अधूरेपन में प्रामाणिकता की तलाश

Shaitan साल ख़त्म होता है और आप अपने झोले में बेहतर फ़िल्में जुटाने फिर हालिया इतिहास में बह निकलते हैं. लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ होता यह है कि सम्भाले जाने लायक अनुभव तमाम फ़िल्मों में बिखरे मिलते हैं. आप ’स्टेनली का डब्बा’ के पार्थो को सहेजकर रखना चाहते हैं, लेकिन हद दर्जे की स्टीरियोटाइप भूमिकाओं में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अध्यापक, अध्यापिकाओं को देखकर आपका माथा ठनक जाता है. आप ’लेडीज़ वर्सेस रिक्की बहल’ की डिम्पल चढ्ढा (परिणिति चोपड़ा) को सराहते हैं लेकिन पिछले साल जिस जोड़े पर आप मर मिटे थे, उसका ऐसा भ्रष्ट ’बॉलीवुडीकरण’ होते देखना दर्द देता है. ’शैतान’ अपने चमत्कार से विस्मित करती है. लेकिन उसके भीतर कुरेदने पर हाथ कुछ नहीं आता. अनुराग को मालूम हो, मैं आज भी उस असल स्याह शैतान ’पांच’ के सार्वजनिक प्रदर्शन का इन्तज़ार करता हूँ. मुझे ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पसन्द आती है. क्योंकि यह फ़िल्म छोटे वादे करती है और उन्हें पूरा करती है.

लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि हमें कौनसी फ़िल्म देखनी चाहिए, तो मैं आपको ’अरण्य काण्डम’ देखने की सलाह दूंगा. पिछले साल की शुरुआत में आई यह तमिल फ़िल्म उन तमाम चमत्कारों को समेटे है जिन्हें आपने ’शैतान’ में देख सराहा, और उस बदलाव को भी जिसे ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ में माही गिल ने अपनी नष्ट अदाकारी से बरबाद कर दिया. और इसके ऊपर ’अरण्य काण्डम’ कहीं और भी है. बेशक इसमें वीभत्स हिंसा है, लेकिन इसकी सबसे डरावनी और भयावह कहानियाँ वे हैं जिन्हें किसी सड़क किनारे के ढाबे पर चाय के प्यालों के बीच सुनाया जा रहा है. चकित करती है, हैरत में डालती है. अगर आप कोरियन सिनेमा के प्रशंसक हैं, तो ’अरण्य काण्डम’ आपके ही लिए है. और अगर आपने हालिया कोरियन सिनेमा नहीं देखा तो ज़रूरत नहीं, सीधे ’अरण्य काण्डम’ देखिए.

Aaranya kaandamदोस्तों की बनाई ’जो डूबा सो पार’ में ठीक पहलेपहल यह हीरा मिलता है. फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ दिखाई देता है,

“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण…”

मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ. करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था.

साल दो हज़ार ग्यारह का यथार्थ ’शोर इन द सिटी’ और ’धोबी घाट’ जैसी फ़िल्में गढ़ती हैं. कैसे? क्योंकि मेरा वो दोस्त जो आठवीं क्लास का टॉपर था और आज परचूने की दुकान चलाता है, उसके पिता भी वही परचूने की दुकान चलाते थे. और मैं आठवीं क्लास का एक औसत से कम विद्यार्थी, जिसे गणित के सूत्रों में मृत्यु के अक्षर दिखाई देते थे आज विश्वविद्यालय में पढ़ता-पढ़ाता हूँ. तो इसमें मेरा क्या योग है, मेरे पिता भी अपनी पूरी ज़िन्दगी एक विश्वविद्यालय में पढ़ाया करते थे. हमारे समाज में तय दायरे तोड़ना आज भी मुश्किल है. चाहे वह वर्ग हो, चाहे जाति. मुम्बई जैसे शहर में आकर उन चुनौतियों के रूप-रंग-चेहरे बदल जाते हैं. अब वो प्रत्यक्ष नहीं, नकाब ओढ़कर बड़ी नफ़ासत से शिकार करती हैं. ऊपर उल्लिखित दोनों फ़िल्में इसीलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे इस खामोश सच्चाई की ओर इशारा करती हैं.

लेकिन उम्मीदों भरी फ़िल्म ’आई एम कलाम’ में यही कोशिश है. वैसे मैं ’आई एम कलाम’ को इसलिए भी याद रखता हूँ कि यह हमें एक सामान्य वार्तालाप के माध्यम से ’आरक्षण’ जैसी प्रक्रिया का औचित्य समझा देती है.

“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”
“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”
“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”
“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”
“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”

लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है. यह कथा वहाँ ख़त्म होती है जहाँ कलाम दिल्ली पहुँचता है. लेकिन अब सिनेमाकार को भी मालूम है कि परिवर्तन दिल्ली से नहीं होता. अब यूं परिवर्तन ही नहीं होता.

यह दूसरी बार देखने पर होता है कि मैं ’तनु वेड्स मनु’ की प्रामाणिक खूबसूरती की सबसे आधारभूत वजह चिह्नित कर पाता हूँ. इस तथ्य से इतर कि कानपुर से शुरु होकर दिल्ली, कपूरथला और फिर लौटकर कानपुर जैसे लोकेल में घूमती यह फ़िल्म अपने शुरुआती बीस मिनट में हिन्दी सिनेमा को पिछले साल का सबसे प्रामाणिक शुरुआती प्रसंग देती है और अपनी भाषा, व्यवहार एवं ’मन्नु भैया’ जैसे अपनी माटी में गहरे रचे-बसे गीत के माध्यम से बाकायदा किसी उत्तर भारतीय शहर का सामुदायिक जीवन खड़ा करती है, चिह्नित यह किया जाना चाहिए कि ’तनु वेड्स मनु’ फ़िल्म के विभिन्न निर्णायक क्षणों में घर की छत का एक घटनास्थल के तौर पर किस तल्लीनता से इस्तेमाल करती है.

इतिहास में हमसे पैंतालीस साल की दूरी पर खड़े श्रीलाल शुक्ल के अविश्वसनीयता की हद तक प्रामाणिक उपन्यास ’राग दरबारी’ का शिवपालगंज याद कीजिए. कल्पना कीजिए कि इस शिवपालगंज में से अगर छतों पर घटित होने वाले प्रसंग निकाल दिए जाएं तो शेष क्या बचेगा. वो अद्वितीय प्रसंग जिसमें छत पर सोये रंगनाथ को भूलवश कन्या द्वारा कोई ’और’ समझ लिया जाता है और गलती समझ आने पर कन्या “हाय, मेरी मैया!” कहकर भाग छूटती हैं. बताते चलें कि यही वह प्रसंग है जिसमें से होकर हमारी लोकप्रिय संस्कृति के बतौर वाहक मौजूद सबसे प्रामाणिक प्रेम-पत्र का सूत्र निकलता है. वही प्रेम पत्र जिसके उद्धरण से ’लव इन साउथ एशिया’ पुस्तक में फ्रेंचस्का ऑरसीनी अपने शोध लेख ’लव लेटर्स’ की शुरुआत करती हैं.

tanu weds manu 400चौक और बरामदे तो हम इस इकसार होती जाती आधुनिक शहरी भवन निर्माण कला के हाथों पहले ही नष्ट करवा चुके थे. मकान से फ़्लैट संस्कृति में संचरण के साथ हमने अपने घर में जिस सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को खोया है वह है छत. मेरे बचपन की यादों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से अपने घर की छत पर उगते हमनाम के साए में मोरनियों के झुंड को गेंहूँ खिलाते हुए बनते हैं. लेकिन मुझसे दस साल बाद पैदा हुई पीढ़ी की यादों से यह अनुभव सिरे से गायब है.

बड़ी सी पोल वाले घर की ऊंचे खंबों पर टिकी छत पर बने ’चे गुवेरा’ की तस्वीर वाले उस बाग़ी लड़की के कमरे से शुरु होकर, जहाँ मनोज शर्मा उर्फ़ मन्नू तनुजा त्रिवेदी उर्फ़ तनु को देखने आए हैं, ’तनु वेड्स मनु’ में विभिन्न प्रसंगों में कुल-मिलाकर अठ्ठारह बार छतों का पृष्ठभूमि के तौर पर इस्तेमाल है. और अगर आप पीछे जाकर देखें तो बीते दशक में आई ’मैं, मेरी पत्नी और वो’ और ’दिल्ली 6’ से लेकर ’गुलाल’ और ’देव डी’ तक, उन तमाम फ़िल्मों में जहाँ आपको शहरों के अन्दरूनी जीवन का प्रामाणिक चित्रण मिलता है, इस ज़िन्दगी में गुंथे एक घटनाप्रधान space के बतौर छत / अटरिया / छज्जे का इस्तेमाल मिलता है. यहाँ राजशेखर के लिखे गीत ’मन्नू भैया’ की वह पंक्तियाँ भी देखी जानी चाहियें जो कहीं हाथ से निकलते कस्बाई जीवन के अवशेषों को बड़े प्रेम से समेटती चलती हैं,

“अंबिया इलाइची दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोल बाग़ के छत पर,
फिर पोस्ता पिसेगा, कलोंजी कुटेगी,
मर्तबान से अफ़वाह उठेगी.

पतंग पीछे बच्चे जब आयेंगे छत पर
तन्नु की सारी बरनी जायेंगे चट चट चट चट चट चटकर
तब मन्नु भइया क्या करिहें, मन्नु भइया क्या करिहें.”

’तनु वेड्स मनु’ एक सम्पूर्ण सिनेमा अनुभव नहीं है और यह बुरी बात है कि इस फ़िल्म में भी अंतत: एक बग़ावती तेवर वाली लड़की को वृहत समुदाय द्वारा बड़ी नफ़ासत से कायदे से रहना और कायदे से ’सही’ फ़ैसले करना सिखा ही दिया जाता है, लेकिन इस फ़िल्म को उत्तर भारत के कस्बाती जीवन के अपने तीक्ष्ण निरीक्षण के लिए याद रखा जाना चाहिए.

delhi belly resizeठीक वैसे ही जैसे पूर्णा जगन्नाथन को याद रखा जाना चाहिए. करीने से सजाई गई नायिकाओं की अन्तहीन श्रंखला के बीच, जिन्हें ज़्यादातर उस विश्व सुंदरी प्रतियोगिताओं की ज़ीरॉक्स मशीन से निकाला जाता है, हिन्दी सिनेमा में मुख्य नायिका के बतौर अपनी शुरुआत कर रहीं चालीस वर्षीय पूर्णा अविश्वस्नीय लगता सकारात्मक बदलाव हैं. नायिका जो नायक द्वारा पूर्व पति के बारे में पूछे जाने पर कहती है, “वही पुरानी कहानी. जबरदस्ती शादी करा दी.” और जब नायक चिंता में पड़कर कहता है, “सच?” तो जवाब मिलता है, “नहीं. स्कूल में मेरा बॉयफ्रेंड था. भागकर शादी की थी हम दोनों ने. अपने माँ-बाप से लड़कर.” आश्चर्य यह नहीं कि यही लड़कपन का प्यार आज उनके ऊपर बीच सड़क गोलियाँ बरसा रहा है. आश्चर्य यह भी नहीं कि अलग हो जाने के बाद भी इस ’पति’ को अपनी पत्नी का किसी ’पराए मर्द’ के साथ दिखना पसन्द नहीं. सुखद आश्चर्य यह है कि इतना सब होने के बाद भी ’डेल्ही बेल्ली’ की नायिका मेनका के चेहरे पर अफ़सोस की एक लकीर नहीं.

अपनी मर्ज़ी से, परिवार और समाज से लड़कर लिए फ़ैसले के सिरे से गलत साबित हो जाने के बावजूद यहाँ एक लड़की है जो अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीना छोड़ने के लिए तैयार नहीं. समाज के प्रति, सलीके के प्रति, व्यवस्था के प्रति झुकने को तैयार नहीं. जिसके बेपरवाह अन्दाज़ को ’वक़्त के थपेड़े’ बदल नहीं पाए हैं. वो अपनी ज़िन्दगी खुद जीना चाहती है और अपने हिस्से की गलतियाँ भी खुद करना चाहती है. यह नायिका लम्बे समय से हमारे सिनेमा से अनुपस्थित रही है. इसे सम्भालिए.

उद्दंडता जनार्दन जाखड़ उर्फ़ जॉर्डन में भी है. वो खुद कभी गहरे दिल से चाही अपनी सफ़लता को क़तरा-क़तरा उड़ाता चला जाता है. लेकिन नायक में ऐसी उद्दंडता देखा जाना कम स कम हिन्दी सिनेमा के लिए नया नहीं, और बहुत सारी अन्य वजहों में एक वजह यह भी है कि मैं ’रॉकस्टार’ को एक पाथब्रेकिंग फ़िल्म नहीं मानता. लेकिन फिर भी, फ़िल्म का वह दृश्य मुझे हमेशा याद रहेगा जहाँ इस राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है,

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”

जॉर्डन में बचपना है. उद्दाम बचपना. लेकिन फ़िल्म ने उसे निभाने वाली नज़र नहीं पाई है. ठीक वैसे जैसे ’चिल्लर पार्टी’ टाइटल रोल के साथ की उस धमाकेदार शुरुआत को आगे नहीं निभा पाती है. जब हम कहते हैं कि बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, तो क्या हम यह समझते हैं कि इसी दुनिया में रहते हुए आखिर वो कौनसे औज़ार हैं जिनसे बच्चे अपनी यह ’अलग दुनिया’ बना पाते हैं? सौभाग्यशाली हैं वो जिन्हें ’चिल्लर पार्टी’ की शुरुआत में इन्हीं में से एक औज़ार साक्षात देखना नसीब हुआ. पुकारने के भिन्न नामों से बनी यह खालिस बच्चों की दुनिया है. इसमें बच्चे अपने लिए भूमिकाएं खुद चुनते हैं और खुद ही उन पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं.

“अकरम, ओये अकरम…”
“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”
“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए…”
“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”

shalaयह चर्चा वापस लौटकर आई है कि आखिर वो कौनसी उमर है जिससे हम हमारे सिनेमा में सदा क़तराकर निकल जाते हैं. हाँ, वो लड़कपन से ठीक पहले का समय है जिसे हिन्दी सिनेमा ने अपने व्याकरण में सबसे ज़्यादा उपेक्षित रखा है. मराठी सिनेमा ने बीते साल में ’विहिर’ जैसी अन्न्तिम सवालों के जवाब तलाशती, अनन्त संभावनाओं को समेटे फ़िल्म देखी और इस साल दोस्त अभी से ’शाला’ की बात कर रहे हैं. हिन्दी के पास अपनी ’खरगोश’ हो सकती थी लेकिन उस फ़िल्म से खुद उसके अपने समाज ने सौतेला व्यवहार किया. वैसे यहाँ सूचना यह भी है कि अब यह फ़िल्म सिनेमा हाल के अभेद्य बियाबान से निकलकर वैधानिक रूप से बाज़ार में खरीदे जाने के लिए उपलब्ध है. और मेरा यह दृढ़ता से मानना है कि हमारा वृहत्तर हिन्दी समाज अगर इस रंग और स्वाद की फ़िल्मों को सराहेगा, तो भविष्य में अपने लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा.

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के फ़रवरी अंक में प्रकाशित.

2011 : सिनेमा

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” – फ़राज़

’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’

फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”

राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है. मुझे बहुत साल पहले प्रसून जोशी की ’फिर मिलेंगे’ के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं. यहाँ अस्वीकार का साहस है. उस मासूमियत को बचाने की तड़प जिसे आप epic बन जाने को बेचैन इस पूरी फ़िल्म के दौरान सिर्फ़ रनबीर कपूर की उदंड आँखों में पढ़ पाते हैं.

’भूमिकाओं का बदलाव’

फ़िल्म – ‘डेल्ही बेली’

मैंने इस दृश्य की तुलना सत्यजित राय की ’चारुलता’ से की और साल की सबसे ज़्यादा गालियाँ यहीं खाईं. भूमिकाओं का यह बदलाव विस्मित करने वाला था. और इसे भूलकर भी नायक के ’नायकत्व’ का हास न समझें. सिंघमों और बॉडीगार्डों के दौर में ’डेल्ही बेली’ का ताशी दोरज़ी लहाटू लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में देखा गया सबसे मज़बूत नायकीय चरित्र है. नैतिक, ईमानदार और सच्चा. ऐसा नायक जिसका यकीन बोलने से ज़्यादा कर दिखाने में है.

’मेरिट बनाम आरक्षण’

फ़िल्म – ’आई एम कलाम’

“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”

“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”

“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”

“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”

“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”

लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है.

’कर्ता ने, कर्म को…’

फ़िल्म – ’जो डूबा सो पार’

फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ,

“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण…”

मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ.  करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था. दो हज़ार ग्यारह में यहीं मेरे लिए हिन्दी सिनेमा यथार्थ के सबसे निकट आया था.

“अकरम, ओए अकरम…”

फ़िल्म – ’चिल्लर पार्टी’

“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”

“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए…”

“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”

साल की सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग. सीधे बच्चों की दुनिया की नब्ज़ पकड़ लेती है फ़िल्म. निकनेम्स से बनी दुनिया जहाँ बड़ों की दुनिया से धकिआया हुआ बच्चा अपनी असल पहचान पाता है. वो अनजान बच्चों की दुनिया जहाँ वे अपने लिए खुद भूमिकाएं चुनते हैं और उनमें खरे उतरने के लिए बड़ों से ज़्यादा गंभीरता से प्रयासरत होते हैं.

दो हज़ार ग्यारह के नवरस : किरदार जिनकी छाप गहरी पड़ी

shor_in_the_cityपूर्णा जगन्नाथन – ’मेनका’ | फ़िल्म – ’डेल्ही बेली’

रनवीर हुड्डा – ’ललित/बबलू’ | फ़िल्म – ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’

परिणिति चोपड़ा – ’डिम्पल चड्ढ़ा’ | फ़िल्म – ’लेडीज़ वर्सेस रिकी बहल’

पित्तोबाश – ’मंडूक’ | फ़िल्म – ’शोर इन द सिटी’

नमन जैन – ’जांघिया’ | फ़िल्म – ’चिल्लर पार्टी’

राहुल बोस – ’जय’ | फ़िल्म – ’आई एम’

रनबीर कपूर – ’जनार्दन जाखड़/जॉर्डन’ | फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

जिमी शेरगिल – ’आदित्य प्रताप सिंह’ | फ़िल्म – ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’

दीपक डोबरियाल – ’पप्पी’ | फ़िल्म – ’तनु वेड्स मनु’


सर्वश्रेष्ठ पांच : 2011

’डेल्ही बेली’ – फ़िल्म देखते हुए मैं बार-बार सोचता हूँ कि क्या पटकथा में यह भी लिखा गया होगा कि कौनसे दृश्य में किस पुरुष किरदार की टीशर्ट पर क्या चित्रकला होनी है. यह फ़िल्म उसी बारीकी से बनाई गई है जिस बारीकी से मेरे प्रिय योगेन्द्र यादव चुनाव नतीजों का असल मतलब समझाते हैं. ठीक वहाँ जहाँ नायक नायक अपने फांसी से लटके दोस्त को मुक्त करवाने के लिए पिस्तौल का प्रयोग करता है और फिर शायद जैसा उसने फ़िल्मों में देखा होगा, पिस्तौल को अपनी पैंट में घुसेड़ता है. हाँ, ठीक वहाँ जहाँ उसे एक अभी-अभी चली पिस्तौल की तपती नली का झटका लगता है. ठीक वहीं यह फ़िल्म अपने साथ की अन्य औसत फ़िल्मों से आगे निकल जाती है.

’शोर इन द सिटी’ – साल की सबसे उम्मीदों भरी फ़िल्म. गुरु-गंभीरता के सघन दौर में रूहानी सच्चाइयों को रागदरबारी सी बेपरवाही से कहने का साहस रखने वाली. शहर की विभिन्न लयों को अपने में समेटे, और उन तमाम ख़रोचों को भी जिन्हें हम अक्सर रूबरू देखने से बचते हैं. साथ ही ’शोर इन द सिटी’ साल का सबसे संभावनाओं से भरा किरदार अपने भीतर समेटे है. बेस्टसेलर किताबों की पाइरेसी करता ’तिलक’ जिसे अचानक ’एलकेमिस्ट’ पढ़कर लगता है कि उसके हाथ किसी खज़ाने की चाबी लग गई है. यह किरदार जैसे दो दुनियाओं को आपस में जोड़ता है. ठीक संचरण की अवस्था में इसे पढ़ना जैसे सम्पूर्ण लोकप्रिय संस्कृति को किसी इंसान में पढ़ना है. इस किरदार के द्वारा हम कामकाजी वर्ग में अदृश्य से दृश्य होने की आकांक्षा का पहला बीज अंकुरित होते देखते हैं. दुर्लभ.

’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ – कई मायनों में एक सम्पूर्ण फ़िल्म जो कुछ बड़ा कहने से बचती है. ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पूरी तरह अपने दोनों मुख्य पुरुष किरदारों के कांधों पर खड़ी है जो ’बीवी’ की भूमिका में माही गिल के अत्यन्त बचकाने अभिनय के बावजूद इसे बखूबी किनारे निकाल ले जाते हैं. काफ़ी हद तक एक प्रदर्शन आधारित फ़िल्म जिसकी ताक़त रणवीर हुड्डा और जिम्मी शेरगिल की दमदार संवाद अदायगी और अभिनय है. फ़िल्म छोटे वादे करती है लेकिन उन्हें पूरा करती है.

‘धोबी घाट’ – अगर ’शोर इन द सिटी’ मुम्बई का रागदरबारी तर्जुमा है तो ’धोबी घाट’ में शहर शास्त्रीयता पाता है. जैसे-जैसे इस महानगर में जगह कम होती जाती है, कहानियों को भी आपस में सटकर बैठना पड़ता है. चार कहानियों में चार भिन्न ज़िन्दगियाँ आपस में रगड़ खाती हैं. लेकिन बड़ी बात यह है कि फ़िल्म हमें चारों कहानियों के उन अंधेरे कोनों तक लेकर जाती है जहाँ इस शहर की तमाम शास्त्रीयता का मुलम्मा छूट जाता है. बड़ी बात यह है कि उन अंधेरे कोनों में भी फ़िल्म शहर को नकारती नहीं, बल्कि एक साथी की तरह कांधे पर हाथ रख कहती है कि आज भी एक रास्ता अच्छाई की ओर जाता है.

’आई एम’ – क्योंकि यह फ़िल्म एक आत्मस्वीकार है. क्योंकि यह फ़िल्म एक अनुभव है. क्योंकि खुद के साथ हुई हर नाइंसाफ़ी से जो सीख मिलती है वो यही है कि फिर कहीं किसी और काल, किसी और दुनिया में जब हम ताक़तवर हों तो अनजाने में वो ही नाइंसाफ़ी न कर बैठें. क्योंकि यह फ़िल्म गांधी की याद दिलाती है, जिन्होंने कहा था कि आँख के बदले आँख का सिद्धांत अंतत: सबको अंधा कर देगा. क्योंकि अंतत: खलनायक बाहर नहीं, खुद हमारे भीतर है जिसका मुकाबला एक निरंतर चलती प्रक्रिया है.

छोटा है लेकिन तलवार है

delhi belly vijay raazपूजा स्वरूप – ’माया’ aka फ़ोन वाली रिसेप्शनिस्ट

फ़िल्म – “दैट गर्ल इन येलो बूट्स”

कुमुद मिश्रा – ’खटाना’ aka कैंटीनवाले अंकल

फ़िल्म – “रॉकस्टार”

विजयराज – ’सोमयाज़ुलु’ aka दार्शनिक डॉन

फ़िल्म – “डेल्ही बेली”

delhi belly rahul singhस्वरा भास्कर – ’पायल’

फ़िल्म – “तनु वेड्स मनु”

राहुल सिंह – ’राजीव खन्ना’ aka Delhi boy with a gun

फ़िल्म – “डेल्ही बेली”

राजेश शर्मा – ’एन. के.’ aka दिल्ली पुलिस

फ़िल्म – “नो वन किल्ड जेसिका”

साल दो हज़ार ग्यारह का विश्व सिनेमा का सबसे विलक्षण अनुभव था ’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ जिसे कोरी फ़िल्म भर कहना मुश्किल है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ मनुष्य के भीतर पहली बार ईर्ष्याभाव जन्म लेता है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ पहली बार जीवन ’देना’ सीखता है. यह मनोभावों के जन्म की कथा है. इस फ़िल्म ने वही किया जो साल दो हज़ार ग्यारह में मेरे प्रिय राहुल द्रविड़ ने किया. साल की सबसे बेहतरीन लेखनियाँ इन्हीं दो मानसरोवरों से निकलीं. मेरे तीन सबसे पसन्दीदा ब्लॉगकार अपनी दुनियाओं में वापस गए और यह मोती निकालकर लाए –यहाँ – वरुण ग्रोवर, यहाँ – अपराजिता सरकार, यहाँ – फ़ाइट क्लब.

क्या यह व्यक्तिगत कहानियाँ भर हैं? नहीं, क्योंकि ठीक उस जगह जहाँ व्यक्तिगत राजनैतिक से मिलता है, रचना का जन्म होता है. मैं हमेशा से मानता हूँ कि गल्प और कथेतर सिर्फ़ कथा कहने के भिन्न रूप भर हैं. हमारी सच्चाईयाँ सदा इन तय खांचों से आगे निकल जाती हैं. सिनेमा हो या उपन्यास, यही चाबी है. फन्तासियों में सदा सत्य पैठा होता है. आपबीतियों से सदा सर्वोत्तम कथाएं जन्म लेती हैं.