फ़िल्म की सफ़लता को हम कैसे आँकें?

IMG_3401अभिनव कश्यप की सलमान ख़ान स्टारर ’दबंग’ की रिकॉर्डतोड़ बॉक्स-ऑफ़िस सफ़लता की ख़बरों के बीच यह सवाल अचानक फिर प्रासंगिक हो उठा है कि आखिर किसे हम ’सुपरहिट फ़िल्म’ कहें? बाज़ार में खबरें हैं कि ’दबंग’ ने ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के रिकॉर्ड्स को भी पीछे छोड़ दिया है और सबूत के तौर पर फ़िल्म के शुरुआती दो-तीन दिन के बॉक्स-ऑफ़िस कमाई के आंकड़े दिखाए जा रहे हैं. यहाँ यह भी एक सवाल है कि सिनेमा के लिए एक ’युनिवर्सल हिट’ के क्या मायने होते हैं? क्या सबसे ज़्यादा पैसा कमाने वाली फ़िल्म ही सबसे बड़ी फ़िल्म है? या उसके लिए फ़िल्म का एक विशाल जनसमूह की साझा स्मृतियों का हिस्सा बनना भी ज़रूरी माना जाना चाहिए? वक़्त भी एक कसौटी होता है और किसी फ़िल्म का सफ़ल होना वक़्त की कसौटी पर भी कसा जाना चाहिए या नहीं?

हिन्दी सिनेमा इस बहु सँस्कृतियों से मिलकर बनते समाज को एक धागे में पिरोने का काम सालों से करता आया है. और इस ख़ासियत को हमेशा उसकी एक सकारात्मक उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया है. पचास का दशक हिन्दी सिनेमा का वो सुनहरा दशक है जहाँ इसने कई सबसे बेहतरीन फ़िल्मों को बड़ी ’युनिवर्सल हिट’ बनते देखा. ’मुगल-ए-आज़म’ जैसी फ़िल्म अपने दौर की सबसे महंगी फ़िल्म होने के साथ-साथ एक कलाकृति के रूप में भी सिनेमा इतिहास में अमर है. ’मदर इंडिया’ से लेकर ’गाइड’ तक कई मुख्यधारा की फ़िल्मों ने देखनेवाले पर अमिट प्रभाव छोड़ा. सत्तर के दशक का ’एंग्री यंग मैन’ नायक भी समाज के असंतोष से उपजा था और एक बड़े समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता था. लेकिन अस्सी का दशक ख़त्म होते न होते हिन्दी सिनेमा की यह ’युनिवर्सल अपील’ बिखरने लगती है.

समांतर सिनेमा ने अपनी राह उस दौर में बनाई जब हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा सस्ती लोकप्रियता की गर्त में जा रही थी. यहीं कुछ फ़िल्मकार ऐसी फ़िल्में बनाने लगे जिनकी भव्यता विदेशों में बसे भारतीय को आकर्षित करती. दर्शक की पहचान बदल रही थी, उसके साथ ही सिनेमा की ’युनिवर्सल अपील’ बदल रही थी. नब्बे के दशक में आई मल्टीप्लैक्स कल्चर ने अनुभव को और बदला. अब सिनेमा ’सबका, सबके लिए’ न रहकर ज़्यादा पर्सनल, ज़्यादा एक्सक्लूसिव होता गया. लेकिन बाद के सालों में इसी और ज़्यादा क्लासीफ़ाइड होते जा रहे सिनेमा में से कुछ अनोखे फ़िल्मकारों ने बेहतर सिनेमा के लिए रास्ता भी निकाला. विशाल भारद्वाज ने ’मक़बूल’ बनाई और अनुराग कश्यप ने ’ब्लैक फ़्राइडे’. आज के समय में सिर्फ़ पैसे के बलबूते नापकर किसी फ़िल्म को ’युनिवर्सल हिट’ का दर्जा देना तो सिक्के का सिर्फ़ एक पहलू देखना हुआ. ’थ्री ईडियट्स’ से कहीं कम पैसा कमाने के बाद भी राजकुमार हिरानी की ही ’लगे रहो मुन्नाभाई’ कहीं बड़ी फ़िल्म है क्योंकि उसका असर ज़्यादा दूर तक जाने वाला है. ’गज़नी’ कुछ साल बाद भुला दी जाएगी लेकिन ’खोसला का घोंसला’ को हम याद रखेंगे.

आज फ़िल्म की सफ़लता नापने के पैमाने सिरे से बदल गए हैं. नए उभरते बाज़ार में नया सूत्र यह है कि फ़िल्म रिलीज़ होने के पहले तीन दिन में ही अधिकतम पैसा वसूल लिया जाए. आक्रामक प्रचार और बहुत सारे प्रिंट्स के साथ फ़िल्म रिलीज़ कर इस उद्देश्य को हासिल किया जाता है. यह बड़ी पूंजी के साथ बनी फ़िल्मों के लिए फ़ायदे का सौदा है, ज़्यादा माध्यमों द्वारा प्रचार का सीधा मतलब है शुरुआती सप्ताहांत में टिकट खिड़की पर ज़्यादा भीड़. यहाँ तक कि फ़िल्म से जुड़े तमाम तरह के विवाद भी इस शुरुआती प्रचार में भूमिका निभाते हैं. इसके बरक़्स उच्च गुणवत्ता वाली ऐसी फ़िल्में जो ’माउथ-टू-माउथ’ पब्लिसिटी पर ज़्यादा निर्भर हैं, इस व्यवस्था में घाटे में रहती हैं. ’दबंग’ एडवांस में हाउसफ़ुल के साथ रिलीज़ होती है वहीं ’अन्तरद्वंद्व’ जैसी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म गिने-चुने सिनेमाघरों में लगकर भी दर्शकों को तरसती है. हमें अपनी ’युनिवर्सल हिट’ की परिभाषा पर फिर से विचार करना चाहिए. अकूत पैसा कमाना ही अकेली कसौटी न हो, बल्कि वह फ़िल्म देखनेवाले की स्मृति का हिस्सा बने. यह बड़ी सफ़लता है.

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मूलत: नवभारत टाइम्स के रविवारीय कॉलम ’रोशनदान’ में उन्नीस सितंबर को प्रकाशित.

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

peepli live posterशाहरुख़ ख़ान और अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारों को ’आम आदमी’ कहकर देखते-दिखाते हिन्दी सिनेमा में बरस बीते. इन्हीं सितारों की चकाचौंध में पहले हिन्दी सिनेमा से गाँव गायब हुआ और उसके साथ ही खेती-किसानी की तमाम बातें. मल्टीप्लैक्स के आगमन के साथ सिनेमा देखने के दाम इतने बढ़े कि हमारा मुख्यधारा का सिनेमा इस महादेश के गाँवों और छोटे कस्बों में रहने वाले असल ’आम इंसान’ से और दूर होता गया. देखिए, जिस समय में हम जी रहे हैं ’पीपली लाइव’ जैसी फ़िल्म का होना एक घटना है. यह फ़िल्म बेहतरीन कास्टिंग का उदाहरण है. जैसे सिनेमा से निष्कासित ’आम आदमी’ अपना हक़, अपना हिस्सा माँगने खुद सिनेमा के परदे पर चला आया है. सिनेमा के पटल पर अन-पहचाने लेकिन बरसों के अनुभवी दसियों कलाकार जैसे एक साथ आते हैं और ’पीपली लाइव’ को एक हंगामाखेज़ अनुभव बना देते हैं.

एक रघुवीर यादव और नसीरुद्दीन शाह को छोड़कर यहाँ नए कलाकारों की पूरी फ़ौज है. हिन्दी सिनेमा से ’आम आदमी’ के निष्कासित होने का रोना रोते मेरे जैसे बहुत से आलोचक ’पीपली लाइव’ देखकर हतप्रभ हैं. फ़िल्म में ’नत्था’ की मुख्य भूमिका निभाने वाले ओंकार दास माणिकपुरी को शायद अब तक आप उनके छोटे परदे पर हुए तमाम साक्षात्कारों द्वारा पहचान चुके होंगे. लगता है जैसे ’नत्था’ के रूप में हिन्दुस्तान के सुदूर हाशिए पर छूटा ’आम आदमी’ मुख्यधारा में अपनी दावेदारी जताने चला आया है. लेकिन उनके अलावा मंझे हुए कलाकारों की पूरी फ़ौज दिखाई देती है ’पीपली लाइव’ में जिन्हें आप सिनेमा के परदे पर इस तरह पहली बार देख रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर हबीब तनवीर के थियेटर ग्रुप ’नया थियेटर’ के स्थापित कलाकार हैं जो अपने फ़न के माहिर हैं. इनमें से बहुत से कलाकार ऐसे हैं जिनके नाम आपको पूरा दिन गूगल खँगालने के बावजूद हासिल नहीं होंगे. इसलिए यह और ज़रूरी है कि इन सभी रत्नों की नाम लेकर तारीफ़ की जाए. तारीफ़ कीजिए ’धनिया’ की भूमिका निभाने वाली शालिनी वत्स की. गाँव की कामकाजी औरत की जिजीविषा को जे.एन.यू. में पढ़ी शालिनी ने परदे पर बखूबी साकार किया है. और अम्मा की भूमिका में फ़ारुख़ ज़फ़र ने पूरा मुशायरा लूट लिया है. टीवी रिपोर्टर ’कुमार दीपक’ बने विशाल शर्मा अपनी भूमिका और उसमें छिपे व्यंग्य के लिए चहुँओर तारीफ़ पा रहे हैं.

तारीफ़ कीजिए लोकल थानेदार बने अनूप त्रिवेदी की जो फ़िल्म में अपने ख़ालिस मुहावरे खींचकर मारते थे बुधिया और नत्था के मुंह पर. अनूप एन.एस.डी रिपर्टरी के प्रॉडक्ट हैं. और फ़िल्म में दलित नेता पप्पूलाल का किरदार इतनी प्रामाणिकता से निभाने वाले रविलाल सांगरे को कौन भूल सकता है. रविलाल भी हमें ’नया थियेटर’ की देन हैं. मुझे ख़ासतौर पर नत्था को सरकारी योजना के तहत ’लालबहाद्दुर’ देने आए बी.डी.ओ. दत्ता सोनवने तथा नत्था के दोस्त ’गोपी’ बने खड़ग राम याद रहेंगे. जिस तरह खड़ग राम मीडिया के सामने वो ’आत्मा बहुते घबड़ाए रही है’ बोलते हैं, मैं तो उनपर फ़िदा हो गया.

विशेष उल्लेख ’होरी महतो’ की भूमिका में फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण रोल निभाने वाले एल. एन. मालवीय का. आपको हिन्दी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कितने किरदार याद हैं जिनका फ़िल्म में सिर्फ़ एक ही संवाद हो लेकिन वो एक ही संवाद बरसों तक आपके स्मृति पटल पर अंकित रहे? ’होरी महतो’ के उस एक संवाद का असर कुछ ऐसा ही होता है दर्शक पर. और ’राकेश’ की भूमिका में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी एक बार फ़िर चमत्कारिक है. उनका चेहरा जैसे आईना है, उनके मन की सारी दुविधाएं उनका चेहरा बयाँ करता है.

’पीपली लाइव’ देखकर प्रेमचंद की याद आती है. हिन्दी के इस महानतम कथाकार की रचनाओं का सा विवेक और वही साफ़ दृष्टि ’पीपली लाइव’ की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है. फ़िल्म के निर्देशक अनुषा रिज़वी और महमूद फ़ारुकी बधाई के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने बाज़ार के दबाव के आगे अपनी फ़िल्म की प्रामाणिकता से समझौता नहीं किया. और आमिर का भी शुक्रिया इस असंभव प्रोजेक्ट को संभव बनाने के लिए.

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रविवार के ’नवभारत टाइम्स’ के कॉलम ’रोशनदान’ के लिए लिखा गया. बाइस अगस्त को प्रकाशित.

The ugliness of the indian male : Udaan

Udaan wallpaperअगर आप भी मेरी तरह ’तहलका’ के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ’स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज़ ऑन इंडियन मैन’ नाम की उस सीरीज़ पर ज़रूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ़्ते के अंतर से आती है और किसी ख़ास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिन्दुस्तानी मर्द का एक रफ़ सा, थोड़ा मज़ाकिया ख़ाका हमारे सामने खींचती है. वो बाहरी पहचानों से मिलाकर एक स्कैच तैयार करती है, मैं भीतर की बात करता हूँ… ’हिन्दुस्तानी मर्द’. आखिर क्या अर्थ होते हैं एक ’हिन्दुस्तानी मर्द’ होने के? क्या अर्थ होते हैं अपनी याद्दाश्त की शुरुआत से उस मानसिकता, उस सोच को जीने के जिसे एक हिन्दुस्तानी मर्द इस समाज से विरासत में पाता है. सोचिए तो, हमने इस पर कितनी कम बात की है.


सही है, इस पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री होना एक सतत चलती लड़ाई है, एक असमाप्त संघर्ष. और हमने इस निहायत ज़रूरी संघर्ष पर काफ़ी बातें भी की हैं. लेकिन क्या हमने कभी इस पर बात की है कि इस पुरुषसत्तात्मक समाज में एक पुरुष होना कैसा अनुभव है? और ख़ास तौर पर तब जब वक़्त के एक ख़ास पड़ाव पर आकर वो पुरुष महसूस करे कि इस निहायत ही एकतरफ़ा व्यवस्था के परिणाम उसे भी भीतर से खोखला कर रहे हैं, उसे भी इस असमानता की दीवार के उस तरफ़ होना चाहिए. इंसानी गुणों का लिंग के आधार पर बँटवारा करती इस व्यवस्था ने उससे भी बहुत सारे विकल्प छीन लिए हैं. क्या कोई कहेगा कि जैसे बचपन में एक लड़की के हाथ में गुड़िया दिया जाना उसके मूल चुनाव के अधिकार का हनन है ठीक वैसे ही लड़के के हाथ में दी गई बंदूक भी अंतत: उसे अधूरा ही करती है.


और फिर ’उड़ान’ आती है.


जैसी ’आम राय’ बनाई जा रही है, मैं उसे नकारता हूँ. ’उड़ान’ पीढ़ियों के अंतर (जैनरेशन गैप) के बारे में नहीं है. यह एक ज़ालिम, कायदे के पक्के, परंपरावादी पिता और अपने मन की उड़ान भरने को तैयार बैठे उसके लड़के के बीच पनपे स्वाभाविक तनाव की कहानी नहीं है जैसा इसका प्रचार संकेत करता रहा. किसी भी महिला की सक्रिय उपस्थिति से रहित यह फ़िल्म मेरे लिए एक नकार है, नकार लड़कपन की दहलीज़ पर खड़े एक लड़के का उस मर्दवादी अवधारणा को जिसे हमारा समाज एक नायकीय आवरण पहनाकर सदियों से तमाम लोकप्रिय अभिव्यक्ति माध्यमों में बेचता आया है. नकार उस खंडित विरासत का जिसे लेकर उत्तर भारत का हर औसत लड़का पैदा होता है. विरासत जो कहती है कि वीरता पुरुषों की जागीर है और सदा पवित्र बने रहना स्त्रियों का गहना. पैसा कमाकर लाना पुरुषों का काम है और घर सम्भालना स्त्रियों की ज़िम्मेवारी.


उड़ान एक सफ़र है. निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने के रचे किरदार, सत्रह साल के एक लड़के ’रोहन’ का सफ़र. जिसे त्रिआयामी बनाते हैं फ़िल्म में मौजूद दो और पुरुष किरदार, ’भैरव सिंह’ और ’अर्जुन’. शुरुआत से नोटिस कीजिए. जैसे भैरव सिंह रोहन पर अपना दबदबा स्थापित करते हैं ठीक वैसे ही रोहन सिंह अर्जुन पर अपना दबदबा स्थापित करता है. अर्जुन के घर की सीढ़ियों पर बार-बार ऊपर नीचे होने के वो दृश्य कौन भूल सकता है. वो अभी छोटा है, दो ’मर्दों’ के बीच अपनी मर्दानगी दिखाने का ज़रिया, एक शटल-कॉक. बेटा सीढ़ियों पर बैठा अपने पिता को इंतज़ार करवाता है और पिता अपने हिस्से की मर्दानगी भरा गुस्सा दिखाता उन्हें पीछे छोड़ अकेला ही गाड़ी ले जाता है. नतीजा, बेचारा बीमार अर्जुन पैदल स्कूल जाता है. रास्ते में वो रोहन का हाथ थामने की कोशिश करता है. वो अकेला बच्चा सिर्फ़ एक नर्म-मुलायम अहसास की तलाश में है. लेकिन रोहन कोई उसकी ’माँ’ तो नहीं, वो उसे झिड़क देता है.


लेकिन फिर धीरे से किरदार का ग्राफ़ घूमने लगता है. जहाँ एक ओर भैरव सिंह अब एक खेली हुई बाज़ी हैं, तमाम संभावनाओं से चुके, वहीं रोहन में अभी अपार संभावनाएं बाक़ी हैं. इस लड़के की ’एड़ी अभी कच्ची है’. बदलाव का पहिया घूमने लगता है. हम एक मुख़र मौन दृश्य में रोहन और अर्जुन के किरदारों को ठीक एक सी परिस्थिति में खड़ा पाते हैं. शायद फ़िल्म पहली बार वहीं हमें यह अहसास करवाती है. अर्जुन का किरदार अनजाने में ही रोहन के भीतर छिपे उस ज़रा से ’भैरव सिंह’ को हमारे सामने ले आता है जिसे एक भरा-पूरा ’भैरव सिंह’ बनने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगने वाला. लेकिन शायद तभी… किसी अदृश्य कोने में छिपा रोहन भी ये दृश्य देख लेता है.


चक्का घूम रहा है. रोहन लगातार तीन दिन तक अर्जुन की तीमारदारी करता है. उसे कविताएँ सुनाता है. उसके लिए नई-नई कहानियाँ गढ़ता है. उसे अपना प्यारा खिलौना देता है और खूब सारी किताबें भी. उससे दोस्तों के किस्से सुनता है, उसे दोस्तों के किस्से सुनाता है. उसके बदन पर जब चमड़े की मार के निशान देखता है तो पलटकर बच्चे से कोई सवाल नहीं करता. सवाल मारनेवाले से करता है और तनकर-डटकर करता है. पहचानिए, यह वही रोहन है जो ’कोई उसकी माँ तो नहीं’ था.


मध्यांतर के ठीक पहले एक लम्बे और महत्वपूर्ण दृश्य में भैरव सिंह रोहन को धिक्कारता है, धिक्कारता है बार-बार ’लड़की-लड़की’ कहकर. धिक्कारता है ये कहकर कि ’थू है, एक बार सेक्स भी नहीं किया.’ यह भैरव सिंह के शब्दकोश की गालियाँ हैं. एक ’मर्द’ की दूसरे ’मर्द’ को दी गई गालियाँ. लेकिन हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा की उम्मीदों से उलट, फ़िल्म का अंत दो और दो जोड़कर चार नहीं बनाता. रोहन इन गालियों का जवाब क्लाइमैक्स में कोई ’मर्दों’ वाला काम कर नहीं देता. या शायद यह कहना ज़्यादा अच्छा हो कि उसके काम को ’असली मर्दों’ वाला काम कहना उसके आयाम को कहीं छोटा करना होगा.


एक विशुद्ध काव्यात्मक अंत की तलाश में भटकती फ़िल्मों वाली इंडस्ट्री से होने के नाते तो उड़ान को वहीं ख़त्म हो जाना चाहिए था जहाँ अंतत: रोहन के सब्र का बाँध टूट जाता है. वो पलटकर अपने पिता को उन्हीं की भाषा में जवाब देता है. और फिर एक अत्यंत नाटकीय घटनाक्रम में उन्हें उस ’जैसे-सदियों-से-चली-आती-खानदानी-दौड़’ में हराता हुआ उनकी पकड़ से बचकर दूर निकल जाता है.


udaan wallpaperलेकिन नहीं, ऐसा नहीं होता. फ़िल्म का अंत यह नहीं है, हो भी नहीं सकता. रोहन वापस लौटता है. ठीक अंत से पहले, पहली बार फ़िल्म में एक स्त्री के होने की आहट है. वो स्त्री जिसका अक़्स पूरी फ़िल्म में मौजूद रहा. पहली बार उस स्त्री का चेहरा दिखाई देता है. वो स्त्री जो रोहन के भीतर मौजूद है. अंत जो हमें याद दिलाता है कि हर हिन्दुस्तानी मर्द के DNA का आधा हिस्सा उसे एक स्त्री से मिलता है. और ’मर्दानगी’ की हर अवधारणा उस भीतर बसी स्त्री की हत्या पर निर्मित होती है. यह अंत उस स्त्री की उपस्थिति का स्वीकार है. न केवल स्वीकार है बल्कि एक उत्सवगान है. क्या आपको याद है फ़िल्म का वो प्रसंग जहाँ अर्जुन और रोहन अपनी माँओं के बारे में बात करते हैं. रोहन उसे बताता है कि मम्मी के पास से बहुत अच्छी खुशबू आती थी, बिलकुल मम्मी वाली. अर्जुन उस अहसास से महरूम है, उसने अपनी माँ को नहीं देखा.


हमें पता नहीं कि रोहन ने उन तसवीरों में क्या देखा. लेकिन अब हम जानते हैं कि रोहन वापस आता है और अर्जुन को अपने साथ ले जाता है. उस रौबीली शुरुआत से जहाँ रोहन ने अर्जुन से बात ही ’सुन बे छछूंदर’ कहकर की थी, इस ’माँ’ की भूमिका में हुई तार्किक परिणिति तक, रोहन के लिए चक्का पूरा घूम गया है. एक लड़के ने अपने भीतर छिपी उस ’स्त्री’ को पहचान लिया जिसके बिना हर मर्द का ’मर्द’ होना कोरा है, अधूरा है. फ़िल्म के अंतिम दृश्य में रास्ता पार करते हुए रोहन अर्जुन का हाथ थाम लेता है. गौर कीजिए, इस स्पर्श में दोस्ती का साथ है, बराबरी है. बड़प्पन का रौब और दबदबा नहीं.


अंत में रोहन की भैरव सिंह को लिखी वो चिठ्ठी बहुत महत्वपूर्ण है. आपने गौर किया – वो अर्जुन को अपने साथ ले जाने की वजह ये नहीं लिखता कि “नहीं तो आप उसे मार डालेंगे”, जैसा स्वाभाविक तौर पर उसे लिखना चाहिए. वो लिखता है कि “नहीं तो आप उसे भी अपने जैसा ही बना देंगे. और इस दुनिया में एक ही भैरव सिंह काफ़ी हैं, दूसरा बहुत हो जाएगा.” क्या आपने सोचा कि वो ऐसा क्यों लिखता है? दरअसल खुद उसने अभी-अभी, शायद सिर्फ़ एक ही रात पहले वो लड़ाई जीती है. ’वो लड़ाई’… ’भैरव सिंह’ न होने की लड़ाई. अब वो फ़ैंस के दूसरी तरफ़ खड़ा होकर उस किरदार को बहुत अच्छी तरह समझ पा रहा है जो शायद कल को वो खुद भी हो सकता था, लेकिन जिसे उसने नकार दिया. वो अर्जुन को एक भरपूर बचपन देगा. जैसा शायद उसे मिलना चाहिए था. और बीते कल में शायद कहीं भैरव सिंह को भी.


udaan wallpaper1रोहन उस चिठ्ठी के साथ वो खानदानी घड़ी भी भैरव सिंह को लौटा जाता है. परिवार के एक मुखिया पुरुष से दूसरे मुखिया पुरुष के पास पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचती ऐसी अमानतों का वो वारिस नहीं होना चाहता. यह उसकी परंपरा नहीं. होनी भी नहीं चाहिए. यह उसका अंदाज़ है इस पुरुषवर्चस्व वाली व्यवस्था को नकारने का. वो और उसकी पीढ़ी अपने लिए रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ेगी. ऐसे रिश्ते जिनमें संबंधों का धरातल बराबरी का होगा.


किसी भी महिला किरदार की सचेत अनुपस्थिति से पूरी हुई उड़ान हमारे समय की सबसे फ़िमिनिस्ट फ़िल्म है. अनुराग कश्यप की पिछ्ली फ़िल्म ’देव डी’ के बारे में लिखते हुए मैंने यह कहा था – दरअसल मेरे जैसे (उत्तर भारत के भी किसी शहर, गाँव कस्बे के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास से निकलकर आया) हर लड़के की असल लड़ाई तो अपने ही भीतर कहीं छिपे ’देवदास’ से है. अगर हम इस दुनिया की बाकी आधी आबादी से बराबरी का रिश्ता चाहते हैं तो पहले हमें अपने भीतर के उस ’देवदास’ को हराना होगा जिसे अपनी बेख़्याली में यह अहसास नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था कहीं और से नहीं, उसकी सोच से शुरु होती है. ’उड़ान’ के रोहन के साथ हम इस पूरे सफ़र को जीते हैं. यह एक त्रिआयामी सफ़र है जिसके एक सिरे पर भैरव सिंह खड़े हैं और दूसरे पर एक मासूम सा बच्चा. रोहन के ’भैरव सिंह’ होने से इनकार में दरअसल एक स्वीकार छिपा है. स्वीकार उस आधी आबादी के साथ समानता के रिश्ते की शुरुआत का जिससे रोहन भविष्य के किसी मोड़ पर टकराएगा.


और सिर्फ़ रोहन ही क्यों. जैसा मैंने पहले लिखा था, “उड़ान हमारे वक़्तों की फ़िल्म है. आज जब हम अपने-अपने चरागाहों की तलाश में निकलने को तैयार खड़े हैं, ’उड़ान’ वो तावीज़ है जिसे हमें अपने बाज़ू पर बाँधकर ले जाना होगा. याद रखना होगा.” ठीक, याद रखना कि हम सबके भीतर कहीं एक ’लड़की’ है, और उसे कभी मिटने नहीं देना है.

सात फ़िल्में, सात संस्कार

सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, कोई एक ही बात, कोई एक नुस्खा असर कर जाए. पिछले सालों में आई ऐसी ही कुछ फ़िल्में और उनकी वजह से समाज में आया बदलाव इस बार हमारी नज़र में है. सात अलग-अलग फ़िल्मों के ज़रिए हम उन सात संस्कारों को समझने की कोशिश करेंगे जिनके समाज में आगमन के पीछे कहीं इन्हीं फ़िल्मों से निकली कोई बात, कोई घटना, कोई विचार था.


कैन्डल लाइट मार्च

(रंग दे बसंती)

rang de basantiकोई फ़िल्म कैसे एक फ़िनोमिना में बदल जाती है, ’रंग दे बसंती’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. ’रंग दे बसंती’ का होना शहरी युवा वर्ग के लिए एक बड़ी घटना थी. लम्बे समय बाद किसी फ़िल्म का ऐसा प्रभाव देखा गया कि उसे आधार बनाकर लोग अपने आस-पास के माहौल को बदलने का प्रयास शुरु कर दें. शहरी युवा वर्ग में कैन्डल लाइट मार्च विरोध के एक सर्वमान्य तरीके के रूप में उभरा. आखिर यह शहरी युवा को न्याय की मांग से जुड़ने का मौका उपलब्ध कर रहा था. जेसिका लाल हत्याकांड से लेकर रुचिका की आत्महत्या के मामले तक इस माध्यम से न्याय की आवाज़ बुलन्द की गई. हालांकि बाद के दिनों में इस ’कैन्डल लाइट मार्च’ की बार-बार पुनरावृत्ति पर इसकी आलोचना भी हुई और इसे ’भद्रजनों की कैन्डल लाइट मार्च पार्टी’ जैसे नाम भी दिए गए.

विरोध के इन तरीकों से अलग ’रंग दे बसंती’ भ्रष्टाचार की समस्या के खिलाफ़ आम युवा में जागरुकता लाई. बहुत से लोग सत्येन्द्र दुबे और मंजुनाथ जैसे नायकों की कुर्बानी के आलोक में इस फ़िल्म के असर का विश्लेषण करते हैं. युवा ने सवाल करना सीखा. आज हमारे पास भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो ’सूचना के अधिकार’ जैसा हथियार है उसे हासिल करने के पीछे एक लम्बा जन आन्दोलन है. ’रंग दे बसंती’ ने इस चेतना को समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलवाने में मदद की.


बच्चे मन के सच्चे

(तारे ज़मीन पर)

taare zameen parएक जोड़ा पति-पत्नी (अमोल गुप्ते और दीपा भाटिया) की लिखी एक छोटी सी कहानी से शुरु हुआ इस फ़िल्म का सफ़र कई आयामों से होता हुआ गुज़रा. सचेत अभिनेता आमिर ख़ान ने इसे इसके मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाया. लेकिन जिस तरह यह फ़िल्म हमारे समाज के सबसे मुलायम और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से – ’बच्चे’ के मन की गहराईयों को हमारे सामने लाई, यह देखना एक विहंगम अनुभव था. सिर्फ़ एक डिस्लेक्सिया रोग के प्रति चेतना की ही बात नहीं, इस फ़िल्म ने हमारे समाज को अपनी नई पौध को देखने और उनके हुनर को पहचानने का नया नज़रिया दिया. ’तारे ज़मीन पर’ ने माता-पिताओं को उनकी ही उम्मीदों के बोझ तले दबे, अपनी पहचान तलाशते उनके बच्चों से फिर से मिलवा दिया.

यह स्कूली शिक्षा के बारे में भी एक सबक था. आने वाले दौर में कई स्कूलों ने अध्यापन में नई और रचनात्मक तकनीकों को शामिल किया और पढ़ाई को बच्चे के लिए और मज़ेदार बनाया. बस्ते का बोझ कम करने के लिए बहुत से सकारात्मक प्रयास हुए. एन.सी.ई.आर.टी. ने प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति की शिफ़ारिशों को लागू करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण  का नया मसौदा तैयार किया. बेशक यह सारे परिवर्तन एक फ़िल्म की वजह से नहीं आए हों लेकिन ’तारे ज़मीन पर’ का सकारात्मक योगदान भुलाया नहीं जा सकता.


जादू की झप्पी

(मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.)

munnabhai MBBSऐसा नहीं कि हम हिन्दुस्तानियों ने गहक कर गले मिलना मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. से सीखा है. वो तो हमारी संस्कृति में पहले से शामिल रहा है. और यूँ भी मेरी पीढ़ी को आत्म-अभिव्यक्ति की शारीरिक भंगिमाएं पसन्द रही हैं. आख़िर किसी वजह के चलते ही अपनी देह-भाषा से स्वयं को अभिव्यक्त करने वाला नायक शाहरुख़ ख़ान हमारे दौर का सबसे बड़ा नायक हुआ होगा. लेकिन इस शहर की धकमपेल में हम उस अहसास को कहीं भूल गए थे. और यही करते हैं राजू हिरानी हर बार – हमारे लिए सबसे कीमती अहसास, हमें मिलीं नेमतें जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं, वे हमें फिर से याद दिला देते हैं. ’मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस’ से निकली ’जादू की झप्पी’ ने पूरे समाज में तेज़ी से अपनी जगह बनाई और मुन्नाभाई-सर्किट एक ही झटके में घर-घर में पहचाना नाम हो गए.

’मुन्नाभाई एम.बी,बी.एस.’ न सिर्फ़ मशीन सी दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगी में सुकून की तलाश के विचार से निकली थी बल्कि वो उन बहुत से विचारों को अपने गुलदस्ते में इकट्ठा कर लाई थी जिन्हें पिछले दिनों में हम बहुत मिस कर रहे थे. दोस्ती एक ऐसा ही विचार था. मुन्ना-सर्किट की दोस्ती का पाठ ऐसा ही एक विचार था. ’जादू की झप्पी’ एक ऐसा ही विचार बनकर उभरा जिसमें बराबरी का भाव प्रधान था. कभी वो किसी टूटे दिल को दिलासा था तो कभी किसी बड़ी खुशी का जश्न. हमेशा इस एक एक्ट ने लोगों को ही नहीं दिलों को भी आपस में जोड़ा है.


गांधीगिरी

(लगे रहो मुन्नाभाई)

Lage_Raho_Munna_Bhai-Gandhiक्या आपने कभी सोचा था कि अपने प्यार को पाने का सबसे अच्छा उपाय आपको गांधी जी से मिल सकता है? या शादी के लिए एक सही लड़का ढूंढ़ते हुए एक लड़की को गांधी जी की सीख सबसे ज़्यादा काम आ सकती है? या गांधी जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर की बरसों से अटकी पेंशन उन्हें दिलवा सकते हैं? नहीं ना. हमने भी नहीं सोचा था. लेकिन तभी सीन में राजू हीरानी आते हैं. फिर से एक मैजिकल मंत्र के साथ. आज़ाद भारत में गांधी को हमने एक ऊँचे आसन पर बिठा दिया था और उनकी बताई बातें भूल गए थे. गांधी इस तरह आम आदमी के सुख-दुख के साथी बन जायेंगे यह हमने सोचा ही कहाँ था.

लोगों ने गांधीगिरी का जमकर उपयोग किया. भ्रष्ट राजनीतिग्यों और नौकरशाहों को ’गेट वेल सून’ के कार्ड भेजे जाने लगे और असहयोग फिर से विरोध का मंत्र बन गया. लेकिन इन बड़े आडम्बरों से इतर भी ’गांधीगिरी’ आज की युवा पीढ़ी का गांधी के कुछ बेसिक आदर्शों से पहला परिचय था. आपसी संबंधों में सच बोलना कई बार कितना कारगर साबित हो सकता है यह गांधीगिरी का दिया नुस्खा था. हमने प्रेम में सच्चाई का महत्व समझा. हमने रिश्तों में ईमानदारी का महत्व समझा. और इतना भी कोई फ़िल्म सिखा दे तो क्या कम है.


आल इज़ वैल

(थ्री ईडियट्स)

3-idiotsहमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो? आखिर शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? ’थ्री ईडियट्स’ ने कुछ ऐसा किया कि यह वाजिब सवाल शिक्षाशास्त्रियों की बैठकों से निकलकर हमारे बीच आ गया. कुछ नई ज़िन्दगियाँ जो अपने सपनों के पीछे भागना तो चाहती थीं, लेकिन हिचक रही थीं. अचानक उन्हें समझ आया कि अपने सपनों के पीछे भागने में कोई जोखिम नहीं, दरअसल ज़िन्दगी जीने का यही सबसे सुरक्षित विकल्प है. बड़े ही मनोरंजक अंदाज में ’थ्री ईडियट्स’ हमें परेशानियों में बेफ़िकर रहने का मंत्र सिखाती रही. ’आल इज़ वैल’ नई पीढ़ी का मैजिक मंत्र बन गया.


अब मैं भी फ़िल्मकार!

(लव, सेक्स और धोखा)

जयपुर में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कहानीकार रामकुमार सिंह का कहना है कि डिजिटल सिनेमा ख़जाने की चाबी है. कल तक वे सिर्फ़ सिनेमा देखते थे, आज उन्होंने खुद अपनी फ़ीचर फ़िल्म बनाना शुरु कर दिया है. वजह – एक ’लव, सेक्स और धोखा’ हो सकती है तो और क्यों नहीं? अपने कथ्य से अलग, सिर्फ़ तकनीक के क्षेत्र में इस एक फ़िल्म ने मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री के सिस्टम को सीधी चुनौती दी है. बॉलीवुड का सिनेमा सालों से दो मुख्य स्तंभों पर खड़ा है, दो वजहें जिनकी वजह से फ़िल्म निर्माण बड़ी पूँजी का खेल बना हुआ है. एक बड़े स्टार जिनकी फ़ीस आसमान छूती है और दूसरा सिनेमा बनाने में आने वाला महँगा खर्चा. और इन्हीं दो वजहों से आम आदमी उसे देख-सराह तो पाता है लेकिन उसकी भीतर प्रवेश करना उसके लिए अब भी टेढ़ी खीर है.

love-sex-aur-dhokhaलेकिन ’लव, सेक्स और धोखा’ ने एक झटके में इन दोनों स्तंभों को हिला दिया है. पूरी तरह नई स्टार कास्ट और मूवी कैमरा के डिजिटल कैमरा में बदलते ही सारा खेल बदल जाता है. अब लोग अपने आप को कैमरे के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री हो या फ़ीचर फ़िल्म, सभी अब अचानक निर्माण में सर्व-सुलभ होने जा रही हैं. ’सिटीज़न जर्नलिस्ट’ जैसे कैम्पेन्स में आम नागरिक ने अपनी बात कहने के लिए खुद कैमरा उठा लिया है. इसी डिजिटल कैमरे की वजह से आज देश के दूर-दराज़ इलाकों से चमत्कारिक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में सामने आ रही हैं. अनुराग कश्यप अपनी अगली फ़िल्म ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ इसी फ़ॉरमैट में शूट कर रहे हैं और अनेक नए फ़िल्मकार इस माध्यम में अपने लिए शुरुआत का सबसे अच्छा रास्ता तलाश रहे हैं. जल्द ही सिनेमा बनाने का संस्कार बदलने वाला है और ’लव, सेक्स और धोखा’ इसका शुरुआती इशारा भर है.


एंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट

(माई नेम इज़ ख़ान)

my-name-is-khanयह फ़िल्म अपनी रिलीज़ के पहले ही चर्चाओं में ऊपर पहुँच गई थी. फ़ेसबुक पर ’आई सपोर्ट एसआरके एंड रिलीज़ ऑफ़ एमएनआईके : ए स्टैन्ड अगेंस्ट शिव सेना’ जैसे ग्रुप्स बन गए और उनकी सदस्य संख्या हज़ारों में थी. शाहरुख़ इस देश के बड़े आइकन हैं. धार्मिक कट्टरवादिता और अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ उनका स्टैन्ड लेना बड़ी बात रही. हिन्दुस्तान में पब्लिक सेलिब्रिटीज़ का किसी विवाद के मुद्दे पर स्टैन्ड लेना चलन में नहीं रहा है. लेकिन पिछले एक-दो साल में कई बड़े सेलिब्रिटी अपने आप को सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे हैं. शाहरुख उनमें आगे हैं. बहुत से लोग अब भी विवाद के मुद्दों पर राय देने से बचते हैं. लेकिन कुछ तो बदला है, लोग अपनी राय जगज़ाहिर करने लगे हैं. और यह बदलाव है तो अच्छा बदलाव है.

अभिव्यक्ति के इन नए माध्यमों में ’माई नेम इज़ ख़ान’ को लेकर जितने अभियान चले, वो एक नई शुरुआत थी. इससे फ़िल्म निर्माताओं ने भी बहुत कुछ सीखा. अब तो बड़े निर्माता-निर्देशक भी पहले अपने प्रचार अभियान में इन नए माध्यमों को टारगेट करते हैं. फ़िल्म को किसी सोशल कॉज़ से जोड़ने की कोशिश रहती है और उस अभियान को समाज में स्वीकार्यता दिलवाना लक्ष्य होता है. अब तो धीरे-धीरे फ़िल्म के प्रचार अभियान का पूरा नक्शा ही बदलता जा रहा है.

:- मूलत: चार जुलाई के रविवारीय नवभारत टाइम्स में ’स्पेशल स्टोरी’ के तहत प्रकाशित.

हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

upयहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.

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एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा वो है जब अपना हीरो हीरोइन को अपने घर का एक कमरा किराए पर देने की जुगत भिड़ा रहा है. वो अपने घर की खूबियाँ कुछ यूं बताता है. “क्या कमरा है मेमसाहब! कमरा. कमरे के आगे टैरेस. टेरेस के आगे गार्डन. गार्डन के आगे समन्दर.” वाकई अच्छा नज़ारा है, है ना! लेकिन सोचो कि अगर इस टैरेस और गार्डन को हटाकर वहाँ एक ऊँची इमारत खड़ी कर दी जाए तो इस घर में रहने वालों को कैसा लगेगा? सीन कुछ अच्छा नहीं है, है ना.

अच्छा बताओ, अगर तुम्हें पता चले कि इस घर में रहने वाला एक बुड्ढा है और वो भी अकेला, तब? बुरा लगेगा ना उसके लिए सोचकर. यहाँ तक तो ’अप’ एक उदास फ़िल्म है (रोना भी आता है बार-बार) लेकिन इसके बाद वो खड़ूस बुड्ढा जो करता है वो तुममें से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. क्या बताऊँ? वो अपने घर के ऊपर ढेर सारे हीलियम से भरे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है! बताओ, है ना मज़ेदार बात! अब तुम कहोगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? अरे भई आखिर ’अप’ कार्टून फ़िल्म है और कार्टून फ़िल्म में उड़ने के लिए खुला आसमान होता है सामने. सो कुछ भी हो सकता है.

पिक्सार एनिमेशन की बनाई फ़िल्म ’अप’ कहानी है एक खड़ूस से दिखते बुड्ढ़े कार्ल फ़्रेडरिकसन की जिसे बचपन से ही रोमांचकारी यात्राओं पर जाने का बहुत चाव है. उसकी पत्नी और वो हमेशा साथ उस सपनीली दुनिया में जाने का सपना देखते हैं जिसका नाम है ’पैराडाइज़ फ़ॉल्स’ और जो दक्षिण अमेरिका में कहीं है. अफ़सोस कि मि. फ्रेडरिकसन की पत्नी इस सपने के पूरा होने से पहले ही उन्हें छोड़कर चली जाती हैं. अब कार्ल फ्रेडरिकस अकेले हैं और उनके घर के आस-पास बड़ी इमारतें बन रही हैं. सभी उन्हें वृद्धाआश्रम चले जाने की सलाह देते हैं. लेकिन मि. फ्रेडरिकसन अपने घर को छोड़कर नहीं जाना चाहते. और फिर होता यूँ है कि एक दिन मि. फ्रेडरिकसन उड़ जाते हैं अपने घर के साथ आसमान में. अपने सपनों की दुनिया की ओर…

लेकिन एक दिक्कत है. गलती से उनके साथ एक छोटा सा लड़का रसेल भी आ गया है. रसेल भी रोमांचकारी यात्राओं का शौकीन है. अब दोनों उड़ रहे हैं ’पैराडाइज़ फ़ॉल’ की ओर. रास्ते में आंधी-तूफ़ान है, बड़ी बाधाएं हैं. शुरुआत में मि. फ्रेडरिकसन बार-बार रसेल से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं. लेकिन धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो जाती है. मुसीबतों को पार करते वे वहाँ पहुँचते हैं और आखिर उन्हें दूर पहाड़ के दूसरे कोने पर ’पैराडाइज़ फॉल’ नज़र आता है. लेकिन उससे पहले अभी बहुत कुछ बाकी है. उन्हें एक रंग-बिरंगी, ख़ूब बड़ी सारी चिड़िया मिलती है रास्ते में. अपना नन्हा उस्ताद रसेल उसका नाम रखता है केविन. उसे चॉकलेट खिलाता है और उसका दोस्त बन जाता है. केविन तलाश में है अपने खोये हुए बच्चों की. रसेल उसकी मदद करना चाहता है.

कहानी अभी और भी है. फिर उन्हें मिलता है एक बोलने वाला कुत्ता, नाम है डग. डग के गले में ऐसा पट्टा है जिससे कुत्ते भी इंसानों की आवाज़ में बोल सकते हैं. उसे ये पट्टा पहनाया है चार्ल्स मंट्स ने. पता चलता है कि चार्ल्स वही खोया हुआ हीरो है जिससे प्रभावित होकर बचपन में मि. फ्रेडरिकसन ने रोमांचकारी यात्राओं के सपने देखे थे. चार्ल्स उन्हें अपने उड़ने वाले गुब्बारेनुमा जहाज़ में दावत के लिए बुलाता है. यहाँ दावत का सारा इंतज़ाम बोलने वाले कुत्तों के हाथों में है.

बातों-बातों में पता चलता है कि चार्ल्स केविन को पकड़ना चाहता है और उसे अपने साथ सबूत के तौर पर वापस ले जाना चाहता है. लेकिन रुको, मि. फ्रेडरिकसन और रसेल ऐसा नहीं होने देंगे. वो केविन को उसके बच्चों तक पहुँचायेंगे. और यहाँ से शुरु होता है आसमान में उठा-पटक का एक रोमांचकारी सफर. जिसमें एक ओर हैं चार्ल्स के बोलने वाले कुत्तों की फ़ौज और दूसरी तरफ़ है मि. फ्रेडरिकसन, रसेल, केविन और डग की चतुर चौकड़ी. ये चतुर चौकड़ी चार्ल्स को ख़ूब नाच नचाती है और आखिर में केविन अपने प्यारे बच्चों तक पहुँच जाती है. मि. फ्रेडरिकसन रसेल के साथ वापस अपनी दुनिया लौट जाते हैं और रसेल के प्यारे दादा और डग के मास्टर बन जाते हैं.

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क्या तुम जानते हो?

’अप’ को इस साल का सर्वश्रेष्ठ एनीमेशन फ़िल्म का ऑस्कर पुरस्कार मिला है.

– इसके साथ ही ’अप’ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए भी नामांकित हुई थी. यह सम्मान पाने वाली ’अप’ सिर्फ़ दूसरी एनीमेशन फ़िल्म है. इस सूची का पहला नाम थी फ़िल्म ’ब्यूटी एंड द बीस्ट’ जो सन 1991 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी.

– फ़िल्म के निर्देशक को घर के ऊपर गुब्बारे लगा घर सहित उड़ जाने वाला मज़ेदार ख़्याल दरअसल असल ज़िन्दगी की परेशानियों से ऊबकर आया था.

– मि. फ्रेडरिकसन का किरदार हॉलीवुड के ही मशहूर अदाकार स्पेंसर ट्रेसी जैसा दिखता है. उनकी फ़िल्म ‘Guess who’s coming to dinner’ मेरी आल टाइम फ़ेवरेट फ़िल्म है.

बुला रहा है कोई मुझको, लुभा रहा है कोई.

Leaving Homeबात पुरानी है, नब्बे का दशक अपने मुहाने पर था. अपने स्कूल के आख़िरी सालों में पढ़ने वाला एक लड़का राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में कैसेट रिकार्ड करने की दुकान खोलकर बैठे दुकानदार से कुछ अजीब अजीब से नामों वाले गाने माँगा करता. जो उम्मीद के मुताबिक उसे कभी नहीं मिला करते. दुकानदार उसे गुस्सैल नज़रों से घूरता. इंडियन ओशियन और यूफ़ोरिया को मैं तब से जानता हूँ. उसे जयपुर शहर में (जहाँ वो अपनी छुट्टियों में जाया करता) अजमेरी गेट के पास वाली एक छोटी सी गली बहुत पसन्द थी. इसलिए क्योंकि ट्रैफ़िक कंट्रोल रूम ’यादगार’ से घुसकर टोंक रोड को नेहरू बाज़ार से जोड़ने वाली यह गली उसे उसकी पसन्दीदा तीन चीज़ें देती थी. एक – क्रिकेट सम्राट, दो – इंडियन ओशियन और यूफ़ोरिया की ऑडियो कैसेट्स और तीसरी गुड्डू की मशीन वाली सॉफ़्टी. और अगर कभी वो जयपुर न जा पाता तो वो अपनी माँ के जयपुर से लौटकर आने का इंतज़ार करता. और उसकी माँ उसे कभी निराश नहीं करतीं.

कितने दूर निकल आए हैं हम अपने-अपने घरों से. कल ओडियन, बिग सिनेमास में जयदीप वर्मा की बनाई ’लीविंग होम – लाइफ़ एंड म्यूज़िक ऑफ़ इंडियन ओशियन’ देखने हुए मुझे यह अहसास हुआ. ’लीविंग होम’ देखते हुए मैंने यह लम्बा सफ़र एक बार फिर से जिया. (और फ़िल्म के इंटरवल में आए ’वीको टरमरिक’ के विज्ञापन तो इसमें असरदार भूमिका निभा ही रहे थे!) और सच मानिए, मैं उल्लासित था. पहली बार अपने बीते कल को याद कर नॉस्टैल्जिक होते हुए भी मैं उदास बिलकुल नहीं था, प्रफ़ुल्लित हो रहा था. और यह असर था उस संगीत का जिसे सुनकर आप भर उदासी में भी फिर से जीना सीख सकते हैं. सीख सकते हैं छोड़ना, आगे बढ़ जाना. सीख सकते हैं भूलना, माफ़ करना. सीख सकते हैं खड़े रहना, आख़िर तक साथ निभाना.

’लीविंग होम’ किरदारों की कहानी नहीं है. यह उन किरदारों द्वारा रचे संगीत की कहानी है. इंडियन ओशियन के द्वारा रचित हर गीत का अपना व्यक्तित्व है, अपना स्वतंत्र अस्तित्व है. इसीलिए फ़िल्म के लिए नए लेकिन बिलकुल माफ़िक कथा संरचना प्रयोग में निर्देशक जयदीप वर्मा इसे इंडियन ओशियन की कहानी द्वारा नहीं, उनके द्वारा रचे गीतों की कहानी से आगे बढ़ाते हैं. तो यहाँ जब ’माँ रेवा’ की कहानी आती है तो हम उस गीत के साथ नर्मदा घाटी के कछारों पर पहुँच जाते हैं और उस लड़के की शुरुआती कहानी से परिचित होते हैं जिसे आज पूरी दुनिया राहुल राम के नाम से जानती है. ’डेज़र्ट रेन’ की कहानी के साथ सुश्मित की कहानी खुलती है जो हमेशा से इंडियन ओशियन का आधार स्तंभ रहा है. ’कौन’ की कहानी एक नौजवान कश्मीरी लड़के की कहानी है. एक पिता हमें बात बताते हैं उन दिनों की जब एक पूरी कौम को उनके घर से बेदखल कर दिया गया था. और इसीलिए जब अमित किलाम कहते हैं कि मैं इसीलिए शुक्रगुज़ार हूँ भगवान का कि इतना सब होते हुए भी मेरे भीतर कभी वो साम्प्रदायिक विद्वेष नहीं आया, हमें भविष्य थोड़ा ज़्यादा उजला दिखता है. आगे जाकर ’झीनी’ की कथा है और अशीम अपने बचपन के दिनों के अकेलेपन को याद करते धूप के चश्मे के पीछे से अपनी नम आँखें छुपाते हैं. सुधीर मिश्रा कहते हैं कि अशीम को सुनते हुए मुझे कुमार गंधर्व की याद आती है. संयोग नहीं है कि इन दोनों ही गायकों ने कबीर की कविता को ऐसे अकल्पनीय क्षेत्रों में स्थापित किया जहाँ उनकी स्वीकार्यता संदिग्ध थी. निर्गुण काव्य की ही तरह, इंडियन ओशियन भी एक खुला मंच है संगीत का. जहाँ विश्व के किसी भी हिस्से के संगीत की आमद का स्वागत होता है.

यह फ़िल्म डॉक्यूमेंट्री के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण एंगल के साथ आई है. आमतौर पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में मूलत: अपने निर्देशक के दिमाग में आए एक अदद ख़पती विचार की उपज होती हैं. और ऐसे में निर्देशक ही कहानी को विभिन्न तरीकों से आगे बढ़ाते हैं. लेकिन ’लीविंग होम’ की ख़ास बात है कि निर्देशक यहाँ सायास लिए गए फ़ैसले के तहत खुद पीछे हट जाता है और अपनी कहानी को बोलने देता है. न ख़ुद बीच में कूदकर कथा सूत्र को आगे बढ़ाने की कोई कोशिश है और न ही कोई वॉइस-ओवर. यहाँ तक की व्यक्तिगत बातचीत भी इस तरह एडिट की गई है कि सवाल पूछने वाला कभी नज़र नहीं आता. बेशक यह सायास है. जैसा दिबाकर बनर्जी की हालिया फ़िल्म में एक किरदार का संवाद है, “डाइरेक्टर को कभी नहीं दिखना चाहिए, डाइरेक्टर का काम दिखना चाहिए.” जयदीप वर्मा का काम बोलता है.

हाँ, एक छोटी सी नाराज़गी भी है मेरी. जिस तरह शुरुआत में फ़िल्म दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी की तरह घूमती, उसकी नज़र से शहर को देखती करोलबाग की ओर बढ़ती है, वह मुझे बाँध लेता है. इंडियन ओशियन से हमारी पहली मुलाकात होती है. लेकिन फिर फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में ही हम दिल्ली के कई नामी चेहरों को इंडियन ओशियन की तारीफ़ करते (जैसे उन्हें सर्टिफ़िकेट देते) देखते हैं. उनमें से कई बाद में फ़िल्म में लौटकर आते हैं, कई नहीं. यह शुरुआती मिलना-मिलाना मुझे अखरा. हम इंडियन ओशियन को सीधे जानना ज़्यादा पसन्द करेंगे (या कहें जानते हैं) या फिर उनके संगीत के माध्यम से, जो आगे फ़िल्म करती है. न कि किसी और ’सेलिब्रिटी’ के माध्यम से. इंडियन ओशियन को अपने चाहने वालों के बीच (जो इस फ़िल्म के संभावित दर्शक होने हैं) आने के लिए मीडिया या सिनेमा के सहारे की कोई ज़रूरत नहीं है. हो सकता है शायद यह उन लोगों को फ़िल्म से जोड़ने का एक प्रयास हो जो सीधे इंडियन ओशियन के संगीत से नहीं बँधे हैं. अगर ऐसा है तो मैं भी इस प्रयोग के सफल होने की पूरी अभिलाषा रखता हूँ. लेकिन एक पुराना इंडियन ओशियन फ़ैन होने के नाते फ़िल्म की ठीक शुरुआत में हुए इस ’सेलिब्रिटी समागम’ पर मैं अपनी छोटी सी नाराज़गी यहाँ दर्ज कराता हूँ.

फ़िल्म की जान हैं वो लाइव रिकॉर्डिंग्स जिन्हें यह फ़िल्म अपने मूल कथा तत्व की तरह बीच-बीच में पिरोए हुए है. सिनेमा हाल में इस संगीत के मेले का आनंद उठाने के बाद इन्हीं रिकॉर्डिंग्स की वजह से अब मैं इस फ़िल्म की अनकट डीवीडी के इंतज़ार में हूँ. सच है कि इंडियन ओशियन का संगीत ऐसे ही अच्छा लगता है. अपने मूल रूम में, बिना किसी मिलावट, एकदम रॉ. मैं वापस आकर अपनी अलमारी में से उनकी दो पुरानी ऑडियो कैसेट्स निकालता हूँ, धूल पौंछकर उनमें से एक को अपने कैसेट प्लेयर में डालता हूँ. अब कमरे में ’डेज़र्ट रेन’ का संगीत गूँज रहा है. मैं बत्ती बुझा देता हूँ. कुछ देर से बाहर मौसम ने अपना रुख़ पलट लिया है. मैं खिड़की पूरी खोल देता हूँ. बारिश…

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जयदीप सिर्फ़ कमाल की फ़िल्में ही नहीं बनाते हैं, वे लिखते भी कमाल का हैं. इस फ़िल्म की सम्पूर्ण कथानुमा यात्रा आप तीन पोस्टों में – पहली यहाँ, दूसरी यहाँ और तीसरी यहाँ पढ़ सकते हैं. मेरी पोस्ट की तरह यह भी फ़िल्म देखने के बाद पढ़ेंगे तो और मज़ा आएगा. फ़िल्म कनॉट प्लेस के ओडियन में चल रही है और ऐसे ही शायद पांच-छ शहरों के कुछ चुनिंदा सिनेमाघरों में. और कम से कम इस हफ़्ते तो है ही.

Things we lost in the fire

’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ – थियोडोर अडोर्नो.

जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस मासूमियत की वापसी संभव है ? क्या उस एक ग्राफ़िकल दृश्य के साथ, ’जाति’ से जुड़े किसी भी संदर्भ को बहुत दशक पहले अपनी स्वेच्छा से त्याग चुके हिन्दी के ’भाववादी प्रेम सिनेमा’ का अंत हो गया है ? क्या अब हम अपनी फ़िल्मों में बिना सरनेम वाले ’हाई-कास्ट-हिन्दू-मेल’ नायक ’राहुल’ को एक ’अच्छे-अंत-वाली-प्रेम-कहानी’ की नायिका के साथ उसी नादानी और लापरवाही से स्वीकार कर पायेंगे ? क्या हमारी फ़िल्में उतनी भोली और भली बनी रह पायेंगी जितना वे आम तौर पर होती हैं ? LSD की पहली कहानी हिन्दी सिनेमा में एक घटना है. मेरे जीवनकाल में घटी सबसे महत्वपूर्ण घटना. इसके बाद मेरी दुनिया अब वैसी नहीं रह गई है जैसी वो पहले थी. कुछ है जो श्रुति और राहुल की कहानी  ने बदल दिया है, हमेशा के लिए.

LSD के साथ आपकी सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि उसे आप ’सिनेमा’ कैसे मानें ? देखने के बाद सिनेमा हाल से बाहर निकलते बहुत ज़रूरी है कि बाहर उजाला बाकी हो. सिनेमा हाल के गुप्प अंधेरे के बाद (जहां आपके साथ बैठे गिनती के लोग वैसे भी आपके सिनेमा देखने के अनुभव को और ज़्यादा अपरिचित और अजीब बना रहे हैं) बाहर निकल कर भी अगर अंधेरा ही मिले तो उस विचार से लड़ाई और मुश्किल हो जाती है. मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में देखते हुए कई बार ऐसा अनुभव किया है, शायद राकेश शर्मा की बनाई ’फ़ाइनल सल्यूशन’. लेकिन किसी हिन्दुस्तानी मुख्यधारा की फ़िल्म के साथ तो कभी नहीं. और सिर्फ़ इस एक विचार को सिद्ध करने के लिए दिबाकर हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा ’रिस्क’ लेते हैं. तक़रीबन चालीस साल पहले ऋषिकेश मुख़र्जी ने अमिताभ को यह समझाते हुए ’गुड्डी’ से अलग किया था कि अगर धर्मेन्द्र के सामने उस ’आम लड़के’ के रोल में तुम जैसा जाना-पहचाना चेहरा (’आनंद’ के बाद अमिताभ को हर तरफ़ ’बाबू मोशाय’ कहकर पुकारा जाने लगा था.) होगा तो फ़िल्म का मर्म हाथ से निकल जायेगा. दिबाकर इससे दो कदम आगे बढ़कर अपनी इस गिनती से तीसरी फ़िल्म में एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिसके नायक – नायिका लगता है फ़िल्म की कहानियों ने खुद मौहल्ले में निकलकर चुन लिये हैं. पहली बार मैं किसी आम सिनेमा प्रेमी द्वारा की गई फ़िल्म की समीक्षा में ऐसा लिखा पढ़ता हूँ कि ’देखो वो बैठा फ़िल्म का हीरो, अगली सीट पर अपने दोस्तों के साथ’ और इसी वजह से उन कहानियों को नकारना और मुश्किल हो जाता है.

पहले दिन से ही यह स्पष्ट है कि LSD अगली ’खोसला का घोंसला’ नहीं होने वाली है. यह ’डार्लिंग ऑफ़ द क्राउड’ नहीं है. ’खोसला का घोंसला’ आपका कैथार्सिस करती है, लोकप्रिय होती है. लेकिन LSD ब्रेख़्तियन थियेटर है जहाँ गोली मारने वाला नाटक में न होकर दर्शकों का हिस्सा है, आपके बीच मौजूद है. मैं पहले भी यह बात कर चुका हूँ कि हमारा लेखन (ख़ासकर भारतीय अंग्रेज़ी लेखन) जिस तरह ’फ़िक्शन’ – ’नॉन-फ़िक्शन’ के दायरे तोड़ रहा है वह उसका सबसे चमत्कारिक रूप है. ऐसी कहानी जो ’कहानी’ होने की सीमाएं बेधकर हक़ीकत के दायरे में घुस आए उसका असर मेरे ऊपर गहरा है. इसीलिए मुझे अरुंधति भाती हैं, इसिलिये पीयुष मिश्रा पसंद आते हैं. उदय प्रकाश की कहानियाँ मैं ढूंढ-ढूंढकर पढ़ता हूँ. खुद मेरे ’नॉन-फ़िक्शन’ लेखन में कथातत्व की सतत मौजूदगी इस रुझान का संकेत है. दिबाकर वही चमत्कार सिनेमा में ले आए हैं. इसलिए उनका असर गहरा हुआ है. उनकी कहानी Love_sex_aur_dhokhaसोने नहीं देती, परेशान करती है. जानते हुए भी कि हक़ीकत का चेहरा ऐसा ही वीभत्स है, मैं चाहता हूँ कि सिनेमा – ’सिनेमा’ बना रहे. मेरी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. ‘हम’ चाहते हैं कि हमारी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. हम LSD को नकारना चाहते हैं, ख़ारिज करना चाहते हैं. चाहते हैं कि उसे किसी संदूक में बंद कर दूर समन्दर में फ़ैंक दिया जाए. उसकी उपस्थिति हमसे सवाल करेगी, हमारा जीना मुहाल करेगी, हमेशा हमें परेशान करती रहेगी.

LSD पर बात करते हुए आलोचक उसकी तुलना ’सत्या’, ’दिल चाहता है’, और ’ब्लैक फ़्राइडे’ से कर रहे हैं. बेशक यह उतनी ही बड़ी घटना है हिन्दी सिनेमा के इतिहास में जितनी ’सत्या’ या ’दिल चाहता है’ थीं. ’माइलस्टोन’ पोस्ट नाइंटीज़ हिन्दी सिनेमा के इतिहास में. उन फ़िल्मों की तरह यह कहानी कहने का एक नया शास्त्र भी अपने साथ लेकर आई है. लेकिन मैं स्पष्ट हूँ इस बारे में कि यह इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह अपने पीछे कोई परिवार नहीं बनाने वाली. इस प्रयोगशील कैमरा तकनीक का ज़रूर उपयोग होगा आगे लेकिन इसका कथ्य, इसका कथ्य ’अद्वितीय’ है हिन्दी सिनेमा में. और रहेगा. यह कहानी फिर नहीं कही जा सकती. इस मायने में LSD अभिशप्त है अपनी तरह की अकेली फ़िल्म होकर रह जाने के लिए. शायद ’ओम दर-ब-दर’ की तरह. क्लासिक लेकिन अकेली.

इस रात की सुबह नहीं

’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.

मैं नर्क में हूँ.

यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों को पसंद करती थी. लेकिन तुमने मेरे साथ धोखा किया है. माना कि मेरे पिता थोड़े सख़्त हैं लेकिन मेरा स्कूल का ड्रामा देखकर तो खुश ही होते थे. यू कांट शो हिम लाइक दैट. और वो ’राहुल’… वो तो एकदम… दिबाकर मैं तुम्हें मार डालूंगी. यू डोन्ट हैव एनी राइट टू शो माई लाइफ़ लाइक दैट इन पब्लिक. अपनी इंटरप्रिटेशंस और अपनी सो-कॉल्ड रियलस्टिक एंडिंग्स तुम अपने पास रखो. हमेशा ही ’सबसे बुरा’ थोड़े न होता है. और हमारे यहाँ तो वैसे भी अब ’कास्ट-वास्ट’ को लेकर इतनी बातें कहाँ होती हैं. माना कि पापा उसे लेकर बड़े ’कॉशस’ रहते हैं लेकिन… शहरों में थोड़े न ऐसा कभी होता है. वो तो गाँवों में कभी-कभार ऐसा सुनने को मिलता है बस. और फ़िल्मों में, फ़िल्मों में तो कभी ऐसा नहीं होता. फ़िल्में ऐसी होती हैं क्या ? तुम फ़िल्म के नाम पर हमें कुछ भी नहीं दिखा सकते. यह फ़िल्म है ही नहीं. नहीं है यह फ़िल्म.

ठीक है, हमारे यहाँ कभी कास्ट से बाहर शादी नहीं हुई है. तो ? क्या हर चीज़ का कोई ’फ़र्स्ट’ नहीं होता ? पहले सब ऐसे ही बुरा-बुरा बोलते हैं, बाद में सब मान लेते हैं. वो निशा का याद नहीं, माना कि उसका वाला लड़का ’सेम कास्ट’ का था लेकिन थी तो ’लव मैरिज’ ना ? कैसे शादी के बाद सबने मान लिया था. दीपक के पापा ने तो पूरा दहेज भी लिया था दुबारा शादी करवाकर. देख लेना मेरा भी सब मान लेंगे. शुरु में प्रॉब्लम होगी उसकी कास्ट को लेकर लेकिन दिबाकर तुम देख लेना. और ‘उसे’ जानने के बाद कैसे कोई उसे नापसंद कर सकता है. पापा को मिलने तो दो, नाम-वाम सब भूल जायेंगे उससे मिलने के बाद. देख लेना  सब मान लेंगे जब मैं उन्हें सब बताऊँगी. शादी के पहले नहीं बतायेंगे, और जब शादी के बाद उनसे मिलवाऊँगी… आई प्लान्ड एवरीथिंग. बट दिबाकर, यू मेस्ड अप ऑल इन माई माइंड. नाऊ व्हाट विल आई डू, हॉऊ विल आई गैट बैक ? इट्स नॉट ए मूवी एट-ऑल. आई हेट दिस मूवी.

एंड वन मोर थिंग… नोट दिस डाउन… माई सरनेम इस नॉट ’दहिया’.

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ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9′ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?

यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूँ. नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं. कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से…

avatarअवतार : मेरी नज़र में इस फ़िल्म की खूबियाँ और कमियाँ दोनों एक ही विशेषता से निकली हैं. वो है इसकी युनिवर्सल अपील और लोकप्रियता. यह दरअसल जेम्स कैमेरून की ख़ासियत है. उनकी पिछली फ़िल्में ’टाइटैनिक’ और ’टर्मिनेटर 2 : जजमेंट डे’ इसकी गवाह हैं. मुझे आज भी याद है कि ’टर्मिनेटर 2’ ही वो फ़िल्म थी जिसे देखते हुए मुझे बचपन में भी ख़ूब मज़ा आया था जबकि उस वक़्त मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्में कम ही समझ आती थीं. तो ख़ूबी ये कि इसकी कहानी सरल है, आसानी से समझ आने वाली. जिसकी वजह से इसे विश्व भर में आसानी से समझा और सराहा जा रहा है. और कमी भी यही कि इसकी कहानी सरल है, परतदार कहानियों की गहराईयों से महरूम. जिसकी वजह से इसके किरदार एकायामी और सतही जान पड़ते हैं.

इस फ़िल्म की अच्छी बात तो यही कही जा सकती है कि यह नष्ट होती प्रकृति को इंसानी लिप्सा से बचाए जाने का ’पावन संदेश’ अपने भीतर समेटे है. लेकिन यह ’पावन संदेश’ ऐसा मौलिक तो नहीं जिसे सारी दुनिया एकटक देखे. सच्चाई यही है कि ’अवतार’ का असल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है. किरदारों और कहानी के उथलेपन को यह तकनीक द्वारा प्रदत्त गहराई से ढकने की कोशिश करती है. यही वजह है कि फ़िल्म की हिन्दुस्तान में प्रदर्शन तिथि को दो महीने से ऊपर बीत जाने के बावजूद कनॉट प्लेस के ’बिग सिनेमा : ओडियन’ में सप्ताहांत जाने पर हमें टिकट खिड़की से ही बाहर का मुँह देखना पड़ता है. मानना पड़ेगा, थ्री-डी अनुभव चमत्कारी तो है. पैन्डोरा के उड़ते पहाड़ और छूते ही बंद हो जाने वाले पौधे विस्मयकारी हैं. और एक भव्य क्लाईमैक्स के साथ वो मेरी उम्मीदें भी पूरी करती है. लेकिन मैं अब भी नहीं जानता हूँ कि अगर इसे एक सामान्य फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसमें कितना ’सत्त’ निकलेगा.

the-hurt-lockerदि हर्ट लॉकर : बहुत उम्मीदों के साथ देखी थी शायद, इसलिए निराश हुआ. बेशक बेहतर फ़िल्म है. लेकिन ’आउट ऑफ़ दि बॉक्स’ नहीं है मेरे लिए. कुछ खास पैटर्न हैं जो इस तरह की हॉलिवुडीय ’वॉर-ड्रामा’ फ़िल्में फ़ॉलो करती हैं, हर्ट लॉकर भी वो करती है. फिर भी, मेरी समस्याएं शायद इससे हैं कि वो जो दिखा रही है, आखिर बस वही क्यों दिखा रही है? लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि वो जिस पक्ष की कहानी दिखाना चाहती है उसे असरदार तरीके से दिखा रही है. एक स्तर पर ’दि हर्ट लॉकर’ की तुलना स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ से की जा सकती है. लेकिन यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि एक महिला द्वारा निर्देशित होने के बावजूद यह बहुत ही मर्दवादी फ़िल्म है. बेशक युद्ध-फ़िल्मों में एक स्तर पर ऐसा होना लाज़मी भी है. इसका नायक एक ’सम्पूर्ण पुरुष नायकीय छवि’ वाला नायक है. तुलना के लिए बताना चाहूँगा कि ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ में जिस तरह टॉम हैंक्स अपने किरदार में एक फ़ेमिनिस्ट अप्रोच डाल देते हैं उसका यहाँ अभाव है.

मेरी नज़र में हर्ट लॉकर का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है उसका ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’. और तनाव निर्माण का इससे बेहतर सांचा और क्या मिलेगा, फ़िल्म का नायक एक बम निरोधक दस्ते का सदस्य है और इराक़ में कार्यरत है. मुझे न जाने क्यों हर्ट लॉकर बार-बार दो साल पहले आई हिन्दुस्तानी फ़िल्म ’आमिर’ की याद दिला रही थी. कोई सीधा संदर्भ बिन्दु नहीं है. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों का मुख्य आधार तनाव की सफ़ल संरचना है और दोनों ही फ़िल्मों में विपक्ष का कोई मुकम्मल चेहरा कभी सामने नहीं आता. और गौर से देखें तो हर्ट लॉकर में वही अंतिम प्रसंग सबसे प्रभावशाली बन पड़ा है जहाँ अंतत: ’फ़ेंस के उधर’ मौजूद मानवीय चेहरा भी नज़र आता है. ’दि हर्ट लॉकर’ आपको बाँधे रखती है. और कुछ दूर तक बना रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.

inglourious-basterdsइनग्लोरियस बास्टर्ड्स : मैं मूलत: टैरेन्टीनो की कला का प्रशंसक नहीं हूँ. मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्त उसके गहरे मुरीद हैं. इस ज़मीन पर खड़े होकर मेरी टैरेन्टीनो से बात शुरु होती है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ शुद्ध एतिहासिक संदर्भों के साथ एक शुद्ध काल्पनिक कहानी है. ख़ास टैरेन्टीनो की मोहर लगी. इस फ़िल्म को आप टैरेन्टीनो के पुराने काम के सन्दर्भ में पढ़ते हैं. ’पल्प फ़िक्शन’ के संदर्भ में पढ़ते हैं. पिछली संदर्भित फ़िल्म ’दि हर्ट लॉकर’ की तरह ही ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ भी अपनी कथा-संरचना में ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’ को अपना आधार बनाती है. फ़िल्म का शुरुआती प्रसंग ही देखें, उसमें ’तनाव निर्माण’ और उसके साथ बदलता इंसानी व्यवहार देखें. आप समझ जायेंगे कि टैरेन्टीनो इस पद्धति के साथ हमारा परिचय इंसानी व्यव्हार की कमज़ोरियों, उसकी कुरूपताओं से करवाने वाले हैं.

और इस शुरुआती प्रसंग के साथ ही क्रिस्टोफर वॉल्टज़ परिदृश्य में आते हैं. मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रैड पिट का काम भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वॉल्टज़ यहाँ निर्विवाद रूप से बहुत आगे हैं. उनका लोकप्रियता ग्राफ़ इससे नापिए कि अपने क्षेत्र में (सहायक अभिनेता) आई.एम.डी.बी. पर उन अकेले को जितने वोट मिले हैं वो बाक़ी चार नामांकितों को मिले कुल वोट के दुगुने से भी ज़्यादा है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ को सम्पूर्ण फ़िल्म के बजाए अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर पढ़ा जाना चाहिए. यह टैरेन्टीनो को पढ़ने का पुराना तरीका है, उन्हीं का दिया हुआ. हिंसा की अति होते हुए भी उनकी फ़िल्म कुरूप नहीं होती, बल्कि वह एक दर्शनीय फ़िल्म होती है. जैसा मैंने पहले भी कहा है, वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे हैं. यह फ़िल्म उस किताब का अगला पाठ है. कई सारे उप-पाठों में बँटा.

up in the airअप इन दि एयर : जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. और ढेर सारा स्टाइल. इस फ़िल्म का सबसे बड़ा बिन्दु मेरी नज़र में यही है. यह एक बेहतर तरीके से बनाई, सेंसिबल कहानी है जिसकी जान इसके ट्रीटमेंट में छिपी है. तुलना के लिए फ़रहान अख़्तर की फ़िल्में देखी जा सकती हैं. शहर दर शहर उड़ती इस फ़िल्म के किरदार कॉर्पोरेट में काम करने वाले मेरे दोस्तों को बहुत रिलेटेबल लग सकते हैं. फ़िल्म में बहुत से तीखे प्रसंग हैं जिन्हें कसी स्क्रिप्ट में पेश किया गया है. और वो बहन-साढू की तसवीर के साथ एयरपोर्ट-एयरपोर्ट घूमना तो बहुत ही मज़ेदार है. क्या पुरस्कार मिलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सुना है कि यह कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों की दौड़ में दूसरे नम्बर पर भाग रही है. अगर आप इस रविवार एक ’अच्छी’ फ़िल्म देखकर अपनी शाम सुकून से बिताना चाहते हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है.

district 9डिस्ट्रिक्ट 9 : नामांकनों की लम्बी सूची में यह सबसे चमत्कारी फ़िल्म है. जी हाँ, यह मैं बहुचर्चित ’अवतार’ थ्री-डी में देखने के बाद कह रहा हूँ. दरअसल मैं इसी फ़िल्म पर बात करना चाहता हूँ. ‘डिस्ट्रिक्ट 9’ आपको हिला कर रख देती है. ध्वस्त कर देती है. यह दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है. इस विज्ञान-फंतासी को इसका तकनीकी पक्ष नहीं, इसका विचार अद्भुत फ़िल्म बनाता है. ऐसा विचार जो आपको डराता भी है और आपकी आँखे भी खोलता है.

जिस तरह पिछले साल आयी फ़िल्म ’दि डार्क नाइट’ सुपरहीरो फ़िल्मों की श्रंखला में एक पीढ़ी की शुरुआत थी उसी तरह से ’डिस्ट्रिक्ट 9’ विज्ञान-फंतासी के क्षेत्र में एक नई पीढ़ी के कदमों की आहट है. ’डार्क नाइट’ एक सामान्य सुपरहीरो फ़िल्म न होकर एक दार्शनिक बहस थी. यह उस शहर के बारे में खुला विचार मंथन थी जिसकी किस्मत एक अनपहचाने, सिर्फ़ रातों को प्रगट होने वाले, मुखौटा लगाए इंसान के हाथों में कैद है. क्या उस शहर को किसी भी अन्य सामान्य शहर की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? ठीक उसी तरह, ’डिस्ट्रिक्ट 9’ भी एक सामान्य ’एलियन फ़िल्म’ न होकर एक प्रतीक सत्ता है. हमारी धरती पर घटती एक ’एलियन कथा’ के माध्यम से यह आधुनिक इंसानी सभ्यता की कलई खोल कर रख देती है. विकास की तमाम बहसें, उसके भोक्ता, उसके असल दुष्परिणाम, हमारे शहरी संरचना के विकास की अनवरत लम्बी होती रेखा और हाशिए पर खड़ी पहचानों से उसकी टकराहट, भेदभाव, इंसानी स्वभाव के कुरूप पक्ष, सभी कुछ इसमें समाहित है. और इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अपनी उस पूर्ववर्ती की तरह ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को भी ऑस्कर में नज़रअन्दाज़ कर दिया जाएगा. ’सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ की दौड़ में उसका शामिल होना भी सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो पाया है कि अकादमी ने इस बार नामांकित फ़िल्मों की संख्या 5 से बढ़ाकर 10 कर दी है.

अपनी शुरुआत से ही ’डिस्ट्रिक्ट 9’ एक प्रामाणिक डॉक्युड्रामा का चेहरा पहन लेती है. मेरे ख़्याल से यह अद्भुत कथा तकनीक फ़िल्म के लिए आगे चलकर अपने मूल विचार को संप्रेषित करने में बहुत कारगर साबित होती है. शुरुआत से ही यह अपना मुख्य घटनास्थल (जहाँ स्पेसशिप आ रुका है) अमरीका के किसी शहर को न बनाकर जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) को बनाती है और केन्द्रीकृत विश्व-व्यवस्था के ध्रुव को हिला देती है. एलियन्स का घेट्टोआइज़ेशन और उनका शहर से उजाड़ा जाना हमारे लिए ऐसा आईना है जिसमें हमारे शहरों को अपना विकृत होता चेहरा देखना चाहिए. और इस ’रियलिटी चैक’ के बाद कहानी जो मोड़ लेती है वो आपने सोचा भी नहीं होगा. फ़िल्म का अंतिम दृश्य एक कभी न भूलने वाला, हॉन्टिंग असर मेरे ऊपर छोड़ गया है. नए, बेहतरीन कलाकारों के साथ इस फ़िल्म का चेहरा और प्रामाणिक बनता है लेकिन तकनीक में यह कोई ओछा समझौता नहीं करती.

मैं आश्चर्यचकित हूँ इस बात से कि क्यों इस फ़िल्म के निर्देशक को हम इस साल के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में नहीं गिन रहे? और शार्लटो कोप्ले (Sharlto Copley) जिन्होंने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है को क्यों नहीं इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता गिना जा रहा? क्या, हिंसा की अति? इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की समूची यात्रा (फ़िल्म की शुरुआत से आखिर तक का कैरेक्टर ग्राफ़) इतनी बदलावों से भरी, अविश्वसनीय और हृदय विदारक है कि उसका सर्वश्रेष्ठ की गिनती में न होना उस सूची के साथ मज़ाक है.

पोस्ट ’क्योटो’ और ’कोपनहेगन’ काल में यह कोरा संयोग नहीं है कि दो ऐसी विज्ञान फंतासियाँ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की दौड़ में हैं जिनमें मनुष्य प्रजाति खलनायक की भूमिका निभा रही है. यह और भी रेखांकित करने लायक बात इसलिए भी बन जाती है जब पता चले कि बीते सालों में अकादमी विज्ञान-फंतासियों को लेकर आमतौर से ज़्यादा नरमदिल नहीं रही है. असल दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है कि अब ’साइंस-फ़िक्शन’ सिनेमा अपनी सही राह पहचान गया है.

upअप : वाह, क्या फ़िल्म है. एक खडूस डोकरा (बूढ़ा) अपने घर के आस-पास फैलते जाते शहर से परेशान है. और वो अपने घर में ढेर सारे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है, अपने सपनों की दुनिया की ओर! क्या कमाल की बात है कि यह एनिमेशन फ़िल्म भी हमारे यांत्रिक होते जा रहे शहरी जीवन और शहरी विकास के मॉडल पर एक तीखी टिप्पणी है. ’अप’ एनीमेशन फ़िल्म होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए नामांकित हुई है. इससे ही आप उसके चमत्कार का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ख़ास बात देखने की है कि पिछले साल की विजेता ’वॉल-ई’ की तरह ही यह भी इंसानी सभ्यता के अंधेरे मोड़ की तरफ़ जाने की एक कार्टूनीकृत भविष्यवाणी है.

क्या आपको मालूम है :

– इस साल पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के दो सबसे बज़बूत दावेदार जेम्स कैमेरून (अवतार) और कैथेरीन बिग्लोव (दि हर्ट लॉकर) पूर्व पति-पत्नी हैं.

– तमाम अन्य पूर्ववर्ती पुरस्कार तथा सिनेमा आलोचक इस बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मुकाबला इन्हीं दोनों पूर्व पति-पत्नी जोड़े के बीच गिन रहे हैं. लेकिन आम दर्शक के बीच आप क्वेन्टीन टैरेन्टीनो (इनग्लोरियस बास्टर्ड्स) की लोकप्रियता और प्रभाव का अन्दाज़ा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि आई.एम.डी.बी. वेबसाइट पर पब्लिक पोल में ऑस्कर की पिछली रात तक भी वे दूसरे स्थान पर चल रहे थे.

– ऑस्कर के पहले मिलने वाला इंडिपेंडेंट सिनेमा का ’स्पिरिट पुरस्कार’ बड़ी मात्रा में ’प्रेशियस’ ने जीता है. कई सिनेमा आलोचक इस फ़िल्म में माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा मोनिक्यू (Mo’nique) की भूमिका को इस साल का सर्वश्रेष्ठ अदाकारी प्रदर्शन गिन रहे हैं.

– अगर कैथरीन बिग्लोव ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता (और जिसकी काफ़ी संभावना है.) तो वे यह पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला होंगी. इससे पहले केवल तीन महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए नामांकित हुई हैं. लीना वार्टमुलर (Lina Wertmuller) ’सेवन ब्यूटीज़’ के लिए (1976), जेन कैम्पियन (Jane Campion) ’दि पियानो’ (1993) के लिए और बहुचर्चित ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ (2003) के लिए सोफ़िया कोपोला (Sofia Coppola).

परदे पर प्यार के यादगार लम्हें

IMG_2741हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न पाए हों लेकिन प्यार का इज़हार तो बेशक उन्हीं से सीखा है. हिन्दी सिनेमा इस मायने में भी एक अनूठी दुनिया रचता है कि यह हमारी उन तमाम कल्पनाओं को असलियत का रंग देता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के छोटे कस्बों और बीहड़ शहरों में जवान होते पूरा करना हमारे जैसों के लिए मुमकिन नहीं. सिनेमा और उसके सिखाए प्रेम के इस फ़लसफ़े का असल अर्थ पाना है तो इस महादेश के भीतर जाइए, अंदरूनी हिस्सों में. व्यवस्था के बँधनों के विपरीत जन्म लेती हर प्रेम कहानी पर सिनेमा की छाप है. किसी ने पहली मुलाकात के लिए मोहल्ले के थियेटर का पिछवाड़ा चुना है तो किसी ने एक फ़िल्मी गीत काग़ज़ पर लिख पत्थर में लपेटकर मारा है. हम सब ऐसे ही बड़े हुए हैं, थोड़े से बुद्धू, थोड़े से फ़िल्मी. पेश हैं एक चयन हिन्दी सिनेमा से, प्रेम में गुँथा. हिन्दी सिनेमा के दस प्रेम दृश्य, जिन्हें देखकर हमारी मौहब्बत की परिभाषाएं बनती- बदलती रहीं हैं. बेशक चयन है और चयन हमेशा विवादास्पद होते हैं, लेकिन साथ यहाँ कोशिश उस प्रभाव को पकड़ने की भी है जिसे हम वक़्त-बेवक़्त ’सिनेमा हमारे जीवन में’ कहकर चिह्नित करते रहे हैं…

1. प्यासा.

सिगरेट का धुआँ उड़ाते गुरुदत्त और दूर से उन्हें तकती वहीदा.

pyaasaयह एक साथ हिन्दी सिनेमा का सबसे इरॉटिक और सबसे पवित्र प्रेम-दृश्य है. अभी-अभी नायिका गुलाबो (वहीदा रहमान) को एक पुलिसवाले के चंगुल से बचाने के लिए नायक विजय (गुरुदत्त) ने अपनी पत्नी कहकर संबोधित किया है. नायिका जो पेशे से एक नाचनेवाली तवायफ़ है अपने लिए इस ’पवित्र’ संबोधन को सुनकर चकित है. न जाने किस अदृश्य बँधन में बँधी नायक के पीछे-पीछे आ गई है. नायक छ्त की रेलिंग के सहारे खड़ा सिगरेट का धुआँ उड़ा रहा है और नायिका दूर से खड़ी उसे तक रही है. कुछ कहना चाहती है शायद, कह नहीं पाती. लेकिन बैकग्राउंड में साहिर का लिखा, एस.डी. द्वारा संगीतबद्ध और गीता दत्त का गाया भजन ’आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफ़ल हो जाए’ बहुत कुछ कह जाता है. इस ’सभ्य समाज’ द्वारा हाशिए पर डाल बार-बार तिरस्कृत की गई दो पहचानें, एक कवि और दूसरी वेश्या, मिलकर हमारे लिए प्रेम का सबसे पवित्र अर्थ गढ़ते हैं.

2. मुग़ल-ए-आज़म.

मधुबाला को टकटकी लगाकर निहारते दिलीप.

mughal-e-azam1कहते हैं कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में डाइरेक्टर से लेकर स्पॉट बॉय तक हर आदमी के पास सुनाने के लिए ’मुग़ल-ए-आज़म’ से जुड़ी एक कहानी होती है. के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म हिन्दुस्तान में बनी पहली मेगा फ़िल्म थी जिसने आगे आने वाली पुश्तों के लिए फ़िल्म निर्माण के पैमाने ही बदल दिए. लेकिन मुग़ल-ए-आज़म कोरा इतिहास नहीं, हिन्दुस्तान के लोकमानस में बसी प्रेम-कथा का पुनराख्यान है. एक बांदी का राजकुमार से प्रेम शहंशाह को नागवार है लेकिन वो प्रेम ही क्या जो बंधनों में बँधकर हो. चहुँओर से बंद सामंती व्यवस्था के गढ़ में प्रेम की खुली उद्घोषणा स्वरूप ’प्यार किया तो डरना क्या’ गाती अनारकली को कौन भूल सकता है.

यही याद बसी है हम सबके मन में. शहज़ादा सलीम (दिलीप कुमार) एक पँखुड़ी से हिन्दी सिनेमा की अनिन्द्य सुंदरी अनारकली (मधुबाला) के मुखड़े को सहला रहे हैं और बैकग्राउंड में तानसेन की आवाज़ बनकर ख़ुद उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ’प्रेम जोगन बन के’ गा रहे हैं. मुग़ल-ए-आज़म सामंती समाज में विरोध स्वरूप तन-कर खड़े ’प्रेम’ का अमर दस्तावेज़ है.

3. दिल चाहता है.

एक बार घूँसा, दूसरी बार इक़रार.

dil chahta haiएक ही डायलॉग ’दिल चाहता है’ के दो सबसे महत्वपूर्ण अंश रचता है. वो डायलॉग है एक कवितामय सा प्यार का इज़हार. पहली बार कॉलेज की पार्टी में यह फ़िल्म का सबसे हँसोड़ प्रसंग है तो दूसरी बार आने पर यह आपकी आँखें गीली कर देता है. बेशक आकाश (आमिर ख़ान) को शालिनी (प्रीटि ज़िन्टा) से प्यार है लेकिन बकौल समीर कौन जानता था कि उसे यह प्यार का इज़हार किसी दूसरे की शादी में दो सौ लोगों के सामने करना पड़ेगा! लेकिन क्या करें कि इस भागती ज़िन्दगी में रुककर प्यार जैसे मुलायम अहसास को समझने में अक़्सर ऐसी देर हो जाया करती है. ’दिल चाहता है’ ट्रेंड सैटर फ़िल्म थी. नई पीढ़ी के लिए आज भी नेशनल एंथम सरीख़ी है और यह ’इज़हार-ए-दिल’ प्रसंग उसके भीतर जड़ा सच्चा हीरा.

4. मि. एण्ड मिसेस अय्यर.

एक हनीमून की कहानी जो कभी मनाया ही नहीं गया.

mr & mrs iyerकल्पनाएं हमेशा हमारे सामने असलियत से ज़्यादा रूमानी और दिलकश मंज़र रचती हैं. ख्वाब हमेशा ज़िन्दगी से ज़्यादा दिलफ़रेब होते हैं. एक दक्षिण भारतीय गृहणी मीनाक्षी अय्यर (कोंकणा सेन) ने अपने मुस्लिम सहयात्री (राहुल बोस) की दंगाइयों से जान बचाने के लिए उन्हें अपना पति ’मि. अय्यर’ घोषित कर दिया है और अब पूरी यात्रा उन्हें इस झूठ को निबाहना है. और इसी कोशिश में ’मि. अय्यर’ साथ सफ़र कर रही लड़कियों को अपने हनीमून की कहानी सुनाते हैं. नीलगिरी के जगलों में एक पेड़ के ऊपर बना छोटा सा घर. पूरे चाँद वाली रात. यह एक फोटोग्राफ़र की आँख से देखा गया दृश्य है. और पीछे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का धीमे-धीम ऊँचा उठता संगीत. नायिका को पता ही नहीं चलता और वो इस नयनाभिराम मंज़र में डूबती जाती है. सबसे मुश्किल वक़्तों में ही सबसे मुलायम प्रेम कहानियाँ देखी जाती हैं. ’मि. एंड मिसेस अय्यर’ ऐसी ही प्रेम कहानी है.

5. स्पर्श.

प्रेम की सुगंध-आवाज़-स्पर्श का अहसास.

sparshसई परांजपे की ’स्पर्श’ इस चयन में शायद थोड़ी अजीब लगे, लेकिन उसका होना ज़रूरी है. फ़िल्म के नायक अनिरुद्ध (नसीरुद्दीन शाह) जो एक ब्लाइंड स्कूल के प्रिसिपल हैं देख नहीं सकते. वे हमारी नायिका कविता (शबाना आज़मी) से जानना चाहते हैं कि वे दिखती कैसी हैं? अब कविता उन्हें बोल-बोलकर बता रही हैं अपनी सुंदरता की वजहें. अपनी आँखों के बारे में, अपनी जुल्फ़ों के बारे में, अपने रंग के बारे में. लेकिन इसका याद रह जाने वाला हिस्सा आगे है जहाँ अनिरुद्ध बताते हैं कि यह रूप रंग तो मेरे लिए बेकार है. मेरे लिए तुम इसलिए सुंदर हो क्योंकि तुम्हारे बदन की खुशबू लुभावनी है, निषिगंधा के फूलों की तरह. तुम्हारी आवाज़ मर्मस्पर्शी है, सितार की झंकार की तरह. और तुम्हारा स्पर्श कोमल है, मख़मल की तरह. यह प्रसंग हिन्दी सिनेमा में ’प्रेम’ को एक और आयाम पर ले जाता है.

6. सोचा न था.

ईमानदार दुविधाओं से निकलकर इज़हार-ए-इश्क.

socha na thaआज की पीढ़ी के पसंदीदा ’लव गुरु’ इम्तियाज़ अली की वही अकेली प्रेम-कहानी को अपने सबसे प्रामाणिक और सच्चे फ़ॉर्म में आप उनकी पहली फ़िल्म ’सोचा न था’ में पाते हैं. नायक आधी रात नायिका की बालकनी फाँदकर उसके घर में घुस आया है और पूछ रहा है, “आखिर क्या है मेरे-तुम्हारे बीच अदिति?” दरअसल यह वो सवाल है जो उस रात वीरेन (अभय देओल) और अदिति (आयशा टाकिया) एक-दूसरे से नहीं, अपने आप से पूछ रहे हैं. और जब उस निर्णायक क्षण उन्हें अपने दिल से वो सही जवाब मिल जाता है तो देखिए कैसे दोनों सातवें आसमान पर हैं! इस इज़हार-ए-मोहब्बत के पहले नायिका जितनी मुख़र है, बाद में उतनी ही ख़ामोश. बरबस ’मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ याद आती है. इम्तियाज़ की प्रेम-कहानियों में प्यार को लेकर वही संशय भाव मिलता है जिसे हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ’कसप’ में पाते हैं. उनकी इन दुविधाग्रस्त लेकिन हद दर्जे तक ईमानदार प्रेम-कहानियों ने हमारे समय में ’प्रेम’ के असल अर्थ को बचाकर रखा है.

7. दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे.

पलट…

ddlj“राज, अगर ये तुझे प्यार करती है तो पलट के देखेगी. पलट… पलट…” और बनती है मेरे दौर की सबसे चहेती प्रेम कहानी. उस पूरे दौर को ही ’डीडीएलजे’ हो गया था जैसे. हमारी प्रेमिकाओं के कोडनेम ’सिमरन’ होने लगे थे और हमारी पीढ़ी ने अपना बिगड़ैल नायक पा लिया था. हम लड़कपन की देहरी पर खड़े थे और अपनी देहभाषा से ख़ुद को अभिव्यक्त करने वाला शाहरुख़ हमारे लिए प्यार के नए फ़लसफ़े गढ़ रहा था. हर दौर की अपनी एक प्रेम-कहानी होती है. परियों वाली प्रेम-कहानी. मेरे समय ने अपनी ’परियों वाली प्रेम कहानी’ शाहरुख़ की इस एक ’पलट’ के साथ पाई.

8. दिल से.

ढाई मिनट की प्रेम कहानी.

dil seहिन्दी सिनेमा में आई सबसे छोटी प्रेम-कहानी. नायक (शाहरुख़ ख़ान) रेडियो पर नायिका (मनीषा कोईराला) से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा एक गीतों भरी कहानी में पिरोकर सुना रहा है और नायिका अपने कमरे में बैठी उस किस्से को सुन रही है, समझ रही है कि ये उसके लिए ही है. इस किस्से में सब-कुछ है, अकेली रात है, बरसात है, सुनसान प्लेटफ़ॉर्म है, दौड़ते हुए घोड़े हैं, बिखरते हुए मोती हैं. यही वो दृश्य है जिसके अंत में रहमान और गुलज़ार द्वारा रचा सबसे खूबसूरत और हॉन्टिंग गीत ’ए अजनबी’ आता है. नायक अभी नायिका का नाम तक नहीं जानता है लेकिन ये कमबख़्त इश्क कब नाम पूछकर हुआ है भला.

9. तेरे घर के सामने.

कुतुब के भीतर ’दिल का भँवर करे पुकार’.

tere ghar ke samneदिल्ली की कुतुब मीनार के भीतर नूतन देव आनंद से पूछती हैं कि क्या तुम्हें ख़ामोशी की आवाज़ सुनाई देती है? और देव आनंद अपने चुहल भरे अंदाज़ में नूतन से कहते हैं कि हमें तो बस एक ही आवाज़ सुनाई देती है, ’दिल की आवाज़’. और हसरत जयपुरी का लिखा तथा एस. डी. बर्मन का रचा गीत आता है ’दिल का भँवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो’. यह आज़ाद भारत की सपने देखती नई युवा पीढ़ी है. बँधनों और रूढ़ियों से मुक्त. इस प्रसंग में आप एक साथ दो प्रेम कहानियों को बनता पायेंगे. और गौर से देखें तो ये दोनों ही प्रेम-कहानियाँ सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली हैं. नए-नए आज़ाद हुए मुल्क की नई बनती राजधानी इस प्रेम का घटनास्थल है और कुतुब से देखने पर इस प्यार का कद थोड़ा और ऊँचा उठ जाता है.

10. शोले.

माउथॉरगन बजाते अमिताभ और लैम्प बुझाती जया.

sholayक्या ’शोले’ के बिना लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से जुड़ा कोई भी चयन पूरा हो सकता है? वीरू और बसंती की मुँहफट और मुख़र प्रेमकहानी के बरक़्स एक साइलेंट प्रेमकहानी है जय और राधा की जिसके बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. हिन्दी सिनेमा की सबसे ख़ामोश प्रेमकहानी. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है.

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मूलत: नवभारत टाइम्स के संडे ’स्पेशल स्टोरी’ में प्रकाशित. चौदह फरवरी 2010 याने वैलेंटाइन डे के दिन.