चपलताएं और ईमानदारियाँ : द व्हाइट बलून

The-White-Balloonयह एक छोटी बच्ची की नज़र से देखी गई दुनिया है. ईरानियन निर्देशक ज़फ़र पनाही की ’द व्हाइट बलून’ हमें अच्छाई में यकीन करना सिखाती है. ईरान से आयी इन फ़िल्मों में कोई ’विलेन’ नहीं होता. बस औसत जीवन की उलझनें होती हैं और उनसे निकली विडम्बनाएं. किसी मितकथा सी खुलती इस कहानी की नायिका एक सात साल की बच्ची है जिसका नाम है रज़िया. कहानी कहे जाने का दिन भी ख़ास है. ईरान में नया साल बस आने ही वाला है. रज़िया अपनी माँ के साथ बाज़ार आई है और यहीं उसका दिल दूर शीशे के पार तैरती एक सुनहरी मछली पर आ जाता है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि माँ को कैसे मनाया जाए? बाज़ार से घर तक वह रूठने-मनाने की सारी जुगत लगाती है, लेकिन माँ तो फिर माँ हैं. बड़ा भाई अली आता है और बहन की उदासी उससे देखी नहीं जाती. इस बीच वहीं-कहीं कुढ़ते-खीजते पिता भी हैं जो परदे पर कभी दिखते तो नहीं हैं लेकिन उनकी सत्ता घर के माहौल में घुली नज़र आती है.

खैर. माँ आखिर माँ हैं, मान जाती हैं. पैसा रज़िया के हाथ में थमाया जाता है और साथ हिदायतों की पोटली भी. और रज़िया फुदकती हुई दौड़ जाती है अपनी प्यारी मछली को अपना बनाने. लेकिन कमबख़्त रास्ते में एक भरा-पूरा ’बाज़ार’ पसरा है. भरमाता है, असल काम भुलाता है. बड़ों की दुनिया को रज़िया हैरत से देखती है. रुकती है, उलझ जाती है, फिर आगे बढ़ती है. समझ जाती है कि बड़ों की दुनिया में आपके पास ’पैसा होना’ सबसे ख़ास है. रज़िया अपनी प्यारी मछली तक पहुँचने की इस नाटकीय और कई दिलचस्प किरदारों से मिलकर बनती यात्रा में पैसा खोती भी है, पाती भी है. अंत तक आते हुए वह आप और हमें भी उसकी भोली उलझनों का साथी बना लेती है.

अब्बास किरोस्तामी के सहायक रहे ज़फ़र पनाही के कैमरा फ्रेम उनसे ज़्यादा चपल हैं. यह उनकी पहली ही फ़ीचर फ़िल्म है. यह ईरान की गलियाँ और चौक-चौबारे साथ कुछ यूँ दिखाते हैं जैसे उन्हें भी किरदारों सा महत्व देते हों. ’द व्हाइट बलून’ असल समय की रफ़्तार से चलती है. दो घंटे से भी कम के इस पूरे घटनाचक्र में लगातार आप नए साल के आने की आहट सुन सकते हैं. इस कारीगरी को और पुख़्ता करते हुए पनाही पहले ही दृश्य में फ़िल्म के तमाम मुख्य किरदारों की एक झलक दिखाते हैं. यहाँ सभी उन काम-धंधों की शुरुआत कर रहे हैं जिन्हें साथ लेकर वे आगे रज़िया की उलझनों से टकराएगें और अपनी बनते उसकी मदद भी करेंगे. फ़िल्म के माध्यम से हम ईरानी जीवन का एक औसत दिन बहुत नज़दीक से देख पाते हैं. रोज़ाना चलते कार्य-व्यापार, लेन-देन, बाज़ार की बहसबाज़ियाँ. एक पूरा दिन अपनी तमाम साधारणताओं के साथ, अपनी तमाम विलक्षणताओं के साथ.

**********

फ़िल्म का यह छोटा सा परिचय हाल ही में संपन्न हुए ’गोरखपुर फ़िल्म उत्सव’ की स्मारिका के लिए लिखा गया था.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

पहुँचना ’127 आर्स’ तक बारास्ते ’आमिर’ के

127 hoursयह तुलना जैसे चांद और सूरज की जोड़ी बनाने जैसी है. एक दूसरे का विलोम होते हुए भी जहाँ से हम उन्हें देखते हैं, वे एक-दूसरे के पूरक नज़र आते हैं. दूसरा पहले से जितना दूर है उतना ही बड़ा भी है. पहला जब दूसरे के सामने आ जाता है तो हम दूसरे को आँखें खोल-खोल देखते हैं. जैसे चंदा मामा सूरज का ताला खोलने वाली चाबी हों. मेरे लिए डैनी बॉयल की ’127 आर्स’ की चाबी हमारे ही घर के चंदा ’आमिर’ में छिपी है. जैसे हंसल मेहता की ’दिल पे मत के यार’ रजत कपूर की ’मिथ्या’ के लिए नेगेटिव थी, ठीक वैसे ही ’127 हार्स’ की नेगेटिव राजकुमार वर्मा की ’आमिर’ है. यह एक ही कथा संरचना को दो भिन्न वातावरण में परखने जैसा है.

इन कहानियों का मूल विचार एक है. एक आम आदमी जिसकी साधारण सी ज़िन्दगी का एक सादा दिन अचानक ख़ास में बदल जाता है. परिस्थितियाँ उन्हें नीचा दिखाती हैं, जैसे कोई और अदृश्य शक्ति उनकी किस्मत लिख रही हो. लेकिन वहीं किसी निर्णायक क्षण में वे अपने भीतर के ’असाधारण’ को पहचानते हैं, बाज़ी पलट देते हैं. दूर से वीभत्स दिखती यह कहानियाँ दरअसल प्रेरक कथाएं है. इनके बीच अंतर बस इतना है कि जहाँ आमिर भीड़ में होते भी सदा अकेला है वहीं एरॉन अकेला होकर भी हमेशा अपनों के बीच है. आमिर को आप भीड़ भरे शहर के बीचोंबीच बदहवास भागता देखते हैं. अनगिनत अनजान घूरते चेहरों का सामना करता हुआ. शहर की इस भीड़ के बीच वो नितांत अकेला है. इसके विपरीत एरॉन ऐसे बीहड़ में जा फंसा है जहाँ रोज़ सुबह आती एक झपट्टामार चील के अलावा जीवन के चिह्न विरल हैं. लेकिन एरॉन को अपनों का साथ और उसकी कीमत पहचानने के लिए शायद ऐसे ही किसी बीहड़ की ज़रूरत थी. एक चट्टान का टुकड़ा जो सदियों से उसका इंतज़ार करता था आज उसकी ज़िन्दगी की कहानी लिखना चाहता है. लेकिन एरॉन वहाँ भी अकेला नहीं है, उसके साथ उसकी सारी दुनिया है. वो तय करता है कि अपनी कहानी वो खुद ही लिखेगा. यह संयोग नहीं है कि तकरीबन सारी फ़िल्म एक किरदार और एक लोकेशन से बंधी होने के बावजूद फ़िल्म की शुरुआत बड़े जनसमूहों से बनते कोलाज से होती है. एरॉन उस बीहड़ खाई में अकेला नहीं है. उसके साथ उसकी पूरी दुनिया है.

डैनी ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के साथ हिन्दुस्तान आए थे. और अब नई फ़िल्म के साथ सबकुछ नहीं बदला है. सबसे ख़ास चीज़ जो इन दोनों फ़िल्मों को जोड़ती है वो दो हिन्दुस्तानी लड़के हैं जिन्हें साज़ों की सच्ची सोहबत की नेमत हासिल है. अमित त्रिवेदी का संगीत ’आमिर’ को एक बिलकुल नया स्वर प्रदान करता है वहीं रहमान ’127 हार्स’ को उसका सही रूप-रंग देते हैं. इन दोनों जादूगरों की एक इकसार खासियत है. यह दोनों यहाँ पूरी तरह निर्देशक के संगीतकार हो जाते हैं और कथा के उन खाली छूटे हिस्सों को अपने संगीत से भरते हैं जिन्हें शब्दों या दृश्यों में कह पाना मुमकिन नहीं. अमित त्रिवेदी अपने संगीत से इस स्याह फ़िल्म में थोड़ा फक्कड़पना मिलाते हैं, जैसे कबीर की कबिराई के रंग भरते हैं. और रहमान का संगीत कथा का ’अन्य’ रचता है. अकेला पात्र बातें कम करता है, गुनगुनाता ज़्यादा है. जैसा निर्देशक की चाह रही होगी, उनके संगीत में घटनाएं होती हैं, निराशाएं आती हैं, दिल टूटता है, इरादा फिर से जुड़कर खड़ा होता है. जैसा रॉजर इबर्ट लिखते हैं, “जो दर्शकों के लिए सबसे दहलाने वाला क्षण है वो दरअसल उन्हें दिखाई नहीं देता, सुनाई देता है.”

**********

साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Simran Singh की रचना.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

यह परिवार तो जाना-पहचाना है

kids are all rightयह गलती कई बार होती है. पुरुषसत्तात्मकता को कोसते हुए हम कई बार सीधे परिवार के मुखिया पुरुष को कोसने लगते हैं. जैसे उसके बदलते ही सब ठीक हो जाना है. लेकिन गलत उसका पुरुष होना नहीं, गलत वह विचार है जिसे उसका व्यक्तित्व अपने साथ ढोता है. लीसा चोलोडेंको की फ़िल्म परिवार की संरचना वही रखते हुए उसमें मुखिया पुरुष को एक महिला किरदार से बदल देती है. और इसके नतीज़े जानना बड़ा मज़ेदार है. ’द किड्स आर ऑल राइट’ ऐसे लेस्बियन जोड़े की कहानी है जो बारास्ते डोनर स्पर्म अपना परिवार बनाता है. दोनों माँओं के लिए स्पर्म डोनर एक ही अनजान व्यक्ति है. यही अनजान व्यक्ति (बच्चों का जैविक पिता) बच्चों के बुलावे पर एक दिन उनकी ज़िन्दगियों में आता है और परिवार के मान्य ढांचे में असंतुलन पैदा करता है.

