“शहरों को फूको के शब्दों में ‘दौर-ए-हमवक्ती’ (इपॉक ऑफ़ सायमाल्टेनिटी) कहा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग कालखंड एकसाथ विद्यमान होते हैं. शहर, ख़ासतौर पर उत्तर-औपनिवेशिक शहर, अपनी ज़द में विभिन्न गतियों और लयों को समेटे रखता है और इससे विरोध और प्रतिस्पर्धा का निहायत गतिशील माहौल पैदा होता है.”
-आदित्य निगम.
किसी फ़िल्म का अन्तिम दृश्य पूरी फ़िल्म को देखने का एक नया नज़रिया दे सकता है. एक आखिरी इशारा इतना कुछ कह दे कि पूरी फ़िल्म के मायने ही बदल जाएँ. मैं यह जानता तो था लेकिन हल्ला में बहुत दिनों बाद फ़िर ऐसा होता देखा. हल्ला यूँ भी एक बेहतर फ़िल्म है जो आधुनिक ‘शहर’ की यंत्रवत व्यवस्था और विडंबनाओं को light hearted way में उभारती है लेकिन इसका अंत इसे सिर्फ़ वही नहीं रहने देता. हल्ला का अंत बताता है कि जहाँ से आप शहर को देख रहे हैं वो शहर की अकेली तस्वीर नहीं. देखने के और नज़रिए हैं लेकिन इस आधुनिक शहर व्यवस्था में चीज़ें इतनी अलग-थलग हैं कि बहुत बार आप यह समझ भी नहीं पाते कि एक ही परिघटना के अलग-अलग व्यक्तियों के लिए कितने अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं.
हल्ला के निर्देशक जयदीप वर्मा हर्षिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और सई परांजपे की फिल्में देखकर बड़े हुए हैं और हल्ला इसी परम्परा का अगला चरण है. शहर को देखने का ये नज़रिया कथा और चश्मेबत्तूर से आता है और इस रिश्ते से खोसला का घोंसला इसकी बड़ी बहन है. हल्ला में वो मुंबई है जो नायक को रोज़ सुनाई देती है, दिखाई देती है. हल्ला की मुंबई जुहू बीच, चौपाटी या मरीन ड्राइव नहीं है. हल्ला में दिन कार की अगली ड्राइवर सीट पर या ऑफिस में कम्प्यूटर के सामने शेयर बेचते-खरीदते बीत जाता है. फ़िल्म के दो सबसे महत्त्वपूर्ण घटनास्थल जहाँ ज्यादातर कहानी आगे बढ़ रही है वो एक चलती कार की अगली दो सीट और रिहायशी इमारत का पार्किंग लॉट हैं. कार्पोरेट व्यवस्था में निचली पायदान पर खड़ी जिंदगियाँ यही शहर देख रही हैं. बहुत देर तक लगता है कि यह फ़िल्म शोर के बारे में है. लेकिन हल्ला शहर के बारे में है. वो शहर जिससे आपका-मेरा रोज़ सामना होता है. शहर जिसकी कितनी लयें हैं ख़ुद उसे भी नहीं मालूम.
सुकेतु मेहता Maximum city में लिखते हैं, ” यह कमबख्त शहर. समुद्र की एक बड़ी लहर को आकर इन द्वीपों को मिटा देना चाहिए और इसे जल समाधि दे देनी चाहिए. इस शहर पर बम गिराकर इसे ख़त्म कर देना चाहिए. हर सुबह मुझे गुस्सा आता है. यहाँ कुछ भी काम कराने का यही रास्ता है; लोग गुस्सा करने पर ही काम करते हैं, गुस्से से डरते हैं. यदि पैसा और सही लोगों से जान-पहचान ना हो तो गुस्सा ही काम आता है. मैं गुस्से का फायदा समझने लगा हूँ- टेक्सी ड्राइवरों, द्वारपालों, प्लमबरों, सरकारी आदमियों पर गुस्सा होता हूँ. भारत में मेरा सीडी प्लेयर भी गुस्से या शारीरिक हिंसा की बदौलत चलता है. जब प्ले बटन को आराम से दबाने पर भी ये नींद से नहीं जागता, तो एक धौल जमाने से तुंरत बजने लगता है.”
रजत कपूर को इस रोल में देखना एक सुखद आश्चर्य था. रजत ख़ुद को मूलत: एक निर्देशक कहते हैं जो शौकिया अदाकारी भी करता है. अभी तक रजत कपूर ने बहुत से बेहतरीन रोल किए हैं लेकिन यह किरदार उनके भीतर के अदाकार के लिए भी एक चुनौती था. Osian’s में उनकी ‘the prisnor’ देखते हुए भी लगा कि एक लेखक का किरदार उनके लिए चुनौती नहीं. लेकिन जनार्दन का किरदार रजत के लिए एक चुनौती था क्योंकि वो ऐसे बिल्कुल नहीं हैं. यह रोल कुछ-कुछ राहुल बोस के झंकार बीट्स में निभाए ऋषि जैसा है. ऋषि राहुल के लिए एक चुनौती था क्योंकि राहुल जैसे मेच्योर ऐक्टर के लिए एक इम्मेच्यौर रोल प्ले करना ही बड़ी चुनौती है. और हमारे दौर के कुछ बेहतरीन अदाकार अपनी अदाकारी की सुरक्षित पनाहों से निकलकर ऐसी चुनौती का सामना करने को तैयार हैं ये देखकर अच्छा लगता है.
