सात फ़िल्में, सात संस्कार

सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का ही माध्यम नहीं. अपनी हरदिल अज़ीज़ कहानियों की बेपरवाह हंसी-ठिठोली के बीच यह देखने वाले के मन में कहीं गहरे कोई विचार छोड़ जाता है. और बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि समाज के एक बड़े हिस्से में किसी फ़िल्म का कोई एक ही प्रसंग, कोई एक ही बात, कोई एक नुस्खा असर कर जाए. पिछले सालों में आई ऐसी ही कुछ फ़िल्में और उनकी वजह से समाज में आया बदलाव इस बार हमारी नज़र में है. सात अलग-अलग फ़िल्मों के ज़रिए हम उन सात संस्कारों को समझने की कोशिश करेंगे जिनके समाज में आगमन के पीछे कहीं इन्हीं फ़िल्मों से निकली कोई बात, कोई घटना, कोई विचार था.


कैन्डल लाइट मार्च

(रंग दे बसंती)

rang de basantiकोई फ़िल्म कैसे एक फ़िनोमिना में बदल जाती है, ’रंग दे बसंती’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. ’रंग दे बसंती’ का होना शहरी युवा वर्ग के लिए एक बड़ी घटना थी. लम्बे समय बाद किसी फ़िल्म का ऐसा प्रभाव देखा गया कि उसे आधार बनाकर लोग अपने आस-पास के माहौल को बदलने का प्रयास शुरु कर दें. शहरी युवा वर्ग में कैन्डल लाइट मार्च विरोध के एक सर्वमान्य तरीके के रूप में उभरा. आखिर यह शहरी युवा को न्याय की मांग से जुड़ने का मौका उपलब्ध कर रहा था. जेसिका लाल हत्याकांड से लेकर रुचिका की आत्महत्या के मामले तक इस माध्यम से न्याय की आवाज़ बुलन्द की गई. हालांकि बाद के दिनों में इस ’कैन्डल लाइट मार्च’ की बार-बार पुनरावृत्ति पर इसकी आलोचना भी हुई और इसे ’भद्रजनों की कैन्डल लाइट मार्च पार्टी’ जैसे नाम भी दिए गए.

विरोध के इन तरीकों से अलग ’रंग दे बसंती’ भ्रष्टाचार की समस्या के खिलाफ़ आम युवा में जागरुकता लाई. बहुत से लोग सत्येन्द्र दुबे और मंजुनाथ जैसे नायकों की कुर्बानी के आलोक में इस फ़िल्म के असर का विश्लेषण करते हैं. युवा ने सवाल करना सीखा. आज हमारे पास भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो ’सूचना के अधिकार’ जैसा हथियार है उसे हासिल करने के पीछे एक लम्बा जन आन्दोलन है. ’रंग दे बसंती’ ने इस चेतना को समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलवाने में मदद की.


बच्चे मन के सच्चे

(तारे ज़मीन पर)

taare zameen parएक जोड़ा पति-पत्नी (अमोल गुप्ते और दीपा भाटिया) की लिखी एक छोटी सी कहानी से शुरु हुआ इस फ़िल्म का सफ़र कई आयामों से होता हुआ गुज़रा. सचेत अभिनेता आमिर ख़ान ने इसे इसके मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाया. लेकिन जिस तरह यह फ़िल्म हमारे समाज के सबसे मुलायम और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से – ’बच्चे’ के मन की गहराईयों को हमारे सामने लाई, यह देखना एक विहंगम अनुभव था. सिर्फ़ एक डिस्लेक्सिया रोग के प्रति चेतना की ही बात नहीं, इस फ़िल्म ने हमारे समाज को अपनी नई पौध को देखने और उनके हुनर को पहचानने का नया नज़रिया दिया. ’तारे ज़मीन पर’ ने माता-पिताओं को उनकी ही उम्मीदों के बोझ तले दबे, अपनी पहचान तलाशते उनके बच्चों से फिर से मिलवा दिया.

यह स्कूली शिक्षा के बारे में भी एक सबक था. आने वाले दौर में कई स्कूलों ने अध्यापन में नई और रचनात्मक तकनीकों को शामिल किया और पढ़ाई को बच्चे के लिए और मज़ेदार बनाया. बस्ते का बोझ कम करने के लिए बहुत से सकारात्मक प्रयास हुए. एन.सी.ई.आर.टी. ने प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति की शिफ़ारिशों को लागू करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण  का नया मसौदा तैयार किया. बेशक यह सारे परिवर्तन एक फ़िल्म की वजह से नहीं आए हों लेकिन ’तारे ज़मीन पर’ का सकारात्मक योगदान भुलाया नहीं जा सकता.


जादू की झप्पी

(मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.)

munnabhai MBBSऐसा नहीं कि हम हिन्दुस्तानियों ने गहक कर गले मिलना मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. से सीखा है. वो तो हमारी संस्कृति में पहले से शामिल रहा है. और यूँ भी मेरी पीढ़ी को आत्म-अभिव्यक्ति की शारीरिक भंगिमाएं पसन्द रही हैं. आख़िर किसी वजह के चलते ही अपनी देह-भाषा से स्वयं को अभिव्यक्त करने वाला नायक शाहरुख़ ख़ान हमारे दौर का सबसे बड़ा नायक हुआ होगा. लेकिन इस शहर की धकमपेल में हम उस अहसास को कहीं भूल गए थे. और यही करते हैं राजू हिरानी हर बार – हमारे लिए सबसे कीमती अहसास, हमें मिलीं नेमतें जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं, वे हमें फिर से याद दिला देते हैं. ’मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस’ से निकली ’जादू की झप्पी’ ने पूरे समाज में तेज़ी से अपनी जगह बनाई और मुन्नाभाई-सर्किट एक ही झटके में घर-घर में पहचाना नाम हो गए.

’मुन्नाभाई एम.बी,बी.एस.’ न सिर्फ़ मशीन सी दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगी में सुकून की तलाश के विचार से निकली थी बल्कि वो उन बहुत से विचारों को अपने गुलदस्ते में इकट्ठा कर लाई थी जिन्हें पिछले दिनों में हम बहुत मिस कर रहे थे. दोस्ती एक ऐसा ही विचार था. मुन्ना-सर्किट की दोस्ती का पाठ ऐसा ही एक विचार था. ’जादू की झप्पी’ एक ऐसा ही विचार बनकर उभरा जिसमें बराबरी का भाव प्रधान था. कभी वो किसी टूटे दिल को दिलासा था तो कभी किसी बड़ी खुशी का जश्न. हमेशा इस एक एक्ट ने लोगों को ही नहीं दिलों को भी आपस में जोड़ा है.


गांधीगिरी

(लगे रहो मुन्नाभाई)

Lage_Raho_Munna_Bhai-Gandhiक्या आपने कभी सोचा था कि अपने प्यार को पाने का सबसे अच्छा उपाय आपको गांधी जी से मिल सकता है? या शादी के लिए एक सही लड़का ढूंढ़ते हुए एक लड़की को गांधी जी की सीख सबसे ज़्यादा काम आ सकती है? या गांधी जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर की बरसों से अटकी पेंशन उन्हें दिलवा सकते हैं? नहीं ना. हमने भी नहीं सोचा था. लेकिन तभी सीन में राजू हीरानी आते हैं. फिर से एक मैजिकल मंत्र के साथ. आज़ाद भारत में गांधी को हमने एक ऊँचे आसन पर बिठा दिया था और उनकी बताई बातें भूल गए थे. गांधी इस तरह आम आदमी के सुख-दुख के साथी बन जायेंगे यह हमने सोचा ही कहाँ था.

लोगों ने गांधीगिरी का जमकर उपयोग किया. भ्रष्ट राजनीतिग्यों और नौकरशाहों को ’गेट वेल सून’ के कार्ड भेजे जाने लगे और असहयोग फिर से विरोध का मंत्र बन गया. लेकिन इन बड़े आडम्बरों से इतर भी ’गांधीगिरी’ आज की युवा पीढ़ी का गांधी के कुछ बेसिक आदर्शों से पहला परिचय था. आपसी संबंधों में सच बोलना कई बार कितना कारगर साबित हो सकता है यह गांधीगिरी का दिया नुस्खा था. हमने प्रेम में सच्चाई का महत्व समझा. हमने रिश्तों में ईमानदारी का महत्व समझा. और इतना भी कोई फ़िल्म सिखा दे तो क्या कम है.


आल इज़ वैल

(थ्री ईडियट्स)

3-idiotsहमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो? आखिर शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? ’थ्री ईडियट्स’ ने कुछ ऐसा किया कि यह वाजिब सवाल शिक्षाशास्त्रियों की बैठकों से निकलकर हमारे बीच आ गया. कुछ नई ज़िन्दगियाँ जो अपने सपनों के पीछे भागना तो चाहती थीं, लेकिन हिचक रही थीं. अचानक उन्हें समझ आया कि अपने सपनों के पीछे भागने में कोई जोखिम नहीं, दरअसल ज़िन्दगी जीने का यही सबसे सुरक्षित विकल्प है. बड़े ही मनोरंजक अंदाज में ’थ्री ईडियट्स’ हमें परेशानियों में बेफ़िकर रहने का मंत्र सिखाती रही. ’आल इज़ वैल’ नई पीढ़ी का मैजिक मंत्र बन गया.


अब मैं भी फ़िल्मकार!

(लव, सेक्स और धोखा)

जयपुर में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कहानीकार रामकुमार सिंह का कहना है कि डिजिटल सिनेमा ख़जाने की चाबी है. कल तक वे सिर्फ़ सिनेमा देखते थे, आज उन्होंने खुद अपनी फ़ीचर फ़िल्म बनाना शुरु कर दिया है. वजह – एक ’लव, सेक्स और धोखा’ हो सकती है तो और क्यों नहीं? अपने कथ्य से अलग, सिर्फ़ तकनीक के क्षेत्र में इस एक फ़िल्म ने मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री के सिस्टम को सीधी चुनौती दी है. बॉलीवुड का सिनेमा सालों से दो मुख्य स्तंभों पर खड़ा है, दो वजहें जिनकी वजह से फ़िल्म निर्माण बड़ी पूँजी का खेल बना हुआ है. एक बड़े स्टार जिनकी फ़ीस आसमान छूती है और दूसरा सिनेमा बनाने में आने वाला महँगा खर्चा. और इन्हीं दो वजहों से आम आदमी उसे देख-सराह तो पाता है लेकिन उसकी भीतर प्रवेश करना उसके लिए अब भी टेढ़ी खीर है.

love-sex-aur-dhokhaलेकिन ’लव, सेक्स और धोखा’ ने एक झटके में इन दोनों स्तंभों को हिला दिया है. पूरी तरह नई स्टार कास्ट और मूवी कैमरा के डिजिटल कैमरा में बदलते ही सारा खेल बदल जाता है. अब लोग अपने आप को कैमरे के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री हो या फ़ीचर फ़िल्म, सभी अब अचानक निर्माण में सर्व-सुलभ होने जा रही हैं. ’सिटीज़न जर्नलिस्ट’ जैसे कैम्पेन्स में आम नागरिक ने अपनी बात कहने के लिए खुद कैमरा उठा लिया है. इसी डिजिटल कैमरे की वजह से आज देश के दूर-दराज़ इलाकों से चमत्कारिक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में सामने आ रही हैं. अनुराग कश्यप अपनी अगली फ़िल्म ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ इसी फ़ॉरमैट में शूट कर रहे हैं और अनेक नए फ़िल्मकार इस माध्यम में अपने लिए शुरुआत का सबसे अच्छा रास्ता तलाश रहे हैं. जल्द ही सिनेमा बनाने का संस्कार बदलने वाला है और ’लव, सेक्स और धोखा’ इसका शुरुआती इशारा भर है.


एंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट

(माई नेम इज़ ख़ान)

my-name-is-khanयह फ़िल्म अपनी रिलीज़ के पहले ही चर्चाओं में ऊपर पहुँच गई थी. फ़ेसबुक पर ’आई सपोर्ट एसआरके एंड रिलीज़ ऑफ़ एमएनआईके : ए स्टैन्ड अगेंस्ट शिव सेना’ जैसे ग्रुप्स बन गए और उनकी सदस्य संख्या हज़ारों में थी. शाहरुख़ इस देश के बड़े आइकन हैं. धार्मिक कट्टरवादिता और अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ उनका स्टैन्ड लेना बड़ी बात रही. हिन्दुस्तान में पब्लिक सेलिब्रिटीज़ का किसी विवाद के मुद्दे पर स्टैन्ड लेना चलन में नहीं रहा है. लेकिन पिछले एक-दो साल में कई बड़े सेलिब्रिटी अपने आप को सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे हैं. शाहरुख उनमें आगे हैं. बहुत से लोग अब भी विवाद के मुद्दों पर राय देने से बचते हैं. लेकिन कुछ तो बदला है, लोग अपनी राय जगज़ाहिर करने लगे हैं. और यह बदलाव है तो अच्छा बदलाव है.