सबसे ख़ास यहाँ उस परिवार को देखना है जहाँ बालिग पुरुष के न होते भी परिवार की वही सत्ता संरचना बनी रहती है. एक महिला परिवार के ढांचे से अनुपस्थित उस पुरुष की भूमिका अपने ऊपर ओढ़ लेती है. निक की भूमिका में एनेट्टे बेनिंग साल का सबसे दमदार रोल निभाती हैं और तिरछी नज़र से हम उन्हें उसी सत्ता संरचना को दूसरे छोर से निभाते देखते हैं जिसमें स्त्री हमेशा दोयम दर्जे की भूमिका में ढकेल दी जाती है. वही सत्ता संरचना जो एक पुरुष और स्त्री से मिलकर बनते परिवार में दिखाई देती है इन स्त्रियों के बीच भी मौजूद है. वही असुरक्षाएं, वही अधिकारभाव, वही अकेलापन. दूर से अपरिचित नज़र आता यह परिवार हमारा पड़ौसी है. ’द किड्स आर ऑल राइट’ हमें इस बात का और तीखा अहसास करवाती है कि बराबरी वाला समाज बनाने के लिए ज़रूरी है कि परिवार के भीतर की सत्ता संरचना को तोड़ा जाए. इसके हुए बिना बस किरदार बदल जायेंगे, कहानी वही रहनी है.

**********

साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Laz Marquez की रचना.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

देवदास का वर्ज़न 2.0

the social networkउमर अभी पच्चीस हुई ही है और अपनी संगत में ठीक-ठाक स्मार्ट गिना जाता हूँ. मैं ’द सोशल नेटवर्क’ देखते हुए अपने को कुछ पुराना महसूस करता हूँ. मेरा छोटा भाई, जिसमें और मुझमें उमर के दो साल और शायद उतनी ही पीढ़ियों का फ़ासला है, जब भी पलटकर मुझसे कुछ पूछता है (हालाँकि पूरी फ़िल्म के दौरान ऐसा बहुत-बहुत कम बार होता है) मुझे बहुत अच्छा लगता है. मेरे साथ कुछ कम उमर के दिखते लड़कों की टोली है जो मेरे भाई के साथ आए हैं. ये तक़रीबन सारे सॉफ़्टवेयर के खिलाड़ी हैं. ज़्यादातर ऐसे जो अपनी क्रियेटिविटी बचाने के लिए सॉफ़्टवेयर उद्योग के कुछ बड़े ब्रैंड छोड़ आए हैं. फ़िल्म कई जगह इतनी तेज़ है (उसे स्मार्ट कहा जाता है आजकल, मैं सच में पुराना हो चला हूँ) कि संवाद मेरे हाथ से निकल जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे इन दोस्तों की आपसी बातें कई बार मेरे हाथ से निकल जाती हैं.

’द सोशल नेटवर्क’ इस साल के MAMI (मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह) की ओपनिंग फ़िल्म थी. वो फ़िल्म जिसे देखने के लिए ऐसी मार मची थी कि उद्घाटन के अगले दिन रिपीट शो में पूरे पैंतालीस मिनट पहले पहुँचकर भी हम फ़िल्म की हवा तक न ले पाए. फ़िनॉमिना बन चुकी सोशल नेटवर्किंग साइट ’फ़ेसबुक’ और उसके जन्मदाता हार्वर्ड स्नातक मार्क जुकरबर्ग की कहानी पर आधारित निर्देशक डेविड फ़िंचर की इस फ़िल्म को आलोचक/समीक्षक रिलीज़ से पहले ही ऑस्कर की बड़ी दावेदार घोषित कर चुके थे. कसी हुई पटकथा और दमदार एडिटिंग के बूते ’द सोशल नेटवर्क’ साल की सबसे उल्लेखनीय अमरीकन फ़िल्म बनकर उभरी है.

हम आश्चर्य करते हैं कि क्यों अनुराग कश्यप तमाम अन्य समकालीन कहानियों को छोड़कर फिर से ’देवदास’ उठाते हैं बनाने के लिए. लेकिन जब दुनिया की सबसे समकालीन फ़िल्म मानी जाती ’दि सोशल नेटवर्क’ देखते हुए मैं हिन्दुस्तानी देवदास के चिह्न पाता हूँ तो बहुत सी बातें समझ आती हैं. शायद सुनकर थोड़ा अजीब लगे लेकिन अगर आज देवदास हो तो बहुत संभव है कि वो ’दि सोशल नेटवर्क’ के मार्क जुकरबर्ग जैसा कोई किरदार हो. हमारी आधुनिक सभ्यता द्वारा तैयार किया वो आत्मकेन्द्रित पुरुष जो साथी लड़की में कभी एक दोस्त नहीं देख पाता. चाहे वो अनुराग की ’देव डी’ हो या फ़िंचर की ’दि सोशल नेटवर्क’, दोनों ही फ़िल्में अंत तक आते आते हमारे आधुनिक देवदास को एक हारे हुए किरदार के तौर पर पेश करती हैं. और दोनों ही फ़िल्में उस उम्मीद के साथ खत्म होती हैं जहाँ देवदास की ये दोनों आधुनिक व्याख्याएं अपनी गलतियाँ पहचान रही हैं. एक नई और बराबरी वाली व्यवस्था पर आधारित शुरुआत करने को तैयार हैं.

फ़िल्म ख़त्म हो चुकी है. मुझे पूरी फ़िल्म समझ नहीं आई, बल्कि यूँ कहना ठीक होगा कि मुझे फ़िल्म में हुई बहुत सी बातें और उनके बताए गए कारण हज़म ही नहीं होते. और बाहर निकलते हुए जब मैं यह बात कहने ही वाला हूँ तभी मेरे भाई का दोस्त X कहता है, “isn’t it sad that we understood everything in this film.” मैं गलत हूँ. बजाए यह कहने के कि मुझे ये फ़िल्म समझ नहीं आई मुझे कहना चाहिए कि मुझे ये पीढ़ी ही समझ नहीं आती. लेकिन यह अच्छा है कि इस पीढ़ी को अपनी आलोचना भाती भी है और समझ भी आती है.

**********

साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित. पोस्टर साभार : Ryan Smallman की रचना.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

मेरी शुभकामनाएं ’ब्लैक स्वॉन’ के साथ हैं, उम्मीदें भी.

एक और सोमवार सुबह का जागना, एक और ऑस्कर की रात का इंतज़ार. उस सितारों भरी रात से पहले उन फ़िल्मों की बातें जिनका नाम उस जगमगाती रात बार-बार आपकी ज़बान पर आना है. पेश हैं इस साल ऑस्कर की सरताज पाँच ख़ास फ़िल्में मेरी नज़र से.

1.   दि किंग्स स्पीच

इस साल ऑस्कर की सबसे तगड़ी दावेदार बन उभरी, टॉम हूपर द्वारा निर्देशित ’दि किंग्स स्पीच’ ब्रिटेन के बाफ़्टा में बड़े पुरस्कार जीत चुकी है. मेरी नज़र में यह साल की सबसे प्रभावशाली ’फ़ीलगुड’ कहानी कहती है. पारंपरिक कथा सांचे में बंधी यह फ़िल्म ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज VI के जीवन पर आधारित है जिन्हें बचपन से हकलाने की आदत थी. यह व्यक्तिगत संघर्ष और जीत की कथा है. फ़िल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह दोस्ती का रिश्ता है जो राजा और उनके स्पीच थैरेपिस्ट (ज्यौफ्री रश) के बीच इलाज के दौरान बनता है. किंग जॉर्ज VI की भूमिका में कॉलिन फ़िर्थ का ’बेस्ट एक्टर’ पुरस्कार जीतना लगभग तय माना जा रहा है.

2.   दि सोशल नेटवर्क

विश्व भर में आलोचकों की पहली पसंद बनी डेविड फ़िंचर की ’दि सोशल नेटवर्क’ हमारे दौर की सबसे समकालीन फ़िल्म है. सोशल नेटवर्किंग साइट ’फेसबुक’ के जन्मदाता मार्क जुकरबर्ग की कहानी पर बनी ’दि सोशल नेटवर्क’ ऑस्कर की रेस में बेस्ट फ़िल्म और बेस्ट डाइरेक्टर के गोल्डन ग्लोब जीत चुकी है. यह युवा दोस्तियों के बारे में है, महत्वाकांक्षाओं के बारे में है, प्रेम के बारे में है, विश्वासघात के बारे में है. यह उस लड़के के बारे में है जो दुनिया का सबसे कम उम्र अरबपति होकर भी अंत में अकेला है. इस फ़िल्म की कमाल की स्क्रिप्ट/ एडिटिंग/ संवादों की मिसाल अभी से दी जाने लगी है.

3.   ब्लैक स्वॉन

मेरे लिए यह इस साल ऑस्कर में आई सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी फ़िल्म है. निर्देशक डैरेन अरोनोफ़्सकी ज़िन्दगी के अंधेरे कोनों के चितेरे हैं. यह कलाकार के अंदरूनी संघर्ष की कथा है. उस ’आत्महंता आस्था’ की कथा जिसके चलते कला की अदम्य ऊंचाई को चाहता कलाकार अपने जीवन को स्वयं भस्म करता जाता है. यह कहानी नृत्य नाटिका ’स्वॉन लेक’ में मुख्य भूमिका पाने वाली ’नीना सायर्स’ की है जिसे नाटक के अच्छे और बुरे दोनों किरदार ’व्हाईट स्वॉन’ और ’ब्लैक स्वॉन’ साथ निभाने हैं. बैले डांसर ’नीना सायर्स’ की मुख्य भूमिका में नटाली पोर्टमैन विस्मयकारी हैं और उनमें मुक्तिबोध की कविताओं सा अँधेरा है, अकेलापन है, ऊँचाई है. इस साल ’बेस्ट एक्ट्रेस’ का पुरस्कार वह अपने नाम लिखाकर लाई हैं.

