लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011.
दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ दुश्चिंताओं को अपने भीतर समेटे है. छोटी सी बच्ची जिसे स्विमिंग पूल पर यह समझाया जा रहा है कि उसे अब पूरे कपड़े पहन पूल में उतरना चाहिए. गौर से देखिए, यही वो क्षण है जहां एक बच्ची को उसके स्त्री होने और उससे जुड़े ’कर्तव्यों’ का पहला पाठ पढ़ाया जा रहा है.
सबक बहुतेरे हैं. उसे मज़बूत होना है, दुनिया का सामना करना है. ठीक उस क्षण जब वह चीते से दिखने वाले अंत:वस्त्रों का जोड़ा पसन्द करती है और साथ में अपने चेहरे पर किसी चीते सी धारियां बना लेती है, ठीक उस क्षण हमारी सभ्यता का मर्दवादी किला भरभराकर ढह जाता है.
साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के नवम्बर अंक में प्रकाशित.