अभिव्यक्ति के इन नए माध्यमों में ’माई नेम इज़ ख़ान’ को लेकर जितने अभियान चले, वो एक नई शुरुआत थी. इससे फ़िल्म निर्माताओं ने भी बहुत कुछ सीखा. अब तो बड़े निर्माता-निर्देशक भी पहले अपने प्रचार अभियान में इन नए माध्यमों को टारगेट करते हैं. फ़िल्म को किसी सोशल कॉज़ से जोड़ने की कोशिश रहती है और उस अभियान को समाज में स्वीकार्यता दिलवाना लक्ष्य होता है. अब तो धीरे-धीरे फ़िल्म के प्रचार अभियान का पूरा नक्शा ही बदलता जा रहा है.

:- मूलत: चार जुलाई के रविवारीय नवभारत टाइम्स में ’स्पेशल स्टोरी’ के तहत प्रकाशित.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

राँझा राँझा

प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार  द्वारा फ़िल्म  ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए…

gulzarबड़ा मज़ेदार किस्सा है…

शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट भी जैसे स्त्री रूपा है. रेखा अपनी आवाज़ को बह जाने देती हैं. बियाबान में भटकने देती हैं. उसे अब फ़िकर नहीं ज़माने की, परवाह नहीं रुसवाइयों की. कहना है हीर का कि उस राँझा का नाम लेते-लेते अब मैं खुद राँझा हो गई हूँ. अरे ओ ज़माने, अब मुझे हीर नहीं, राँझा कहकर ही बुलाया कर…

राँझा राँझा करदी वे मैं…

जावेद अली की आवाज़ साफ़ है, खड़ी एकदम. जैसे उसे ज़माने की परवाह हो, किसी की नज़रों में आने से दिल धड़कता हो. पुरुष स्वर थोड़ी ज़्यादा व्यावहारिकता समझता है. ’दिल अगर आ भी गया, वो तेरा शहर नहीं’. नदी होना बस स्त्री के ही हिस्से है. वे दूसरी तरफ़ इसके सिरे को सम्भाले रखते हैं. रोक लो इस उफनते समन्दर को नहीं तो ये अपने साथ हम दोनों को भी बहा ले जायेगा..

राँझा राँझा ना कर हीरे जग बदनामी होए,
पत्ती पत्ती झर जावे पर खुशबू चुप न होए.

गुलज़ार की दुनिया में खुशबू ’कम न होने’ की बजाय ’चुप नहीं होती’ है. बड़ा मज़ेदार है ये देखना कि कैसे आवाज़ की ये खूबियाँ बोल के भावों से मिल जाती हैं और अद्भुत तालमेल पैदा करती हैं. स्त्री स्वर उसकी चोरी पकड़ लेता है, “देखना पकड़ा गया, इश्क़ में जकड़ा गया” और पुरुष स्वर अपनी प्यारी सी बेचारगी कुछ यूँ बताता है, “आँख से हटती नहीं, अरे हटती नहीं, अरे हटती नहीं…”

शुरुआत में पुरुष बोल सीख वाले, देख, संभल कर चल, वाले हैं. और जहाँ पुरुष स्वर के बोलों के भाव भटकने लगते हैं, ठीक वहीं पुरुष स्वर धीरे-धीरे ये ओढ़ी हुई गम्भीरता छोड़ता है.

बिना तेरे रातें, अरे रातें, क्यों लम्बी लगती हैं,
कभी तेरा गुस्सा, तेरी बातें, क्यों अच्छी लगती हैं.

“ये ढलते कोयले, अरे कोयले, अब रखना मुश्किल है…” और अंत में इन बोलों के साथ वो भी उसी नदी की धारा में बह जाता है जिसे स्त्री रूपा हवाओं की सनसनाहट, अनुराधा का रगड़ खाता हुआ आलाप और रेखा का स्त्री स्वर इस गीत के शुरु में अपने साथ लेकर आए थे.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

upयहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.

*****

एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा वो है जब अपना हीरो हीरोइन को अपने घर का एक कमरा किराए पर देने की जुगत भिड़ा रहा है. वो अपने घर की खूबियाँ कुछ यूं बताता है. “क्या कमरा है मेमसाहब! कमरा. कमरे के आगे टैरेस. टेरेस के आगे गार्डन. गार्डन के आगे समन्दर.” वाकई अच्छा नज़ारा है, है ना! लेकिन सोचो कि अगर इस टैरेस और गार्डन को हटाकर वहाँ एक ऊँची इमारत खड़ी कर दी जाए तो इस घर में रहने वालों को कैसा लगेगा? सीन कुछ अच्छा नहीं है, है ना.

अच्छा बताओ, अगर तुम्हें पता चले कि इस घर में रहने वाला एक बुड्ढा है और वो भी अकेला, तब? बुरा लगेगा ना उसके लिए सोचकर. यहाँ तक तो ’अप’ एक उदास फ़िल्म है (रोना भी आता है बार-बार) लेकिन इसके बाद वो खड़ूस बुड्ढा जो करता है वो तुममें से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. क्या बताऊँ? वो अपने घर के ऊपर ढेर सारे हीलियम से भरे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है! बताओ, है ना मज़ेदार बात! अब तुम कहोगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? अरे भई आखिर ’अप’ कार्टून फ़िल्म है और कार्टून फ़िल्म में उड़ने के लिए खुला आसमान होता है सामने. सो कुछ भी हो सकता है.

पिक्सार एनिमेशन की बनाई फ़िल्म ’अप’ कहानी है एक खड़ूस से दिखते बुड्ढ़े कार्ल फ़्रेडरिकसन की जिसे बचपन से ही रोमांचकारी यात्राओं पर जाने का बहुत चाव है. उसकी पत्नी और वो हमेशा साथ उस सपनीली दुनिया में जाने का सपना देखते हैं जिसका नाम है ’पैराडाइज़ फ़ॉल्स’ और जो दक्षिण अमेरिका में कहीं है. अफ़सोस कि मि. फ्रेडरिकसन की पत्नी इस सपने के पूरा होने से पहले ही उन्हें छोड़कर चली जाती हैं. अब कार्ल फ्रेडरिकस अकेले हैं और उनके घर के आस-पास बड़ी इमारतें बन रही हैं. सभी उन्हें वृद्धाआश्रम चले जाने की सलाह देते हैं. लेकिन मि. फ्रेडरिकसन अपने घर को छोड़कर नहीं जाना चाहते. और फिर होता यूँ है कि एक दिन मि. फ्रेडरिकसन उड़ जाते हैं अपने घर के साथ आसमान में. अपने सपनों की दुनिया की ओर…

लेकिन एक दिक्कत है. गलती से उनके साथ एक छोटा सा लड़का रसेल भी आ गया है. रसेल भी रोमांचकारी यात्राओं का शौकीन है. अब दोनों उड़ रहे हैं ’पैराडाइज़ फ़ॉल’ की ओर. रास्ते में आंधी-तूफ़ान है, बड़ी बाधाएं हैं. शुरुआत में मि. फ्रेडरिकसन बार-बार रसेल से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं. लेकिन धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो जाती है. मुसीबतों को पार करते वे वहाँ पहुँचते हैं और आखिर उन्हें दूर पहाड़ के दूसरे कोने पर ’पैराडाइज़ फॉल’ नज़र आता है. लेकिन उससे पहले अभी बहुत कुछ बाकी है. उन्हें एक रंग-बिरंगी, ख़ूब बड़ी सारी चिड़िया मिलती है रास्ते में. अपना नन्हा उस्ताद रसेल उसका नाम रखता है केविन. उसे चॉकलेट खिलाता है और उसका दोस्त बन जाता है. केविन तलाश में है अपने खोये हुए बच्चों की. रसेल उसकी मदद करना चाहता है.

कहानी अभी और भी है. फिर उन्हें मिलता है एक बोलने वाला कुत्ता, नाम है डग. डग के गले में ऐसा पट्टा है जिससे कुत्ते भी इंसानों की आवाज़ में बोल सकते हैं. उसे ये पट्टा पहनाया है चार्ल्स मंट्स ने. पता चलता है कि चार्ल्स वही खोया हुआ हीरो है जिससे प्रभावित होकर बचपन में मि. फ्रेडरिकसन ने रोमांचकारी यात्राओं के सपने देखे थे. चार्ल्स उन्हें अपने उड़ने वाले गुब्बारेनुमा जहाज़ में दावत के लिए बुलाता है. यहाँ दावत का सारा इंतज़ाम बोलने वाले कुत्तों के हाथों में है.

बातों-बातों में पता चलता है कि चार्ल्स केविन को पकड़ना चाहता है और उसे अपने साथ सबूत के तौर पर वापस ले जाना चाहता है. लेकिन रुको, मि. फ्रेडरिकसन और रसेल ऐसा नहीं होने देंगे. वो केविन को उसके बच्चों तक पहुँचायेंगे. और यहाँ से शुरु होता है आसमान में उठा-पटक का एक रोमांचकारी सफर. जिसमें एक ओर हैं चार्ल्स के बोलने वाले कुत्तों की फ़ौज और दूसरी तरफ़ है मि. फ्रेडरिकसन, रसेल, केविन और डग की चतुर चौकड़ी. ये चतुर चौकड़ी चार्ल्स को ख़ूब नाच नचाती है और आखिर में केविन अपने प्यारे बच्चों तक पहुँच जाती है. मि. फ्रेडरिकसन रसेल के साथ वापस अपनी दुनिया लौट जाते हैं और रसेल के प्यारे दादा और डग के मास्टर बन जाते हैं.

*****

क्या तुम जानते हो?

’अप’ को इस साल का सर्वश्रेष्ठ एनीमेशन फ़िल्म का ऑस्कर पुरस्कार मिला है.

– इसके साथ ही ’अप’ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए भी नामांकित हुई थी. यह सम्मान पाने वाली ’अप’ सिर्फ़ दूसरी एनीमेशन फ़िल्म है. इस सूची का पहला नाम थी फ़िल्म ’ब्यूटी एंड द बीस्ट’ जो सन 1991 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी.

– फ़िल्म के निर्देशक को घर के ऊपर गुब्बारे लगा घर सहित उड़ जाने वाला मज़ेदार ख़्याल दरअसल असल ज़िन्दगी की परेशानियों से ऊबकर आया था.

– मि. फ्रेडरिकसन का किरदार हॉलीवुड के ही मशहूर अदाकार स्पेंसर ट्रेसी जैसा दिखता है. उनकी फ़िल्म ‘Guess who’s coming to dinner’ मेरी आल टाइम फ़ेवरेट फ़िल्म है.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

बुला रहा है कोई मुझको, लुभा रहा है कोई.

Leaving Homeबात पुरानी है, नब्बे का दशक अपने मुहाने पर था. अपने स्कूल के आख़िरी सालों में पढ़ने वाला एक लड़का राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में कैसेट रिकार्ड करने की दुकान खोलकर बैठे दुकानदार से कुछ अजीब अजीब से नामों वाले गाने माँगा करता. जो उम्मीद के मुताबिक उसे कभी नहीं मिला करते. दुकानदार उसे गुस्सैल नज़रों से घूरता. इंडियन ओशियन और यूफ़ोरिया को मैं तब से जानता हूँ. उसे जयपुर शहर में (जहाँ वो अपनी छुट्टियों में जाया करता) अजमेरी गेट के पास वाली एक छोटी सी गली बहुत पसन्द थी. इसलिए क्योंकि ट्रैफ़िक कंट्रोल रूम ’यादगार’ से घुसकर टोंक रोड को नेहरू बाज़ार से जोड़ने वाली यह गली उसे उसकी पसन्दीदा तीन चीज़ें देती थी. एक – क्रिकेट सम्राट, दो – इंडियन ओशियन और यूफ़ोरिया की ऑडियो कैसेट्स और तीसरी गुड्डू की मशीन वाली सॉफ़्टी. और अगर कभी वो जयपुर न जा पाता तो वो अपनी माँ के जयपुर से लौटकर आने का इंतज़ार करता. और उसकी माँ उसे कभी निराश नहीं करतीं.