4.   इंसेप्शन

वह निर्देशक जिसके हर नए काम का दुनिया साँसे रोके इंतज़ार करती है. लेकिन क्रिस्टोफ़र नोलान का एकेडेमी से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. इस साल भी ज़्यादा बड़ी खबर एक बार फिर उनका ’बेस्ट डाइरेक्टर’ की लिस्ट से बाहर किया जाना रहा. ’इंसेप्शन’ इस साल की सबसे बहसतलब फ़िल्मों में से एक रही है. इसमें सपनों की कई परते हैं और उनके भीतर सच्चाई पहचान पाना लगातार मुश्किल हुआ जाता है. लेकिन अंतत: ’इंसेप्शन’ का मूलभाव एक अपराधबोध और उससे निरंतर जलता कथानायक (लियोनार्डो डि कैप्रियो) है. खेल-खेल में दुनिया पलट देने की बाज़ीगरी है और फिर भी कुछ न बदल पाने की कसमसाहट है जो जाती नहीं.

5.   दि फ़ाइटर

इस फ़िल्म को सिर्फ़ क्रिश्चियन बेल की अदाकारी के लिए देखा जाना चाहिए. सर्वश्रेष सहायक अभिनेता का गोल्डन ग्लोब जीत चुके बेल यहाँ अपनी पुरानी सुपरहीरो इमेज को धोते हुए एक हारे हुए इंसान का किरदार जीवंत बनाते हैं. कथा दो मुक्केबाज़ भाइयों की है. बड़ा भाई जिसका जीवन ड्रग्स और अपराध में उलझकर रह गया है. और छोटा भाई जिसके सामने अभी मौका है कुछ बनने का, कुछ कर दिखाने का. लेकिन बड़ा भाई के बिना छोटा भाई अधूरा है. डिस्फ़ंक्शनल फ़ैमिली ड्रामा होते हुए भी यहाँ रिश्तों की गर्माहट अभी बाकी है.

**********

रविवार 26 फ़रवरी के नव भारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

फिर एक ’जाने भी दो यारों’ की तलाश में

“नेहरूवियन सपना तब बुझ चुका था और राजनैतिक नेताओं की जमात राक्षसों में बदल चुकी थी. हर आदमी भ्रष्ट था और हमारा शहर अब उन्हीं भ्रष्ट राजनेताओं और अफ़सरानों के कब्ज़े में था. भू-माफ़ियाओं के साथ मिलकर उन्होंने पूरी व्यवस्था को एक कूड़ेदान में बदल दिया था. और इन्हीं सब के बीच दो फ़ोटोग्राफ़र दोस्त अपनी ज़िन्दगी के लिए संघर्ष कर रहे थे. लेकिन इस भ्रष्ट दुनिया में न तो उन्हें प्यार मिला और न ही अपनी नैतिकता बचाने की जगह ही मिली. कुंदन शाह की दुनिया में ’प्यासा’ का शायर और नाचनेवाली, और खुद उनके दो युवा फोटोग्राफ़र, सभी गर्त में हैं. सभी की किस्मत में अंधे कुएं में ढकेला जाना लिखा है और हम इस त्रासदी को देख हंसते हैं.” – सुधीर मिश्रा. ’नो पोट्स इन दि रिपब्लिक’. आउटलुक, 21 मई 2007.

jai arjun singh1ब्लॉग-जगत में सिनेमाई बहसबाज़ियों में शामिल रहे दोस्तों के लिए जय अर्जुन सिंह का नाम नया नहीं है. उनका ब्लॉग ‘Jabberwock’ बड़ी तेज़ी से आर्काइवल महत्व की चीज़ होता जा रहा है. उनके लेखन में नयापन है, उनके संदर्भ हमारी पीढ़ी की साझा स्मृतियों से आते हैं और सिनेमा पर होती किसी भी बात में यह संदर्भ सदा शामिल रहते हैं. कुंदन शाह की फ़िल्म ’जाने भी दो यारों’ पर हाल में आई उनकी किताब भी सिनेमा अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. किताब अपने साथ फ़िल्म से जुड़े अनगिन अनजाने किस्से लाती है. ऐसे किस्से जिन्हें इस फ़िल्म के कई घनघोर प्रंशसक भी कम ही जानते हैं. यहाँ एक चूहे की लाश के लिए भर गर्मी में दौड़ा दिए गए जवान पवन मल्होत्रा हैं तो भरी बंदूक से पेड़ पर लटके आमों का शिकार करते ’डिस्को किलर’ अनुपम खेर. यहाँ ऐसे तमाम किस्से हैं जिन्हें फ़िल्म का ’फ़ाइनल कट’ देखने भर से नहीं जाना जा सकता. लेकिन साथ ही किताब उस मूल सोच पर गहराई से रौशनी डालती है जिससे ’जाने भी दो यारों’ जैसी फ़िल्म पैदा हुई. उस निर्देशक के बारे में जिसके लिए आज भी मार्क्सवाद एक प्रासंगिक विचार है.

किताब के अंत में लेखक जय अर्जुन सिंह एक जायज़ सवाल पूछते हैं, कि हमारे पिछले पच्चीस साला सिनेमा में कोई ’जाने भी दो यारों’ दुबारा क्यों नहीं हुई? एक बड़े फ़लक पर यह सवाल हमसे यह भी पूछता है कि फ़ूहड़ हास्य से भरे जा रहे हमारे हिन्दी सिनेमा में स्तरीय राजनैतिक व्यंग्य और व्यवस्था पर कटाक्ष करती फ़िल्मों के लिए जगह क्यों नहीं बन पाई? बड़ी तलाश के बाद एक पंकज आडवानी मिलते हैं जिनकी फ़िल्मों में उस दमकते हुए पागलपन की झलक मिलती है और कई सालों बाद दास्तान कहने वालों की टोली एक ’पीपली लाइव’ लेकर आती है. लेकिन इनके बीच लम्बा अकाल पसरा है. ’राडिया-टेप’ दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद आज हमारा वर्तमान जिन बहस-मुबाहिसों में घिरा है, ’जाने भी दो यारों’ सबसे प्रासंगिक फ़िल्म लगती है. यही हमारा वर्तमान है, जिसे परदे पर देख हम लोट-पोट हो रहे हैं, ठहाके लगा रहे हैं.

मैं अपने दोस्त वरुण ग्रोवर के सामने यही सवाल रखता हूँ. वरुण पेशेवर व्यंग्य लेखक हैं और टेलिविज़न पर रणवीर शौरी, विनय पाठक, शेखर सुमन जैसे कलाकारों के लिए स्टैंड-अप कॉमेडी लिख चुके हैं. वरुण का साफ़ कहना है कि स्तरीय राजनैतिक व्यंग्य के लिए ज़रूरी है कि वह ’एंटी-एस्टेब्लिशमेंट’ हो. और हिन्दी सिनेमा के लिए ’एंटी-एस्टेब्लिशमेंट’ होना कभी भी चाहा गया रास्ता नहीं रहा. वरुण इस सिद्धांत को अन्य मीडिया माध्यमों पर भी लागू करते हैं और उनका मानना है कि हमारे टेलिविज़न पर भी खासकर राजनैतिक और व्यवस्थागत मसलों पर व्यंग्य लिखते हुए ज़्यादा आगे जाने की गुंजाइश नहीं मिलती. इंटरनेट पर अपनी बात कहने की फिर भी थोड़ी आज़ादी है और इसीलिए हम अपने दौर का कुछ सबसे स्तरीय व्यंग्य ट्विटर और फ़ेसबुक पर ’फ़ेकिंग न्यूज़’, ’जी खंबा’ और ’जय हिंद’ जैसी साइट्स और ट्विटर हैंडल के माध्यम से पाते हैं. इस संदर्भ में जय अर्जुन भी कुंदन शाह का वो पुराना साक्षात्कार उद्धृत करते हैं जहाँ उन्होंने कहा था कि मैं ईमानदारी में विश्वास रखता हूँ. मेरे किरदार भ्रष्ट होने का विकल्प चुनने के बजाए मर जाना पसन्द करेंगे. जय अर्जुन कहीं न कहीं खुद कुंदन में भी यही प्रवृत्ति देखते हैं और इस ईमानदारी के साथ, गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले सिनेमा जगत में कुंदन फिर कभी वो नहीं बना पाते जो उन्होंने चाहा होगा.

एक और वजह है जो मैं दूसरी ’जाने भी दो यारों’ न होने के पीछे देख पाता हूँ. और यह बात सिर्फ़ सिनेमा तक सीमित नहीं, एक बड़े कैनवास पर यह व्यंग्य की पूरी विधा के सामने खड़े संकट की बात है. एक ख़ास दौर में आकर हमारी रोज़मर्रा की हक़ीकत का चेहरा ही इतना विकृत हो जाता है कि व्यंग्य के लिए कुछ नया कहने की गुंजाइश ही नहीं बचती. हमारा वर्तमान ऐसा ही एक दौर है. साथी व्यंग्यकारों ने पिछले कुछ सालों में यह बार-बार अनुभव किया है कि उनका व्यंग्य में लिखा हुआ कटाक्ष उनके ही सामने सच्चाई बन मुँह बाए खड़ा है. आज ’जाने भी दो यारों’ जैसी व्यंग्य फ़िल्म संभव नहीं, क्योंकि यह आज की नंगी सच्चाई है.

लेकिन क्या यह पूरा सच है कि हिन्दी सिनेमा में ’जाने भी दो यारों’ जैसी फ़िल्म का कोई वारिस नहीं हुआ? अगर मैं इस सवाल को थोड़ा बदल दूँ, जानना चाहूँ कि ’जाने भी दो यारों’ में आया शहर क्या हिन्दी सिनेमा में लौटकर आता है? कहीं दुबारा दिखाई देता है? तो क्या तब भी जवाब नकारात्मक ही होगा? ’जाने भी दो यारों’ को ’डार्क कॉमेडी’ कहा गया. सच है कि उसके बाद ’कॉमेडी’ किसी और ही दिशा में गई, लेकिन जो बदरंग स्याह इस फ़िल्म ने हमारे सिनेमाई शहर के चेहरे पर रंगा है उसका असर दूर तक और गहरे दिखाई देता है. फ़िल्म के असिस्टेंट डाइरेक्टर रहे सुधीर मिश्रा जय अर्जुन से आपसी बातचीत में इस ओर इशारा करते हैं. खुद उनकी फ़िल्मों को ही लीजिए. ’ये वो मंज़िल तो नहीं’, ’इस रात की सुबह नहीं’, ’हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’, ’चमेली’ जैसी फ़िल्में. भले इन फ़िल्मों का चेहरा-मोहरा ’जाने भी दो यारों’ से न मिलता हो, इनका स्वाद तो वही है.

