तारे ज़मीन पर’ ने माता-पिताओं को उनकी ही उम्मीदों के बोझ तले दबे, अपनी पहचान तलाशते उनके बच्चों से फिर से मिलवा दिया.

यह स्कूली शिक्षा के बारे में भी एक सबक था. आने वाले दौर में कई स्कूलों ने अध्यापन में नई और रचनात्मक तकनीकों को शामिल किया और पढ़ाई को बच्चे के लिए और मज़ेदार बनाया. बस्ते का बोझ कम करने के लिए बहुत से सकारात्मक प्रयास हुए. एन.सी.ई.आर.टी. ने प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति की शिफ़ारिशों को लागू करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण  का नया मसौदा तैयार किया. बेशक यह सारे परिवर्तन एक फ़िल्म की वजह से नहीं आए हों लेकिन ’तारे ज़मीन पर’ का सकारात्मक योगदान भुलाया नहीं जा सकता.


जादू की झप्पी

(मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.)

munnabhai MBBSऐसा नहीं कि हम हिन्दुस्तानियों ने गहक कर गले मिलना मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. से सीखा है. वो तो हमारी संस्कृति में पहले से शामिल रहा है. और यूँ भी मेरी पीढ़ी को आत्म-अभिव्यक्ति की शारीरिक भंगिमाएं पसन्द रही हैं. आख़िर किसी वजह के चलते ही अपनी देह-भाषा से स्वयं को अभिव्यक्त करने वाला नायक शाहरुख़ ख़ान हमारे दौर का सबसे बड़ा नायक हुआ होगा. लेकिन इस शहर की धकमपेल में हम उस अहसास को कहीं भूल गए थे. और यही करते हैं राजू हिरानी हर बार – हमारे लिए सबसे कीमती अहसास, हमें मिलीं नेमतें जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं, वे हमें फिर से याद दिला देते हैं. ’मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस’ से निकली ’जादू की झप्पी’ ने पूरे समाज में तेज़ी से अपनी जगह बनाई और मुन्नाभाई-सर्किट एक ही झटके में घर-घर में पहचाना नाम हो गए.

’मुन्नाभाई एम.बी,बी.एस.’ न सिर्फ़ मशीन सी दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगी में सुकून की तलाश के विचार से निकली थी बल्कि वो उन बहुत से विचारों को अपने गुलदस्ते में इकट्ठा कर लाई थी जिन्हें पिछले दिनों में हम बहुत मिस कर रहे थे. दोस्ती एक ऐसा ही विचार था. मुन्ना-सर्किट की दोस्ती का पाठ ऐसा ही एक विचार था. ’जादू की झप्पी’ एक ऐसा ही विचार बनकर उभरा जिसमें बराबरी का भाव प्रधान था. कभी वो किसी टूटे दिल को दिलासा था तो कभी किसी बड़ी खुशी का जश्न. हमेशा इस एक एक्ट ने लोगों को ही नहीं दिलों को भी आपस में जोड़ा है.


गांधीगिरी

(लगे रहो मुन्नाभाई)

Lage_Raho_Munna_Bhai-Gandhiक्या आपने कभी सोचा था कि अपने प्यार को पाने का सबसे अच्छा उपाय आपको गांधी जी से मिल सकता है? या शादी के लिए एक सही लड़का ढूंढ़ते हुए एक लड़की को गांधी जी की सीख सबसे ज़्यादा काम आ सकती है? या गांधी जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर की बरसों से अटकी पेंशन उन्हें दिलवा सकते हैं? नहीं ना. हमने भी नहीं सोचा था. लेकिन तभी सीन में राजू हीरानी आते हैं. फिर से एक मैजिकल मंत्र के साथ. आज़ाद भारत में गांधी को हमने एक ऊँचे आसन पर बिठा दिया था और उनकी बताई बातें भूल गए थे. गांधी इस तरह आम आदमी के सुख-दुख के साथी बन जायेंगे यह हमने सोचा ही कहाँ था.

