सथ्यू साहेब की ‘गरम हवा’ का यह परिचय दो महीने पहले हुए पहले ‘उदयपुर फिल्म फेस्टिवल’ के पहले अाई फेस्टिवल स्मारिका लिए लिखा था, जहाँ की यह समापन फिल्म थी.
हिन्दी साहित्य की तरह हिन्दी सिनेमा पर भी यह अारोप लगाया जा सकता है कि उसने हिन्दुस्तान के इतिहास में अाये सबसे बड़े ज़लज़ले, बँटवारे का सीधा सामना नहीं किया। अौर हिन्दी साहित्य पर लगाये अारोप की तरह ही इस अारोप में भी सच्चाई का कुछ अंश ज़रूर होगा। सैंतालीस अौर उसके बाद के सिनेमा में बँटवारे के सैलाब से निकली अावाज़ें अाई तो लेकिन सीधे कहकर नहीं बल्कि प्रकारांतर से। ऐसे में सन् तिहत्तर में अायी एम एस सथ्यू की बनाई फिल्म ‘गरम हवा’ हमारे सिनेमा इतिहास में मौजूद इस गहरी खाई को पाटने का काम करती है। कुछ वैसा ही जैसा हिन्दी साहित्य में भीष्म साहनी द्वारा लिखे गये उपन्यास ‘तमस’ ने किया। इस्मत चुग़ताई की कहानी पर अाधारित यह फिल्म चालीस के दशक के अागरा की कथा है, जिसके केन्द्र में मौजूद है हमारे कथानायक सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) का परिवार। मिर्ज़ा परिवार जिसने सबके साथ मिलकर साझा अाज़ादी का सपना देखा। लेकिन जब अाज़ादी अाई तो उसने पाया कि उसे किनारे कर दिया गया है। सलीम मिर्ज़ा अौर उनके कुटुम्ब की कथा जैसे पूरे समय का रूपक बन जाती है अौर हम देखते हैं कि कैसे ‘हम’ बनाम ‘वे’ के विलोम रूपक दोअाबे की साझा संस्कृति को हमेशा के लिए छिन्न-भिन्न कर देते हैं।
लेकिन अाज दो हज़ार तेरह में यह चालीस साल पुरानी फिल्म ‘गरम हवा’ हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण हो उठती है। पहला जवाब तो इसका यह हो सकता है कि ज़िन्दगी जीने की जो रवायत जो सलीम मिर्ज़ा के किरदार में दिखाई देती है, जो अाबोहवा यह फिल्म अपने परिवेश में बुनती है, एक पूरा साँस्कृतिक परिवेश है जो हमारी अाँखों के सामने जीवित हो उठता है। ऐसा साँस्कृतिक परिवेश जो बँटवारे की अाग में हमने गवाँ दिया। लेकिन इससे भी अागे जाकर, हमारे समय में ‘गरम हवा’ का महत्व इसलिए अौर ज़्यादा है क्योंकि यह ‘हम’ बनाम ‘वे’ बनाने की राजनीति हमारे हुक्मरान बखूबी सीख चुके हैं अौर रह-रहकर इतिहास में हुअा बँटवारा हमारे वर्तमान में अा घुसता है। किसी ख़ास समुदाय से पलटकर उसकी ‘वफ़ादारी’ का सिला माँगा जाता है अौर अपने ही मुल्क़ में उन्हें गैर बनाने की राजनीति खेली जाती है। अयोध्या से अहमदाबाद तक अौर मालेगाँव से मुज़्ज़फरनगर तक, जब तक हिन्दुस्तान में बँटवारे की यह राजनीति ज़िन्दा है, ‘गरम हवा’ जैसी फिल्म के फिर-फिर देखे जाने की ज़रूरत ज़िन्दा है।
स्वयं प्रकाश की कहानी ‘पार्टीशन’ में कुर्बान भाई इतिहास के किसी अध्यापक से कहते हैं, “अाप क्या ख़ाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं? कह रहे हैं पार्टीशन हुअा था! हुअा था नहीं, हो रहा है, ज़ारी है…” यह हमारे बीच की जीती-जागती सच्चाई है। सैंतालीस में हुअा ज़मीन का बँटवारा वहीं रुका नहीं, बल्कि हमारे सामुदायिक संबंधों के दरम्यान यह बँटवारा लगातार ज़ारी है। अौर बानवे अौर दो हज़ार दो के बाद उसका दिलों पर असर अौर तीख़ा, चेहरा अौर बदनुमा हुअा है। यही वो वजह है जो सैंतालीस में अपनी ज़मीन से, अपनी जड़ों से, अपनी स्मृतियों की कोख़ से उजाड़े गये इस मिर्ज़ा परिवार की कथा को हमारे लिए अाज अौर ज़्यादा प्रासंगिक बनाती है। अौर अगर ‘गरम हवा’ देखते हुए यह महसूस होता है कि उसके सुझाए समाधान वक़्त बीतने के साथ अपना अर्थ खो बैठे हैं या कहें कि चुक गए हैं, तो इसका मेरे लिए अर्थ यही है कि हिन्दी सिनेमा की यह सर्वकालिक महान फ़िल्म हमारे सामने किसी नये पथ, किसी नवीन समाधान की तलाश में एक व्यक्ति के रूप में अौर एक समाज के रूप में भी, किसी सर्वथा नई कल्पनाशीलता को गढ़ने का दुस्साहसी प्रस्ताव रखती है।






