यहाँ से शहर को देखो : हल्ला

“शहरों को फूको के शब्दों में ‘दौर-ए-हमवक्ती’ (इपॉक ऑफ़ सायमाल्टेनिटी) कहा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग कालखंड एकसाथ विद्यमान होते हैं. शहर, ख़ासतौर पर उत्तर-औपनिवेशिक शहर, अपनी ज़द में विभिन्न गतियों और लयों को समेटे रखता है और इससे विरोध और प्रतिस्पर्धा का निहायत गतिशील माहौल पैदा होता है.”
-आदित्य निगम.

किसी फ़िल्म का अन्तिम दृश्य पूरी फ़िल्म को देखने का एक नया नज़रिया दे सकता है. एक आखिरी इशारा इतना कुछ कह दे कि पूरी फ़िल्म के मायने ही बदल जाएँ. मैं यह जानता तो था लेकिन हल्ला में बहुत दिनों बाद फ़िर ऐसा होता देखा. हल्ला यूँ भी एक बेहतर फ़िल्म है जो आधुनिक ‘शहर’ की यंत्रवत व्यवस्था और विडंबनाओं को light hearted way में उभारती है लेकिन इसका अंत इसे सिर्फ़ वही नहीं रहने देता. हल्ला का अंत बताता है कि जहाँ से आप शहर को देख रहे हैं वो शहर की अकेली तस्वीर नहीं. देखने के और नज़रिए हैं लेकिन इस आधुनिक शहर व्यवस्था में चीज़ें इतनी अलग-थलग हैं कि बहुत बार आप यह समझ भी नहीं पाते कि एक ही परिघटना के अलग-अलग व्यक्तियों के लिए कितने अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं.

हल्ला के निर्देशक जयदीप वर्मा हर्षिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और सई परांजपे की फिल्में देखकर बड़े हुए हैं और हल्ला इसी परम्परा का अगला चरण है. शहर को देखने का ये नज़रिया कथा और चश्मेबत्तूर से आता है और इस रिश्ते से खोसला का घोंसला इसकी बड़ी बहन है. हल्ला में वो मुंबई है जो नायक को रोज़ सुनाई देती है, दिखाई देती है. हल्ला की मुंबई जुहू बीच, चौपाटी या मरीन ड्राइव नहीं है. हल्ला में दिन कार की अगली ड्राइवर सीट पर या ऑफिस में कम्प्यूटर के सामने शेयर बेचते-खरीदते बीत जाता है. फ़िल्म के दो सबसे महत्त्वपूर्ण घटनास्थल जहाँ ज्यादातर कहानी आगे बढ़ रही है वो एक चलती कार की अगली दो सीट और रिहायशी इमारत का पार्किंग लॉट हैं. कार्पोरेट व्यवस्था में निचली पायदान पर खड़ी जिंदगियाँ यही शहर देख रही हैं. बहुत देर तक लगता है कि यह फ़िल्म शोर के बारे में है. लेकिन हल्ला शहर के बारे में है. वो शहर जिससे आपका-मेरा रोज़ सामना होता है. शहर जिसकी कितनी लयें हैं ख़ुद उसे भी नहीं मालूम.

सुकेतु मेहता Maximum city में लिखते हैं, ” यह कमबख्त शहर. समुद्र की एक बड़ी लहर को आकर इन द्वीपों को मिटा देना चाहिए और इसे जल समाधि दे देनी चाहिए. इस शहर पर बम गिराकर इसे ख़त्म कर देना चाहिए. हर सुबह मुझे गुस्सा आता है. यहाँ कुछ भी काम कराने का यही रास्ता है; लोग गुस्सा करने पर ही काम करते हैं, गुस्से से डरते हैं. यदि पैसा और सही लोगों से जान-पहचान ना हो तो गुस्सा ही काम आता है. मैं गुस्से का फायदा समझने लगा हूँ- टेक्सी ड्राइवरों, द्वारपालों, प्लमबरों, सरकारी आदमियों पर गुस्सा होता हूँ. भारत में मेरा सीडी प्लेयर भी गुस्से या शारीरिक हिंसा की बदौलत चलता है. जब प्ले बटन को आराम से दबाने पर भी ये नींद से नहीं जागता, तो एक धौल जमाने से तुंरत बजने लगता है.”

रजत कपूर को इस रोल में देखना एक सुखद आश्चर्य था. रजत ख़ुद को मूलत: एक निर्देशक कहते हैं जो शौकिया अदाकारी भी करता है. अभी तक रजत कपूर ने बहुत से बेहतरीन रोल किए हैं लेकिन यह किरदार उनके भीतर के अदाकार के लिए भी एक चुनौती था. Osian’s में उनकी ‘the prisnor’ देखते हुए भी लगा कि एक लेखक का किरदार उनके लिए चुनौती नहीं. लेकिन जनार्दन का किरदार रजत के लिए एक चुनौती था क्योंकि वो ऐसे बिल्कुल नहीं हैं. यह रोल कुछ-कुछ राहुल बोस के झंकार बीट्स में निभाए ऋषि जैसा है. ऋषि राहुल के लिए एक चुनौती था क्योंकि राहुल जैसे मेच्योर ऐक्टर के लिए एक इम्मेच्यौर रोल प्ले करना ही बड़ी चुनौती है. और हमारे दौर के कुछ बेहतरीन अदाकार अपनी अदाकारी की सुरक्षित पनाहों से निकलकर ऐसी चुनौती का सामना करने को तैयार हैं ये देखकर अच्छा लगता है.

इस फ़िल्म की खूबसूरती यही है कि यह बड़े के पीछे नहीं भागती. हमने ‘नई कहानी’ पढ़ते हुए जाना है कि जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा भी अपने भीतर सारे अर्थ समेटे होता है. जिंदगी की एक छोटी सी ‘क्राइसिस’ किसी बड़े परिवर्तन की ओर ईशारा कर देती है. और कहानी का मूल काम है ईशारा करना.

………………………

*पोस्ट का शीर्षक फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म से लिया गया है.

मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर.

यह कहानी उन लड़कों की है जो ‘शहर’ नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. कुछ है जो हम सबमें एकसा है. मुझमें और विशाल में एकसा है. आज जब मैं लौटकर अपने बचपन को देखता हूँ तो मुझे एक ‘रहस्यमयी-सा’ अहसास होता है. जैसे बाबू देवकीनंदन खत्री की ‘चंद्रकांता’ पढ़नी शुरू कर दी हो. हमारे बचपन और शहर के इस अलगाव का हमारे व्यक्तित्वों पर असर है. बाद में हर दोस्त इस विचार से अपनी तरह से जूझा है. बचपन किसी ‘राबिन्सन क्रूसो’ की तरह टापू पर बिताया गया समय है. और अब हम उस टापू को साथ लेकर अपने-अपने ‘शहरों’ में घूमते हैं. कुछ परिचित से, कुछ बेमतलब.

सुशील ने मुझे ‘चकमक’ के लिए ए. आर. रहमान पर कुछ लिखने को कहा था. और मैं रहमान पर जो लिख पाया वो ये है. यह सुशील की तारीफ ही है कि चकमक में आकर अब मेरी यह अनसुलझी कहानी हजारों बच्चों के पास पहुँचेगी. शुक्रिया सुशील.

ए. आर. रहमान हमारे दौर के आर. डी. बर्मन हैं. जब हिन्दी सिनेमा ने पंचम को खोया तो लगा था कि एक दौर ख़त्म हो गया है. उनकी आखिरी फ़िल्म का गीत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ अपने भीतर उस दौर की तमाम खूबसूरती समेटे था तो एक दूसरे गीत ‘रूठ न जाना’ में वही शरारत थी जो आर. डी. के संगीत की ख़ास पहचान थी. लगा पंचम के संगीत की अठखेलियाँ और शरारत अब लौटकर नहीं आयेंगे. लेकिन तभी दक्षिण भारत से आई एक डब्ड फ़िल्म ‘रोज़ा’ के गीत ‘छोटी सी आशा’ ने हमें चमत्कृत कर दिया. इस गीत में वही बदमाशी और भोलापन एकसाथ मौजूद था जो हम अबतक पंचम के संगीत में सुनते आए थे. ए. आर. रहमान के साथ हमें हमारा खोया हुआ पंचम वापिस मिल गया.

