देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा

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luck-by-chance-wallpaper-1महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी है और अंक जाना है इसलिए किसी एक फ़िल्म की समीक्षा कर रात तक हमें भेज दें. अगले हफ़्ते हमें गोरखपुर फ़िल्म उत्सव के लिए निकलना था और हम उसकी ही तैयारियों में जुटे थे. ’विक्टरी’ का हश्र मैं पहले से जानता था, तय हुआ कि ज़ोया अख़्तर की ’लक बाय चांस’ देखी जाएगी.

आज मैं इस घटना से तक़रीबन एक साल दूर खड़ा हूँ लेकिन इस साल आए लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा पर बात शुरु करते हुए बार-बार मेरा ध्यान इसी फ़िल्म पर जाता है. हाँ यह मेरे लिए इस साल की पहली उल्लेखनीय फ़िल्म है क्योंकि रोहन सिप्पी और कुणाल रॉय कपूर की बनाई बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य कथा ’दि प्रेसिडेंट इज़ कमिंग’ मैं बहुत बाद में देख पाया. बहरहाल ’लक बाय चांस’ इस साल की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म नहीं है. शायद मैं इस जगह ’देव डी’ को रखूँगा. हद से हद उसे हम औसत से थोड़ा ऊपर गिन सकते हैं. लेकिन ’देव डी’ तक पहुँचने का रास्ता इसी फ़िल्म से होकर जाता है. शायद इसके माध्यम से वो कहना संभव हो पाए जिसे मैं हिन्दी सिनेमा के एक बड़े बदलाव के तौर पर चिह्नित कर रहा हूँ.

बेशक ’लक बाय चांस’ को एक ख़ास मल्टीप्लेक्स-यूथ श्रंखला की फ़िल्मों वाले खांचे में फ़िट किया जा सकता है और इसकी पूर्ववर्ती फ़िल्मों में ’दिल चाहता है’ से ’रॉक ऑन’ तक सभी को गिना जाता है लेकिन एक मूल अंतर है जो ’लक बाय चांस’ को अपनी इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों से अलग बनाता है और वो है इसका अंत. जैसा मैंने अपनी समीक्षा में लिखा था,

zoya akhtar“लेकिन वो इसका अन्त है जो इसे ’दिल चाहता है’ और ’रॉक ऑन’ से ज़्यादा बड़ी फ़िल्म बनाता है. अन्त जो हमें याद दिलाता है कि बहुत बार हम एक परफ़ैक्ट एन्डिंग के फ़ेर में बाक़ी ’आधी दुनिया’ को भूल जाते हैं. याद कीजिए ’दिल चाहता है’ का अन्त जहाँ दोनों नायिकायें अपनी दुनिया खुशी से छोड़ आई हैं और तीनों नायकों के साथ बैठकर उनकी (उनकी!) पुरानी यादें जी रही हैं. या ’रॉक ऑन’ का अन्त जहाँ चारों नायकों का मेल और उनके पूरे होते सपने ही परफ़ैक्ट एन्डिंग बन जाते हैं. अपनी तमाम खूबियों और मेरी व्यक्तिगत पसंद के बावजूद ये बहुत ही मेल-शॉवनिस्टिक अन्त हैं और यहीं ’लक बाय चांस’ ख़ुद को अपनी इन पूर्ववर्तियों से बहुत सोच-समझ कर अलग करती है. ’लक बाय चांस’ इस तरह के मेल-शॉवनिस्टिक अन्त को खारिज़ करती है. फ़िल्मी भाषा में कहूं तो यह एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का महिला-प्रधान अन्त है. ज़्यादा खुला और कुछ ज़्यादा संवेदनशील. एक नायिका की भूली कहानी, उसका छूटा घर, उसके सपने, उसका भविष्य. आखिर यह उसके बारे में भी तो है. यह अन्त हमें याद दिलाता है कि बहुत दिनों बाद इस पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री में एक लड़की निर्देशक के तौर पर आई है!”

एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का एक महिला-प्रधान अन्त. यहाँ एक और गौर करने की बात है, मेरी इस समीक्षा को पढ़कर एक पाठक ने टिप्पणी की थी कि जिस अन्त की आप तारीफ़ कर रहे हैं वो तो फ़िल्म में अलग से जोड़ा हुआ लगता है. कहना होगा कि ख़ामी के बावजूद यह एक ईमानदार टिप्पणी है. सच है कि फ़िल्म की बाकी कहानी से फ़िल्म का अन्त अलग है. लेकिन यही ’जोड़े हुए अन्त’ वाला तरीका हमें एक झटके के साथ समझाता है कि हमारी मुख्यधारा सिनेमा की कहानियाँ कितनी ज़्यादा पुरुष केन्द्रित होती हैं. और हम इस सांचे में इतना गहरे ढल चुके हैं कि इससे परेशानी होना तो दूर की बात है, हमें यह अजीब भी नहीं लगता. हमारे सिनेमा में बीती हुई कहानियाँ (पास्ट स्टोरीज़) सिर्फ़ नायकों के पास होती हैं, नायिकाओं के पास नहीं.

gulaalposterऔर इसी अंत की वजह से ’लक बाय चांस’ इस साल की दो सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्मों अनुराग कश्यप की ’गुलाल’ और ’देव डी’ की पूर्वपीठिका बनती है. पहले बात ’गुलाल’ की. ’गुलाल’ इतनी आसानी से हजम होनेवाली फ़िल्म नहीं है. इस पर मेरी दोस्तों से लम्बी बहसें हुई हैं. गुलाल का समाज कैसा है? उसे क्या मानकर पढ़ा जाए – यथार्थ या फंतासी? लेकिन इन सवालों से अलग शुरुआत में मेरा फ़िल्म को लेकर मुख्य आरोप यह रहा कि मुख्य किरदार के साथ-साथ चलते हुए बीच में कहीं फ़िल्म भी यह समझ खो देती है कि इस व्यवस्था की असली शिकार आखिर में स्त्री है. तो क्या ’गुलाल’ स्त्री विरोधी फ़िल्म है और मधुर भंडारकर की फ़िल्मों की तरह क्या वो भी जिस समस्या के खिलाफ़ बनाई गई है उसे ही बेचने लगती है?

मुझे खुशी है कि मैं यहाँ गलत था. ‘गुलाल’ की बहुत सी समस्याएं तो उसे एक फंतासी मानकर पढ़ने से हल होती हैं. इस मायने में ’गुलाल’ का पुरुष-प्रधान समाज मुक्तिबोध की कविता ’अंधेरे में’ के डरावने अंधेरे की याद दिलाता है. यह निरंकुश व्यवस्था का चरम है. लेकिन मेरे आरोप का जवाब यहाँ भी फ़िल्म के अन्त में छिपा है. मेरे मित्र पल्लव ने ऐसी ही किसी उत्तेजक बहस के बीच में कहा था कि ’गुलाल’ का असल अर्थ वहाँ खुलता है जहाँ फ़िल्म के आखिरी दृश्य में नायिका गुलाल पुते चेहरों की भीड़ में खड़ी है और उसके भाई की ताजपोशी हो रही है. नायिका की आँख से बह निकले एक आँसू में सम्पूर्ण ’गुलाल’ का अर्थ समाहित है. व्यवस्था परिवर्तन होता है और एक स्त्री को माध्यम बनाकर होता है लेकिन इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद इस पुरुष-प्रधान समाज का ढांचा ज़रा नहीं बदलता. माना कि ’गुलाल’ में स्त्री का दृष्टिकोण फ़िल्म में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं है लेकिन आपको गुलाल के असल अर्थ तभी समझ आयेंगे जब आप उस स्त्री के नज़रिए को अपने साथ रख फ़िल्म देखेंगे.

dev-dअनुराग कश्यप की ’देव डी’ पारंपरिक चरित्रों की नई व्याख्या के लिए मील का पत्थर मानी जानी चाहिए. अगर देवदास उपन्यास और उस पर बनी पहले की फ़िल्में (विशेष तौर से संजय लीला भंसाली का अझेल मैलोड्रामा) सिर्फ़ देवदास की कहानी हैं तो अनुराग की ’देव डी’ देवदास के साथ-साथ चंदा और पारो की भी कहानी है. देवदास दरअसल हिन्दी सिनेमा का सतत कुंठित नायक है. उसमें एक ’शहीदी भाव’ सदा से मौजूद रहा है. कभी उसके हाथ पर ’मेरा बाप चोर है’ लिख दिया गया है (दीवार में अमिताभ) तो कभी उसके पिता को उनके ही दोस्त ने धोखे से मार दिया है (बाज़ीगर में शाहरुख़). हिन्दुस्तानी सिनेमा का महानायक हमेशा ऐसी ’पास्ट लाइफ़ स्टोरीज़’ अपने साथ रखता है जिससे उसके आनेवाले सभी कदम जस्टीफाइड साबित हों. और नायिकाएं होती हैं जिनकी कोई पिछली कहानियाँ नहीं होती. लेकिन ’देव डी’ में चंदा की भी कहानी है और पारो की भी. और यही ’अन्य कहानियाँ’ हमारी ’मुख्य कथा’ को आईना दिखाती हैं. अपनी व्याख्या को ही अकेली व्याख्या मानकर चलने वाला हमारा फ़िल्मी नायक आखिर ’ख़ामोशी के उस पार’ की आवाज़ सुन पाता है.

’देव डी’ में जब चंदा देव को कहती है कि ’तुम किसी और से प्यार नहीं करते. तुम सिर्फ़ अपने आप से प्यार करते हो’ तो दरअसल वो यहाँ हिन्दुस्तानी सिनेमा के सबसे चहेते नायकीय किरदार को आईना दिखा रही है. यही अंतर है देवदास और ’देव डी’ में. अनुराग देव के पिता का किरदार इसीलिए बदल देते हैं. देव के पिता यहाँ एक नरम मिजाज़ लिबरल बाप की भूमिका में हैं ताकि कोई गलतफ़हमी न बाकी रहे. हमें यह मालूम होना चाहिए कि देव और पारो के न मिल पाने की वजह देव के पिता का सामंती व्यवहार नहीं था. देव द्वारा पारो को चाहने और उसकी याद में अपनी ज़िन्दगी जला लेने के दावे के बावजूद सच यह है कि देव के भीतर भी एक ऐसा पुरुष बैठा है जो अंत में पारो को उन्हीं कसौटियों पर कसता है जो इस सामंती और पुरुषसत्तात्मक समाज ने एक लड़की के लिए बनाई हैं. इस देवदास का थोड़ा सा हिस्सा हर हिन्दुस्तानी पुरुष के भीतर कहीं है. आपके भीतर भी, मेरे भीतर भी. जब ’लव आजकल’ में जय, वीर सिंह से सवाल करता है कि ’अब मीरा किसी और के साथ है और जब वो किसी और के साथ है तो फिर उनके बीच ’वो सब’ भी होगा, फिर मुझे बुरा क्यों लग रहा है?’ तो यह उसके भीतर कहीं बचा रह गया वही ’देवदास’ है जिसके लिए स्त्री एक ऑबजेक्ट पहले है और बाद में कुछ और. और जब फ़िल्म के आखिर में वो वापस मीरा के पास लौटता है तो उसका एक शादीशुदा लड़की को पहले हुए ’वो सब’ के बारे में पूछे बिना प्रपोज़ करना उसी ’देवदास’ पर एक छोटी सी जीत है.

हमारी लड़ाई भी अपने भीतर के ’देवदासों’ से ही है.

Khargosh-Hindiमुख्यधारा से अलग हटकर मैंने दो हज़ार नौ में जो सबसे बेहतरीन फ़िल्में देखी उनमें से ज़्यादातर आपके लिए दो हज़ार दस की फ़िल्में होने वाली हैं. इन्हीं में से एक ’खरगोश’ को मैं हिन्दी सिनेमा के सबसे संभावनापूर्ण प्रयासों में से एक गिन रहा हूँ. ’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’ अपने विज़ुअल टेक्स्ट में चमत्कार पैदा करती है और इस सिनेमा माध्यम की असल विज़ुअल ताक़त का अहसास करवाती है. मराठी फ़िल्म ’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ तो अपने ऑस्कर नामांकन के साथ अभी से चर्चा में आ गई है. इस फ़िल्म में ’लगे रहो मुन्नाभाई’ की ज़िन्दादिली और ’गांधी’ की सी प्रामाणिकता एक साथ मौजूद है. उम्मीद करें कि नए साल में परेश कामदार की ’खरगोश’, अमित दत्ता की ’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’ और परेश मोकाशी की ’हरिशचंद्राची फैक्ट्री’ को बड़ा परदा नसीब हो और हमें इन फ़िल्मों को विशाल सार्वजनिक प्रदर्शन में देखकर एक बार फिर इस सिनेमा नामक जादुई माध्यम के जादू से चमत्कृत होने का मौका मिले.

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मूलत: मासिक पत्रिका समकालीन जनमत के कॉलम ’बायस्कोप’ में प्रकाशित. जनवरी 2010.

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इसे कहते हैं धमाकेदार शुरुआत!

IMG_1601इस बार के ओशियंस में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित हुए गुलज़ार साहब समारोह के डायरेक्टर जनरल मणि कौल के हाथों तैयार किया प्रशस्ति पत्र ग्रहण कर बैठने को हुए ही थे कि अचानक मंच संचालक रमन पीछे से बोले, “गुलज़ार साहब, हमने आपके लिए कुछ सरप्राइज़ रखा है!” और फिर अचानक परदे के पीछे से आयीं रेखा भारद्वाज. उन्हें यूँ देखकर एक बार तो गुलज़ार साहब के साथ बैठे विशाल भारद्वाज भी ’चौंक गए’ से लगे. धूसर किरदारों वाला सिनेमा रचने वाले ये दोनों कलाकार आज भी हमेशा की तरह अपने पसन्दीदा ब्लैक एंड वाइट के विरोधाभासी परिधानों को धारण किए मंच पर उपस्थित थे. रेखा भी ख़ाली हाथ नहीं आई थीं. उनके हाथ में माइक था और उसके साथ ही शुरु हुआ गुलज़ार के कुछ अमर गीतों का उनकी जादुई उपस्थिति में पुनर्पाठ. तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी… दिल हूम हूम करे…

गुलज़ार साहब ने कहा कि आते हुए जो सिनेमा कि गलियाँ मैंने इस समारोह स्थल के अहाते में देखीं उनसे गुज़रते हुए अहसास हुआ कि वक़्त कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है. उन्होंने बताया कि बाहर लगे बंदिनी के उस पोस्टर वाले सीन का क्लैप मैंने दिया था. जो कुछ पाया है अब तक, जो कुछ सहेजा है उसे आगे भी यूँ ही बाँटते रहने का वादा कर गुलज़ार साहब ने सबका धन्यवाद किया. सब जैसे सपनों की सी बातें थीं. संचालक रमन भी रह-रह कर समारोह का क्रम भूल-भूल जाते थे. समाँ कैसा मतवाला था इसका अन्दाज़ा आप इस बात से लगाइये कि गौरव ए. सी. की तेज़ी से परेशान हो टॉयलेट में घुसा तो उसने अपने एक ओर गुलज़ार को और दूसरी ओर विशाल भारद्वाज को हल्का होते पाया. तमाम कैमरे निरर्थक साबित हुए और माहौल को हमने अपने भीतर उतरते पाया. जैसे दो दुनियाओं के बीच का फ़र्क, लम्बा फ़ासला अचानक मिट गया हो. जादू हो जादू.

ग्यारहवें ओशियंस की ओपनिंग फ़िल्म थी रोमानिया की ’हुक्ड’. एक प्रेमी जोड़े की कहानी किसका कालखंड कुल-जमा एक शाम भर का था. बदहवास कैमरा जैसे दोनों पात्र उसे बदल-बदल कर चला रहे हों. संवादों में बनता तनाव और पात्रों के बीच लगातार उस तनाव को उठाकर ख़ुद से दूर फैंक देने की असफल जद्दोजहद. और फिर एक अनचाहे एक्सीडेंट के साथ फ़िल्म में आगमन होता है तीसरी पात्र का, एक प्रॉस्टीट्यूड. फ़िल्म की कहानी इन्हीं तीन किरदारों के सहारे आगे बढ़ती है. ’हुक्ड’ रिश्तों में ईमानदारी और विश्वास की ज़रूरत को दर्शाती फ़िल्म है. यह उन तनावों की फ़िल्म है जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी में खुशी पाने की चाहत में छोटे-छोटे समझौते कर खुद अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं. जैसा फ़िल्म की नायिका ने फ़िल्म की शुरुआत से पहले अपने वक्तव्य में कहा था कि हो सकता है यह बहुत दूर देश की कहानी है लेकिन इसके पात्रों और उन पर तारी तनावों से आप ज़रूर रिलेट कर पायेंगे.

इस बार ओशियंस के पिटारे में फ़िल्में कम चर्चाएं ज़्यादा हैं. आगे कतार में कुछ बेहतरीन सेशन विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, ज़ोया अख़्तर, इम्तियाज़ अली, राजकुमार गुप्ता और दिबाकर बैनर्जी के साथ प्रस्तावित हैं. इसके अलावा आप आने वाले दिनों में ’हरीशचन्द्र फ़ैक्ट्री’, ’ख़रगोश’, ’आदमी की औरत और अन्य कहानियाँ’ जैसी हिन्दुस्तानी और बहुत सी चर्चित विदेशी फ़िल्मों का हाल भी जान पायेंगे. तो खेल शुरु किया जाए!

बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने

kaminey-21उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले तांडव होते हैं?’ रविकांत भी सही थे अपनी जगह. मैं मुम्बई का खुलापन और आज़ादी देखता था और वो बढ़ते दक्षिणपंथी राजनीति के उभार चिह्नित कर रहे थे. हम ’मेट्रोपॉलिटन’ और ’कॉस्मोपॉलिटन’ के भेद वाली पारिभाषिक बहसों में उलझे थे. हमारे सामने एक विरोधाभासी पहचानों वाला शहर था. हम दोनों सही थे. मुम्बई के असल चेहरे में ही एक फांक है. यह शहर ऐसी बहुत सारी पहचानों से मिलकर बनता है जो अब एक-दूसरे को इसके भीतर शामिल नहीं होने देना चाहती. हाँ यह कॉस्मोपॉलिटन है. लेकिन अब कॉस्मोपॉलिटन शहर की परिभाषा बदल रही है. दुनिया के हर कॉस्मोपॉलिटन शहर में एक धारा ऐसी भी मिलती है जो उस रंग-बिरंगी कॉस्मोपॉलिटन पहचान को उलट देना चाहती है. दरअसल इस धारा से मिलकर ही शहर का ’मेल्टिंग पॉट’ पूरा होता है.

’मेल्टिंग पॉट’. विशाल भारद्वाज की ’कमीने’ ऐसे ही ’मेल्टिंग पॉट’ मुम्बई की कहानी है जहां सब गड्ड-मड्ड है. सिर्फ़ चौबीस घंटे की कहानी. यह दो भाइयों (शाहिद कपूर दोहरी भूमिका में) की कहानी है जो एक-दूसरे की शक्ल से भी नफ़रत करते हैं और इस नफ़रत की वजह उनके अतीत में दफ़्न है. चार्ली तेज़ है, उसके सपने बड़े हैं. वह रेसकोर्स का बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है. गुड्डू छोटी इच्छाओं वाला जीव है जिसकी ज़िन्दगी का ख़ाका पॉलीटेक्नीक में डिप्लोमा, नौकरी, तरक्की, शादी से मिलकर बनता है. लेकिन इस सबके बीच एक प्रेम कहानी है. गुड्डू की ज़िन्दगी में स्वीटी (प्रियंका चोपड़ा) है जो माँ बनने वाली है और बदकिस्मती से वो लोकल माफिया डॉन भोपे भाऊ (अमोल गुप्ते) की बहन है. पूरी फ़िल्म धोखे और फरेब से भरी है लेकिन अंत में आपको महसूस होगा कि असल में यह फ़िल्म अच्छाई के बारे में है. यह इंसान के भीतर छिपी अच्छाई की तलाश है. यह कबूतर के भीतर छिपे मोर की तलाश है. ’कमीने’ को लिकप्रिय हिन्दी सिनेमा की सर्वकालिक महानतम क्लासिक ’शोले’ का आधुनिक संस्करण कह सकते हैं. और इस आधुनिक संस्करण के मूल सूत्र ’शोले’ से ही उठाए गए हैं.

इस मुम्बई में अन्डरवर्ल्ड माफिया के तीन अलग अलग तंत्र एक साथ काम कर रहे हैं और जिस ’क़त्ल की रात’ की यह कहानी है उस रात यह तीनों माफिया तंत्र आपस में बुरी तरह उलझ गए हैं. अपने सपनों के पीछे भागता एक भाई चार्ली ज़िन्दगी में शॉर्टकट लेने के चक्कर में ऐसे चक्कर में फंसा है कि अब जान बचानी मुश्किल है और दूसरा भाई गुड्डू न चाहते हुए भी अब भोपे भाऊ के निशाने पर है. मराठी अस्मिता के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले भोपे भाऊ के लिए एक उत्तर भारतीय दामाद उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं का अंत है. और इसी सबके बीच उस बरसाती रात उनकी ज़िन्दगियां आपस में टकरा जाती हैं. जैसे एक-दूसरे का रास्ता काट जाती हैं. तेज़ बरसात है. गुप्प अंधेरा है. एक गिटार है जिसमें दस करोड़ रु. बन्द हैं. उस गिटार के आस-पास खून है, गोलियां हैं, लालच है, विश्वासघात है, मौत है. एक तरफ शादी की शहनाई बज रही है और दूसरी तरफ अंधाधुंध गोलियों की बौछार है. इस सारे मकडजाल से भाग जाने की इच्छा लिए हुए हमारे दोनों नायक हैं और चीज़ों को और जटिल बनाने के लिए इन दोनों नायकों की शक्लें भी एक हैं. इसी सबके बीच पुलिस के भेस में माफिया के गुर्गे हैं, बाराबंकी से मुम्बई रोज़ी की तलाश में होते विस्थापन के किस्से हैं, रिज़वानुर्रहमान से तहलका तक के उल्लेख हैं और सबसे ऊपर आर.डी बर्मन के गीत हैं. ’सत्या’ के साथ हिन्दी सिनेमा ने मुम्बई अन्डरवर्ल्ड का जो यथार्थवादी स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है उसे अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज अपने सिनेमा में नए आयाम दे रहे हैं.