इस फ़िल्म की खूबसूरती यही है कि यह बड़े के पीछे नहीं भागती. हमने ‘नई कहानी’ पढ़ते हुए जाना है कि जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा भी अपने भीतर सारे अर्थ समेटे होता है. जिंदगी की एक छोटी सी ‘क्राइसिस’ किसी बड़े परिवर्तन की ओर ईशारा कर देती है. और कहानी का मूल काम है ईशारा करना.
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*पोस्ट का शीर्षक फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म से लिया गया है.
“शहरों को फूको के शब्दों में ‘दौर-ए-हमवक्ती’ (इपॉक ऑफ़ सायमाल्टेनिटी) कहा जा सकता है, जहाँ अलग-अलग कालखंड एकसाथ विद्यमान होते हैं. शहर, ख़ासतौर पर उत्तर-औपनिवेशिक शहर, अपनी ज़द में विभिन्न गतियों और लयों को समेटे रखता है और इससे विरोध और प्रतिस्पर्धा का निहायत गतिशील माहौल पैदा होता है.”
आखिरी फ़िल्म का गीत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ अपने भीतर उस दौर की तमाम खूबसूरती समेटे था तो एक दूसरे गीत ‘रूठ न जाना’ में वही शरारत थी जो आर. डी. के संगीत की ख़ास पहचान थी. लगा पंचम के संगीत की अठखेलियाँ और शरारत अब लौटकर नहीं आयेंगे. लेकिन तभी दक्षिण भारत से आई एक डब्ड फ़िल्म
अब तो कई साल हुए विशाल से मुलाकर हुए. मैं दिल्ली आगे की पढ़ाई के लिए आ गया हूँ और विशाल ने कर्नाटक में अपनी हेंडलूम फैक्ट्री शुरू कर दी है. लेकिन आज भी जब मैं कहीं रेडियो पर ‘हम्मा-हम्मा’ सुनता हूँ तो मेरे पाँव में थिरकन होने लगती है और उस वक़्त मुझे विशाल की बहुत याद आती है. और इसीलिए रहमान हमारे दौर के आर. डी. हैं. सबका चहेता. सबसे चहेता.
मोहनदास
Finally… इतने इंतज़ार के बाद कल आख़िरकार
हॉलीवुड के जानेमाने पटकथा लेखक और निर्देशक
में इसे और विस्तार में समझाने की कोशिश करता हूँ. हेनरी किसिंजर ने एकबार कहा था कि तकनीक और प्रजातंत्र साथ साथ चलते हैं. तकनीक के क्षेत्र में आया कोई भी सुधार प्रजातंत्र में जनता को ताक़तवर बनाता है. यह बात सिनेमा के दर्शक पर पूरी तरह लागू होती है जो इन्टरनेट, सेलफ़ोन, आई-पोड्स के आने के साथ और समर्थ हुआ है. अब वो ना केवल नई हॉलीवुड फिल्में डाउनलोड कर देख सकता है बल्कि स्वयं फ़िल्म बनाकर उसे आराम से प्रसारित/वितरित भी कर सकता है. लेकिन इसका एक बड़ा प्रभाव सिनेमा देखने के तरीके पर पड़ा है जिससे मुझे चिंता है. ऑनलाइन नेट्वर्किंग और पब्लिक शेअरिंग से होनेवाले दर्शकों के इस बिखराव से एक बड़ा परिवर्तन आया है. अब सिनेमा पहले की तरह एक सामूहिक अनुभव नहीं रहा. सिनेमा ने अपनी वो ताक़त खो दी है जो सारे दर्शकों को एक साथ एक छत के नीचे ले आती थी. इससे सिनेमा अपना प्रभाव खो रहा है.
सीरीफोर्ट में एशियाई और अरब फिल्मों का एक बार फ़िर जमावड़ा. दसवें
पिछली बार से उलट मोबाइल और बैग हॉल में ले जाना मान्य है. वैसे हो सकता है आने वाले दिनों में इसमें कुछ परिवर्तन आ जाए. खाने की चीज़ें हमेशा की तरह बहुत महँगी हैं. चाय भी 10रु. की मिल रही है. टिकट की दर भी 20 से बढ़ाकर 30 कर दी गई है. डेलिगेट फीस 50 है. फ़िर भी बड़े सिनेमाघरों से तो फेस्टिवल में फ़िल्म देखना कहीं सस्ता है.



