यहाँ से शहर को देखो : हल्ला

“शहरों को फूको के शब्दों में ‘दौर-ए-हमवक्ती’ (इपॉक ऑफ़ सायमाल्टेनिटी) कहा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग कालखंड एकसाथ विद्यमान होते हैं. शहर, ख़ासतौर पर उत्तर-औपनिवेशिक शहर, अपनी ज़द में विभिन्न गतियों और लयों को समेटे रखता है और इससे विरोध और प्रतिस्पर्धा का निहायत गतिशील माहौल पैदा होता है.”
-आदित्य निगम.

किसी फ़िल्म का अन्तिम दृश्य पूरी फ़िल्म को देखने का एक नया नज़रिया दे सकता है. एक आखिरी इशारा इतना कुछ कह दे कि पूरी फ़िल्म के मायने ही बदल जाएँ. मैं यह जानता तो था लेकिन हल्ला में बहुत दिनों बाद फ़िर ऐसा होता देखा. हल्ला यूँ भी एक बेहतर फ़िल्म है जो आधुनिक ‘शहर’ की यंत्रवत व्यवस्था और विडंबनाओं को light hearted way में उभारती है लेकिन इसका अंत इसे सिर्फ़ वही नहीं रहने देता. हल्ला का अंत बताता है कि जहाँ से आप शहर को देख रहे हैं वो शहर की अकेली तस्वीर नहीं. देखने के और नज़रिए हैं लेकिन इस आधुनिक शहर व्यवस्था में चीज़ें इतनी अलग-थलग हैं कि बहुत बार आप यह समझ भी नहीं पाते कि एक ही परिघटना के अलग-अलग व्यक्तियों के लिए कितने अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं.

हल्ला के निर्देशक जयदीप वर्मा हर्षिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और सई परांजपे की फिल्में देखकर बड़े हुए हैं और हल्ला इसी परम्परा का अगला चरण है. शहर को देखने का ये नज़रिया कथा और चश्मेबत्तूर से आता है और इस रिश्ते से खोसला का घोंसला इसकी बड़ी बहन है. हल्ला में वो मुंबई है जो नायक को रोज़ सुनाई देती है, दिखाई देती है. हल्ला की मुंबई जुहू बीच, चौपाटी या मरीन ड्राइव नहीं है. हल्ला में दिन कार की अगली ड्राइवर सीट पर या ऑफिस में कम्प्यूटर के सामने शेयर बेचते-खरीदते बीत जाता है. फ़िल्म के दो सबसे महत्त्वपूर्ण घटनास्थल जहाँ ज्यादातर कहानी आगे बढ़ रही है वो एक चलती कार की अगली दो सीट और रिहायशी इमारत का पार्किंग लॉट हैं. कार्पोरेट व्यवस्था में निचली पायदान पर खड़ी जिंदगियाँ यही शहर देख रही हैं. बहुत देर तक लगता है कि यह फ़िल्म शोर के बारे में है. लेकिन हल्ला शहर के बारे में है. वो शहर जिससे आपका-मेरा रोज़ सामना होता है. शहर जिसकी कितनी लयें हैं ख़ुद उसे भी नहीं मालूम.

सुकेतु मेहता Maximum city में लिखते हैं, ” यह कमबख्त शहर. समुद्र की एक बड़ी लहर को आकर इन द्वीपों को मिटा देना चाहिए और इसे जल समाधि दे देनी चाहिए. इस शहर पर बम गिराकर इसे ख़त्म कर देना चाहिए. हर सुबह मुझे गुस्सा आता है. यहाँ कुछ भी काम कराने का यही रास्ता है; लोग गुस्सा करने पर ही काम करते हैं, गुस्से से डरते हैं. यदि पैसा और सही लोगों से जान-पहचान ना हो तो गुस्सा ही काम आता है. मैं गुस्से का फायदा समझने लगा हूँ- टेक्सी ड्राइवरों, द्वारपालों, प्लमबरों, सरकारी आदमियों पर गुस्सा होता हूँ. भारत में मेरा सीडी प्लेयर भी गुस्से या शारीरिक हिंसा की बदौलत चलता है. जब प्ले बटन को आराम से दबाने पर भी ये नींद से नहीं जागता, तो एक धौल जमाने से तुंरत बजने लगता है.”

