जब वी मेट : ‘किस्सा-ऐ-कसप’

आज फ़िल्मफेयर देखते हुए लगा कि यह पुरानी पोस्ट (13 नवम्बर) जो मैंने अपने ब्लॉग कबाड़ में डाल दी थी पोस्ट कर दी जानी चाहिए. आख़िर ‘गीत’ को एक के बाद एक पुरस्कार मिल रहे हैं! अब तो यह मुझ अकेले की तमन्ना का बयान नहीं. इससे identify करने वाले बहुत हैं. पढ़िये एक नितांत निजी टिप्पणी और उसके बाद इम्तियाज़ अली होने का अर्थ तलाशती ये ‘जब वी मेट’ की कसपिया व्याख्या..!

………………………………

“दिल्ली शहर एक परेशान सा ठिकाना है जो सुकून से कोसों दूर है. दोस्त भी पास नहीं, ना सितारेसब एक फासले पर रह गया है. कमरे में अकेलेसारे सुखन हमारेदोहराता मैं तनहा हूँना, अब मैं और सलाह नहीं दे सकता. अब रंग चाहिए. अब दूसरों की प्रेम कहानियाँ सुनना और हल तलाशना काफी हुआ. हाँ.. मुझे संगीत कुछ अधूरा सा लग रहा है. धुन तबतक अधूरी है जबतक उसे बोल मिलें. हाँ.. मेरा तराना अधूरा है. हाँ.. अब मुझे
=”font-family: georgia;”>
मेरी जिन्दगी में एक गीत चाहिए..”

………………..

क्या आपने कभी किसी कहानी से प्रेम किया है? पूरी शिद्दत से किसी कविता को चाहा है? किसी उपन्यास को दिल से लगाकर रातें काटी हैं? एक प्रेम कहानीसाधारण सीएक लड़का, एक लड़की और बहुत सारे संशय वाली. क्या कभी आप पर ऐसी छायी है कि उसका जादू आपके हर काम को अपने आगोश में ले ले? आप जब भी कोई नयी कहानी सुनाने बैठें, वही प्रेम कहानी रूप बदलकर आपकी जुबाँ पर आ जाए?

इम्तियाज़ अली ने एक प्रेम कहानी से ऐसा ही घनघोर प्रेम किया है. पहले एक टेलीफिल्म (स्टार के लिए ‘बेस्टसेलर’ में). फ़िर अभय देओलआयशा टाकिया के साथ पहली फ़िल्म ‘सोचा ना था’. उसके बाद ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ जो उस पुरानी टेलीफिल्म का ही रीमेक थी (इम्तियाज़ ने कहानी/स्क्रीनप्ले किया था). और अब ‘जब वी मेट’ आई है, उनकी दूसरी फ़िल्म. शाहिदकरीना के साथ. एक ही प्रेम कहानी रूप बदल-बदलकर… एक साधारण सी प्रेम कहानी, जिसमें एक लड़का है, एक लड़की है लेकिन “love at first sight” नहीं है. (तीनो फिल्में इसका उदाहरण हैं). शुरुआत में तो लड़के या लड़की को प्रेम भी किसी और से है (आप ‘सोचा ना था’ की कैरेल, ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ के धीरज और ‘जब वी मेट’ के अंशुमान को याद कर सकते हैं.) और फिर एक सफर है साथ… कभी गोवा, कभी दिल्ली और कभी रतलाम से भटिंडा तक! जिन्दगी का सफर.. कभी कंटीले रास्ते, कभी सुहानी पगडंडियाँ. याद आता है गोपीकृष्ण/राधाकृष्ण प्रेम जिसको सूरदास ने साहचर्य का प्रेम बनाकर प्रस्तुत किया. यह पहली नज़र का प्यार नहीं, यह तो रोज की दिनचर्या में पलता-बढ़ता है. रोज की अटखेलियाँ इसे सहलाती है. चुहल बात को आगे बढाती है और पता ही नहीं चलता कि कब प्यार हो जाता है.

और फ़िर हमेशा.. एक भाग जाने का सुर्रा है! संशय मूल थीम है और कहानी हमेशा ‘या की’ टोन बनाए रखती है. यह ‘कसपिया’ संशय है जो ‘ये प्यार है या ये प्यार है’ से उपजता है. अतार्किकता हावी रहती है और कहानी हमेशा “जब आप प्यार में होते हो तो कुछ सही-ग़लत नहीं होता” जैसे ‘वेद-वाक्य’ देती चलती है. मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि इम्तियाज़ अपने तकिये के सिरहाने ‘कसप’ रखकर सोते होंगे!

ये तो थी इम्तियाज़ की प्रेम कहानी एक प्रेम-कहानी से उधार! और अब अपनी और फ़िल्म की बात. तो मुझे गीत से प्यार हो गया. ऊपर का कथन टाइम-पास बकवास नहीं एक स्वीकारोक्ति था. और गीत है ही ऐसी की कोई भी उसपर मर मिटे! करने से पहले सोचा नहीं, जो सोचा वो कभी किया नहीं.. that’s geet for U! कुछ कमाल के संवाद नज़र हैं… नायिका नायक को कहती है, “तुम मेरी बहन के साथ भाग जाओ.” या “मैं अपनी फेवरेट हूँ!”. तमाम बातों के बावजूद नायिका का भिड़ जाने का अंदाज.. याद रहेगा. तो प्रेम कहानियो के सुखद अंत तलाशना बंद कर ‘जब वी मेट’ को इस नज़रिये से परखें. खासकर इम्तियाज़ द्वारा बनाये इसी प्रेम कहानी के अन्य रूपों के सामने रखकर जब वी मेट का अर्थ करें. नए अर्थ अपने आप खुलने लगेंगे.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

मिथ्या: खोई हुई पहचान की तलाश में

मैं जान जाता कि यह एक सपना है. लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से बच नहीं सकता. मृत्यु नहीं -तिरिछ द्वारा अपनी हत्या से- और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह मैं जाग जाऊं. मैं पूरी ताक़त लगाता, सपने के भीतर आँखें फाड़ता, रौशनी को देखने की कोशिश करता और ज़ोर से कुछ बोलता. कई बार बिलकुल ऐन मौके पर मैं जागने में सफल भी हो जाता.