लोगों ने गांधीगिरी का जमकर उपयोग किया. भ्रष्ट राजनीतिग्यों और नौकरशाहों को ’गेट वेल सून’ के कार्ड भेजे जाने लगे और असहयोग फिर से विरोध का मंत्र बन गया. लेकिन इन बड़े आडम्बरों से इतर भी ’गांधीगिरी’ आज की युवा पीढ़ी का गांधी के कुछ बेसिक आदर्शों से पहला परिचय था. आपसी संबंधों में सच बोलना कई बार कितना कारगर साबित हो सकता है यह गांधीगिरी का दिया नुस्खा था. हमने प्रेम में सच्चाई का महत्व समझा. हमने रिश्तों में ईमानदारी का महत्व समझा. और इतना भी कोई फ़िल्म सिखा दे तो क्या कम है.


आल इज़ वैल

(थ्री ईडियट्स)

3-idiotsहमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो? आखिर शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? ’थ्री ईडियट्स’ ने कुछ ऐसा किया कि यह वाजिब सवाल शिक्षाशास्त्रियों की बैठकों से निकलकर हमारे बीच आ गया. कुछ नई ज़िन्दगियाँ जो अपने सपनों के पीछे भागना तो चाहती थीं, लेकिन हिचक रही थीं. अचानक उन्हें समझ आया कि अपने सपनों के पीछे भागने में कोई जोखिम नहीं, दरअसल ज़िन्दगी जीने का यही सबसे सुरक्षित विकल्प है. बड़े ही मनोरंजक अंदाज में ’थ्री ईडियट्स’ हमें परेशानियों में बेफ़िकर रहने का मंत्र सिखाती रही. ’आल इज़ वैल’ नई पीढ़ी का मैजिक मंत्र बन गया.


अब मैं भी फ़िल्मकार!

(लव, सेक्स और धोखा)

जयपुर में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कहानीकार रामकुमार सिंह का कहना है कि डिजिटल सिनेमा ख़जाने की चाबी है. कल तक वे सिर्फ़ सिनेमा देखते थे, आज उन्होंने खुद अपनी फ़ीचर फ़िल्म बनाना शुरु कर दिया है. वजह – एक ’लव, सेक्स और धोखा’ हो सकती है तो और क्यों नहीं? अपने कथ्य से अलग, सिर्फ़ तकनीक के क्षेत्र में इस एक फ़िल्म ने मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री के सिस्टम को सीधी चुनौती दी है. बॉलीवुड का सिनेमा सालों से दो मुख्य स्तंभों पर खड़ा है, दो वजहें जिनकी वजह से फ़िल्म निर्माण बड़ी पूँजी का खेल बना हुआ है. एक बड़े स्टार जिनकी फ़ीस आसमान छूती है और दूसरा सिनेमा बनाने में आने वाला महँगा खर्चा. और इन्हीं दो वजहों से आम आदमी उसे देख-सराह तो पाता है लेकिन उसकी भीतर प्रवेश करना उसके लिए अब भी टेढ़ी खीर है.

love-sex-aur-dhokhaलेकिन ’लव, सेक्स और धोखा’ ने एक झटके में इन दोनों स्तंभों को हिला दिया है. पूरी तरह नई स्टार कास्ट और मूवी कैमरा के डिजिटल कैमरा में बदलते ही सारा खेल बदल जाता है. अब लोग अपने आप को कैमरे के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री हो या फ़ीचर फ़िल्म, सभी अब अचानक निर्माण में सर्व-सुलभ होने जा रही हैं. ’सिटीज़न जर्नलिस्ट’ जैसे कैम्पेन्स में आम नागरिक ने अपनी बात कहने के लिए खुद कैमरा उठा लिया है. इसी डिजिटल कैमरे की वजह से आज देश के दूर-दराज़ इलाकों से चमत्कारिक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में सामने आ रही हैं. अनुराग कश्यप अपनी अगली फ़िल्म ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ इसी फ़ॉरमैट में शूट कर रहे हैं और अनेक नए फ़िल्मकार इस माध्यम में अपने लिए शुरुआत का सबसे अच्छा रास्ता तलाश रहे हैं. जल्द ही सिनेमा बनाने का संस्कार बदलने वाला है और ’लव, सेक्स और धोखा’ इसका शुरुआती इशारा भर है.


एंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट

(माई नेम इज़ ख़ान)

my-name-is-khanयह फ़िल्म अपनी रिलीज़ के पहले ही चर्चाओं में ऊपर पहुँच गई थी. फ़ेसबुक पर ’आई सपोर्ट एसआरके एंड रिलीज़ ऑफ़ एमएनआईके : ए स्टैन्ड अगेंस्ट शिव सेना’ जैसे ग्रुप्स बन गए और उनकी सदस्य संख्या हज़ारों में थी. शाहरुख़ इस देश के बड़े आइकन हैं. धार्मिक कट्टरवादिता और अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ उनका स्टैन्ड लेना बड़ी बात रही. हिन्दुस्तान में पब्लिक सेलिब्रिटीज़ का किसी विवाद के मुद्दे पर स्टैन्ड लेना चलन में नहीं रहा है. लेकिन पिछले एक-दो साल में कई बड़े सेलिब्रिटी अपने आप को सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे हैं. शाहरुख उनमें आगे हैं. बहुत से लोग अब भी विवाद के मुद्दों पर राय देने से बचते हैं. लेकिन कुछ तो बदला है, लोग अपनी राय जगज़ाहिर करने लगे हैं. और यह बदलाव है तो अच्छा बदलाव है.

अभिव्यक्ति के इन नए माध्यमों में ’माई नेम इज़ ख़ान’ को लेकर जितने अभियान चले, वो एक नई शुरुआत थी. इससे फ़िल्म निर्माताओं ने भी बहुत कुछ सीखा. अब तो बड़े निर्माता-निर्देशक भी पहले अपने प्रचार अभियान में इन नए माध्यमों को टारगेट करते हैं. फ़िल्म को किसी सोशल कॉज़ से जोड़ने की कोशिश रहती है और उस अभियान को समाज में स्वीकार्यता दिलवाना लक्ष्य होता है. अब तो धीरे-धीरे फ़िल्म के प्रचार अभियान का पूरा नक्शा ही बदलता जा रहा है.

:- मूलत: चार जुलाई के रविवारीय नवभारत टाइम्स में ’स्पेशल स्टोरी’ के तहत प्रकाशित.

हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

upयहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.

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एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा वो है जब अपना हीरो हीरोइन को अपने घर का एक कमरा किराए पर देने की जुगत भिड़ा रहा है. वो अपने घर की खूबियाँ कुछ यूं बताता है. “क्या कमरा है मेमसाहब! कमरा. कमरे के आगे टैरेस. टेरेस के आगे गार्डन. गार्डन के आगे समन्दर.” वाकई अच्छा नज़ारा है, है ना! लेकिन सोचो कि अगर इस टैरेस और गार्डन को हटाकर वहाँ एक ऊँची इमारत खड़ी कर दी जाए तो इस घर में रहने वालों को कैसा लगेगा? सीन कुछ अच्छा नहीं है, है ना.

अच्छा बताओ, अगर तुम्हें पता चले कि इस घर में रहने वाला एक बुड्ढा है और वो भी अकेला, तब? बुरा लगेगा ना उसके लिए सोचकर. यहाँ तक तो ’अप’ एक उदास फ़िल्म है (रोना भी आता है बार-बार) लेकिन इसके बाद वो खड़ूस बुड्ढा जो करता है वो तुममें से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. क्या बताऊँ? वो अपने घर के ऊपर ढेर सारे हीलियम से भरे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है! बताओ, है ना मज़ेदार बात! अब तुम कहोगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? अरे भई आखिर ’अप’ कार्टून फ़िल्म है और कार्टून फ़िल्म में उड़ने के लिए खुला आसमान होता है सामने. सो कुछ भी हो सकता है.

पिक्सार एनिमेशन की बनाई फ़िल्म ’अप’ कहानी है एक खड़ूस से दिखते बुड्ढ़े कार्ल फ़्रेडरिकसन की जिसे बचपन से ही रोमांचकारी यात्राओं पर जाने का बहुत चाव है. उसकी पत्नी और वो हमेशा साथ उस सपनीली दुनिया में जाने का सपना देखते हैं जिसका नाम है ’पैराडाइज़ फ़ॉल्स’ और जो दक्षिण अमेरिका में कहीं है. अफ़सोस कि मि. फ्रेडरिकसन की पत्नी इस सपने के पूरा होने से पहले ही उन्हें छोड़कर चली जाती हैं. अब कार्ल फ्रेडरिकस अकेले हैं और उनके घर के आस-पास बड़ी इमारतें बन रही हैं. सभी उन्हें वृद्धाआश्रम चले जाने की सलाह देते हैं. लेकिन मि. फ्रेडरिकसन अपने घर को छोड़कर नहीं जाना चाहते. और फिर होता यूँ है कि एक दिन मि. फ्रेडरिकसन उड़ जाते हैं अपने घर के साथ आसमान में. अपने सपनों की दुनिया की ओर…

लेकिन एक दिक्कत है. गलती से उनके साथ एक छोटा सा लड़का रसेल भी आ गया है. रसेल भी रोमांचकारी यात्राओं का शौकीन है. अब दोनों उड़ रहे हैं ’पैराडाइज़ फ़ॉल’ की ओर. रास्ते में आंधी-तूफ़ान है, बड़ी बाधाएं हैं. शुरुआत में मि. फ्रेडरिकसन बार-बार रसेल से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं. लेकिन धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो जाती है. मुसीबतों को पार करते वे वहाँ पहुँचते हैं और आखिर उन्हें दूर पहाड़ के दूसरे कोने पर ’पैराडाइज़ फॉल’ नज़र आता है. लेकिन उससे पहले अभी बहुत कुछ बाकी है. उन्हें एक रंग-बिरंगी, ख़ूब बड़ी सारी चिड़िया मिलती है रास्ते में. अपना नन्हा उस्ताद रसेल उसका नाम रखता है केविन. उसे चॉकलेट खिलाता है और उसका दोस्त बन जाता है. केविन तलाश में है अपने खोये हुए बच्चों की. रसेल उसकी मदद करना चाहता है.

कहानी अभी और भी है. फिर उन्हें मिलता है एक बोलने वाला कुत्ता, नाम है डग. डग के गले में ऐसा पट्टा है जिससे कुत्ते भी इंसानों की आवाज़ में बोल सकते हैं. उसे ये पट्टा पहनाया है चार्ल्स मंट्स ने. पता चलता है कि चार्ल्स वही खोया हुआ हीरो है जिससे प्रभावित होकर बचपन में मि. फ्रेडरिकसन ने रोमांचकारी यात्राओं के सपने देखे थे. चार्ल्स उन्हें अपने उड़ने वाले गुब्बारेनुमा जहाज़ में दावत के लिए बुलाता है. यहाँ दावत का सारा इंतज़ाम बोलने वाले कुत्तों के हाथों में है.

बातों-बातों में पता चलता है कि चार्ल्स केविन को पकड़ना चाहता है और उसे अपने साथ सबूत के तौर पर वापस ले जाना चाहता है. लेकिन रुको, मि. फ्रेडरिकसन और रसेल ऐसा नहीं होने देंगे. वो केविन को उसके बच्चों तक पहुँचायेंगे. और यहाँ से शुरु होता है आसमान में उठा-पटक का एक रोमांचकारी सफर. जिसमें एक ओर हैं चार्ल्स के बोलने वाले कुत्तों की फ़ौज और दूसरी तरफ़ है मि. फ्रेडरिकसन, रसेल, केविन और डग की चतुर चौकड़ी. ये चतुर चौकड़ी चार्ल्स को ख़ूब नाच नचाती है और आखिर में केविन अपने प्यारे बच्चों तक पहुँच जाती है. मि. फ्रेडरिकसन रसेल के साथ वापस अपनी दुनिया लौट जाते हैं और रसेल के प्यारे दादा और डग के मास्टर बन जाते हैं.

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क्या तुम जानते हो?

’अप’ को इस साल का सर्वश्रेष्ठ एनीमेशन फ़िल्म का ऑस्कर पुरस्कार मिला है.

– इसके साथ ही ’अप’ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए भी नामांकित हुई थी. यह सम्मान पाने वाली ’अप’ सिर्फ़ दूसरी एनीमेशन फ़िल्म है. इस सूची का पहला नाम थी फ़िल्म ’ब्यूटी एंड द बीस्ट’ जो सन 1991 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी.

– फ़िल्म के निर्देशक को घर के ऊपर गुब्बारे लगा घर सहित उड़ जाने वाला मज़ेदार ख़्याल दरअसल असल ज़िन्दगी की परेशानियों से ऊबकर आया था.

– मि. फ्रेडरिकसन का किरदार हॉलीवुड के ही मशहूर अदाकार स्पेंसर ट्रेसी जैसा दिखता है. उनकी फ़िल्म ‘Guess who’s coming to dinner’ मेरी आल टाइम फ़ेवरेट फ़िल्म है.