रजत कपूर को इस रोल में देखना एक सुखद आश्चर्य था. रजत ख़ुद को मूलत: एक निर्देशक कहते हैं जो शौकिया अदाकारी भी करता है. अभी तक रजत कपूर ने बहुत से बेहतरीन रोल किए हैं लेकिन यह किरदार उनके भीतर के अदाकार के लिए भी एक चुनौती था. Osian’s में उनकी ‘the prisnor’ देखते हुए भी लगा कि एक लेखक का किरदार उनके लिए चुनौती नहीं. लेकिन जनार्दन का किरदार रजत के लिए एक चुनौती था क्योंकि वो ऐसे बिल्कुल नहीं हैं. यह रोल कुछ-कुछ राहुल बोस के झंकार बीट्स में निभाए ऋषि जैसा है. ऋषि राहुल के लिए एक चुनौती था क्योंकि राहुल जैसे मेच्योर ऐक्टर के लिए एक इम्मेच्यौर रोल प्ले करना ही बड़ी चुनौती है. और हमारे दौर के कुछ बेहतरीन अदाकार अपनी अदाकारी की सुरक्षित पनाहों से निकलकर ऐसी चुनौती का सामना करने को तैयार हैं ये देखकर अच्छा लगता है.

इस फ़िल्म की खूबसूरती यही है कि यह बड़े के पीछे नहीं भागती. हमने ‘नई कहानी’ पढ़ते हुए जाना है कि जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा भी अपने भीतर सारे अर्थ समेटे होता है. जिंदगी की एक छोटी सी ‘क्राइसिस’ किसी बड़े परिवर्तन की ओर ईशारा कर देती है. और कहानी का मूल काम है ईशारा करना.

………………………

*पोस्ट का शीर्षक फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म से लिया गया है.

मोहनदास

विचित्र प्रोसेशन,
गंभीर क्विक मार्च …
कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैंड-दल-
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप,उदर-आकृति
आँतों के जालों-से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत-स्वन-तरंगें
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर.
बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के ! !
बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में ! !
उनके पीछे चल रहा
संगीन-नोकों का चमकता जंगल,
चल रही पदचाप, तालबद्ध दीर्घ पाँत
टैंक-दल, मोर्टार, आर्टिलरी, सन्नद्ध,
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,
सैनिकों के पथराये चेहरे
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे !
शायद, मैंने उन्हें पहले कहीं तो भी देखा था.
शायद, उनमें मेरे कई परिचित ! !
उनके पीछे यह क्या ! !
कैवेलरी ! !
काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रेस,
चेहरे का आधा भाग सिंदूरी गेरुआ
आधा भाग कोलतारी भैरव,
भयानक ! !
हाथों में चमचमाती सीधी खड़ी तलवार
आबदार ! !
कंधे से कमर तक कारतूसी बैल्ट है तिरछा.
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,
रोषभरी एकाग्र दृष्टि में धार है,
कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,
उनके चित्र समाचार-पत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कवितायेँ पढ़ी थीं
भई वाह !
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण
मंत्री भी, उद्योगपति भी और विद्वान्
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमाजी उस्ताद
बनता है बलबन
हाय, हाय ! !
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय.
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छुपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आए हैं,

यह शोभा-यात्रा है किसी मृत्यु-दल की.

गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंश.

मैं सिरीफोर्ट जाते हुए संसद के बाहर से गुज़रता हूँ. आज देखा वहाँ बड़ा जमावड़ा लगा है. चैनल बाहर से लाइव ख़बरें दे रहे हैं.
हिंदुस्तान के प्रजातंत्र की सबसे बड़ी मंडी आजकल सजी है. मोलभाव जारी हैं. खरीद-फ़रोख्त चल रही है. भाव तय हो रहे हैं. रात न्यूज़ देखते हुए उबकाई सी आती है. मुझे संसद भवन को देखकर हरिशंकर परसाई का ‘अकाल उत्सव’ याद आता है,

“अब ये भूखे क्या खाएं? भाग्य विधाताओं और जीवन के थोक ठेकेदारों की नाक खा गए. वे सब भाग गए. अब क्या खाएं? आख़िर वे विधानसभा और संसद की इमारतों के पत्थर और इंटें काट-काटकर खाने लगे.”