कितने दूर निकल आए हैं हम अपने-अपने घरों से. कल ओडियन, बिग सिनेमास में जयदीप वर्मा की बनाई ’लीविंग होम – लाइफ़ एंड म्यूज़िक ऑफ़ इंडियन ओशियन’ देखने हुए मुझे यह अहसास हुआ. ’लीविंग होम’ देखते हुए मैंने यह लम्बा सफ़र एक बार फिर से जिया. (और फ़िल्म के इंटरवल में आए ’वीको टरमरिक’ के विज्ञापन तो इसमें असरदार भूमिका निभा ही रहे थे!) और सच मानिए, मैं उल्लासित था. पहली बार अपने बीते कल को याद कर नॉस्टैल्जिक होते हुए भी मैं उदास बिलकुल नहीं था, प्रफ़ुल्लित हो रहा था. और यह असर था उस संगीत का जिसे सुनकर आप भर उदासी में भी फिर से जीना सीख सकते हैं. सीख सकते हैं छोड़ना, आगे बढ़ जाना. सीख सकते हैं भूलना, माफ़ करना. सीख सकते हैं खड़े रहना, आख़िर तक साथ निभाना.

’लीविंग होम’ किरदारों की कहानी नहीं है. यह उन किरदारों द्वारा रचे संगीत की कहानी है. इंडियन ओशियन के द्वारा रचित हर गीत का अपना व्यक्तित्व है, अपना स्वतंत्र अस्तित्व है. इसीलिए फ़िल्म के लिए नए लेकिन बिलकुल माफ़िक कथा संरचना प्रयोग में निर्देशक जयदीप वर्मा इसे इंडियन ओशियन की कहानी द्वारा नहीं, उनके द्वारा रचे गीतों की कहानी से आगे बढ़ाते हैं. तो यहाँ जब ’माँ रेवा’ की कहानी आती है तो हम उस गीत के साथ नर्मदा घाटी के कछारों पर पहुँच जाते हैं और उस लड़के की शुरुआती कहानी से परिचित होते हैं जिसे आज पूरी दुनिया राहुल राम के नाम से जानती है. ’डेज़र्ट रेन’ की कहानी के साथ सुश्मित की कहानी खुलती है जो हमेशा से इंडियन ओशियन का आधार स्तंभ रहा है. ’कौन’ की कहानी एक नौजवान कश्मीरी लड़के की कहानी है. एक पिता हमें बात बताते हैं उन दिनों की जब एक पूरी कौम को उनके घर से बेदखल कर दिया गया था. और इसीलिए जब अमित किलाम कहते हैं कि मैं इसीलिए शुक्रगुज़ार हूँ भगवान का कि इतना सब होते हुए भी मेरे भीतर कभी वो साम्प्रदायिक विद्वेष नहीं आया, हमें भविष्य थोड़ा ज़्यादा उजला दिखता है. आगे जाकर ’झीनी’ की कथा है और अशीम अपने बचपन के दिनों के अकेलेपन को याद करते धूप के चश्मे के पीछे से अपनी नम आँखें छुपाते हैं. सुधीर मिश्रा कहते हैं कि अशीम को सुनते हुए मुझे कुमार गंधर्व की याद आती है. संयोग नहीं है कि इन दोनों ही गायकों ने कबीर की कविता को ऐसे अकल्पनीय क्षेत्रों में स्थापित किया जहाँ उनकी स्वीकार्यता संदिग्ध थी. निर्गुण काव्य की ही तरह, इंडियन ओशियन भी एक खुला मंच है संगीत का. जहाँ विश्व के किसी भी हिस्से के संगीत की आमद का स्वागत होता है.

यह फ़िल्म डॉक्यूमेंट्री के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण एंगल के साथ आई है. आमतौर पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में मूलत: अपने निर्देशक के दिमाग में आए एक अदद ख़पती विचार की उपज होती हैं. और ऐसे में निर्देशक ही कहानी को विभिन्न तरीकों से आगे बढ़ाते हैं. लेकिन ’लीविंग होम’ की ख़ास बात है कि निर्देशक यहाँ सायास लिए गए फ़ैसले के तहत खुद पीछे हट जाता है और अपनी कहानी को बोलने देता है. न ख़ुद बीच में कूदकर कथा सूत्र को आगे बढ़ाने की कोई कोशिश है और न ही कोई वॉइस-ओवर. यहाँ तक की व्यक्तिगत बातचीत भी इस तरह एडिट की गई है कि सवाल पूछने वाला कभी नज़र नहीं आता. बेशक यह सायास है. जैसा दिबाकर बनर्जी की हालिया फ़िल्म में एक किरदार का संवाद है, “डाइरेक्टर को कभी नहीं दिखना चाहिए, डाइरेक्टर का काम दिखना चाहिए.” जयदीप वर्मा का काम बोलता है.

हाँ, एक छोटी सी नाराज़गी भी है मेरी. जिस तरह शुरुआत में फ़िल्म दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी की तरह घूमती, उसकी नज़र से शहर को देखती करोलबाग की ओर बढ़ती है, वह मुझे बाँध लेता है. इंडियन ओशियन से हमारी पहली मुलाकात होती है. लेकिन फिर फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में ही हम दिल्ली के कई नामी चेहरों को इंडियन ओशियन की तारीफ़ करते (जैसे उन्हें सर्टिफ़िकेट देते) देखते हैं. उनमें से कई बाद में फ़िल्म में लौटकर आते हैं, कई नहीं. यह शुरुआती मिलना-मिलाना मुझे अखरा. हम इंडियन ओशियन को सीधे जानना ज़्यादा पसन्द करेंगे (या कहें जानते हैं) या फिर उनके संगीत के माध्यम से, जो आगे फ़िल्म करती है. न कि किसी और ’सेलिब्रिटी’ के माध्यम से. इंडियन ओशियन को अपने चाहने वालों के बीच (जो इस फ़िल्म के संभावित दर्शक होने हैं) आने के लिए मीडिया या सिनेमा के सहारे की कोई ज़रूरत नहीं है. हो सकता है शायद यह उन लोगों को फ़िल्म से जोड़ने का एक प्रयास हो जो सीधे इंडियन ओशियन के संगीत से नहीं बँधे हैं. अगर ऐसा है तो मैं भी इस प्रयोग के सफल होने की पूरी अभिलाषा रखता हूँ. लेकिन एक पुराना इंडियन ओशियन फ़ैन होने के नाते फ़िल्म की ठीक शुरुआत में हुए इस ’सेलिब्रिटी समागम’ पर मैं अपनी छोटी सी नाराज़गी यहाँ दर्ज कराता हूँ.

फ़िल्म की जान हैं वो लाइव रिकॉर्डिंग्स जिन्हें यह फ़िल्म अपने मूल कथा तत्व की तरह बीच-बीच में पिरोए हुए है. सिनेमा हाल में इस संगीत के मेले का आनंद उठाने के बाद इन्हीं रिकॉर्डिंग्स की वजह से अब मैं इस फ़िल्म की अनकट डीवीडी के इंतज़ार में हूँ. सच है कि इंडियन ओशियन का संगीत ऐसे ही अच्छा लगता है. अपने मूल रूम में, बिना किसी मिलावट, एकदम रॉ. मैं वापस आकर अपनी अलमारी में से उनकी दो पुरानी ऑडियो कैसेट्स निकालता हूँ, धूल पौंछकर उनमें से एक को अपने कैसेट प्लेयर में डालता हूँ. अब कमरे में ’डेज़र्ट रेन’ का संगीत गूँज रहा है. मैं बत्ती बुझा देता हूँ. कुछ देर से बाहर मौसम ने अपना रुख़ पलट लिया है. मैं खिड़की पूरी खोल देता हूँ. बारिश…

*****

जयदीप सिर्फ़ कमाल की फ़िल्में ही नहीं बनाते हैं, वे लिखते भी कमाल का हैं. इस फ़िल्म की सम्पूर्ण कथानुमा यात्रा आप तीन पोस्टों में – पहली यहाँ, दूसरी यहाँ और तीसरी यहाँ पढ़ सकते हैं. मेरी पोस्ट की तरह यह भी फ़िल्म देखने के बाद पढ़ेंगे तो और मज़ा आएगा. फ़िल्म कनॉट प्लेस के ओडियन में चल रही है और ऐसे ही शायद पांच-छ शहरों के कुछ चुनिंदा सिनेमाघरों में. और कम से कम इस हफ़्ते तो है ही.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

Things we lost in the fire

’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ – थियोडोर अडोर्नो.

जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस मासूमियत की वापसी संभव है ? क्या उस एक ग्राफ़िकल दृश्य के साथ, ’जाति’ से जुड़े किसी भी संदर्भ को बहुत दशक पहले अपनी स्वेच्छा से त्याग चुके हिन्दी के ’भाववादी प्रेम सिनेमा’ का अंत हो गया है ? क्या अब हम अपनी फ़िल्मों में बिना सरनेम वाले ’हाई-कास्ट-हिन्दू-मेल’ नायक ’राहुल’ को एक ’अच्छे-अंत-वाली-प्रेम-कहानी’ की नायिका के साथ उसी नादानी और लापरवाही से स्वीकार कर पायेंगे ? क्या हमारी फ़िल्में उतनी भोली और भली बनी रह पायेंगी जितना वे आम तौर पर होती हैं ? LSD की पहली कहानी हिन्दी सिनेमा में एक घटना है. मेरे जीवनकाल में घटी सबसे महत्वपूर्ण घटना. इसके बाद मेरी दुनिया अब वैसी नहीं रह गई है जैसी वो पहले थी. कुछ है जो श्रुति और राहुल की कहानी  ने बदल दिया है, हमेशा के लिए.

LSD के साथ आपकी सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि उसे आप ’सिनेमा’ कैसे मानें ? देखने के बाद सिनेमा हाल से बाहर निकलते बहुत ज़रूरी है कि बाहर उजाला बाकी हो. सिनेमा हाल के गुप्प अंधेरे के बाद (जहां आपके साथ बैठे गिनती के लोग वैसे भी आपके सिनेमा देखने के अनुभव को और ज़्यादा अपरिचित और अजीब बना रहे हैं) बाहर निकल कर भी अगर अंधेरा ही मिले तो उस विचार से लड़ाई और मुश्किल हो जाती है. मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में देखते हुए कई बार ऐसा अनुभव किया है, शायद राकेश शर्मा की बनाई ’फ़ाइनल सल्यूशन’. लेकिन किसी हिन्दुस्तानी मुख्यधारा की फ़िल्म के साथ तो कभी नहीं. और सिर्फ़ इस एक विचार को सिद्ध करने के लिए दिबाकर हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा ’रिस्क’ लेते हैं. तक़रीबन चालीस साल पहले ऋषिकेश मुख़र्जी ने अमिताभ को यह समझाते हुए ’गुड्डी’ से अलग किया था कि अगर धर्मेन्द्र के सामने उस ’आम लड़के’ के रोल में तुम जैसा जाना-पहचाना चेहरा (’आनंद’ के बाद अमिताभ को हर तरफ़ ’बाबू मोशाय’ कहकर पुकारा जाने लगा था.) होगा तो फ़िल्म का मर्म हाथ से निकल जायेगा. दिबाकर इससे दो कदम आगे बढ़कर अपनी इस गिनती से तीसरी फ़िल्म में एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिसके नायक – नायिका लगता है फ़िल्म की कहानियों ने खुद मौहल्ले में निकलकर चुन लिये हैं. पहली बार मैं किसी आम सिनेमा प्रेमी द्वारा की गई फ़िल्म की समीक्षा में ऐसा लिखा पढ़ता हूँ कि ’देखो वो बैठा फ़िल्म का हीरो, अगली सीट पर अपने दोस्तों के साथ’ और इसी वजह से उन कहानियों को नकारना और मुश्किल हो जाता है.

