सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, कोई एक ही बात, कोई एक नुस्खा असर कर जाए. पिछले सालों में आई ऐसी ही कुछ फ़िल्में और उनकी वजह से समाज में आया बदलाव इस बार हमारी नज़र में है. सात अलग-अलग फ़िल्मों के ज़रिए हम उन सात संस्कारों को समझने की कोशिश करेंगे जिनके समाज में आगमन के पीछे कहीं इन्हीं फ़िल्मों से निकली कोई बात, कोई घटना, कोई विचार था.
कैन्डल लाइट मार्च
(रंग दे बसंती)
कोई फ़िल्म कैसे एक फ़िनोमिना में बदल जाती है, ’रंग दे बसंती’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. ’रंग दे बसंती’ का होना शहरी युवा वर्ग के लिए एक बड़ी घटना थी. लम्बे समय बाद किसी फ़िल्म का ऐसा प्रभाव देखा गया कि उसे आधार बनाकर लोग अपने आस-पास के माहौल को बदलने का प्रयास शुरु कर दें. शहरी युवा वर्ग में कैन्डल लाइट मार्च विरोध के एक सर्वमान्य तरीके के रूप में उभरा. आखिर यह शहरी युवा को न्याय की मांग से जुड़ने का मौका उपलब्ध कर रहा था. जेसिका लाल हत्याकांड से लेकर रुचिका की आत्महत्या के मामले तक इस माध्यम से न्याय की आवाज़ बुलन्द की गई. हालांकि बाद के दिनों में इस ’कैन्डल लाइट मार्च’ की बार-बार पुनरावृत्ति पर इसकी आलोचना भी हुई और इसे ’भद्रजनों की कैन्डल लाइट मार्च पार्टी’ जैसे नाम भी दिए गए.
विरोध के इन तरीकों से अलग ’रंग दे बसंती’ भ्रष्टाचार की समस्या के खिलाफ़ आम युवा में जागरुकता लाई. बहुत से लोग सत्येन्द्र दुबे और मंजुनाथ जैसे नायकों की कुर्बानी के आलोक में इस फ़िल्म के असर का विश्लेषण करते हैं. युवा ने सवाल करना सीखा. आज हमारे पास भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो ’सूचना के अधिकार’ जैसा हथियार है उसे हासिल करने के पीछे एक लम्बा जन आन्दोलन है. ’रंग दे बसंती’ ने इस चेतना को समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलवाने में मदद की.
बच्चे मन के सच्चे
(तारे ज़मीन पर)
एक जोड़ा पति-पत्नी (अमोल गुप्ते और दीपा भाटिया) की लिखी एक छोटी सी कहानी से शुरु हुआ इस फ़िल्म का सफ़र कई आयामों से होता हुआ गुज़रा. सचेत अभिनेता आमिर ख़ान ने इसे इसके मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाया. लेकिन जिस तरह यह फ़िल्म हमारे समाज के सबसे मुलायम और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से – ’बच्चे’ के मन की गहराईयों को हमारे सामने लाई, यह देखना एक विहंगम अनुभव था. सिर्फ़ एक डिस्लेक्सिया रोग के प्रति चेतना की ही बात नहीं, इस फ़िल्म ने हमारे समाज को अपनी नई पौध को देखने और उनके हुनर को पहचानने का नया नज़रिया दिया. ’तारे ज़मीन पर’ ने माता-पिताओं को उनकी ही उम्मीदों के बोझ तले दबे, अपनी पहचान तलाशते उनके बच्चों से फिर से मिलवा दिया.
यह स्कूली शिक्षा के बारे में भी एक सबक था. आने वाले दौर में कई स्कूलों ने अध्यापन में नई और रचनात्मक तकनीकों को शामिल किया और पढ़ाई को बच्चे के लिए और मज़ेदार बनाया. बस्ते का बोझ कम करने के लिए बहुत से सकारात्मक प्रयास हुए. एन.सी.ई.आर.टी. ने प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति की शिफ़ारिशों को लागू करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण का नया मसौदा तैयार किया. बेशक यह सारे परिवर्तन एक फ़िल्म की वजह से नहीं आए हों लेकिन ’तारे ज़मीन पर’ का सकारात्मक योगदान भुलाया नहीं जा सकता.
जादू की झप्पी
(मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.)