पिछले साल सिनेमा में बदलती शहर की संरचना को पढ़ते हुए मेरी नज़र दो फ़िल्मों पर बार-बार ठहरती है. ’जाने भी दो यारों’ से कुछ ही साल की दूरी पर, यह अस्सी के उत्तरार्ध में आई दो सबसे आईकॉनिक फ़िल्में हैं — ’परिंदा’ और ’तेज़ाब’. रंजनी मजूमदार और मदन गोपाल सिंह जैसे आलोचकों ने इन्हें अपने अध्ययनों में रेखांकित किया है. ’तेज़ाब’ में आया शहर साक्षात खलनायक है और उसने नायक महेश देशमुख को उचक्के ’मुन्ना’ में बदल तड़ीपार कर दिया है. ’परिंदा’ में भी शहर एक नकारात्मक विचार है. दोनों ही फ़िल्मों में शहर का असल किरदार रात में उभरता है. यह ’रात का शहर’ है जिसमें अवैध सत्ता ही असल सत्ता है. उसके तमाम कुरूप खेलों के आगे ईमानदारी आत्महत्या सरीखी है. यह मासूमियत की मौत है.

JBDYक्या यह शहर वही नहीं? यह संयोग नहीं कि ’जाने भी दो यारों’ का ज़्यादातर महत्वपूर्ण घटनाक्रम रात में घटता है. चाहे वह डिमैलो के बंगले पर अवैध सौदेबाज़ी हो चाहे आधी रात ’अंतोनियोनी पार्क’ में लाश की तलाश. चाहे वह पुल के नीचे कथानायकों पर चला हवलदार का डंडा हो चाहे लाश के साथ आहूजा की लम्बी बातचीत. यह अवैध सत्ता के वैध सत्ता हो जाने का शहर है, यह ’रात का शहर’ है. और सबसे महत्वपूर्ण, ’जाने भी दो यारों’ के उस अविस्मरणीय दृश्य को हम कैसे भूल सकते हैं जहाँ मरीन ड्राइव की किसी निर्माणाधीन बहुमंज़िला इमारत की सबसे ऊपरी मंज़िल पर खड़े कमिश्नर डिमैलो, और उनसे बांद्रा के कब्रिस्तान पर बनने वाली ऊँची इमारत की सौदेबाज़ी करते तरनेजा और उसके गुर्गे सामने से आती डूबते सूरज की रौशनी में स्याह परछाइयों में बदल जाते हैं. जैसे उनके ’काले कारनामों’ को फ़िल्म एक और चाक्षुक अर्थ दे रही हो. मज़ेदार बात जय अर्जुन अपनी किताब में बताते हैं कि उस दृश्य में किरदारों का स्याह परछाइयों की तरह दिखाया जाना पहले से तय नहीं था, यह फ़िल्मांकन के वक़्त रौशनी कम होने के चलते कुंदन द्वारा मज़बूरन किया गया एक प्रयोग था. लेकिन यह संयोग से बना दृश्य वनराज भाटिया के बैकग्राउंड स्कोर से मिलकर जैसे फ़िल्म का प्रतिनिधि दृश्य बन जाता है. जब रंजनी मजूमदार ’परिंदा’ में आए शहर के बारे में लिखती हैं,

“यहाँ सभी छवियाँ अंधेरों से निकलती हैं और परछाइयाँ किरदारों के रूप गढ़ती हैं. शायद ही आप कहीं रंगों का चटख़ इस्तेमाल देखें. यहाँ रात को लेकर एक अजीब सा आकर्षण है. जैसा सार्त्र ने आधुनिक जीवन के बारे में कहा है की यह ऐसे रास्ते, दरवाज़े और सीढ़ियाँ हैं जो कहीं नहीं पहुंचतीं. ऐसे विशाल चिह्न जिनका कोई अर्थ नहीं. परिंदा का शहर अंधेरा, भीड़ भरा और निर्मम है.”

तो मुझे रह-रहकर ’जाने भी दो यारों’ का वो अद्भुत संयोग से बना, स्याह परछाइयों के जाम से जाम टकराने वाला दृश्य याद आता है.

जब दिबाकर के गढ़े ’लक्की सिंह’ को हमारा नागर समाज अपने भीतर से बार-बार बेइज़्ज़्त कर बेदखल करता है, मुझे ’जाने भी दो यारों’ का बेमुरव्वत शहर याद आता है. जब अनुराग के रचे आधुनिक महाकाव्य ’ब्लैक फ्राइडे’ में उम्मीद की आखिरी किरण भी हाथ से छूटती दिखाई देती है, मुझे ’जाने भी दो यारों’ का बहरूपिया शहर याद आता है. ’शिवा’, ’सत्या’ और ’कम्पनी’, मुझे राम गोपाल वर्मा की शुरुआती फ़िल्मों की तपिश में ’जाने भी दो यारों’ का रात में जागता शहर याद आता है. जहाँ से मैंने शुरुआत की वो सुधीर मिश्रा के उस लेख का अंतिम अंश है जिसे उन्होंने हिन्दुतान में बने राजनैतिक सिनेमा पर बात करते हुए लिखा था. और यह संयोग नहीं है कि जिस लेख का अंत ’जाने भी दो यारों’ के ज़िक्र से होता है उसकी शुरुआत गुरुदत्त की ’प्यासा’ से होती है. ’प्यासा’ जिससे हिन्दी सिनेमा में आए ’एंटी-एस्टेब्लिशमेंट’ के विचार से ज़ुड़ी किसी भी बहस की शुरुआत होती है. यह दरअसल एक ही समाज है, एक ही ’राष्ट्र-राज्य’ जो अपना रंग बदलता रहा है. कभी वो ’लोक कल्याणकारी राज्य’ का चोला ओढ़े था और कभी वो खुलेआम बाज़ार का ताबेदार है. एक ऐसा नागर समाज जिसमें से हर वो ’अन्य’ बहिष्कृत है जो मान्य व्यवस्था की खिलाफ़त करता है. चाहे वे ’प्यासा’ का शायर और नाचनेवाली हो, चाहे ’जाने भी दो यारों’ के ईमानदार फ़ोटोग्राफ़र.

आपके और हमारे दौर में वो नाम बिनायक सेन का है.

**********

‘कथादेश’ के फ़रवरी अंक में प्रकाशित हुआ.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

हिन्दी सिनेमा में प्रेम की अजीब दास्तान

madhubala

हिन्दी सिनेमा के पुराने पन्ने पलटते हुए कई बार मुझे ताज्जुब होता है कि क्या यही वो कहानियाँ थीं जिनके बलबूते हमारे इश्क़ पीढ़ियों परवान चढ़े? हिन्दी सिनेमा अपवादों को छोड़कर खासा यथास्थितिवादी रहा है और ऐसे में प्रेम जैसे स्वभाव से यथास्थितिवाद विरोधी मनोभाव का इसके मूल दर्शन के रूप में barsaat-ki-raat1स्थापित होना अजब ही विरोधाभास है. लेकिन यह भी कहना होगा कि हमारे बंद घरों के लड़के-लड़कियाँ इन अपवादों को देखकर नहीं भागे, उनके लिए तो मुख्यधारा सिनेमा ने ही हमेशा वो काम पूरा किया. सुनहरे दौर की फ़िल्म ’बरसात की रात’ में आई कव्वाली ’ये इश्क़-इश्क़ है’ के चरम पर नायक भारत भूषण आकर माइक सम्भाल लेते हैं और मोहम्मद रफ़ी की मदभरी आवाज़ में गाते हैं,

“जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सजके.
जान-अजान का ज्ञान भुलाके, लोक-लाज को तजके.
बन-बन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला.
दर्शन-जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला.”

और नायिका मधुबाला उन्हें रेडियो पर सुन नंगे पांव भागती हुई आती हैं. ऐसे ही कुछ जादुई सिनेमाई क्षण हर पीढ़ी के पास रहे हैं जिन्हें उसने अपने प्रेम में संदर्भ सूत्र की तरह इस्तेमाल किया है.

मुद्दा यह है कि और तमाम बातों में आगे बढ़-चढ़कर आज़ाद ख़्यालों से नाता जोड़ता हमारा मिडिल क्लास आज भी शादी-ब्याह में जाति के बंधनों को आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं दिखता. और यही प्रवृत्ति वर्तमान युवा प्रेम के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है. ऐसे में मुख्यधारा सिनेमा का यह खेल देखना बड़ा मज़ेदार है जिसमें बार-बार प्रेम कहानियां विषय के केन्द्र में हैं लेकिन जाति के संदर्भ सिरे से गायब हैं. हमारे दौर की अमर मान ली गई सिनेमाई प्रेम कहानी ’दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ का ही किस्सा लें. फ़िल्म की मुख्य अड़चन यही है कि नायक-नायिका के संबंध नायिका के पिता को स्वीकार नहीं. लेकिन इस फ़िल्म में कहीं कोई यह मानने को राज़ी नहीं दिखता कि इसकी एक वजह जाति भी हो सकती है जो दरअसल हमारे देश में तमाम प्रेम विवाहों के रास्ते में आती सबसे मूल अड़चन है.

तो फिर इन सिनेमाई प्रेम-कहानियों को किस तरह व्याख्यायित किया जाए. मुझे माणिक मुल्ला याद आते हैं और उनकी दी प्रेम कहानियां लिखने संबंधी मुख्य सीख याद आती है, “कुछ पात्र लो, और एक निष्कर्ष पहले से सोच लो, जैसे… यानी जो भी निष्कर्ष निकालना हो, फिर पात्रों पर इतना अधिकार रखो, इतना शासन रखो कि वे अपने आप प्रेम के चक्र में उलझ जाएँ और अन्त में वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचें जो तुमने पहले से तय कर रखा है.” क्या हिन्दी सिनेमा को समझने की इससे अच्छी और कोई परिभाषा आपको पहले कभी मिली है. हम तय निष्कर्षों और पूर्वनिर्धारित अंत वाले सिनेमा उद्योग हैं. ऐसी फ़िल्में बनाते हैं जिनमें किरदारों को काफ़ी हद तक छूट है मनमानी करने की, लेकिन अंत में उन्हें वापस ’सही राह’ पर आकर नैतिकता की उंगली पकड़नी ही पड़ती है.

लेकिन इस मनमाने खेल में काफ़ी कुछ रह जाता है जिसे पूर्व निर्धारित नहीं किया जाता और खुला छोड़ दिया जाता है. जैसा एम. माधव प्रसाद हिन्दी सिनेमा पर अपने उत्कृष्ठ अध्ययन ’आईडियोलाजी ऑफ़ दि हिन्दी फ़िल्म’ में लिखते हैं, “लोकप्रिय सिनेमा परंपरा और आधुनिकता के मध्य परंपरागत मूल्यों का पक्ष नहीं लेता. इसका एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा निर्धारित सामाजिक बंधनों के मध्य एक उपभोक्ता संस्कृति को खपाना है. इस प्रक्रिया में यह कई बार सामाजिक संरचना को बदलने के उस यूटोपियाई विचार का प्रतिनिधित्व करने लगता है जिसका वादा एक आधुनिक- पूँजीवादी राज्य ने किया था.” और यही वो अंश हैं जिन्हें देख-देखकर कई पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े. शायद यह कहना ज़्यादा ठीक हो कि सुन-सुनकर पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े क्योंकि जब इन ’प्रेम के चक्करों में’ हमारी कहानियों के पात्र उलझ जाते हैं तो यह मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा का अलिखित नियम है कि वे गीत गाते हैं.

हिन्दी सिनेमा में आए प्रेम के हर रूप को साकार करने में गीतों की सबसे अहम भूमिका है. कई बार यह गीत फ़िल्म से बाहर निकल अपना स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण कर लेते हैं. जावेद अख़्तर हिन्दी सिनेमा में प्रेम के प्रमुख स्रोत बने गीतों की इस भूमिका पर अपनी पुस्तक ’टॉकिंग साँग्स’ में कहते हैं,

“मुझे लगता है कि गीत एक तरह की जकड़न से मुक्ति हैं. जब आप गीत गाते हैं तो अपने भीतर किसी दबाए गए भाव, चाहत या विचार को मुक्त करते हैं. गद्य में आप उत्तरदायी होते हैं लेकिन गीत में आप बिना परवाह खुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं. अगर आप पूछें, “कौन जाने ये लोग प्यार क्यों करते हैं?” तो ज़रूर कोई जवाब में पूछेगा, “आप प्यार के इतना खिलाफ़ क्यों हैं?” लेकिन अगर आप यूं एक गाना गाएं, “जाने क्यों लोग प्यार करते हैं?” तो कोई भी आपसे इसका स्पष्टीकरण नहीं माँगेगा. लोग गीत मे अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. मुझे लगता है कि जो जितना ज़्यादा दमित होगा वो उतना ही ज़्यादा गीतों में अपनी अभिव्यक्ति पाएगा.

किसी भी समाज में जितना ज़्यादा दमन होगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत मिलेंगे. यह आश्चर्य नहीं है कि हिन्दुस्तानी समाज में जहाँ औरतों पर दमन ज़्यादा है वहाँ उनके हिस्से गीत भी पुरुषों से ज़्यादा हैं. गरीब के हिस्से अमीर से ज़्यादा गीत है. लोक संगीत आख़िर निर्माण से लेकर संरक्षण तक आम आदमी का ही तो है. अगर गीत सिर्फ़ आनंद और आराम के प्रतीक भर हैं तो फिर इन्हें समृद्ध समाजों में अधिक मात्रा में मिलना चाहिए था लेकिन इनकी बहुतायत मिलती है श्रमिक और वंचित वर्ग के बीच. मुझे लगता है कि गाना एक तरह से आपकी सेक्सुअलिटी का प्रतीक है और अगर यह माना जाए तो समाज में जितना इंसान की सेक्सुअलिटी को दबाया जाएगा, दमित किया जाएगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत और उन्हें गानेवाले मिलेंगे.”

chameli ki shadi1बासु चटर्जी की बनाई अद्भुत व्यंग्य फ़िल्म ’चमेली की शादी’ को ही देखें जो कस्बाऊ प्यार में ’फ़िल्मी गीतों’ के अहम रोल को बड़े मज़ाकिया अंदाज़ में हमारे सामने पेश करती है. यहाँ लड़कपन का अनगढ़ प्यार है. नायिका चमेली के नायक चरणदास से अंधाधुंध प्यार के सच्चे साथी रेडियो पर बजते हिन्दी के फ़िल्मी गीत हैं. नायिका की मां कहती भी हैं कि, “इन फ़िल्मी गानों ने ही इस लड़की का दिमाग़ खराब कर रखा है.” यह फ़िल्म इसलिए भी ख़ास है कि इसमें बड़े साफ़-साफ़ शब्दों में चमेली और चरणदास के प्रेम विवाह में बाधक बनते जाति और समुदाय के संदर्भ आते हैं. फ़िल्म में आए कुछ और संदर्भ भी नोट करने लायक हैं. नायिका स्कूल जाती है और पढ़ी लिखी है और इसके सामने उसके माता-पिता अनपढ़ हैं. वो दीवार पर अपने प्यार का इज़हार भी लिखती है तो नीचे ’दस्तख़त चमेली’ कर देती है. और मां के लिए दीवार पर लिखा प्रेम संदेसा भी ’चील-बिलाव’ सरीख़ा है. माता-पिता की सोच से उसकी सोच अलग होने में यह तथ्य एक महत्वपूर्ण सूत्र की तरह दिखाया गया है.

लेकिन इस तरह की प्रगतिशीलता हिन्दी सिनेमा में कम ही मिलती है. ख़ासतौर पर प्रेम के सामने ऐसी ’तुच्छ बातों’ को हमेशा दरकिनार किया जाता है. ’पड़ोसन’ से लेकर हालिया ’ब्रेक के बाद’ तक, हमारी फ़िल्में अलग रास्तों से होते बार-बार इस निष्कर्ष तक पहुँचती दिखती हैं कि एक प्यार करने वाले लड़के का मिलना ही लड़की के जीवन की असल सफ़लता है. सोचने की बात है कि कहीं हम ’प्रेम’ की आड़ में एक पुरुषपरस्त समाज तो नहीं गढ़ रहे?

असंभाव्य प्रेम कहानियों का कल्पनालोक

“प्यार भी भला कहीं किसी का पूरा होता है,
प्यार का तो पहला ही अक्षर अधूरा होता है.”

इससे इतर एक और मुद्दा है जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए. पिछले दिनों हिन्दी सिनेमा के कुछ अमर प्रेम प्रसंग छांटते हुए इस ओर मेरी निगाह गई. क्या यह देखना रोचक नहीं कि ऐसे किसी भी चयन में बार-बार आपकी उंगली जहाँ ठहरती है वो एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसके पूरा होने में कोई न कोई अड़चन है. प्रेम के साथ जुड़ा यह ’शहीदी भाव’ शायद उसे ज़्यादा गहरा और कालातीत बनाता है. इस गिनती में सबसे आगे हिन्दी सिनेमा का अमर शाहकार याद आता है, ’मुग़ल-ए-आज़म’. सलीम और अनारकली का प्रेम ऐसा ही प्रेम है जिसकी राह में ’क्लास’ का अंतर बहुत बड़ा है. हिन्दुस्तान के होनेवाले शहंशाह को एक कनीज़ से प्यार हो गया है. नायिका शीशमहल में हज़ारों अक़्स के बरक़्स गाती है, “प्यार किया तो डरना क्या” और हिन्दुस्तान के सबसे महान शहंशाह अपने आप को चारों ओर से एक नाचीज़ के प्रतिबिम्ब से घिरा पाते हैं.

हिन्दी सिनेमा की निर्विवाद रूप से सबसे मशहूर फ़िल्म ’शोले’ भी ऐसी ही एक असंभाव्य प्रेम कहानी अपने भीतर समेटे है. जय (अमिताभ) और राधा (जया) की यह मूक प्रेम कहानी समाज की प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध है. इस प्रेम कहानी बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है. लेकिन इस फ़िल्म में भी शुरु से ही यह मान लिया गया है कि इस प्रेम कहानी का तारुण लेकिन सुविधाजनक अंत जय की मौत और राधा के विधवा रह जाने में ही है. इससे अलग कोई भी अंत इस फ़िल्म की लोकप्रियता में कैसा असर पैदा करता यह देखना बहुत ही मज़ेदार अनुभव हो सकता था.

शायद इन्हीं तमाम वजहों से हिन्दी सिनेमा जाति के संदर्भों को सिरे से खारिज करने के बाद भी कहीं उन आकांक्षाओं और विश्वासों का प्रतीक बन जाता है जिसे युवा मन अपनी-अपनी प्रेम कहानियों में रोज़ बुन रहा है. हिन्दी सिनेमा का अंत उसे बार-बार ’पॉलिटिकली करेक्ट’ करने की कोशिशें करता है, लेकिन उसमें विद्रोह और परंपराओं को नकारते स्वर मिल ही जाते हैं.

“अरे क्या प्रेम कहानियों के दो चार अंत होते हैं.”

Love_sex_aur_dhokhaफिर एक दिबाकर बनर्जी आता है और हिन्दी सिनेमा में प्रेम की इस विलक्षण थाति को नए सिरे से परिभाषित करना तय करता है. यही सुविधाजनक अंत की ओर पहुँचती प्रेम कहानियाँ उसने भी देखी हैं. उसके नायक ने भी देखी हैं. ’लव, सेक्स और धोखा’ का कथा नायक राहुल आदित्य चोपड़ा का अंध भक्त है और अपनी डिप्लोमा फ़िल्म के लिए एक ऐसी ही कहानी फ़िल्मा रहा है. उन्हीं सुविधाजनक अंतों की ओर बढ़ते हुए उसकी राह में कुछ ऐसे सवाल हैं जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने कबका पूछना ही छोड़ दिया है. पत्रकार और ब्लॉगर रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग ’कस्बा’ में इस फ़िल्म को ’अ-फ़िल्म’ का नाम दिया है. यह नामकरण सिर्फ़ इस फ़िल्म की नहीं, हिन्दी सिनेमा की पुरानी सारी प्रेम कहानियों की असलियत उघाड़ता है. ’लव. सेक्स और धोखा’ प्रेम के सवाल को वापस उस धरातल पर लेकर आती है जहाँ से हमारे यथार्थ की चारदीवारी शुरु होती है. यह एक बहकी हुई बहस को वापस उसके सही ढर्रे पर लाना है. सही सवालों को फिर से पूछना है. ’राहुल’ और ’श्रुति’ की हत्या अचानक एक फ़्लैशलाइट की तरह आपको यह याद दिलाती है कि हमारे समाज में ’प्रेम’ एक रूमानी ख़्याल भर नहीं, इसके बड़े गहरे सामाजिक निहितार्थ हैं. जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने हमेशा ही ’अनुकूलित’ करने का प्रयास किया है. स्पष्ट है कि ’प्रेम’ के संदर्भ में जाति के सवाल हमेशा केन्द्र में रहे हैं. हमारा सिनेमा शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन छिपाकर उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता.

अनुराग कश्यप की ’देव डी’ के आधुनिक देवदास की समस्या पारो का न मिलना या चंद्रमुखी को न भूल पाना नहीं है. उसकी असल समस्या उसके भीतर बसा आदिम ’पवित्रताबोध’ है जो उसे न पारो का होने देता है न चंदा का. जब चंदा देव को कहती है, “यू ओनली लव योरसेल्फ़. यू कांट लव एनीवन, एक्सेप्ट दिस.” तो यह हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत का प्रस्थान बिन्दु है. ऐसा बिन्दु जहाँ हमारा नायक प्रेम के लिहाफ़ में छिपाकर अपना अहम तुष्ट नहीं कर रहा. उसकी असलियत सामने है. और कम से कम हमारी नायिका उस असलियत से परिचित है.

हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत ’लक बाए चांस’ से होती है जहाँ एक नायिका ’राह भूले’ नायक की घर वापसी से बने सुविधाजनक अंत पर फ़िल्म को ख़त्म नहीं होने देती. हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत ’अस्तित्व’ जैसी फ़िल्म से होती है जहाँ फ़िल्म के अंत में एक सुगढ़ गृहणी अपनी पहचान तलाशने ’घर’ की चारदीवारी को छोड़ बाहर निकलती है. अगर हमें और हमारे सिनेमा को वर्तमान पीढ़ी के ’प्रेम’ के सच्चे अर्थ समझने हैं तो उसे पहले रिश्तों की बराबरी का महत्व समझना होगा. मेरे दौर की कुछ सबसे खूबसूरत प्रेम काहनियाँ बनाने वाले निर्देशक इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की तरह उसे याद रखना होगा कि जितना हक़ एक लड़के को है गलतियाँ करने का और भूल जाने का, उतना ही हक़ एक लड़की को भी होना चाहिए. उसे भी जी भर के ’कन्फ़्यूज़’ होना चाहिए और फ़िल्म द्वारा अंत में उसके किरदार की इस रूहानी सी लगती ख़ासियत को ’अनुकूलित’ नहीं किया जाना चाहिए.

*********

भास्कर समूह की पत्रिका ‘अहा! ज़िन्दगी’ के फ़रवरी ’प्रेम विशेषांक’ अंक में प्रकाशित.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

अभिनेता के अवसान का साल

पिछला साल खत्म हुआ था ’थ्री ईडियट्स’ के साथ, जिसे इस साल भी लगातार हिन्दी सिनेमा की सबसे ’कमाऊ पूत’ के रूप में याद किया जाता रहा. इस साल आई ’दबंग’ से लेकर ’राजनीति’ तक हर बड़ी हिट की तुलना ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के आंकड़ों से की जाती रही. मेरे लिए साल 2010 के सिनेमा पर बात करते हुए इनमें से कोई फ़िल्म संदर्भ बिंदु नहीं है. होनी भी नहीं चाहिए. आमिर ख़ान के ज़िक्र से शुरुआत इसलिए क्योंकि इन्हीं आमिर ख़ान ने साल 2010 में ’पीपली लाइव’ जैसी फ़िल्म का होना संभव बनाया. इसलिए भी कि इस फ़िल्म के प्रमोशन से जुड़ा एक किस्सा ही हमारी इस चर्चा का शुरुआती संदर्भ बिंदु है. सिनेमाघरों और टीवी पर आए ’पीपली लाइव’ के एक शुरुआती प्रोमो में एक टीवी पत्रकार कुमार दीपक को गांव पीपली से लाइव रिपोर्ट करते दिखाया गया है. दिखाया गया है कि आमिर के असर से अब गांव पीपली में उसके ही नाम के चिप्स और बिस्किट बिक रहे हैं. मज़ेदार बात तब होती है जब ’कट’ होने के बाद भी कैमरा चालू रहता है और हम पत्रकार कुमार दीपक को कहते हुए सुनते हैं कि आमिर ख़ान पगला गया है और पागलपन में कुछ भी बना रहा है. कुमार दीपक का कहना है कि ’लगान’ जैसी फ़िल्में बार-बार नहीं बनतीं और आमिर ख़ान ’पीपली लाइव’ बनाने के चक्कर में मुँह के बल गिरेगा.

चाहे यह आमिर का उसके पिछले प्रयोगों के प्रति कुछ कठोर रहे मुख्यधारा मीडिया पर पलटवार हो, इसमें अनजाने ही हिन्दी सिनेमा की मान्य संरचना दरकती दिखाई देती है. फ़िल्म का एक किरदार अपनी ही फ़िल्म के निर्माता के असल फ़िल्मी जीवन पर कमेंट पास करता है. जैसे कथा कहने की पारंपरिक संरचना में छेद करता है. जैसे किरदार के लिए निर्धारित दायरे को तोड़ता है. न जाने तारीफ़ में कहते थे कि उसके काम की खोट दिखाने के लिए, लेकिन हमारे दौर के महानायक शाहरुख़ के लिए उसके सुनहरे वर्षों में बार-बार यह दोहराया जाता रहा कि वह भूमिका चाहे होई भी निभाएं, लगते हर भूमिका में ’शाहरुख़ ख़ान’ ही हैं. चोपड़ाओं और उन जैसे कई और सिनेमाई घरानों की मार्फ़त बरसों से हम सुनते आए हैं कि हिन्दुस्तानी सिनेमा दर्शक के लिए उसके सपनों का संसार रचता है और इसी तर्क की आड़ लेकर बहुत बार उस सिनेमा का रिश्ता दर्शक की असल ज़िन्दगी से बिलकुल काट दिया जाता है. हिन्दी सिनेमा हमेशा ’साधारणीकरण’ सिद्धांत का कायल रहा है और ब्रेख़्त उसे मौके-बमौके बड़ी मुश्किल से याद आते हैं. उसे यह बिलकुल पसंद नहीं कि फ़िक्शन और नॉन-फ़िक्शन के तय दायरे टूटें और परदे पर चलती कथा में दर्शक की अपनी सच्चाई का ज़रा भी घालमेल हो.

लेकिन यह होता है. बीते साल में विभिन्न स्तर पर इनमें से कई प्रवृत्तियां बदलती दिखाई देती हैं, पलटती दिखाई देती हैं. हमारे शहराती जीवनानुभव की कलई खोलती दिबाकर बनर्जी की क्रम से तीसरी फ़ीचर फ़िल्म ’लव, सेक्स और धोखा’ फ़िक्शन सिनेमा में वृत्तचित्र का सा असर पैदा करती है. सबसे पहले ’डार्लिंग-ऑफ़-दि-क्राउड’ ’खोसला का घोंसला’, फिर विलक्षण ’ओए लक्की, लक्की ओए’ और अब आईने में दिखती कुरूप हक़ीक़त सी ’लव, सेक्स और धोखा’. दोस्तों का कहना है कि विरले बल्लेबाज़ मोहम्मद अज़रुद्दीन की तरह दिबाकर के नाम भी अब पहले तीन मौकों पर तीन शतकों सा विरला कीर्तिमान है. फ़िल्म से पहले आई अपनी एक ब्लॉग पोस्ट में दिबाकर उस दिन का किस्सा सुनाते हैं जब फ़िल्म की निर्माता एकता कपूर फ़िल्म का रफ़ कट पहली बार देख रही थीं. ज्ञात हो कि ये वही एकता कपूर हैं जिनके नाम अपने अतिनाटकीय ’के’ धारावाहिकों की बदौलत हिन्दुस्तानी टेलीविज़न की मलिका होने का ख़िताब दर्ज है. एकता के लिए फ़िल्म की प्रामाणिकता इस हद तक कटु हो जाती है कि नाकाबिलेबर्दाश्त है. एकता चलती फ़िल्म के बीच से उठ जाती हैं, दिबाकर अपने प्रयोग में कामयाब हुए हैं.

udaanइन्हीं एकता कपूर द्वारा निर्मित अतिनाटकीय ’के’ धारावाहिकों से निकले दो कलाकारों को मुख्य भूमिकाओं में लेकर विक्रमादित्य मोटवाने ’उड़ान’ बनाते हैं. साल की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म और मज़ेदार बात है कि इसे लेकर भी कई ’पारिवारिक स्रोतों’ से वैसी ही विपरीत प्रतिक्रियाएं आईं जैसी कुछ महीने पहले ’लव, सेक्स और धोखा’ को लेकर मिली थीं. ’उड़ान’ भी हिन्दुस्तानी समाज के लिए बड़ा असहज करने वाला अनुभव था, क्योंकि वह हमारे समाज की सबसे महत्वपूर्ण ’पवित्र गाय’ में से एक मानी गई संस्था – ’परिवार’, के ध्वंसावशेष अपने भीतर समेटे थी. यह लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रचलित मॉडल जैसी नहीं थी, याने यह एक ’पारिवारिक फ़िल्म’ नहीं थी. उन दो छोटे परदे के अदाकारों के अलावा ’उड़ान’ की मुख्य भूमिकाओं में दो बिलकुल नए चेहरे थे. लेकिन ’उड़ान’ की प्रामाणिकता सिर्फ़ उसकी कास्टिंग में ही नहीं थी. इस कहानी की स्वाभाविकता उसकी जान थी. बार-बार आती कविताओं से रची-बसी यह फ़िल्म दिल और ज़बान पर कड़वाहट भर देने की हद तक सच्ची थी. इतनी सच्ची की उसकी असलियत पर ही शक होने लगे. ’ऐसा ज़ालिम पिता भला कहीं होता है’, अभी-अभी उड़ान देखकर निकले किसी परिवार के मुखिया के मुँह से यह सुनना बड़ा आसान रहा होगा. लेकिन यह कड़वाहट से भरा अस्वीकार इस बात का सबूत है कि ’भैरव सिंह’ ऐसा आईना है जिसे हमारा हिन्दुस्तानी मर्द आज भी आसानी से देखने को तैयार नहीं.

’लव, सेक्स और धोखा’ को सार्वजनिक पटल पर सिर्फ़ अतिवादी प्रतिक्रियाएं ही मिलीं. आलोचकों और दर्शकवर्ग के एक हिस्से के लिए यह साल की सबसे बेहतरीन फ़िल्म थी तो एक बड़ा दर्शकवर्ग इसे सिरे से खारिज कर देना चाहता था. बहुत से दर्शकों की परिभाषा में यह ’फ़िल्म’ होने के आधारभूत नियम ही पूरे नहीं करती. हमारे दर्शकवर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज भी सिनेमा की तय परंपरा में बंधा है और वह सिनेमा को बदलता तो देखना चाहता है लेकिन मौजूदा सिनेमाई चारदीवारी के भीतर ही. और ऐसे में ’लव, सेक्स और धोखा’ की पहली कहानी ’मोहब्बत बॉलीवुड श्टाइल’ आपके सामने है. फ़िल्म का नायक सिनेमा में और उसकी सच्चाई में दिलो-जान से यकीन करता है लेकिन कम्बख़्त सिनेमा के भीतर होते हुए भी उसकी नियति हमारे सिनेमा जैसी नहीं होती. जैसे ब्रेख़्तियन थियेटर में चलते नाटक के बीच अचानक दर्शकों में से उठकर कोई आदमी नाटक के मुख्य नायक को गोली मार देता है, ठीक वैसा ही ’अ-फ़िल्मी’ अंत राहुल और श्रुति की प्रेम-कहानी का होता है.

dibakarदिबाकर के यहाँ प्रामाणिकता और समाज की ’मिरर इमेज’ दिखाने की यह ज़िद ही अभिनेता के अवसान का कारण बनती है. इसका अर्थ यह न समझा जाए कि ’लव, सेक्स और धोखा’ में काम कर रहे कलाकार अभिनेता नहीं हैं. बेशक वे अभिनेता हैं और उनमें से कुछ तो क्या कमाल के अभिनेता हैं. हिन्दी सिनेमा में इनके काम की धमक मैं आनेवाले सालों में बारम्बार सुनने की तमन्ना रखता हूँ. इसे इस अर्थ में समझा जाए कि यहाँ अभिनेता फ़िल्म की कथा को सही और सच्चे अर्थों में आप तक पहुँचाने का माध्यम भर हैं. और शायद सच्चे सिनेमा में एक अभिनेता की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका यही हो सकती है. यहाँ अभिनेता पटकथा के आगे, उस विचार के आगे, जिसे वो अपने कांधे पर रख आगे बढ़ा रहा है, गौण हो जाता है. ’लव, सेक्स और धोखा’ ऐसा अनुभव है जिसे देख लगता है कि जैसे इन कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम करना नहीं चुना, इस फ़िल्म की तीनों कहानियों ने मोहल्ले में निकल अपने नायक-नायिका खुद चुन लिए हैं. बरसों से ’स्टार सिस्टम’ की गुलामी करते आए हिन्दी सिनेमा के लिए यह मौका देखना बड़ा विलक्षण अनुभव है. यह फ़िल्म के मूल विचार – उसकी कहानी, के माध्यम – अभिनेता पर जीत का क्षण है. एक ऐसी कहानी, ऐसा विचार जिसके आगे अभिनेता गौण हो जाता है.

बेला नेगी की फ़िल्म ’दायें या बायें’ भी इसी श्रंखला में आती है जहाँ कथा की प्रामाणिकता न सिर्फ़ असल पहाड़ी कलाकार बढ़ाते हैं बल्कि वही असल उत्तराखंडी परिवेश फ़िल्म की कथा संरचना को पूरा करता चलता है. यह अभिनेता के ह्वास का एक और आयाम है जहाँ अभिनेताओं के साथ जैसे मुख्य कथा का भी ह्वास हो जाता है. बार-बार वह उन हाशिए की कहानियों को सुनाने लगती है जिन्हें हम मुख्य कथा के साथ बंधे-बंधे भूले ही जा रहे थे. फ़िल्म वहाँ से शुरु नहीं होती जहाँ से हम चाहते थे कि वो हो और ठीक वैसे ही फ़िल्म वहाँ ख़त्म नहीं होती जहाँ हमने सोचा था कि वो होगी. समस्या कहाँ है? हम चाहते हैं कि हमारी थाली में मुख्य कथा को कढ़ाई में छौंककर, सजा-धजा कर, मेवा-इलायची डालकर बाकायदा परोसा जाए जबकि फ़िल्म हमें अपनी पसंद का फूल चुनने बगीचे में खुला छोड़ देती है. हम सिनेमा में इस मनमानी के आदी नहीं और चिड़ियाघर के जानवर की तरह तुरन्त अपने पिंजरे में वापस घुस जाना चाहते हैं. अपनी हर भूमिका में ’शाहरुख़ ख़ान’ दिखते महानायक को धता बताते हुए हमारे दौर के सबसे प्रामाणिक अभिनेता दीपक डोबरियाल ’रमेश मजीला’ को साक्षात हमारे सामने जीवित कर देते हैं. एक अभिनेता कहानी की तरफ़ से खड़ा होकर लड़ता है और उसका साथ पाकर फ़िल्म की कथा ’नायकत्व’ के विचार को क्या ख़ूब पटखनी देती है.

और ऐसा ही कुछ ओंकारदास माणिकपुरी और रघुबीर यादव नया थियेटर से आए दर्जन भर दुर्लभ अभिनेताओं के साथ जुगलबंदी कर ’पीपली लाइव’ में कर दिखाते हैं. यहाँ फ़िल्म की निर्देशक अनुषा रिज़वी के साथ आमिर का भी शुक्रिया. शुक्रिया इसलिए कि उन्होंने अनुषा और महमूद को उनके मनमाफ़िक सिनेमा रचने के लिए पूरा स्पेस दिया. शुक्रिया इसलिए कि उन्होंने खुद ’नत्था’ की भूमिका निभाने का लालच नहीं किया. जी हाँ, यह होना संभव था. हिन्दी सिनेमा में ऐसा बिना किसी रोक-टोक होता आया है. अगर आमिर बेखटके ’लगान’ के ’भुवन’ हो सकते हैं और चालीस पार की उमर में एक कॉलेज जाते लड़के की भूमिका निभा सकते हैं तो क्या वे ’पीपली लाइव’ के ’नत्था’ नहीं हो सकते थे? लेकिन हमारी खुशकिस्मती कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और नतीजा यह कि उनकी फ़िल्म साल 2010 में आई ’कथ्य की जीत’ वाली फ़िल्मों की श्रंखला में एक दमकती कड़ी साबित हुई. अद्वितीय रचनात्मकता के धनी ’इंडियन ओशियन’ ने इस फ़िल्म के लिए विलक्षण संगीत रचा और रघुबीर यादव का गाया छत्तीसगढ़ी जनगीत ’महंगाई डायन’ हर नई व्याख्या के साथ फ़िल्म के दायरे से बाहर निकलता गया. हर नई व्याख्या के साथ यह वर्तमान समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर मारक टिप्पणी करता प्रतीत हुआ.

indian oceanऔर इन्हीं ’इंडियन ओशियन’ के ज़िक्र के साथ इस बात का रुख़ ’लीविंग होम’ की तरफ़ मुड़ता है. यह ऐसी संगीतमय डॉक्यूमेंट्री थी जिसने साल 2010 में सिनेमा के कई पूर्वलिखित नियमों को बदला. न केवल यह बाकायदा देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई बल्कि हाल ही में संपन्न हुए भारत के इकतालीसवें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (गोआ) में इसे हिन्दुस्तानी पैनोरमा की उद्घाटन फ़िल्म होने का सम्मान भी दिया गया. जैसे साल भर कथा फ़िल्में प्रामाणिकता की तलाश में नित नए प्रयोग करती रहीं वैसे ही इस वृत्तचित्र के निर्देशक ने कथातत्व की तलाश में अपनी फ़िल्म से स्वयं को सदा अनुपस्थित रखा. निर्देशक जयदीप वर्मा इस प्रयोग को लेकर इतना सचेत थे कि फ़िल्म के चार किरदारों से चलती किसी आपसी बातचीत में आप कहीं उनका सवाली स्वर तक नहीं पकड़ पाते. इसके चलते यह वृत्तचित्र चार मुख्य किरदारों की ऐसी कथा-यात्रा बन जाता है जो अपने समकालीन किसी और फ़िक्शन से ज़्यादा रोचक और उतसुक्ता से भरा है. चार मुख्य किरदार जो यूँ अकेले खड़े हों तो बस इस महादेश की भीड़ का हिस्सा भर हैं, लेकिन जब मिल जाएं तो इस महादेश का सबसे सच्चा और प्रतिनिधि संगीत रचते हैं. नायकों की तलाश में निरंतर भटकते समाज को जयदीप कुछ सच्चे नायक देते हैं, और वो भी उस साल में जिसे हम सिनेमाई महानायक के अवसान का एक और अध्याय गिन रहे हैं.

एक और ख़ासियत है जो इन तमाम फ़िल्मों को एक सूत्र में बांधती है. न केवल यह फ़िल्में कहानी को अभिनेता से ऊपर रखती हैं, बल्कि इनके लिए परिवेश की प्रामाणिकता भी व्यावसायिक लाभ से कहीं आगे की चीज़ है. पिछले दो-ढाई दशक से, ठीक-ठीक जब से यह ’स्विट्ज़रलैंड’ नाम की बीमारी चोपड़ा साहब हिन्दी सिनेमा में लाए हैं, लगता है जैसे हिन्दी सिनेमा ’विदेशी लोकेशनों’ का गुलाम हो गया है. हमारे फ़िल्मकार बिना संदर्भ विदेश भागते दिखते हैं.

Udaan1फिर ऐसे ही दौर में ये फ़िल्में आती हैं. ’उड़ान’ का जमशेदपुर और शिमला किसी मज़बूत किरदार सरीख़ा है. ’पीपली लाइव’ का ’पीपली’ प्रियदर्शन की फ़िल्मों के गांवों की तरह वर्तमान संदर्भों से कटा गांव नहीं है. उसमें ’लालबहाद्दुर’ टाइप मृगतृष्णा सरकारी परियोजनाएं हैं तो ’सोंमेंटो’ टाइप विदेशी बीज बेचकर हिन्दुस्तानी किसान को आत्महत्या के लिए मज़बूर करती बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के संदर्भ भी. ’दायें या बायें’ में आया प्रामाणिक बागेश्वर का पहाड़ी इलाका है जो शहर में रहते हर पहाड़ी को उसके ’रटी हुई सीढ़ियों में बंटे’ गांव की याद दिला जाता है. दिल्ली शहर में रहता मैं रोज़ सुबह अखबार खोलता हूँ और रोज़ अपने शहर को और ज़्यादा ’लव, सेक्स और धोखा’ में मौजूद शहर में बदलता पाता हूँ.

इन फ़िल्मों में आई परिवेश की प्रामाणिकता मुख्यधारा सिनेमा के लिए भी चुनौती है. तभी तो ’दबंग’ जैसी साल की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफ़ल फ़िल्म भी कोशिश करती दिखती है कि इस प्रामाणिकता को किसी हद तक तो बचाया जाए. करण जौहर महानायक को लेकर ’माई नेम इज़ ख़ान’ बनाते हैं जो हैं तो अब भी विदेश में लेकिन फ़िल्म में कम से कम उनके इस ’होने’ के उचित संदर्भ मिलते हैं. एक हबीब फ़ैज़ल आते हैं जो पहले तो अद्भुत प्रामाणिकता से भरी ’दो दुनी चार’ बनाते हैं और फिर अपने ’खांटी दिल्लीवाला’ संवादों से यशराज की ’बैंड, बाजा, बारात’ में असलियत के रंग भरते हैं. बेशक यशराज अब भी वही पंजाबी शादी देख, दिखा रहा है. लेकिन सिनेमा में ये हाशिए की आवाज़ें अब उनका भी जीना मुहाल करने लगी हैं. इन फ़िल्मों की नज़र से देखें तो दिखता है, हमारा सिनेमा अपनी ’सिनेमाई’ छोड़ रहा है, असलियत की संगत पाने के लिए.

**********

‘कथादेश’ के जनवरी अंक में प्रकाशित

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

2010 : पांच किरदार

vidya-balan___

vidya balanA

  • विद्या बालन – इश्किया

जवान होती शीलाओं और बदनाम होती मुन्नियों के समय में हो सकता है कि आप विद्या बालन की ठीक-ठीक जगह न पहचान पाएं. लेकिन बीस-तीस साल बाद जब इतिहास के पन्नों में यह धुंध छंट चुकी होगी, उनका नाम उसी क्रम में होगा जहाँ ऊपर मधुबाला, वहीदा रहमान और नूतन का नाम लिखा है. हिन्दी सिनेमा की वर्तमान नायिका के लिए यह एक असल ’गैर-परंपरागत’ रोल था. और जैसा काम उन्होंने कर दिखाया है, सुंदरता/ मादकता/ यौवन/ आकर्षण के तमाम मापदंड उलट-पलट जाते हैं. इश्किया की ‘कृष्णा’ इंसान के भीतर बसे भगवान और शैतान दोनों को एक साथ जगा देती है.

  • रोनित रॉय – उड़ान

यह आकाशवाणी जयपुर है. अब आप सुनेंगे प्रायोजित कार्यक्रम ’युववाणी’. तक़रीबन पन्द्रह साल हुए उस बात को जब ’जान तेरे नाम’ का वो गाना दादा ने मेरी विशेष फ़रमाइश पर रेडियो पर सुनवाया था. और इसीलिए आज यहाँ ‘भैरव सिंह’ का नाम लिखते हुए मुझे बखूबी मालूम है कि रोनित रॉय के लिए यह कितना लम्बा फ़ासला है. हम जैसे नास्तिकों के लिए शायद यही ’पुनर्जन्म’ है. यह साल का सबसे उल्लेखनीय पुरुष किरदार है, और सबसे ज़्यादा कोसा गया भी.

  • रघुबीर यादव – पीपली लाइव

वजह वही जो दिबाकर की “ओये लक्की लक्की ओये” में ‘लक्की सिंह’ से ज़्यादा ‘बंगाली’ की तरफ़दारी करने की है. आपके पास कोई तय दिशा-निर्देश नहीं होता ऐसा किरदार निभाते वक़्त. यह करतब/कलाबाज़ी है. धार पर चलने बराबर. न आप उतने भोले हैं कि दुनिया के झमेले न समझें, न आप उतने चालाक/ताक़तवर हैं कि उन्हें धता बताते हुए बचकर निकल जाएं. आप ऐसे शिकार हैं जो अपने शिकारी की सूरत तो पहचानता है, लेकिन उससे बचने का कोई रास्ता उसके पास नहीं. और ‘बुधिया’ के किरदार में रघुबीर इस मुश्किल को ऐसे निकाल ले जाते हैं जैसे इसमें और बीड़ी सुलगाने में कोई अंतर ही न हो.

  • daayen-ya-baayenAदीपक डोबरियाल – दायें या बाएं

मक़बूल, ओमकारा, 1971, शौर्य, दिल्ली6, 13B, गुलाल.. दीपक डोबरियाल हमारे दौर के सबसे प्रामाणिक अभिनेता हैं. और ’रमेश मजीला’ की भूमिका निभाते हुए उनकी उलझनों में गज़ब की सच्चाई है. ’नायक’ होने की तमाम मान्य परिभाषाओं को झुठलाते दीपक इस छोटी मगर खूबसूरत फ़िल्म के सबसे बड़े सितारे हैं. सहेजने के किए झोली भर के चमत्कारी क्षण दे जाते हैं.

  • राजकुमार यादव – लव, सेक्स और धोखा

इनमें से चुनाव कठिन है. लेकिन श्रुति, राहुल या रश्मि होने के मुकाबले ’आदर्श’ होना मुझे ज़्यादा मुश्किल लगता है. इस किरदार के लिए रचा गया घटनाचक्र पूरी तरह नकारात्मक था. लेकिन इसे ’नकारात्मक’ नहीं होना था. इस किरदार को निभाना इसलिए मुश्किल था क्योंकि इसे व्यवस्था का ’शिकार’ दिखाना सबसे मुश्किल था. ज़रा सी चूक और ’आदर्श’ हिन्दी सिनेमा का आदर्श विलेन होता और हमारी नज़रों के सामने से वो आईना ओझल हो जाता जो उस किरदार ने हमें दिखाया. राज कुमार यादव साल के इस सबसे मुश्किल इम्तिहान में पूरे खरे उतरते हैं.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

साल सदियों पुराना पक्का घर है

साल,
दिखता नहीं पर पक्का घर है
हवा में झूलता रहता है
तारीखों पर पाँव रख के
घड़ी पे घूमता रहता है

बारह महीने और छह मौसम हैं
आना जाना रहता है
एक ही कुर्सी है घर में
एक उठता है इक बैठता है

जनवरी फ़रवरी बचपन ही से
भाई बहन से लगते हैं
ठण्ड बहुत लगती है उन को
कपड़े गर्म पहनते हैं

जनवरी का कद ऊँचा है कुछ
फरवरी थोड़ी दबती है,
जनवरी बात करे तो मुँह से
धुएँ की रेल निकलती है

मार्च मगर बाहर सोता है
घबराता है बँगले में
दिन भर छींकता रहता है
रातें कटती हैं नज़ले में

लेकिन ये अप्रैल मई तो
बाग में क्या कुछ करते हैं
आम और जामुन, शलजम, गोभी
फल क्या, फूल भी चरते हैं

मख्यियाँ भिन भिन करती हैं और
मच्छर भी बढ़ जाते हैं
जुगनू पूँछ पे बत्ती लेकर
पेड़ों पे चढ़ जाते हैं

जून बड़ा वहमी है लेकिन
गर्ज सुने घबराता है
घर के बीचों बीच खड़ा
सब को आवाज़ लगाता है

रेन-कोट और छतरी ले लो
बादल आया, बारिश होगी
भीगना मत गन्दे पानी में
खुजली होगी, खारिश होगी

दोस्त जुलाई लड़का है पर
लड़कियों जैसा लगता है
गुल मोहर की छतरी लेकर
ठुमक ठुमक कर चलता है

और अगस्त, बड़ा बद-मस्त है
छत पे चढ़ के गाता है
भीगता रहता है बारिश में
झरने खोल नहाता है

पीला अम्बर पहन सितम्बर
पूरा साधू लगता है,
रंग बिरंगे उड़ते पत्ते
पतझड़, जादू लगता है

गुस्से वाला है अक्टूबर
घुन्ना है गुर्राता है
कहता कुछ है, करता कुछ है
पत्ते नोच… गिराता है

और नवम्बर, पंखा लेकर
सर्द हवाएँ छोड़ता है
रूठे मौसम मनवाता है
टूटे पत्ते जोड़ता है

बड़ा बुज़ुर्ग दिसम्बर आखिर
बर्फ़ सफ़ेद – लिबास में आए
सब के तोहफ़े पीठ पे लेकर,
-सांताक्लॉज़- को साथ में लाए

बारह महीनों बाद हमेशा
घर पोशाक बदलता है
नम्बर प्लेट – बदल जाती है
साल नया जब लगता है

-गुलज़ार. साभार  ’चकमक’ से

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook