वो पांच प्रसंग जब हमारा सिनेमा बड़ा हो रहा था : सिनेमा 2016

‘बॉलीवुड’ कहा जाने वाला मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा हमेशा से मेरे लिए एक बहुवचन रहा है. कई नितांत भिन्न, आपस में टकराती पहचानों को साथ संभालने की कोशिश करता माध्यम. आैर फिर सिनेमा तो ठहरा भी सामुदायिक कला. इसलिए कोई फिल्म अकेली नहीं होती. दरअसल वह कितने ही भिन्न समुच्चयों का सामंजस्य होती है. सदा बहुवचन होती है. ऐसे में, मेरे लिए हमेशा ही साल के अन्त में ‘पसन्दीदा फिल्म’ छांटने से ज़्यादा दिलचस्प ‘पसन्दीदा प्रसंग’ छांटना रहा है. ऐसे मौके, जहां मेरी नज़र में हमारे सिनेमा ने कुछ भिन्न किया, या कुछ निडरता दिखाई. मुझे डूबने का मौका दिया, या मुझे चौंकाया.

तो सदी के इस सोलहवें बसंत में, ऐसे ही पांच मौके मेरी पसन्द के, जहां हमारा सिनेमा कुछ ‘बड़ा’ होता है.

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बच्चन

वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद है, उनकी आवाज़ को मानक सांचों से ’भिन्न’ पाया गया था। जल्द ही उन्होंने वे ’मानक सांचे’ बदल दिए।

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मनोरंजन का बदला चेहरा

पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है. Continue reading →