पहले दिन से ही यह स्पष्ट है कि LSD अगली ’खोसला का घोंसला’ नहीं होने वाली है. यह ’डार्लिंग ऑफ़ द क्राउड’ नहीं है. ’खोसला का घोंसला’ आपका कैथार्सिस करती है, लोकप्रिय होती है. लेकिन LSD ब्रेख़्तियन थियेटर है जहाँ गोली मारने वाला नाटक में न होकर दर्शकों का हिस्सा है, आपके बीच मौजूद है. मैं पहले भी यह बात कर चुका हूँ कि हमारा लेखन (ख़ासकर भारतीय अंग्रेज़ी लेखन) जिस तरह ’फ़िक्शन’ – ’नॉन-फ़िक्शन’ के दायरे तोड़ रहा है वह उसका सबसे चमत्कारिक रूप है. ऐसी कहानी जो ’कहानी’ होने की सीमाएं बेधकर हक़ीकत के दायरे में घुस आए उसका असर मेरे ऊपर गहरा है. इसीलिए मुझे अरुंधति भाती हैं, इसिलिये पीयुष मिश्रा पसंद आते हैं. उदय प्रकाश की कहानियाँ मैं ढूंढ-ढूंढकर पढ़ता हूँ. खुद मेरे ’नॉन-फ़िक्शन’ लेखन में कथातत्व की सतत मौजूदगी इस रुझान का संकेत है. दिबाकर वही चमत्कार सिनेमा में ले आए हैं. इसलिए उनका असर गहरा हुआ है. उनकी कहानी Love_sex_aur_dhokhaसोने नहीं देती, परेशान करती है. जानते हुए भी कि हक़ीकत का चेहरा ऐसा ही वीभत्स है, मैं चाहता हूँ कि सिनेमा – ’सिनेमा’ बना रहे. मेरी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. ‘हम’ चाहते हैं कि हमारी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. हम LSD को नकारना चाहते हैं, ख़ारिज करना चाहते हैं. चाहते हैं कि उसे किसी संदूक में बंद कर दूर समन्दर में फ़ैंक दिया जाए. उसकी उपस्थिति हमसे सवाल करेगी, हमारा जीना मुहाल करेगी, हमेशा हमें परेशान करती रहेगी.

LSD पर बात करते हुए आलोचक उसकी तुलना ’सत्या’, ’दिल चाहता है’, और ’ब्लैक फ़्राइडे’ से कर रहे हैं. बेशक यह उतनी ही बड़ी घटना है हिन्दी सिनेमा के इतिहास में जितनी ’सत्या’ या ’दिल चाहता है’ थीं. ’माइलस्टोन’ पोस्ट नाइंटीज़ हिन्दी सिनेमा के इतिहास में. उन फ़िल्मों की तरह यह कहानी कहने का एक नया शास्त्र भी अपने साथ लेकर आई है. लेकिन मैं स्पष्ट हूँ इस बारे में कि यह इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह अपने पीछे कोई परिवार नहीं बनाने वाली. इस प्रयोगशील कैमरा तकनीक का ज़रूर उपयोग होगा आगे लेकिन इसका कथ्य, इसका कथ्य ’अद्वितीय’ है हिन्दी सिनेमा में. और रहेगा. यह कहानी फिर नहीं कही जा सकती. इस मायने में LSD अभिशप्त है अपनी तरह की अकेली फ़िल्म होकर रह जाने के लिए. शायद ’ओम दर-ब-दर’ की तरह. क्लासिक लेकिन अकेली.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

इस रात की सुबह नहीं

’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.

मैं नर्क में हूँ.

यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों को पसंद करती थी. लेकिन तुमने मेरे साथ धोखा किया है. माना कि मेरे पिता थोड़े सख़्त हैं लेकिन मेरा स्कूल का ड्रामा देखकर तो खुश ही होते थे. यू कांट शो हिम लाइक दैट. और वो ’राहुल’… वो तो एकदम… दिबाकर मैं तुम्हें मार डालूंगी. यू डोन्ट हैव एनी राइट टू शो माई लाइफ़ लाइक दैट इन पब्लिक. अपनी इंटरप्रिटेशंस और अपनी सो-कॉल्ड रियलस्टिक एंडिंग्स तुम अपने पास रखो. हमेशा ही ’सबसे बुरा’ थोड़े न होता है. और हमारे यहाँ तो वैसे भी अब ’कास्ट-वास्ट’ को लेकर इतनी बातें कहाँ होती हैं. माना कि पापा उसे लेकर बड़े ’कॉशस’ रहते हैं लेकिन… शहरों में थोड़े न ऐसा कभी होता है. वो तो गाँवों में कभी-कभार ऐसा सुनने को मिलता है बस. और फ़िल्मों में, फ़िल्मों में तो कभी ऐसा नहीं होता. फ़िल्में ऐसी होती हैं क्या ? तुम फ़िल्म के नाम पर हमें कुछ भी नहीं दिखा सकते. यह फ़िल्म है ही नहीं. नहीं है यह फ़िल्म.

ठीक है, हमारे यहाँ कभी कास्ट से बाहर शादी नहीं हुई है. तो ? क्या हर चीज़ का कोई ’फ़र्स्ट’ नहीं होता ? पहले सब ऐसे ही बुरा-बुरा बोलते हैं, बाद में सब मान लेते हैं. वो निशा का याद नहीं, माना कि उसका वाला लड़का ’सेम कास्ट’ का था लेकिन थी तो ’लव मैरिज’ ना ? कैसे शादी के बाद सबने मान लिया था. दीपक के पापा ने तो पूरा दहेज भी लिया था दुबारा शादी करवाकर. देख लेना मेरा भी सब मान लेंगे. शुरु में प्रॉब्लम होगी उसकी कास्ट को लेकर लेकिन दिबाकर तुम देख लेना. और ‘उसे’ जानने के बाद कैसे कोई उसे नापसंद कर सकता है. पापा को मिलने तो दो, नाम-वाम सब भूल जायेंगे उससे मिलने के बाद. देख लेना  सब मान लेंगे जब मैं उन्हें सब बताऊँगी. शादी के पहले नहीं बतायेंगे, और जब शादी के बाद उनसे मिलवाऊँगी… आई प्लान्ड एवरीथिंग. बट दिबाकर, यू मेस्ड अप ऑल इन माई माइंड. नाऊ व्हाट विल आई डू, हॉऊ विल आई गैट बैक ? इट्स नॉट ए मूवी एट-ऑल. आई हेट दिस मूवी.

एंड वन मोर थिंग… नोट दिस डाउन… माई सरनेम इस नॉट ’दहिया’.

Love_sex_aur_dhokha

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9′ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?

यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूँ. नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं. कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से…

avatarअवतार : मेरी नज़र में इस फ़िल्म की खूबियाँ और कमियाँ दोनों एक ही विशेषता से निकली हैं. वो है इसकी युनिवर्सल अपील और लोकप्रियता. यह दरअसल जेम्स कैमेरून की ख़ासियत है. उनकी पिछली फ़िल्में ’टाइटैनिक’ और ’टर्मिनेटर 2 : जजमेंट डे’ इसकी गवाह हैं. मुझे आज भी याद है कि ’टर्मिनेटर 2’ ही वो फ़िल्म थी जिसे देखते हुए मुझे बचपन में भी ख़ूब मज़ा आया था जबकि उस वक़्त मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्में कम ही समझ आती थीं. तो ख़ूबी ये कि इसकी कहानी सरल है, आसानी से समझ आने वाली. जिसकी वजह से इसे विश्व भर में आसानी से समझा और सराहा जा रहा है. और कमी भी यही कि इसकी कहानी सरल है, परतदार कहानियों की गहराईयों से महरूम. जिसकी वजह से इसके किरदार एकायामी और सतही जान पड़ते हैं.

इस फ़िल्म की अच्छी बात तो यही कही जा सकती है कि यह नष्ट होती प्रकृति को इंसानी लिप्सा से बचाए जाने का ’पावन संदेश’ अपने भीतर समेटे है. लेकिन यह ’पावन संदेश’ ऐसा मौलिक तो नहीं जिसे सारी दुनिया एकटक देखे. सच्चाई यही है कि ’अवतार’ का असल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है. किरदारों और कहानी के उथलेपन को यह तकनीक द्वारा प्रदत्त गहराई से ढकने की कोशिश करती है. यही वजह है कि फ़िल्म की हिन्दुस्तान में प्रदर्शन तिथि को दो महीने से ऊपर बीत जाने के बावजूद कनॉट प्लेस के ’बिग सिनेमा : ओडियन’ में सप्ताहांत जाने पर हमें टिकट खिड़की से ही बाहर का मुँह देखना पड़ता है. मानना पड़ेगा, थ्री-डी अनुभव चमत्कारी तो है. पैन्डोरा के उड़ते पहाड़ और छूते ही बंद हो जाने वाले पौधे विस्मयकारी हैं. और एक भव्य क्लाईमैक्स के साथ वो मेरी उम्मीदें भी पूरी करती है. लेकिन मैं अब भी नहीं जानता हूँ कि अगर इसे एक सामान्य फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसमें कितना ’सत्त’ निकलेगा.

the-hurt-lockerदि हर्ट लॉकर : बहुत उम्मीदों के साथ देखी थी शायद, इसलिए निराश हुआ. बेशक बेहतर फ़िल्म है. लेकिन ’आउट ऑफ़ दि बॉक्स’ नहीं है मेरे लिए. कुछ खास पैटर्न हैं जो इस तरह की हॉलिवुडीय ’वॉर-ड्रामा’ फ़िल्में फ़ॉलो करती हैं, हर्ट लॉकर भी वो करती है. फिर भी, मेरी समस्याएं शायद इससे हैं कि वो जो दिखा रही है, आखिर बस वही क्यों दिखा रही है? लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि वो जिस पक्ष की कहानी दिखाना चाहती है उसे असरदार तरीके से दिखा रही है. एक स्तर पर ’दि हर्ट लॉकर’ की तुलना स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ से की जा सकती है. लेकिन यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि एक महिला द्वारा निर्देशित होने के बावजूद यह बहुत ही मर्दवादी फ़िल्म है. बेशक युद्ध-फ़िल्मों में एक स्तर पर ऐसा होना लाज़मी भी है. इसका नायक एक ’सम्पूर्ण पुरुष नायकीय छवि’ वाला नायक है. तुलना के लिए बताना चाहूँगा कि ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ में जिस तरह टॉम हैंक्स अपने किरदार में एक फ़ेमिनिस्ट अप्रोच डाल देते हैं उसका यहाँ अभाव है.

मेरी नज़र में हर्ट लॉकर का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है उसका ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’. और तनाव निर्माण का इससे बेहतर सांचा और क्या मिलेगा, फ़िल्म का नायक एक बम निरोधक दस्ते का सदस्य है और इराक़ में कार्यरत है. मुझे न जाने क्यों हर्ट लॉकर बार-बार दो साल पहले आई हिन्दुस्तानी फ़िल्म ’आमिर’ की याद दिला रही थी. कोई सीधा संदर्भ बिन्दु नहीं है. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों का मुख्य आधार तनाव की सफ़ल संरचना है और दोनों ही फ़िल्मों में विपक्ष का कोई मुकम्मल चेहरा कभी सामने नहीं आता. और गौर से देखें तो हर्ट लॉकर में वही अंतिम प्रसंग सबसे प्रभावशाली बन पड़ा है जहाँ अंतत: ’फ़ेंस के उधर’ मौजूद मानवीय चेहरा भी नज़र आता है. ’दि हर्ट लॉकर’ आपको बाँधे रखती है. और कुछ दूर तक बना रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.

inglourious-basterdsइनग्लोरियस बास्टर्ड्स : मैं मूलत: टैरेन्टीनो की कला का प्रशंसक नहीं हूँ. मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्त उसके गहरे मुरीद हैं. इस ज़मीन पर खड़े होकर मेरी टैरेन्टीनो से बात शुरु होती है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ शुद्ध एतिहासिक संदर्भों के साथ एक शुद्ध काल्पनिक कहानी है. ख़ास टैरेन्टीनो की मोहर लगी. इस फ़िल्म को आप टैरेन्टीनो के पुराने काम के सन्दर्भ में पढ़ते हैं. ’पल्प फ़िक्शन’ के संदर्भ में पढ़ते हैं. पिछली संदर्भित फ़िल्म ’दि हर्ट लॉकर’ की तरह ही ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ भी अपनी कथा-संरचना में ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’ को अपना आधार बनाती है. फ़िल्म का शुरुआती प्रसंग ही देखें, उसमें ’तनाव निर्माण’ और उसके साथ बदलता इंसानी व्यवहार देखें. आप समझ जायेंगे कि टैरेन्टीनो इस पद्धति के साथ हमारा परिचय इंसानी व्यव्हार की कमज़ोरियों, उसकी कुरूपताओं से करवाने वाले हैं.