मैं अपने बचपन के दिनों में रहमान के संगीत वाली हर फ़िल्म की ऑडियो कैसेट ज़िद करके ख़रीदा करता था. यह वो समय था जब हमारे घर में नया-नया टेप रिकॉर्डर आया था. हम उसमें अपनी आवाज़ें रिकॉर्ड कर सुनते थे और वो हमें किसी और की आवाज़ें लगती थीं. हम कभी भी अपनी आवाज़ नहीं पहचान पाते थे. और हम उसमें रहमान के गाने सुनते थे. मेरा दोस्त विशाल सांगा बहुत अच्छा डाँस करता था और रहमान की धुनों पर वो एक ख़ास तरह का ब्रेक डाँस करता था जो सिर्फ़ उसे ही आता था. हम दोस्त एक दूसरे के जन्मदिन का बेसब्री से इंतज़ार करते और हर जन्मदिन की पार्टी का सबसे ख़ास आइटम होता विशाल का ब्रेक डाँस. हर बार हम विशाल से कहते कि वो हमें अपना डाँस दिखाए. पहले तो वो आनाकानी करता लेकिन हमारे मनाने पर मान जाता. हम कमरे के सारे खिड़की/दरवाज़े बंद कर लेते. हमें ये बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई और हमें देखे. मैं टेप रिकॉर्डर ऑन करता और कमरे में रहमान का ‘हम्मा-हम्मा’ गूंजने लगता. विशाल अपना ब्रेक डाँस शुरू करता और हम बैठकर उसे निहारते. हमें लगता कि वो एकदम ‘प्रभुदेवा स्टाइल’ में डाँस करता है. हम भी उसके जैसा डाँस करना चाहते थे. कभी-कभी वो हमें भी उस ब्रेक डाँस का कोई ख़ास स्टेप सिखा देता और हम उसे सीखकर एकदम खुश हो जाते. थोड़ी ही देर में हम सारे दोस्त खड़े हो जाते और सब एकसाथ नाचने लगते. विशाल भी कहता कि जब सब एकसाथ डाँस करते हैं तो उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आता है.

विशाल को भी गानों का बहुत शौक था. खासकर रहमान के गानों का. उसके पास एक वाकमैन था जिसे कान में लगाकर वो रात-रात भर गाने सुना करता था. मैं जब भी कोई नई कैसेट लेकर आता तो वो रातभर के लिए उसे मुझसे माँगकर ले जाता था. और रहमान की कैसेट तो छोड़ता ही नहीं. दिन में मैं रहमान के गाने सुनता और रात में विशाल. उसे हिन्दी ठीक से बोलनी नहीं आती थी. वो अटक अटक कर हिन्दी बोलता और बीच बीच में शब्द भूल जाता था. मेरे नए जूते देखकर कहता, “छुटकू तेरे ये तो दूसरों के ये से बहुत अच्छे हैं!” मुझे ‘ये’ सुनकर बहुत मज़ा आता था और मैं अपने घर आकर सबको ये बात बताता. लेकिन वो संगीत में जीनियस था. मेरी और उसकी पसंद कितनी मिलती थी. ‘दिल से’ के एक-एक गीत को वो हजारों बार सुनता था. मुझे कहता था, “पता है छुटकू, ये रहमान की आदत ही ख़राब है. जाने क्या-क्या करता है. अब बताओ, गाने की शूटिंग ट्रेन पर होनी है तो पूरे गाने में ताल की जगह ट्रेन की आवाज़ को ही पिरो दिया. पूरे गाने में ऐसी बीट जैसे कोई लम्बी ट्रेन किसी ऊंचे पुल पर से गुज़र रही हो! कमाल है इसका भी हाँ.” हम दोनों रहमान के दीवाने थे. याद है ना.. मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर. मैं घर पर माँ से कहता. “पता है माँ, मेरे तीनों दोस्त इंजिनियर बनेंगे. गौरव और रोहित तो सादा इंजिनियर बनेंगे और विशाल बनेगा म्युज़िक इंजिनियर!”

अब तो कई साल हुए विशाल से मुलाकर हुए. मैं दिल्ली आगे की पढ़ाई के लिए आ गया हूँ और विशाल ने कर्नाटक में अपनी हेंडलूम फैक्ट्री शुरू कर दी है. लेकिन आज भी जब मैं कहीं रेडियो पर ‘हम्मा-हम्मा’ सुनता हूँ तो मेरे पाँव में थिरकन होने लगती है और उस वक़्त मुझे विशाल की बहुत याद आती है. और इसीलिए रहमान हमारे दौर के आर. डी. हैं. सबका चहेता. सबसे चहेता.

रहमान को मालूम है कि हम आधे से ज़्यादा पानी के बने हैं. पानी की आवाज़ सबसे मधुर आवाज़ होती है. इसीलिए वो बार-बार अपने गीतों में इस आवाज़ को पिरो देते हैं. ‘साथिया’ में उछालते पानी का अंदाज़ हो या ‘लगान’ में गरजते बादलों की आवाज़. ‘ताल’ में बूँद-बूँद टपकते पानी की थिरकन हो या ‘रोजा’ में बहते झरने की कलकल. रहमान की सबसे पसंदीदा धुनें सीधा प्रकृति से निकलकर आती हैं. वो नए वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में माहिर हैं और नए गायकों को मौका देने में सबसे आगे. ‘दिल से’ के लिए उन्होंने Dobro गिटार का उपयोग किया तो ‘मुस्तफा-मुस्तफा’ गीत के लिए Blues गिटार का. अपने गीत ‘टेलीफोन-टेलीफोन’ के लिए उन्होंने अरबी वाद्य Ooud का प्रयोग किया.  चित्रा, हेमा सरदेसाई, मुर्तजा, मधुश्री से लेकर नरेश aiyer और मोहित चौहान तक रहमान ने हमेशा नए और उभरते गायकों को मौका दिया है. उनका संगीत लातिन अमेरिका के संगीत को हिन्दुस्तानी संगीत से और पाश्चात्य संगीत को दक्षिण भारतीय संगीत से जोड़ता है. और उनके बहुत से गीतों पर सूफि़याना प्रभाव साफ़  नज़र आता है. ‘दिल से’ के गीतों में ये सूफि़याना प्रभाव ही था जिसने उसे रहमान का और हमारे दौर का सबसे खूबसूरत अल्बम बनाया है. ये प्रेम की तड़प को उस हद तक ले जाना है कि वो प्रार्थना में उठा हाथ बन जाए. ‘लगान’ में वे लोकसंगीत को अपनी प्रेरणा बनाते हैं और ‘घनन घनन’ तथा ‘मितवा’ में ढोल का खूब उपयोग मिलता है. ‘राधा कैसे न जले’ में लोकजीवन से जुड़ी मितकथाओं का और धुन में बांसुरी का बहुत अच्छा उपयोग है. ‘स्वदेस’ की धुन में स्वागत में बजने वाली धुनों का इस्तेमाल एकदम मौके के माफ़िक है. रहमान के लिए धुनों में नयापन कभी समस्या नहीं रहा. पूरी दुनिया सामने पड़ी है. हर फूल-पत्ती में आवाज़ छुपी है. बस दिल से सुननेवाला चाहिए.

एकलव्य की बाल-विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ के अगस्त 2008 अंक में प्रकाशित.

मोहनदास

विचित्र प्रोसेशन,
गंभीर क्विक मार्च …
कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैंड-दल-
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप,उदर-आकृति
आँतों के जालों-से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत-स्वन-तरंगें
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर.
बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के ! !
बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में ! !
उनके पीछे चल रहा
संगीन-नोकों का चमकता जंगल,
चल रही पदचाप, तालबद्ध दीर्घ पाँत
टैंक-दल, मोर्टार, आर्टिलरी, सन्नद्ध,
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,
सैनिकों के पथराये चेहरे
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे !
शायद, मैंने उन्हें पहले कहीं तो भी देखा था.
शायद, उनमें मेरे कई परिचित ! !
उनके पीछे यह क्या ! !
कैवेलरी ! !
काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रेस,
चेहरे का आधा भाग सिंदूरी गेरुआ
आधा भाग कोलतारी भैरव,
भयानक ! !
हाथों में चमचमाती सीधी खड़ी तलवार
आबदार ! !
कंधे से कमर तक कारतूसी बैल्ट है तिरछा.
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,
रोषभरी एकाग्र दृष्टि में धार है,
कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,
उनके चित्र समाचार-पत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कवितायेँ पढ़ी थीं
भई वाह !
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण
मंत्री भी, उद्योगपति भी और विद्वान्
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमाजी उस्ताद
बनता है बलबन
हाय, हाय ! !
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय.
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छुपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आए हैं,

यह शोभा-यात्रा है किसी मृत्यु-दल की.

गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंश.

मैं सिरीफोर्ट जाते हुए संसद के बाहर से गुज़रता हूँ. आज देखा वहाँ बड़ा जमावड़ा लगा है. चैनल बाहर से लाइव ख़बरें दे रहे हैं.
हिंदुस्तान के प्रजातंत्र की सबसे बड़ी मंडी आजकल सजी है. मोलभाव जारी हैं. खरीद-फ़रोख्त चल रही है. भाव तय हो रहे हैं. रात न्यूज़ देखते हुए उबकाई सी आती है. मुझे संसद भवन को देखकर हरिशंकर परसाई का ‘अकाल उत्सव’ याद आता है,

“अब ये भूखे क्या खाएं? भाग्य विधाताओं और जीवन के थोक ठेकेदारों की नाक खा गए. वे सब भाग गए. अब क्या खाएं? आख़िर वे विधानसभा और संसद की इमारतों के पत्थर और इंटें काट-काटकर खाने लगे.”

मोहनदास को लगता है. जो जितना ऊपर बैठा है लगता है वो उतना ही बड़ा बेईमान है. क्या सब नकली हैं? डुप्लीकेट? सारी व्यवस्था ही ढह गई है. जीता जागता हाड़-मांस का इंसान किसी काम का नहीं. इस दुनिया में कागज़ की लड़ाई लड़ी जाती है. न्याय व्यवस्था की आंखों पर पट्टी बंधी है. उसके हाथ बंधे हैं. मोहनदास के पास पैसा नहीं, पहुँच नहीं. वो मोहनदास नहीं, कोई और अब मोहनदास है. कुछ समझ नहीं आ रहा है. डर सा लगता है. क्या कोई रास्ता है? मुक्तिबोध ने जब अंधेरे में लिखी तब आपातकाल सालों दूर था. लेकिन उन्होनें आनेवाले समय की डरावनी पदचाप सुन ली थी. ब्रह्मराक्षस साक्षात् उनके सामने था. यूँ ही तकरीबन चार साल पुरानी कहानी मोहनदास को आज 17 जुलाई 2008 को पहली बार देखते हुए मुझे ऐसा लगा कि आज ही वो दिन था जो तय किया गया था इस मुलाक़ात के लिए. आज जब पहली बार मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए एक अजीब सी गंध आई. सत्ता की तीखी दुर्गन्ध. गूंजते से शब्द, 20 करोड़, 25 करोड़, 30 करोड़… आज जब मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए पहली बार उबकाई सी आई.

एक ईमानदार पाठक ही नहीं एक ईमानदार दर्शक की हैसियत से भी यह तो कहना होगा कि फ़िल्म कुछ कमज़ोर थी. ईमानदार राय यह है कि कहानी से जो सहूलियतें ली गयीं दरअसल वो ही फ़िल्म को कमज़ोर बनाती हैं. शुरुआत में मीडिया दर्शन के नामपर बहुत सारे स्टीरियोटाइप किरदार गढे गए. एक बड़ी राय यह भी थी कि कलाकारों का चयन ठीक नहीं हुआ है. खासकर कबूतर जैसी अपने परिवेश में इतनी रची बसी फ़िल्म देखने के बाद दर्शकों की यह राय लाज़मी थी. फ़िर भी एक बार मोहनदास की कहानी शुरू होने के बाद फ़िल्म अपना तनाव बनाकर रखती है. साफ़ है कि कहानी की अपनी ताक़त इतनी है कि वो फ़िल्म को अपने पैरों पर खड़ा रखती है. अनिल यादव जैसे किरदार कमाल की कास्टिंग और काम का उदाहरण हैं लेकिन ऐसे उदाहरण फ़िल्म में कुछ एक ही हैं. मोहनदास के रोल के लिए ही मैं अभी हाथों-हाथ 2-3 ज़्यादा अच्छे नाम सुझा सकता हूँ. फ़िल्म कस्बे के चित्रण में जहाँ खरी उतरी है वहीँ उसका गाँव कुछ ‘बनाया-बनाया’ सा लगता है. बोली अभी-अभी सीखी सी. कस्बे के बीच से बार-बार गुज़रती कोयले की गाडियाँ याद रहती हैं, कुछ कहती हैं. फ़िल्म कहानी के मुख्य संकेत नहीं छोड़ती है. बार बार यश मालवीय और वी. के. सोनकिया  की कवितायें बात को आगे बढाती हैं. ब्रेख्त आते हैं. मुक्तिबोध आते हैं. मोहनदास के माँ-बाप पुतलीबाई और काबादास सतगुरु कबीर को याद करते हैं. कबीर जो एक ऐसी भाषा में कविता कहते थे जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है. हो सकता है कि मैं कहानी के प्रति कुछ पक्षपाती हो जाऊं. उदय प्रकाश को सहेजने वालों के साथ ऐसा हो जाता है. लेकिन फ़िल्म के शुरूआती आधे घंटे से मेरे वो दोस्त भी असंतुष्ट थे जिन्होनें कहानी नहीं पढ़ी है. शायद सोनाली कुलकर्णी के साथ थोड़ा कम वक्त और उससे मिली थोड़ी कम लम्बाई ज़्यादा कारगर रहे.

कहानी की बड़ी बात यह थी कि उसमें आप एक विलेन को नहीं पकड़ पाते. अँधेरा है. डर है. पूरी व्यवस्था का पतन है. कहानी के बीच-बीच कोष्ठकों में पूरी दुनिया में घट रही घटनाएँ हैं. बुश हैं, लादेन हैं, गिरते ट्विन टावर हैं. मेरा यह कहना नहीं है कि यह सब फ़िल्म में होता. मुझे बस यह लगता है कि काश कहानी की तरह फ़िल्म भी कुछ व्यक्तियों को विलेन बनाकर पेश करने की बजाए सिस्टम के ध्वंसावशेष दिखा पाती. सुशांत सिंह और उसके पिता के रोल में अखिलेन्द्र मिश्रा अपनी पुरानी फिल्मी इमेज ढो रहे हैं. यह फ़िल्म को कमज़ोर बनाता है. लेकिन इस सबके बावजूद मैं फ़िल्म से इसलिए खुश हूँ कि वो कहानी का काफ़ी कुछ बचा लेती है. अंत में,

क्या सिनेमा के लिए यह ज़रूरी है कि तमाम अंधेरों के बावजूद भी आख़िर में वह एक उम्मीद की किरण के साथ ख़त्म हो? क्या एक कला माध्यम को सकारात्मक होने के लिए आशावादी होना ज़रूरी है? क्या हर मोहनदास के अंत में एक पत्थर उछाले जाने से ही समाज बदलेगा? क्या एक बंद दरवाज़े के साथ हुआ मोहनदास का अंत ज़्यादा बड़ी शुरुआत नहीं है? फ़िल्म जिन सफ़दरों, मंजुनाथों और सत्येंद्रों को याद करती है शायद उनका नाम ही था जो तमाम दबावों के बावजूद फ़िल्म का अंत नहीं बदला गया. और ब्रेख्त को दोहराती फ़िल्म से हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि वह सिनेमा के भीतर क्रांति की बात करने के बजाए उन अंधेरों की बात करे जो हमारे समय को घेर रहे हैं.

मज़हर कामरान से बार-बार यह पूछा गया कि आख़िर क्यों उनका मोहनदास अपनी लड़ाई लड़ना छोड़ देता है? आख़िर क्यों फ़िल्म इतने निराशाजनक नोट पर ख़त्म हो जाती है? क्या उन्हें फ़िल्म की माँग को समझते हुए उदय प्रकाश की कहानी का अंत बदल देने का ख्याल नहीं आया? बहुत से दर्शक जो उदय की कहानी से अनजान थे वो निर्देशक से फ़िल्म के अंत में एक उम्मीद की किरण चाहते थे. एक उछाला जाता पत्थर शायद अंकुर की तरह या एक रोपा जाता पौधा शायद रंग दे बसंती की तरह. पता नहीं उदय प्रकाश इस सब में कहाँ थे? वो होते तो बहुत से दर्शक उनसे भी यही सवाल करते. और मुझे मालूम है कि उनका जवाब क्या होता… मैं यही चाहता था कि आप सब मुझे इस अंत के लिए कोसें. कहें कि यह अंत गलत है. मोहनदास को एक आखिरी पत्थर उछालना चाहिए. अब भी इस सत्ता तंत्र के पार एक सवेरा है जो उसका इंतज़ार करता है. आप सब ये कहें और मेरी कहानी शायद तब पूरी हो. एक-एक मोहनदास आप सबको इस हॉल से बाहर निकलने के बाद मिलेगा. आप उसे यही बात कहें. मेरी कहानी में तो उसने दरवाज़ा बंद कर लिया लेकिन हो सकता है कि आपकी कहानी में ऐसा ना हो. अगर हम एक भी कहानी ऐसी रच पाये जहाँ मोहनदास को उसकी पहचान वापिस मिल जाती है और वो आख़िर में दरवाज़ा बंद नहीं करता तो मेरा कहानी कहना पूरा हुआ. आप इस कहानी पर अविश्वास करें क्योंकि अगर सिनेमा में बंद हुआ दरवाज़ा असल जिंदगी में ऐसा एक भी दरवाज़ा खोल पाये तो मैं उस बंद दरवाज़े के साथ हूँ.

रणवीर शौरी का होना या ना होना.

Finally… इतने इंतज़ार के बाद कल आख़िरकार Osian’s में रणवीर शौरी के दर्शन हो ही गये! उसके बिना Osian’s कुछ अधूरा-अधूरा सा लगता है. पिछली बार वो अपनी नई फ़िल्म मिथ्या के साथ यहाँ था. मिथ्या जो इस साल की सबसे उल्लेखनीय और जटिल फिल्मों में से एक बनकर उभरी है. मिथ्या जो मुझे उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ की याद दिलाती है. मिथ्या जिसे किसी एक श्रेणी में डालना मुश्किल है. रणवीर शौरी हमारे दौर के सबसे बेहतरीन कलाकारों में से एक है. इतना अपना लगता है कि उसके लिए ‘उनके’ लिखने का मन नहीं होता. मैं उसे हमारी पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र मानता आया हूँ. जैसे मेले में खोया हुआ बच्चा. Lost Child. क्या कहें, अपना भूत भूल चुकी मेरी पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र. कल सिरीफोर्ट की सीढियों पर बैठा वो फिर से उसी Lost Child जैसा लग रहा था. मीनाक्षी उसे देखकर बोली, “देखो मिहिर वो जो लड़का वहाँ सीढियों पर बैठा है वो तो…” और मैंने कहा, “हाँ रणवीर शौरी है.” और फ़िर हम दोनों ने एकसाथ कहा… Finally.

यहाँ मैं रणवीर का एक मिनी साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहा हूँ. साभार Osian’s.

Q. क्या आपको ऐसा महसूस होता है कि Osian’s एक ख़ास तरह के सिनेमा को बढ़ावा देकर और फ़िल्म समारोहों से कुछ अलहदा भूमिका निभा रहा है?
रणवीर. Osian’s हमारे मुल्क़ में होने वाला सबसे जीवंत समारोह है. यहाँ दिखाई जाने वाली फिल्में और आने वाले दर्शकों का समूह मिलकर इसे एक बेहतर माहौल देते हैं.

Q. नई फ़िल्म जो आपको पसंद आई हो?
रणवीर. मुझे Orphanage पसंद आई. वैसे आजकल मुझे ज़्यादा फिल्में देखने का समय नहीं मिल पाता है.

Q. पुरानी हिन्दी फिल्मों में आपकी पसंद क्या है?
रणवीर. मैंने अपने कॉलेज के दिनों में ही गुरु दत्त, राज कपूर और अशोक कुमार को खोज लिया था.

Q. मिथ्या में आपके किरदार को दुनिया भर में वाहवाही मिली है. इस रोल के लिए आपकी तैयारी के बारे में कुछ बतायें.
रणवीर. मुझे रजत के साथ काम करने में मज़ा आता है. मेरे लिए यह एक ख़ास मौका होता है. उनके लिए काम सबसे पहले है. पैसा और वक्त उसके बाद आते हैं. मिथ्या की योजना रजत के पास पिछले दस सालों से थी. मैंने यह कहानी उस वक्त पढ़ी थी जब मैं मिक्स डबल्स की शूटिंग कर रहा था. क्योंकि यह इतने लंबे समय तक चलने वाली फ़िल्म थी इसलिए रजत इसे और ज़्यादा गहराई दे पाये. मिथ्या का किरदार एक डबल रोल नहीं था बल्कि यह तो एक ट्रिपल रोल था. एक बार किरदार की याददाश्त जाने के बाद किरदार का तीसरा हिस्सा शुरू हो जाता है. इसीलिए मुझे हर किरदार को अलग पहचान देनी ज़रूरी थी. एकबार याददाश्त जाने के बाद नया किरदार दो हिस्सों में विभाजित हो जाता है. एक है उसका दिमाग और दूसरा उसका शरीर जो दो अलग-अलग व्यक्तियों की स्मृतियाँ ढो रहे हैं.

Q. आपने My Blueberry Nights देखी. कैसी लगी?
रणवीर. मुझे यह पसंद आई. विंटेज वोंग कार वाई का जादू है. लेकिन उन्हें हॉलीवुड के अभिनेताओं के साथ काम करते देखना मज़ेदार था.

पॉल श्रेडर: न्यू मीडिया एंड दी डेथ ऑफ़ सिनेमा.

हॉलीवुड के जानेमाने पटकथा लेखक और निर्देशक पॉल श्रेडर इन दिनों दिल्ली में हैं. पॉल को हम उनकी लिखी फिल्मों ‘Taxi driver’,  ‘Raging bull’, ‘Mishima’ और ‘The last temptation of christ’ से जानते हैं. ख़ासकर मार्टिन स्कोर्सेसी की फ़िल्म टैक्सी ड्राईवर शहर के विकृत चेहरे को करीब से देखने की एक प्रभावशाली कोशिश है. कैसे हिंसक शहर एक इंसान के दिलो-दिमाग़ में घुस जाता है यह देखना हो तो टैक्सी ड्राईवर देखिये. Osian’s में कल उन्होनें एमर्जिंग न्यू मीडिया और डेथ ऑफ़ सिनेमा पर एक रोचक व्याख्यान दिया. मैं यहाँ उस व्याख्यान का सार रूप प्रस्तुत कर रहा हूँ. यह ज्यादातर मेरी याददाश्त और समारोह में अगले दिन छपने वाली रिपोर्ट पर आधारित है. साथ ही मेरी असहमति के बिन्दु भी मैं यहाँ साथ रख रहा हूँ. आगे समय मिलने पर हम Osian’s में देखी फिल्मों पर भी बात करेंगे. यह समारोह 20 जुलाई तक चलेगा. आप अगर इस दौरान समय निकल पायें तो एकबार ज़रूर सिरीफोर्ट का रुख करें.

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सिनेमा हॉल में बैठकर फ़िल्म देखने की जो चाहत वेस्ट में पहले हुआ करती थी वो समय के साथ कम होती जा रही है. इसकी मुख्य वजह है नई तकनीक और उसपर सवार न्यू मीडिया. हाँ हिदुस्तान जैसे तीसरी दुनिया के देशों में यह अब भी बरकरार है. आनेवाले सालों में हम इन्टरनेट के क्षेत्र में आक्रामक तकनीकी उभार देखने वाले हैं जो इस नए उभरते मीडिया का ही एक रूप होगा. और यह उभार सिनेमा के उस रूप को जिससे हम परिचित हैं पलट कर रख देगा. दुनिया भर के फ़िल्म उद्योगों में एक तीखी ढलान देखी जा रही है और अभी की परिस्थितियों में हमारे पास इससे बचने का कोई उपाय नहीं है.

में इसे और विस्तार में समझाने की कोशिश करता हूँ. हेनरी किसिंजर ने एकबार कहा था कि तकनीक और प्रजातंत्र साथ साथ चलते हैं. तकनीक के क्षेत्र में आया कोई भी सुधार प्रजातंत्र में जनता को ताक़तवर बनाता है. यह बात सिनेमा के दर्शक पर पूरी तरह लागू होती है जो इन्टरनेट, सेलफ़ोन, आई-पोड्स के आने के साथ और समर्थ हुआ है. अब वो ना केवल नई हॉलीवुड फिल्में डाउनलोड कर देख सकता है बल्कि स्वयं फ़िल्म बनाकर उसे आराम से प्रसारित/वितरित भी कर सकता है. लेकिन इसका एक बड़ा प्रभाव सिनेमा देखने के तरीके पर पड़ा है जिससे मुझे चिंता है. ऑनलाइन नेट्वर्किंग और पब्लिक शेअरिंग से होनेवाले दर्शकों के इस बिखराव से एक बड़ा परिवर्तन आया है. अब सिनेमा पहले की तरह एक सामूहिक अनुभव नहीं रहा. सिनेमा ने अपनी वो ताक़त खो दी है जो सारे दर्शकों को एक साथ एक छत के नीचे ले आती थी. इससे सिनेमा अपना प्रभाव खो रहा है.

इससे भी बड़ी बात. सिनेमा हमेशा से एक एकतरफा संवाद प्रणाली रहा है. पेसिव मीडियम. और आज की पीढ़ी जो इंटरेक्टिव वीडियो गेम और इन्टरनेट पर बड़ी हुई है उसने इस पेसिव मीडियम पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. और अब बड़े स्टूडियो इस सवाल से भी जूझ रहे हैं जो उनसे बार बार पूछा जायेगा, “जब मैं फ्री में फ़िल्म डाउनलोड कर देख सकता हूँ तो मैं उसके लिए पैसा क्यों चुकाऊँ?” और अभी तक उनके पास इसका कोई मुफ़ीद जवाब नहीं है. संगीत उद्योग इस तरह की समस्याओं से पहले ही जूझ चुका है. थिएटर बंद हो रहे हैं और पाईरेसी तेज़ी से बढ़ रही है. और सच कहें तो हमारे पास कोई प्लान-बी भी नहीं है. इतना तय है कि ‘फ़िल्म’ नामक यह संस्था एक नया रूप लेने जा रही है और अभी से यह कह पाना मुश्किल है कि वो नया रूप क्या होगा. वैसे पूंजीवाद हमेशा कोई रास्ता तलाश ही लेता है. लेकिन सिनेमा अभी सिर्फ़ एक सदी पुराना है और मुझे लगता है कि हमें इस मध्यम की असली परिणिति जानने के लिए इस सदी के पार झाँकना होगा.

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यह बात सही है कि नए रूप में सिनेमा अपना सामूहिक प्रभाव खो रहा है लेकिन नई तकनीक अपने साथ और बहुत सारे नए विचार लेकर आती है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. हो सकता है कि पेसिव माध्यम कहा जाने वाला सिनेमा अपना यह चोला उतारकर एक ज़्यादा दुतरफा बात करने वाला चोगा पहन ले. किसे पता कल इन्टरनेट सिनेमा का दुश्मन नहीं सहयात्री बनकर उभरे. मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया शुरू भी हो गई है. मेरी पाल श्रेडर की इस राय से घोर असहमति है कि सिनेमा का भविष्य अन्धकार में है. बात बस इतनी है कि शायद हम उसके नए बदलते रूप पहचान नहीं पा रहे हैं.

बड़े स्टूडियो का टूटता साम्राज्य तो एक अच्छा लक्षण है. ख़ुद पॉल का मानना है कि आज के दौर में फ़िल्म बनाना और उसे प्रसारित करना कहीं ज़्यादा आसान है. हिन्दुस्तान में तेज़ी से बढ़ती डॉक्युमेंटरी फिल्मों की संस्कृति इसका एक छोटा सा उदहारण है. अब हमें अपनी फ़िल्म बनाने के लिए किसी और का मोहताज नहीं रहना होगा. पब्लिक शेयरिंग की संस्कृति दुनिया को और ज़्यादा प्रजातांत्रिक बनाती है. पाइरेसी  एक नकारात्मक चलन है इसपर भी अभी बहस होनी बाकी है. संगीत उद्योग में आया परिवर्तन भी नकारात्मक नहीं सकारात्मक परिवर्तन है. इससे जुड़ी ख़ास बातें आप यहाँ रविकांत के लेख में देख सकते हैं. अच्छा है कि पूंजीवादी जमावड़े को अभी कोई प्लान-बी नहीं नज़र आ रहा है. और मुझे उम्मीद है कि रिचर्ड स्टॉलमैन और पूरी दुनिया में फैले उनके साथी उस प्लान-बी के आने से पहले एक एक्शन प्लान-सी तैयार कर बैठे होंगे! मैं आनेवाले समय के सिनेमा को लेकर आशान्वित हूँ और इसकी वजहें बहुत कुछ वही हैं जो पाल श्रेडर को चिंता में डाल रही हैं. देखने का नज़रिया अलग है शायद.

हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं!

सीरीफोर्ट में एशियाई और अरब फिल्मों का एक बार फ़िर जमावड़ा. दसवें ओसियन सिनेफैन फ़िल्म फेस्टिवल की शुरुआत. पहले दिन ही कुछ महत्त्वपूर्ण सबक मिले जो आपके काम आ सकते हैं.

अपनी सीट पर बैठते वक़्त सावधान रहें. और कोशिश करें कि फेस्टिवल में अगले दो-तीन दिन कोई नया कपड़ा पहनकर ना जाएँ. मेरे जैसे नया कुरता तो बिल्कुल नहीं. वजह? सीरीफोर्ट सभागार की सभी सीटों के हत्थों पर किया गया नया काला रंग अभी भी ताज़ा है. आपके हाथ रखते ही वो अपना असर दिखा देगा. शायद फ़िल्म फेस्टिवल के लिए सीरीफोर्ट के रंग रोगन का काम कुछ देर से शुरू हुआ हो. वैसे भी आजकल दिल्ली सरकार को आनेवाले राष्ट्रमंडल खेलों के अलावा और कुछ कहाँ दिखता है! इस काले रंग से बचने के उपाय कुछ ऐसे हो सकते हैं.. कागज़ का उपयोग करें. बैठने से पहले हत्थों पर ये कागज़ बिछा लें. आज इस कागज़ के रूप में बाहर बुकिंग काउंटर पर मिलने वाले डेली न्यूज़ बुलेटिन का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया गया.

इसबार एक प्रतिभागी को एक ही टिकट लेने की इजाज़त है. याने अपने डेलिगेट पास को दिखाकर आप हर शो का सिर्फ़ एक ही टिकट ले सकते हैं. शायद ऐसा टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग रोकने के लिहाज से किया गया हो. तो अगर आप एक साथ सभी दोस्तों के लिए फ़िल्म के टिकट लेने की योजना बनाकर सीरीफोर्ट जा रहे हैं तो  दोस्तों को कहिये कि उन्हें ख़ुद ही आना होगा. हाँ ये हो सकता है कि आप जितने टिकट चाहियें उतने ही डेलिगेट पास खरीद लें क्योंकि डेलिगेट पास बनवाने के लिए हस्ताक्षर की ज़रूरत नहीं है.

पिछली बार से उलट मोबाइल और बैग हॉल में ले जाना मान्य है. वैसे हो सकता है आने वाले दिनों में इसमें कुछ परिवर्तन आ जाए. खाने की चीज़ें हमेशा की तरह बहुत महँगी हैं. चाय भी 10रु. की मिल रही है. टिकट की दर भी 20 से बढ़ाकर 30 कर दी गई है. डेलिगेट फीस 50 है. फ़िर भी बड़े सिनेमाघरों से तो फेस्टिवल में फ़िल्म देखना कहीं सस्ता है.

11 तारीख़ को समारोह का विधिवत उदघाटन प्रस्तावित है. हाँग-काँग की फ़िल्म ‘स्पैरो’ से समारोह का आगाज़ होगा. अगले दिनों में आप यहाँ उदय प्रकाश की कहानी पर बनी फ़िल्म ‘मोहनदास’, मृणाल सेन की ‘खंडहर’, समीरा मक्मल्बफ़ की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ब्लैकबोर्ड’, मार्टिन स्कोर्सेसी की पुरानी क्लासिक ‘टैक्सी ड्राईवर’, मणि कौल की बिज्जी की कहानी पर निर्मित ‘दुविधा’ और फेलिनी की ‘एट एंड अ हाफ’ जैसी फिल्में देख सकते हैं. यह समारोह आपको गोविन्द निहलाणी, पॉल श्रेडर, अब्बास टायरवाला, चेतन भगत और कुणाल बासु जैसे लेखकों और फिल्मकारों से मुलाकात का मौका भी दे रहा है. समारोह में इन सभी हस्तियों के साथ बातचीत के सत्र प्रस्तावित हैं. समारोह 20 जुलाई तक चलेगा.

सरकार राज: आग से तो बेहतर है!


” Idea! लेकिन अभी पूरी तरह आया नहीं है.” सरकार राज में उपस्थित कैरीकैचर खलनायकों की पूरी जमात में से एक गोविन्द नामदेव (जिनकी मूँछें इतनी अजीब हैं कि आप उन्हें कम और उनकी मूंछों को ज़्यादा देखते हैं. पेंसिल से बनाई हैं क्या!) का यह संवाद ही सरकार राज की पूरी कहानी है. इस Idea पर थोड़ी और मेहनत इसे सरकार से बेहतर फ़िल्म बना सकती थी. लेकिन जैसा जय को लगता है कि फ़िल्म कुछ जल्दबाज़ी में बना दी गई है, ठीक लगता है. ऐसे में angled और close-up shots पर, कलाकारों के अलग-अलग mannerisms पर तथा पार्श्व संगीत पर तो ध्यान दिया गया लेकिन लगता है कि सिर्फ़ इन्हीं पर ध्यान दिया गया. इन सभी तकनीकों से प्रभाव का निर्माण तो होता है लेकिन सिर्फ़ प्रभाव का ही निर्माण होता है. मेरे ऊपर के वाक्यों में जैसा उकताऊ सा दोहराव है आख़िर में सरकार राज भी सरकार का ऐसा ही उकताऊ दोहराव बनकर रह जाती है जहाँ कोई पुराना किरदार पिछली फ़िल्म से आगे ठीक तरह से विकसित नहीं होता. सवा दो घंटे की मशक्कत के बाद अंत में आपके पास ढेर सारे रामूप्रभाव (‘अँधेरा कायम रहे’ और इसबार साथ में पीलापन भी! पीला पीला हो पीला पीलाएकदम शाहरुख़ और सैफ style!) और भविष्य में सरकार-3 की उम्मीद (‘चीकू को फ़ोन लगाओ’ और क्यों था यार!) के सिवा कुछ नहीं बचता.

सरकार के अमिताभ की सबसे बड़ी खा़सियत थी उसकी खामोशी. वही उसकी ताक़त थी. ‘शक्ति’. जब बिस्तर पर घायल पड़े सरकार को शंकर आकर कहता है कि मैंने भाई को मार दिया, सरकार कुछ नहीं कहते. लेकिन सरकार का वो चेहरा हमें हमेशा याद रहता है. लेकिन सरकार राज इससे उलट है. सरकार राज में दोनों की सोच है कि, ‘हम तो फ़ेल होना चाहते थे. तुमने हमें पास कैसे कर दिया? लो हम फ़िर वही परीक्षा देंगे. अब पास करके बताओ!’ दोनों बाप-बेटे मिलकर ‘विष्णु के मामले में मुझसे गलती कहाँ हुई’ और ‘बाबा मुझे कोई पछतावा नहीं है’ जैसे पिछली फ़िल्म के छूटे तंतू discuss करते हैं और एक अच्छे ड्रामा में तब्दील हो सकने की सम्भावना रखने वाले Idea को मेलोड्रामा में तब्दील कर देते हैं (ले देकर साला एक के के था उसे भी पिछली फ़िल्म में मार डाला) कोई क़सर बाकी न रहे इसलिए सरकार बार बार आंसू बहाते हैं. न जाने ये सरकार का रोना reality shows की देखादेखी है या लालकृष्ण आडवाणी की प्रेरणा से है. (लेकिन सरकार तो बाल ठाकरे से प्रेरित थी ना? लगता है फ़िर जल्दबाज़ी में घालमेल हो गया!) सरकार ना सिर्फ़ आडवाणी माफ़िक रोते हैं बल्कि आख़िर में बहु ऐश्वर्या को (और हैरान परेशान दर्शक को भी) पूरा plot समझाने की ज़िम्मेदारी भी उनपर ही है. वे सरकार में जो-जितनी बकवास नहीं कर पाये थे सारी सरकार राज में करते हैं. मुझे तो लगता है कि अपने henchmen बाला के हिस्से के सारे संवाद भी बिचारे सरकार को ही बोलने पड़े हैं!

लेकिन सरकार राज की जल्दबाज़ी का सबसे बड़ा शिकार है शंकर नागरे (अभिषेक बच्चन). फ़िल्म के लेखक, निर्देशक यह तय ही नहीं कर पाये हैं कि इस आधुनिक महाभारत में शंकर नागरे अर्जुन है या अभिमन्यु? नतीजा यह कि शंकर का किरदार अर्जुन की उग्र वीरता और चालाकी तथा अभिमन्यु की इमानदार पात्रता और भोलेपन के बीच में झूलता रहता है. उसका पूरी फ़िल्म में बार-बार ‘सब संभाल लूँगा’ का दावा अर्जुन रुपी अदम्य योग्यता है तो आख़िर में चक्रव्यूह में फँसकर मौत उसे फ़िर भोले अभिमन्यु के खाँचे में पहुँचा देती है. फ़िल्म शुरू से ही उसका चित्रण कुछ ‘नादान’ रूप में करती तो अभिमन्यु पूरा जीवन पाकर मरता और ये किरदार का झोल यूँ ना अखरता. लेकिन बाज़ार को अभिषेक अभिमन्यु के रूप में हजम नहीं होता शायद. आज बाज़ार को अर्जुन रुपी नायक अभिषेक चाहिए. character development गया भाड़ में.

ऐसे में आश्चर्य नहीं की सबसे बेहतरीन काम उस अदाकार के हिस्से आया है जिसके काँधों पर पिछली फ़िल्म का बोझा नहीं है. ऐश्वर्या राय एक बेहतर तराशे गए किरदार में जान फूंकती हैं (अनीता राजन) और अकेली बाप-बेटे की मैलोड्रामा से भरपूर जोड़ी पर भारी हैं. अनीता फ़िल्म में सिर्फ़ एक बार रोती है और वो मेरे हिसाब से इस फ़िल्म का सबसे बेहतरीन दृश्य है. उसकी ईमानदारी उसकी आँखों में दिखती है. सबसे कम संवादों के बाद भी (या शायद इसी वजह से?) उसका प्रभाव सबसे गहरा है. आमतौर पर वह हमेशा receiving end पर है. उन top angled shots में जहाँ शंकर उसे ‘शक्ति’ का और ना जाने क्या क्या समझा रहा है और फ़िर जहाँ वो अपने ससुर से अभिमन्यु की मौत के जिम्मेदार दुर्योधनों और शकुनियों के नाम जान रही है. हर संवाद में उसका ‘सुनना’ बोलने वालों के ‘वक्तव्यों’ से ज़्यादा प्रभावशाली है.

मैं एक वक्त Orkut पर ‘आई हेट ऐश्वर्या राय’ community का सदस्य रहा हूँ. आज भी दोस्तों में ऐश का प्रशंसक नहीं गिना जाता हूँ. लेकिन सरकार राज देखने के बाद मेरा मानना है कि अगर यह फ़िल्म किसी कलाकार के फिल्मी सफ़रनामे में एक नया आयाम जोड़ती है तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐश्वर्या हैं. उनका कार्पोरेट रूप बिपाशा से ज़्यादा convincing है. अब ये बात और है कि शायद ख़ुद ऐश्वर्या राय (बच्चन) यह निष्कर्ष सुनकर सबसे ज़्यादा दुखी हों!

एक सुझाव है. अगर आप मुम्बई पर एक बेहतरीन फ़िल्म देखना ही चाहते हैं तो ‘आमिर’ देखिये. एक ऐसी फ़िल्म जिसे देखने एक एक हफ्ते बाद भी जिसका review नहीं लिख पाया हूँ. इतना कुछ है कहने को कि कहना ही मुश्किल हो जाता है. फ़िर घनानंद याद आते हैं, “अच्छर मन को छरै बहुरि अच्छर ही भावे”. कोशिश जारी है.

नैतिक दुविधा से ग्रस्त खूनी खेल: रेस

एक बात है, अब्बास-मस्तान नामधारी यह सफ़ेदपोश निर्देशक जोड़ा जब भी बदले के खूनी खेल से भरी कहानियाँ बनता है तो अपनी पिच पर खेलता नज़र आता है. और यह भी सही है कि श्रीराम राघवन नामक चमत्कार के हिन्दी सिनेमा में अवतरित होने से पहले थ्रिलर के क्षेत्र में अब्बास-मस्तान ही मांग की पूर्ति करते रहे हैं.
लेकिन रेस की कहानी में एक मूलभूत झोल है जो इसे बाज़ीगर या सोल्ज़र (मैं इन्हें अब्बास-मस्तान का सबसे महत्त्वपूर्ण काम मानता हूँ) नहीं बनने देता. आप गौर करेंगे कि बाज़ीगर और सोल्ज़र दोनों ही फिल्मों में नायक प्रत्येक हत्या के साथ अपने नायकत्व को और ज़्यादा मज़बूती से स्थापित करता है. प्रतिनायक की छवि बनाते हुए भी शाहरुख़ अपनी हर हत्या के साथ और ज़्यादा क्रूर होता जाता है और सोल्ज़र में बॉबी भी एक के बाद एक हत्या के दहला देने वाले तरीके तलाशता है. जैसे एक स्टेटमेंट की तरह बार-बार अपना नायकत्व सामने रख रहे हों. और यह काम करता है. यह दोनों ही अपने ‘मर्दाना’ नायकत्व को प्रत्येक क्रूरता के साथ और ज़्यादा मज़बूती से स्थापित करते हैं. इसका क्या कारण है?
इसका कारण यह है कि इन दोनों ही नायकों के पास एक बहुत ही मज़बूत मोटिव है बदले का. एक ऐसा अतीत है इनके पास जो इनका हर गुनाह माफ़ करवा देता है. ऐसा अतीत जो नायक की छवि हत्यारा होने के वावजूद खंडित नहीं होने देता. यहाँ तक कि नायक नायिका का भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति में इस्तेमाल करता है. लेकिन जिसके अतीत में राखी जैसी माँ अकेली खड़ी हो वहां नायिका के प्रेम की क्या बिसात. वैसे भी हिन्दुस्तानी सिनेमा में ‘माँ’ के सामने ‘प्रेमिका’ ने हमेशा दोयम दर्जे की भूमिका ही पाई है. यह नायक प्रत्येक हत्या के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है.
यहीं रेस मात खा जाती है. रेस में दोनों ही नायकों के पास हत्या का कोई आधार नहीं है. खासकर फ़िल्म के नायक के तौरपर स्थापित किए गए सैफ़ (रणवीर) के पास. ऐसे में वह अपने raw look के बावजूद भी कभी पूरी तरह क्रूर नहीं हो पाता. यह नैतिक दुविधा निर्देशक द्वय के दिमाग में भी है और इसी वजह से अंत में भी रणवीर द्वारा राजीव (अक्षय) की हत्या नहीं करवाई जाती. दरअसल रणवीर के पास राजीव को मारने का कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि राजीव उसे मारना चाहता है और बचने के लिए वह अपने छोटे भाई को मार दे. और यह तो बड़ा टटपूँजिया सा कारण है खून का! इसीलिए नैतिक दुविधा पैदा होती है जो फ़िल्म को एक संतुष्टिदायक अंत तक नहीं पहुचने देती. अंत में एक सड़क दुर्घटना में राजीव की मौत होती है जो बड़ा फुस्स अंत है!
फ़िल्म में दोनों नायकों में से किसी एक के पास हत्या के लिए एक सौलिड मोटिव का होना ज़रूरी था. अक्षय के नकारात्मक किरदार में इसकी कोशिश तो की गई लेकिन ‘सौतेला’ वाला फंडा कुछ जम नहीं पाया. यूँ भी नायक जब सैफ़ को पेश किया जा रहा है तो उसका एक नायक के रूप में स्थापित होना ज़रूरी था जो नहीं हो पाया. हालांकि फ़िल्म में इसकी गुंजाइश थी. शुरूआती पन्द्रह मिनट तक जिस तरह रनिंग कमेंट्री (वायस ओवर) के साथ किदारों का परिचय करवाया जा रहा था वह थियेटर का सबसे मूलभूत गड्ढा है. इसके बजाए एक अतीत का गढ़ना कहीं कारगर होता जहाँ भाइयों का टकराव बचपन से ही स्थापित किया जाता. एक सौलिड मोटिव रचा जाता. एक माँ भी होती तो क्या कहने! ऐसी एक अदद ‘माँ’ आनेवाली हर हत्या को नायक का बदला बना देती है. एक क्रूर लेकिन दिलचस्प बदले की कहानी और रेस में बस इतना ही फ़ासला है.

जब वी मेट : ‘किस्सा-ऐ-कसप’

आज फ़िल्मफेयर देखते हुए लगा कि यह पुरानी पोस्ट (13 नवम्बर) जो मैंने अपने ब्लॉग कबाड़ में डाल दी थी पोस्ट कर दी जानी चाहिए. आख़िर ‘गीत’ को एक के बाद एक पुरस्कार मिल रहे हैं! अब तो यह मुझ अकेले की तमन्ना का बयान नहीं. इससे identify करने वाले बहुत हैं. पढ़िये एक नितांत निजी टिप्पणी और उसके बाद इम्तियाज़ अली होने का अर्थ तलाशती ये ‘जब वी मेट’ की कसपिया व्याख्या..!

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“दिल्ली शहर एक परेशान सा ठिकाना है जो सुकून से कोसों दूर है. दोस्त भी पास नहीं, ना सितारेसब एक फासले पर रह गया है. कमरे में अकेलेसारे सुखन हमारेदोहराता मैं तनहा हूँना, अब मैं और सलाह नहीं दे सकता. अब रंग चाहिए. अब दूसरों की प्रेम कहानियाँ सुनना और हल तलाशना काफी हुआ. हाँ.. मुझे संगीत कुछ अधूरा सा लग रहा है. धुन तबतक अधूरी है जबतक उसे बोल मिलें. हाँ.. मेरा तराना अधूरा है. हाँ.. अब मुझे
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मेरी जिन्दगी में एक गीत चाहिए..”

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क्या आपने कभी किसी कहानी से प्रेम किया है? पूरी शिद्दत से किसी कविता को चाहा है? किसी उपन्यास को दिल से लगाकर रातें काटी हैं? एक प्रेम कहानीसाधारण सीएक लड़का, एक लड़की और बहुत सारे संशय वाली. क्या कभी आप पर ऐसी छायी है कि उसका जादू आपके हर काम को अपने आगोश में ले ले? आप जब भी कोई नयी कहानी सुनाने बैठें, वही प्रेम कहानी रूप बदलकर आपकी जुबाँ पर आ जाए?

इम्तियाज़ अली ने एक प्रेम कहानी से ऐसा ही घनघोर प्रेम किया है. पहले एक टेलीफिल्म (स्टार के लिए ‘बेस्टसेलर’ में). फ़िर अभय देओलआयशा टाकिया के साथ पहली फ़िल्म ‘सोचा ना था’. उसके बाद ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ जो उस पुरानी टेलीफिल्म का ही रीमेक थी (इम्तियाज़ ने कहानी/स्क्रीनप्ले किया था). और अब ‘जब वी मेट’ आई है, उनकी दूसरी फ़िल्म. शाहिदकरीना के साथ. एक ही प्रेम कहानी रूप बदल-बदलकर… एक साधारण सी प्रेम कहानी, जिसमें एक लड़का है, एक लड़की है लेकिन “love at first sight” नहीं है. (तीनो फिल्में इसका उदाहरण हैं). शुरुआत में तो लड़के या लड़की को प्रेम भी किसी और से है (आप ‘सोचा ना था’ की कैरेल, ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ के धीरज और ‘जब वी मेट’ के अंशुमान को याद कर सकते हैं.) और फिर एक सफर है साथ… कभी गोवा, कभी दिल्ली और कभी रतलाम से भटिंडा तक! जिन्दगी का सफर.. कभी कंटीले रास्ते, कभी सुहानी पगडंडियाँ. याद आता है गोपीकृष्ण/राधाकृष्ण प्रेम जिसको सूरदास ने साहचर्य का प्रेम बनाकर प्रस्तुत किया. यह पहली नज़र का प्यार नहीं, यह तो रोज की दिनचर्या में पलता-बढ़ता है. रोज की अटखेलियाँ इसे सहलाती है. चुहल बात को आगे बढाती है और पता ही नहीं चलता कि कब प्यार हो जाता है.

और फ़िर हमेशा.. एक भाग जाने का सुर्रा है! संशय मूल थीम है और कहानी हमेशा ‘या की’ टोन बनाए रखती है. यह ‘कसपिया’ संशय है जो ‘ये प्यार है या ये प्यार है’ से उपजता है. अतार्किकता हावी रहती है और कहानी हमेशा “जब आप प्यार में होते हो तो कुछ सही-ग़लत नहीं होता” जैसे ‘वेद-वाक्य’ देती चलती है. मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि इम्तियाज़ अपने तकिये के सिरहाने ‘कसप’ रखकर सोते होंगे!

ये तो थी इम्तियाज़ की प्रेम कहानी एक प्रेम-कहानी से उधार! और अब अपनी और फ़िल्म की बात. तो मुझे गीत से प्यार हो गया. ऊपर का कथन टाइम-पास बकवास नहीं एक स्वीकारोक्ति था. और गीत है ही ऐसी की कोई भी उसपर मर मिटे! करने से पहले सोचा नहीं, जो सोचा वो कभी किया नहीं.. that’s geet for U! कुछ कमाल के संवाद नज़र हैं… नायिका नायक को कहती है, “तुम मेरी बहन के साथ भाग जाओ.” या “मैं अपनी फेवरेट हूँ!”. तमाम बातों के बावजूद नायिका का भिड़ जाने का अंदाज.. याद रहेगा. तो प्रेम कहानियो के सुखद अंत तलाशना बंद कर ‘जब वी मेट’ को इस नज़रिये से परखें. खासकर इम्तियाज़ द्वारा बनाये इसी प्रेम कहानी के अन्य रूपों के सामने रखकर जब वी मेट का अर्थ करें. नए अर्थ अपने आप खुलने लगेंगे.

मिथ्या: खोई हुई पहचान की तलाश में

मैं जान जाता कि यह एक सपना है. लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से बच नहीं सकता. मृत्यु नहीं -तिरिछ द्वारा अपनी हत्या से- और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह मैं जाग जाऊं. मैं पूरी ताक़त लगाता, सपने के भीतर आँखें फाड़ता, रौशनी को देखने की कोशिश करता और ज़ोर से कुछ बोलता. कई बार बिलकुल ऐन मौके पर मैं जागने में सफल भी हो जाता.

माँ बतलाती कि मुझे सपने में बोलने और चीखने की आदत है. कई बार उन्होंने मुझे नींद में रोते हुए भी देखा था. ऐसे में उन्हें मुझे जगा डालना चाहिए, लेकिन वे मेरे माथे को सहला कर मुझे रजाई से ढक देती थीं और मैं उसी खौफ़नाक दुनिया में अकेला छोड़ दिया जाता था. अपनी मृत्यु -बल्कि अपनी हत्या से बचने की कमज़ोर कोशिश में भागता, दौड़ता, चीखता.”

उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ का अंश.


दुनिया का सबसे बड़ा डर क्या है?
…सपने आपके भीतर के डर और इच्छाओं को जानने का सबसे बेहतर ज़रिया हैं. मुझे सबसे डरावना सपना वह लगता है जहाँ मैं अकेला रह जाता हूँ. मेरे दोस्त
, मेरा परिवार, मेरी दुनिया मुझसे बिछुड़ जाते हैं. मैं अनजान भीड़ के बीच होता हूँ या अपनी जानी-पहचानी जगहों पर अकेला होता हूँ. मुझे पहचानने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में अक्सर मैं जागने की कोशिश करता हूँ. लेकिन कभी-कभी सपने के भीतर अचानक ऐसा लगता है कि यह सपना नहीं हकीक़त है और वह अहसास खौफ़नाक होता है. हाँ, दुनिया का सबसे बड़ा डर अकेलेपन का डर होता है. अपनी पहचान के खो जाने का डर होता है. अपनी दुनिया से बिछुड़ने का डर होता है.
इस नज़रिये से देखने पर
मिथ्या का दूसरा हिस्सा एक डरावना अनुभव है. वी.के. (रणवीर) बारबार इसे सपना समझकर जागने की कोशिश करता है. लेकिन वह सपना नहीं है. उसे समझ नहीं आता कि क्या सपना है और क्या सच? वह चिल्लाता हैतुमने कहा था कि कुछ नहीं बदलेगा.” और आख़िर में वह अपनी एकमात्र याद रही पहचान से भी ठुकराया जा चुका है. वी.के. एक ऐसा शख्स है जिसका सबसे डरावना सपना सच हो गया है.
दोस्तों को नायक की मौत पर कहानी का अंत एक त्रासद अंत लग सकता है लेकिन मैं इससे असहमत हूँ. वी.के. का अंत दरअसल उसके सपने का भी अंत है. उसकी ‘जागने’ की निरंतर कोशिश एक बंदूक की गोली उसके भेजे में जाने के साथ ही सफल हो जाती है. गोली लगने के साथ ही उसका खौफ़नाक सपना टूट जाता है और उसे एक फ्लैश में सब याद आ जाता है. उसकी आखिरी पुकार
सोनल में एक चैन, एक संतुष्टि, एक सुकून सुनाई देता है. यह त्रासद अंत नहीं. वी.के. एक कमाल का दोहराव रचते हुए एक परफैक्ट मौतमरता है जो फ़िल्म के पहले दृश्य से उसकी तमन्ना थी. मौत उसे अपनी खोई हुई पहचान, खोई हुई जिंदगी से जोड़ देती है.
मैं यह कहने में हिचकूंगा नहीं कि फ़िल्म पर रजत कपूर से ज्यादा सौरभ शुक्ला की छाप नज़र आती है. यह मिक्स डबल्स जैसी नहीं है और भेजा फ्राई जैसी तो बिलकुल नहीं है. हाँ रघु रोमियो के कुछ अंश यहाँ-वहां दिख जाते हैं. मरीन ड्राइव (नेकलेस) के फुटपाथ पर बैठे अथाह/अनंत समंदर की तरफ़ देखते और दारु पीते वी.के. की छवि सत्या के भीखू की याद दिलाती है. जैसा मदनगोपाल सिंह कहते हैं यह उत्तर भारत के छोटे शहरों से वाया दिल्ली (
NSD) होते मुम्बई आए लड़कों की पौध का दक्षिण भारत के उन्नत तकनीशियन निर्देशकों से लेखक के तौर पर मिलन से उपजा सिनेमा है. मिथ्या मुझे अनेक पूर्ववर्ती फिल्मों की याद दिलाती रही जिनमें से कुछ की चर्चा मैं यहाँ करना चाहूँगा.

सत्या– फ़िल्म पर RGV स्कूल की छाप साफ नज़र आती है. इसका सीधा कारण फ़िल्म से लेखक के रूप में सौरभ शुक्ला का जुड़ा होना है. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. विनय पाठक ने ओशियंस सिने फेस्ट में मिथ्या के प्रीमियर में कहा भी था कि डॉन लोग कोई चाँद से नहीं आए हैं. वे भी हमारे-आपके जैसे इंसान हैं. यह दृष्टि सौरभ शुक्ला, अनुराग कश्यप, जयदीप सहनी जैसे लेखकों की बदौलत आई थी और आज फैक्टरीकी बुरी हालत के पीछे इन लेखकों का अलगाव एक बड़ा कारण माना जा रहा है. मिथ्या में यह दृष्टि इंस्पेक्टर श्याम (ब्रिजेन्द्र काला) के किरदार में बखूबी उभरकर आई है. एक बेहतरीन अदाकार जिसके काम की पूरी तारीफ ज़रूरी है बिना किसी हकलाहट के!

डिपार्टेड– मार्टिन स्कोर्सेसी की यह थ्रिलर दो परस्पर विरोधी योजनाओं के उलझाव से निकली कहानी है. मुझे वी.के. की दुविधा में लिओनार्दो की दुविधा का अक्स दिख रहा था. lost identities की कहानी के रूप में और अपनी खोई पहचान वापस पाने की लड़ाई के तौर पर यह दोनों फिल्में साथ रखी जा सकती हैं. कुछ और नाम भी याद आ रहे हैं नेट और बरमूडा ट्राएंगल जैसे. कभी विस्तृत चर्चा में बात करेंगे.

दिल पे मत ले यार– यह मिथ्या की नेगेटिव है. इसमें सपना खौफनाक नहीं है, सपने के टूटने के बाद की असल तस्वीर खौफनाक है. हिन्दी सिनेमा का सबसे त्रासद अंत. मिथ्या का अंत मौत के बावजूद सुकून देता है. दिल पे मत ले यार का अंत कड़वाहट से भर देता है. असल जिंदगी अपनी तमाम ऐयाशियों के साथ किसी भी खौफनाक सपने से ज़्यादा भयावह है. मिथ्या के अंत में नायक की मौत सुकून देने वाली है. सुकून इस बात का कि आखिरकार वह अपने भयावह सपने की कैद से आजाद हो गया है. इसके विपरीत दिल पे मत ले यार के अंत में दुबई में बैठे अरबपति डान रामसरन और गायतोंडे सफलता के नहीं, मौत के प्रतीक हैं. मासूमियत की मौत, भरोसे की मौत, इंसानियत की मौत. मुम्बई शहर को आधार बनाती दो बेहतरीन फिल्में जो उत्तर भारत से आए दो युवकों के भोले सपनों और महत्वाकांक्षाओं की किरचें बिखरने की कथा को मायानगरी के वृहत लैंडस्कैप में चित्रित करती है. मुम्बई शहर पर चर्चित और प्रशंसित फिल्में कम नहीं लेकिन यह दोनों अपेक्षाकृत रूप से कम चर्चित फिल्में 90 के बाद बदलते महानगर और उसके जायज़- नाजायज़ हिस्सों पर तीखा कटाक्ष हैं. इन्हें उल्लेखनीय हस्तक्षेप के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए.

अंत में रणवीर शौरी. मेरी पसंद. उसमें मेरे जैसा कुछहै. मिथ्या में पहले आप उसके लिए डरते हैं, फ़िर उसके साथ डरते हैं और अंत में उसकी जगह आप होते हैं और आपका ही डर आपके सामने खड़ा होता है. यह साधारणीकरण ही रणवीर के काम की सबसे बड़ी बात है. कुछ दृश्यों में उसका काम आपपर हॉंटिंग इफेक्ट छोड़ जाता है. जब भानू (हर्ष छाया) उसे अपने भाई का कातिल समझ कर मार रहा है वहां उसकी पुकार “भानू, मैं तेरा भाई हूँ.” एक ना मिटने वाला निशान छोड़ जाती है. एक ही फ़िल्म में हास्य और त्रासदी के दो चरम को साधकर उसने काफी कुछ साबित कर दिया है.

मिथ्या देखा जाना चाहती है. उसकी यह चाहत पूरी करें.