गुड्डू की भूमिका में शाहिद कपूर हकलाते हैं और चार्ली की भूमिका में उनका उच्चारण गलत है (मैं ’फ़’ को ’फ़’ बोलता हूँ! आपने सुना ही होगा.) लेकिन इन शारिरिक भेदों से अलग शाहिद ने अपनी अदाकारी से दो अलग व्यक्तित्वों को जीवित किया है. स्वीटी के किरदार की आक्रामकता उसे आकर्षक बनाती है और एक मराठी लड़की के किरदार में प्रियंका बेहतर लगी हैं. भाइयों की कहानियां देखने की अभ्यस्त हिन्दुस्तानी जनता को विशाल ने खूब पकड़ा है. अब तक देखे मुख्यधारा के बॉलीवुड सिनेमा से आपकी जो भी समझ बनी है उसे साथ लेकर थियेटर में जाइएगा, वो सारे फॉर्मूले आपको बहुत काम आयेंगे इस फ़िल्म का आनंद उठाने में. वही बॉलीवुडीय परंपरा कभी आपको खास सूत्र देगी फ़िल्म को समझने के और वही कई बार आपको उस क्षण तक भी पहुंचाएगी जिसके आगे आपने जो सोचा होगा वो उलट जाएगा. श्रीराम राघवन की ही तरह विशाल भारद्वाज ने भी एक थ्रिलर को अमली जामा पहनाने के लिए हमारी साझा फ़िल्मी स्मृतियों का खूब सहारा लिया है. इस फ़िल्म की बड़ी खासियत इसके सह-कलाकारों का सही चयन और अभिनय है. कमाल किया है भोपे भाऊ की भूमिका में अमोल गुप्ते ने एवं मिखाइल की भूमिका में चंदन रॉय सान्याल ने. चंदन तो इस फ़िल्म की खोज कहे जा सकते हैं. अपने किरदार में वो कुछ इस तरह प्रविष्ठ हुए हैं कि उन्हें उससे अलगाना असंभव हो गया है.

विशाल का पुराना काम देखें तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि ’कमीने’ सबके बीच कहां ठहरती है? क्या इसे शेक्सपियर की रचनाओं के विशाल द्वारा किए तर्जुमे ’मक़बूल’ और ’ओमकारा’ के आगे की कड़ी माना जाए? बेशक ’कमीने’ विशाल की पिछली ’ओमकारा’ और ’मक़बूल’ से अलग है. इसमें शेक्सपियर की कहानियों का मृत्युबोध नहीं है, इसमें संसार की निस्सारता और नश्वरता का अलौकिक बोध नहीं है. इस मायने में यह फ़िल्म अपने अनुभव में ज़्यादा सांसारिक फ़िल्म है. ज़्यादा आमफ़हम. शायद इसमें मृत्यु भी एक आमफ़हम चीज़ बन गई है. और यहीं यह फ़िल्म क्वेन्टीन टेरेन्टीनो की फ़िल्मों के सबसे नज़दीक ठहरती है.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि एक बेहतरीन थ्रिलर की तरह यह पूरे समय अपना तनाव बरकरार रखती है. और यह तनाव बनाने के लिए विशाल ने किसी तकनीकी सहारे का उपयोग नहीं किया है बल्कि यह तनाव किरदारों के आपसी संबंधों से निकल कर आता है. ’कमीने’ कसी पटकथा और सटीक संवादों से रची फ़िल्म है जिसमें बेवजह कुछ भी नहीं है. हाँ इस कहानी में ’मक़बूल’ जितने गहरे अर्थ नहीं मिलेंगे लेकिन ’कमीने’ एक रोचक फ़िल्म है. और यह रोचक फ़िल्म अपना आकर्षण बनाए रखने के लिए हमेशा सही रास्ता चुनती है, कोई ’फॉर्टकट’ नहीं. यही मुंबई का ‘मेल्टिंग पॉट’ है।

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जनसत्ता के लिए लिखी गई थी. पहली बार मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित.

’तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं’, कमीने संगीत समीक्षा.

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मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया… और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की नई बनी लाइन घुमावदार उलझे फ्लाईओवरों के ऊपर से पच्चीस डिग्री के कोण पर उन्हें नीचा दिखाती हुई सीधा चाँद की ओर निकल जाती है वहीं, बस वहीं. दूर बादलों के बीच से निकलता एक हवाईजहाज़ था जिसकी बत्ती किसी डूबते सितारे की तरह दूर जाती लग रही थी. खिड़की के शीशे पर अटकी बारिश की बूंदें थीं जिन्हें सामने से आती ट्रक की हेडलाइट रह-रहकर सुनहरे मोती में बदल देती थी. रह-रहकर पानी, रह-रहकर मोती. चमकता सा पानी, बहते से मोती. खिड़की से दीखते सामने टंगे चाँद को देखकर ये ख्याल आया था कि क्या हमारी तरह चांद भी बारिश में भीग जाता होगा? क्या घुटने जोड़कर, दोनों हाथों के बीच सर छिपाकर वो भी इस ठिठुरन भरे मौसम में अपनी जान बचाता होगा? मैंने खिड़की से ऐसा ही एक भीगा हुआ चाँद देखा. तेज़ बौछार में उसके कपड़े जब टपकते होंगे तो क्या वो उन्हें सुखाने के लिए दो उजले तारों के बीच फैलाकर लटका देता होगा? वहीं, बस वहीं मुझे अधूरेपन का अहसास हुआ. वहीं, बस वहीं मैंने एक कहानी लिखने का फ़ैसला किया. वहीं, बस वहीं मैंने भाग जाने की सोची. वहीं, बस वहीं मैंने ’कमीने’ के गीत सुने. जैसे पहली बार सुने, जैसे आखिरी बार सुने.

“ढैन टे णे टेणे नेणे” 4:45 (सुखविंदर सिंह, विशाल डडलानी, रॉबर्ट बॉब)

“आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी तोड़े.
कोई गुडलक निकालें,
आज गुल्लक तो फोड़े.”

विशाल को शायद शेक्सपियर के साथ लम्बी संगत का यह गुण मिला है कि वे आदिम मनोभावों को सबसे बेहतर पहचानने लगे हैं. इसी संगत का असर है कि विशाल मुम्बइया सिनेमा की सबसे आदिम धुन खोज लाए हैं. ढैन टै णे टेणे टेणे ….. हमेशा से मौजूद हमारे बॉलीवुडीय मसाला सिनेमाई मनोभावों को अभिव्यक्त करने वाली सबसे आदिम धुन. इस धुन का बॉलीवुड के लिए वही महत्व है जो हॉलीवुड के लिए ’द गुड, द बैड एंड द अगली’ की शीर्षक धुन का था. मुझे लगता है मैं इस धुन को सालों से जानता हूँ. इस धुन के साथ सत्तर के दशक के अमिताभीय सिनेमा से अस्सी के दशक के मिथुन चक्रवर्तीय सिनेमा तक सिनेमा की एक पूरी किस्म अपने सारे फॉर्मूलों के साथ जी उठती है. यह महा (खल) नायक के दौर से आई आदिम धुन है. मारक असर वाली. सुखविंदर की हमलावर आवाज़ के साथ. हमेशा की तरह गुलज़ार बेहतर प्रयोग करते हैं. हालांकि इस गीत में कोई चमत्कारिक प्रयोग नहीं है लेकिन संगीत की बुलन्दी उसे ढक लेती है.

कहते हैं मुम्बई शहर कभी सोता नहीं. कहते हैं मुम्बई शहर रात का शहर है. यह गीत मुम्बई में ही होना था. यह सड़क का गाना है. रात में जागती सड़क का गाना. इसमें बहुत साल पहले जावेद अख़्तर के लिखे ’सो गया ये जहाँ’ का आवारापन घुला है. विनोद कुमार शुक्ल ने ’नौकर की कमीज़’ में लिखा था, “घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है. लौटने के लिए खुद का घर ज़रूरी होता है.” ओये लक्की लक्की ओये से कमीने तक, क्या हम नष्ट/छूटे घर की तलाश में अनवरत भटकते नायकों की कथायें रच रहे हैं.

“रात आई तो वो जिनके घर थे
वो घर को गए सो गए
रात आई तो हम जैसे आवारा
फिर निकले राहों में और खो गए
इस गली, उस गली
इस नगर उस नगर
जाएँ भी तो कहाँ
जाना चाहें अगर
सो गई हैं सारी मंज़िलें
सो गया है रस्ता”

“पहली बार मोहब्बत” 5:24 (मोहित चौहान)

“याद है पीपल के जिसके घने साये थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाये थे.
ये बरक़त उन हज़रत की है,
पहली बार मोहब्बत की है.
आखिरी बार मोहब्बत की है.”

यह दूर पहाड़ों का गीत है. यह गाना पानी वाला गाना है. ठंडे पानी वाला गाना. रसोई के पीछे अलावघर से बुलाती उसकी आवाज़. बर्फीले पानी वाला गाना. कुड़कुड़ी वाले सर्द मौसम के बीच मिट्टी के कुल्हड़ में गरमागरम धुआँ उड़ाती चाय. कुछ है जो बहता हुआ है. नम. जैसे सुनो और भीग जाओ. देवदार. इस गाने की फ़ितरत में ठिठुरन है. कोयले की सिगड़ी जिसमें फूँक मारते ही कोयले का रँग स्याह से बदल कर सुनहरा हो जाता है. ऊना, चोप्ता, लद्दाख, दार्जिलिंग. कहते हैं कि अगर दार्जिलिंग में एड़ी के बल उचककर ऊपर को देखो तो दूर कंचनजघा दीख पड़ता है. मैं बस इस गाने को सुनने के लिये पहली बार पहाड़ों पर जाऊँ, आखिरी बार पहाड़ों पर जाऊँ.

मोहित चौहान को मैंने ’गुँचा कोई मेरे नाम कर दिया’ के साथ खोजा था, दुनिया ने ’तुमसे ही दिन होता है’ के साथ पाया. अब उन्हीं के लिये गीत रचे जा रहे हैं. सुनियेगा, जब ’पहली बार… मोहब्बत की है’ के साथ गीत ऊपर जाता है तो किसी चीड़ या देवदार की सी ऊँचाई का अहसास होता है. गुलज़ार फिर एकबार ’सोये वोये भी तो कम हैं’ जैसे प्रयोगों से साथ दिल जीत लेते हैं. एक सच्चे प्रेम-गीत की तरह यह भी ढेर सारी पुरानी यादों से गुँथा हुआ गीत है. घने साये वाले पीपल के नीचे खाये गिलहरी के झूठे मटर वाला किस्सा इस गीत की जान है. इस गीत का नशा धीरे धीरे चढ़ता है. ’रात के ढाई बजे’ से उलट यह गीत पहली नज़र का प्यार नहीं, साहचर्य का प्रेम है. आप पर आता ही जाता है, आता ही जाता है, आता ही जाता है.

“रात के ढाई बजे” 4:31 (सुरेश वाडकर, रेखा भारद्वाज, सुनिधि चौहान, कुणाल गाँजावाला, अर्ल इ.डी.)

“एक ही लट सुलझाने में
सारी रात गुज़ारी है
चाँद की गठरी सर पे ले ली
आपने कैसी ज़हमत की है”

यह पहली नज़र का प्यार है.

शुरु में ही शहनाई की बदमाश आवाज़ नोटिस करें. रैप का प्रयोग इतना उम्दा है कि हम यह भूल ही जाते हैं कि विशाल के लिये यह बिलकुल नया प्रयोग है. हमारे समय के कुछ सबसे बेहतरीन गायकों की गायकी के बीच रैप कुछ इस तरह पिरोया गया है कि अटखेली को एक और रूप तो मिलता है लेकिन गीत की तन्मयता टूटने नहीं पाती है. यह विशाल की वैरायटी है ’सपने में मिलती है’ की मासूम बदमाशी से ’कल्लू मामा’ के उज्जड्पन तक और ’छोड़ आए हम वो गलियाँ’ के नॉस्टेल्जिया से ’तुम गए सब गया’ के मृत्युबोध तक.

इस गीत की गायकी के बारे में कुछ बात विस्तार से. रेखा भारद्वाज और सुनिधि चैहान इस वक़्त हमारी सबसे वर्सटाइल गायिकाओं में से हैं. दोनों की आवाज़ की बदमाशी अब तो जगज़ाहिर है. अगर आप आवाज़ों की मूल प्रकृति पहचानते हैं तो जान जायेंगे कि इस गीत में सुरेश वाडकर की आवाज़ का क्या महत्व है. इस सांसारिक मोह माया में फंसे साधारण इच्छाओं के गीत को सुरेश वाडकर की आवाज़ अचानक एक ’पवित्रताबोध’ देती है, जैसे उसे कुछ ऊँचा उठा देती है. गौर करें कैसे कुणाल गाँजावाला अपनी चार लाइनों में कुछ अटखेलियाँ करते हैं और आखिर में टाऊ णाऊ भी लेकिन उन्हीं पंक्तियों को गाते हुए सुरेश वाडकर कितने सटीक हैं. सुरेश की आवाज़ चीनी घुली आवाज़ों के बीच गुड़ की मिठास है. और विशाल इसे बखूबी पहचानते हैं. तभी तो दूसरे अंतरे में पहली तीन लाइनें तो कुणाल की आवाज़ में हैं लेकिन ’भोले भाले बन्दे’ में अचानक सुरेश वाडकर की आवाज़ आती हैं और उसे कितना, कितना विश्वसनीय बनाती है. मैं कुणाल और सुनिधि का भी बड़ा पंखा हूँ लेकिन मुझे कहीं गहरे यह लगता है कि इस गीत पर पूरा हक रेखा भारद्वाज और सुरेश वाडकर का ही होना था. मैं पूरे गीत में उनकी आवाज़ का इंतज़ार करता हूँ. शायद उनके हिस्से का असल गीत अभी बाकी है. विशाल सुन रहे हैं न?

“फटक” 5:03 (सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर)

“ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी एड्स का खतरा है.
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है.”

आक्रामक गाना है. हमला करता हुआ. वैसे भी सुखविंदर और कैलाश हमारी सबसे बुलन्द आवाज़ें हैं. थीम बैकग्राउंड बीट है ’फटाक’, किसी वाद्ययंत्र से नहीं कोरस आवाज़ में. टिपिकल विशाल का अंदाज़. सत्या के ’कल्लू मामा’ में भी ’ढिशक्याऊँ’ की धुन इसी अन्दाज़ में आती थी. यह यथार्थवाद का विशाल का अपना तर्जुमा है. बीच में ढोल का प्रयोग एम एम करीम से रहमान तक बहुत से और लोगों के काम की याद दिला जाता है. बहुत ही लिरिकल है, सीधे ज़बान और दिमाग़ पर चढ़ने वाला. इंस्टैंट असर के लिए. गुलज़ार के प्रयोग भी अपनी पूरी बुलन्दी पर हैं. इस बार तो सामाजिक संदेश भी साथ है. ’रात का जाया रे’ जैसे प्रयोग फिर गीत को सतह से थोड़ा गहरे ले जाते हैं.

“कमीने” 5:57 (विशाल भारद्वाज)

“जिसका भी चेहरा छीला, अन्दर से और निकला.
मासूम सा कबूतर, नाचा तो मोर निकला.
कभी हम कमीने निकले, कभी दूसरे कमीने.”

सोल ऑफ़ द एलबम. पूरी तरह विशाल छाप गाना जिसमें इस बार आवाज़ भी खुद विशाल की है. इस गीत में कुल बीस बार कमीने शब्द आता है फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि यह इस दशक का सबसे मासूम गीत है. सबसे ईमानदार गीत. ऐसी ईमानदारी जो शायद आपके भीतर की उस सच्चाई को जगा दे जिसका सामना करने से आप खुद भी डरते हैं. इस गीत की प्रकृति कुछ-कुछ ’सच का सामना’ की कुर्सी पर बैठने जैसी है. यह गीत डायरी लिखने जैसा ईमानदार काम है. यह अपने ही भीतर के स्याह हिस्से की उजली तलाश है. यह गीत न्यू वेव हिन्दी सिनेमा का थीम साँग हो सकता है. यह वो सारे भाव अपने भीतर समेटे है जिसकी तलाश दिबाकर बनर्जी से अनुराग कश्यप तक अपने सिनेमा में करते रहे हैं. यह सही समय है कि एक ’पल्प फिक्शन’ हमारे यहाँ भी आए, कोई टैरेन्टीनो हमारे यहाँ भी जिन्दगी के उन स्याह हिस्सों की तलाश में निकले जिन्हें शेक्सपियर के ओथेलो से ओमकारा तक और मैकबैथ से मक़बूल तक खोजा ही जाता रहा है. विशाल, अब हम आपके इंतज़ार में है.

kaminey11

“मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!” ~पीयूष मिश्रा.

पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक ‘स्केलेटन वुमन’ था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए – साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा – परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.

लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे ‘गुम’ हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.

समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~वरुण ग्रोवर

वरुण~ आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?

पीयूष~ (लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.

लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक… उसके बाद में लेफ्ट आपको… या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ… लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ… तब आप बहुत सुखी… (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.

और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो… तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब… बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.

वरुण~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?

पीयूष~ पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा… तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (…..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था… हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!

वरुण~ हाँ लेकिन जो लोग ‘एक्ट वन’ को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि ‘एक्ट वन’ में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, ‘एक्ट वन’ की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.

पीयूष~ ठीक है, वो ‘एक्ट वन’ हो गया. ‘एक्ट वन’ ने बहुत कुछ सिखाया. ‘एक्ट वन’ (की) ‘सो कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. ‘एक्ट वन’ ने (जीना) सिखाया… ‘एक्ट वन’ की जो ‘सो-कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में… फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है… सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को… सफ़दर का काम, सफ़दर का काम… क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा… ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की… खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.

अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये… कर तो लिया यार… अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था… शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.

वरुण~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल… उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?

पीयूष~ एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ… उनसे ही पूछो!

वरुण~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर… वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.

पीयूष~ टॉक टू हिम… टॉक टू हिम!

वरुण~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?

पीयूष~ ऐसा कुछ नहीं है.

वरुण~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?

पीयूष~ कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)

वरुण~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.

पीयूष~ नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि…

वरुण~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी…

पीयूष~ हाँ… स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो… थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.

लेकिन ऐसा कुछ नहीं है… आज… नसीर हैं, ओम पुरी हैं… पंकज कपूर… दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं…

वरुण~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद…

पीयूष~ आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.

वरुण~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था…

पीयूष~ तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं… आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. ‘एक्ट वन’ मैंने जब छोड़ा था ’95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. ‘एक्ट वन’ वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.

रुण~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है…

पीयूष~ ‘झूम बराबर झूम’ में काम किया, वो चल नहीं पाई. ‘मक़बूल’ में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला… वो भी अच्छे एक्टर हैं… पर पता नहीं कुछ कारणों से, ‘मक़बूल’ में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. ‘आजा नच ले’ में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा… ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे… जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.

वरुण~ गुलाल की बात करें तो… उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?

पीयूष~ एक लाइन ली है… एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं… वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था… ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.

वरुण~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?

पीयूष~ मालूम नहीं… इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.

वरुण~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को ‘लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.

पीयूष~ वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है… मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.

वरुण~ ‘ब्लैक फ्राइडे’ के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.

पीयूष~ हूँ… हूँ… नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (‘अरे रुक जा रे बँदे’)… लाइव कॉन्सर्ट करते हैं… उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर ‘ब्लैक फ्राइडे’ सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो… सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत… यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना… गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक… भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं… मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.

एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. “यह नाटक कर रहा है… लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!” अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को…

वरुण~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है… दिल्ली के मुक़ाबले.

पीयूष~ दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) “नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.” एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)… प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या… डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में… दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ… सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?

वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य… क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने… ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का… गाली देने की इच्छा होती है.

वरुण~ फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?

पीयूष~ एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)… एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.

वरुण~ लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.

पीयूष~ वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते… उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है… अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता… ऐसा होता तो ऐसे हो जाता… जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.

वरुण~ आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.

पीयूष~ कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक… कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.

आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा… बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो… ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है… मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी… कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ… कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को… अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.

फ़िराक के शहर में सिनेमा का मेला : गोरखपुर फ़िल्म उत्सव

“हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश,
हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं.” –फ़िराक़ गोरखपुरी.

गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि प्रकाशन से लेकर फ़िल्मों के वितरण तक इसके दायरे तेज़ी से फ़ैल रहे हैं. गोरखपुर फ़िल्म सोसायटी द्वारा पहले प्रकाशन के रूप में विश्व सिनेमा के दस महानतम फ़िल्मकारों पर केन्द्रित ’पहली किताब’ का प्रकाशन इस उत्सव की उल्लेखनीय घटना थी. इस किताब में अब्बास किआरुस्तमी, अकीरा कुरोसावा, इल्माज़ गुने, इंगमार बर्गमैन, बिमल राय, चार्ली चैप्लिन और दि सिका जैसे फ़िल्मकारों पर महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं.

गोरखपुर फ़िल्म सोसायटी अब वृत्तचित्रों के वितरण का काम भी कर रही है और स्मारिका के अनुसार पन्द्रह से ज़्यादा फ़िल्मों के वितरण के अधिकार अब इसके पास हैं. इनमें संजय काक की ’जश्न-ए-आज़ादी’ और ’पानी पे लिखा’, यूसुफ़ सईद कीख्याल दर्पण’, मेघनाथ और बीजू टोप्पो की ’लोहा गरम है’ जैसी फ़िल्में शामिल हैं. लेकिन मेरे लिए इस पहली गोरखपुर यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण यह देखना था कि गोरखपुर जैसे राजनैतिक रूप से ’हायपरएक्टिव’ और उग्र हिन्दुत्ववादी राजनीति के गढ़ बनते जा रहे शहर में यह प्रतिरोध के सिनेमा का मेला शहर के सार्वजनिक जीवन में किस तरह का बदलाव ला रहा है. बेशक अब यह पूरे पूर्वांचल में अपनी तरह का अकेला फ़िल्म समारोह बनकर उभरा है लेकिन क्या यह इलाके के सांस्कृतिक पटल पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप कर पाया है?

इस बार उत्सव में मुख्य वक्तव्य अरुंधति राय का था. समारोह की थीम ’अमेरिकी साम्राज्यवाद से मुक्ति के नाम’ थी और दुनिया-भर से तमाम जनसंघर्षों से जुड़ी फ़िल्में समारोह में दिखाई जानी थीं. अरुंधति अपने वक्तव्य को लेकर कुछ दुविधा में थीं. वे चाहती थीं कि उनका वक्तव्य एकतरफ़ा संवाद न होकर दुतरफ़ा हो और यह चर्चा बातचीत की शक्ल में आगे बढ़े. उनकी इच्छा अपनी बताने से ज़्यादा लोगों के मन की बात जानने में थी. शायद वे समझना चाहती थीं कि लोगों के मन में क्या चल रहा है. वैसे शहर में आते ही स्थानीय मीडिया ने उन्हें घेरने की कोशिश शुरु कर दी थी और उन्हें लेकर मीडिया का यह पागलपन पूरे उद्घाटन सत्र में जारी रहा. मैंने उनसे पूछा कि क्या वे इस ’सेलिब्रिटी’ के पीछे पागल मीडिया और लोगों के बीच अपने असल पाठक को पहचान पाती हैं? और उन्होंने विश्वास के साथ कहा : हाँ.

बी.बी.सी. से आये मिर्ज़ा बेग ऐसे ही असल पाठक थे जिनसे अरुंधति काफ़ी देर तक बात करती रहीं. अरुंधति ने मगहर के रास्ते में आपसी बातचीत के दौरान कहा था, “इन पुरस्कारों से मिली प्रसिद्धि की चकाचौंध को मैंने नहीं चुना था लेकिन अपनी जिन्दगी के लिये मैंने जिन चीजों को चुना है उन्हें मैं इस प्रसिद्धि की वजह से खोने से इनकार करती हूँ.” अगले दिन हिन्दुस्तान दैनिक में छपे उनके साक्षात्कार का शीर्षक था, “मैं सच नहीं लिखूँगी तो मर जाऊँगी.” इस तमाम चकाचौंध के बावजूद अरुंधति ने अपनी बात कही और लोगों के सवालों से ये साफ़ था कि बात उन तक पहुँची है. अरुंधति ने कहा कि आज साम्राज्यवाद का अमेरिकी मॉडल हार रहा है. ओबामा जैसे उनके लिए आपातकालीन स्थिति के पायलट बनकर आये हैं. लेकिन यह लड़ाई का अंत नहीं है. इशारा था उन नए रूपों की ओर जिनका भेस धरकर साम्राज्यवाद वापस आयेगा, शायद हमारे ही भीतर से. हमें उन रूपों की पहचान करनी होगी. शायद यह लड़ाई का अगला चरण है जो ज़्यादा जटिल है. वे हमारे प्रतिरोध के मंच भी हड़प लेना चाहते हैं. ऐसे में प्रतिरोध का हर छोटा रूप बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. गोरखपुर का यह फ़िल्म उत्सव ऐसा ही मंच है और इसलिये एक महत्वपूर्ण कोशिश है.

उत्सव स्थल इसबार विश्वविद्यालय के प्रांगण से निकलकर शहर के बीचों-बीच आ गया था. पूरा शहर जहाँ भाजपा की आगामी 15 फ़रवरी को होनेवाली ’राष्ट्र रक्षा रैली’ के पोस्टरों और बैनरों से अटा पड़ा था वहीं इस सबके बीच शहर के मुख्य चौराहे पर समारोह स्थल पर लगा फ़ेस्टिवल का विशाल बैनर आते-जाते लोगों मे अजब उत्सुक़्ता जगा रहा था. मैंने कई लोगों को रुक-रुक कर उत्सव परिसर में घूमते और किताबें, फ़िल्में, कविता पोस्टर पढ़ते देखा. हमारी दोस्त भाषा एक सुबह उठकर अखबार की तलाश में कुछ दूर निकलीं तो उन्होंने अखबार की दुकान पर सुबह के जमावड़े में भी समारोह की चर्चा होते सुनी. शहर उत्सुक़्ता से देख रहा है, धीरे-धीरे शहर उत्सव से जुड़ रहा है. यह बात समारोह के आयोजक संजय जोशी और मनोज सिंह के लिए सबसे खास है.

मनोज कहते हैं, “2006 में समारोह की शुरुआत का विचार इस इलाके के ठहरे हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में पत्थर मारने सरीख़ा था. लेकिन हमारा उद्देश्य सिर्फ़ यही नहीं. हम चाहते हैं कि संवाद का माहौल बने. फ़िल्म समारोह के ज़रिए हम ऐसा प्रगतिशील आन्दोलन खड़ा करना चाहते हैं जो इस प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य में भी अपनी दखल बनाये.” शायद अभी उसमें वक़्त है लेकिन उत्सव से जुड़े लोग इस बात को लेकर निश्चिंत हो सकते हैं कि वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

बीजू टोप्पो जो अपनी फ़िल्म ’लोहा गरम है’ के साथ समारोह में मौजूद थे, का कहना था, “मेरे लिए यह समारोह सिर्फ़ अपनी फ़िल्म एक बड़े समूह को दिखाने का माध्यम भर नहीं. मैं खुद यहाँ दुनिया भर के जन आन्दोलनों से जुड़ी फ़िल्में देख पाता हूँ और उनसे अपनी लड़ाई को जोड़कर देख पाता हूँ जो और कहीं संभव नहीं. इस बार भी ब्रिटिश निर्देशक गिब्बी जोबेल की ब्राज़ील के भूमि-सुधार आन्दोलन पर बनी फ़िल्म ’एम.एस.टी.’ समारोह का मुख्य आकर्षण थी और मैंने, बीजू ने और हम जैसे बहुत से दर्शकों ने इस फ़िल्म के माध्यम से ब्राज़ील में राष्ट्रपति लूला के शासनकाल के बारे में बहुत सी नई जानकारियाँ पाईं. गिब्बी खुद समारोह में मौजूद थे और पूरे समारोह में उनकी आम लोगों से जुड़ने की कोशिश, हिन्दी सीखने की कोशिश के हम सब गवाह बने! फिर समारोह में ’वर्किंग मैन्स डैथ’ जैसी हार्ड हिटिंग फ़िल्म भी थी जिसे मैं इस समारोह की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार करता हूँ. इसबार समारोह इल्माज़ गुने की फ़िल्मों का रेट्रोस्पेक्टिव लेकर आया था और अपने ही देश में प्रतिबंधित इस मार्मिक फ़िल्मकार की ’योल’ और ’उमत’ जैसी फ़िल्में यहाँ दिखाई गईं और पसंद की गईं.

प्रतिरोध कितना रचनात्मक हो सकता है इसका सबसे बेहतर उदाहरण था ’जूता तो खाना ही था’ शीर्षक आधारित कविता प्रदर्शनी. इराक में पत्रकार मुंतज़र अलजैदी की बुश को जूता मारने की बहादुराना कार्यवाही पर देश भर से साथियों ने कवितायें लिखकर भेजीं थीं जिन्हें समारोह के मौके पर एक प्रदर्शनी के तौर पर सजाया गया था. यहाँ मैं मृत्युंजय की कविता का एक अंश आपके सामने पेश कर रहा हूँ,

“यह जूता है प्रजातंत्र का, नया नवेला चमड़ा,
ठाने बैठा अमरीका से नव प्रतिरोधी रगड़ा.
तेल-लुटइया, जंग-करइया, अब तो नाथ-नथाना ही था,
व्हाइट हाउस के गब्बर-गोरे जूता तो खाना ही था!.”

तो यह उत्सव सिर्फ़ सिनेमा तक सीमित नहीं. अमेरिका के साम्राज्यवाद से दुनिया भर में ज़ारी लड़ाई और उड़ीसा के गाँव-देहातों मे चल रहे जनसंघर्ष यहाँ आकर एक पहचान पाते हैं. मुझे अफ़सोस रहा कि आखिरी दिन मैं अपनी ट्रेन का वक़्त हो जाने की वजह से अशोक भौमिक द्वारा युद्ध विरोधी चित्रकला पर व्याख्यान नहीं सुन पाया. लेकिन अब मुझे पता है कि जिनके लिये वो व्याख्यान था वे लोग धीरे-धीरे आ रहे हैं, सुन रहे हैं, सोच रहे हैं. गोरखपुर धीरे-धीरे ही सही लेकिन यहाँ से निकली आवाज़ें सुन रहा है. उग्र धार्मिक पहचान वाला यह शहर अब अपने शायर फ़िराक की तरह इंसानों में खुदा देखने लगा है.

मूलत: ’द पब्लिक एजेंडा’ के 18 मार्च 2009 अंक में प्रकाशित रपट.

अँधियारा है, अश्वत्थामा है, संजय है : गुलाल

गान्धारी~
“तो सुनो कृष्ण !
प्रभु हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक-दूसरे को परस्पर फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभु हो
पर मारे जाओगे पशुओं की तरह.”

कृष्ण-ध्वनि~
“माता !
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो !
मैंने अर्जुन से कहा-
सारे तुम्हारे कर्मों का पाप-पुण्य, योगक्षेम
मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई नहीं था
वह मैं ही था
गिरता था घायल होकर जो रणभूमि में.
अश्वत्थामा के अंगों से
रक़्त, पीप, स्वेद बन कर बहूँगा
मैं ही युग-युगान्तर तक
जीवन हूँ मैं
तो मृत्यु भी तो मैं ही हूँ माँ !
शाप तुम्हारा स्वीकार है.”

धर्मवीर भारती के गीति-नाट्य ’अन्धा युग’ से.

गुलाल अश्वत्थामा का पशुवत चित्कार है. मैं उन तमाम आलोचकों से असहमत हूँ जिन्हें गुलाल अनुराग की पुरानी फ़िल्मों के मुकाबले ज़्यादा सरल और उनके तय सांचों में ज़्यादा यथार्थवादी फ़िल्म लगती है. हर लिहाज से ’ब्लैक फ्राइडे’ अनुराग की सबसे ज़्यादा यथार्थवादी फ़िल्म थी. मेरे लिए गुलाल एक फ़ैंटसी है जिसमें उन तमाम अंधेरे वक़्तों की गूँज सुनाई देती है जिनसे इंसानी तारीख़ होकर गुज़री है. यह हिटलर का जर्मनी है, यह बुश का अमरीका है. यह तालिबानी फ़रमानों के तले दबा कराहता अफ़गानिस्तान है. यह सदा से जीवित अश्वत्थामा के सड़े-गले अंगों से रिसती मवाद है. यह अन्धा युग है जो रह-रहकर लौटकर आता है. “उस दिन जो अन्धा युग अवतरित हुआ जग पर/ बीतता नहीं रह – रह कर दोहराता है/ हर क्षण होती है प्रभु की मृत्यु कहीं न कहीं/ हर क्षण अँधियारा गहरा होता जाता है.”

जैसा अनुराग ने कहा, यह अनुराग की सबसे उग्र, हिंसक, विद्रूप फ़िल्म है. गुलाल अपने आप को प्यासा के विचार से जोड़ती है. प्यासा के समाज में कवि और वेश्या के लिए कोई जगह नहीं थी. गुलाल में भी कवि और वेश्या समाज से दरकिनार हैं. लेकिन इन बीते सालों में उम्मीदें कुछ इस तरह टूटी हैं कि अब इस दुनिया को छोड़कर चले जाने के लिए उम्मीद का कोई उजला आसमान भी नहीं बाक़ी है. बस अंत में कवि की मार्मिक पुकार है, ” जैसी बची है वैसी की वैसी बचा लो ये दुनिया, अपना समझकर अपनों के जैसी सम्भालो ये दुनिया.”

पीयूष के गीत सुनकर मन में एक कसक सी उठती है. इस सपनों की नगरी ने उन्हें कभी उनकी सही जगह नहीं दी. साल निकलते जाते थे. न जाने वे शराब पी रहे थे या शराब उन्हें पी रही थी. गुलाल तक आते आते बहुत कुछ खो सा गया है. गुलाल के गीत अब भी चमत्कार हैं हिन्दी सिनेमा के लिए. जिन्होंने ’एक्ट-वन’ के सुनहरे दिनों में मन्डी हाउस के आस-पास बिखरे रंगमंचों पर पीयूष को ’गगन दमामा बाज्यो’ से लेकर ’कोर्ट मार्शल’ तक खेलते देखा है उनके लिए गुलाल फिर याद आयी तड़पा देने वाली कसक है. पीयूष के कंठ से ’ये दुनिया ग़र मिल भी जाये तो क्या है’ भी कहानी के दायरे को फांदकर हकीक़त की ओर आता सा लगता है. गुलाल के गीत सुनकर अहसास कीजिये कि हमसे अब तक क्या छूट रहा था, हमने अब तक क्या खोया है.

सिद्धार्थ- द प्रिजनर : महानगरीय सांचे में ढली नीतिकथा

मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित

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बचपन में पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियाँ सुनकर बड़ी हुई हिन्दुस्तान की जनता के लिए ’सिद्दार्थ, द प्रिज़नर’ की कहानी अपरिचित नहीं है. सोने का अंडा देने वाली मुर्गी और व्यापारी की कहानी के ज़रिये ’लालच बुरी बला है’ का पाठ बचपन में हम सबने सीखा है. इस तरह की कहानियों को हम नीति कथायें (मोरल टेल) कहते हैं. सिद्दार्थ और मोहन की कहानी एक ऐसी ही नीति कथा का मल्टीप्लैक्सीय संस्करण है जो अपना रिश्ता ऋग्वेद और बुद्धनीति से जोड़ती है. फ़िल्म के मुख्य किरदार रजत कपूर के नाम ’सिद्दार्थ’ में भी यही अर्थ-ध्वनि व्यंजित होती है. कहानी की सीख है, “इच्छाएं ही इंसान के लिए सबसे बड़ा बंधन हैं. इच्छाओं से मुक्ति पाकर ही इंसान सच्ची आज़ादी पाता है.”

मैंने यह फ़िल्म पिछले साल ’ओशियंस’ में देखी थी जहाँ रजत कपूर को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था. ’ओशियंस’ में यह उन हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में से एक थी जिसका टिकट मैंने समारोह शुरु होते ही सबसे पहले खरीदा था. वजह? ऑन पेपर, इस फ़िल्म का मूल प्लॉट हिन्दी सिनेमा इतिहास में आई थ्रिलर फ़िल्मों में अबतक के सबसे आकर्षक प्लॉट्स में से एक है. कुछ ही समय पहले जेल से रिहा हुए और अब अपनी ज़िन्दगी नए सिरे से शुरु करने की कोशिश में लगे लेखक सिद्दार्थ रॉय की नई किताब की इकलौती पांडुलिपि सायबर कैफ़े चलानेवाले मोहन (सचिन नायक) के रुपयों से भरे ब्रीफ़केस से बदल जाती है. सिद्दार्थ अपनी किताब को लेकर बैचैन है वहीं मोहन की जान उस पैसों से भरे ब्रीफ़केस में अटकी है जो अब सिद्दार्थ के पास है. इंसान की इच्छाएं उसे क्या-क्या नाच नचाती हैं. आगे इस कहानी में प्यार, रोमांच, धोखा, लालच, झूठ और मौत सभी कुछ है. लेकिन इस चमत्कारिक प्लॉट के बाद भी कुछ है जो अटका रह जाता है. थ्रिलर होते हुए भी यह फ़िल्म रजत कपूर की ही पिछली फ़िल्म मिथ्या की तरह अंत में आपके ऊपर एक उदासी का साया छोड़ जाती है. शुरुआत में आपको यह फ़िल्म एक थ्रिलर होने के नाते रफ़्तार में धीमी लग सकती है लेकिन इच्छाओं के पीछे भागती जिस जिन्दगी की व्यर्थता को दर्शाने की कोशिश फ़िल्म कर रही है उस तक पहुँचने के लिए यह कारगर हथियार है. जेल से छूटने के बाद सिद्दार्थ की रिहाइशगाह के शुरुआती सीन मेरे मन में फ़िर कभी न उगने के लिए डूबते सूरज का सा प्रभाव छोड़ते हैं. मेरे लिए यह फ़िल्म औसत से एक पायदान ऊपर खड़ी है. छोटी सी कहानी जिसकी चाहत एक बड़ा कैनवास रचकर कुछ बड़ा कहना नहीं. ओ. हेनरी और मोपांसा की लघु कथाओं की याद दिलाती यह फ़िल्म सिनेमा हाल से चाहे अनपहचानी ही निकल जाये लेकिन लेकिन आनेवाले वक़्तों में हमारे घरों में मौजूद और धीरे-धीरे बड़े हो रहे डी.वी.डी. संग्रह का हिस्सा ज़रूर बनेगी ऐसी मुझे उम्मीद है.

विज्ञापन जगत से सिनेमा में आये प्रयास गुप्ता के लिये सबसे बड़ी तारीफ़ है ’बैंग-ऑन’ कास्टिंग. रजत कपूर को देखकर तो मुझे शुरु से ही लगता रहा है कि वे तो बने ही लेखक का रोल करने के लिए हैं! वो इस रोल में इतने फ़िट हैं कि आप उनकी बेहतरीन अदाकारी को नोटिस तक नहीं करते. लेकिन अदाकारी में कमाल किया है अपने दांतों से पूरे महल को रौशन करते रहे ’हैप्पीडेंट वाइट फ़ेम’ सचिन नायक ने. सच्चाई, ईमानदारी, नैतिकता और भौतिक सुख के बीच छिड़ी जंग के निशान आप उसके चेहरे पर पढ़ सकते हैं. फ़िल्म की उदासी और निस्सहायता उनके किरदार से ही सबसे बेहतर तरीके से व्यंजित होती है. प्रदीप सागर के रूप में एक बार फिर हम ’भाई’ का ’दूसरा’ चेहरा देखते हैं और मुझे ’सत्या’ याद आती है. लेकिन ‘सिद्दार्थ’ रामू की ’सत्या’ की तरह बड़े कैनवास वाली ’मैग्नमओपस’ नहीं है. यह ज़िन्दगी की कतरन है, ’स्लाइस ऑफ़ लाइफ़’ जो बात तो छोटी कहती है लेकिन पूरी साफ़गोई से कहती है.

सल्मडॉग मिलेनियर: बॉलीवुड मसाले का फ़िरंगी तड़का. बोले तो ’जय हो!’

स्ल्मडॉग मिलिनेयर देखते हुए मुझे दो उपन्यास बार-बार याद आते रहे. एक सुकेतु मेहता का गल्पेतर गल्प ’मैक्सिमम सिटी: बाँबे लॉस्ट एंड फ़ाउन्ड’ और दूसरा ग्रेगरी डेविड रॉबर्टस का बेस्टसेलर ’शान्ताराम’. हाल-फ़िलहाल इस बहस में ना पड़ते हुए कि स्लमडॉग क्या भारत की वैसी ही औपनिवेशिक व्याख्या है जैसी अंग्रेज़ हमेशा से करते आए हैं, मैं इन उपन्यासों के ज़िक्र के माध्यम से यह देखना चाहता हूँ कि इस फ़िल्म की ’परम्परा’ की रेखाएँ कहाँ जाती हैं. इन कहानियों में मुम्बई ऐसे धड़कते शहर के रूप में हमारे सामने आता है जिसके मुख़्तलिफ़ चेहरे एक-दूसरे से उलट होते हुए भी मिलकर एक पहचान, एक व्यवस्था बनाते है. सुकेतु अलग-अलग अध्यायों में मुम्बई अन्डरवर्ल्ड, बार-डांसर्स की दुनिया, फ़िल्मी दुनिया की मायानगरी और मुम्बई पुलिस की कहानी बहुत ही व्यक्तिगत लहजे के साथ कहते हैं लेकिन साथ ही मैक्सिमम सिटी इन सब व्यवस्थाओं को आपस में उलझी हुई और जगह-जगह पर एक दूसरे को काटती हुई पहचानों का रूप देती है. उम्मीद है कि मीरा नायर जब जॉनी डेप के साथ शान्ताराम बनायेंगीं तो वो भी इसी परम्परा को समृद्ध करेंगी.

स्लमडॉग देखने के बाद सबसे महत्वपूर्ण किरदार जो आपको याद रह जाता है वो है शहर मुम्बई. एक परफ़ैक्ट नैरेटिव स्ट्रक्चर में जमाल के हर जवाब के साथ मुम्बई का एक चेहरा, एक पहचान सामने आती है. जगमगाते सिनेमाई दुनिया के सपने, धर्म के नाम पर हो रही हिंसा में बचकर भागते तीन बच्चे, झोपड़पट्टियों में चलते तमाम अवैध खेल और उनके बीच से ही पनपता जीवन. क्रिकेट और सट्टेबाज़ी, जीने की ज़द्दोजहद और प्यार…

पिछले हफ़्ते सी.एन.एन. आई.बी.एन. को दिए साक्षात्कार में डैनी बॉयल ने मुम्बई के लिए कहा है, “और इस फ़िल्म में एक किरदार मुम्बई शहर भी है. ऐसा किरदार जिसके भीतर से अन्य सभी किरदार निकलते हैं. मैं इस शहर को इसकी सम्पूर्णता में पेश करना चाहता था, लेकिन वस्तविकता यह है कि आप इसका एक हिस्सा ही पकड़ पाते हैं. इसे पूरा पकड़ पाना असंभव है क्योंकि यह बहुत जटिल है और हर रोज़ बदलता है. ये समन्दर की तरह है, हमेशा अपना रूप बदलने वाला समन्दर. लेकिन इस समन्दर का स्वाद चख़ना भी स्लमडॉग की कहानी का एक हिस्सा था. यह वैश्विक अपील रखने वाली कहानी है.”

स्लमडॉग में कोई स्टैन्डआउट एक्टिंग परफ़ॉरमेंस नहीं है. अगर याद रखे जायेंगे तो वो दो बच्चे जिन्होंने कहानी के पहले हिस्से में जमाल (आयुष महेश खेड़ेकर) और सलीम (अज़रुद्दीन मौहम्मद इस्माइल) की भूमिका निभाई है. स्लमडॉग को स्टैन्डआउट बनाती हैं उसकी तीन ख़ासियतें:-

1.पटकथा 2.सिनेमैटोग्राफ़ी 3.संगीत

साइमन बुफ़ॉय की पटकथा ’परफ़ैक्ट’ पटकथा का उदाहरण है. एन्थोनी डॉड मेन्टल की सिनेमैटोग्राफ़ी ने मुम्बई में नए रँग भरे हैं. और साथ ही यह फ़िल्म की गतिशीलता के मुताबिक है. और रहमान का संगीत फ़िल्म की जान है. कहानी का मुख्य हिस्सा. रहमान का संगीत उस तनाव के निर्माण में सबसे ज़्यादा सहायक बनता है जिस तनाव की ऐसी थ्रिलर को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है.

पटकथा- क्योंकि मैंने विकास स्वरूप का उपन्यास Q&A नहीं पढ़ा है इसलिये मैं कह नहीं सकता कि इस नैरेटिव स्ट्रक्चर का क्या और कितना उपन्यास से लिया गया है लेकिन फ़िल्म में ’कौन बनेगा करोड़पति’ के सवालों का यह सिलसिला मुम्बई की कहानी कहने के लिए ’परफ़ैक्ट’ नैरेटिव स्ट्रक्चर बन जाता है. यह पटकथा अलग-अलग बिखरी मुम्बई की कहानी को एक सूत्र में पिरो देती है. आपको कहानी में एक पूर्णता का अहसास होता है और फ़िल्म भव्यता को प्राप्त होती है. मुझे व्यक्तिगत रूप से इस तरह की ’संपूर्ण’ कहानियाँ कम ही पसन्द आती हैं. मुझे अधूरी, बिखरी, खंडित कहानियाँ (और वैसा ही नैरेटिव स्ट्रक्चर उसे पूरी तरह संप्रेषित करने के लिए) ज़्यादा प्रतिनिधि लगती हैं इस अधूरे, बिखरे, खंडित जीवन की. लेकिन शायद मेनस्ट्रीम (उधर का भी और इधर का भी) पूर्णता ज़्यादा पसन्द करता है. और इस मामले में स्लमडॉग की पटकथा पूरी तरह ’मेनस्ट्रीम’ की पटकथा है. सबकुछ एकदम अपनी जगह पर, सही-सही. विलेन वहीं जहाँ उसे होना चाहिए, नयिका वहीं जहाँ उसे मिलना चाहिए, मौत भी वहीं जहाँ उसे आना चाहिए. सभी कुछ एकदम परफ़ैक्ट टाइमिंग के साथ. इसपर बहस करने की बजाए कि यह फ़िल्म कितनी बॉलीवुड की है और कितनी हॉलीवुड की समझना यह चाहिए कि यह फ़िल्म अपने तमाम प्रयोगों के बावजूद एक शुद्ध मुख्यधारा की फ़िल्म है. और मुझे लगता है कि हॉलीवुड और बॉलीवुड के मेनस्ट्रीम में स्तर का अन्तर ज़रूर है, दिशा और ट्रीटमेंट के तरीके का नहीं. खुद डैनी बॉयल ने इस बात को माना है कि सिनेमा भारत और अमेरिका दोनों देशों में उनके सार्वजनिक जीवन के ’मेनस्ट्रीम’ में शामिल है. वे कहते हैं, “सौभाग्यवश हिन्दुस्तान में सिनेमा और उसमें काम करना लोगों की ज़िन्दगी का सामान्य हिस्सा है. यह बिलकुल अमेरिका की तरह है. लोग यहाँ सिनेमा को प्यार करते हैं.” तो यहाँ हम एक जैसे हैं. और स्लमडॉग इसी ’एक-जैसे’ तार को आपस में जोड़ रही है.

हमेशा सही जगह पर आने वाले ’कम शॉट’ और एक बेहद तनावपूर्ण क्लाइमैक्स के साथ स्लमडॉग ईस्ट और वेस्ट दोनों में लोकप्रिय और व्यावसायिक रूप से सफ़ल फ़िल्म साबित हो रही है (और होगी). और इसलिए ही यह हिन्दुस्तान की जनता के लिए कोई नई कहानी नहीं लेकर आ रही है. हिन्दुस्तानी दर्शकों ने यह ’रैग्स-गो-रिच’ वाली कहानी ही तो देखी है बार-बार. हर तीसरी बॉलीवुड फ़िल्म इसी ढर्रे की फ़िल्म है. बस इसबार उन्हें ये कहानी एक बेहतरीन पटकथा और उन्नत तकनीक के साथ देखने को मिलेगी.

फ़िल्म की शुरुआत पुलिस स्टेशन से होती है. अपने हवालदार कल्लू मामा (सौरभ शुक्ला) और इंसपेक्टर (इररफ़ान ख़ान) एक लड़के जमाल (देव पटेल) को बिजली के शॉक दे रहे हैं. इस झोपड़पट्टी के लड़के ने गई रात गेम शो ’के.बी.सी.’ में सारे सवालों के सही जवाब दिए हैं और अब वह दो करोड़ रुपयों से सिर्फ़ एक सवाल पीछे है. शक है कि उसने बेईमानी की है क्योंकि एक झोपड़पट्टी के लड़के को ये सारे जवाब मालूम हों इसका विश्वास किसी को नहीं है, खुद गेम शो के होस्ट (अनिल कपूर) को भी नहीं. पुलिस की पूछताछ में जमाल एक-एक कर हर जवाब से जुड़ा स्पष्टीकरण देता है. हर स्पष्टीकरण के साथ एक कहानी है. उसे जवाब मालूम होने की वजह. कहानी बार-बार फ़्लैशबैक में जाती है. जितनी विविधता सवालों में है उतनी ही मुम्बई की परतें खुलती हैं. आखिर में कहानी वर्तमान में आती है और जमाल आखिरी सवाल का जवाब देने वापिस लौटता है. वो कौन बनेगा करोड़पति में पैसा जीतने नहीं आया है, उसे अपनी खोयी प्रेमिका लतिका (फ़्राइडा पिन्टो) की तलाश है. उसे मालूम है कि लतिका ये शो देखती है. शायद वो उसे देख ले और उसे मिल जाये. आखिर में एक शुद्ध मुम्बईया क्लाईमैक्स है और एक ठेठ मुम्बईया आइटम नम्बर.

फ़िल्म की पटकथा सवालों के क्रम में एक के बाद एक जमाल के जीवन के अलग-अलग एपीसोड्स पिरो देती है. इससे आप मुम्बई की बहुरँगी तसवीर भी देख पाते हैं और फ़िल्म की मुख्य कथा का तनाव भी बना रहता है. यह कहानी व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक बन जाती है और ठेठ मुम्बईया फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी प्यार ही कथा के ’होने की’ मुख्य वजह बनकर सामने आता है. एक कहानी जो एलेक्ज़ेंडर ड्यूमा के ’तीन तिलंगों’ के ज़िक्र से शुरु होती है पूरा चक्र घूमकर वहीं आकर एक ’परफ़ैक्ट एंडिग’ पाती है. फ़िल्म की टैगलाइन सही है शायद, “सब लिखा हुआ है”. सल्मडॉग की सबसे बड़ी ताक़त उसका लेखन (कहानी, पटकथा, संवाद) ही है!

छायांकन- फ़िल्म मुम्बई की झोपड़पट्टी को फ़िल्माती है लेकिन ये भी सच है कि फ़िल्म उसकी गरीबी से कोई करुणा नहीं पैदा करती है. शुरुआती सीन में जहाँ पहली बार मुम्बई के सल्म से आपका सामना होता है एक कमाल की सिहरन आपमें दौड़ जाती है. कैमरा जिस गति से भागते बच्चों की टोली का पीछा करता है वो पूरे सल्म को एक निहायत गतिशील पहचान देता है. यह फ़िल्म यथार्थवाद के पीछे नहीं, भव्यता और रोमांच के पीछे भागती है और इस मामले में ये हिन्दुस्तानी समांतर सिनेमा की नहीं, मुख्यधारा सिनेमा की बहन है. रेलगाड़ी के तमाम प्रसंग भी इसी भव्यता की बानगी हैं. रेगिस्तान हो या पहाड़, रेल हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोती है. वैसी ही सम्पूर्णता प्रदान करती है जो फ़िल्म का नैरेटिव स्ट्रक्चर कहानी के साथ कर रहा है. इसलिए रेलगाड़ी इस फ़िल्म के लिए एकदम ठीक प्रतीक है.

संगीत- संगीत इस फ़िल्म की जान है. रहमान ने बैकग्राउंड स्कोर में रेलगाड़ी की धड़क-धड़क को कुछ ऐसे पिरो दिया है कि पूरी फ़िल्म में एक स्वाभाविक गति पैठ गई है. यह मुझे बार-बार ’छैयाँ छैयाँ’ की याद दिलाता है. रहमान के पास हर मौके के लिए धुन है. नायक-नायिका के मिलन के अवसर पर वे ठेठ देसी ’चोली के पीछे क्या है’ और ’मुझको राणा जी माफ़ करना’ से प्रभावित गीत लेकर आते हैं. आवाज़ें भी वही दोनों इला अरुण और अलका याग्निक. शुरुआती धुन सिनेमा हॉल में डॉल्बी डिज़िटल में क्या समाँ बाँधेगी मुझे इसका इंतज़ार है. रहमान पहले भी इतना ही कमाल का संगीत देते रहे हैं लेकिन यहाँ फ़िल्म के उदेश्य में उनका संगीत जिस तरह से इस्तेमाल हुआ है वो अद्भुत है. ऐसे में फ़िल्म में संगीत एक ’एडड एट्रेक्शन’ ना होकर कहानी का हिस्सा, एक किरदार बन जाता है. ऐसा किरदार जिसके ना रहने पर कहानी ही अधूरी रह जाये. आख़िर में आया ’जय हो!’ तो जैसे एक बड़ा समापन समारोह है जो इस उत्सवनुमा फ़िल्म को एक आश्वस्तिदायक अन्त देता है. वही अपने गुलज़ार, रहमान और सुखविन्दर की तिकड़ी. जादू है जादू.. हमने तो सालों से सुना है. अब दुनिया सुने! पेपर प्लेन उड़ाये और लिक्विड डांस करा करे!

ख़ास प्रसंगों में अन्धे लड़के अरविन्द का वापिस मिलना याद रह जाता है, “तू बच गया यार, मैं नहीं बच सका. बस इतना ही फ़र्क है.” और हमारा हीरो एक सच्चा हिन्दुस्तानी नायक है. एकदम उसके फ़ेवरिट अमिताभ बच्चन की माफ़िक! बचपन के प्यार को वो भूलता नहीं और करोड़ों की भीड़ में भी आख़िर लतिका को तलाश कर ही लेता है (याद कीजिए बेताब). नायिका भी हीरो की एक पुकार पर सातों ताले तोड़कर भागी आती है. (मुझे एक पुरानी फ़िल्म ’बरसात की रात’ की मशहूर कव्वाली ’ये इश्क इश्क है इश्क इश्क’ याद आ गई. मधुबाला नायक भारत भूषण की एक पुकार पर यूँ ही भागी आई थी. बस फ़र्क इतना था कि वो रेडियो वाला दौर था.) और विलेन ऐसा कि उसके बारे में मशहूर है कि वो भूलता नहीं, ख़ासकर अपने दुश्मनों को. जिनका उसपर ’कर्ज़ है’. (मुझे बड़ी शिद्द्त से ’काइट रनर’ का खलनायक आसिफ़ याद आ रहा है. वैसे आप ’शोले’ से लेकर ’कर्मा’ तक के खलनायकों को याद कर सकते हैं. हिन्दुस्तानी विलेन लोगों की ये ख़ासियत रही है हमेशा से. वो भूलते नहीं. और इसलिए ’गज़नी’ का खलनायक एक पिद्दी विलेन ही रह जाता है, साले को कुछ याद ही नहीं रहता! क्या उसको भी ’शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस’ की बीमारी थी!) अब इतनी सब बातों से ये तो साफ़ है कि इस फ़िल्म में किसी भी ’बॉलीवुड फ़िल्म’ जैसा ख़ूब मसाला है. देखना है कि तेईस तारीख़ को हिन्दुस्तान में प्रदर्शन के साथ ही इस फ़िल्म की चर्चा कहाँ जाती है. उम्मीद है कि सल्मडॉग मुझसे अभी और कलम घिसवाएगी.. आला रे आला ऑस्कर आला! जय हो!

सारे शहर की जगमग के भीतर है अँधेरा

बहुत दिनों बाद थियेटर में अकेले कोई फ़िल्म देखी. बहुत दिनों बाद थियेटर में रोया. बहुत दिनों बाद यूँ अकेले घूमने का मन हुआ. बहुत दिनों बाद लगा कि जिन्हें प्यार करता हूँ उन्हें जाकर यह कह दूँ कि मैं उनके बिना नहीं रह पाता. माँ की बहुत याद आयी. रिवोली से निकलकर सेन्ट्रल पार्क में साथ घूमते जोड़ों को निहारता रहा और प्यार के उस भोलेपन/अल्हड़पन का एक बार फ़िर कायल हुआ. निधि कुशवाहा याद आयी. मेट्रो में उतरती सीढ़ियों पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए किसी लड़की के बालों की क्लिप सामने पड़ी मिली और मैं उसे अपना बचपन याद करता हुआ जेब में रख साथ ले आया. दसविदानिया आपके साथ बहुत कुछ करती है. ये उनमें से कुछ की झलक है.

दसविदानिया हास्य फ़िल्म नहीं है. इसकी एक बड़ी ख़ासियत मेरी नज़र में यह है कि इसमें ज़्यादातर मुख्य किरदार अन्य हास्य फ़िल्मों की तरह कैरीकैचर नहीं हैं. आजकल यह फ़िल्म में हास्य पैदा करने का सबसे आसान तरीका मान लिया गया है. अमर कौल, विवेक कौल, राजीव जुल्का, नेहा भानोट, गिटारिस्ट अंकल, सेल्सवुमन पूरबी जोशी सभी सामान्य जीते-जागते हमें अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मिलते रहने वाले इंसान हैं जिनमें ना देखकर हँसने लायक कुछ है और ना ये बात-बात पर कोई जोक या पंच मारते हैं. हां कुछ कैरीकैचर हैं जैसे अमर का बॉस (सौरभ शुक्ला) जो हर वक्त कुछ ना कुछ खाता रहता है लेकिन यह उसी तरह का छौंक है जो सादा दाल को ‘दाल मखनी’ बना देता है. यह फ़िल्म तमाम प्रलोभनों के बावजूद अपनी ईमानदारी बनाकर रखती है और चारों तरफ़ एक ही दिशा में बहती हवा के बाद भी कोई गैरज़रूरी कॉमेडी का तड़का अपनी कहानी में नहीं लगाती. कहानी के साथ ईमानदारी और बॉक्स ऑफिस पर सफ़लता में शशांत शाह ने ईमानदारी को चुना है और इस ईमानदारी को फ़िल्म ही नहीं फ़िल्म के प्रोमोस में भी बनाकर रखा है. यह बात तब और भी ख़ास हो जाती है जब यह पता चले कि अपनी पहली फ़िल्म बना रहे शशांत शाह स्टार वन के मशहूर कॉमेडी शो ’दी ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो’ और ’रणवीर, विनय और कौन’ के निर्देशक हैं. दरअसल यह वहीं से निकली टीम है और फ़िल्म के कहानीकार अरशद सैयद इन दोनों धारावहिकों के भी प्रमुख पटकथा लेखक थे. और आप दसविदानिया में ’दि ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो’ के अनेक चेहरों विनय पाठक, रणवीर शौरी, गौरव गेरा, पूरबी जोशी को पहचान सकते हैं. यह साफ़ करता है कि यह नई पीढ़ी बात को गंभीरता से कहना भी उतना ही अच्छे से जानती है जितना हँसाना. खोसला का घोंसला, मिथ्या, रघु रोमियो, मनोरमा सिक्स फ़ीट अन्डर जैसी फ़िल्में इस बात को पुख़्ता करती हैं कि इस हँसी के पीछे एक गहरा छिपा दर्द है जो सालता रहता है. एक उदासी है जो पसरी दिखायी देती है मनोरमा सिक्स फ़ीट अन्डर के बीहड़/पीले/प्यासे कस्बों से दसविदानिया में बालकनी से दिखायी देती ऊंची-ऊंची इमारतों तक. आप अमर कौल को बरिश में भीगते हुए/ डमशिराज़ में आई लव यू कहते हुए देखें और आप समझ जायेंगे कि ऐसे मौकों पर कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं होती. न जाने इस बारिश में क्या चमत्कार था कि मैंनें देखा मैं भी अपनी आँखें पोंछ रहा था. मैज़िकल चार्ली चैप्लिन ने कहा था कि उन्हें बारिश इसलिये भाती है कि उसमें कोई उनके आंसू नहीं देख पाता. दसविदानिया में अमर कौल को भी यूँ रोने की ज़रूरत नहीं पड़ती और मुंबई की मशहूर ‘बिन-मौसम-बरसात’ आती है.

किसी भी किरदार को उसकी तयशुदा स्पेस से ज़्यादा जगह नहीं दी गयी है और रणवीर जैसे कलाकार भी दस मिनट के रोल में आते हैं. ऐसे में शीर्षक भूमिका निभाते विनय के लिये यह वन-मैन-शो है. विनय की ख़ास बात यहाँ यह है कि एक बहुत ही ’आम’ इंसान का रोल निभाते हुए भी उनकी स्क्रीन प्रेसेंस बहुत भारी है. लेकिन यह भारी स्क्रीन प्रेसेंस कहीं भी ’आम’ इंसान वाली भूमिका की तय सीमा नहीं लांघती. वो एक मरते हुए आदमी का रोल करते हुए भी आकर्षक बने रहते हैं. लेकिन यह आकर्षण सिर्फ़ दर्शकों को बांधे रखने तक जाता है, रोल के साथ नाइंसाफ़ी तक नहीं. गौरव गेरा (विवेक कौल की भूमिका में) मुझे विशेष पसंद आये. उनके गुस्से में एक सच्चाई थी. उनकी अदाकारी में एक सच्चाई थी. शायद उनके किरदार में एक सच्चाई थी. और वहीं विवेक के साथ बातचीत में शायद अमर का किरदार सबसे अच्छी तरह खुलता है. एक छोटा भाई शिकायती लहजे में कहता है कि अगर माँ को मेरी शादी से परेशानी थी तो आप तो जानते थे कि मैं ठीक कर रहा हूं. फ़िर आपने मेरा साथ क्यों नहीं दिया? क्यों मुझे घर से निकाल दिया? और जवाब में अमर कहता है कि तू बता विवेक मैं क्या करता, तुझे घर से ना निकालता तो क्या माँ को घर से निकाल देता? शुक्रिया अरशद इतनी जटिलताओं और तनावों को इतने सरल शब्दों में (एक ही वाक्य में) व्यक्त कर देने के लिये.

गौर से देखिये, अमर ज़िन्दगी से हारा हुआ इंसान नहीं है, उसने अपनी मर्जी से यह ’हार’ चुनी है अगर आप उसे हार कहें तो. अगर उसे अपने ’सही’ कहलाये जाने और किसी अपने की खुशी में से एक को चुनना हो तो वह बिना सोचे अपनों की खुशी चुनता है. ’गलत’ कहलाया जाना चुनता है. एक ’हारा हुआ आदमी’ कहलाया जाना चुनता है. यह एक ऐसे इंसान की कथा है जो अपनी मर्जी से एक ’आम’ ज़िन्दगी चुनता है. और दसविदानिया देखने के बाद मैं इस आम/ प्रिडिक्टिबल/ औसत सी ज़िन्दगी (और वैसी ही आम/ प्रिडिक्टिबल/ औसत सी मौत) को ’हार’ नहीं ’जीत’ कहूंगा.

विशेष तारीफ़ सरिता जोशी (माँ) के लिये. माँ जिन्हें यह परेशानी है कि टी.वी. के रिमोट (टाटा स्काई रिमोट!) में इतने सारे बटन क्यों होते हैं! माँ के लिये उनके बेटों का कहना है कि उन्हें आजतक कमीज़ के बटन के सिवा और कोई बटन समझ नहीं आया चाहे वो लिफ़्ट का बटन हो या घंटी का बटन. और यही माँ अपने बेटे की मौत की खबर सुनने के बाद पहली बार खुद लिफ़्ट से जाने की इच्छा प्रगट करती है. माँ कभी यह विश्वास नहीं करती कि उसका बेटा मरने वाला है (बेटे को भी यह विश्वास नहीं करने देती, जैसे उसका विश्वास ही मौत को जीत लेगा) लेकिन उनका खुद लिफ़्ट से नीचे जाने का फ़ैसला करना सच्चाई आपके सामने रख ही देता है. यह एक सीन इशारा कर देता है कि तमाम तांत्रिकों के चक्करों के बावजूद आख़िर में तो माँ भी जानती है कि क्या होने वाला है. जब अमर अपनी नयी कार में माँ को बैठाता है तो उनकी खुशी देखने लायक है. मैं यहाँ सरिता जोशी की ’ओवर-द-टॉप’ खुशी को फ़िल्म के सबसे अच्छे सीन के तौर पर याद रखूँगा.

फ़िल्म अपने कालक्रम को लेकर भी काफ़ी सजग है. अमर के दफ़्तर में चर्चा गरम है कि जब सभी टीम में अपने खिलाड़ी हैं (आया आई.पी.एल. का ज़माना!) तो सपोर्ट किसे करें? लेट 80s में बड़े होने वाले अमर और राजीव एक दूसरे के लिये ’गनमास्टर जी-नाइन’ और ’गनमास्टर जी-टेन’ हैं (जय हो ‘गरीबों के अमिताभ’ मिथुन की!) और नेहा-अमर की फ़्लैशबैक मुलाकात में पीछे ’मैनें प्यार किया’ का पोस्टर विशेष उल्लेख की मांग करता है. फ़िल्म में कुछ ख़ामियां भी हैं जैसे राजीव जुल्का (चटनी और फ़ुलका!) की पत्नी के रोल में सुचित्रा पिल्लई का नकारात्मक किरदार गैरज़रूरी था. जहाँ मौत जैसा नकारात्मक तथ्य आपके पास पहले से हो वहाँ फ़िल्म में बाकी सब सकारात्मक ही होना चाहिये. ’खोसला का घोंसला’ की तरह ही एक बार फ़िर पुरानी तस्वीरों ने (तस्वीर ने) फ़िल्म में एक अहम भूमिका निभायी है. मैं दसविदानिया देखकर अपनी बचपन की तस्वीरों को फ़िर याद करता हूं. इस बार बनस्थली जाउँगा तो ज़रूर कुछ साथ ले आऊँगा. पुरानी तस्वीरें फ़्रेम में बंद यादों की तरह होती हैं. फ़ोर बाय सिक्स/ पोस्टकार्ड साइज़/ पासपोर्ट साइज़ में कैद सुनहरी यादें.
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फ़िल्म के निर्देशक शशांत शाह और विनय पाठक से एक प्रदर्शन पूर्व की गयी बातचीत आप यहाँ पढ़ सकते हैं. प्रश्नकर्ता अपने ही दोस्त वरुण हैं. जैसा आप जानते हैं वरुण भी इस ’टीम’ का हिस्सा रहे हैं. आप वरुण की समीक्षा यहाँ देख सकते हैं.