और इस शुरुआती प्रसंग के साथ ही क्रिस्टोफर वॉल्टज़ परिदृश्य में आते हैं. मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रैड पिट का काम भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वॉल्टज़ यहाँ निर्विवाद रूप से बहुत आगे हैं. उनका लोकप्रियता ग्राफ़ इससे नापिए कि अपने क्षेत्र में (सहायक अभिनेता) आई.एम.डी.बी. पर उन अकेले को जितने वोट मिले हैं वो बाक़ी चार नामांकितों को मिले कुल वोट के दुगुने से भी ज़्यादा है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ को सम्पूर्ण फ़िल्म के बजाए अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर पढ़ा जाना चाहिए. यह टैरेन्टीनो को पढ़ने का पुराना तरीका है, उन्हीं का दिया हुआ. हिंसा की अति होते हुए भी उनकी फ़िल्म कुरूप नहीं होती, बल्कि वह एक दर्शनीय फ़िल्म होती है. जैसा मैंने पहले भी कहा है, वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे हैं. यह फ़िल्म उस किताब का अगला पाठ है. कई सारे उप-पाठों में बँटा.

up in the airअप इन दि एयर : जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. और ढेर सारा स्टाइल. इस फ़िल्म का सबसे बड़ा बिन्दु मेरी नज़र में यही है. यह एक बेहतर तरीके से बनाई, सेंसिबल कहानी है जिसकी जान इसके ट्रीटमेंट में छिपी है. तुलना के लिए फ़रहान अख़्तर की फ़िल्में देखी जा सकती हैं. शहर दर शहर उड़ती इस फ़िल्म के किरदार कॉर्पोरेट में काम करने वाले मेरे दोस्तों को बहुत रिलेटेबल लग सकते हैं. फ़िल्म में बहुत से तीखे प्रसंग हैं जिन्हें कसी स्क्रिप्ट में पेश किया गया है. और वो बहन-साढू की तसवीर के साथ एयरपोर्ट-एयरपोर्ट घूमना तो बहुत ही मज़ेदार है. क्या पुरस्कार मिलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सुना है कि यह कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों की दौड़ में दूसरे नम्बर पर भाग रही है. अगर आप इस रविवार एक ’अच्छी’ फ़िल्म देखकर अपनी शाम सुकून से बिताना चाहते हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है.

district 9डिस्ट्रिक्ट 9 : नामांकनों की लम्बी सूची में यह सबसे चमत्कारी फ़िल्म है. जी हाँ, यह मैं बहुचर्चित ’अवतार’ थ्री-डी में देखने के बाद कह रहा हूँ. दरअसल मैं इसी फ़िल्म पर बात करना चाहता हूँ. ‘डिस्ट्रिक्ट 9’ आपको हिला कर रख देती है. ध्वस्त कर देती है. यह दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है. इस विज्ञान-फंतासी को इसका तकनीकी पक्ष नहीं, इसका विचार अद्भुत फ़िल्म बनाता है. ऐसा विचार जो आपको डराता भी है और आपकी आँखे भी खोलता है.

जिस तरह पिछले साल आयी फ़िल्म ’दि डार्क नाइट’ सुपरहीरो फ़िल्मों की श्रंखला में एक पीढ़ी की शुरुआत थी उसी तरह से ’डिस्ट्रिक्ट 9’ विज्ञान-फंतासी के क्षेत्र में एक नई पीढ़ी के कदमों की आहट है. ’डार्क नाइट’ एक सामान्य सुपरहीरो फ़िल्म न होकर एक दार्शनिक बहस थी. यह उस शहर के बारे में खुला विचार मंथन थी जिसकी किस्मत एक अनपहचाने, सिर्फ़ रातों को प्रगट होने वाले, मुखौटा लगाए इंसान के हाथों में कैद है. क्या उस शहर को किसी भी अन्य सामान्य शहर की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? ठीक उसी तरह, ’डिस्ट्रिक्ट 9’ भी एक सामान्य ’एलियन फ़िल्म’ न होकर एक प्रतीक सत्ता है. हमारी धरती पर घटती एक ’एलियन कथा’ के माध्यम से यह आधुनिक इंसानी सभ्यता की कलई खोल कर रख देती है. विकास की तमाम बहसें, उसके भोक्ता, उसके असल दुष्परिणाम, हमारे शहरी संरचना के विकास की अनवरत लम्बी होती रेखा और हाशिए पर खड़ी पहचानों से उसकी टकराहट, भेदभाव, इंसानी स्वभाव के कुरूप पक्ष, सभी कुछ इसमें समाहित है. और इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अपनी उस पूर्ववर्ती की तरह ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को भी ऑस्कर में नज़रअन्दाज़ कर दिया जाएगा. ’सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ की दौड़ में उसका शामिल होना भी सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो पाया है कि अकादमी ने इस बार नामांकित फ़िल्मों की संख्या 5 से बढ़ाकर 10 कर दी है.

अपनी शुरुआत से ही ’डिस्ट्रिक्ट 9’ एक प्रामाणिक डॉक्युड्रामा का चेहरा पहन लेती है. मेरे ख़्याल से यह अद्भुत कथा तकनीक फ़िल्म के लिए आगे चलकर अपने मूल विचार को संप्रेषित करने में बहुत कारगर साबित होती है. शुरुआत से ही यह अपना मुख्य घटनास्थल (जहाँ स्पेसशिप आ रुका है) अमरीका के किसी शहर को न बनाकर जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) को बनाती है और केन्द्रीकृत विश्व-व्यवस्था के ध्रुव को हिला देती है. एलियन्स का घेट्टोआइज़ेशन और उनका शहर से उजाड़ा जाना हमारे लिए ऐसा आईना है जिसमें हमारे शहरों को अपना विकृत होता चेहरा देखना चाहिए. और इस ’रियलिटी चैक’ के बाद कहानी जो मोड़ लेती है वो आपने सोचा भी नहीं होगा. फ़िल्म का अंतिम दृश्य एक कभी न भूलने वाला, हॉन्टिंग असर मेरे ऊपर छोड़ गया है. नए, बेहतरीन कलाकारों के साथ इस फ़िल्म का चेहरा और प्रामाणिक बनता है लेकिन तकनीक में यह कोई ओछा समझौता नहीं करती.

मैं आश्चर्यचकित हूँ इस बात से कि क्यों इस फ़िल्म के निर्देशक को हम इस साल के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में नहीं गिन रहे? और शार्लटो कोप्ले (Sharlto Copley) जिन्होंने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है को क्यों नहीं इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता गिना जा रहा? क्या, हिंसा की अति? इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की समूची यात्रा (फ़िल्म की शुरुआत से आखिर तक का कैरेक्टर ग्राफ़) इतनी बदलावों से भरी, अविश्वसनीय और हृदय विदारक है कि उसका सर्वश्रेष्ठ की गिनती में न होना उस सूची के साथ मज़ाक है.

पोस्ट ’क्योटो’ और ’कोपनहेगन’ काल में यह कोरा संयोग नहीं है कि दो ऐसी विज्ञान फंतासियाँ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की दौड़ में हैं जिनमें मनुष्य प्रजाति खलनायक की भूमिका निभा रही है. यह और भी रेखांकित करने लायक बात इसलिए भी बन जाती है जब पता चले कि बीते सालों में अकादमी विज्ञान-फंतासियों को लेकर आमतौर से ज़्यादा नरमदिल नहीं रही है. असल दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है कि अब ’साइंस-फ़िक्शन’ सिनेमा अपनी सही राह पहचान गया है.

upअप : वाह, क्या फ़िल्म है. एक खडूस डोकरा (बूढ़ा) अपने घर के आस-पास फैलते जाते शहर से परेशान है. और वो अपने घर में ढेर सारे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है, अपने सपनों की दुनिया की ओर! क्या कमाल की बात है कि यह एनिमेशन फ़िल्म भी हमारे यांत्रिक होते जा रहे शहरी जीवन और शहरी विकास के मॉडल पर एक तीखी टिप्पणी है. ’अप’ एनीमेशन फ़िल्म होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए नामांकित हुई है. इससे ही आप उसके चमत्कार का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ख़ास बात देखने की है कि पिछले साल की विजेता ’वॉल-ई’ की तरह ही यह भी इंसानी सभ्यता के अंधेरे मोड़ की तरफ़ जाने की एक कार्टूनीकृत भविष्यवाणी है.

क्या आपको मालूम है :

– इस साल पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के दो सबसे बज़बूत दावेदार जेम्स कैमेरून (अवतार) और कैथेरीन बिग्लोव (दि हर्ट लॉकर) पूर्व पति-पत्नी हैं.

– तमाम अन्य पूर्ववर्ती पुरस्कार तथा सिनेमा आलोचक इस बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मुकाबला इन्हीं दोनों पूर्व पति-पत्नी जोड़े के बीच गिन रहे हैं. लेकिन आम दर्शक के बीच आप क्वेन्टीन टैरेन्टीनो (इनग्लोरियस बास्टर्ड्स) की लोकप्रियता और प्रभाव का अन्दाज़ा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि आई.एम.डी.बी. वेबसाइट पर पब्लिक पोल में ऑस्कर की पिछली रात तक भी वे दूसरे स्थान पर चल रहे थे.

– ऑस्कर के पहले मिलने वाला इंडिपेंडेंट सिनेमा का ’स्पिरिट पुरस्कार’ बड़ी मात्रा में ’प्रेशियस’ ने जीता है. कई सिनेमा आलोचक इस फ़िल्म में माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा मोनिक्यू (Mo’nique) की भूमिका को इस साल का सर्वश्रेष्ठ अदाकारी प्रदर्शन गिन रहे हैं.

– अगर कैथरीन बिग्लोव ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता (और जिसकी काफ़ी संभावना है.) तो वे यह पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला होंगी. इससे पहले केवल तीन महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए नामांकित हुई हैं. लीना वार्टमुलर (Lina Wertmuller) ’सेवन ब्यूटीज़’ के लिए (1976), जेन कैम्पियन (Jane Campion) ’दि पियानो’ (1993) के लिए और बहुचर्चित ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ (2003) के लिए सोफ़िया कोपोला (Sofia Coppola).

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

परदे पर प्यार के यादगार लम्हें

IMG_2741हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न पाए हों लेकिन प्यार का इज़हार तो बेशक उन्हीं से सीखा है. हिन्दी सिनेमा इस मायने में भी एक अनूठी दुनिया रचता है कि यह हमारी उन तमाम कल्पनाओं को असलियत का रंग देता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के छोटे कस्बों और बीहड़ शहरों में जवान होते पूरा करना हमारे जैसों के लिए मुमकिन नहीं. सिनेमा और उसके सिखाए प्रेम के इस फ़लसफ़े का असल अर्थ पाना है तो इस महादेश के भीतर जाइए, अंदरूनी हिस्सों में. व्यवस्था के बँधनों के विपरीत जन्म लेती हर प्रेम कहानी पर सिनेमा की छाप है. किसी ने पहली मुलाकात के लिए मोहल्ले के थियेटर का पिछवाड़ा चुना है तो किसी ने एक फ़िल्मी गीत काग़ज़ पर लिख पत्थर में लपेटकर मारा है. हम सब ऐसे ही बड़े हुए हैं, थोड़े से बुद्धू, थोड़े से फ़िल्मी. पेश हैं एक चयन हिन्दी सिनेमा से, प्रेम में गुँथा. हिन्दी सिनेमा के दस प्रेम दृश्य, जिन्हें देखकर हमारी मौहब्बत की परिभाषाएं बनती- बदलती रहीं हैं. बेशक चयन है और चयन हमेशा विवादास्पद होते हैं, लेकिन साथ यहाँ कोशिश उस प्रभाव को पकड़ने की भी है जिसे हम वक़्त-बेवक़्त ’सिनेमा हमारे जीवन में’ कहकर चिह्नित करते रहे हैं…

1. प्यासा.

सिगरेट का धुआँ उड़ाते गुरुदत्त और दूर से उन्हें तकती वहीदा.

pyaasaयह एक साथ हिन्दी सिनेमा का सबसे इरॉटिक और सबसे पवित्र प्रेम-दृश्य है. अभी-अभी नायिका गुलाबो (वहीदा रहमान) को एक पुलिसवाले के चंगुल से बचाने के लिए नायक विजय (गुरुदत्त) ने अपनी पत्नी कहकर संबोधित किया है. नायिका जो पेशे से एक नाचनेवाली तवायफ़ है अपने लिए इस ’पवित्र’ संबोधन को सुनकर चकित है. न जाने किस अदृश्य बँधन में बँधी नायक के पीछे-पीछे आ गई है. नायक छ्त की रेलिंग के सहारे खड़ा सिगरेट का धुआँ उड़ा रहा है और नायिका दूर से खड़ी उसे तक रही है. कुछ कहना चाहती है शायद, कह नहीं पाती. लेकिन बैकग्राउंड में साहिर का लिखा, एस.डी. द्वारा संगीतबद्ध और गीता दत्त का गाया भजन ’आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफ़ल हो जाए’ बहुत कुछ कह जाता है. इस ’सभ्य समाज’ द्वारा हाशिए पर डाल बार-बार तिरस्कृत की गई दो पहचानें, एक कवि और दूसरी वेश्या, मिलकर हमारे लिए प्रेम का सबसे पवित्र अर्थ गढ़ते हैं.

2. मुग़ल-ए-आज़म.

मधुबाला को टकटकी लगाकर निहारते दिलीप.

mughal-e-azam1कहते हैं कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में डाइरेक्टर से लेकर स्पॉट बॉय तक हर आदमी के पास सुनाने के लिए ’मुग़ल-ए-आज़म’ से जुड़ी एक कहानी होती है. के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म हिन्दुस्तान में बनी पहली मेगा फ़िल्म थी जिसने आगे आने वाली पुश्तों के लिए फ़िल्म निर्माण के पैमाने ही बदल दिए. लेकिन मुग़ल-ए-आज़म कोरा इतिहास नहीं, हिन्दुस्तान के लोकमानस में बसी प्रेम-कथा का पुनराख्यान है. एक बांदी का राजकुमार से प्रेम शहंशाह को नागवार है लेकिन वो प्रेम ही क्या जो बंधनों में बँधकर हो. चहुँओर से बंद सामंती व्यवस्था के गढ़ में प्रेम की खुली उद्घोषणा स्वरूप ’प्यार किया तो डरना क्या’ गाती अनारकली को कौन भूल सकता है.

यही याद बसी है हम सबके मन में. शहज़ादा सलीम (दिलीप कुमार) एक पँखुड़ी से हिन्दी सिनेमा की अनिन्द्य सुंदरी अनारकली (मधुबाला) के मुखड़े को सहला रहे हैं और बैकग्राउंड में तानसेन की आवाज़ बनकर ख़ुद उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ’प्रेम जोगन बन के’ गा रहे हैं. मुग़ल-ए-आज़म सामंती समाज में विरोध स्वरूप तन-कर खड़े ’प्रेम’ का अमर दस्तावेज़ है.

3. दिल चाहता है.

एक बार घूँसा, दूसरी बार इक़रार.

dil chahta haiएक ही डायलॉग ’दिल चाहता है’ के दो सबसे महत्वपूर्ण अंश रचता है. वो डायलॉग है एक कवितामय सा प्यार का इज़हार. पहली बार कॉलेज की पार्टी में यह फ़िल्म का सबसे हँसोड़ प्रसंग है तो दूसरी बार आने पर यह आपकी आँखें गीली कर देता है. बेशक आकाश (आमिर ख़ान) को शालिनी (प्रीटि ज़िन्टा) से प्यार है लेकिन बकौल समीर कौन जानता था कि उसे यह प्यार का इज़हार किसी दूसरे की शादी में दो सौ लोगों के सामने करना पड़ेगा! लेकिन क्या करें कि इस भागती ज़िन्दगी में रुककर प्यार जैसे मुलायम अहसास को समझने में अक़्सर ऐसी देर हो जाया करती है. ’दिल चाहता है’ ट्रेंड सैटर फ़िल्म थी. नई पीढ़ी के लिए आज भी नेशनल एंथम सरीख़ी है और यह ’इज़हार-ए-दिल’ प्रसंग उसके भीतर जड़ा सच्चा हीरा.

4. मि. एण्ड मिसेस अय्यर.

एक हनीमून की कहानी जो कभी मनाया ही नहीं गया.

mr & mrs iyerकल्पनाएं हमेशा हमारे सामने असलियत से ज़्यादा रूमानी और दिलकश मंज़र रचती हैं. ख्वाब हमेशा ज़िन्दगी से ज़्यादा दिलफ़रेब होते हैं. एक दक्षिण भारतीय गृहणी मीनाक्षी अय्यर (कोंकणा सेन) ने अपने मुस्लिम सहयात्री (राहुल बोस) की दंगाइयों से जान बचाने के लिए उन्हें अपना पति ’मि. अय्यर’ घोषित कर दिया है और अब पूरी यात्रा उन्हें इस झूठ को निबाहना है. और इसी कोशिश में ’मि. अय्यर’ साथ सफ़र कर रही लड़कियों को अपने हनीमून की कहानी सुनाते हैं. नीलगिरी के जगलों में एक पेड़ के ऊपर बना छोटा सा घर. पूरे चाँद वाली रात. यह एक फोटोग्राफ़र की आँख से देखा गया दृश्य है. और पीछे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का धीमे-धीम ऊँचा उठता संगीत. नायिका को पता ही नहीं चलता और वो इस नयनाभिराम मंज़र में डूबती जाती है. सबसे मुश्किल वक़्तों में ही सबसे मुलायम प्रेम कहानियाँ देखी जाती हैं. ’मि. एंड मिसेस अय्यर’ ऐसी ही प्रेम कहानी है.

5. स्पर्श.

प्रेम की सुगंध-आवाज़-स्पर्श का अहसास.

sparshसई परांजपे की ’स्पर्श’ इस चयन में शायद थोड़ी अजीब लगे, लेकिन उसका होना ज़रूरी है. फ़िल्म के नायक अनिरुद्ध (नसीरुद्दीन शाह) जो एक ब्लाइंड स्कूल के प्रिसिपल हैं देख नहीं सकते. वे हमारी नायिका कविता (शबाना आज़मी) से जानना चाहते हैं कि वे दिखती कैसी हैं? अब कविता उन्हें बोल-बोलकर बता रही हैं अपनी सुंदरता की वजहें. अपनी आँखों के बारे में, अपनी जुल्फ़ों के बारे में, अपने रंग के बारे में. लेकिन इसका याद रह जाने वाला हिस्सा आगे है जहाँ अनिरुद्ध बताते हैं कि यह रूप रंग तो मेरे लिए बेकार है. मेरे लिए तुम इसलिए सुंदर हो क्योंकि तुम्हारे बदन की खुशबू लुभावनी है, निषिगंधा के फूलों की तरह. तुम्हारी आवाज़ मर्मस्पर्शी है, सितार की झंकार की तरह. और तुम्हारा स्पर्श कोमल है, मख़मल की तरह. यह प्रसंग हिन्दी सिनेमा में ’प्रेम’ को एक और आयाम पर ले जाता है.

6. सोचा न था.

ईमानदार दुविधाओं से निकलकर इज़हार-ए-इश्क.

socha na thaआज की पीढ़ी के पसंदीदा ’लव गुरु’ इम्तियाज़ अली की वही अकेली प्रेम-कहानी को अपने सबसे प्रामाणिक और सच्चे फ़ॉर्म में आप उनकी पहली फ़िल्म ’सोचा न था’ में पाते हैं. नायक आधी रात नायिका की बालकनी फाँदकर उसके घर में घुस आया है और पूछ रहा है, “आखिर क्या है मेरे-तुम्हारे बीच अदिति?” दरअसल यह वो सवाल है जो उस रात वीरेन (अभय देओल) और अदिति (आयशा टाकिया) एक-दूसरे से नहीं, अपने आप से पूछ रहे हैं. और जब उस निर्णायक क्षण उन्हें अपने दिल से वो सही जवाब मिल जाता है तो देखिए कैसे दोनों सातवें आसमान पर हैं! इस इज़हार-ए-मोहब्बत के पहले नायिका जितनी मुख़र है, बाद में उतनी ही ख़ामोश. बरबस ’मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ याद आती है. इम्तियाज़ की प्रेम-कहानियों में प्यार को लेकर वही संशय भाव मिलता है जिसे हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ’कसप’ में पाते हैं. उनकी इन दुविधाग्रस्त लेकिन हद दर्जे तक ईमानदार प्रेम-कहानियों ने हमारे समय में ’प्रेम’ के असल अर्थ को बचाकर रखा है.

7. दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे.

पलट…

ddlj“राज, अगर ये तुझे प्यार करती है तो पलट के देखेगी. पलट… पलट…” और बनती है मेरे दौर की सबसे चहेती प्रेम कहानी. उस पूरे दौर को ही ’डीडीएलजे’ हो गया था जैसे. हमारी प्रेमिकाओं के कोडनेम ’सिमरन’ होने लगे थे और हमारी पीढ़ी ने अपना बिगड़ैल नायक पा लिया था. हम लड़कपन की देहरी पर खड़े थे और अपनी देहभाषा से ख़ुद को अभिव्यक्त करने वाला शाहरुख़ हमारे लिए प्यार के नए फ़लसफ़े गढ़ रहा था. हर दौर की अपनी एक प्रेम-कहानी होती है. परियों वाली प्रेम-कहानी. मेरे समय ने अपनी ’परियों वाली प्रेम कहानी’ शाहरुख़ की इस एक ’पलट’ के साथ पाई.

8. दिल से.

ढाई मिनट की प्रेम कहानी.

dil seहिन्दी सिनेमा में आई सबसे छोटी प्रेम-कहानी. नायक (शाहरुख़ ख़ान) रेडियो पर नायिका (मनीषा कोईराला) से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा एक गीतों भरी कहानी में पिरोकर सुना रहा है और नायिका अपने कमरे में बैठी उस किस्से को सुन रही है, समझ रही है कि ये उसके लिए ही है. इस किस्से में सब-कुछ है, अकेली रात है, बरसात है, सुनसान प्लेटफ़ॉर्म है, दौड़ते हुए घोड़े हैं, बिखरते हुए मोती हैं. यही वो दृश्य है जिसके अंत में रहमान और गुलज़ार द्वारा रचा सबसे खूबसूरत और हॉन्टिंग गीत ’ए अजनबी’ आता है. नायक अभी नायिका का नाम तक नहीं जानता है लेकिन ये कमबख़्त इश्क कब नाम पूछकर हुआ है भला.

9. तेरे घर के सामने.

कुतुब के भीतर ’दिल का भँवर करे पुकार’.

tere ghar ke samneदिल्ली की कुतुब मीनार के भीतर नूतन देव आनंद से पूछती हैं कि क्या तुम्हें ख़ामोशी की आवाज़ सुनाई देती है? और देव आनंद अपने चुहल भरे अंदाज़ में नूतन से कहते हैं कि हमें तो बस एक ही आवाज़ सुनाई देती है, ’दिल की आवाज़’. और हसरत जयपुरी का लिखा तथा एस. डी. बर्मन का रचा गीत आता है ’दिल का भँवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो’. यह आज़ाद भारत की सपने देखती नई युवा पीढ़ी है. बँधनों और रूढ़ियों से मुक्त. इस प्रसंग में आप एक साथ दो प्रेम कहानियों को बनता पायेंगे. और गौर से देखें तो ये दोनों ही प्रेम-कहानियाँ सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली हैं. नए-नए आज़ाद हुए मुल्क की नई बनती राजधानी इस प्रेम का घटनास्थल है और कुतुब से देखने पर इस प्यार का कद थोड़ा और ऊँचा उठ जाता है.

10. शोले.

माउथॉरगन बजाते अमिताभ और लैम्प बुझाती जया.

sholayक्या ’शोले’ के बिना लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से जुड़ा कोई भी चयन पूरा हो सकता है? वीरू और बसंती की मुँहफट और मुख़र प्रेमकहानी के बरक़्स एक साइलेंट प्रेमकहानी है जय और राधा की जिसके बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. हिन्दी सिनेमा की सबसे ख़ामोश प्रेमकहानी. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है.

**********

**********

मूलत: नवभारत टाइम्स के संडे ’स्पेशल स्टोरी’ में प्रकाशित. चौदह फरवरी 2010 याने वैलेंटाइन डे के दिन.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

बंजारा नमक लाया

प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है.

