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फिर एक ’जाने भी दो यारों’ की तलाश में

“नेहरूवियन सपना तब बुझ चुका था और राजनैतिक नेताओं की जमात राक्षसों में बदल चुकी थी. हर आदमी भ्रष्ट था और हमारा शहर अब उन्हीं भ्रष्ट राजनेताओं और अफ़सरानों के कब्ज़े में था. भू-माफ़ियाओं के साथ मिलकर उन्होंने पूरी व्यवस्था को एक कूड़ेदान में बदल दिया ...

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February 21, 2011

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हिन्दी सिनेमा में प्रेम की अजीब दास्तान

हिन्दी सिनेमा के पुराने पन्ने पलटते हुए कई बार मुझे ताज्जुब होता है कि क्या यही वो कहानियाँ थीं जिनके बलबूते हमारे इश्क़ पीढ़ियों परवान चढ़े? हिन्दी सिनेमा अपवादों को छोड़कर खासा यथास्थितिवादी रहा है और ऐसे में प्रेम जैसे स्वभाव से यथास्थितिवाद विरोधी मनोभाव का इसके मूल दर्शन के ...

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February 3, 2011

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अभिनेता के अवसान का साल

पिछला साल खत्म हुआ था ’थ्री ईडियट्स’ के साथ, जिसे इस साल भी लगातार हिन्दी सिनेमा की सबसे ’कमाऊ पूत’ के रूप में याद किया जाता रहा. इस साल आई ’दबंग’ से लेकर ’राजनीति’ तक हर बड़ी हिट की तुलना ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के आंकड़ों से की जाती रही. ...

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January 5, 2011

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2010 : पांच किरदार

विद्या बालन – इश्किया जवान होती शीलाओं और बदनाम होती मुन्नियों के समय में हो सकता है कि आप विद्या बालन की ठीक-ठीक जगह न पहचान पाएं. लेकिन बीस-तीस साल बाद जब इतिहास के पन्नों में यह धुंध छंट चुकी होगी, उनका नाम उसी क्रम में होगा ...

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January 4, 2011

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2010 : पहले तीन नाम

दुस्साहस कल-कल सच्चाई

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December 31, 2010

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मनोरंजन का बदला चेहरा

पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है. मज़ेदार बात ...

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December 26, 2010

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विकल्प की नई राह

नैनीताल फ़िल्मोत्सव (29 से 31 अक्टूबर, 2010) के ठीक पिछले हफ़्ते मैं बम्बई में था, मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (मामी) में. हम वहाँ युद्ध स्तर पर फ़िल्में देख रहे थे. कई दोस्त बन गए थे जिनमें से बहुत सिनेमा बनाने के पेशे से ही किसी न किसी रूप में जुड़े ...

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December 19, 2010

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हिन्दी सिनेमा इतिहास की पंद्रह सर्वश्रेष्ठ हास्य फ़िल्में

व्यंग्य हिन्दी सिनेमा का मूल स्वर नहीं रहा है. इसीलिए हजारों फ़िल्मों लम्बे इस सिनेमाई सफ़र में बेहतरीन कहे जा सकने लायक सटायर कम ही बने हैं. फिर भी हिन्दी सिनेमा ने समय-समय पर कई अच्छी कॉमेडी फ़िल्में दी हैं जिन्हें आज भी देखा पसंद किया जाता ...

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December 7, 2010

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ताजमहल पटाखे की लड़ी सी : फंस गए रे ओबामा

मेरे लिए ’फंस गए रे ओबामा’ का सबसे पहला परिचय यह है कि यह मनु ऋषि की दूसरी फ़िल्म है. आपको याद होना चाहिए कि शहरी जीवन के उस असहज कर देने वाले लेकिन अविस्मरणीय अनुभव ’ओये लक्की लक्की ओये’ को परदे पर साकार करने का जितना श्रेय इंडी सिनेमा ...

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December 4, 2010

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ख़रगोश

‘ख़रगोश’ एक अद्भुत चाक्षुक अनुभव है. मुख्यधारा के सिनेमा से अलग, बहुत दिनों बाद इस फ़िल्म को देखते हुए आप परदे पर निर्मित होते वातावरण का रूप, रंग, गंध महसूस करते हैं. इसकी वजह है फ़िल्म बेहतरीन कैमरावर्क और पाश्वसंगीत. निर्देशक परेश कामदार की बनाई फ़िल्म ’ख़रगोश’ ...

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November 25, 2010