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मनोरंजन का बदला चेहरा

पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है. मज़ेदार बात ...

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December 26, 2010

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विकल्प की नई राह

नैनीताल फ़िल्मोत्सव (29 से 31 अक्टूबर, 2010) के ठीक पिछले हफ़्ते मैं बम्बई में था, मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (मामी) में. हम वहाँ युद्ध स्तर पर फ़िल्में देख रहे थे. कई दोस्त बन गए थे जिनमें से बहुत सिनेमा बनाने के पेशे से ही किसी न किसी रूप में जुड़े ...

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December 19, 2010

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हिन्दी सिनेमा इतिहास की पंद्रह सर्वश्रेष्ठ हास्य फ़िल्में

व्यंग्य हिन्दी सिनेमा का मूल स्वर नहीं रहा है. इसीलिए हजारों फ़िल्मों लम्बे इस सिनेमाई सफ़र में बेहतरीन कहे जा सकने लायक सटायर कम ही बने हैं. फिर भी हिन्दी सिनेमा ने समय-समय पर कई अच्छी कॉमेडी फ़िल्में दी हैं जिन्हें आज भी देखा पसंद किया जाता ...

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December 7, 2010

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ताजमहल पटाखे की लड़ी सी : फंस गए रे ओबामा

मेरे लिए ’फंस गए रे ओबामा’ का सबसे पहला परिचय यह है कि यह मनु ऋषि की दूसरी फ़िल्म है. आपको याद होना चाहिए कि शहरी जीवन के उस असहज कर देने वाले लेकिन अविस्मरणीय अनुभव ’ओये लक्की लक्की ओये’ को परदे पर साकार करने का जितना श्रेय इंडी सिनेमा ...

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December 4, 2010

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ख़रगोश

‘ख़रगोश’ एक अद्भुत चाक्षुक अनुभव है. मुख्यधारा के सिनेमा से अलग, बहुत दिनों बाद इस फ़िल्म को देखते हुए आप परदे पर निर्मित होते वातावरण का रूप, रंग, गंध महसूस करते हैं. इसकी वजह है फ़िल्म बेहतरीन कैमरावर्क और पाश्वसंगीत. निर्देशक परेश कामदार की बनाई फ़िल्म ’ख़रगोश’ ...

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November 25, 2010

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फ़िल्म की सफ़लता को हम कैसे आँकें?

अभिनव कश्यप की सलमान ख़ान स्टारर ’दबंग’ की रिकॉर्डतोड़ बॉक्स-ऑफ़िस सफ़लता की ख़बरों के बीच यह सवाल अचानक फिर प्रासंगिक हो उठा है कि आखिर किसे हम ’सुपरहिट फ़िल्म’ कहें? बाज़ार में खबरें हैं कि ’दबंग’ ने ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के रिकॉर्ड्स को भी पीछे छोड़ दिया है और ...

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September 29, 2010

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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

शाहरुख़ ख़ान और अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारों को ’आम आदमी’ कहकर देखते-दिखाते हिन्दी सिनेमा में बरस बीते. इन्हीं सितारों की चकाचौंध में पहले हिन्दी सिनेमा से गाँव गायब हुआ और उसके साथ ही खेती-किसानी की तमाम बातें. मल्टीप्लैक्स के आगमन के साथ सिनेमा देखने के दाम इतने बढ़े कि ...

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August 24, 2010

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The ugliness of the indian male : Udaan

अगर आप भी मेरी तरह ’तहलका’ के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ’स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज़ ऑन इंडियन मैन’ नाम की उस सीरीज़ पर ज़रूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ़्ते के अंतर से आती है और किसी ख़ास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिन्दुस्तानी मर्द का ...

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July 23, 2010

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सात फ़िल्में, सात संस्कार

सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, ...

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July 10, 2010

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हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. ***** एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा ...

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June 3, 2010