माँ बतलाती कि मुझे सपने में बोलने और चीखने की आदत है. कई बार उन्होंने मुझे नींद में रोते हुए भी देखा था. ऐसे में उन्हें मुझे जगा डालना चाहिए, लेकिन वे मेरे माथे को सहला कर मुझे रजाई से ढक देती थीं और मैं उसी खौफ़नाक दुनिया में अकेला छोड़ दिया जाता था. अपनी मृत्यु -बल्कि अपनी हत्या से बचने की कमज़ोर कोशिश में भागता, दौड़ता, चीखता.”

उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ का अंश.


दुनिया का सबसे बड़ा डर क्या है?
…सपने आपके भीतर के डर और इच्छाओं को जानने का सबसे बेहतर ज़रिया हैं. मुझे सबसे डरावना सपना वह लगता है जहाँ मैं अकेला रह जाता हूँ. मेरे दोस्त
, मेरा परिवार, मेरी दुनिया मुझसे बिछुड़ जाते हैं. मैं अनजान भीड़ के बीच होता हूँ या अपनी जानी-पहचानी जगहों पर अकेला होता हूँ. मुझे पहचानने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में अक्सर मैं जागने की कोशिश करता हूँ. लेकिन कभी-कभी सपने के भीतर अचानक ऐसा लगता है कि यह सपना नहीं हकीक़त है और वह अहसास खौफ़नाक होता है. हाँ, दुनिया का सबसे बड़ा डर अकेलेपन का डर होता है. अपनी पहचान के खो जाने का डर होता है. अपनी दुनिया से बिछुड़ने का डर होता है.
इस नज़रिये से देखने पर
मिथ्या का दूसरा हिस्सा एक डरावना अनुभव है. वी.के. (रणवीर) बारबार इसे सपना समझकर जागने की कोशिश करता है. लेकिन वह सपना नहीं है. उसे समझ नहीं आता कि क्या सपना है और क्या सच? वह चिल्लाता हैतुमने कहा था कि कुछ नहीं बदलेगा.” और आख़िर में वह अपनी एकमात्र याद रही पहचान से भी ठुकराया जा चुका है. वी.के. एक ऐसा शख्स है जिसका सबसे डरावना सपना सच हो गया है.
दोस्तों को नायक की मौत पर कहानी का अंत एक त्रासद अंत लग सकता है लेकिन मैं इससे असहमत हूँ. वी.के. का अंत दरअसल उसके सपने का भी अंत है. उसकी ‘जागने’ की निरंतर कोशिश एक बंदूक की गोली उसके भेजे में जाने के साथ ही सफल हो जाती है. गोली लगने के साथ ही उसका खौफ़नाक सपना टूट जाता है और उसे एक फ्लैश में सब याद आ जाता है. उसकी आखिरी पुकार
सोनल में एक चैन, एक संतुष्टि, एक सुकून सुनाई देता है. यह त्रासद अंत नहीं. वी.के. एक कमाल का दोहराव रचते हुए एक परफैक्ट मौतमरता है जो फ़िल्म के पहले दृश्य से उसकी तमन्ना थी. मौत उसे अपनी खोई हुई पहचान, खोई हुई जिंदगी से जोड़ देती है.
मैं यह कहने में हिचकूंगा नहीं कि फ़िल्म पर रजत कपूर से ज्यादा सौरभ शुक्ला की छाप नज़र आती है. यह मिक्स डबल्स जैसी नहीं है और भेजा फ्राई जैसी तो बिलकुल नहीं है. हाँ रघु रोमियो के कुछ अंश यहाँ-वहां दिख जाते हैं. मरीन ड्राइव (नेकलेस) के फुटपाथ पर बैठे अथाह/अनंत समंदर की तरफ़ देखते और दारु पीते वी.के. की छवि सत्या के भीखू की याद दिलाती है. जैसा मदनगोपाल सिंह कहते हैं यह उत्तर भारत के छोटे शहरों से वाया दिल्ली (
NSD) होते मुम्बई आए लड़कों की पौध का दक्षिण भारत के उन्नत तकनीशियन निर्देशकों से लेखक के तौर पर मिलन से उपजा सिनेमा है. मिथ्या मुझे अनेक पूर्ववर्ती फिल्मों की याद दिलाती रही जिनमें से कुछ की चर्चा मैं यहाँ करना चाहूँगा.

सत्या– फ़िल्म पर RGV स्कूल की छाप साफ नज़र आती है. इसका सीधा कारण फ़िल्म से लेखक के रूप में सौरभ शुक्ला का जुड़ा होना है. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को देखने की नई यथार्थवादी दृष्टि थी जो सत्या में उभरकर सामने आई थी. विनय पाठक ने ओशियंस सिने फेस्ट में मिथ्या के प्रीमियर में कहा भी था कि डॉन लोग कोई चाँद से नहीं आए हैं. वे भी हमारे-आपके जैसे इंसान हैं. यह दृष्टि सौरभ शुक्ला, अनुराग कश्यप, जयदीप सहनी जैसे लेखकों की बदौलत आई थी और आज फैक्टरीकी बुरी हालत के पीछे इन लेखकों का अलगाव एक बड़ा कारण माना जा रहा है. मिथ्या में यह दृष्टि इंस्पेक्टर श्याम (ब्रिजेन्द्र काला) के किरदार में बखूबी उभरकर आई है. एक बेहतरीन अदाकार जिसके काम की पूरी तारीफ ज़रूरी है बिना किसी हकलाहट के!

डिपार्टेड– मार्टिन स्कोर्सेसी की यह थ्रिलर दो परस्पर विरोधी योजनाओं के उलझाव से निकली कहानी है. मुझे वी.के. की दुविधा में लिओनार्दो की दुविधा का अक्स दिख रहा था. lost identities की कहानी के रूप में और अपनी खोई पहचान वापस पाने की लड़ाई के तौर पर यह दोनों फिल्में साथ रखी जा सकती हैं. कुछ और नाम भी याद आ रहे हैं नेट और बरमूडा ट्राएंगल जैसे. कभी विस्तृत चर्चा में बात करेंगे.

