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हम बड़े हुए, शहर बदल गए…

तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप ...

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November 5, 2008

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ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं

मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल 'घर' को इतना क्यों याद करता हूँ. 'घर' के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे ...

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September 5, 2008