ऐसा नहीं कि हम हिन्दुस्तानियों ने गहक कर गले मिलना मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. से सीखा है. वो तो हमारी संस्कृति में पहले से शामिल रहा है. और यूँ भी मेरी पीढ़ी को आत्म-अभिव्यक्ति की शारीरिक भंगिमाएं पसन्द रही हैं. आख़िर किसी वजह के चलते ही अपनी देह-भाषा से स्वयं को अभिव्यक्त करने वाला नायक शाहरुख़ ख़ान हमारे दौर का सबसे बड़ा नायक हुआ होगा. लेकिन इस शहर की धकमपेल में हम उस अहसास को कहीं भूल गए थे. और यही करते हैं राजू हिरानी हर बार – हमारे लिए सबसे कीमती अहसास, हमें मिलीं नेमतें जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं, वे हमें फिर से याद दिला देते हैं. ’मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस’ से निकली ’जादू की झप्पी’ ने पूरे समाज में तेज़ी से अपनी जगह बनाई और मुन्नाभाई-सर्किट एक ही झटके में घर-घर में पहचाना नाम हो गए.
’मुन्नाभाई एम.बी,बी.एस.’ न सिर्फ़ मशीन सी दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगी में सुकून की तलाश के विचार से निकली थी बल्कि वो उन बहुत से विचारों को अपने गुलदस्ते में इकट्ठा कर लाई थी जिन्हें पिछले दिनों में हम बहुत मिस कर रहे थे. दोस्ती एक ऐसा ही विचार था. मुन्ना-सर्किट की दोस्ती का पाठ ऐसा ही एक विचार था. ’जादू की झप्पी’ एक ऐसा ही विचार बनकर उभरा जिसमें बराबरी का भाव प्रधान था. कभी वो किसी टूटे दिल को दिलासा था तो कभी किसी बड़ी खुशी का जश्न. हमेशा इस एक एक्ट ने लोगों को ही नहीं दिलों को भी आपस में जोड़ा है.
गांधीगिरी
(लगे रहो मुन्नाभाई)
क्या आपने कभी सोचा था कि अपने प्यार को पाने का सबसे अच्छा उपाय आपको गांधी जी से मिल सकता है? या शादी के लिए एक सही लड़का ढूंढ़ते हुए एक लड़की को गांधी जी की सीख सबसे ज़्यादा काम आ सकती है? या गांधी जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर की बरसों से अटकी पेंशन उन्हें दिलवा सकते हैं? नहीं ना. हमने भी नहीं सोचा था. लेकिन तभी सीन में राजू हीरानी आते हैं. फिर से एक मैजिकल मंत्र के साथ. आज़ाद भारत में गांधी को हमने एक ऊँचे आसन पर बिठा दिया था और उनकी बताई बातें भूल गए थे. गांधी इस तरह आम आदमी के सुख-दुख के साथी बन जायेंगे यह हमने सोचा ही कहाँ था.
लोगों ने गांधीगिरी का जमकर उपयोग किया. भ्रष्ट राजनीतिग्यों और नौकरशाहों को ’गेट वेल सून’ के कार्ड भेजे जाने लगे और असहयोग फिर से विरोध का मंत्र बन गया. लेकिन इन बड़े आडम्बरों से इतर भी ’गांधीगिरी’ आज की युवा पीढ़ी का गांधी के कुछ बेसिक आदर्शों से पहला परिचय था. आपसी संबंधों में सच बोलना कई बार कितना कारगर साबित हो सकता है यह गांधीगिरी का दिया नुस्खा था. हमने प्रेम में सच्चाई का महत्व समझा. हमने रिश्तों में ईमानदारी का महत्व समझा. और इतना भी कोई फ़िल्म सिखा दे तो क्या कम है.
आल इज़ वैल
(थ्री ईडियट्स)
हमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो? आखिर शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? ’थ्री ईडियट्स’ ने कुछ ऐसा किया कि यह वाजिब सवाल शिक्षाशास्त्रियों की बैठकों से निकलकर हमारे बीच आ गया. कुछ नई ज़िन्दगियाँ जो अपने सपनों के पीछे भागना तो चाहती थीं, लेकिन हिचक रही थीं. अचानक उन्हें समझ आया कि अपने सपनों के पीछे भागने में कोई जोखिम नहीं, दरअसल ज़िन्दगी जीने का यही सबसे सुरक्षित विकल्प है. बड़े ही मनोरंजक अंदाज में ’थ्री ईडियट्स’ हमें परेशानियों में बेफ़िकर रहने का मंत्र सिखाती रही. ’आल इज़ वैल’ नई पीढ़ी का मैजिक मंत्र बन गया.
अब मैं भी फ़िल्मकार!
(लव, सेक्स और धोखा)
जयपुर में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कहानीकार रामकुमार सिंह का कहना है कि डिजिटल सिनेमा ख़जाने की चाबी है. कल तक वे सिर्फ़ सिनेमा देखते थे, आज उन्होंने खुद अपनी फ़ीचर फ़िल्म बनाना शुरु कर दिया है. वजह – एक ’लव, सेक्स और धोखा’ हो सकती है तो और क्यों नहीं? अपने कथ्य से अलग, सिर्फ़ तकनीक के क्षेत्र में इस एक फ़िल्म ने मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री के सिस्टम को सीधी चुनौती दी है. बॉलीवुड का सिनेमा सालों से दो मुख्य स्तंभों पर खड़ा है, दो वजहें जिनकी वजह से फ़िल्म निर्माण बड़ी पूँजी का खेल बना हुआ है. एक बड़े स्टार जिनकी फ़ीस आसमान छूती है और दूसरा सिनेमा बनाने में आने वाला महँगा खर्चा. और इन्हीं दो वजहों से आम आदमी उसे देख-सराह तो पाता है लेकिन उसकी भीतर प्रवेश करना उसके लिए अब भी टेढ़ी खीर है.
लेकिन ’लव, सेक्स और धोखा’ ने एक झटके में इन दोनों स्तंभों को हिला दिया है. पूरी तरह नई स्टार कास्ट और मूवी कैमरा के डिजिटल कैमरा में बदलते ही सारा खेल बदल जाता है. अब लोग अपने आप को कैमरे के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री हो या फ़ीचर फ़िल्म, सभी अब अचानक निर्माण में सर्व-सुलभ होने जा रही हैं. ’सिटीज़न जर्नलिस्ट’ जैसे कैम्पेन्स में आम नागरिक ने अपनी बात कहने के लिए खुद कैमरा उठा लिया है. इसी डिजिटल कैमरे की वजह से आज देश के दूर-दराज़ इलाकों से चमत्कारिक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में सामने आ रही हैं. अनुराग कश्यप अपनी अगली फ़िल्म ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ इसी फ़ॉरमैट में शूट कर रहे हैं और अनेक नए फ़िल्मकार इस माध्यम में अपने लिए शुरुआत का सबसे अच्छा रास्ता तलाश रहे हैं. जल्द ही सिनेमा बनाने का संस्कार बदलने वाला है और ’लव, सेक्स और धोखा’ इसका शुरुआती इशारा भर है.
एंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट
(माई नेम इज़ ख़ान)
यह फ़िल्म अपनी रिलीज़ के पहले ही चर्चाओं में ऊपर पहुँच गई थी. फ़ेसबुक पर ’आई सपोर्ट एसआरके एंड रिलीज़ ऑफ़ एमएनआईके : ए स्टैन्ड अगेंस्ट शिव सेना’ जैसे ग्रुप्स बन गए और उनकी सदस्य संख्या हज़ारों में थी. शाहरुख़ इस देश के बड़े आइकन हैं. धार्मिक कट्टरवादिता और अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ उनका स्टैन्ड लेना बड़ी बात रही. हिन्दुस्तान में पब्लिक सेलिब्रिटीज़ का किसी विवाद के मुद्दे पर स्टैन्ड लेना चलन में नहीं रहा है. लेकिन पिछले एक-दो साल में कई बड़े सेलिब्रिटी अपने आप को सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे हैं. शाहरुख उनमें आगे हैं. बहुत से लोग अब भी विवाद के मुद्दों पर राय देने से बचते हैं. लेकिन कुछ तो बदला है, लोग अपनी राय जगज़ाहिर करने लगे हैं. और यह बदलाव है तो अच्छा बदलाव है.
अभिव्यक्ति के इन नए माध्यमों में ’माई नेम इज़ ख़ान’ को लेकर जितने अभियान चले, वो एक नई शुरुआत थी. इससे फ़िल्म निर्माताओं ने भी बहुत कुछ सीखा. अब तो बड़े निर्माता-निर्देशक भी पहले अपने प्रचार अभियान में इन नए माध्यमों को टारगेट करते हैं. फ़िल्म को किसी सोशल कॉज़ से जोड़ने की कोशिश रहती है और उस अभियान को समाज में स्वीकार्यता दिलवाना लक्ष्य होता है. अब तो धीरे-धीरे फ़िल्म के प्रचार अभियान का पूरा नक्शा ही बदलता जा रहा है.
:- मूलत: चार जुलाई के रविवारीय नवभारत टाइम्स में ’स्पेशल स्टोरी’ के तहत प्रकाशित.
