दिल पे मत ले यार– यह मिथ्या की नेगेटिव है. इसमें सपना खौफनाक नहीं है, सपने के टूटने के बाद की असल तस्वीर खौफनाक है. हिन्दी सिनेमा का सबसे त्रासद अंत. मिथ्या का अंत मौत के बावजूद सुकून देता है. दिल पे मत ले यार का अंत कड़वाहट से भर देता है. असल जिंदगी अपनी तमाम ऐयाशियों के साथ किसी भी खौफनाक सपने से ज़्यादा भयावह है. मिथ्या के अंत में नायक की मौत सुकून देने वाली है. सुकून इस बात का कि आखिरकार वह अपने भयावह सपने की कैद से आजाद हो गया है. इसके विपरीत दिल पे मत ले यार के अंत में दुबई में बैठे अरबपति डान रामसरन और गायतोंडे सफलता के नहीं, मौत के प्रतीक हैं. मासूमियत की मौत, भरोसे की मौत, इंसानियत की मौत. मुम्बई शहर को आधार बनाती दो बेहतरीन फिल्में जो उत्तर भारत से आए दो युवकों के भोले सपनों और महत्वाकांक्षाओं की किरचें बिखरने की कथा को मायानगरी के वृहत लैंडस्कैप में चित्रित करती है. मुम्बई शहर पर चर्चित और प्रशंसित फिल्में कम नहीं लेकिन यह दोनों अपेक्षाकृत रूप से कम चर्चित फिल्में 90 के बाद बदलते महानगर और उसके जायज़- नाजायज़ हिस्सों पर तीखा कटाक्ष हैं. इन्हें उल्लेखनीय हस्तक्षेप के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए.

अंत में रणवीर शौरी. मेरी पसंद. उसमें मेरे जैसा कुछहै. मिथ्या में पहले आप उसके लिए डरते हैं, फ़िर उसके साथ डरते हैं और अंत में उसकी जगह आप होते हैं और आपका ही डर आपके सामने खड़ा होता है. यह साधारणीकरण ही रणवीर के काम की सबसे बड़ी बात है. कुछ दृश्यों में उसका काम आपपर हॉंटिंग इफेक्ट छोड़ जाता है. जब भानू (हर्ष छाया) उसे अपने भाई का कातिल समझ कर मार रहा है वहां उसकी पुकार “भानू, मैं तेरा भाई हूँ.” एक ना मिटने वाला निशान छोड़ जाती है. एक ही फ़िल्म में हास्य और त्रासदी के दो चरम को साधकर उसने काफी कुछ साबित कर दिया है.

मिथ्या देखा जाना चाहती है. उसकी यह चाहत पूरी करें.

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

अच्छर मन को छरै बहुरि अच्छर ही भावै

रवीश ने अपने ब्लॉग पर यह चर्चा शुरू की है कि किसने पुस्तक मेले से क्या खरीदा यह शेयर किया जाए. तो मुझे लगा कि ‘सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए’ की परम्परा पर चलते हुए मुझे भी यह ‘पुण्य कर्म’ कर ही देना चाहिए! मेरे लिए यह तीसरा पुस्तक मेला था. दिल्ली आने के बाद दूसरा. पहली बार जब दादा,भाभी के साथ दिल्ली पुस्तक मेले में आया था उन दिनों उदयपुर में बी. ए. में पढ़ा करता था. दूसरा मेला मेरे दिल्ली रहते हुआ और तब से मैं दादा,भाभी के लिए दिल्ली में होस्ट हूँ. अब मैं कह सकता हूँ कि मैंने अपने 22 साल के जीवन में चार क्रिकेट वर्ल्डकप और तीन विश्व पुस्तकमेले देखे हैं.

Delhi Metropolitan:The Meking of an Unlikely City. Ranjana Sengupta. Penguin Books.
पिछले दिनों अपने सेमिनार के सिलसिले में मैंने ‘खोंसला का घोसला’ में मध्यवर्ग, शहरीकरण और लिविंग स्पेस की संरचना पर काम किया. यह फ़िल्म दिल्ली को अपना आधार शहर बनाती है और इस शहर की बदलती सत्ता संरचना का एक कमाल का पाठ रचती है. एक पंक्ति में कहूं तो यह फ़िल्म एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की ‘यमुना पार’ या ‘पुरानी दिल्ली/ दिल्ली 6’ से निकलकर ‘साऊथ दिल्ली’ वाला बनने की तमन्ना का मुकम्मल बयान है. तमाम चिन्ह इस पाठ से निकलते हैं जिनमें से कुछ को मैंने अपने पर्चे में पकड़ने की कोशिश की. तो स्वाभाविक था कि मेले में दिल्ली पर आया एक नया अध्ययन देखकर मेरा मन मचल जाए. और दादा ने कहते ही किताब दिलवा दी.
Anna Karenina. Lev Tolstoy. Raduga Publications.
हाँ मैंने अभी तक अन्ना केरेनिना नहीं पढ़ी है. लेकिन इसे खरीदने का केवल यही कारण नहीं था. करीब तीन साल पहले मैंने अपना पहला लेख (प्रकाशित) जो लिखा था उसका विषय बचपन में पढ़ी रूसी कहानियों की याद था. दोस्त कहते हैं कि बहुत nostalgic लेख था. शायद वो सही कहते हैं. आज भी मुझे पुराने प्रगति प्रकाशन/ रादुगा प्रकाशन से एक लगाव सा है. वो मुझे मेरा बचपन याद दिलाते हैं जो बहुत खूबसूरत था. (तब नहीं लगता था, आज लगता है.) तो मैं ना केवल अन्ना कैरेनिना पढ़ना चाहता था बल्कि उसे उसी पुराने रूसी अनुवाद वाले कलेवर में पढ़ना चाहता था. किस्मत कि वो मुझे PPH पर आसानी से मिल गया.
साफ माथे का समाज. अनुपम मिश्र. पेंग्विन बुक्स.
अनुपम मिश्र की ‘आज भी खरे हैं तालाब’ एक चर्चित किताब रही है. मैंने इनके बारे में तब ज़्यादा जाना जब मैं MA में गाँधी पर बनी फिल्मों पर एक शोध कर रहा था. हालांकि अभी भी पढ़ा नहीं है लेकिन दादा का कहना है कि मुझे इन्हें पढ़ना चाहिए. और फ़िर जीतू भैया की वजह से हमें पेंग्विन पर ख़ास डिस्काउंट भी मिल रहा था. तो ऐसे में यह खरीद बिल्कुल मुफ़ीद रही!
A Roland Barthes Reader. Edi. Susan Sontag. Vintage.
सेमिनार पेपर के लिए संरचनावाद पढ़ा (द्वितीयक स्रोत से) और फ़िर लिखा. संदर्भ पर विवाद हो गया. और मैं मूल देखते ही ले आया. अब मूल पढने की कोशिश करूँगा और सामने वाले को विवाद का कोई मौका ही नहीं दूंगा. वैसे भी मुझे आजकल संरचनावादियों में रोलां बार्थ सबसे ज़्यादा आकर्षित कर रहे हैं.
अम्बेडकर साहित्य. सभी गौतम बुक सेंटर से प्रकाशित
हिन्दू धर्मं की रिडल.
अछूत कौन और कैसे.
जाति भेद का उच्छेद.
शूद्रों की खोज.
बुद्ध और उनका धम्म.
इसमें अब क्या शक है के अम्बेडकर को पढ़ना बहुत ज़रूरी है. चाहता तो था कि पूरा समग्र खरीद लिया जाए लेकिन अभी इतने से ही संतोष कर लिया है. दादा भी ले जाना चाहता था. लेकिन अभी पहले मुझे मिल गया है.
A World To Win. Essays on Communist Manifesto. Leftword.
लेफ्टवर्ड वाले आधी कीमत पर बेच रहे थे. केवल चालीस रूपये!
याद के लिए:- यह किताब
कभी मैंने पापा को गिफ्ट की थी.
निबंधों की दुनिया. विजयदेव नारायण साही. वाणी प्रकाशन.
दोस्तों हिन्दी में M.Phil. कर रहा हूँ. पढ़ना पढता है सारा कुछ. अब तो पर्चे नज़दीक आ रहे हैं.
Fantasies of a Bollywood Love Thief. Stephen Alter. Harper Collins.
मेरी सबसे पसंदीदा ख़रीद. यह किताब ‘ओमकारा‘ के बनने के दौरान लिखी गई है लेकिन इसमें हिन्दुस्तानी सिनेमा से जुड़े और कई मज़ेदार किस्से भी हैं. रविकांत ने इसका ज़िक्र कर तिल्ली लगाई थी सबसे पहले. उसका ही नतीजा है यह ख़रीद.
हाँ, मैंने जिंदगी जी है. पाब्लो नेरुदा. अनुवादक मनीषा तनेजा. कांफ्लुएंस इंटरनेशनल.
पाब्लो नेरुदा की आत्मकथा का सीधा स्पेनिश से हिन्दी अनुवाद. मनीषा का किया मर्ख्वेज़ का अनुवाद ‘एकाकीपन के सौ साल’ आपने पिछले दिनों देखा होगा. मैंने उस उपन्यास का सौम्या सुरभि गुप्ता वाला अनुवाद पढ़ा था. तो मैं मनीषा तनेजा का किया यह पहला अनुवाद पढूँगा. देखें इसका नंबर कब आता है.
सिनेमा के शिखर. प्रदीप तिवारी. संवाद प्रकाशन.
विश्व सिनेमा के चर्चित फिल्मकारों के जीवन और सृजन पर लेख हैं. मुझे एक परिचयात्मक जानकारी मिलने की उम्मीद है.
अपनी धरती, अपना आकाश. विजय शर्मा. संवाद प्रकाशन.
एक और परिचयात्मक किताब. नोबल विजेताओं के जीवन/विचार/रचना पर केंद्रित.
हंसने वाला कुत्ता. सत्यजित राय. प्रकाशन विभाग.
सत्यजित राय बचपन से मेरे प्रिय कहानीकार रहे हैं. उनकी कहानियाँ जब भी कहीं हिन्दी में मिल जाएं, मैं नहीं छोड़ता. और जो दोस्त आजकल ‘तारे ज़मीन पर’ देखकर बौराए हुए हैं उन्हें मेरी सलाह है कि सत्यजित राय की कहानी ‘सदानंद की छोटी दुनिया’ एकबार ढूंढकर/खोजकर/तलाशकर ज़रूर पढ़ें.
जो ख़रीदा था और उसमें से जो उदयपुर जाने से बच गया, मेरे पास रह गया वो सब बता दिया है. अब यह मत पूछियेगा कि क्या पढ़ा? कितना पढ़ा? कब पढ़ा? 2007 में शुरू किया उपन्यास ‘काइट रनर’ तो अभी तक जारी है. अब और क्या कहूँ. फ़िर भी उम्मीद है और उम्मीद पर ही दुनिया कायम है! सलाम!
Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी

मीडियानगर 03 पर बातचीत
फ़रवरी की शाम छ: बजे,
ऑक्सफ़र्ड बुक स्टोर, कनॉट प्लेस, दिल्ली.

फिज़ाओं में क्या था:- वक्ताओं के पीछे एक नारंगी रंग की दीवार थी जिसपर बहुत सारे शब्द बिखरे हुए थे. ये मुझे ‘तारे ज़मीन पर’ के शुरूआती दृश्य की याद दिला रहा था जिसमें हमारा कुल-ज़मा लिखा पढ़ा सब कुछ एकसाथ बरसता सा लगता है. हाँ, बीच में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था vernacular. कई बार ये बेतरतीब चुनाव की प्रणाली भी कितने अर्थ व्यंजित करने लगती है ना. वैसे मानने वाले ये भी मान सकते हैं कि वो ‘vernacular’ वहाँ यूं ही नहीं था. क्योंकि हर बेतरतीब नमूने के पीछे एक नजरिया होता है.
पार्श्व में बार-बार NDTV के नये शाहकार ‘रामायण’ की ध्वनि “जय श्री राम” गूँज उठती थी और सामने बैठे NDTV के अविनाश सिर्फ़ अपनी मौजूदगी से ही एक कमाल का विरोधाभास पैदा कर रहे थे. अब जब किसी संवाद का माहौल ही ऐसा कोलाजनुमा हो गया हो तो बातचीत को तो उस तरफ़ जाना ही हुआ!

बात-चीत:- अनुवाद पर हुई बातों को ज़रा देर के लिए छोड़ दें तो आनंद प्रधान की बातों से निकली बात ही आगे बढ़ती गई. बात ठीक थी और सवाल भी कि “आज का हमारा मीडिया आखिर जा कहाँ रहा है?” लेकिन मुझे बार बार लगता रहा कि जो छोटी पहलकदमियाँ इसके बरक्स खड़ी होंगी उनपर बात होती तो कैसा होता. लेकिन इस ‘यूं होता तो क्या होता’ का अब क्या जवाब…
जैसे ये भी एक सवाल है कि हमें वहाँ ये बात करने की बजाए कि mainstream media क्या और क्यों छाप रहा है ये बात करनी चाहिए थी कि medianagar में क्या छपा? सीधा कहूँ तो हमें ज़रूर पहले दोनों वक्ताओं राहुल और देबश्री के लिखे पर बात करनी चाहिए थी जो हमनें नहीं की. ‘मल्लिका सेहरावत’ और ‘राखी सावंत’ के कारनामों को सिनेमा की ख़बर कहकर दिखाते मीडिया को देबश्री का मुम्बई सिनेमा पर किया काम जवाब हो सकता है. या कम से कम एक विकल्प तो हो ही सकता है. तो उसपर बात करनी तो रह ही गयी. और मैं भी बात ना करने वालों में से एक था तो ये इल्जाम मुझपर भी है. उम्मीद है कि आगे होने वाली बातचीत इस मुद्दे को साध लेंगी.

ठोस:- संजीव के तरकश में कई पैने तीर थे जो उन्होंने चलाये. मुझे जो बात सबसे ज्यादा सोचने वाली लगी उसका ज़िक्र कर रहा हूँ. इसलिए भी कि इसका ठीक जवाब मुझे भी नहीं मालूम. उन्होंने कहा कि पूरे अंक की भाषा का स्वाद एक जैसा है. ये मानते हुए कि ये स्वाद बहुत स्वादिष्ट है ये भी मानना पड़ेगा कि एकरसता कभी अच्छी नहीं लगती. उनका कहना था कि ऐसा लगता है जैसे सारा अनुवाद एक ही व्यक्ति ने कर दिया हो. अब मैं इस बहस में नहीं जा रहा कि उनका ये आकलन medianagar के बारे में कितना सही है. मेरा सवाल ज्यादा बड़ा है जो और दिमागों में भी आया होगा. हर पत्रिका समय के साथ अपना एक ख़ास कलेवर/एक ख़ास आकार लेती है. यही उसकी पहचान बनाता है. अब पहला सवाल तो ये है कि क्या भाषा भी इस पहचान का एक हिस्सा है? और दूसरा ये कि इसका एक ख़ास स्वरूप में ढलकर पत्रिका की पहचान बनना ज्यादा ठीक है या भाषागत वैविध्य ज्यादा ज़रूरी है? इस सवाल को यूं देखिये कि क्या ‘पहल’ ‘तद्भव’ ‘हंस’ में भी भाषागत एकरसता दिखती है? और अगर हाँ तो वो क्यों और कितनी ठीक है?

दिल की बात:- मेरे लिए तो वो एक निजी कोलाज था. मेरे दो भूतपूर्व गुरु मुझे मेरे ‘रंग दे बसंती’ ( अर्थात ‘क्या करें, क्या ना करें’ वाले दिन) दिनों की याद दिला रहे थे. आनंद प्रधान IIMC में बीते एक महीने की और देवेन्द्र चौबे JNU की जागती रातों की याद ताज़ा कर गए. और इस तस्वीर को मुकम्मल करने अचानक पीछे खड़ा आदित्य राज कौल दिखा (शायद किताब ख़रीदने आया था) और उसके तुरंत बाद राहुल ने बोलते हुए शिवम्

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

“मामूली चीजों के देवता का आगमन.”

मामूली चीजों के देवता का आगमन. लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा 2007.
…….
यकीन मानिये 2007 शाहरुख खान का साल नहीं था. हाँ ये सच है कि साल की दो सबसे कमाऊ फ़िल्में उनके नाम हैं लेकिन यकीनन साल 2007 की पहचान king khan से नहीं, kabeer khan से होगी. और यही चक दे का कबीर खान हमें उस हौले से होती सुगबुगाहट की आवाज़ सुनाता है जो धीरे-धीरे तेज़ हो रही है. शोर बन रही है. केन्द्र टूट रहा है. परिधि के बाशिंदे केन्द्र में आ रहे हैं. शाहरुख ही हमें बताते हैं कि इस साल का मुम्बईया सिनेमा महानायक की स्तुति नहीं, आम आदमी का जयगान है. सबूत भी उन्हीं से लीजिये! मैं यहाँ कबीर खान के हवाले से दो बातें कहना चाहूँगा:-
1. चक दे इन्डिया जितनी ज़िद्दी कोच कबीर खान की फ़िल्म थी उतनी ही वो उन तेरह अनजान चेहरों की फ़िल्म भी थी जिनकी ताज़गी से सिनेमा जगत अभी तक चमत्कृत है. और कबीर खान भी तो उस मीर रंजन नेगी का आईना था जो जिन्दगी की लड़ाई हारने वालों का प्रतिनिधित्व करता है. उसका वो खटारा बजाज स्कूटर कौन भूल सकता है जिसे वो दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर बेधड़क चलाता रहा.
2. King khan के ही हवाले से ये भी बताता चलूं कि साल की सबसे बड़ी हिट OSO का नायक बिगडैल स्टार पुत्र ओम कपूर (OK) नहीं था, एक जूनियर आर्टिस्ट और जिन्दगी की लड़ाई हारने वाला अदना सा इंसान ओम प्रकाश मखीज़ा ही था. ओम प्रकाश मखीज़ा ही OSO का नायक था. आप ओम कपूर पर हँसेंगे, लेकिन ओम प्रकाश मखीज़ा के साथ रोयेंगे. और OK के किरदार की असल व्याख्या हम वक्त आने पर करेंगे ही!

ब्लैक फ़्राईडे के बादशाह खान से मनोरमा सिक्स फ़ीट अन्डर के सतवीर सिंह तक यह उसी अदना से इंसान की कथा है जिसे अब परिधि पर बैठना मंज़ूर नहीं. नये केन्द्रों की संरचनाओं के साथ ही बालीवुड अधिक से अधिक व्यक्तिगत पहचानों को टटोल रहा है, ’लोकेल’ की कहानियां कह रहा है, शहर की हर सिम्त को खोल रहा है. मैं 2007 में हिन्दी सिनेमा के साथ हुई कुछ अच्छी बातों को यहाँ लिख रहा हूँ…

पैशन फॉर सिनेमा. सुधीर मिश्रा के साथ पूरी टोली है अनुराग कश्यप, ओनीर, नवदीप सिंह जैसों की जो www.passionforcinema.com पर जमकर खड़े हैं और यशराज कैम्प से लोहा ले रहे हैं. कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि साल की सबसे कमाल की फ़िल्में/खूबसूरत फ़िल्में/प्रयोगात्मक फ़िल्में यहीं से निकली हैं. पिछले एक साल में मैंनें यहां कई बेहतरीन लेख और cinema debates पढी़ हैं. आप नमूना देखना चाहें तो अभी PFC पर अनुराग का लिखा लेख देख सकते हैं. अनुराग कश्यप ने हमें तारे ज़मीन पर के असली हीरो से मिलवाया है! हिन्दी सिनेमा में आ रही एकध्रुव अवधारणा (यशराज के सौजन्य से!) को तोड़ने की कामयाब कोशिश.
पिछले साल मैंनें रंग दे बसन्ती और मुन्नाभाई की धूम के सामने जिस फ़िल्म को MOVIE OF THE YEAR के तमगे से नवाज़ा था वो थी खोसला का घोसला. जयदीप की लिखी यह कहानी अपने अन्दाज़ में निराली ही थी. लेकिन जैसा मैंनें कहा, साल 2007 परिधि के मुख्यधारा की ओर आने का साल है. और ऐसे में किसी एक फ़िल्म को MOVIE OF THE YEAR कहना उस बहुलता का नकार होगा जिसे हम इस साल की खासियत कह रहे हैं. और यह तब और भी ज़रूरी हो जाता है जब आपको KKG की सुगंध अनेक फ़िल्मों में बिखरी मिले. तो आईये देखें 2007 हमें क्या देकर जा रहा है. मैं इसबार शुरुआत 7 ख़ास फिल्मों की बात से करूँगा. वो सात फिल्में जिन्होंने मेरी नज़र में इस साल को पहचान दी. जो मुझे अब भी मेरे दिल के क़रीब लगती हैं. इस चुनाव का एकमात
Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

प्रेम के पक्ष में…

साल 1986. राजीव गाँधी ने ये दाँव खेला था. मुस्लिम कट्टरपंथियों को फायदा पहुँचाने के लिये शाहबानो केस में फैसला पलटा गया और हिंदु कट्टरपंथियों को अयोध्या में ताला खोल चुप कराया गया. कुछ दोस्त शाहबानो केस को मुस्लिम तुष्टीकरण कहते हैं और ये भूल जाते हैं कि आधी मुस्लिम आबादी उन महिलाओं की है जिनका हक़ छीना गया. और सच शायद यही है. हर समुदाय में वो महिला ही तो है जो हर बार इस प्रकार के ‘तुष्टीकरण’ के नतीजे भुगतती है.
……
साल 2007. प. बंगाल में CPM की सरकार आलोचना के घेरे में है. नंदीग्राम में जो हुआ और जो हो रहा है वह हमारी आँखें खोलने के लिये काफ़ी है. हम सभी जो अपने आपको मार्क्सवाद से किसी ना किसी तरह जुडा पाते हैं. लेकिन कुछ और भी है जिसे यूँ नहीं छोड़ा जा सकता…
पहले नंदीग्राम और फ़िर रिज़वान का मामला, कहा गया कि CPM का ‘मुस्लिम वोट बैंक’ टूट रहा है. और फ़िर कल कलकत्ता में हुई हिंसा.. और आज रात मैं TV पर देख रहा हूँ कि तस्लीमा को रातोंरात कलकत्ता छोडना पडा है. शायद हिंसा की आशंका.. शायद सरकार की सलाह पर.. पता नहीं. एक बार फ़िर एक महिला ने ‘तुष्टीकरण’ का नतीजा भुगता है. शायद अब CPM का ‘मुस्लिम वोट बैंक’ बच जाये…
मैं व्यक्तिगत रूप से तसलीमा के लेखन का प्रशंसक नहीं रहा हूँ. लेकिन “हमारे समाज में हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक़ है” इसके पक्ष में जम के खडा हूँ. और अपनी तरह से जीने का हक़ है चाहे वो सबको रास आये या न आये. और हमारे समाज को इतना संवेदनशील तो होना ही चाहिये कि वो तसलीमा को भी उतनी ही जगह (space) दे जितना मुझे मिली है. और ये लडाई उसी ‘Room for one’s own’ के लिये है.
……
तसलीमा का कलकत्ता से जाना सिर्फ एक घटना भर नहीं है. ये एक प्रेमी-प्रेमिका का बिछुडना है. तसलीमा ने कलकत्ता से प्रेम किया है. वो उसके लिये तड्पी हैं, उसे उलाहना दिया है, उससे रूठी हैं, उसे मनाया भी है. वो उन्हें अपने घर की याद जो दिलाता है. बीता बचपन, गुज़रा साथी, छूटा दोस्त…
पढिये ये कविता ‘कलकत्ता इस बार…’ जो उन्होंनें हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रहते हुये लिखी थी. भूमिका में वे लिखती हैं, “चार्ल्स नदी के पार, केम्ब्रिज के चारों तरफ़ जब बर्फ़ ही बर्फ़ बिछी होती है और मेरी शीतार्त देह जमकर, लगभग पथराई होती है, मैं आधे सच और आधे सपने से, कोई प्रेमी निकाल लेती हूँ और अपने प्यार को तपिश देती हूँ, अपने को ज़िन्दा रखती हूँ. इस तरह समूचे मौसम की नि:संगता में, मैं अपने को फिर ज़िन्दा कर लेती हूँ.”

आज इस कविता की प्रासंगिकता अचानक बढ गयी है…

कलकता इस बार…
इस बार कलकता ने मुझे काफी कुछ दिया,
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,
छि: छि:, धिक्कार,
निषेधाञा
चूना-कालिख, जूतम्-पजार
लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे गुपचुप और भी बहुत कुछ,
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें
रीता-पारमीता की मुग्धता
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने
2 नम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,
आसमान नहीं तो और क्या है?
कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें, लाल-सुर्ख गुलाबों से,
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में.
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खूब.
सबको दिखा-दिखाकर, चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड्.
कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है, बिल्कुल सगी माँ जैसा,
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,
कि वह प्यार करता है.
चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिये रटती रहती हूँ-कलकत्ता! कलकत्ता!
अब अगर न भी करे प्यार, भले दुरदुराकर भगा दे
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे, खडी रहूँगी, बेअदब लड्की की तरह!
अगर धकियाकर हटा भी दे, तो भी मेरे कदम नहीं होंगे टस से मस!
क्यों?
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नही?

-तसलीमा नसरीन
‘कुछ पल साथ रहो…’ से (
अनुवाद- सुशील गुप्ता)

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

उदय भारतीय क्रिकेट के युवराज का

yuvrajइंडिया-इंग्लैंड मैच मे देखी गई उस स्वर्गिक पारी के बाद जिसे युवराज ने कंगारुओं के ख़िलाफ़ दोहरा दिया. खेल में देखे गए सबसे शुद्ध बल्लेबाजो में से एक के लिए…


“दिनों, महिनों, साल लोग इंतज़ार करते हैं। आसमाँ की ओर सर करके दुआएँ करते हैं। उस एक शाम का जब उनकी दुआ कुबूल होगी. और फ़िर एक दिन आसमान से नूर बरसता है. उस दिन उनकी दुआ कुबूल होती है और युवराज आता है।”


…………..
कहा गया था कि युवराज में ग्रीम पोलक और गैरी सोबर्स के बीच का क्रॉस दिखाई देता है। मुझसे जब भी पूछा गया कि अपना पसन्दीदा बल्लेबाज बताओ तो हमेशा गिब्स के बाद मैं युवराज का ही नाम लेना चाहता था। मेहनत और लगन में स्टीव वॉ से लेकर राहुल द्रविड़ तक का नाम आयेगा लेकिन दर्शनीयता में लारा और गिब्स के बाद युवराज का उदय हुआ है। यहाँ बल्लेबाजी में पानी सी तरलता है. शफ़क-शुद्धता. लेकिन मेरी ज़ुबाँ रुक जाती थी. युवराज का नाम लेने के लिये मुझे एक ज़मीन चहिये थी. मेरी हिचक आज गयी है. मुझे मेरी ज़मीन मिल गयी. ये 20-20 विश्व कप की पारियाँ पहली नहीं हैं युवराज को जानने के लिये लेकिन अब लग रहा है की भारतीय क्रिकेट का ये बिगड़ा बच्चा वापिस अपने काम पर है!
Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook

चक दे इंडिया : हुँकारा आज भर ले…

chak de india

ये एक अजीब सी तुलना है. पिछले सप्ताह मैनें अमिताभ को “सी.एन.एन. आई.बी.एन.” पर बोलते सुना. स्वतंत्रता दिवस के दिन अमिताभ अपनी पसन्दीदा फिल्मों के बारे में बात कर रहे थे. अम्रर अकबर एन्थनी की बात आने पर उन्होनें कहा कि हम सभी को लगता था कि इतना अतार्किक विचार कैसे चलेगा? संयोगों और अतार्किकताओं से भरी ये कहानी सिर्फ मनमोहन देसाई के दिमाग का फितूर है. आज भी हम उस फिल्म के पहले दृश्य को देखकर हंसते हैं. एक नली से तीनों भाइयों का खून सीधा माँ को चढता हुआ दिखाया जाना एक मेडिकल जोक है। लेकिन इन सबके बावजूद कुछ है जिसने देखने वाले से सीधा नाता जोड़ लिया. सारी अतार्किकतायें पीछे छूट गयीं और कहानी अपना काम कर गयी. अब आप क्या कहेंगे इसे…
srk
मैं इसे एक फिल्मी नाम देता हूँ… दिल का रिश्ता. पिछ्ले ह्फ्ते शिमित अमीन की फिल्म चक दे इण्डिया देखते हुए भी मुझे ऐसा ही एह्सास हुआ. वैसे फिल्म के कई प्रसंग तो बहुत ही पकाऊ थे जैसे कबीर खान के घर छोडने का प्रसंग जहाँ पडोस में रहने वाला बच्चा अपने पिता से कह्ता है, “पापा मैनूं भी गद्दार देख्नना है”. इस जगह भारी मेलोड्रामा दिखाई देता है. या वो सारी बोर्ड मीटिंग्स जहाँ चेयरमैन बार-बार ये ही दोहराता है, “ये चकला-बेलन चलाने वाली भारतीय नारियाँ हैं”. क्या ये भी स्टिरियोटाइप किरदार नहीं हैं? लेकिन इनके बावजूद मुझे फिल्म पसन्द आयी और इसका कारण वो ही दिल का रिश्ता है. ये एक सच्चे दिल से बनाई गई फिल्म है जो नज़र आ ही जाता है.
…..
सबसे पहले सबसे खास बात… याद कीजिये कि मुख्यधारा के सिनेमा में आखिरी बार आपने कब एक मुस्लिम को नायक के रूप में देखा था? आसानी से याद नहीं आयेगा ये तय है. हमारे दौर के सबसे बडे नायक शाहरुख ने भी हमेशा राज या राहुल या वीर प्रताप सिंह या मोहन भार्गव जैसी भूमिकाएँ ही निभाई हैं. हाँ हे राम् का अमज़द एक अपवाद कहा जा सकता है. शायद जयदीप के लिये सबसे मुश्किल ये ही रहा हो की यशराज को एक ऐसी कहानी के लिये कैसे मनाया जाये जिसके नायक का नाम कबीर खान है. यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे गौर से देखा जाना चाहिये. आज SRK ऐसा रोल कर सकता है, क्या ये पहले सम्भव था या हो सकता था? पुराने धुरंधर याद कर पायेंगे कि अमिताभ ने अपनी बादशाहत के दौर में मुस्लिम नायक की भूमिकाएँ भी निभाई हैं लेकिन शाहरुख के खाते में ये तथ्य नहीं है. यह समय का परिवर्तन है. मित्रों का तो यहाँ तक कहना है कि गदर जैसी दुर्घटना नब्बे के दशक में ही सम्भव थी. मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने इस दशक की शुरूआत में जो किया यह उसी का असर है. इसलिये चक दे अभी भी एक अपवाद ही कही जाएगी, मुख्यधारा नहीं. लेकिन ये एक खूबसूरत अपवाद है.

…..
चक दे एक खेल आधारित फिल्म का मूल नियम ध्यान रखती है और वो है कमज़ोर की विजय. भारत द्वारा निर्मित सबसे चर्चित खेल फिल्म लगान की तरह चक दे भी कमज़ोरों के विजेता बनकर निकलने की कहानी है. यहाँ आपको सारे भेदभाव दिख जायेंगें जैसे जेन्डर, इलाका, खेल के आपसी भेदभाव और इनके खिलाफ लडाई साथ-साथ जारी है. टाँम एण्ड जैरी की लडाई में जीत हमेशा जैरी की ही होती है और यही नियम हमारी फिल्मों पर भी लागू होता है. सच यही है कि आम दर्शक ज़िन्दगी की लडाई हारे हुये किरदार से ही रिलेट करता है. वहीं उसे अपना अक्स दिखाई देता है.
…..
हाँकी की भारत में क्या जगह थी इसे दिखाने के लिये बहुत सुन्दर प्रतीक चुना गया है. देश की राजधानी के ह्रदयस्थल को निहारती मेजर ध्यानचन्द की मूरत उस केन्द्रीय स्थान की गवाही देती है जो आजाद भारत में हाँकी ने पाया था. मेजर ध्यानचन्द हाँकी स्टेडियम जैसे लुटियंस की बनाई दिल्ली को निहार रहा है. इंडिया गेट के मध्य भाग से देखने पर ठीक सामने राष्ट्रपति भवन दिखाई देता है. अगर आप सुनील खिलनानी की आइडिया आँफ इंडिया का शहर और सपना अध्याय पढें तो मालूम होगा कि इस नक्शे को बनाने में क्या सत्ता संरचना काम कर रही थी. क्यों वायसराय के घर के लिये उन्नयन कोण सबसे ऊँचा रखा गया था. यहाँ ध्यानचंद का होना एक कमाल के प्रतीक की खोज है. और इसका श्रेय भी मैं जयदीप साहनी को दूंगा जिन्होंनें एकबार फिर साबित कर दिया है की नये बनते शहर की बुनावट और उसकी सत्ता संरचना को उनसे अच्छा समझने वाला हिन्दी सिनेमा में और कोई नहीं है. खोसला का घोसला के बाद चक दे इंडिया एक और उपलब्धि है जयदीप के लिये. ये दिल्ली है बिना किसी लाग-लपेट के.
…..
और वो सोलह लड़कियाँ… सोलह अलग-अलग नाम, सोलह अलग-अलग किरदार, सोलह अलग-अलग पहचान. हर एक ऊर्जा की खान. जैसे उबलता लावा. वैसे कोमल चौटाला को सबसे ज्यादा पसंद किया गया है और खुद ममता खरब ने कहा है कि कोमल मे मेरी छवि है लेकिन काम के मामले में मेरी पसंद शिल्पा शर्मा रही. आपने उसे खामोश पानी में देखा होगा और हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी में नहीं देखा होगा. लेकिन आप बिन्दिया नायक को नहीं भूल सकते. अगर ये उनका फिल्म जगत में आगमन माना जाये तो ये एक धमाकेदार आगमन है. वो आयी… वो छायी टाइप! लेकिन आखिर में श्रेय तो जयदीप को ही जाएगा जिन्होंनें इतने तीखे, तेज़्-तर्रार किरदार रचे.

chak de india
…..
शाहरुख के लिये ये फिल्म स्वदेस वाले खाते में जाती है जहाँ उसने अपना किंग खान वाला स्टाइल छोड़कर काम किया है. स्वदेस हालाँकि ज्यादा परतदार फिल्म थी लेकिन चक दे इंडिया भी उसी खाते में है. स्तर भले कम हो लेकिन खाना वो ही है. शाहरुख को चाहनेवालों के लिये ये एक नया रूप तो है ही. (हाँ, मेरी पसंद अभी भी कभी हाँ, कभी ना को ही शाहरुख का सर्वश्रेष्ठ काम मानती है. ना स्वदेस को और ना चक दे को).

ये फिल्म तो बस उम्मीद है कि हिन्दुस्तानी फिल्मों की मुख्यधारा किसी नये प्रयोगशील रास्ते पर आगे बढ़ रही है…

Share on : Tweet about this on TwitterPin on PinterestEmail this to someonePrint this pageShare on Google+Share on LinkedInShare on Facebook