मोहनदास को लगता है. जो जितना ऊपर बैठा है लगता है वो उतना ही बड़ा बेईमान है. क्या सब नकली हैं? डुप्लीकेट? सारी व्यवस्था ही ढह गई है. जीता जागता हाड़-मांस का इंसान किसी काम का नहीं. इस दुनिया में कागज़ की लड़ाई लड़ी जाती है. न्याय व्यवस्था की आंखों पर पट्टी बंधी है. उसके हाथ बंधे हैं. मोहनदास के पास पैसा नहीं, पहुँच नहीं. वो मोहनदास नहीं, कोई और अब मोहनदास है. कुछ समझ नहीं आ रहा है. डर सा लगता है. क्या कोई रास्ता है? मुक्तिबोध ने जब अंधेरे में लिखी तब आपातकाल सालों दूर था. लेकिन उन्होनें आनेवाले समय की डरावनी पदचाप सुन ली थी. ब्रह्मराक्षस साक्षात् उनके सामने था. यूँ ही तकरीबन चार साल पुरानी कहानी मोहनदास को आज 17 जुलाई 2008 को पहली बार देखते हुए मुझे ऐसा लगा कि आज ही वो दिन था जो तय किया गया था इस मुलाक़ात के लिए. आज जब पहली बार मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए एक अजीब सी गंध आई. सत्ता की तीखी दुर्गन्ध. गूंजते से शब्द, 20 करोड़, 25 करोड़, 30 करोड़… आज जब मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए पहली बार उबकाई सी आई.

एक ईमानदार पाठक ही नहीं एक ईमानदार दर्शक की हैसियत से भी यह तो कहना होगा कि फ़िल्म कुछ कमज़ोर थी. ईमानदार राय यह है कि कहानी से जो सहूलियतें ली गयीं दरअसल वो ही फ़िल्म को कमज़ोर बनाती हैं. शुरुआत में मीडिया दर्शन के नामपर बहुत सारे स्टीरियोटाइप किरदार गढे गए. एक बड़ी राय यह भी थी कि कलाकारों का चयन ठीक नहीं हुआ है. खासकर कबूतर जैसी अपने परिवेश में इतनी रची बसी फ़िल्म देखने के बाद दर्शकों की यह राय लाज़मी थी. फ़िर भी एक बार मोहनदास की कहानी शुरू होने के बाद फ़िल्म अपना तनाव बनाकर रखती है. साफ़ है कि कहानी की अपनी ताक़त इतनी है कि वो फ़िल्म को अपने पैरों पर खड़ा रखती है. अनिल यादव जैसे किरदार कमाल की कास्टिंग और काम का उदाहरण हैं लेकिन ऐसे उदाहरण फ़िल्म में कुछ एक ही हैं. मोहनदास के रोल के लिए ही मैं अभी हाथों-हाथ 2-3 ज़्यादा अच्छे नाम सुझा सकता हूँ. फ़िल्म कस्बे के चित्रण में जहाँ खरी उतरी है वहीँ उसका गाँव कुछ ‘बनाया-बनाया’ सा लगता है. बोली अभी-अभी सीखी सी. कस्बे के बीच से बार-बार गुज़रती कोयले की गाडियाँ याद रहती हैं, कुछ कहती हैं. फ़िल्म कहानी के मुख्य संकेत नहीं छोड़ती है. बार बार यश मालवीय और वी. के. सोनकिया  की कवितायें बात को आगे बढाती हैं. ब्रेख्त आते हैं. मुक्तिबोध आते हैं. मोहनदास के माँ-बाप पुतलीबाई और काबादास सतगुरु कबीर को याद करते हैं. कबीर जो एक ऐसी भाषा में कविता कहते थे जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है. हो सकता है कि मैं कहानी के प्रति कुछ पक्षपाती हो जाऊं. उदय प्रकाश को सहेजने वालों के साथ ऐसा हो जाता है. लेकिन फ़िल्म के शुरूआती आधे घंटे से मेरे वो दोस्त भी असंतुष्ट थे जिन्होनें कहानी नहीं पढ़ी है. शायद सोनाली कुलकर्णी के साथ थोड़ा कम वक्त और उससे मिली थोड़ी कम लम्बाई ज़्यादा कारगर रहे.

कहानी की बड़ी बात यह थी कि उसमें आप एक विलेन को नहीं पकड़ पाते. अँधेरा है. डर है. पूरी व्यवस्था का पतन है. कहानी के बीच-बीच कोष्ठकों में पूरी दुनिया में घट रही घटनाएँ हैं. बुश हैं, लादेन हैं, गिरते ट्विन टावर हैं. मेरा यह कहना नहीं है कि यह सब फ़िल्म में होता. मुझे बस यह लगता है कि काश कहानी की तरह फ़िल्म भी कुछ व्यक्तियों को विलेन बनाकर पेश करने की बजाए सिस्टम के ध्वंसावशेष दिखा पाती. सुशांत सिंह और उसके पिता के रोल में अखिलेन्द्र मिश्रा अपनी पुरानी फिल्मी इमेज ढो रहे हैं. यह फ़िल्म को कमज़ोर बनाता है. लेकिन इस सबके बावजूद मैं फ़िल्म से इसलिए खुश हूँ कि वो कहानी का काफ़ी कुछ बचा लेती है. अंत में,

क्या सिनेमा के लिए यह ज़रूरी है कि तमाम अंधेरों के बावजूद भी आख़िर में वह एक उम्मीद की किरण के साथ ख़त्म हो? क्या एक कला माध्यम को सकारात्मक होने के लिए आशावादी होना ज़रूरी है? क्या हर मोहनदास के अंत में एक पत्थर उछाले जाने से ही समाज बदलेगा? क्या एक बंद दरवाज़े के साथ हुआ मोहनदास का अंत ज़्यादा बड़ी शुरुआत नहीं है? फ़िल्म जिन सफ़दरों, मंजुनाथों और सत्येंद्रों को याद करती है शायद उनका नाम ही था जो तमाम दबावों के बावजूद फ़िल्म का अंत नहीं बदला गया. और ब्रेख्त को दोहराती फ़िल्म से हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि वह सिनेमा के भीतर क्रांति की बात करने के बजाए उन अंधेरों की बात करे जो हमारे समय को घेर रहे हैं.

मज़हर कामरान से बार-बार यह पूछा गया कि आख़िर क्यों उनका मोहनदास अपनी लड़ाई लड़ना छोड़ देता है? आख़िर क्यों फ़िल्म इतने निराशाजनक नोट पर ख़त्म हो जाती है? क्या उन्हें फ़िल्म की माँग को समझते हुए उदय प्रकाश की कहानी का अंत बदल देने का ख्याल नहीं आया? बहुत से दर्शक जो उदय की कहानी से अनजान थे वो निर्देशक से फ़िल्म के अंत में एक उम्मीद की किरण चाहते थे. एक उछाला जाता पत्थर शायद अंकुर की तरह या एक रोपा जाता पौधा शायद रंग दे बसंती की तरह. पता नहीं उदय प्रकाश इस सब में कहाँ थे? वो होते तो बहुत से दर्शक उनसे भी यही सवाल करते. और मुझे मालूम है कि उनका जवाब क्या होता… मैं यही चाहता था कि आप सब मुझे इस अंत के लिए कोसें. कहें कि यह अंत गलत है. मोहनदास को एक आखिरी पत्थर उछालना चाहिए. अब भी इस सत्ता तंत्र के पार एक सवेरा है जो उसका इंतज़ार करता है. आप सब ये कहें और मेरी कहानी शायद तब पूरी हो. एक-एक मोहनदास आप सबको इस हॉल से बाहर निकलने के बाद मिलेगा. आप उसे यही बात कहें. मेरी कहानी में तो उसने दरवाज़ा बंद कर लिया लेकिन हो सकता है कि आपकी कहानी में ऐसा ना हो. अगर हम एक भी कहानी ऐसी रच पाये जहाँ मोहनदास को उसकी पहचान वापिस मिल जाती है और वो आख़िर में दरवाज़ा बंद नहीं करता तो मेरा कहानी कहना पूरा हुआ. आप इस कहानी पर अविश्वास करें क्योंकि अगर सिनेमा में बंद हुआ दरवाज़ा असल जिंदगी में ऐसा एक भी दरवाज़ा खोल पाये तो मैं उस बंद दरवाज़े के साथ हूँ.

रणवीर शौरी का होना या ना होना.

Finally… इतने इंतज़ार के बाद कल आख़िरकार Osian’s में रणवीर शौरी के दर्शन हो ही गये! उसके बिना Osian’s कुछ अधूरा-अधूरा सा लगता है. पिछली बार वो अपनी नई फ़िल्म मिथ्या के साथ यहाँ था. मिथ्या जो इस साल की सबसे उल्लेखनीय और जटिल फिल्मों में से एक बनकर उभरी है. मिथ्या जो मुझे उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ की याद दिलाती है. मिथ्या जिसे किसी एक श्रेणी में डालना मुश्किल है. रणवीर शौरी हमारे दौर के सबसे बेहतरीन कलाकारों में से एक है. इतना अपना लगता है कि उसके लिए ‘उनके’ लिखने का मन नहीं होता. मैं उसे हमारी पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र मानता आया हूँ. जैसे मेले में खोया हुआ बच्चा. Lost Child. क्या कहें, अपना भूत भूल चुकी मेरी पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र. कल सिरीफोर्ट की सीढियों पर बैठा वो फिर से उसी Lost Child जैसा लग रहा था. मीनाक्षी उसे देखकर बोली, “देखो मिहिर वो जो लड़का वहाँ सीढियों पर बैठा है वो तो…” और मैंने कहा, “हाँ रणवीर शौरी है.” और फ़िर हम दोनों ने एकसाथ कहा… Finally.

यहाँ मैं रणवीर का एक मिनी साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहा हूँ. साभार Osian’s.

Q. क्या आपको ऐसा महसूस होता है कि Osian’s एक ख़ास तरह के सिनेमा को बढ़ावा देकर और फ़िल्म समारोहों से कुछ अलहदा भूमिका निभा रहा है?
रणवीर. Osian’s हमारे मुल्क़ में होने वाला सबसे जीवंत समारोह है. यहाँ दिखाई जाने वाली फिल्में और आने वाले दर्शकों का समूह मिलकर इसे एक बेहतर माहौल देते हैं.

Q. नई फ़िल्म जो आपको पसंद आई हो?
रणवीर. मुझे Orphanage पसंद आई. वैसे आजकल मुझे ज़्यादा फिल्में देखने का समय नहीं मिल पाता है.

Q. पुरानी हिन्दी फिल्मों में आपकी पसंद क्या है?
रणवीर. मैंने अपने कॉलेज के दिनों में ही गुरु दत्त, राज कपूर और अशोक कुमार को खोज लिया था.

Q. मिथ्या में आपके किरदार को दुनिया भर में वाहवाही मिली है. इस रोल के लिए आपकी तैयारी के बारे में कुछ बतायें.
रणवीर. मुझे रजत के साथ काम करने में मज़ा आता है. मेरे लिए यह एक ख़ास मौका होता है. उनके लिए काम सबसे पहले है. पैसा और वक्त उसके बाद आते हैं. मिथ्या की योजना रजत के पास पिछले दस सालों से थी. मैंने यह कहानी उस वक्त पढ़ी थी जब मैं मिक्स डबल्स की शूटिंग कर रहा था. क्योंकि यह इतने लंबे समय तक चलने वाली फ़िल्म थी इसलिए रजत इसे और ज़्यादा गहराई दे पाये. मिथ्या का किरदार एक डबल रोल नहीं था बल्कि यह तो एक ट्रिपल रोल था. एक बार किरदार की याददाश्त जाने के बाद किरदार का तीसरा हिस्सा शुरू हो जाता है. इसीलिए मुझे हर किरदार को अलग पहचान देनी ज़रूरी थी. एकबार याददाश्त जाने के बाद नया किरदार दो हिस्सों में विभाजित हो जाता है. एक है उसका दिमाग और दूसरा उसका शरीर जो दो अलग-अलग व्यक्तियों की स्मृतियाँ ढो रहे हैं.

Q. आपने My Blueberry Nights देखी. कैसी लगी?
रणवीर. मुझे यह पसंद आई. विंटेज वोंग कार वाई का जादू है. लेकिन उन्हें हॉलीवुड के अभिनेताओं के साथ काम करते देखना मज़ेदार था.

हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं!

सीरीफोर्ट में एशियाई और अरब फिल्मों का एक बार फ़िर जमावड़ा. दसवें ओसियन सिनेफैन फ़िल्म फेस्टिवल की शुरुआत. पहले दिन ही कुछ महत्त्वपूर्ण सबक मिले जो आपके काम आ सकते हैं.

अपनी सीट पर बैठते वक़्त सावधान रहें. और कोशिश करें कि फेस्टिवल में अगले दो-तीन दिन कोई नया कपड़ा पहनकर ना जाएँ. मेरे जैसे नया कुरता तो बिल्कुल नहीं. वजह? सीरीफोर्ट सभागार की सभी सीटों के हत्थों पर किया गया नया काला रंग अभी भी ताज़ा है. आपके हाथ रखते ही वो अपना असर दिखा देगा. शायद फ़िल्म फेस्टिवल के लिए सीरीफोर्ट के रंग रोगन का काम कुछ देर से शुरू हुआ हो. वैसे भी आजकल दिल्ली सरकार को आनेवाले राष्ट्रमंडल खेलों के अलावा और कुछ कहाँ दिखता है! इस काले रंग से बचने के उपाय कुछ ऐसे हो सकते हैं.. कागज़ का उपयोग करें. बैठने से पहले हत्थों पर ये कागज़ बिछा लें. आज इस कागज़ के रूप में बाहर बुकिंग काउंटर पर मिलने वाले डेली न्यूज़ बुलेटिन का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया गया.

इसबार एक प्रतिभागी को एक ही टिकट लेने की इजाज़त है. याने अपने डेलिगेट पास को दिखाकर आप हर शो का सिर्फ़ एक ही टिकट ले सकते हैं. शायद ऐसा टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग रोकने के लिहाज से किया गया हो. तो अगर आप एक साथ सभी दोस्तों के लिए फ़िल्म के टिकट लेने की योजना बनाकर सीरीफोर्ट जा रहे हैं तो  दोस्तों को कहिये कि उन्हें ख़ुद ही आना होगा. हाँ ये हो सकता है कि आप जितने टिकट चाहियें उतने ही डेलिगेट पास खरीद लें क्योंकि डेलिगेट पास बनवाने के लिए हस्ताक्षर की ज़रूरत नहीं है.

पिछली बार से उलट मोबाइल और बैग हॉल में ले जाना मान्य है. वैसे हो सकता है आने वाले दिनों में इसमें कुछ परिवर्तन आ जाए. खाने की चीज़ें हमेशा की तरह बहुत महँगी हैं. चाय भी 10रु. की मिल रही है. टिकट की दर भी 20 से बढ़ाकर 30 कर दी गई है. डेलिगेट फीस 50 है. फ़िर भी बड़े सिनेमाघरों से तो फेस्टिवल में फ़िल्म देखना कहीं सस्ता है.

11 तारीख़ को समारोह का विधिवत उदघाटन प्रस्तावित है. हाँग-काँग की फ़िल्म ‘स्पैरो’ से समारोह का आगाज़ होगा. अगले दिनों में आप यहाँ उदय प्रकाश की कहानी पर बनी फ़िल्म ‘मोहनदास’, मृणाल सेन की ‘खंडहर’, समीरा मक्मल्बफ़ की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ब्लैकबोर्ड’, मार्टिन स्कोर्सेसी की पुरानी क्लासिक ‘टैक्सी ड्राईवर’, मणि कौल की बिज्जी की कहानी पर निर्मित ‘दुविधा’ और फेलिनी की ‘एट एंड अ हाफ’ जैसी फिल्में देख सकते हैं. यह समारोह आपको गोविन्द निहलाणी, पॉल श्रेडर, अब्बास टायरवाला, चेतन भगत और कुणाल बासु जैसे लेखकों और फिल्मकारों से मुलाकात का मौका भी दे रहा है. समारोह में इन सभी हस्तियों के साथ बातचीत के सत्र प्रस्तावित हैं. समारोह 20 जुलाई तक चलेगा.

मिथ्या: खोई हुई पहचान की तलाश में

मैं जान जाता कि यह एक सपना है. लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से बच नहीं सकता. मृत्यु नहीं -तिरिछ द्वारा अपनी हत्या से- और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह मैं जाग जाऊं. मैं पूरी ताक़त लगाता, सपने के भीतर आँखें फाड़ता, रौशनी को देखने की कोशिश करता और ज़ोर से कुछ बोलता. कई बार बिलकुल ऐन मौके पर मैं जागने में सफल भी हो जाता.

माँ बतलाती कि मुझे सपने में बोलने और चीखने की आदत है. कई बार उन्होंने मुझे नींद में रोते हुए भी देखा था. ऐसे में उन्हें मुझे जगा डालना चाहिए, लेकिन वे मेरे माथे को सहला कर मुझे रजाई से ढक देती थीं और मैं उसी खौफ़नाक दुनिया में अकेला छोड़ दिया जाता था. अपनी मृत्यु -बल्कि अपनी हत्या से बचने की कमज़ोर कोशिश में भागता, दौड़ता, चीखता.”

उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ का अंश.


दुनिया का सबसे बड़ा डर क्या है?
…सपने आपके भीतर के डर और इच्छाओं को जानने का सबसे बेहतर ज़रिया हैं. मुझे सबसे डरावना सपना वह लगता है जहाँ मैं अकेला रह जाता हूँ. मेरे दोस्त
, मेरा परिवार, मेरी दुनिया मुझसे बिछुड़ जाते हैं. मैं अनजान भीड़ के बीच होता हूँ या अपनी जानी-पहचानी जगहों पर अकेला होता हूँ. मुझे पहचानने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में अक्सर मैं जागने की कोशिश करता हूँ. लेकिन कभी-कभी सपने के भीतर अचानक ऐसा लगता है कि यह सपना नहीं हकीक़त है और वह अहसास खौफ़नाक होता है. हाँ, दुनिया का सबसे बड़ा डर अकेलेपन का डर होता है. अपनी पहचान के खो जाने का डर होता है. अपनी दुनिया से बिछुड़ने का डर होता है.
इस नज़रिये से देखने पर
मिथ्या का दूसरा हिस्सा एक डरावना अनुभव है. वी.के. (रणवीर) बारबार इसे सपना समझकर जागने की कोशिश करता है. लेकिन वह सपना नहीं है. उसे समझ नहीं आता कि क्या सपना है और क्या सच? वह चिल्लाता हैतुमने कहा था कि कुछ नहीं बदलेगा.” और आख़िर में वह अपनी एकमात्र याद रही पहचान से भी ठुकराया जा चुका है. वी.के. एक ऐसा शख्स है जिसका सबसे डरावना सपना सच हो गया है.
दोस्तों को नायक की मौत पर कहानी का अंत एक त्रासद अंत लग सकता है लेकिन मैं इससे असहमत हूँ. वी.के. का अंत दरअसल उसके सपने का भी अंत है. उसकी ‘जागने’ की निरंतर कोशिश एक बंदूक की गोली उसके भेजे में जाने के साथ ही सफल हो जाती है. गोली लगने के साथ ही उसका खौफ़नाक सपना टूट जाता है और उसे एक फ्लैश में सब याद आ जाता है. उसकी आखिरी पुकार
सोनल में एक चैन, एक संतुष्टि, एक सुकून सुनाई देता है. यह त्रासद अंत नहीं. वी.के. एक कमाल का दोहराव रचते हुए एक परफैक्ट मौतमरता है जो फ़िल्म के पहले दृश्य से उसकी तमन्ना थी. मौत उसे अपनी खोई हुई पहचान, खोई हुई जिंदगी से जोड़ देती है.
मैं यह कहने में हिचकूंगा नहीं कि फ़िल्म पर रजत कपूर से ज्यादा सौरभ शुक्ला की छाप नज़र आती है. यह मिक्स डबल्स जैसी नहीं है और भेजा फ्राई जैसी तो बिलकुल नहीं है. हाँ रघु रोमियो के कुछ अंश यहाँ-वहां दिख जाते हैं. मरीन ड्राइव (नेकलेस) के फुटपाथ पर बैठे अथाह/अनंत समंदर की तरफ़ देखते और दारु पीते वी.के. की छवि सत्या के भीखू की याद दिलाती है. जैसा मदनगोपाल सिंह कहते हैं यह उत्तर भारत के छोटे शहरों से वाया दिल्ली (
NSD) होते मुम्बई आए लड़कों की पौध का दक्षिण भारत के उन्नत तकनीशियन निर्देशकों से लेखक के तौर पर मिलन से उपजा सिनेमा है. मिथ्या मुझे अनेक पूर्ववर्ती फिल्मों की याद दिलाती रही जिनमें से कुछ की चर्चा मैं यहाँ करना चाहूँगा.

सत्या– फ़िल्म पर RGV स्कूल की छाप साफ नज़र आती है. इसका सीधा कारण फ़िल्म से लेखक के रूप में सौरभ शुक्ला का जुड़ा होना है. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. विनय पाठक ने ओशियंस सिने फेस्ट में मिथ्या के प्रीमियर में कहा भी था कि डॉन लोग कोई चाँद से नहीं आए हैं. वे भी हमारे-आपके जैसे इंसान हैं. यह दृष्टि सौरभ शुक्ला, अनुराग कश्यप, जयदीप सहनी जैसे लेखकों की बदौलत आई थी और आज फैक्टरीकी बुरी हालत के पीछे इन लेखकों का अलगाव एक बड़ा कारण माना जा रहा है. मिथ्या में यह दृष्टि इंस्पेक्टर श्याम (ब्रिजेन्द्र काला) के किरदार में बखूबी उभरकर आई है. एक बेहतरीन अदाकार जिसके काम की पूरी तारीफ ज़रूरी है बिना किसी हकलाहट के!

डिपार्टेड– मार्टिन स्कोर्सेसी की यह थ्रिलर दो परस्पर विरोधी योजनाओं के उलझाव से निकली कहानी है. मुझे वी.के. की दुविधा में लिओनार्दो की दुविधा का अक्स दिख रहा था. lost identities की कहानी के रूप में और अपनी खोई पहचान वापस पाने की लड़ाई के तौर पर यह दोनों फिल्में साथ रखी जा सकती हैं. कुछ और नाम भी याद आ रहे हैं नेट और बरमूडा ट्राएंगल जैसे. कभी विस्तृत चर्चा में बात करेंगे.

दिल पे मत ले यार– यह मिथ्या की नेगेटिव है. इसमें सपना खौफनाक नहीं है, सपने के टूटने के बाद की असल तस्वीर खौफनाक है. हिन्दी सिनेमा का सबसे त्रासद अंत. मिथ्या का अंत मौत के बावजूद सुकून देता है. दिल पे मत ले यार का अंत कड़वाहट से भर देता है. असल जिंदगी अपनी तमाम ऐयाशियों के साथ किसी भी खौफनाक सपने से ज़्यादा भयावह है. मिथ्या के अंत में नायक की मौत सुकून देने वाली है. सुकून इस बात का कि आखिरकार वह अपने भयावह सपने की कैद से आजाद हो गया है. इसके विपरीत दिल पे मत ले यार के अंत में दुबई में बैठे अरबपति डान रामसरन और गायतोंडे सफलता के नहीं, मौत के प्रतीक हैं. मासूमियत की मौत, भरोसे की मौत, इंसानियत की मौत. मुम्बई शहर को आधार बनाती दो बेहतरीन फिल्में जो उत्तर भारत से आए दो युवकों के भोले सपनों और महत्वाकांक्षाओं की किरचें बिखरने की कथा को मायानगरी के वृहत लैंडस्कैप में चित्रित करती है. मुम्बई शहर पर चर्चित और प्रशंसित फिल्में कम नहीं लेकिन यह दोनों अपेक्षाकृत रूप से कम चर्चित फिल्में 90 के बाद बदलते महानगर और उसके जायज़- नाजायज़ हिस्सों पर तीखा कटाक्ष हैं. इन्हें उल्लेखनीय हस्तक्षेप के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए.

अंत में रणवीर शौरी. मेरी पसंद. उसमें मेरे जैसा कुछहै. मिथ्या में पहले आप उसके लिए डरते हैं, फ़िर उसके साथ डरते हैं और अंत में उसकी जगह आप होते हैं और आपका ही डर आपके सामने खड़ा होता है. यह साधारणीकरण ही रणवीर के काम की सबसे बड़ी बात है. कुछ दृश्यों में उसका काम आपपर हॉंटिंग इफेक्ट छोड़ जाता है. जब भानू (हर्ष छाया) उसे अपने भाई का कातिल समझ कर मार रहा है वहां उसकी पुकार “भानू, मैं तेरा भाई हूँ.” एक ना मिटने वाला निशान छोड़ जाती है. एक ही फ़िल्म में हास्य और त्रासदी के दो चरम को साधकर उसने काफी कुछ साबित कर दिया है.

मिथ्या देखा जाना चाहती है. उसकी यह चाहत पूरी करें.