IMG_2656प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं प्रभात की उन कविताओं को ख़ास नोटिस करता हूँ जहाँ वह हमारे साहित्य में ’क्रूर, हत्यारे शहर’ के बरक्स गाँव की रूमानी लेकिन एकतरफ़ा बनती छवि को तोड़ते हैं. यहाँ मेरी पसंदीदा कविता ’मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में’ आपके सामने है. उनका गाँव हिन्दुस्तान का जीता-जागता गाँव है, अपनी तमाम बेइंसाफ़ियों के साथ. लेकिन इससे उनका गाँव बेरंग नहीं होता, बेगंध नहीं होता. तमाम बेइंसाफ़ियों के बावजूद उसका रंग मैला नहीं होता. एक ’सत्तातंत्र’ गाँव में भी है और उसका मुकाबला भी उतना ही ज़रूरी है. प्रभात जब ’गाँव’ की बेइंसाफ़ियों पर सवाल करते हैं तो यह उस ’सत्तातंत्र’ पर सीधा सवाल है. प्रभात की कविता ’गाँव’ का पक्ष नहीं लेती, बल्कि गाँव के भीतर जाकर ’सही’ का पक्ष लेती है.

जैसा हमारे दोस्त प्रमोद ने भूमिका में लिखा है कि ’पानी’ प्रभात की कविता का सबसे मुख्य किरदार है. होना भी चाहिए, राजस्थान पानी का कितना इंतज़ार करता है, पानी हमारे मानस का मूल तत्व हो जैसे. और उनकी कविता ’या गाँव को बंटाढार बलमा’ मैं यहाँ न समझे जाने का जोख़िम उठाते हुए भी दे रहा हूँ, ऐसा गीत विरले ही लिखा जाता है. कितना सीधा, सटीक. फिर भी कितना गहरा.

एक और वजह से यह किताब ख़ास है. इस किताब में दोस्ती की मिठास है. कैसे एक दोस्त कविताएं लिखता है, दूसरा दोस्त उन कविताओं को एक बहुत ही ख़ूबसूरत किताब का रूप देता है और तीसरा दोस्त अपना लाड़ लड़ाता है एक प्यारी सी भूमिका लिख कर. मैंने बचपन में अपनी छोटी-छोटी, मिचमिचाई आँखों से इन दोस्तियों को बड़े होते देखा है. कभी ये सारे अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, कोई चित्रकार है तो कोई मास्टर. कोई संपादक हो गया है तो कोई बड़ा अफसर. कोई किसी अख़बार में काम करती है तो कोई दिखाई ही नहीं देता कई-कई साल तक. लेकिन फिर अचानक किसी दिन ये मिलकर ’वितान’ हो जाते हैं. और इन्हें जोड़ने का सबसे मीठा माध्यम हैं प्रभात की कविताएं. इन सारे दोस्तों को थोड़ा सा कुरेदो और प्रभात की एक कविता निकल आती है हरेक के भीतर से.

आप प्रभात की कविताएं पढ़ना और सहेजना चाहें तो इस सुंदर सी किताब को विश्व पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ की स्टॉल (हॉल न.12A/ स्टॉल न.188) से सिर्फ़ साठ रु. देकर ख़रीद सकते हैं. यहाँ इस किताब से मेरी पसंदीदा कविताओं के अलावा मैं प्रमोद की लिखी भूमिका भी उतार रहा हूँ.

ज़मीन की बटायी

मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में

सिर्फ़ चार के खाते है सैंकड़ो बीघा ज़मीन
कुछ छह-छह बीघा में हैं बाकी सारे भूमिहीन
भूमिहीन हैं जो मज़दूर मज़लूम हैं
ज़िन्दा हैं मगर ज़िन्दगी से महरूम हैं
जीना क्या है जीना दुखदायी तेरे गाँव में
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में

ठसक रुपैये की किसी में ऎंठ लट्ठ की
बड़ी पूछ बाबू तेरे गाँव में मुँहफट्ट की
बड़ी पूछ उनकी जो कि छोटे काश्तकार हैं
शामिल जो ज़मींदारों के संग अनाचार में
चारों खण्ड गाँव घूमा पाया यही घूम के
सबके हित एक से सब बैरी मज़लूम के
दुखिया की नहीं सुनवायी तेरे गाँव में
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में
ऋण लेर सेर घी छँडायौ तो पै रामजी
अन्न का दो दाणा भी तो दै रै म्हारा रामजी

खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं
जानेवाले जाने कैसी पीर छोड़ जाते हैं
परदेसी तेरी अटारी राँय-बाँय रहती है
मौत के सन्नाटे जैसी साँय-साँय रहती है
ऎसी ना हो किसी की रुसवायी मेरे गाँव में
बुरी है ज़मीन की बटायी मेरे गाँव में

भाई रे

ऋतुओं की आवाजाही रे
मौसम बदलते हैं भाई रे

खजूरों को लू में ही
पकते हुए देखा
किसानों को तब मेघ
तकते हुए देखा
कुँओं के जल को
उतरते हुए देखा
गाँवों के बन को
झुलसते हुए देखा
खेतों को अगनी में
तपते हुए देखा
बर्फ़ वाले के पैरों को
जलते हुए देखा
गाते हुए ठंडी-मीठी बर्फ़
दूध की मलाई रे
मौसम बदलते हैं भाई रे

जहाँ से उठी थी पुकारें
वहाँ पर पड़ी हैं बौछारें
बैलों ने देखा
भैंस-गायों ने देखा
सूखें दरख़्तों की
छावों ने देखा

नीमों बबूलों से ऊँची-ऊँची घासें
ऎसी ही थी इनकी गहरी-गहरी प्यासें
सूखे हुए कुँए में मरी हुई मेंढकी
ज़िन्दा हुई टर-टर टर्राई रे
मौसम बदलते हैं भाई रे

आल भीगा पाल भीगा
भरा हुआ ताल भीगा
आकाश पाताल भीगा
पूरा एक साल भीगा
बरगदों में बैठे हुए
मोरों का शोर भीगा
आवाज़ें आई घिघियाई रे
मौसम बदलते हैं भाई रे

गड़रियों ने देखा
किसानों ने देखा
ग्वालों ने देखा
ऊँट वालों ने देखा

बारिश की अब दूर
चली गई झड़ियों को
खेतों में उखड़ी
पड़ी मूँगफलियों को
हल्दी के रंग वाले
तितली के पर वाले
अरहर के फूलों को
कोसों तक जंगल में
ज्वार के फूलों को

दूध जैसे दानों से
जड़े हुए देखा
खड़े हुए बाजरे को
पड़े हुए देखा

चूहों ने देखा
बिलावों ने देखा
साँपों ने देखा
सियारों ने देखा

आते हुए जाड़े में
हरेभरे झाड़ों की
कच्ची सुगंध महमहायी रे
मौसम बदलते हैं भाई रे

बंजारा नमक लाया

साँभर झील से भराया
भैंरु मारवाड़ी ने
बंजारा नमक लाया
ऊँटगाड़ी में

बर्फ़ जैसी चमक
चाँद जैसी बनक
चाँदी जैसी ठनक
अजी देसी नमक
देखो ऊँटगाड़ी में
बंजारा नमक लाया
ऊँटगाड़ी में

कोई रोटी करती भागी
कोई दाल चढ़ाती आई
कोई लीप रही थी आँगन
बोली हाथ धोकर आयी
लायी नाज थाळी में
बंजारा नमक लाया
ऊँटगाड़ी में

थोड़ा घर की खातिर लूँगी
थोड़ा बेटी को भेजूँगी
महीने भर से नमक नहीं था
जिनका लिया उधारी दूँगी
लेन देन की मची है धूम
घर गुवाळी में
बंजारा नमक लाया
ऊँटगाड़ी में

कब हाट जाना होता
कब खुला हाथ होता
जानबूझ कर नमक
जब ना भूल आना होता
फ़ीके दिनों में नमक डाला
मारवाड़ी ने
बंजारा नमक लाया
ऊँटगाड़ी में

या गाँव को बंटाढार बलमा

याकी कबहुँ पड़े ना पार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

इसकूल कू बनबा नाय देगौ
बनती इसकूल को ढाय देगौ
यामैं छँट-छँट बसे गँवार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

या कू एक पटैलाँई ले बैठी
काँई सरपंचाई ले बैठी
बोटन म लुटाया घरबार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

छोरी के बहयाव म लख देगौ
छोरा के म दो लख लेगौ
छोरा-छोरी कौ करै ब्यौपार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

या की छोरी आगे तक रौवै है
पढबा के दिनन कू खोवै है
चूल्हा फूँकै झकमार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

या का छोरा बिंगड़ै कोनी पढै
दस्सूई सूँ आगै कोनी बढै
इनकू इस्याई मिल्या संस्कार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

पैलाँई कमाई कम होवै
ऊपर सूँ कुरीति या ढोवै
बात-बात म जिमावै बामण चार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

कुटमन की काँई चलाई लै
भाई कू भाई देख जलै
यामै पनपै कैसे प्यार बलमा
या गाँव कौ बंटाढार बलमा

बनती कोई बात बनन ना दे
करै भीतर घात चलन ना दे
यामै कैसै सधै कोई कार बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

यामै म्हारी कोई हेट नहीं
दिनरात खटूँ भरै पेट नहीं
या गाँव म डटूँ मैं काँई खा र बलमा
या गाँव को बंटाढार बलमा

IMG_2652इस किताब का नाम ’बंजारा नमक लाया’ नहीं होता तो क्या हो सकता था? शायद ’प्रिय पानी’ हो सकता था. इसका एक बड़ा हिस्सा है जो पानी की कथा कहता है, पानी को याद करता है. पानी वहाँ एक स्मृति है, पानी वहाँ जीवन है, पानी अपने आप में संगीत है. उसकी अपनी ध्वनियाँ हैं. गिरने की, बरसने की. फिर ऎसा क्या रहा होगा जो किताब का नाम सिर्फ़ एक गीत के नाम पर रख दिया गया होगा. दरअसल यह भी एक कहानी जैसा है कि कोई गीत अपनी ही किताब पर भारी पड़े. मगर गीत में यह वज़न आया कहाँ से है? तो वह आया है इसकी प्रसिद्धि से. दरअसल प्रभात का यह गीत लिखे जाने के दिन से ही इतना प्रसिद्ध हुआ है कि इसे नज़र अंदाज करना किसी भी किताब में किन्हीं भी गीतों के बीच मुश्किल होता. राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के जिन-जिन इलाकों में इसे किसी ने गा दिया यह तुरंत ही वहाँ के लोगों की ज़बान पर चढ़ गया और उन्होंने इसे अपनाकर प्यार देना शुरु कर दिया. यह बात इस ओर भी संकेत करती है कि उदार बाज़ारवाद के इन दिनों में इन सभी इलाकों में कहीं ना कहीं जीवन इतना ही संघर्षमय है कि उन्हें नमक जैसी चीज़ पर लिखा गया गीत अपनी ज़रूरत महसूस होता है. इस गीत की खूबसूरती है कि इसमें एक तरफ़ तो नमक के इतने सुन्दर बिम्ब हमें मिलते हैं और दूसरी तरफ़ उसी नमक के लिए ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पूरी जटिलता के साथ उपस्थित है.

इस किताब में दो-तीन तरह के मिजाज़ के गीत हैं. एक वे जो सीधे-सीधे प्रकृति की सुन्दरता को प्रगट करते हैं. दूसरे वे जो प्रतिरोध की आवाज़ बन जाते हैं, तीसरे वे जो जीवन को उसकी वास्तविकता में बहुत ही मार्मिक ढंग से कहते हैं और चौथे वे जो पारंपरिक मिथक कथाओं को लेकर एक ख़ास शैली में लिखे गए हैं. इस शैली को ’पद गायन’ की शैली कहते हैं और यह राजस्थान के माळ, जगरौटी इलाके (करौली, सवाईमाधोपुर व दौसा ज़िले) में मीणा व अन्य जातियों द्वारा गाए जाते हैं. यही कारण है कि किताब को इस शैली के प्रसिद्ध कवि एवं लोक गायक धवले को समर्पित किया गया है. किताब में दो भाषाएं हैं जो हमारी बहुभाषिक संस्कृति की बानगी हैं. कुछ गीत खड़ी बोली हिन्दी में हैं, कुछ उस माळ की भाषा में जो प्रभात की संवेदनात्मक ज़मीन है.

यह किताब इस बात की गवाह है कि काव्य किस भाषा में है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह किस चेतना के साथ है. ’सीता वनवास’ पद की काव्य चेतना वह सारे सवाल हमारी मनुष्य सभ्यता के सामने खड़े करती है जिनकी अपेक्षा हम आज की किसी भी कविता से करना चाहेंगे. इसी तरह चाहे वह खड़ी बोली हिन्दी में लिखा ’धरती राजस्थानी है’ हो या माळ की भाषा में लिखा ’काळी बादळी’. दोनों में ही सूखे व अकाल की विभीषिका को व्यक्त करने वाली काव्य चेतना बहुत नज़दीक की है. इस किताब से गुज़रते हुए दो-तीन तरह की अनुभूतियाँ हो सकती हैं. एक स्थिति है जब आप नई भाषा व उसमें आए प्रकृति के नए बिम्बों के काव्य रसास्वादन से कुछ खुश व समृद्ध महसूस करते हैं. दूसरी स्थिति है जब वास्तविकता के वर्णन में काव्य की मार्मिकता आपको अन्दर तक भर देती है और आप उदास महसूस करते हैं. और तीसरी स्थिति है जब आप अपने समय पर किए जा रहे सवालों में शामिल हो जाते हैं, स्थितियों के प्रतिरोध के स्वर में शामिल हो जाते हैं, और अपने भीतर बदलाव की कोशिश करने की एक ताकत महसूस करने लगते हैं.

जब सपनों को सच में बदलने की ज़िद की जाती है तो वे विचार या कला की शक्ल लेते हैं. यह किताब देखे गए सपनों में से कुछ का सच में बदलना है. सपनों का वह हिस्सा जिसे आप अपने दम पर पूरा करने की कोशिश भर कर सकते हैं. –प्रमोद

Book cover

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

हरिश्चंद्राची फैक्टरी

यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.

harishchandrachi factory

इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे?

अच्छा जब तक तुम अपने मन का जवाब सोचो तब तक मैं तुम्हें बताता हूँ कि जब ऐसे ही आज से तकरीबन सौ साल पहले धुंडीराज गोविन्द फालके को मूवी कैमरा मिला तो उन्होंने किस चीज़ का वीडियो बनाया? अब तुम पूछोगे कि ये अजीब से नाम वाले ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ कौन हुए? अरे बताऊँगा, लेकिन पहले किस्सा तो पूरा सुनो. उन्होंने पहला वीडियो बनाया एक उगते हुए पौधे का. अब तुम कहोगे कि उगते हुए पौधे का कोई वीडियो कैसे बना सकता है. अरे भई पौधा कोई एक दिन में थोड़े न उग आता है कि बस कैमरा लगाया और बन गया वीडियो. पहले बीज डालो, फिर पानी डालो और लगातार उसकी देखभाल करो. तब हफ़्तों में कहीं जाकर एक बीज से पौधा तैयार होता है.

ठीक कहा तुमने. लेकिन फालके भी इतनी आसानी से हार मानने वाले कहाँ थे. उन्होंने इसके लिए एक अद्भुत तरकीब खोजी. उन दिनों हाथ से हैंडल घुमाकर चलाने वाले फ़िल्म कैमरा आते थे. तो फालके साहब ने क्या किया कि कैमरा गमले के ठीक सामने रख दिया और बिना उसे अपनी जगह से हिलाए वो रोज़ एक तय समय पर उसका हैंडल घुमा देते थे. ऐसा उन्होंने एक महीने तक लगातार लिया. फिर उस पूरी रील को धोकर एक साथ प्रोजेक्टर पर चलाया. और चमत्कार! ऐसा लगा जैसे हमने अपनी आँखों के सामने एक पौधा उगते देखा हो.

और यही थी हिन्दुस्तान में बनी पहली चलती-फिरती फ़िल्म. और इसे बनानेवाले थे ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ या दादासाहब फालके.

मुझे भी यह सब पहले से कहाँ पता था. हिन्दुस्तान में बनी पहली फ़िल्म की यह कहानी और उसके साथ जुड़ी दादा साहब फालके की कहानी का मुझे पता चला नई मराठी फ़िल्म ’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ से. निर्देशक परेश मोकाशी की बनाई यह फ़िल्म दादा साहब फालके के जीवन पर आधारित है. दादा साहब फालके हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक थे. उन्होंने ही हिन्दुस्तान में फ़िल्म निर्माण की शुरुआत की और उन्हें हिन्दुस्तानी फ़िल्म उद्योग का पितामह माना जाता है. आज भी भारत सरकार फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदान के लिए जो सबसे बड़ा सम्मान देती है उसे ’दादा साहब फालके’ सम्मान कहा जाता है.

लेकिन यह इतना आसान नहीं था. फ़िल्म बनाना तब नई-नई कला थी. हिन्दुस्तान में उस वक़्त फ़िल्म बनाने के बारे में कोई भी ठीक से नहीं जानता था. तरह तरह की अफ़वाहें फैली हुई थीं सिनेमा के बारे में. कोई कहता था यह आदमी से उसकी शक्ति छीन लेती है और कोई इसे अंग्रेज़ों का जादू-टोना बताता था. लेकिन गोविन्द फालके हमेशा से विज्ञान में रुचि रखते थे. विज्ञान से इसी गहरे लगाव के चलते उन्होंने फोटोग्राफी का व्यवसाय भी किया था और खुद जादू भी सीखा था. पहली बार अंग्रेज़ों के थियेटर में फ़िल्म देखकर वे इतने चमत्कृत हुए कि उन्होंने ऐसी ही फ़िल्म भारत में भी बनाने की ठान ली. क्योंकि यहाँ कोई इस कला के बारे में जानता नहीं था इसलिए उन्होंने अपने घर का सामान बेचा और जहाज़ से इंग्लैंड की यात्रा पर निकल पड़े. इंग्लैंड में रहकर उन्होंने फ़िल्म बनाने की पूरी कला सीखी. जब भारत वापस आये तो अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मिलकर फ़ैसला कर लिया कि हिन्दुस्तान की पहली फ़िल्म बनायेंगे. उन्हें उनके दोस्त अपनी ’घर फूँक, तमाशा देख’ प्रवृत्ति के कारण सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहते थे. तो उन्होंने भी तय किया कि पहली फ़िल्म सत्यवादी ’राजा हरिश्चन्द्र’ पर ही बनायेंगे.

फ़िल्म बनाते हुए भी बहुत सी मुश्किलें आईं. उस दौर में महिलाओं का नाटकों में काम करना बुरा माना जाता था और फ़िल्म तो वैसे भी एकदम नया माध्यम थी, कोई महिला फ़िल्म में काम करने को तैयार न हुई. ऐसे में पुरुषों को ही स्त्रियों के कपड़े पहन कर उनके रोल निभाने पड़े. और भी मुसीबतें थीं. फ़िल्म में स्त्रियों का रोल करने वाले पुरुष अपनी मूँछे मुंडवाने को तैयार नहीं थे. ऐसी मान्यता जो है कि मूँछें सिर्फ़ पिता की मौत के बाद मुंडवाते हैं. बड़ी मुश्किल से अभिनेता माने. फिर भी समाज में फ़िल्म में काम करने वालों को बुरी नज़र से देखा जाता था. इस मुश्किल के हल के लिए फालके ने कहा कि सारे लोग ये कहा करें कि वे ’फ़ैक्टरी’ में काम करते हैं, फ़िल्म बनाने वाली फ़ैक्टरी!

मई उन्नीस सौ तेरह में ’राजा हरिश्चन्द्र’ प्रदर्शित हुई और खूब सराही गई. सन उन्नीस सौ चौदह में फालके को फिर लंदन जाने का मौका मिला और वहाँ उनकी फ़िल्में बहुत सराही गईं. उन्हें वहाँ रहकर फ़िल्म बनाने के प्रस्ताव भी दिये गए लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तान में फ़िल्म उद्योग की स्थापना का जो सपना देखा था उसे पूरा करना उनका सबसे मुख्य ध्येय था. उन्होंने हिन्दुस्तान में ही रहकर सौ से ज़्यादा फ़िल्में बनाईं और भारत में फ़िल्म उद्योग की विधिवत शुरुआत की.

‘हरिश्चन्द्र फ़ैक्टरी’ के निर्देशक परेश मोकाशी ने फ़िल्म में दादा साहब फालके को एक ऐसे जुझारू इंसान के रूप में पेश किया है जिसने हर परेशानी का हँसकर सामना किया. फ़िल्म में एक घटना का ज़िक्र आता है. लगातार फ़िल्में देखते हुए एक रोज़ उन्हें आँखों में बहुत तकलीफ़ हुई और डॉक्टर को दिखाने पर उसने आँखों की रौशनी जाने की आशंका व्यक्त की. फालके यह सुनकर उदास हो गए. इसलिए नहीं कि आँखों की रौशनी चली जायेगी बल्कि इसलिए कि अगर उनकी आँखों की रौशनी चली गई तो फिर उनका फ़िल्म बनाने का सपना अधूरा जो रह जायेगा. ऐसे थे दादा साहब फालके!

*****

क्या तुम जानते हो:-

  • dadasaheb-phalkeफालके ने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की थी. उन्होंने कला भवन, बड़ौदा से मूर्तिकला और फोटोग्राफी सीखी. फिर उन्होंने गुजरात के गोधरा में एक फोटोग्राफी स्टूडियो खोला. लेकिन वो चला नहीं, लोगों में यह अफ़वाह जो फैल गई थी कि फोटो खिंचवाने से आदमी की ताक़त नष्ट हो जाती है.
  • वे प्रक्षिशित जादूगर भी थे. वे ’केल्फा’ नाम से जादू दिखाते थे. केल्फा मतलब समझे? अरे उनके नाम फालके का उल्टा केल्फा!
  • उन्होंने आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए भी काम किया. फिर उन्होंने अपनी प्रिटिंग प्रेस भी खोली. यहाँ उन्होंने महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के लिए भी काम किया.
  • जो पहली फ़िल्म दादा साहब फालके ने देखी थी वो थी ’लाइफ़ ऑफ़ क्राइस्ट’ और साल था उन्नीस सौ बारह.
  • दादासहब फालके की बनाई फ़िल्म ’राजा हरिश्चन्द्र’ जो हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म थी प्रदर्शित हुई 3 मई 1913 को और थियेटर था कोरोनेशन थियेटर, मुम्बई.
  • आगे चलकर उन्होंने अपनी फ़िल्म निर्माण कम्पनी स्थापित की जिसका नाम रखा ’हिन्दुस्तान फ़िल्म कम्पनी’.
  • भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले धुंडीराज गोविन्द फालके के सम्मान में उनके नाम पर भारत सरकार ने सन 1969 में ’दादा साहब फालके’ पुरस्कार की शुरुआत की. यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष था. यह पुरस्कार किसी व्यक्ति को सिनेमा के क्षेत्र में जीवन भर के अविस्मरणीय योगदान के लिए प्रदान किया जाता है. पहले साल इस पुरस्कार को गृहण करने वाली अभिनेत्री थीं देविका रानी. साल 2007 के लिए यह पुरस्कार गायक मन्ना डे को दिया गया है. और इस साल गुरुदत्त की फ़िल्मों के लाजवाब सिनेमैटोग्राफर  वी. के. मूर्ति को.

*****

अरे जिस सवाल से बात शुरु की थी वो तो अधूरा ही रह गया. वही वीडियो बनाने वाला. चलो मैं तुम्हें अपने मन की बात बताता हूँ. जब मैं छोटा था तो हर बरसात के मौसम में हमारे बगीचे में एक कुतिया छोटे-छोटे पिल्ले देती थी. पहले-दूसरे दिन तो वो इतने छोटे होते कि उनके मुँह भी ठीक से नज़र नहीं आते. वे बिलकुल गुलाबी होते. मुझे उनसे बहुत ही प्यार था. फिर तेज़ी से वो बड़े होने लगते. इधर-उधर भागते. मैं उन्हें एक के ऊपर एक रख देता और वो फिसल-फिसलकर नीचे गिरते. वे अलग-अलग पहचान में आने लगते. मैं उनके अलग-अलग नाम रख देता. चिंटू, प्यारू, भूरू, कालू. उनके साथ खेलने में बहुत मज़ा आता. इस पूरे दौर में उनमें से कुछ मर भी जाते. अगर मुझे कोई उस वक़्त वीडियो कैमरा दे देता तो मैं उनकी वीडियो ज़रूर बनाता. छोटे पिल्लों से बड़े होने की यात्रा. खूब सारी मस्ती और मज़ा. कितना मज़ेदार ख्याल है न! तुम बताओ, किसका वीडियो बनाते?

**********

एकलव्य की बाल-विज्ञान पत्रिका ’चकमक’ के दिसंबर अंक में प्रकाशित.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook