डेल्ही बेली

जिस तुलना से मैं अपनी बात शुरु करने जा रहा हूँ, इसके बाद कुछ दोस्त मुझे सूली पर चढ़ाने की भी तमन्ना रखें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. फिर भी, पहले भी ऐसा करता रहा हूँ. फिर सही एक बार…

Delhi-Belly-Posterसत्यजित राय की ’चारुलता’ के उस प्रसंग को हिन्दुस्तानी सिनेमा के इतिहास में क्रांतिकारी कहा जाता है जहाँ नायिका चारुलता झूले पर बैठे स्वयं गुरुदेव का लिखा गीत गुनगुना रही हैं और उनकी नज़र लगातार नायक अमल पर बनी हुई है. सदा से व्यवस्था का पैरोकार रहा हिन्दुस्तानी सिनेमा भूमिकाओं का निर्धारण करने में हमेशा बड़ा सतर्क रहा है. ऐसे में यह ’भूमिकाओं का बदलाव’ उसके लिए बड़ी बात थी. ’चारुलता’ को आज भी भारत में बनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में शुमार किया जाता है.

यह तब भी बड़ी बात थी, यह आज भी बड़ी बात है. अध्ययन तो इस बात के भी हुए हैं कि लता मंगेशकर की आवाज़ को सबसे महान स्त्री स्वर मान लिए जाने के पीछे कहीं उनकी आवाज़ का मान्य ’स्त्रियोचित खांचे’ में अच्छे से फ़िट होना भी एक कारण है. जहाँ ऊँचे कद की नायिकाओं के सामने नाचते बौने कद के नायकों को ट्रिक फ़ोटोग्राफ़ी से बराबर कद पर लाया जाता हो, वहाँ सुष्मिता सेन का पीछे से आकर सलमान ख़ान को बांहों में भरना ही अपने आप में क्रांति है. बेशक ’देव डी’ के होते हम मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा में पहली बार देखे गए इस ’भूमिकाओं में बदलाव’ का श्रेय ’डेल्ही बेली’ को नहीं दे सकते, लेकिन यौन-आनंद से जुड़े एक प्रसंग में स्त्री का ’भोक्ता’ की भूमिका में देखा जाना हिन्दी सिनेमा के लिए आज भी किसी क्रांति से कम नहीं.

  • ’देव डी’ में जब पहली बार हम सिनेमा के पर्दे पर इस ’भूमिकाओं के बदलाव’ को देखते हैं तो यह अपने आप में वक्तव्य है. ’डेल्ही बेली’ को इसके लिए ’देव डी’ का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि वो उसके लिए रास्ता बनाती है. उसी के कांधे पर चढ़कर ’डेल्ही बेली’ इस प्रसंग को इतने कैज़ुअल तरीके से कह पाई है. हमारा सिनेमा आगे बढ़ रहा है और अब यह अपने आप में स्टेटमेंट भर नहीं रह गया, बल्कि अब कहानी इस दृश्य के माध्यम से दोनों किरदारों के बारे में, उनके आपसी रिश्ते के बारे में कुछ बातें कहने की कोशिश कर सकती है.

  • ठीक यही बात गालियों के बारे में है. यहाँ गालियाँ किसी स्टेटमेंट की तरह नहीं आई हैं. यही शब्द जिसे देकर ’डी के बोस’ इतना विवादों में है, जब गुलाल में आता है तो वो अपने आप में एक स्टेटमेंट है. लेकिन ’डेल्ही बेली’ में किरदार सामान्य रूप से गालियाँ देते हैं. लेकिन वहीं देते हैं जहाँ समझ में आती हैं. जैसे दो दोस्त आपस की बातचीत में गालियाँ देते हैं, लेकिन अपने माता-पिता के सामने बैठे नहीं. अब गालियाँ फ़िल्म में ’चमत्कार’ पैदा नहीं करतीं. और अगर करती भी हैं तो ज़रूरत उस दिशा में बढ़ने की है जहाँ उनका सारा ’चमत्कार’ खत्म हो जाए. विनीत ने कल फेसबुक पर बड़ी मार्के की बात लिखी थी, “मैं सिनेमा, गानों या किसी भी दूसरे माध्यमों में गालियों का समर्थन इसलिए करता हूं कि वो लगातार प्रयोग से अपने भीतर की छिपी अश्लीलता को खो दे, उसका कोई असर ही न रह जाए. ऐसा होना जरुरी है क्योंकि मैं नहीं चाहता कि महज एक गाली के दम पर कोई गाना या फिल्म करोड़ों की बिजनेस डील करे और पीआर, मीडिया एजेंसी इसके लिए लॉबिंग करे. ऐसी गालियां इतनी बेअसर हो जाए कि कल को कोई इसके दम पर बाजार खड़ी न कर सके.” ’डेल्ही बेली’ में गालियाँ ऐसे ही हैं जैसे कॉस्ट्यूम्स हैं, लोकेशन हैं. अपने परिवेश के अनुसार चुने हुए. असलियत के करीब. नाकाबिलेगौर हद तक सामान्य.

  • तमाम अन्य हिन्दी फ़िल्मों की तरह इसमें समलैंगिक लोगों का मज़ाक नहीं उड़ाया गया है, बल्कि उन लोगों का मज़ाक उड़ाया गया है जो किसी के समलैंगिक होने को असामान्य चीज़ की तरह देखते हैं, उसे गॉसिप की चीज़ मानते हैं.

  • सच कहा, हम यह फ़िल्म अपने माता-पिता के साथ बैठकर नहीं देख सकते हैं. लेकिन क्या यह सच नहीं कि नए बनते विश्व सिनेमा का सत्तर से अस्सी प्रतिशत हिस्सा हम अपने माता-पिता के साथ बैठकर नहीं देख सकते हैं. न टेरेन्टीनो, न वॉन ट्रायर, न कितानो. अगर हिन्दी सिनेमा भी विश्व सिनेमा के उस वृहत दायरे का हिस्सा है जिसे हम सराहते हैं तो उसे भी वो आज़ादी दीजिए जो आज़ादी विश्व के अन्य देशों का सिनेमा देखते हुए उन्हें दी जाती है. माता-पिता नहीं, लेकिन ’डेल्ही बेली’ को अपनी महिला मित्र के साथ बैठकर बड़े आराम से देखा जा सकता है. क्योंकि यह फ़िल्म और कुछ भी हो, अधिकांश मुख्यधारा हिन्दी फ़िल्मों की तरह ’एंटी-वुमन’ नहीं है. इस फ़िल्म में आई स्त्रियाँ जानती हैं कि उन्हें क्या चाहिए. वे उसे हासिल करने को लेकर कभी किसी तरह की शर्मिंदगी या हिचक महसूस नहीं करतीं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे फ़िल्म की किसी ढलती सांझ में अपने पिछले किए पर पश्चाताप नहीं करतीं.

  • मुझे अजीब यह सुनकर लगा जब बहुत से दोस्तों की नैतिकता के धरातल पर यह फ़िल्म खरी नहीं उतरी. कई बार सिनेमा में गालियों के विरोधियों के साथ एक दिक्कत यह हो जाती है कि वे चाहकर भी गालियों से आगे नहीं देख पाते. अगर आप सिनेमा में ’नैतिकता’ की स्थापना को अच्छे सिनेमा का गुण मानते हैं (मैं नहीं मानता) तो फिर तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है. आप उसे पहचान क्यों नहीं पाए. गौर से देखिए, प्रेमचंद की किसी शुरुआती ’हृदय परिवर्तन’ वाली कहानी की तरह यहाँ भी कहानी का एक उप-प्रसंग एकदम वही नहीं है?

एक किरायदार किराया देने से बचने के लिए अपने मकान-मालिक को ब्लैकमेल करने का प्लान बनाता है. उसकी कुछ अनचाही तस्वीरें खींचता है और अनाम बनकर उससे पैसा मांगता है. तभी अचानक किसी अनहोनी के तहत खुद उसकी जान पर बन आती है. ऐसे में उसका वही मकान-मालिक आता है और उसकी जान बचाता है. ग्लानि से भरा किराएदार बार-बार शुक्रिया कहे जा रहा है और ऐसे में उसका मकान-मालिक जो उसके किए से अभी तक अनजान है उससे एक ही बात कहता है, “मेरी जगह तुम होते तो तुम भी यही नहीं करते?” किरायदार का हृदय परिवर्तन होता है और वो ब्लैकमेल करने वाला सारा कच्चा माल एक ’सॉरी नोट’ के साथ मकान-मालिक के लैटर-बॉक्स में डाल आता है.

  • लड़का इतने उच्च आदर्शों वाला है कि उनके लिए एक मॉडल का फ़ोटोशूट वाहियात है लेकिन किसी मृत व्यक्ति की लाश उन्हें शहर के किसी भी हिस्से में खींच ले जाती है. यह भी कि जब सवाल नायिका को बचाने का आता है तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बचाना है, पैसा रख लेना कहीं ऑप्शन ही नहीं है इन लड़कों के लिए. और यह तब जब उन्होंने अभी-अभी जाना है कि वही नायिका इस सारी मुसीबत की जड़ है. पूरी फ़िल्म में सिर्फ़ दो जगह ऐसी है जहाँ फ़िल्म मुझे खटकती है. जहाँ उसका सौंदर्यबोध फ़िल्म के विचार का साथ छोड़ देता है. लेकिन सैकड़ों दृश्यों से मिलकर बनती फ़िल्म में सिर्फ़ दो ऐसे दृश्यों का होना मेरे ख्याल से मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए अच्छा ही कहा जाएगा.

  • फिर, नायक ऐसे उच्च आदर्शों वाला है कि एक लड़की के साथ होते दूसरी लड़की से चुम्बन खुद उसके लिए नैतिक रूप से गलत है. एक क्षण उसके चेहरे पर ’मैंने दोनों के साथ बेईमानी की’ वाला गिल्ट भी दिखता है और दूसरे क्षण वो किसी प्राश्च्यित के तहत दोनों के सामने ’सच का सामना’ करता है, यह जानते हुए भी कि इसका तुरंत प्रभाव दोनों को ही खो देने में छिपा है.

  • मैं एक ऐसे परिवार से आता हूँ जहाँ घर के बड़े सुबह नाश्ते की टेबल पर पहला सवाल यही पूछते हैं, “ठीक से निर्मल हुए कि नहीं?” कमल हासन की ’पुष्पक’ आज भी मेरे लिए हिन्दुस्तान में बनी सर्वश्रेष्ठ हास्य फ़िल्मों मे से एक है. क्यों न हम इसे उस अधूरी छूटी परंपरा में ही देखें.

Delhi Belly Stills

  • गालियों से आगे निकलकर देखें कि कि कैसे सिर्फ़ एक दृश्य वर्तमान शहरी लैंडस्केप में तेज़ी से मृत्यु की ओर धकेली जा रही कला का माकूल प्रतीक बन जाता है. घर की चटकती छत में धंसा वो नृतकी का घुंघरू बंधा पैर सब कुछ कहता है. कला की मृत्यु, संवेदना की मृत्यु, तहज़ीब की राजधानी रहे शहर में एक समूचे सांस्कृतिक युग की मृत्यु. कथक की ताल पर थिरकते उन पैरों की थाप अब कोई नई प्रेम कहानी नहीं पैदा करती, अब वह अनचाहा शोर है. अब तो इससे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो कथक है या फिर भरतनाट्यम. सितार को गिटार की तरह बजाया जाता है और उसमें से चिंगारियाँ निकलती हैं.

  • शुभ्रा गुप्ता ने बहुत सही कहा, ’डेल्ही बेली’ की भाषा ’हिंग्लिश’ नहीं है. ’हिंग्लिश’ अब एक पारिभाषिक शब्द है. ऐसी भाषा जिसमें एक ही वाक्य में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का घालमेल मिलता है. वरुण ने इसका बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था कुछ दिन पहले, “बॉय और गर्ल घर से भागे. पेरेंट्स परेशान”. ’यूथ ओरिएंटेड’ कहलाए जाने वाले अखबारों जैसे नवभारत टाइम्स और आई नेक्स्ट के फ़ीचर पृष्ठों पर आप इस तरह की भाषा आसानी से पढ़ सकते हैं. इसके उलट ’डेल्ही बेली’ में भाषा को लेकर वह समझदारी है जिसकी बात हम पिछले कुछ समय से कर रहे हैं. यहाँ किरदार अपने परिवेश के अनुसार हिन्दी या अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे नायक आपस में अंग्रेज़ी में बात कर रहे हैं लेकिन उन्हें मारने आए गुंडो से हिन्दी में. जैसे नायिका अपने सहकर्मी से अंग्रेज़ी में बात कर रही है लेकिन पुरानी दिल्ली के जौहरी से हिन्दी में. उच्च-मध्यम वर्ग से आए पढ़े लिखे नायकों की गालियाँ आंग्ल भाषा में हैं लेकिन विजय राज की गालियाँ उसके किरदार के अनुसार शुद्ध देसी.

कहानी का अंत उस प्रसंग से करना चाहूँगा जिसने मेरे मन में भी कई सवाल खड़े किए हैं. फ़िल्म की रिलीज़ के अगले ही दिन जब मेरे घरशहरी दोस्त रामकुमार ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि ’क्यों न हम खुलकर यह कहें कि ’डेल्ही बेली’ एक ’एंटी-वुमन’ फ़िल्म है’ तो मुझे यह बात खटकी. मैंने अपनी असहमति दर्ज करवाई. फिर मेरा ध्यान गया, वहीं नीचे उन्होंने वह संवाद उद्धृत किया था जिसके आधार पर वे इस नतीजे तक पहुँचे थे. मेरी याद्दाश्त के हिसाब से संवाद अधूरा उद्धृत किया गया था और अगर उसे पूरा उतारा जाता तो यह भ्रम न होता. मैंने यही बात नीचे टिप्पणी में लिख दी.

अगले ही पल रामकुमार का फ़ोन आया. पहला सवाल उन्होंने पूछा, “मिहिर भाई, आपने फ़िल्म इंग्लिश में देखी या हिंदी में?” बेशक दिल्ली में होने के नाते मैंने फ़िल्म इंग्लिश में ही देखी थी. पेंच अब खुला था. हम दोनों अपनी जगह सही थे. जो संवाद मूल अंग्रेज़ी में बड़ा जनतांत्रिक था उसकी प्रकृति हिन्दी अनुवाद में बिल्कुल बदल गई थी और वो एक खांटी ’एंटी-वुमन’ संवाद लग रहा था.

चेतावनी – आप चाहें तो आगे की कुछ पंक्तियाँ छोड़ कर आगे बढ़ सकते हैं. मैं बात समझाने के लिए आगे दोनों संवादों को उद्धृत कर रहा हूँ.

(Ye shadi nahi ho sakti. because this girl given me a BJ and being a 21st century man I also given her oral pleasure.)

(ये शादी नहीं हो सकती. क्योंकि इस लड़की ने मेरा चूसा है और बदले में मैंने भी इसकी ली है.)

इसी ज़मीन से उपजे कुछ मूल सवाल हैं जिनके जवाब मैं खुले छोड़ता हूँ आगे आपकी तलाश के लिए…

  • क्या ऐसा इसलिए होता है कि सिनेमा बनाने वाले तमाम लोग अब अंग्रेज़ी में सोचते हैं और अंग्रेजी में लिखे गए संवादों को ’आम जनता’ के उपयुक्त बनाने का काम कुछ अगंभीर और भाषा का रत्ती भर भी ज्ञान न रखने वाले सहायकों पर छोड़ दिया जाता है? क्या हमें सच में ऐसे असंवेदनशील अनुवादों की आवश्यकता है?
  • या यह एक सोची समझी चाल है. हिन्दी पट्टी के दर्शकों को लेकर सिनेमा ने एक ख़ास सोच बना ली है और ठीक वैसे जैसे ’इंडिया टुडे’ एक ही कवर स्टोरी का सुरुचिपूर्ण मुख्य पृष्ठ हिन्दी के पाठकों की ’सौंदर्याभिरुचि’ को देखते हुए बदल देती है, यह भी जान-समझ कर की गई गड़बड़ी है? यह मानकर कि हिन्दी का दर्शक बाहर चाहे कितनी गाली दे, भीतर ऐसे संवाद को इस बदले अंदाज़ में ही पसन्द करेगा? यह दृष्टि फ़िल्म के उन प्रोमो से भी सिद्ध होती है जहाँ इस संवाद को हमेशा आधा ही उद्धृत किया गया है.
  • क्या हमारी वर्तमान हिन्दी भाषा में वो अभिव्यक्ति ही नहीं है जिसके द्वारा हम ऊपर उद्धृत वाक्य के दूसरे हिस्से का ठीक हिन्दी अनुवाद कर पाएं?

भाषा का विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए आखिरी सवाल सबसे डरावना है. मैं चाहता हूँ कि कहीं से कोई आचार्य ह़ज़ारीप्रसाद द्विवेदी का शिष्य फिर निकलकर सामने आए और मुझे झूठा साबित कर दे. फिर कोई सुचरिता बाणभट्ट को याद दिलाए, “मानव देह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है, आर्य! यह विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है. यह नारायण का पवित्र मंदिर है. पहले इस बात को समझ गई होती, तो इतना परिताप नहीं भोगना पड़ता. गुरु ने मुझे अब यह रहस्य समझा दिया है. मैं जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा कलुष समझती थी, वही मेरा सबसे बड़ा सत्य है. क्यों नहीं मनुष्य अपने सत्य को देवता समझ लेता आर्य?”

सिकंदर का मुकद्दर

दृश्य एक :-

फ़िल्म – धोबी घाट (2011)

निर्देशक – किरण राव

हरे रंग की टीशर्ट पहने अकेला खड़ा मुन्ना शाय की उस लम्बी सी गाड़ी को अपने से दूर जाते देख रहा है. असमंजस में है शायद. ’क्लास’ की दूरियाँ इतनी ज़्यादा हैं मुन्ना की नज़र में कि वह कभी वो कह नहीं पाया जो कहना चाहता था. और अचानक वो भागना शुरु करता है. मुम्बई की भीड़ भरी सड़क पर दुपहिया – चौपहिया सवारियों की तेज़ रफ़्तार अराजकता के बीच अंधाधुंध भागना. बड़ी गाड़ियाँ उसका रास्ता रोक रही हैं बार-बार. आखिर वो पहुँचता है शाय तक. शीशे पर दस्तक देता है.

यही निर्णायक क्षण है.

वह अपनी डायरी में से फाड़कर एक पन्ना उसकी ओर बढ़ा देता है. कागज़ में अरुण का नया पता है. निश्चिंतता आ जाती है चेहरे पर. अब असमंजस और तनाव शाय के हिस्से हैं. भागती हुई फ़िल्म अचानक रुक जाती है. मुम्बई की अराजक गति में अचानक ठहराव आ गया है. शहर ख़रामा- ख़रामा साँसे ले रहा है.

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Shor-In-The-City-Movie-Wallpaperदृश्य दो :-

फ़िल्म – शोर इन द सिटी (2011)

निर्देशक द्वय – राज निदिमोरू एवं कृष्णा डी के

लुटेरों की गोली खाकर घायल पड़ा साठ साला बैंक का वॉचमैन हमारे नायक सावन द्वारा पूछे जाने पर कि “हॉस्पिटल फ़ोन करूँ?”, डूबती हुई आवाज़ में जवाब देता है, “पहले ये पैसे वापस वॉल्ट में रख दो”. यह वही वॉचमैन है जिसके बारे में पहले बताया गया है कि बैंक की ड्यूटी शुरू होने के बाद वो पास की ज्यूलरी शॉप का ताला खोलने जाता है. इस दिहाड़ी मजदूरी की सी नौकरी में कुछ और पैसा कमाने की कोशिश. दिमाग़ में बरबस ’हल्ला’ के बूढ़े चौकीदार मैथ्यू की छवि घूम जाती है जिसकी जवान बेटियाँ शादी के लायक हो गई थीं और जिसके सहारे फ़िल्म ने हमें एक ध्वस्त कर देने वाला अन्त दिया था. लेकिन यहाँ सावन के पास मौका है कि वह सारे पैसे लेकर भाग जाए. उसे भी पैसों की सख़्त ज़रूरत है. रणजी टीम का चयनकर्ता एकादश में चयन के लिए बड़ी रिश्वत मांग रहा है.

यही निर्णायक क्षण है.

ऐसे में वो एक ’बीच का रास्ता’ निकालता है. वो अपनी ज़रूरत के पैसे निकालकर बाक़ी पैसे वॉचमैन के कहे अनुसार फिर से बैंक के वॉल्ट में रख आता है. और आगे जो होना है वो यह कि जो पैसे उसने निकाले हैं उन्हें भी वो अपने काम में इस्तेमाल नहीं करेगा.

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दृश्य तीन :–

फ़िल्म – ओये लक्की! लक्की ओये! (2008)

निर्देशक – दिबाकर बनर्जी

लक्की अपनी ’थ्री एपीसोडिक’ कहानी के अंतिम हिस्से में है. डॉ. हांडा के साथ मिलकर खोला गया रेस्टोरेंट शुरु हो चुका है. फिर एक बार लक्की को समझ आया है कि डॉ. हांडा भी पिछली दोनों कहानियों का ही पुनर्पाठ हैं. बाहर उसके ही रेस्टोरेंट की ’ओपनिंग पार्टी’ चल रही है और कांच की दीवार के भीतर उसे बेइज़्ज़त किया जा रहा है. इसी गुस्सैल क्षण जैसे लक्की के भीतर का वही पुराना उदंड लड़का जागता है. वो कसकर एक मुक्का डॉ. हांडा के मुँह पर तानता है. बस एक क्षण और डॉ. हांडा की सारी अकड़ उसके हाथ में होगी.

यही निर्णायक क्षण है.

लेकिन नहीं, लक्की मुक्का नहीं मारता. उनका कॉलर झाड़ पीछे हट जाता है. निकल पड़ता है फिर अपनी ज़िन्दगी की अगली कहानी जीने. उन्हीं अनजान रास्तों पर. उन्हीं जाने-पहचाने ’अपनों’ से धोखा खाने.

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यह तीनों अपनी अपनी कहानियों के निर्णायक क्षण हैं. हमारे दौर की तीन सबसे बेहतरीन फ़िल्मों के तीन निर्णायक क्षण. वो क्या है जो अपनी जड़ों में गहरे पैठी इन कहानियों के तीन निर्णायक क्षणों को साथ खड़ा करता है? इनमें से हर कहानी हमारे महानगरीय जीवनानुभव के विविध-वर्गीय चारित्रिक स्वरूप और उन वर्गों के रोज़मर्रा के आपसी भौतिक और गैर-भौतिक लेन-देन में होती उठापटक को अपना विषय बनाती है. लेकिन सिर्फ़ यही मिलाप इन निर्णायक क्षणों के बीच का सूत्र नहीं. इनमें से हर फ़िल्म अपनी विषयवस्तु में कहीं न कहीं वर्गों के बीच खिंची इन सरहदी रेखाओं के धुंधला होने की ओर संकेत करती है. जैसे ’शोर इन द सिटी’ का नायक तिलक अपनी पत्नी को दुपहिया पर घुमाते हुए अगले साल एक बड़ी गाड़ी – नैनो – खरीदने का सपना दिखाता है. या याद कीजिए तस्वीरें लेती हुई शाय और कैमरे के सामने पोज़ देता मुन्ना. या फिर उस एक पर्फ़ेक्ट ’फ़ैमिली फ़ोटो’ की चाह में सोनल के साथ पहाड़ों की बर्फ़ पर घूमता लक्की.

लेकिन फिर आते हैं यह निर्णायक क्षण. और हर बार हमारा सिनेमा वर्गों के बीच खिंची इन गैर-भौतिक विभाजक रेखाओं को शहरी जीवन में पाई जाने वाली किसी भी भौतिक रेखा से ज़्यादा पक्का और अपरिवर्तनशील साबित करता है. हर मौके पर वर्ग की यह तयशुदा दीवारें पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर उभरती हैं. मुन्ना, सावन और लक्की तीनों अपने समाज के सबसे महत्वाकांक्षी लड़के हैं. अपने पूर्व निर्धारित वर्ग की चौहद्दियाँ तोड़ कर ऊपर की ओर जाती सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए सबसे आदर्श किरदार. यहाँ मज़ेदार यह देखना भी है कि इन्होंने अपने इस ऊर्ध्वागमन के लिए कौनसे रास्ते चुने हैं? क्रमश: बॉलीवुड, क्रिकेट और व्यापार का चयन यह दिखाता है कि हमारी लोकप्रिय संस्कृति इन दिनों ’जादुई सफ़लता’ के कौनसे किस्से सबसे सफ़लतापूर्वक गढ़ रही है. लेकिन ’आदर्श चयन’ होने के बावजूद तीनों उस अंतिम निर्णायक क्षण पीछे हट जाते हैं और वर्ग की पूर्व-निर्धारित दीवारें यथावत बनी रहती हैं. हाँ, अंत में सावन का चयन रणजी टीम में होता है लेकिन वह अंत पूरी फ़िल्म की खुरदुरी असलियत पर एक बेहुदा मखमल के पैबन्द सा नज़र आता है.

यह हिन्दी सिनेमा का नया यथार्थवाद है.

Shor-in-the-City’शोर इन द सिटी’ और भी कई मज़ेदार तरीकों से इन अदृश्य वर्गीय दीवारों को खोलती चलती है. इसमें दो समांतर चलती कहानियों का आगे बढ़ता ग्राफ़ असलियत को बहुत रोमांचक तरीके से हमारे सामने खोलता है. कहानी के केन्द्र में मौजूद तिलक और अभय के चरित्र कहानी आगे बढ़ने के साथ विपरीत ग्राफ़ रचते हैं. एक ओर तिलक का चरित्र है जिसका शुरुआती प्रस्थान बिन्दु एक अपहरण अंजाम देना है, लेकिन उसकी पढ़ने की चाह (जिसमें गहरे कहीं अपने ’स्टेटस’ को ऊपर उठाने की चाह छिपी है) उसे वाया पाउलो कोएलो के ’एलकेमिस्ट’ से होते एक सभ्य नागर समाज की सदस्यता की ओर ले जा रही है. दूसरी ओर विदेश से आया उसी नागर समाज का सम्मानित सदस्य अभय है जिसे कहानी का ग्राफ़ गैरकानूनी गतिविधियों की ओर ले जा रहा है.

कहानी के किसी मध्यवर्ती मोड़ पर आते लगता है कि इनकी समांतर चलती कहानियों के ग्राफ़ एक दूसरे को काटकर विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ जायेंगे. अर्थात तिलक अपनी नई मिली दार्शनिक समझदारी के चलते समाज में एक सम्मानित स्थान की ओर अग्रसर होगा और अभय हिंसा भरे जिस मायाजाल में उलझ गया है उसे भेद पाने में असफ़ल रहेगा. लेकिन ऐसा होता नहीं. तिलक का अंत एक बैंक में गोली खाकर घायल पड़े ही होना है और अभय को हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बाद भी साफ़ बचकर निकल जाना है. यही इनकी वर्गीय हक़ीकत है जिसे इन फ़िल्मों का कोई किरदार झुठला नहीं पाता. यही वो रेखा है जिसे भेदकर निकल जाने की कोशिश ने इन कहानियों को बनाया है, लेकिन यह हमेशा ही एक असफ़ल होने को अभिशप्त कोशिश है.

‘धोबी घाट’ के किरदारों के वर्गीय चरित्र किस बारीकी से आपके सामने आते हैं इसे बरदवाज रंगन ने अपनी समीक्षा में एक मज़ेदार उदाहरण द्वारा बड़ी खूबसूरती से दिखलाया है. यहाँ एक किरदार है ’राकेश’ का. राकेश वो प्रॉपर्टी डीलर है जिसने अरुण को उसका नया घर दिलवाया है. फ़िल्म में कुछ सेकंड भर को नज़र आने वाला यह किरदार उस बातचीत में अचानक एक व्यक्तित्व पा लेता है जहाँ हम उसकी आवाज़ तक नहीं सुन रहे हैं. घर की बंद अलमारी में कुछ पुराना सामान मिलने पर अरुण जब राकेश को फ़ोन करता है तो हम सिर्फ़ वही सुन पाते हैं जो इस तरफ़ खड़ा अरुण बोल रहा है. संवाद कुछ यूँ हैं,

“हाँ राकेश, पहले जो लोग यहाँ रहते थे ना, उनका कुछ सामान रह गया है.”
“कुछ टेप हैं. एक अंगूठी और…”
“नहीं… चांदी की है.”
“क्यों? मकान मालिक को दे दो ना.”
“कोई पूछेगा तो?”
“ठीक है फैंक देता हूँ यार. लेकिन फिर बाद में मांगना मत.”

आप ख़ाली स्थानों को भरते हैं और समझ पाते हैं कि राकेश यहाँ भी किसी संभावित आर्थिक फ़ायदे की सोच रहा है. सोने की या हीरे की अंगूठी हो तो उसकी कीमत अपने आप में बहुत है. इस एकतरफ़ा वार्तालाप में वह प्रॉपटी डीलर अपना व्यक्तित्व, अपना वर्गीय चरित्र पा लेता है.

dhobi ghatऔर यहाँ बहुल वर्गों के आपसी रिश्ते अपनी तमाम जटिलताओं के साथ जगह पाते हैं. निम्नवर्ग से आने वाली शाय की आया उसे मुन्ना से दूर रहने की सलाह देती है. मुन्ना जो खुद उसी निम्नवर्ग से आया चरित्र है. रंगन यहाँ सहज ही अमेरिकन क्लासिक ’गेस हूस कमिंग टू डिनर’ की आया माटिल्दा को याद करते हैं जिसे एक काले अंग्रेज़ का का अपनी गोरी मालकिन की बिटिया से रिश्ता फूटी आँख नहीं सुहाता. यह बावजूद इसके कि वह खुद एक ब्लैक है. कई बार आपकी वर्गीय पहचान आपकी प्रतिक्रिया को सहज ही तयशुदा धारा से विपरीत दिशा में मोड़ देती है.

इस शहर में प्यार करने को भी जगह कम पड़ती है. ’शोर इन द सिटी’ के एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य में समन्दर किनारे आधे चांद की परिधि सी बिछी उस मरीन ड्राइव पर प्यार के चंद लम्हें साथ बांटते सावन और सेजल शादी की बात पर आपस में झगड़ पड़ते हैं. कैमरे का ध्यान टूटता है और दिखाई देते हैं छ:- छ: फ़ुट की दूरी पर क्रम से बैठे ऐसे ही अनगिनत जोड़े. सब अपनी ज़िन्दगी के सबसे कीमती चंद निजी क्षण यूँ जीते हुए मानो उन्हें इस शहर से बांटने आए हों. यह शहर भी तो माशूका है. एक दूसरे लेकिन इतने ही खूबसूरत और बारीकियत वाले दृश्य में तिलक दुपहिया पर अपनी नई-नवेली पत्नी को घुमाते हुए शहर की ख़ास जगहें दिखाता चलता है. इनमें मुम्बई का वो ट्रैफ़िक सिग्नल भी शामिल है जिसके आगे ’गरीबों की गाड़ी’ ऑटो नहीं जा सकता, सिर्फ़ ’अमीरों की गाड़ी’ कार या टैक्सी का जाना ’अलाउड’ है. यह नमूना भर है कि कैसे शहर में वर्गों के आभासी दायरे हमारी सीधी नज़रों में आए बिना ठोस ज़मीनी हक़ीकत पा लेते हैं. उधर ’धोबी घाट’ में हमेशा अपने बदलते घरों में कैद रहने वाला अरुण अब यास्मिन की नज़रों से शहर को देख रहा है. जैसे ज़िन्दगी जीने के कुछ नए हुनर सिखा रही हैं ये चिठ्ठियाँ उसे.

Oye_lucky_lucky_oye’शोर इन द सिटी’ में तिलक का किरदार मुझे ख़ासकर बहुत दूर तक आकर्षित करता रहा. अगर ’प्रॉड्यूसर का भाई’ वहाँ न होता अपनी एक्टिंग से सब गुड़गोबर करने को, तो वह बीते कुछ समय में हिन्दी सिनेमा में देखा गया सबसे रोचक किरदार होना था. समाज के निचले तबके से आया तिलक वह किरदार है जिसे एक बेस्टसेलर किताब की बिकाऊ सूक्तियों में अचानक अपने रूखे यथार्थ से निकलने का रास्ता दिखाई देने लगता है. उसकी भी महत्वाकांक्षायें हैं लेकिन अब वो उसके दो दोस्तों रमेश और मंडूक की महत्वाकांक्षाओं से अलग राह ले चुकी हैं. यहाँ तिलक अपनी वर्गीय पहचान बदलने की चाह रखने वाले निम्नवर्गीय हिन्दुस्तानी का सच्चा प्रतिनिधि बन जाता है. अब उसे सिर्फ़ पैसा नहीं चाहिए. उसे समाज में इज़्ज़त चाहिए, मान चाहिए. और ठीक दिबाकर के ’लक्की सिंह’ की तरह वो समझ चुका है कि वर्तमान समाज की गैर-बराबरियों में यह दोनों चीज़ें एक-दूसरे की पर्यायवाची नहीं हैं.

दिबाकर बनर्जी की आधुनिक क्लासिक ’ओये लक्की! लक्की ओये!’ का ’लक्की सिंह’ शहर में अकेला समय के साथ चौड़े होते गए इन्हीं आभासी वर्गीय दायरों को भेदने के लिए प्रयासरत था. हमेशा असफ़ल होने को अभिशप्त एक प्रयास. और हर मायने में दिबाकर की फ़िल्में इन नव प्रयासों की पूर्ववर्ती हैं. नब्बे के मुख्यधारा सिनेमा पर यह बड़ा आरोप है कि उसने अपनी वर्गीय समझदारियाँ बड़ी तेज़ी से खोई हैं. औए मल्टीप्लेक्स के आने के साथ अपने समाज को लेकर इस नासमझी में और इज़ाफ़ा ही हुआ है. ऐसे में यह नया सिनेमा हमारे महानगर में दिखाई देती विभिन्न वर्गीय पहचानों और उनकी नियतियों को लेकर अपनी समझदारी से आश्वस्त करता है. भले ही इसका टोन आक्रोश का न होकर व्यंग्य का है, लेकिन यही सिनेमा सत्तर और अस्सी के दशक के ’समांतर सिनेमा आन्दोलन’ का सच्चा उत्तराधिकारी है. क्योंकि इसके पास झूठे सपनों पर जीते किरदार तो बहुत हैं, लेकिन यह हमें झूठे सपने नहीं दिखाता.

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हिन्दी साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के जून अंक में प्रकाशित.

तारे ज़मीं पर : कान फ़िल्मोत्सव

कान फ़िल्मोत्सव का संक्षिप्त परिचय पत्र दोस्त दुष्यंत के आग्रह पर.
आज ही  सुबह डेली न्यूज़ के रविवारीय ’हम लोग’ में प्रकाशित हुआ.

Midnight_in_Parisवैसे तुलनाएं हमेशा ही नाजायज़ कोशिश होती हैं लेकिन फिर भी समझने के लिहाज से कहा जाए तो जैसे ऑस्कर विश्व सिनेमा के ’फ़िल्मफ़ेयर’ हैं वैसे ही कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल की जीत ’राष्ट्रीय पुरस्कार’ जैसे किसी सम्मान सरीख़ी है. ऑस्कर जहाँ मूलत: अमेरिकन पुरस्कार हैं और उनमें ज़्यादा बोलबाला हमेशा हॉलीवुड की फ़िल्मों का ही होता है, कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल हमारे सामने विश्व सिनेमा की विविधरंगी और कुछ ज़्यादा लोकतांत्रिक तस्वीर प्रस्तुत करता है. लेकिन कान फ़िल्मोत्सव का अर्थ सिर्फ़ इतना भर नहीं. यह सारे संसार की बहु-भाषा भाषी सिनेमाई दुनिया को एक मंच पर इकठ्ठा करता एक ऐसा बहुरंगी मेला है जिसका जोड़ कायनात में कहीं और मिलना मुश्किल है. फ्रांस के दक्षिणी किनारे पर बसे छोटे से शहर कान को हर साल मई के महीने में होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह ने विश्व पटल पर अविस्मरणीय पहचान दिलवाई है. द्वितीय विश्व युद्ध के ख़ात्मे के साथ ही साल 1946 में इस सालाना समारोह की शुरुआत हुई थी और धीरे-धीरे इसने न केवल यूरोपीय सिनेमा जगत में बल्कि विश्व सिनेमा परिदृश्य पर अपनी अमिट जगह बनाई.

इस साल भी भूमध्यसागर किनारे सिनेमा का यह मेला अपनी पूरी रंगत बिखेरता चल रहा है. इस वर्ष मुख्य स्पर्धा के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष रॉबर्ट डि नीरो हैं. प्रेम कहानियों के मास्टर वुडी एलन की ’मिडनाइट इन पेरिस’ से शुरु हुए इस सालाना जलसे में स्पेनिश पैद्रो अल्मोदोवार की ’द स्किन आई लिव इन’, लार्स वॉन ट्रायर की ’मैलेंकॉलिया’ तथा सीन पेन और ब्रैड पिट जैसे अभिनेताओं से सजी अमेरिकन फ़िल्म ’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ मुख्य स्पर्धा वर्ग में शामिल हैं. इनके अलावा कोरिया के जाने माने निर्देशक किम-की-डुक और अमेरिकन गस वान सांत की नई फ़िल्में Un Certain regard खंड में दिखाई जायेंगी. कान फ़िल्मोत्सव इस बार विशेष पहल के तहत उन दो ईरानियन फ़िल्मकारों को सम्मानित कर रहा है जिन्हें ईरान की सरकार ने एक तानाशाही फ़रमान सुनाकर कैद में डाल रखा है. इसी सम्मान के तहत जफ़र पनाही और मोहम्मद रसूलोव की फ़िल्में ’गुडबाय’ और ’दिस इज़ नॉट ए फ़िल्म’ महोत्सव में दिखाई जायेंगी. यह एक गैर लोकतांत्रिक सत्ता के विपक्ष को रचता कलात्मक प्रतिरोध है. यह याद दिलाता है 2004 की उस शाम की जब क्वेन्टिन टेरेन्टीनो की अध्यक्षता वाली निर्णायक समिति ने माइकल मूर की ’फ़ेरेनहाइट 9/11’ को समारोह की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुनकर तत्कालीन अमानवीय अमेरिकन सत्ता और उनके उदंड सिपहसालार को प्रतिरोध का रचनात्मक काला झंडा दिखाया था.

वैसे इस बार का समारोह एक बड़े विवाद के भी नाम रहा जब ’मैलेंकॉलिया’ के निर्देशक लार्स वॉन ट्रायर की हिटलर को लेकर कही गई कुछ विवादित टिप्पणियों ने उन्हें समारोह से निष्कासित करवा दिया. यह कान में अपनी तरह का पहला मामला है. हालांकि आयोजकों द्वारा कहा गया कि उनकी फ़िल्म मुख्य स्पर्धा में बनी रहेगी.

हिन्दुस्तानी सिनेमा विश्व पटल पर अब भी अपनी सही जगह और पहचान की तलाश में है, और कान फ़िल्मोत्सव भी इसका अपवाद नहीं है. लेकिन मज़ेदार बात यह जानना है कि कान फ़िल्मोत्सव के पहले ही साल भारतीय सिनेमा ने वहाँ अपनी धमक सुनवाई थी. ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी और चेतन आनंद द्वारा निर्देशित ’नीचा नगर’ को उन्नीस सौ छियालीस में हुए कान फ़िल्मोत्सव में ’ग्रैंड प्रिक्स’ पुरस्कार से नवाजा गया था. आगे भी सत्यजित राय और एम. एस. सथ्यू जैसे निर्देशकों ने सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म सम्मान के लिए नामांकन पाया, लेकिन ’पाल्म डे’ओर’ (Palme d’Or) या कहें गोल्डन पाल्म भारतीय निर्देशकों से कुछ दूरी पर ही रहा. वैसे कान के गोल्डन पाल्म का इतिहास सिनेमा के पुराने धुरंधरों फ़ेलिनी, कुरोसावा और कोपोला से लेकर आधुनिक सिनेमाई उस्तादों सोडरबर्ग, लार्स वॉन ट्रायर और माइकल हनेके के नामों से जगमगाता रहा है.

Piraviउन्नीस सौ अठत्तर में कान फ़िल्मोत्सव में एक नया वर्ग Un Certain regard नाम से शुरु किया गया. यह विश्व सिनेमा में हो रहे नए और चुनौतीपूर्ण काम को उत्सव के पटल पर रेखांकित करने का प्रयास था. इस वर्ग में हिन्दुस्तानी सिनेमा ने लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है. मणि कौल की फ़िल्म ’सतह से उठता आदमी’, मृणाल सेन की ’खंडहर’, शाजी करुण की ’पीरावी’ और ’वानप्रस्थम’, गौतम घोष की ’गुड़िया’ तथा पिछले साल आई विक्रमादित्य मोटवाने की ’उड़ान’ जैसी कई फ़िल्मों ने इस खंड में स्थान पाया.

कान जैसे उत्सवों में हिन्दुस्तानी सिनेमा अपनी ठोस पहचान क्यों नहीं बना पाता? अडूर गोपालकृष्णन (जिनकी फ़िल्म ’इलिप्पाथायम’ 1982 के कान फ़िल्मोत्सव के लिए चुनी गई थी) इस कथन को आलोचनात्मक नज़र से देखते हैं. उनका कहना है, “कान जैसे फ़िल्मोत्सव का सिनेमाई नज़रिया बड़ा यूरोपीय-अमेरिकी झुकाव वाला होता है जो हमारे सिनेमा से काफ़ी अलग है. न तो हम जापान जैसे ’सुदूर-पूर्व’ वाले देश हैं और न ही पश्चिम. हम कहीं बीच में अटके हैं उनकी नज़र में. हमारी संस्कृति की सही समझ पश्चिम में अब भी काफ़ी कम है. और सिनेमा की तारीफ़ तो उस देश की संस्कृति और लोगों के बारे में समझ से ही निकलती है.”

अनुराग कश्यप का कहना है कि विश्व सिनेमा पटल पर हिन्दी सिनेमा की ऐसी छवि बनी हुई है जैसे वो कोई मसखरा हो. लेकिन सच में ऐसा है नहीं. और अब हिन्दी सिनेमा भी केवल ’नाच-गाने’ वाला सिनेमा नहीं रहा. वैसे इस छवि को पोषित करने में कुछ गलती हमारी भी है. जैसे इस साल कान में दिखाई गई शेखर कपूर द्वारा बनाई फ़िल्म “बॉलीवुड : ग्रेटेस्ट लव स्टोरी एवर टोल्ड” हिन्दी सिनेमा की कुछ ऐसी ही स्टीरियोटाइप छवि प्रस्तुत करती है और इस वजह से उसे काफ़ी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है.

’राष्ट्रवाद’ का सिनेमाई उत्सवगान

“ यह दीप अकेला स्नेह भरा,
है गर्व भरा मदमाता पर,
इसको भी पंक्ति दे दो ”
– अज्ञेय

mother-indiaबीते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। और जैसा किसी भी ‘कल्पित समुदाय’ के निर्माण में होता है, उस दौर के लोकप्रिय जनमाध्यम का अध्ययन इस ‘राष्ट्रीय भावना’ के निर्माण को बड़े दिलचस्प अंदाज में आपके सामने रखता है। मजेदार बात यह है कि नवस्वतंत्र मुल्क में जब हमारा समाज इस विचार को अपने भीतर गहरे आत्मसात कर रहा था, सिनेमा एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह वहां मौजूद रहा। यही वो दौर है जिसे हिंदी सिनेमा के ‘सुनहरे दौर’ के तौर पर भी याद किया जाता है।

पारिवारिक और सामुदायिक पहचानों में अपने को तलाशते और चिह्नित करते नवस्वतंत्र मुल्क की जनता को ‘राष्ट्र-राज्य’ की वैधता और आधिपत्य का पाठ पढ़ाने का काम हमारा लोकप्रिय सिनेमा करता है। और प्रक्रिया में वह दो ऐसे काम करता है, जिन्हें समझना ‘आधुनिकता’ के भारतीय मॉडल (जिसे आप सुविधा के लिए ‘नेहरुवियन आधुनिकता’ भी कह सकते हैं) को समझने के लिए कुंजी सरीखा है। पहला तो यह कि वह व्यक्ति की पुरानी वफादारियों (पढ़ें समुदाय, परिवार) के ऊपर राज्य की सत्ता को स्थापित करने के लिए पूर्व सत्ता को विस्थापित नहीं करता, बल्कि उन पुरानी वफादारियों को ही वह ‘राष्ट्र’ के रूपक में बदल देता है। इससे सहज ही और बिना किसी मौलिक परिवर्तन के इस नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता को वैधता मिल जाती है।

इसे उदाहरण के माध्यम से समझें। सुमिता चक्रवर्ती लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर अपने सर्वप्रथम अकादमिक कार्य में दो आइकॉनिक हिंदी फिल्मों को इस संदर्भ में व्याख्यायित करती हैं। सबसे पहले याद आती है, महबूब खान की अविस्मरणीय ‘मदर इंडिया’ जहां मां – देवी मां और भारत मां के बीच की सारी रेखाएं मिट जाती हैं। सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “एक विचार के तौर पर मदर इंडिया हिंदुस्तान के कई हिस्सों में पूजी जाने वाली ‘देवी मां’ के कल्ट से उधार लिया गया है।” वे आगे लिखती हैं, “यह रस्मी गौरवगान समाज में होने वाले स्त्री के सामाजिक शोषण और उसकी गैर-बराबर सामाजिक हैसियत के साथ-साथ चलता है। लेकिन हिंदुस्तानी समाज में एक ‘मां’ के रूप में स्त्री की छवि सिर्फ एक ‘स्त्री’ भर होने से कहीं ऊंची है।” यहां हिंदुस्तानी समाज में पहले से मौजूद एक धार्मिक प्रतीक को फिल्म बखूबी राष्ट्रीय प्रतीक से बदल देती है। यह संयोग नहीं है कि फिल्म की शुरुआत इन ‘भारत माता’ द्वारा एक बांध के उदघाटन से दृश्य से होती है। वैसा ही एक बांध, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था। वैसा ही एक बांध जैसे बीते साठ सालों में लाखों लोगों की समूची दुनियाओं को ‘विकास’ के नाम पर अपने पेटे में निगलते गये हैं। ‘विकास’ के नेहरुवियन मॉडल की पैरवी करती यह फिल्म अंत तक पहुंचते हुए एक ऐसी व्यवस्था की पैरवी में खड़ी हो जाती है, जहां ‘बिरजू’ जैसी अनियंत्रित (लेकिन मूल रूप से असहमत) आवाजों के लिए कोई जगह नहीं।

raj kapoorऐसा ही एक और मजेदार उदाहरण है राज कपूर की ‘आवारा’। यह राज्य की सत्ता के सबसे चाक्षुक हिस्से – कानून व्यवस्था, को परिवार के मुखिया पुरुष पर आरोपित कर देती है और इस तरह पारिवारिक वफादारी की चौहद्दी में रहते हुए भी व्यक्ति को राज्य-सत्ता की वैधता के स्वीकार का एक आसान या कहें जाना-पहचाना तरीका सुझाती है। ‘आवारा’ के संदर्भ में बात करते हुए सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “हिंदी सिनेमा देखने वाली जनता एक नये आजाद हुए मुल्‍क की नागरिक भी थी और यह जनता एक नागरिक के रूप में अपने परिवार और समुदाय की पारंपरिक चौहद्दियों से आगे अपने उत्तरदायित्व समझने में कहीं परेशानी महसूस कर रही थी। नये संदभों में उन्हें मौजूद मुश्किल परिस्थितियों को भी समझना था और बदलाव और सुधार का वादा भी ध्यान रखना था। यह वादा अब नयी एजेंसियों द्वारा किया जा रहा था और यह एजेंसियां थीं राज्य-सत्ता और उसकी अधिकार प्रणाली। क्योंकि ‘कानून-व्यवस्था’ आम जनमानस में राज्य की सत्ता का सबसे लोकप्रिय प्रतीक है, इसलिए हिंदी सिनेमा में एक आम नागरिक के जीवन में राज्य की भूमिका दिखाने का यह सबसे माकूल प्रतीक बन गया।”

फिल्म ‘आवारा’ में जज रघुनाथ की भूमिका में कानून-व्यवस्था के प्रतीक बने पृथ्वीराज कपूर न सिर्फ फिल्म में कानून के दूसरी तरफ खड़े नायक राज (राज कपूर) के जैविक पिता हैं, बल्कि असल जीवन में भी वह राज कपूर के पिता हैं। ऐसे में इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पहले से तय सोपान और अधिकार शृंखला में बिना किसी छेड़छाड़ के यह फिल्म नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की कानून-व्यवस्था की वैधता की स्थापना आम जनमानस में करती है।

दूसरा यह कि इस ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ की तलाश में वह तमाम इतर पहचानों को अनुकूलित भी करता चलता है। हिंदी सिनेमा के शुरुआती सालों में ‘जाति’ के सवाल सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बनते हैं लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, हमारा सिनेमा ऐसे सवाल पूछना कम करता जाता है। हमारे नायक-नायिकाओं के पीछे से इसी ‘सार्वभौम पहचान’ के नाम पर उनकी जातिगत पहचानें गायब होती जाती हैं। इस ‘राष्ट्रवाद’ का एक दमनकारी चेहरा भी है। साल 1954 में बनी ‘जागृति’ जैसी फिल्म, जिसे ‘बच्चों की फिल्म’ कहकर आज भी देखा-दिखाया जाता है, में ‘शक्ति’ की मौत जैसे अजय के ‘शुद्धीकरण’ की प्रक्रिया में आखिरी आहूति सरीखी है। शक्ति की मौत अजय को एकदम ‘बदल’ देती है। अब वह एक ‘आदर्श विद्यार्थी’ है। किताबों में डूबा हुआ। आखिर ‘शक्ति’ की मौत ने अजय को अपने देश और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करवा ही दिया! और फिर ऊपर से ‘शेखर’ जैसे अध्यापक दृश्य में मौजूद हैं, जो फिल्म के अंत तक आते-आते एकदम नियंत्रणकारी भूमिका में आ जाते हैं। यहां भी फिल्म तमाम ‘अन्य पहचानों’ का मुख्यधारा के पक्ष में बड़ी सफाई से अनुकूलन कर देती है।

jagritiइस समूचे प्रसंग को एक प्रतीक रूप में देखें तो बड़ी क्रूर छवि उभरकर हमारे सामने आती है। सुमिता चक्रवर्ती फिल्म ‘जागृति’ पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, “यहां कमजोर की कुर्बानी दी जाती है, जिससे बलशाली आगे जिये और अपनी शक्ति को पहचाने। ‘शक्ति’ न सिर्फ शारिरिक रूप से कमजोर है, गरीब और दया के पात्र की तरह दिखाया गया है। उसे साथी बच्चों द्वारा उसकी शारीरिक अक्षमता के लिए चिढ़ाया जाता है। लेकिन वह सुशील और उच्च नैतिकता वाला बच्चा है, जिसे फिल्म अपने पवित्र विचारों के प्रगटीकरण के लिए एक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करती है। लेकिन उसे मरना होगा (दोस्ती की खातिर) उस मिथ को जिलाये रखने के लिए। एकीकृत जनता का मिथ।”

अगर लोकप्रिय सिनेमा के ढांचे पर इस राष्ट्रवादी बिंब को आरोपित कर देखें, तो यह अनुकूलन बहुत दूर तक जाता है। मुख्य नायक हमेशा एक ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ लिये होता है (जो आमतौर पर शहरी-उच्चवर्ण-हिंदू-पुरुष की होती है) और उसके दोस्त या मददगार के रूप में आप किसी अन्य धार्मिक या सामाजिक पहचान वाले व्यक्ति को पाते हैं। तो ‘जंजीर’ में ईमानदार नायक ‘विजय’ की सहायता के लिए ‘शेर खान’ मौजूद रहता है और ‘लक्ष्य’ में नायक ‘करण शेरगिल’ की सहायता के लिए ‘जलाल अहमद’। फिल्म ‘तेजाब’ में तड़ीपार नायक ‘मुन्ना’ को वापस ‘महेश देशमुख’ की पहचान दिलाने की लड़ाई में ‘बब्बन’ जैसे इतर पहचान वाले दोस्त ‘कुर्बान’ हो जाते हैं, और ‘लगान’ के राष्ट्रवादी उफान में ‘इस्माइल’ से लेकर ‘कचरा’ की भूमिका हमेशा मुख्य नायक ‘भुवन’ (उच्चवर्ण हिंदू) के सहायक की ही रहती है।

एक तय प्रक्रिया के तहत सिनेमा का यह राष्ट्रवादी विमर्श तमाम ‘इतर’ पहचानों को सहायक भूमिकाओं में चिह्नित करता जाता है और हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती। और फिर एक दिन अचानक हम ‘गदर’ या ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म को देख चौंक जाते हैं। क्यों? क्या जिस अनुकूलन की प्रक्रिया का हिंदी सिनेमा इतने सालों से पालन करता आया है, उसकी स्वाभाविक परिणिति यही नहीं थी? हम ऐसा सिनेमाई राष्ट्रवाद गढ़ते हैं, जिसमें तमाम अल्पसंख्यक पहचानें या तो सहायक भूमिकाओं में ढकेल दी जाती हैं या वह मुख्य नायक के कर्मपथ पर कहीं ‘कुर्बान’ हो जाती हैं। क्या यह पूर्व तैयारी नहीं है ‘गदर’ जैसी फिल्म की, जो अन्य धार्मिक पहचान को सीधे तौर पर खलनायक के रूप में चिह्नित करती है? ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म, जिसे इस बहुचर्चित छद्मवाक्य, “सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते, लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं” के प्रमाण-पत्र के रूप में पढ़ा जा सकता है, क्या उन फिल्मों का स्वाभाविक अगला चरण नहीं है जिनमें मुसलमान चरित्र हमेशा दोयम दर्जे की सहायक भूमिका पाने को अभिशप्त हैं?

और सवाल केवल धार्मिक पहचान का ही नहीं। मैंने एक और लेख में ‘हिंदी सिनेमा में प्रेम’ पर लिखते हुए यह सवाल उठाया था कि क्या ‘शोले’ में जय और राधा की प्रेम-कहानी का अधूरा रह जाना एक संयोग भर था? क्या यह पहले से ही तय नहीं था कि जय को आखिर मरना ही है। और फर्ज करें कि अगर ‘शोले’ में यह प्रेम-कहानी, जो सामाजिक मान्यताओं के ढांचे को हिलाती है, पूर्णता को प्राप्त होती तो क्या तब भी ‘शोले’ हमारे सिनेमाई इतिहास की सबसे लोकप्रिय फिल्म बन पाती? यह सवाल मैं यहां इसीलिए जोड़ रहा हूं क्योंकि एक विधवा से शादी करने के फैसले के साथ खुद ‘जय’ भी एक अल्पसंख्यक पहचान से खुद को जोड़ता है। और उसका भी वही क्रूर अंजाम होता है, जिसकी परिणति आगे जाकर ‘राष्ट्रवादी अतिवाद’ में होती है। चाहें तो ‘राष्ट्रवाद’ का यह अतिवादी चेहरा देखने के लिए हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद की लिखी ‘क्रांति’ तक आएं, जहां एक अधपगली दिखती स्त्री की ओर इशारा कर नायक मनोज ‘भारत’ कुमार कहता है कि यह अभागी अपने पति के साथ सती हो जाना चाहती थी, इन जालिम अंगेजों ने वो भी न होने दिया।

इन्हें भारतीय आधुनिकता के मॉडल के ‘शॉर्टकट’ कहें या ‘षड्यंत्र’, सच यही है कि इन्हीं चोर रास्तों में कहीं उन तमाम अतिवादी विचारों के बीज छिपे हैं, जिन्हें भारत ने बीते सालों में अनेक बार रूप बदल-बदल कर आते देखा है। जब हम पारिवारिक सत्ता के और धार्मिक मिथकों में ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता के बिंब को मिलाकर परोस रहे थे, उस वक्त हमने यह क्यों नहीं सोचा कि आगे कोई इस प्रक्रिया को उल्टी तरफ से भी पढ़ सकता है? और ऐसे में ‘राष्ट्र-राज्य’ और उसकी सत्ता किसी खास बहुसंख्यक पहचान के साथ जोड़ कर देखी जाएगी और लोग इसे स्वाभाविक मानकर स्वीकार कर लेंगे? आज ऐसा होते देखकर हम भले ही कितना बैचैन हों और हाथ-पांव मारें। सच्चाई यही है कि यह हमारी ‘आधुनिकता’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मॉडल की स्वाभाविक परिणिति है।

और अंत में : कुछ अपनी बात, गांधी की बात

बीते दिनों में महात्मा गांधी का नाम लौट-लौटकर संदर्भों में आता रहा। लेकिन यह जिक्र तमाम संदर्भों से गायब है कि आज भारतीय राष्ट्रवाद के पितृपुरुष घोषित किये जा रहे इस व्यक्ति को जीवन के अंतिम दिनों में इसी नवस्वतंत्र देश ने नितांत अकेला छोड़ दिया था। गांधी द्वारा उठाये जा रहे असुविधाजनक सवाल इस नवस्वतंत्र मुल्क के राष्ट्रवादी विजयरथ की राह में बाधा की तरह थे। राष्ट्र उत्सवगान में व्यस्त है, संशयवादियों के लिए उसके पास समय नहीं। जिस गांधी के नैतिक इच्छाशक्ति पर आधारित फैसलों के पीछे पूरा मुल्क आंख मूंदकर खड़ा हो जाता था, आज उसे संशय में पाकर वही मुल्क उसे कठघरे में खड़ा करता था। ठीक उस वक्त जब यह नवस्वतंत्र देश ‘नियति से साक्षात्कार’ कर रहा था, महात्मा सुदूर पूर्व में कहीं अकेले थे। अपनी नैतिकताओं के साथ, अपनी असफलताओं के साथ।

सुधीर चंद्र गांधी पर अपनी नयी किताब में उस वक्त कांग्रेस के सभापति आचार्य कृपलानी के वक्तव्य, “आज गांधी खुद अंधेरे में भटक रहे हैं” को उद्धृत करते हुए एक वाजिब सवाल उठाते हैं, “कृपलानी के कहे को लेकर बड़ी बहस की गुंजाइश है। पूछा जा सकता है कि 1920 में, असहयोग आंदोलन के समय और उसके बाद क्या लोगों को गांधी की अहिंसा के कारगर होने के बारे में शक नहीं होता रहता था? कितनी बार उन तीस सालों के दौरान संकटों का सामना होने पर गांधी लंबी अनिश्चितता और आत्म संशय से गुजरने के बाद ही उपयुक्त तरीके को तलाश कर पाये थे? वैसे ही जैसे कि इस वक्त, जब कृपलानी और कांग्रेस और देश गांधी को अकेला छोड़ने पर आमादा थे।”

सवाल वाजिब है। लेकिन एक बड़ा अंतर है, जो गांधी के पूर्ववर्ती अहिंसक आंदोलनों और उपवास को इस अंतिम दौर से अलगाता है। राष्ट्रवाद की जिस उद्दाम धारा पर गांधी के पूर्ववर्ती आंदोलन सवार रहे और अपार जनसमर्थन जिनके पीछे शामिल था, वह इन अंतिम दिनों में छिटक कर कहीं दूर निकल गयी थी। कभी यही ‘राष्ट्रवाद‘ उनका हथियार बना था। यह राष्ट्रवाद और अखंडता का ’पवित्र मूल्य‘ ही था, जिसके सहारे गांधी अंबेडकर से एक नाजायज बहस में ’जीते‘ थे। गांधी के आभामय व्यक्तित्त्व के आगे यह तथ्य अदृश्य रहा, लेकिन जब देश के सामने चुनने की बारी आयी, तो उसने ’राष्ट्र‘ के सामने ’राष्ट्रपिता‘ को भी पार्श्व में ढकेल दिया। कड़वा है लेकिन सच है, अपने देश के अतिवादी राष्ट्रवाद की पहली बलि खुद ’राष्ट्रपिता’ थे।

‘राष्ट्रवाद’ अपने आप में कोई इकहरा विचार नहीं। इसलिए सरलीकरण का खतरा उठाते हुए कह रहा हूं कि ‘राष्ट्रवाद’ आधुनिक दौर की सबसे वर्चस्ववादी और सर्वग्राह्य विचारधारा है। इसके आगे किसी और की नहीं चलती। यह सिद्धांतत: ‘ब्लैक होल’ की तरह है, किसी भी व्यक्ति / विचार / असहमति को समूचा निगलने में सक्षम। समझ आता है कि क्यों ओरहान पामुक पिछली हिंदुस्तान यात्रा में साहित्य के बारे में बात करते हुए कह गये थे, “साहित्य मानवता की अभिव्यक्ति है। लेकिन हमें समझना होगा कि मानवता और राष्ट्रवादी मानवता दो अलग-अलग चीजें हैं।”

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‘कथादेश’ के मई अंक में प्रकाशित

बड़े नसीबों का शहर है ये, जो इसकी किस्मतों में हम हैं लिखे

“यह शहर सिर्फ़ एक बहाना भर है आपके अच्छे या बुरे होने का. ज़्यादातर मामलों में बुरे होने का.”

Shor-In-The-City-Movie-Wallpaperलुटेरों की गोली खाकर घायल पड़ा साठ साला बैंक का वॉचमैन हमारे नायक सावन द्वारा पूछे जाने पर कि “हॉस्पिटल फ़ोन करूँ?”, डूबती हुई आवाज़ में जवाब देता है, “पहले ये पैसे वापस वॉल्ट में रख दो”. यह वही वॉचमैन है जिसके बारे में पहले बताया गया है कि बैंक की ड्यूटी शुरू होने के बाद वो पास की ज्यूलरी शॉप का ताला खोलने जाता है. इस दिहाड़ी मजदूरी की सी नौकरी में कुछ और पैसा कमाने की कोशिश. दिमाग़ में बरबस ’हल्ला’ के बूढ़े चौकीदार मैथ्यू की छवि घूम जाती है जिसकी जवान बेटियाँ शादी के लायक हो गई थीं और जिसके सहारे फ़िल्म ने हमें एक ध्वस्त कर देने वाला अन्त दिया था. राज और कृष्णा की क्रम से तीसरी फ़िल्म ’शोर इन द सिटी’ जयदीप की फ़िल्म की तरह उतनी गहराई में नहीं जाती, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि और फ़िल्मों की तरह यह शहर को कभी खलनायक नहीं बनने देती. अपनी पिछली फ़िल्म ’99’ की तरह यहाँ भी राज और कृष्णा बम-बंदूकों, धोखेबाज़ गुंडों, क्रिकेट और बेइमानी और अराजकता से भरे शहर की कहानी किसी प्रेम कथा की तरह प्यार से सुनाते हैं.

किसी अचर्चित सच्चाई की तरह समझ आता है कि हमारे शहरों पर ’एक ध्येय, एक मुस्कान, एक कहानी’ वाली फ़िल्में बनाना कैसे असंभव हुआ जाता है. अब तो यह भी ज़रूरी नहीं लगता कि इन समानांतर बहती नदियों के रास्ते में कोई ’इलाहाबाद’ आना ही चाहिए. ’शोर इन द सिटी’ की ये कहानियाँ तीनों कहानियों को जोड़ते उस घरेलू डॉन (और निर्देशक द्वय के प्यारे) अमित मिस्त्री की मोहताज नहीं हैं. बल्कि जब तक ये साथ नहीं आतीं, इनका आकर्षण कहीं ज़्यादा है. यह एक सद्चरित्र फ़िल्म है. बंदूकों के साए में आगे बढ़ती ’शोर इन द सिटी’ कभी आपको बंदूक के सामने खड़ा नहीं करती, हाँ कभी ऐन मौका आने पर उसे चलाना ज़रूर सिखाती है. शहर को लेकर इसका नज़रिया आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक है, जैसे अपने मुख्य शीर्षक को इसने अब अनिवार्य हक़ीक़त मानकर अपना लिया है. जिस ’गणेश विसर्जन’ को मुम्बई शहर की आधुनिक कल्ट क्लासिक ’सत्या’ में आतंक के पर्याय के तौर पर चित्रित किया है, वह यहाँ विरेचन का पर्याय है. बाक़ी फ़िल्म से अलग विसर्जन के दृश्य किसी हैंडीकैम पर फ़िल्माए लगते हैं. शायद यह उसकी ’असलियत’ बढ़ाने का एक और उपाए हो. जैसे आधुनिक शहर के इस निहायत ही गैर-बराबर समाज में अतार्किक बराबरियाँ लाने के रास्ते इन्हीं सार्वजनिकताओं में खोज लिए गए हैं.

पैसा उगाहने वाले गुंडों के किरदार में ज़ाकिर हुसैन और सुरेश दुबे उतना ही सही चयन है जितना विदेश से भारत आए हिन्दुतानी मूल ’अभय’ के किरदार में सेंदिल रामामूर्ति. साथ ही ’शोर इन द सिटी’ के पास ट्रैफ़िक सिग्नल पर बिकने वाली पाइरेटेड बेस्टसेलर्स छापने वाले और घर में उन्हीं किताबों को डिक्शनरी की सहायता से पढ़ने की असफ़ल कोशिश करने वाले ’तिलक’ जैसे बहु स्तरीय और एक AK56 बंदूक को अपना दिल दे बैठे ’मंडूक’ जैसे औचक-रोचक किरदार हैं. एक का तो निर्माता के भाई ने गुड़-गोबर कर दिया है. दूसरे किरदार में पित्तोबाश त्रिपाठी उस दुर्लभ स्वाभाविकता को जीवित करते हैं जिसने इरफ़ान ख़ान से लेकर विजय राज तक को हमारा चहेता बनाया है. पित्तोबाश, याद रखना. ’कॉमेडी बिकती है’ वाली भेड़चाल में यह मायानगरी तुम्हें अगला ’राजपाल यादव’ बनाने की कोशिश करेगी. तुम इनकी माया से बचना. क्योंकि तुम्हारी अदाकारी की ऊँचाई तुम्हें उन तमाम छ: फ़ुटे नायकों से ऊपर खड़ा करती है.

राज और कृष्णा की ’99’ में दिल्ली को लेकर कुछ दुर्लभ प्रतिक्रियाएं थीं. ऐसी जिन्हें मुम्बईवाले दोस्तों से मैंने कई बार सुना है, लेकिन हिन्दी सिनेमा शहरों को लेकर ऐसी बारीकियाँ दिखाने के लिए नहीं जाना जाता. लेकिन ’शोर इन द सिटी’ ने भी इस मामले में अपनी पूर्ववर्ती जैसा स्वभाव पाया है. यहाँ भी आप मुम्बई के उस ’रेड सिग्नल’ से परिचित होते हैं जिससे आगे गरीब की सवारी ’ऑटो’ नहीं, अमीर की सवारी ’टैक्सी’ ही चलती है. यह पूरी की पूरी पाइरेटेड दुनिया है जहाँ न सिर्फ़ किताबें और उनके प्रकाशक फ़र्जी हैं बल्कि बम-बंदूकें और उनसे निकली गोलियाँ भी. जब अच्छाई का कोई भरोसा नहीं रहा तो बुरी चीज़ों का भी भरोसा कब तक बना रहना था. यह कुछ-कुछ उस चुटकुले की याद दिलाता है जहाँ ज़िन्दगी की लड़ाई में हार आत्महत्या करने के लिए आदमी ज़हर की पूरी बोतल गटक जाए लेकिन मरे नहीं. एक और हार, कमबख़्त बोतल का नकली ज़हर भी उसका मुंह चिढ़ाता है. अब यह शहर निर्दयी नहीं, बेशर्म है. इस पाइरेटेड शहर की हर करुणा में चालाकियाँ छिपी हैं और ’भाई’ अकेला ऐसा है जिसे अब भी देश की चिंता है. यह ओसामा और ओबामा के बीच का फ़र्क मिट जाने का समय है. यह नकल के असल हो जाने का समय है.

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*शीर्षक निर्देशक द्वय की पिछली फ़िल्म ’99′ में इस्तेमाल हुए एक गीत से लिया गया है.

चपलताएं और ईमानदारियाँ : द व्हाइट बलून

The-White-Balloonयह एक छोटी बच्ची की नज़र से देखी गई दुनिया है. ईरानियन निर्देशक ज़फ़र पनाही की ’द व्हाइट बलून’ हमें अच्छाई में यकीन करना सिखाती है. ईरान से आयी इन फ़िल्मों में कोई ’विलेन’ नहीं होता. बस औसत जीवन की उलझनें होती हैं और उनसे निकली विडम्बनाएं. किसी मितकथा सी खुलती इस कहानी की नायिका एक सात साल की बच्ची है जिसका नाम है रज़िया. कहानी कहे जाने का दिन भी ख़ास है. ईरान में नया साल बस आने ही वाला है. रज़िया अपनी माँ के साथ बाज़ार आई है और यहीं उसका दिल दूर शीशे के पार तैरती एक सुनहरी मछली पर आ जाता है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि माँ को कैसे मनाया जाए? बाज़ार से घर तक वह रूठने-मनाने की सारी जुगत लगाती है, लेकिन माँ तो फिर माँ हैं. बड़ा भाई अली आता है और बहन की उदासी उससे देखी नहीं जाती. इस बीच वहीं-कहीं कुढ़ते-खीजते पिता भी हैं जो परदे पर कभी दिखते तो नहीं हैं लेकिन उनकी सत्ता घर के माहौल में घुली नज़र आती है.

खैर. माँ आखिर माँ हैं, मान जाती हैं. पैसा रज़िया के हाथ में थमाया जाता है और साथ हिदायतों की पोटली भी. और रज़िया फुदकती हुई दौड़ जाती है अपनी प्यारी मछली को अपना बनाने. लेकिन कमबख़्त रास्ते में एक भरा-पूरा ’बाज़ार’ पसरा है. भरमाता है, असल काम भुलाता है. बड़ों की दुनिया को रज़िया हैरत से देखती है. रुकती है, उलझ जाती है, फिर आगे बढ़ती है. समझ जाती है कि बड़ों की दुनिया में आपके पास ’पैसा होना’ सबसे ख़ास है. रज़िया अपनी प्यारी मछली तक पहुँचने की इस नाटकीय और कई दिलचस्प किरदारों से मिलकर बनती यात्रा में पैसा खोती भी है, पाती भी है. अंत तक आते हुए वह आप और हमें भी उसकी भोली उलझनों का साथी बना लेती है.

अब्बास किरोस्तामी के सहायक रहे ज़फ़र पनाही के कैमरा फ्रेम उनसे ज़्यादा चपल हैं. यह उनकी पहली ही फ़ीचर फ़िल्म है. यह ईरान की गलियाँ और चौक-चौबारे साथ कुछ यूँ दिखाते हैं जैसे उन्हें भी किरदारों सा महत्व देते हों. ’द व्हाइट बलून’ असल समय की रफ़्तार से चलती है. दो घंटे से भी कम के इस पूरे घटनाचक्र में लगातार आप नए साल के आने की आहट सुन सकते हैं. इस कारीगरी को और पुख़्ता करते हुए पनाही पहले ही दृश्य में फ़िल्म के तमाम मुख्य किरदारों की एक झलक दिखाते हैं. यहाँ सभी उन काम-धंधों की शुरुआत कर रहे हैं जिन्हें साथ लेकर वे आगे रज़िया की उलझनों से टकराएगें और अपनी बनते उसकी मदद भी करेंगे. फ़िल्म के माध्यम से हम ईरानी जीवन का एक औसत दिन बहुत नज़दीक से देख पाते हैं. रोज़ाना चलते कार्य-व्यापार, लेन-देन, बाज़ार की बहसबाज़ियाँ. एक पूरा दिन अपनी तमाम साधारणताओं के साथ, अपनी तमाम विलक्षणताओं के साथ.

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फ़िल्म का यह छोटा सा परिचय हाल ही में संपन्न हुए ’गोरखपुर फ़िल्म उत्सव’ की स्मारिका के लिए लिखा गया था.

पहुँचना ’127 आर्स’ तक बारास्ते ’आमिर’ के

127 hoursयह तुलना जैसे चांद और सूरज की जोड़ी बनाने जैसी है. एक दूसरे का विलोम होते हुए भी जहाँ से हम उन्हें देखते हैं, वे एक-दूसरे के पूरक नज़र आते हैं. दूसरा पहले से जितना दूर है उतना ही बड़ा भी है. पहला जब दूसरे के सामने आ जाता है तो हम दूसरे को आँखें खोल-खोल देखते हैं. जैसे चंदा मामा सूरज का ताला खोलने वाली चाबी हों. मेरे लिए डैनी बॉयल की ’127 आर्स’ की चाबी हमारे ही घर के चंदा ’आमिर’ में छिपी है. जैसे हंसल मेहता की ’दिल पे मत के यार’ रजत कपूर की ’मिथ्या’ के लिए नेगेटिव थी, ठीक वैसे ही ’127 हार्स’ की नेगेटिव राजकुमार वर्मा की ’आमिर’ है. यह एक ही कथा संरचना को दो भिन्न वातावरण में परखने जैसा है.

इन कहानियों का मूल विचार एक है. एक आम आदमी जिसकी साधारण सी ज़िन्दगी का एक सादा दिन अचानक ख़ास में बदल जाता है. परिस्थितियाँ उन्हें नीचा दिखाती हैं, जैसे कोई और अदृश्य शक्ति उनकी किस्मत लिख रही हो. लेकिन वहीं किसी निर्णायक क्षण में वे अपने भीतर के ’असाधारण’ को पहचानते हैं, बाज़ी पलट देते हैं. दूर से वीभत्स दिखती यह कहानियाँ दरअसल प्रेरक कथाएं है. इनके बीच अंतर बस इतना है कि जहाँ आमिर भीड़ में होते भी सदा अकेला है वहीं एरॉन अकेला होकर भी हमेशा अपनों के बीच है. आमिर को आप भीड़ भरे शहर के बीचोंबीच बदहवास भागता देखते हैं. अनगिनत अनजान घूरते चेहरों का सामना करता हुआ. शहर की इस भीड़ के बीच वो नितांत अकेला है. इसके विपरीत एरॉन ऐसे बीहड़ में जा फंसा है जहाँ रोज़ सुबह आती एक झपट्टामार चील के अलावा जीवन के चिह्न विरल हैं. लेकिन एरॉन को अपनों का साथ और उसकी कीमत पहचानने के लिए शायद ऐसे ही किसी बीहड़ की ज़रूरत थी. एक चट्टान का टुकड़ा जो सदियों से उसका इंतज़ार करता था आज उसकी ज़िन्दगी की कहानी लिखना चाहता है. लेकिन एरॉन वहाँ भी अकेला नहीं है, उसके साथ उसकी सारी दुनिया है. वो तय करता है कि अपनी कहानी वो खुद ही लिखेगा. यह संयोग नहीं है कि तकरीबन सारी फ़िल्म एक किरदार और एक लोकेशन से बंधी होने के बावजूद फ़िल्म की शुरुआत बड़े जनसमूहों से बनते कोलाज से होती है. एरॉन उस बीहड़ खाई में अकेला नहीं है. उसके साथ उसकी पूरी दुनिया है.

डैनी ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के साथ हिन्दुस्तान आए थे. और अब नई फ़िल्म के साथ सबकुछ नहीं बदला है. सबसे ख़ास चीज़ जो इन दोनों फ़िल्मों को जोड़ती है वो दो हिन्दुस्तानी लड़के हैं जिन्हें साज़ों की सच्ची सोहबत की नेमत हासिल है. अमित त्रिवेदी का संगीत ’आमिर’ को एक बिलकुल नया स्वर प्रदान करता है वहीं रहमान ’127 हार्स’ को उसका सही रूप-रंग देते हैं. इन दोनों जादूगरों की एक इकसार खासियत है. यह दोनों यहाँ पूरी तरह निर्देशक के संगीतकार हो जाते हैं और कथा के उन खाली छूटे हिस्सों को अपने संगीत से भरते हैं जिन्हें शब्दों या दृश्यों में कह पाना मुमकिन नहीं. अमित त्रिवेदी अपने संगीत से इस स्याह फ़िल्म में थोड़ा फक्कड़पना मिलाते हैं, जैसे कबीर की कबिराई के रंग भरते हैं. और रहमान का संगीत कथा का ’अन्य’ रचता है. अकेला पात्र बातें कम करता है, गुनगुनाता ज़्यादा है. जैसा निर्देशक की चाह रही होगी, उनके संगीत में घटनाएं होती हैं, निराशाएं आती हैं, दिल टूटता है, इरादा फिर से जुड़कर खड़ा होता है. जैसा रॉजर इबर्ट लिखते हैं, “जो दर्शकों के लिए सबसे दहलाने वाला क्षण है वो दरअसल उन्हें दिखाई नहीं देता, सुनाई देता है.”

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Simran Singh की रचना.

यह परिवार तो जाना-पहचाना है

kids are all rightयह गलती कई बार होती है. पुरुषसत्तात्मकता को कोसते हुए हम कई बार सीधे परिवार के मुखिया पुरुष को कोसने लगते हैं. जैसे उसके बदलते ही सब ठीक हो जाना है. लेकिन गलत उसका पुरुष होना नहीं, गलत वह विचार है जिसे उसका व्यक्तित्व अपने साथ ढोता है. लीसा चोलोडेंको की फ़िल्म परिवार की संरचना वही रखते हुए उसमें मुखिया पुरुष को एक महिला किरदार से बदल देती है. और इसके नतीज़े जानना बड़ा मज़ेदार है. ’द किड्स आर ऑल राइट’ ऐसे लेस्बियन जोड़े की कहानी है जो बारास्ते डोनर स्पर्म अपना परिवार बनाता है. दोनों माँओं के लिए स्पर्म डोनर एक ही अनजान व्यक्ति है. यही अनजान व्यक्ति (बच्चों का जैविक पिता) बच्चों के बुलावे पर एक दिन उनकी ज़िन्दगियों में आता है और परिवार के मान्य ढांचे में असंतुलन पैदा करता है.

सबसे ख़ास यहाँ उस परिवार को देखना है जहाँ बालिग पुरुष के न होते भी परिवार की वही सत्ता संरचना बनी रहती है. एक महिला परिवार के ढांचे से अनुपस्थित उस पुरुष की भूमिका अपने ऊपर ओढ़ लेती है. निक की भूमिका में एनेट्टे बेनिंग साल का सबसे दमदार रोल निभाती हैं और तिरछी नज़र से हम उन्हें उसी सत्ता संरचना को दूसरे छोर से निभाते देखते हैं जिसमें स्त्री हमेशा दोयम दर्जे की भूमिका में ढकेल दी जाती है. वही सत्ता संरचना जो एक पुरुष और स्त्री से मिलकर बनते परिवार में दिखाई देती है इन स्त्रियों के बीच भी मौजूद है. वही असुरक्षाएं, वही अधिकारभाव, वही अकेलापन. दूर से अपरिचित नज़र आता यह परिवार हमारा पड़ौसी है. ’द किड्स आर ऑल राइट’ हमें इस बात का और तीखा अहसास करवाती है कि बराबरी वाला समाज बनाने के लिए ज़रूरी है कि परिवार के भीतर की सत्ता संरचना को तोड़ा जाए. इसके हुए बिना बस किरदार बदल जायेंगे, कहानी वही रहनी है.

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Laz Marquez की रचना.

देवदास का वर्ज़न 2.0

the social networkउमर अभी पच्चीस हुई ही है और अपनी संगत में ठीक-ठाक स्मार्ट गिना जाता हूँ. मैं ’द सोशल नेटवर्क’ देखते हुए अपने को कुछ पुराना महसूस करता हूँ. मेरा छोटा भाई, जिसमें और मुझमें उमर के दो साल और शायद उतनी ही पीढ़ियों का फ़ासला है, जब भी पलटकर मुझसे कुछ पूछता है (हालाँकि पूरी फ़िल्म के दौरान ऐसा बहुत-बहुत कम बार होता है) मुझे बहुत अच्छा लगता है. मेरे साथ कुछ कम उमर के दिखते लड़कों की टोली है जो मेरे भाई के साथ आए हैं. ये तक़रीबन सारे सॉफ़्टवेयर के खिलाड़ी हैं. ज़्यादातर ऐसे जो अपनी क्रियेटिविटी बचाने के लिए सॉफ़्टवेयर उद्योग के कुछ बड़े ब्रैंड छोड़ आए हैं. फ़िल्म कई जगह इतनी तेज़ है (उसे स्मार्ट कहा जाता है आजकल, मैं सच में पुराना हो चला हूँ) कि संवाद मेरे हाथ से निकल जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे इन दोस्तों की आपसी बातें कई बार मेरे हाथ से निकल जाती हैं.

’द सोशल नेटवर्क’ इस साल के MAMI (मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह) की ओपनिंग फ़िल्म थी. वो फ़िल्म जिसे देखने के लिए ऐसी मार मची थी कि उद्घाटन के अगले दिन रिपीट शो में पूरे पैंतालीस मिनट पहले पहुँचकर भी हम फ़िल्म की हवा तक न ले पाए. फ़िनॉमिना बन चुकी सोशल नेटवर्किंग साइट ’फ़ेसबुक’ और उसके जन्मदाता हार्वर्ड स्नातक मार्क जुकरबर्ग की कहानी पर आधारित निर्देशक डेविड फ़िंचर की इस फ़िल्म को आलोचक/समीक्षक रिलीज़ से पहले ही ऑस्कर की बड़ी दावेदार घोषित कर चुके थे. कसी हुई पटकथा और दमदार एडिटिंग के बूते ’द सोशल नेटवर्क’ साल की सबसे उल्लेखनीय अमरीकन फ़िल्म बनकर उभरी है.

हम आश्चर्य करते हैं कि क्यों अनुराग कश्यप तमाम अन्य समकालीन कहानियों को छोड़कर फिर से ’देवदास’ उठाते हैं बनाने के लिए. लेकिन जब दुनिया की सबसे समकालीन फ़िल्म मानी जाती ’दि सोशल नेटवर्क’ देखते हुए मैं हिन्दुस्तानी देवदास के चिह्न पाता हूँ तो बहुत सी बातें समझ आती हैं. शायद सुनकर थोड़ा अजीब लगे लेकिन अगर आज देवदास हो तो बहुत संभव है कि वो ’दि सोशल नेटवर्क’ के मार्क जुकरबर्ग जैसा कोई किरदार हो. हमारी आधुनिक सभ्यता द्वारा तैयार किया वो आत्मकेन्द्रित पुरुष जो साथी लड़की में कभी एक दोस्त नहीं देख पाता. चाहे वो अनुराग की ’देव डी’ हो या फ़िंचर की ’दि सोशल नेटवर्क’, दोनों ही फ़िल्में अंत तक आते आते हमारे आधुनिक देवदास को एक हारे हुए किरदार के तौर पर पेश करती हैं. और दोनों ही फ़िल्में उस उम्मीद के साथ खत्म होती हैं जहाँ देवदास की ये दोनों आधुनिक व्याख्याएं अपनी गलतियाँ पहचान रही हैं. एक नई और बराबरी वाली व्यवस्था पर आधारित शुरुआत करने को तैयार हैं.

फ़िल्म ख़त्म हो चुकी है. मुझे पूरी फ़िल्म समझ नहीं आई, बल्कि यूँ कहना ठीक होगा कि मुझे फ़िल्म में हुई बहुत सी बातें और उनके बताए गए कारण हज़म ही नहीं होते. और बाहर निकलते हुए जब मैं यह बात कहने ही वाला हूँ तभी मेरे भाई का दोस्त X कहता है, “isn’t it sad that we understood everything in this film.” मैं गलत हूँ. बजाए यह कहने के कि मुझे ये फ़िल्म समझ नहीं आई मुझे कहना चाहिए कि मुझे ये पीढ़ी ही समझ नहीं आती. लेकिन यह अच्छा है कि इस पीढ़ी को अपनी आलोचना भाती भी है और समझ भी आती है.

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Ryan Smallman की रचना.

मेरी शुभकामनाएं ’ब्लैक स्वॉन’ के साथ हैं, उम्मीदें भी.

एक और सोमवार सुबह का जागना, एक और ऑस्कर की रात का इंतज़ार. उस सितारों भरी रात से पहले उन फ़िल्मों की बातें जिनका नाम उस जगमगाती रात बार-बार आपकी ज़बान पर आना है. पेश हैं इस साल ऑस्कर की सरताज पाँच ख़ास फ़िल्में मेरी नज़र से.

1.   दि किंग्स स्पीच

इस साल ऑस्कर की सबसे तगड़ी दावेदार बन उभरी, टॉम हूपर द्वारा निर्देशित ’दि किंग्स स्पीच’ ब्रिटेन के बाफ़्टा में बड़े पुरस्कार जीत चुकी है. मेरी नज़र में यह साल की सबसे प्रभावशाली ’फ़ीलगुड’ कहानी कहती है. पारंपरिक कथा सांचे में बंधी यह फ़िल्म ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज VI के जीवन पर आधारित है जिन्हें बचपन से हकलाने की आदत थी. यह व्यक्तिगत संघर्ष और जीत की कथा है. फ़िल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह दोस्ती का रिश्ता है जो राजा और उनके स्पीच थैरेपिस्ट (ज्यौफ्री रश) के बीच इलाज के दौरान बनता है. किंग जॉर्ज VI की भूमिका में कॉलिन फ़िर्थ का ’बेस्ट एक्टर’ पुरस्कार जीतना लगभग तय माना जा रहा है.

2.   दि सोशल नेटवर्क

विश्व भर में आलोचकों की पहली पसंद बनी डेविड फ़िंचर की ’दि सोशल नेटवर्क’ हमारे दौर की सबसे समकालीन फ़िल्म है. सोशल नेटवर्किंग साइट ’फेसबुक’ के जन्मदाता मार्क जुकरबर्ग की कहानी पर बनी ’दि सोशल नेटवर्क’ ऑस्कर की रेस में बेस्ट फ़िल्म और बेस्ट डाइरेक्टर के गोल्डन ग्लोब जीत चुकी है. यह युवा दोस्तियों के बारे में है, महत्वाकांक्षाओं के बारे में है, प्रेम के बारे में है, विश्वासघात के बारे में है. यह उस लड़के के बारे में है जो दुनिया का सबसे कम उम्र अरबपति होकर भी अंत में अकेला है. इस फ़िल्म की कमाल की स्क्रिप्ट/ एडिटिंग/ संवादों की मिसाल अभी से दी जाने लगी है.

3.   ब्लैक स्वॉन

मेरे लिए यह इस साल ऑस्कर में आई सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी फ़िल्म है. निर्देशक डैरेन अरोनोफ़्सकी ज़िन्दगी के अंधेरे कोनों के चितेरे हैं. यह कलाकार के अंदरूनी संघर्ष की कथा है. उस ’आत्महंता आस्था’ की कथा जिसके चलते कला की अदम्य ऊंचाई को चाहता कलाकार अपने जीवन को स्वयं भस्म करता जाता है. यह कहानी नृत्य नाटिका ’स्वॉन लेक’ में मुख्य भूमिका पाने वाली ’नीना सायर्स’ की है जिसे नाटक के अच्छे और बुरे दोनों किरदार ’व्हाईट स्वॉन’ और ’ब्लैक स्वॉन’ साथ निभाने हैं. बैले डांसर ’नीना सायर्स’ की मुख्य भूमिका में नटाली पोर्टमैन विस्मयकारी हैं और उनमें मुक्तिबोध की कविताओं सा अँधेरा है, अकेलापन है, ऊँचाई है. इस साल ’बेस्ट एक्ट्रेस’ का पुरस्कार वह अपने नाम लिखाकर लाई हैं.

4.   इंसेप्शन

वह निर्देशक जिसके हर नए काम का दुनिया साँसे रोके इंतज़ार करती है. लेकिन क्रिस्टोफ़र नोलान का एकेडेमी से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. इस साल भी ज़्यादा बड़ी खबर एक बार फिर उनका ’बेस्ट डाइरेक्टर’ की लिस्ट से बाहर किया जाना रहा. ’इंसेप्शन’ इस साल की सबसे बहसतलब फ़िल्मों में से एक रही है. इसमें सपनों की कई परते हैं और उनके भीतर सच्चाई पहचान पाना लगातार मुश्किल हुआ जाता है. लेकिन अंतत: ’इंसेप्शन’ का मूलभाव एक अपराधबोध और उससे निरंतर जलता कथानायक (लियोनार्डो डि कैप्रियो) है. खेल-खेल में दुनिया पलट देने की बाज़ीगरी है और फिर भी कुछ न बदल पाने की कसमसाहट है जो जाती नहीं.

5.   दि फ़ाइटर

इस फ़िल्म को सिर्फ़ क्रिश्चियन बेल की अदाकारी के लिए देखा जाना चाहिए. सर्वश्रेष सहायक अभिनेता का गोल्डन ग्लोब जीत चुके बेल यहाँ अपनी पुरानी सुपरहीरो इमेज को धोते हुए एक हारे हुए इंसान का किरदार जीवंत बनाते हैं. कथा दो मुक्केबाज़ भाइयों की है. बड़ा भाई जिसका जीवन ड्रग्स और अपराध में उलझकर रह गया है. और छोटा भाई जिसके सामने अभी मौका है कुछ बनने का, कुछ कर दिखाने का. लेकिन बड़ा भाई के बिना छोटा भाई अधूरा है. डिस्फ़ंक्शनल फ़ैमिली ड्रामा होते हुए भी यहाँ रिश्तों की गर्माहट अभी बाकी है.

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रविवार 26 फ़रवरी के नव भारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ.