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	<title>आवारा हूँ... &#187; सत्ता</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Mar 2012 21:48:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><em>“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को दैगो?”</em></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
’पान सिंह तोमर’</strong> अपने दद्दा से जवाब माँग रहा है. इरफ़ान ख़ान की गुरु-गम्भीर आवाज़ पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है. मैं उनकी बोलती आँखें पढ़ने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता. नहीं, ’बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं. पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है. पान सिंह को झटका लगता है. वो बुलन्द आवाज़ में चीख रहा है,<em> “हमारो जवाब पूरो ना भयो.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1040" title="Paan-Singh-Tomar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-207x300.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar" width="207" height="300" /></a>अचानक सिनेमा हाल की सार्वजनिकता गायब हो जाती है और पान सिंह की यह पुकार सीधे किसी फ़्लैश की तरह आँखों के पोरों में आ गड़ती है. हाँ, इस कथा में ’दद्दा’ मुख्य विलेन नहीं, गौण किरदार हैं. दरअसल यह कथा सीधे बीहड़ के किसान पान सिंह तोमर की भी नहीं, वह तो इस कथा को कहने का इंसानी ज़रिया बने हैं. यह कथा है उस महान संस्था की जिसके<em> ’संगे-संगे’ </em>पान सिंह तोमर की कहानी शुरु होती है और अगले पैंतीस साल किसी समांतर कथा सी चलती है. भारतीय राज्य, नेहरूवियन आधुनिकता को धारण करने वाली वो एजेंसी जिसके सहारे आधुनिकता का यह वादा समुदायगत पहचानों को सर्वोपरि रखने वाले हिन्दुस्तानी नागरिक के जीवन-जगत में पहुँचाया गया, यह उसके द्वारा दिखाए गए ध्वस्त सपनों की कथा है. उन मृगतृष्णाओं की कथा जिनके भुलावे में आकर पान सिंह तोमर का, सफ़लताओं की गाथा बना शुरुआती जीवन हमेशा के लिए पल्टी खा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह अस्सी के दशक की शुरुआत है. गौर कीजिए, स्थानीय पत्रकार (सदा मुख्य सूचियों से बाहर रहे, गज़ब के अभिनेता ब्रिजेन्द्र काला) पूछता है सूबेदार से डकैत बने पान सिंह से,<em> “बन्दूक आपने पहली बार कब उठाई?”</em> और पान सिंह का जवाब है,<em> “अंगरेज़ भगे इस मुल्क से. बस उसके बाद. पन्डित जी परधानमंत्री बन गए, और नवभारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण शुउ भओ.” </em>गौर कीजिए, अपने पहले ही संवाद में पान सिंह इस आधुनिकता के पितामह का ना सिर्फ़ नाम लेता है, उनके दिखाए स्वप्न ’नवभारत’ के साथ अपनी गहरी समानता भी स्थापित करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर तैयार किया ख़ास भारतीय आधुनिकता का मॉडल, जिसमें मिलावटी रसायन के तौर पर यहाँ की सामन्ती व्यवस्था चली आती है. यह अर्ध सामन्ती – अर्ध पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य संस्था की कथा है जिसकी बदलती तस्वीर ’पान सिंह तोमर’ में हर चरण पर नज़र आती है. मुख्य नायक खुद पान सिंह तोमर इसी पुरानी सामन्ती व्यवस्था से निकलकर आया है और आप उसके शुरुआती संवादों में समुदायगत पहचानों के लिए वफ़ादारियाँ साफ़ पढ़ सकते हैं. अफ़सर द्वारा पूछे जाने पर कि क्या देश के लिए जान दे सकते हो, उसका जवाब है,<em> “हा साब, ले भी सकते हैं. देस-ज़मीन तो हमारी माँ होती है. माँ पे कोई उँगली उठाए तो का फिर चुप बैठेंगे?” </em>और यहीं उसके जवाबों में आप नवस्वतंत्र देश के नागरिकों की उन शुरुआती उलझनों को भी पढ़ सकते हैं जो राज्य संस्था, उसके अधिकार क्षेत्र और उसकी भूमिका को ठीक से समझ पाने में अभी तक परेशानी महसूस कर रहे थे. पूछा जाता है पान सिंह से कि क्या वो सरकार में विश्वास रखता है, और उसका दो टूक जवाब है,<em> “ना साब. सरकार तो चोर है. जेई वास्ते तो हम सरकार की नौकरी न कर फ़ौज की नौकरी में आए हैं.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">स्पष्ट है कि पान सिंह के लिए राज्य द्वारा स्थापित किए जा रहे आधुनिकता के इस विचार की आहट नई है. लेकिन यह विचार सुहावना भी है. अपने समय और समाज के किसी प्रतिनिधि उदाहरण की तरह वो जल्द ही इसकी गिरफ़्त में आ जाता है. और इसी वजह से आप उसके विचारों और समझदारी में परिवर्तन देखते हैं. यह पान सिंह का सफ़र है,<em> “हमारे यहाँ गाली के जवाब में गोली चल जाती है कोच सरजी” </em>से शुरु होकर यह उस मुकाम तक जाता है जहाँ गाँव में विपक्ष से लेकर अपने पक्ष वाले भी उसका बन्दूक न उठाने और बार-बार कार्यवाही के लिए पुलिस के पास भागे चले जाने का मज़ाक उड़ा रहे हैं. अपने-आप में यह पूरा बदलाव युगान्तकारी है. और फ़िल्म के इस मुकाम तक यह उस नागरिक की कथा है जो आया तो हिन्दुस्तान के देहात की पुरातन सामन्ती व्यवस्था से निकलकर है, लेकिन जिसको आधुनिकता के विचार ने अपने मोहपाश में बाँध लिया है. जिसका आधुनिक ’राज्य’ की संस्था द्वारा अपने नागरिक से किए वादे में यकीन है. वह उससे उम्मीद करता है और व्यवस्था की स्थापना का हक सिर्फ़ उसे देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">विचारक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ashis_Nandy" target="_blank">आशिस नंदी</a></strong> भारतीय राष्ट्र-राज्य संस्था पर बात करते हुए लिखते हैं, “स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ’विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गई थी. चूंकि हमारा अभिजात्य वर्ग राज्य के इस विचार में निहित समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए उसने भारत की तथाकथित अभागी और आदम विविधताओं के साथ समझौता करके थोड़ा मिलावटी विचार विकसित किया.” यही वो मिलावटी विचार है जहाँ आधुनिकता के संध्याकाल में वही पुराना सामन्ती ढांचा फिर से सर उठाता है और ठीक यहीं किसी गठबंधन के तहत राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इसीलिए, फ़िल्म में सबसे निर्णायक क्षण वो है जहाँ पान सिंह के बुलावे पर गाँव आया कलेक्टर यह कहकर वापस लौट जाता है,<em> “देखो, ये है चम्बल का खून. अपने आप निपटो.” </em>यह आधुनिकता द्वारा दिखाए उस सपने की मौत है जिसके सहारे नवस्वतंत्र देश के नागरिक पुरातन व्यवस्था की गैर-बराबरियों के चंगुल से निकल जाने का मार्ग तलाश रहे थे. फिर आप राज्य की एक दूसरी महत्वपूर्ण संस्था ’पुलिस’ को भी ठीक इसी तरह पीछे हटता पाते हैं. यहीं हिन्दुस्तानी राष्ट्र-राज्य संस्था और उसके द्वारा निर्मित ख़ास आधुनिकता के मॉडल का वो पेंच खुलकर सामने आता है जिसके सहारे मध्यकालीन समाज की तमाम गैर-बराबरियाँ इस नवीन व्यवस्था में ठाठ से घुसी चली आती हैं. पहले यह सामाजिक वफ़ादारियों को राज्य के प्रति वफ़ादारी में बदलने के लिए स्थापित गैर-बराबरीपूर्ण व्यवस्थाओं का अपने फ़ायदे में भरपूर इस्तेमाल करता है और इसीलिए बाद में उन्हें कभी नकार नहीं पाता. जाति जैसे सवाल इसमें प्रमुख हैं. नेहरूवियन आधुनिकता में मौजूद यह फ़ांक ही जाति व्यवस्था को कहीं गहरे पुन:स्थापित करती है. पान सिंह की उम्मीद राज्य रूपी संस्था और उसके द्वारा किए आधुनिकता के वादे से सदा बनी रहती है. वह खुद बन्दूक उठाता है लेकिन अपने बेटे को कभी उस रास्ते पर नहीं आने देता. वह दिल से चाहता है कि राज्य का यह आधुनिक सपना जिये. लेकिन राज्य उसके सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह ऐतिहासिक रूप से भी सच्चाई के करीब है. अगर आप फ़िल्म में देखें तो यह अस्सी के दशक तक कहानी का वो हिस्सा सुनाती है जिसमें अगड़ी जाति के लोग ज़मीन पर कब्ज़े के लिए लड़ रहे हैं और राज्य संस्था इसे पारिवारिक अदावत घोषित कर इसे सुलझाने से अपने हाथ खींच लेती है. दरअसल आधुनिक राज्य संस्था ने स्थानीय स्तर पर उन सामन्ती शक़्तियों से समझौता कर लिया था जिनके खिलाफ़ उसे लड़ना चाहिए था. यह नवस्वतंत्र मुल्क़ में शासन स्थापित करने और अपनी वैधता स्थापित करने का एक आसान रास्ता था. ऐसे में ज़रूरत पड़ने पर भी वह उनकी गैरबराबरियों के खिलाफ़ कभी बोली नहीं. बन्दूक उठाने वाले यहीं से पैदा होते हैं. वे आधुनिक राज्य द्वारा किए उन वादों के भग्नावशेषों पर खड़े हैं जिनमें समता और समानता की स्थापना और समाज से तमाम गैर-बराबर पुरातन व्यवस्थाओं को खदेड़ दिए जाने की बातें थीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जय अर्जुन सिंह फ़िल्म पर <a href="http://jaiarjun.blogspot.in/2012/03/loneliness-of-long-distance-baaghi.html" target="_blank"><strong>अपने आलेख में</strong></a> इस बात का उल्लेख करते हैं कि फ़िल्म के अन्त में आया नर्गिस की मौत की खबर वाला संदर्भ इसे कल्ट फ़िल्म ’मदर इंडिया’ से जोड़ता है और यह उन नेहरूवियन आदर्शों की मौत है जिनकी प्रतिनिधि फ़िल्म हिन्दी सिनेमा इतिहास में ’मदर इंडिया’ है. मुझे यहाँ उन्नीस सौ सड़सठ में आई मनोज कुमार की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Upkar" target="_blank">’उपकार’</a></strong> याद आती है. एक सेना का जवान जो किसान भी है, ठीक पान सिंह की तरह, और जिसकी सामुदायिक वफ़ादारियाँ इस आधुनिक राष्ट्र राज्य के मिलावटी विचार के साथ एकाकार हो जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया की ’पान सिंह तोमर’ इस आदर्श राज्य व्यवस्था की स्थापना वाली भौड़ी ’उपकार’ की पर्फ़ेक्ट एंटी-थिसिस है. यहाँ भी एक सेना का जवान है, जो मूलत: किसान है, लेकिन आधुनिकता का महास्वप्न अब एक छलावा भर है. इस जवान-किसान की भी वफ़ादारी में कोई कमी नहीं, उसने देश के लिए सोने के तमगे जीते हैं. लेकिन देखिए, वह पूछने पर मजबूर हो जाता है कि,<em> “देश के लिए फ़ालतू भागे हम?” </em>अन्त में वह व्यवस्था द्वारा बहिष्कृत समाज के हाशिए पर खड़ा है और उसके हाथ में बन्दूक थमा दी गई है. वह जवाब मांग रहा है कि उसके हाथ में थमाई गई इस बन्दूक के लिए ज़िम्मेदार कौन है, और कौन उन्हें सज़ा देगा?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">गौर करने की बात है कि ’पान सिंह तोमर’ में मारे जाने वाले गुर्जर हैं जिनका स्थान सामाजिक पदक्रम में अगड़ी जातियों से नीचे आता है. और यह तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है. आज यही गुर्जर राजस्थान में अपने हक की जायज़-नाजायज़ मांग करते निरन्तर आन्दोलनरत हैं. और इस जाति व्यवस्था के आधुनिकता के बीच भी काम करने का सबसे अच्छा उदाहरण खुद फ़िल्म में ही देखा जा सकता है. वहाँ देखिए जहाँ इंस्पेक्टर (सदा सर्वोत्कृष्ठ ज़ाकिर हुसैन) गोपी के ससुराल मिलने आए हैं. यह सामाजिक पदक्रम में नीचे खड़ा परिवार है. पुलिसिया थानेदार का उद्देश्य पान सिंह तोमर के गिरोह की टोह लेना है और वह कहते हैं,<em> “जात पात कछू न होत कक्का. इंसान-इंसान के काम आनो चहिए. और जिसके हाथ के खाए हुवे थे धरम भरष्ट हो जावे, ऐसे धरम को तो भरष्ट ही हो जानो चहिए.” </em>वे पानी पीने को भी मंगाते हैं. गौर कीजिए कि तमाम सूचनाएं निकलवा लेने के बाद किस चालाकी से वह बिना उनके घर का पानी पिये ही निकल जाते हैं. यही दोहरे मुखौटे वाला आधुनिक भारतीय राज्य का असल चेहरा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1045" title="Paan-Singh-Tomar-Image-580" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580-300x199.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar-Image-580" width="300" height="199" /></a>ज़िला टोंक अपने देश में कहाँ है, ठीक-ठीक जानने के लिए शायद आप में से बहुत को आज भी नक्शे की ज़रूरत पड़े. और क्योंकि मैं उन्हीं के गृह ज़िले से आता हूँ, इसलिए अच्छी तरह जानता हूँ कि चम्बल की ही एक सहायक नदी ’बनास’ के सहारे बसा होने के बावजूद टोंक की स्थानीय बोली बीहड़ की भाषा से कितनी अलग है. और इसीलिए इरफ़ान के जिस खूबी से उस लहज़े को अपनाया है, मेरे मन में उनके भीतर के कलाकार की इज़्ज़त और बढ़ गई है. जिस तरह वे पर्लियामेंट, मिलिट्री, स्पोर्ट्स जैसे ख़ास शब्दों के उच्चारण में एकदम माफ़िक अक्षर पर विराम लेते हैं और ठीक जगह पर बलाघात देते हैं, भरतपुर-भिंड-मुरैना-ग्वालियर की समूची चम्बल बैल्ट जैसे परदे पर जी उठती है. वे दौड़ते हैं और उनका दौड़ना घटना न रहकर जल्द ही किसी बिम्ब में बदल जाता है. बीहड़ में विपक्षी को पकड़ने के लिए भागते हुए जंगल में सामने आई बाधा कैसे स्टीपलचेज़ धावक को उसका मासूम लड़कपन याद दिलाती है, देखिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस तमाम विमर्श से अलग ’पान सिंह तोमर’ कविता की हद को छूने वाली फ़िल्म है. पहली बार मैं सुनता हूँ जब कोच सर कहते हैं,<em> “ओये तू पाणी पर दौड़ेगा.” </em>और समझ खुश होता हूँ कि यह स्टीपलचेज़ जैसी दौड़ के लिए एक सुन्दर मुहावरा है. लेकिन दूसरी बार सिनेमाहाल में फ़िल्म देखते हुए अचानक समझ आता है कि इस वाक्य के कितने गहरे निहितार्थ हैं. यह संवाद पान सिंह तोमर की पूरी ज़िन्दगी की कहानी है. ज़िन्दगी भर वो बीहड़ में चम्बल के पानी पर ही तो दौड़ता रहा. सन्दीप चौटा का पार्श्वसंगीत फ़िल्म को विहंगम भाव प्रदान करता है और बेदाग़ सिनेमैटोग्राफ़ी महाकाव्य सी ऊँचाई. तिग्मांशु की अन्य फ़िल्मों की तरह ही यहाँ भी संवाद फ़िल्म की जान हैं, लेकिन सबसे विस्मयकारी वे दृश्य हैं जहाँ इरफ़ान बिना किसी संवाद वो कह देते हैं जिसे शब्दों में कहना सम्भव नहीं. मेरा पसन्दीदा दृश्य फ़िल्म के बाद के हिस्से में आया वो शॉट है जहाँ सेना के कंटोनमेंट एरिया में अपने जवान हो चुके बेटे से मिलने आए अधेड़ पान सिंह पीछे से अपने वर्दी पहने बेटे को जाता हुआ देख रहे हैं. आप सिर्फ़ उन आँखों को देखने भर के लिए यह फ़िल्म देखने जाएं. ऐसा विस्मयकारी दृश्य लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के लिए दुर्लभ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’पान सिंह तोमर’ जैसी फ़िल्में हिन्दी सिनेमा में दुर्लभ हैं और मुश्किल से नसीब होती हैं. हम इस राष्ट्र की किसी एक उपकथा के माध्यम से इस बिखरी तस्वीर के सिरे आपस में जोड़ पाते हैं. ’पान सिंह तोमर’ वह उपकथा है जिसमें आधुनिक राज्य अपना किया वादा पूरा नहीं करता और निर्णायक क्षण अपने हाथ वापस खींच लेता है. एक सामान्य नागरिक बन्दूक उठाने के लिए इसलिए मजबूर होता है क्योंकि उसके लिए दो ही विकल्प छोड़े गए हैं, पहला कि बन्दूक उठाओ या फिर दूसरा कि मारे जाओ. मरना दोनों विकल्पों में बदा है. वर्तमान में इसी राज्य द्वारा पोषित कथित ’विकास’ के अश्वमेधी घोड़े के रथचक्र में पिस रहे असहाय नागरिक द्वारा विरोध में उठाए जाते विद्रोह के झंडे को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश करें. देखें कि आखिर उसके लिए हमारी राज्य व्यवस्था ने कौन से विकल्प छोड़े हैं? और यह भी कि अगर निर्वाह के लिए वही विकल्प आपके या मेरे सामने होते तो हमारा चयन क्या होता?</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के अप्रैल अंक में प्रकाशित.</p>
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		<title>’राष्ट्रवाद’ का सिनेमाई उत्सवगान</title>
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		<pubDate>Mon, 09 May 2011 16:26:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“ यह दीप अकेला स्नेह भरा,
है गर्व भरा मदमाता पर,
इसको भी पंक्ति दे दो ”
- अज्ञेय
बीते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। और जैसा किसी भी ‘कल्पित [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><em>“ यह दीप अकेला स्नेह भरा,<br />
है गर्व भरा मदमाता पर,<br />
इसको भी पंक्ति दे दो ”<br />
<strong>- अज्ञेय</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times,serif,Georgia;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/mother-india.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-817" title="mother-india" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/mother-india.jpg" alt="mother-india" width="213" height="300" /></a><span style="color: #000000;">बी</span></span>ते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। और जैसा किसी भी ‘कल्पित समुदाय’ के निर्माण में होता है, उस दौर के लोकप्रिय जनमाध्यम का अध्ययन इस ‘राष्ट्रीय भावना’ के निर्माण को बड़े दिलचस्प अंदाज में आपके सामने रखता है। मजेदार बात यह है कि नवस्वतंत्र मुल्क में जब हमारा समाज इस विचार को अपने भीतर गहरे आत्मसात कर रहा था, सिनेमा एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह वहां मौजूद रहा। यही वो दौर है जिसे हिंदी सिनेमा के ‘सुनहरे दौर’ के तौर पर भी याद किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पारिवारिक और</strong> सामुदायिक पहचानों में अपने को तलाशते और चिह्नित करते नवस्वतंत्र मुल्क की जनता को ‘राष्ट्र-राज्य’ की वैधता और आधिपत्य का पाठ पढ़ाने का काम हमारा लोकप्रिय सिनेमा करता है। और प्रक्रिया में वह दो ऐसे काम करता है, जिन्हें समझना ‘आधुनिकता’ के भारतीय मॉडल (जिसे आप सुविधा के लिए ‘नेहरुवियन आधुनिकता’ भी कह सकते हैं) को समझने के लिए कुंजी सरीखा है। पहला तो यह कि वह व्यक्ति की पुरानी वफादारियों (पढ़ें समुदाय, परिवार) के ऊपर राज्य की सत्ता को स्थापित करने के लिए पूर्व सत्ता को विस्थापित नहीं करता, बल्कि उन पुरानी वफादारियों को ही वह ‘राष्ट्र’ के रूपक में बदल देता है। इससे सहज ही और बिना किसी मौलिक परिवर्तन के इस नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता को वैधता मिल जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसे उदाहरण के</strong> माध्यम से समझें। सुमिता चक्रवर्ती लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर अपने सर्वप्रथम अकादमिक कार्य में दो आइकॉनिक हिंदी फिल्मों को इस संदर्भ में व्याख्यायित करती हैं। सबसे पहले याद आती है, महबूब खान की अविस्मरणीय ‘मदर इंडिया’ जहां मां – देवी मां और भारत मां के बीच की सारी रेखाएं मिट जाती हैं। सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “एक विचार के तौर पर मदर इंडिया हिंदुस्तान के कई हिस्सों में पूजी जाने वाली ‘देवी मां’ के कल्ट से उधार लिया गया है।” वे आगे लिखती हैं, “यह रस्मी गौरवगान समाज में होने वाले स्त्री के सामाजिक शोषण और उसकी गैर-बराबर सामाजिक हैसियत के साथ-साथ चलता है। लेकिन हिंदुस्तानी समाज में एक ‘मां’ के रूप में स्त्री की छवि सिर्फ एक ‘स्त्री’ भर होने से कहीं ऊंची है।” यहां हिंदुस्तानी समाज में पहले से मौजूद एक धार्मिक प्रतीक को फिल्म बखूबी राष्ट्रीय प्रतीक से बदल देती है। यह संयोग नहीं है कि फिल्म की शुरुआत इन ‘भारत माता’ द्वारा एक बांध के उदघाटन से दृश्य से होती है। वैसा ही एक बांध, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था। वैसा ही एक बांध जैसे बीते साठ सालों में लाखों लोगों की समूची दुनियाओं को ‘विकास’ के नाम पर अपने पेटे में निगलते गये हैं। ‘विकास’ के नेहरुवियन मॉडल की पैरवी करती यह फिल्म अंत तक पहुंचते हुए एक ऐसी व्यवस्था की पैरवी में खड़ी हो जाती है, जहां ‘बिरजू’ जैसी अनियंत्रित (लेकिन मूल रूप से असहमत) आवाजों के लिए कोई जगह नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/raj-kapoor.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-819" title="raj kapoor" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/raj-kapoor-300x219.jpg" alt="raj kapoor" width="300" height="219" /></a>ऐसा ही एक और</strong> मजेदार उदाहरण है राज कपूर की ‘आवारा’। यह राज्य की सत्ता के सबसे चाक्षुक हिस्से – कानून व्यवस्था, को परिवार के मुखिया पुरुष पर आरोपित कर देती है और इस तरह पारिवारिक वफादारी की चौहद्दी में रहते हुए भी व्यक्ति को राज्य-सत्ता की वैधता के स्वीकार का एक आसान या कहें जाना-पहचाना तरीका सुझाती है। ‘आवारा’ के संदर्भ में बात करते हुए सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “हिंदी सिनेमा देखने वाली जनता एक नये आजाद हुए मुल्‍क की नागरिक भी थी और यह जनता एक नागरिक के रूप में अपने परिवार और समुदाय की पारंपरिक चौहद्दियों से आगे अपने उत्तरदायित्व समझने में कहीं परेशानी महसूस कर रही थी। नये संदभों में उन्हें मौजूद मुश्किल परिस्थितियों को भी समझना था और बदलाव और सुधार का वादा भी ध्यान रखना था। यह वादा अब नयी एजेंसियों द्वारा किया जा रहा था और यह एजेंसियां थीं राज्य-सत्ता और उसकी अधिकार प्रणाली। क्योंकि ‘कानून-व्यवस्था’ आम जनमानस में राज्य की सत्ता का सबसे लोकप्रिय प्रतीक है, इसलिए हिंदी सिनेमा में एक आम नागरिक के जीवन में राज्य की भूमिका दिखाने का यह सबसे माकूल प्रतीक बन गया।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>फिल्म ‘आवारा’ में</strong> जज रघुनाथ की भूमिका में कानून-व्यवस्था के प्रतीक बने पृथ्वीराज कपूर न सिर्फ फिल्म में कानून के दूसरी तरफ खड़े नायक राज (राज कपूर) के जैविक पिता हैं, बल्कि असल जीवन में भी वह राज कपूर के पिता हैं। ऐसे में इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पहले से तय सोपान और अधिकार शृंखला में बिना किसी छेड़छाड़ के यह फिल्म नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की कानून-व्यवस्था की वैधता की स्थापना आम जनमानस में करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरा यह कि</strong> इस ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ की तलाश में वह तमाम इतर पहचानों को अनुकूलित भी करता चलता है। हिंदी सिनेमा के शुरुआती सालों में ‘जाति’ के सवाल सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बनते हैं लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, हमारा सिनेमा ऐसे सवाल पूछना कम करता जाता है। हमारे नायक-नायिकाओं के पीछे से इसी ‘सार्वभौम पहचान’ के नाम पर उनकी जातिगत पहचानें गायब होती जाती हैं। इस ‘राष्ट्रवाद’ का एक दमनकारी चेहरा भी है। साल 1954 में बनी ‘जागृति’ जैसी फिल्म, जिसे ‘बच्चों की फिल्म’ कहकर आज भी देखा-दिखाया जाता है, में ‘शक्ति’ की मौत जैसे अजय के ‘शुद्धीकरण’ की प्रक्रिया में आखिरी आहूति सरीखी है। शक्ति की मौत अजय को एकदम ‘बदल’ देती है। अब वह एक ‘आदर्श विद्यार्थी’ है। किताबों में डूबा हुआ। आखिर ‘शक्ति’ की मौत ने अजय को अपने देश और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करवा ही दिया! और फिर ऊपर से ‘शेखर’ जैसे अध्यापक दृश्य में मौजूद हैं, जो फिल्म के अंत तक आते-आते एकदम नियंत्रणकारी भूमिका में आ जाते हैं। यहां भी फिल्म तमाम ‘अन्य पहचानों’ का मुख्यधारा के पक्ष में बड़ी सफाई से अनुकूलन कर देती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/jagriti.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-820" title="jagriti" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/jagriti.jpg" alt="jagriti" width="271" height="225" /></a>इस समूचे प्रसंग को</strong> एक प्रतीक रूप में देखें तो बड़ी क्रूर छवि उभरकर हमारे सामने आती है। सुमिता चक्रवर्ती फिल्म ‘जागृति’ पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, “यहां कमजोर की कुर्बानी दी जाती है, जिससे बलशाली आगे जिये और अपनी शक्ति को पहचाने। ‘शक्ति’ न सिर्फ शारिरिक रूप से कमजोर है, गरीब और दया के पात्र की तरह दिखाया गया है। उसे साथी बच्चों द्वारा उसकी शारीरिक अक्षमता के लिए चिढ़ाया जाता है। लेकिन वह सुशील और उच्च नैतिकता वाला बच्चा है, जिसे फिल्म अपने पवित्र विचारों के प्रगटीकरण के लिए एक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करती है। लेकिन उसे मरना होगा (दोस्ती की खातिर) उस मिथ को जिलाये रखने के लिए। एकीकृत जनता का मिथ।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अगर लोकप्रिय सिनेमा</strong> के ढांचे पर इस राष्ट्रवादी बिंब को आरोपित कर देखें, तो यह अनुकूलन बहुत दूर तक जाता है। मुख्य नायक हमेशा एक ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ लिये होता है (जो आमतौर पर शहरी-उच्चवर्ण-हिंदू-पुरुष की होती है) और उसके दोस्त या मददगार के रूप में आप किसी अन्य धार्मिक या सामाजिक पहचान वाले व्यक्ति को पाते हैं। तो ‘जंजीर’ में ईमानदार नायक ‘विजय’ की सहायता के लिए ‘शेर खान’ मौजूद रहता है और ‘लक्ष्य’ में नायक ‘करण शेरगिल’ की सहायता के लिए ‘जलाल अहमद’। फिल्म ‘तेजाब’ में तड़ीपार नायक ‘मुन्ना’ को वापस ‘महेश देशमुख’ की पहचान दिलाने की लड़ाई में ‘बब्बन’ जैसे इतर पहचान वाले दोस्त ‘कुर्बान’ हो जाते हैं, और ‘लगान’ के राष्ट्रवादी उफान में ‘इस्माइल’ से लेकर ‘कचरा’ की भूमिका हमेशा मुख्य नायक ‘भुवन’ (उच्चवर्ण हिंदू) के सहायक की ही रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>एक तय प्रक्रिया के तहत</strong> सिनेमा का यह राष्ट्रवादी विमर्श तमाम ‘इतर’ पहचानों को सहायक भूमिकाओं में चिह्नित करता जाता है और हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती। और फिर एक दिन अचानक हम ‘गदर’ या ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म को देख चौंक जाते हैं। क्यों? क्या जिस अनुकूलन की प्रक्रिया का हिंदी सिनेमा इतने सालों से पालन करता आया है, उसकी स्वाभाविक परिणिति यही नहीं थी? हम ऐसा सिनेमाई राष्ट्रवाद गढ़ते हैं, जिसमें तमाम अल्पसंख्यक पहचानें या तो सहायक भूमिकाओं में ढकेल दी जाती हैं या वह मुख्य नायक के कर्मपथ पर कहीं ‘कुर्बान’ हो जाती हैं। क्या यह पूर्व तैयारी नहीं है ‘गदर’ जैसी फिल्म की, जो अन्य धार्मिक पहचान को सीधे तौर पर खलनायक के रूप में चिह्नित करती है? ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म, जिसे इस बहुचर्चित छद्मवाक्य, “सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते, लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं” के प्रमाण-पत्र के रूप में पढ़ा जा सकता है, क्या उन फिल्मों का स्वाभाविक अगला चरण नहीं है जिनमें मुसलमान चरित्र हमेशा दोयम दर्जे की सहायक भूमिका पाने को अभिशप्त हैं?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और सवाल</strong> केवल धार्मिक पहचान का ही नहीं। मैंने एक और लेख में ‘हिंदी सिनेमा में प्रेम’ पर लिखते हुए यह सवाल उठाया था कि क्या ‘शोले’ में जय और राधा की प्रेम-कहानी का अधूरा रह जाना एक संयोग भर था? क्या यह पहले से ही तय नहीं था कि जय को आखिर मरना ही है। और फर्ज करें कि अगर ‘शोले’ में यह प्रेम-कहानी, जो सामाजिक मान्यताओं के ढांचे को हिलाती है, पूर्णता को प्राप्त होती तो क्या तब भी ‘शोले’ हमारे सिनेमाई इतिहास की सबसे लोकप्रिय फिल्म बन पाती? यह सवाल मैं यहां इसीलिए जोड़ रहा हूं क्योंकि एक विधवा से शादी करने के फैसले के साथ खुद ‘जय’ भी एक अल्पसंख्यक पहचान से खुद को जोड़ता है। और उसका भी वही क्रूर अंजाम होता है, जिसकी परिणति आगे जाकर ‘राष्ट्रवादी अतिवाद’ में होती है। चाहें तो ‘राष्ट्रवाद’ का यह अतिवादी चेहरा देखने के लिए हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद की लिखी ‘क्रांति’ तक आएं, जहां एक अधपगली दिखती स्त्री की ओर इशारा कर नायक मनोज ‘भारत’ कुमार कहता है कि यह अभागी अपने पति के साथ सती हो जाना चाहती थी, इन जालिम अंगेजों ने वो भी न होने दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इन्हें भारतीय आधुनिकता के</strong> मॉडल के ‘शॉर्टकट’ कहें या ‘षड्यंत्र’, सच यही है कि इन्हीं चोर रास्तों में कहीं उन तमाम अतिवादी विचारों के बीज छिपे हैं, जिन्हें भारत ने बीते सालों में अनेक बार रूप बदल-बदल कर आते देखा है। जब हम पारिवारिक सत्ता के और धार्मिक मिथकों में ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता के बिंब को मिलाकर परोस रहे थे, उस वक्त हमने यह क्यों नहीं सोचा कि आगे कोई इस प्रक्रिया को उल्टी तरफ से भी पढ़ सकता है? और ऐसे में ‘राष्ट्र-राज्य’ और उसकी सत्ता किसी खास बहुसंख्यक पहचान के साथ जोड़ कर देखी जाएगी और लोग इसे स्वाभाविक मानकर स्वीकार कर लेंगे? आज ऐसा होते देखकर हम भले ही कितना बैचैन हों और हाथ-पांव मारें। सच्चाई यही है कि यह हमारी ‘आधुनिकता’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मॉडल की स्वाभाविक परिणिति है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #808080;"><span style="font-size: large;">और अंत में : कुछ अपनी बात, गांधी की बात</span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times,serif,Georgia;">बी</span>ते दिनों में महात्मा गांधी का नाम लौट-लौटकर संदर्भों में आता रहा। लेकिन यह जिक्र तमाम संदर्भों से गायब है कि आज भारतीय राष्ट्रवाद के पितृपुरुष घोषित किये जा रहे इस व्यक्ति को जीवन के अंतिम दिनों में इसी नवस्वतंत्र देश ने नितांत अकेला छोड़ दिया था। गांधी द्वारा उठाये जा रहे असुविधाजनक सवाल इस नवस्वतंत्र मुल्क के राष्ट्रवादी विजयरथ की राह में बाधा की तरह थे। राष्ट्र उत्सवगान में व्यस्त है, संशयवादियों के लिए उसके पास समय नहीं। जिस गांधी के नैतिक इच्छाशक्ति पर आधारित फैसलों के पीछे पूरा मुल्क आंख मूंदकर खड़ा हो जाता था, आज उसे संशय में पाकर वही मुल्क उसे कठघरे में खड़ा करता था। ठीक उस वक्त जब यह नवस्वतंत्र देश ‘नियति से साक्षात्कार’ कर रहा था, महात्मा सुदूर पूर्व में कहीं अकेले थे। अपनी नैतिकताओं के साथ, अपनी असफलताओं के साथ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सुधीर चंद्र गांधी पर</strong> अपनी नयी किताब में उस वक्त कांग्रेस के सभापति आचार्य कृपलानी के वक्तव्य, “आज गांधी खुद अंधेरे में भटक रहे हैं” को उद्धृत करते हुए एक वाजिब सवाल उठाते हैं, “कृपलानी के कहे को लेकर बड़ी बहस की गुंजाइश है। पूछा जा सकता है कि 1920 में, असहयोग आंदोलन के समय और उसके बाद क्या लोगों को गांधी की अहिंसा के कारगर होने के बारे में शक नहीं होता रहता था? कितनी बार उन तीस सालों के दौरान संकटों का सामना होने पर गांधी लंबी अनिश्चितता और आत्म संशय से गुजरने के बाद ही उपयुक्त तरीके को तलाश कर पाये थे? वैसे ही जैसे कि इस वक्त, जब कृपलानी और कांग्रेस और देश गांधी को अकेला छोड़ने पर आमादा थे।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सवाल वाजिब है</strong>। लेकिन एक बड़ा अंतर है, जो गांधी के पूर्ववर्ती अहिंसक आंदोलनों और उपवास को इस अंतिम दौर से अलगाता है। राष्ट्रवाद की जिस उद्दाम धारा पर गांधी के पूर्ववर्ती आंदोलन सवार रहे और अपार जनसमर्थन जिनके पीछे शामिल था, वह इन अंतिम दिनों में छिटक कर कहीं दूर निकल गयी थी। कभी यही ‘राष्ट्रवाद‘ उनका हथियार बना था। यह राष्ट्रवाद और अखंडता का ’पवित्र मूल्य‘ ही था, जिसके सहारे गांधी अंबेडकर से एक नाजायज बहस में ’जीते‘ थे। गांधी के आभामय व्यक्तित्त्व के आगे यह तथ्य अदृश्य रहा, लेकिन जब देश के सामने चुनने की बारी आयी, तो उसने ’राष्ट्र‘ के सामने ’राष्ट्रपिता‘ को भी पार्श्व में ढकेल दिया। कड़वा है लेकिन सच है, अपने देश के अतिवादी राष्ट्रवाद की पहली बलि खुद ’राष्ट्रपिता’ थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>‘राष्ट्रवाद’ अपने आप में</strong> कोई इकहरा विचार नहीं। इसलिए सरलीकरण का खतरा उठाते हुए कह रहा हूं कि ‘राष्ट्रवाद’ आधुनिक दौर की सबसे वर्चस्ववादी और सर्वग्राह्य विचारधारा है। इसके आगे किसी और की नहीं चलती। यह सिद्धांतत: ‘ब्लैक होल’ की तरह है, किसी भी व्यक्ति / विचार / असहमति को समूचा निगलने में सक्षम। समझ आता है कि क्यों ओरहान पामुक पिछली हिंदुस्तान यात्रा में साहित्य के बारे में बात करते हुए कह गये थे, “साहित्य मानवता की अभिव्यक्ति है। लेकिन हमें समझना होगा कि मानवता और राष्ट्रवादी मानवता दो अलग-अलग चीजें हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&#8216;कथादेश’</strong> के मई अंक में प्रकाशित</p>
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		<title>बड़े नसीबों का शहर है ये, जो इसकी किस्मतों में हम हैं लिखे</title>
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		<pubDate>Wed, 04 May 2011 22:56:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“यह शहर सिर्फ़ एक बहाना भर है आपके अच्छे या बुरे होने का. ज़्यादातर मामलों में बुरे होने का.”

लुटेरों की गोली खाकर घायल पड़ा साठ साला बैंक का वॉचमैन हमारे नायक सावन द्वारा पूछे जाने पर कि “हॉस्पिटल फ़ोन करूँ?”, डूबती हुई आवाज़ में जवाब देता है, “पहले ये पैसे वापस वॉल्ट में रख दो”. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">“यह शहर सिर्फ़ एक बहाना भर है आपके अच्छे या बुरे होने का. ज़्यादातर मामलों में बुरे होने का.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/Shor-In-The-City-Movie-Wallpaper.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-802" title="Shor-In-The-City-Movie-Wallpaper" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/Shor-In-The-City-Movie-Wallpaper-207x300.jpg" alt="Shor-In-The-City-Movie-Wallpaper" width="207" height="300" /></a>लुटेरों की गोली खाकर घायल पड़ा साठ साला बैंक का वॉचमैन हमारे नायक सावन द्वारा पूछे जाने पर कि “हॉस्पिटल फ़ोन करूँ?”, डूबती हुई आवाज़ में जवाब देता है, “पहले ये पैसे वापस वॉल्ट में रख दो”. यह वही वॉचमैन है जिसके बारे में पहले बताया गया है कि बैंक की ड्यूटी शुरू होने के बाद वो पास की ज्यूलरी शॉप का ताला खोलने जाता है. इस दिहाड़ी मजदूरी की सी नौकरी में कुछ और पैसा कमाने की कोशिश. दिमाग़ में बरबस <a href="http://www.imdb.com/title/tt1314274/" target="_blank"><strong>’हल्ला’</strong></a> के बूढ़े चौकीदार मैथ्यू की छवि घूम जाती है जिसकी जवान बेटियाँ शादी के लायक हो गई थीं और जिसके सहारे फ़िल्म ने हमें एक ध्वस्त कर देने वाला अन्त दिया था. राज और कृष्णा की क्रम से तीसरी फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shor_in_the_City" target="_blank"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong></a> जयदीप की फ़िल्म की तरह उतनी गहराई में नहीं जाती, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि और फ़िल्मों की तरह यह शहर को कभी खलनायक नहीं बनने देती. अपनी पिछली फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/99_(2009_film)" target="_blank"><strong>’99’</strong></a> की तरह यहाँ भी राज और कृष्णा बम-बंदूकों, धोखेबाज़ गुंडों, क्रिकेट और बेइमानी और अराजकता से भरे शहर की कहानी किसी प्रेम कथा की तरह प्यार से सुनाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">किसी अचर्चित सच्चाई की तरह समझ आता है कि हमारे शहरों पर ’एक ध्येय, एक मुस्कान, एक कहानी’ वाली फ़िल्में बनाना कैसे असंभव हुआ जाता है. अब तो यह भी ज़रूरी नहीं लगता कि इन समानांतर बहती नदियों के रास्ते में कोई ’इलाहाबाद’ आना ही चाहिए. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shor_in_the_City" target="_blank"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong></a> की ये कहानियाँ तीनों कहानियों को जोड़ते उस घरेलू डॉन (और निर्देशक द्वय के प्यारे) अमित मिस्त्री की मोहताज नहीं हैं. बल्कि जब तक ये साथ नहीं आतीं, इनका आकर्षण कहीं ज़्यादा है. यह एक सद्चरित्र फ़िल्म है. बंदूकों के साए में आगे बढ़ती ’शोर इन द सिटी’ कभी आपको बंदूक के सामने खड़ा नहीं करती, हाँ कभी ऐन मौका आने पर उसे चलाना ज़रूर सिखाती है. शहर को लेकर इसका नज़रिया आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक है, जैसे अपने मुख्य शीर्षक को इसने अब अनिवार्य हक़ीक़त मानकर अपना लिया है. जिस ’गणेश विसर्जन’ को मुम्बई शहर की आधुनिक कल्ट क्लासिक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank"><strong>’सत्या’</strong></a> में आतंक के पर्याय के तौर पर चित्रित किया है, वह यहाँ विरेचन का पर्याय है. बाक़ी फ़िल्म से अलग विसर्जन के दृश्य किसी हैंडीकैम पर फ़िल्माए लगते हैं. शायद यह उसकी ’असलियत’ बढ़ाने का एक और उपाए हो. जैसे आधुनिक शहर के इस निहायत ही गैर-बराबर समाज में अतार्किक बराबरियाँ लाने के रास्ते इन्हीं सार्वजनिकताओं में खोज लिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पैसा उगाहने वाले गुंडों के किरदार में ज़ाकिर हुसैन और सुरेश दुबे उतना ही सही चयन है जितना विदेश से भारत आए हिन्दुतानी मूल ’अभय’ के किरदार में सेंदिल रामामूर्ति. साथ ही <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shor_in_the_City" target="_blank"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong></a> के पास ट्रैफ़िक सिग्नल पर बिकने वाली पाइरेटेड बेस्टसेलर्स छापने वाले और घर में उन्हीं किताबों को डिक्शनरी की सहायता से पढ़ने की असफ़ल कोशिश करने वाले ’तिलक’ जैसे बहु स्तरीय और एक AK56 बंदूक को अपना दिल दे बैठे ’मंडूक’ जैसे औचक-रोचक किरदार हैं. एक का तो निर्माता के भाई ने गुड़-गोबर कर दिया है. दूसरे किरदार में पित्तोबाश त्रिपाठी उस दुर्लभ स्वाभाविकता को जीवित करते हैं जिसने इरफ़ान ख़ान से लेकर विजय राज तक को हमारा चहेता बनाया है. पित्तोबाश, याद रखना. ’कॉमेडी बिकती है’ वाली भेड़चाल में यह मायानगरी तुम्हें अगला ’राजपाल यादव’ बनाने की कोशिश करेगी. तुम इनकी माया से बचना. क्योंकि तुम्हारी अदाकारी की ऊँचाई तुम्हें उन तमाम छ: फ़ुटे नायकों से ऊपर खड़ा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">राज और कृष्णा की ’99’ में दिल्ली को लेकर कुछ दुर्लभ प्रतिक्रियाएं थीं. ऐसी जिन्हें मुम्बईवाले दोस्तों से मैंने कई बार सुना है, लेकिन हिन्दी सिनेमा शहरों को लेकर ऐसी बारीकियाँ दिखाने के लिए नहीं जाना जाता. लेकिन <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shor_in_the_City" target="_blank"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong></a> ने भी इस मामले में अपनी पूर्ववर्ती जैसा स्वभाव पाया है. यहाँ भी आप मुम्बई के उस ’रेड सिग्नल’ से परिचित होते हैं जिससे आगे गरीब की सवारी ’ऑटो’ नहीं, अमीर की सवारी ’टैक्सी’ ही चलती है. यह पूरी की पूरी पाइरेटेड दुनिया है जहाँ न सिर्फ़ किताबें और उनके प्रकाशक फ़र्जी हैं बल्कि बम-बंदूकें और उनसे निकली गोलियाँ भी. जब अच्छाई का कोई भरोसा नहीं रहा तो बुरी चीज़ों का भी भरोसा कब तक बना रहना था. यह कुछ-कुछ उस चुटकुले की याद दिलाता है जहाँ ज़िन्दगी की लड़ाई में हार आत्महत्या करने के लिए आदमी ज़हर की पूरी बोतल गटक जाए लेकिन मरे नहीं. एक और हार, कमबख़्त बोतल का नकली ज़हर भी उसका मुंह चिढ़ाता है. अब यह शहर निर्दयी नहीं, बेशर्म है. इस पाइरेटेड शहर की हर करुणा में चालाकियाँ छिपी हैं और ’भाई’ अकेला ऐसा है जिसे अब भी देश की चिंता है. यह ओसामा और ओबामा के बीच का फ़र्क मिट जाने का समय है. यह नकल के असल हो जाने का समय है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">_ _ _ _ _</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>*</strong>शीर्षक निर्देशक द्वय की पिछली फ़िल्म ’99&#8242; में इस्तेमाल हुए एक गीत से लिया गया है.</p>
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		<title>यह परिवार तो जाना-पहचाना है</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Mar 2011 23:58:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह गलती कई बार होती है. पुरुषसत्तात्मकता को कोसते हुए हम कई बार सीधे  परिवार के मुखिया पुरुष को कोसने लगते हैं. जैसे उसके बदलते ही सब ठीक हो  जाना है. लेकिन गलत उसका पुरुष होना नहीं, गलत वह विचार है जिसे उसका  व्यक्तित्व अपने साथ ढोता है. लीसा चोलोडेंको की फ़िल्म [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/03/kids-are-all-right.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-782" title="kids are all right" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/03/kids-are-all-right-202x300.jpg" alt="kids are all right" width="202" height="300" /></a>यह गलती कई बार होती है. पुरुषसत्तात्मकता को कोसते हुए हम कई बार सीधे  परिवार के मुखिया पुरुष को कोसने लगते हैं. जैसे उसके बदलते ही सब ठीक हो  जाना है. लेकिन गलत उसका पुरुष होना नहीं, गलत वह विचार है जिसे उसका  व्यक्तित्व अपने साथ ढोता है. लीसा चोलोडेंको की फ़िल्म परिवार की संरचना  वही रखते हुए उसमें मुखिया पुरुष को एक महिला किरदार से बदल देती है. और  इसके नतीज़े जानना बड़ा मज़ेदार है. <a href="http://www.imdb.com/title/tt0842926/" target="_blank"><strong>’द किड्स आर ऑल राइट’</strong></a> ऐसे लेस्बियन  जोड़े की कहानी है जो बारास्ते डोनर स्पर्म अपना परिवार बनाता है. दोनों  माँओं के लिए स्पर्म डोनर एक ही अनजान व्यक्ति है. यही अनजान व्यक्ति  (बच्चों का जैविक पिता) बच्चों के बुलावे पर एक दिन उनकी ज़िन्दगियों में  आता है और परिवार के मान्य ढांचे में असंतुलन पैदा करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे ख़ास यहाँ उस परिवार को देखना है जहाँ बालिग पुरुष के न होते भी  परिवार की वही सत्ता संरचना बनी रहती है. एक महिला परिवार के ढांचे से  अनुपस्थित उस पुरुष की भूमिका अपने ऊपर ओढ़ लेती है. निक की भूमिका में एनेट्टे बेनिंग साल का सबसे दमदार रोल निभाती हैं और तिरछी नज़र से हम  उन्हें उसी सत्ता संरचना को दूसरे छोर से निभाते देखते हैं जिसमें स्त्री  हमेशा दोयम दर्जे की भूमिका में ढकेल दी जाती है. वही सत्ता संरचना जो एक  पुरुष और स्त्री से मिलकर बनते परिवार में दिखाई देती है इन स्त्रियों के  बीच भी मौजूद है. वही असुरक्षाएं, वही अधिकारभाव, वही अकेलापन. दूर से  अपरिचित नज़र आता यह परिवार हमारा पड़ौसी है. ’द किड्स आर ऑल राइट’ हमें इस  बात का और तीखा अहसास करवाती है कि बराबरी वाला समाज बनाने के लिए ज़रूरी है  कि परिवार के भीतर की सत्ता संरचना को तोड़ा जाए. इसके हुए बिना बस किरदार  बदल जायेंगे, कहानी वही रहनी है.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p>साहित्यिक पत्रिका<strong> ’कथादेश’ </strong>के मार्च अंक में प्रकाशित<strong>.</strong> पोस्टर साभार : <strong>Laz Marquez</strong> की रचना<strong>.</strong></p>
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		<title>Things we lost in the fire</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Mar 2010 08:23:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; थियोडोर अडोर्नो.

जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Theodor_W._Adorno" target="_blank">थियोडोर अडोर्नो</a></strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">लव, सेक्स और धोखा</a></strong> की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस मासूमियत की वापसी संभव है ? क्या उस एक ग्राफ़िकल दृश्य के साथ, ’जाति’ से जुड़े किसी भी संदर्भ को बहुत दशक पहले अपनी स्वेच्छा से त्याग चुके हिन्दी के ’भाववादी प्रेम सिनेमा’ का अंत हो गया है ? क्या अब हम अपनी फ़िल्मों में बिना सरनेम वाले ’हाई-कास्ट-हिन्दू-मेल’ नायक ’राहुल’ को एक ’अच्छे-अंत-वाली-प्रेम-कहानी’ की नायिका के साथ उसी नादानी और लापरवाही से स्वीकार कर पायेंगे ? क्या हमारी फ़िल्में उतनी भोली और भली बनी रह पायेंगी जितना वे आम तौर पर होती हैं ? <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> की पहली कहानी हिन्दी सिनेमा में एक घटना है. मेरे जीवनकाल में घटी सबसे महत्वपूर्ण घटना. इसके बाद मेरी दुनिया अब वैसी नहीं रह गई है जैसी वो पहले थी. कुछ है जो श्रुति और राहुल की कहानी  ने बदल दिया है, हमेशा के लिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> के साथ आपकी सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि उसे आप ’सिनेमा’ कैसे मानें ? देखने के बाद सिनेमा हाल से बाहर निकलते बहुत ज़रूरी है कि बाहर उजाला बाकी हो. सिनेमा हाल के गुप्प अंधेरे के बाद (जहां आपके साथ बैठे गिनती के लोग वैसे भी आपके सिनेमा देखने के अनुभव को और ज़्यादा अपरिचित और अजीब बना रहे हैं) बाहर निकल कर भी अगर अंधेरा ही मिले तो उस विचार से लड़ाई और मुश्किल हो जाती है. मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में देखते हुए कई बार ऐसा अनुभव किया है, शायद राकेश शर्मा की बनाई ’फ़ाइनल सल्यूशन’. लेकिन किसी हिन्दुस्तानी मुख्यधारा की फ़िल्म के साथ तो कभी नहीं. और सिर्फ़ इस एक विचार को सिद्ध करने के लिए दिबाकर हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा ’रिस्क’ लेते हैं. तक़रीबन चालीस साल पहले ऋषिकेश मुख़र्जी ने अमिताभ को यह समझाते हुए ’गुड्डी’ से अलग किया था कि अगर धर्मेन्द्र के सामने उस ’आम लड़के’ के रोल में तुम जैसा जाना-पहचाना चेहरा (’आनंद’ के बाद अमिताभ को हर तरफ़ ’बाबू मोशाय’ कहकर पुकारा जाने लगा था.) होगा तो फ़िल्म का मर्म हाथ से निकल जायेगा. दिबाकर इससे दो कदम आगे बढ़कर अपनी इस गिनती से तीसरी फ़िल्म में एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिसके नायक &#8211; नायिका लगता है फ़िल्म की कहानियों ने खुद मौहल्ले में निकलकर चुन लिये हैं. पहली बार मैं किसी आम सिनेमा प्रेमी द्वारा की गई फ़िल्म की समीक्षा में <strong><a href="http://www.imdb.com/title/tt1608777/usercomments" target="_self">ऐसा लिखा</a></strong> पढ़ता हूँ कि ’देखो वो बैठा फ़िल्म का हीरो, अगली सीट पर अपने दोस्तों के साथ’ और इसी वजह से उन कहानियों को नकारना और मुश्किल हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले दिन से ही यह स्पष्ट है कि <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अगली <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> नहीं होने वाली है. यह ’डार्लिंग ऑफ़ द क्राउड’ नहीं है. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> आपका कैथार्सिस करती है, लोकप्रिय होती है. लेकिन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> ब्रेख़्तियन थियेटर है जहाँ गोली मारने वाला नाटक में न होकर दर्शकों का हिस्सा है, आपके बीच मौजूद है. मैं पहले भी यह बात कर चुका हूँ कि हमारा लेखन (ख़ासकर भारतीय अंग्रेज़ी लेखन) जिस तरह ’फ़िक्शन’ &#8211; ’नॉन-फ़िक्शन’ के दायरे तोड़ रहा है वह उसका सबसे चमत्कारिक रूप है. ऐसी कहानी जो ’कहानी’ होने की सीमाएं बेधकर हक़ीकत के दायरे में घुस आए उसका असर मेरे ऊपर गहरा है. इसीलिए मुझे अरुंधति भाती हैं, इसिलिये पीयुष मिश्रा पसंद आते हैं. उदय प्रकाश की कहानियाँ मैं ढूंढ-ढूंढकर पढ़ता हूँ. खुद मेरे ’नॉन-फ़िक्शन’ लेखन में कथातत्व की सतत मौजूदगी इस रुझान का संकेत है. दिबाकर वही चमत्कार सिनेमा में ले आए हैं. इसलिए उनका असर गहरा हुआ है. उनकी कहानी <a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-462" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="200" height="311" /></a>सोने नहीं देती, परेशान करती है. जानते हुए भी कि हक़ीकत का चेहरा ऐसा ही वीभत्स है, मैं चाहता हूँ कि सिनेमा &#8211; ’सिनेमा’ बना रहे. मेरी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. &#8216;हम&#8217; चाहते हैं कि हमारी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. हम <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> को नकारना चाहते हैं, ख़ारिज करना चाहते हैं. चाहते हैं कि उसे किसी संदूक में बंद कर दूर समन्दर में फ़ैंक दिया जाए. उसकी उपस्थिति हमसे सवाल करेगी, हमारा जीना मुहाल करेगी, हमेशा हमें परेशान करती रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> पर बात करते हुए आलोचक उसकी तुलना <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong>, और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Black_Friday_(2004_film)" target="_blank">’ब्लैक फ़्राइडे’</a></strong> से कर रहे हैं. बेशक यह उतनी ही बड़ी घटना है हिन्दी सिनेमा के इतिहास में जितनी <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong> या <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong> थीं. ’माइलस्टोन’ पोस्ट नाइंटीज़ हिन्दी सिनेमा के इतिहास में. उन फ़िल्मों की तरह यह कहानी कहने का एक नया शास्त्र भी अपने साथ लेकर आई है. लेकिन मैं स्पष्ट हूँ इस बारे में कि यह इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह अपने पीछे कोई परिवार नहीं बनाने वाली. इस प्रयोगशील कैमरा तकनीक का ज़रूर उपयोग होगा आगे लेकिन इसका कथ्य, इसका कथ्य ’अद्वितीय’ है हिन्दी सिनेमा में. और रहेगा. यह कहानी फिर नहीं कही जा सकती. इस मायने में <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अभिशप्त है अपनी तरह की अकेली फ़िल्म होकर रह जाने के लिए. शायद <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Om-Dar-Ba-Dar" target="_blank">’ओम दर-ब-दर’</a></strong> की तरह. क्लासिक लेकिन अकेली.</p>
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		<title>इस रात की सुबह नहीं</title>
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		<pubDate>Tue, 23 Mar 2010 12:29:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.

मैं नर्क में हूँ.
यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">’लव, सेक्स और धोखा’</a></strong> पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote style="text-align: justify;"><p>मैं नर्क में हूँ.</p>
<p>यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों को पसंद करती थी. लेकिन तुमने मेरे साथ धोखा किया है. माना कि मेरे पिता थोड़े सख़्त हैं लेकिन मेरा स्कूल का ड्रामा देखकर तो खुश ही होते थे. यू कांट शो हिम लाइक दैट. और वो ’राहुल’&#8230; वो तो एकदम&#8230; दिबाकर मैं तुम्हें मार डालूंगी. यू डोन्ट हैव एनी राइट टू शो माई लाइफ़ लाइक दैट इन पब्लिक. अपनी इंटरप्रिटेशंस और अपनी सो-कॉल्ड रियलस्टिक एंडिंग्स तुम अपने पास रखो. हमेशा ही ’सबसे बुरा’ थोड़े न होता है. और हमारे यहाँ तो वैसे भी अब ’कास्ट-वास्ट’ को लेकर इतनी बातें कहाँ होती हैं. माना कि पापा उसे लेकर बड़े ’कॉशस’ रहते हैं लेकिन&#8230; शहरों में थोड़े न ऐसा कभी होता है. वो तो गाँवों में कभी-कभार ऐसा सुनने को मिलता है बस. और फ़िल्मों में, फ़िल्मों में तो कभी ऐसा नहीं होता. फ़िल्में ऐसी होती हैं क्या ? तुम फ़िल्म के नाम पर हमें कुछ भी नहीं दिखा सकते. यह फ़िल्म है ही नहीं. नहीं है यह फ़िल्म.</p>
<p>ठीक है, हमारे यहाँ कभी कास्ट से बाहर शादी नहीं हुई है. तो ? क्या हर चीज़ का कोई ’फ़र्स्ट’ नहीं होता ? पहले सब ऐसे ही बुरा-बुरा बोलते हैं, बाद में सब मान लेते हैं. वो निशा का याद नहीं, माना कि उसका वाला लड़का ’सेम कास्ट’ का था लेकिन थी तो ’लव मैरिज’ ना ? कैसे शादी के बाद सबने मान लिया था. दीपक के पापा ने तो पूरा दहेज भी लिया था दुबारा शादी करवाकर. देख लेना मेरा भी सब मान लेंगे. शुरु में प्रॉब्लम होगी उसकी कास्ट को लेकर लेकिन दिबाकर तुम देख लेना. और &#8216;उसे’ जानने के बाद कैसे कोई उसे नापसंद कर सकता है. पापा को मिलने तो दो, नाम-वाम सब भूल जायेंगे उससे मिलने के बाद. देख लेना  सब मान लेंगे जब मैं उन्हें सब बताऊँगी. शादी के पहले नहीं बतायेंगे, और जब शादी के बाद उनसे मिलवाऊँगी&#8230; आई प्लान्ड एवरीथिंग. बट दिबाकर, यू मेस्ड अप ऑल इन माई माइंड. नाऊ व्हाट विल आई डू, हॉऊ विल आई गैट बैक ? इट्स नॉट ए मूवी एट-ऑल. आई हेट दिस मूवी.</p>
<p style="text-align: justify;">एंड वन मोर थिंग&#8230; नोट दिस डाउन&#8230; माई सरनेम इस नॉट ’दहिया’.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1new.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-438" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1new.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="700" height="211" /></a></p>
]]></content:encoded>
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		<title>ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9&#8242; सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/</link>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 17:32:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">यह <strong>ऑस्कर</strong> भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे <strong>’अवतार’</strong> और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा <strong>’दि हर्ट लॉकर’</strong> के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म <strong>’डिस्ट्रिक्ट 9’</strong> को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूँ. नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं. कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से&#8230;</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-412" title="avatar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster-200x300.jpg" alt="avatar" width="200" height="300" /></a>अवतार </strong>: मेरी नज़र में इस फ़िल्म की खूबियाँ और कमियाँ दोनों एक ही विशेषता से निकली हैं. वो है इसकी युनिवर्सल अपील और लोकप्रियता. यह दरअसल जेम्स कैमेरून की ख़ासियत है. उनकी पिछली फ़िल्में ’टाइटैनिक’ और ’टर्मिनेटर 2 : जजमेंट डे’ इसकी गवाह हैं. मुझे आज भी याद है कि ’टर्मिनेटर 2’ ही वो फ़िल्म थी जिसे देखते हुए मुझे बचपन में भी ख़ूब मज़ा आया था जबकि उस वक़्त मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्में कम ही समझ आती थीं. तो ख़ूबी ये कि इसकी कहानी सरल है, आसानी से समझ आने वाली. जिसकी वजह से इसे विश्व भर में आसानी से समझा और सराहा जा रहा है. और कमी भी यही कि इसकी कहानी सरल है, परतदार कहानियों की गहराईयों से महरूम. जिसकी वजह से इसके किरदार एकायामी और सतही जान पड़ते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म की अच्छी बात तो यही कही जा सकती है कि यह नष्ट होती प्रकृति को इंसानी लिप्सा से बचाए जाने का ’पावन संदेश’ अपने भीतर समेटे है. लेकिन यह ’पावन संदेश’ ऐसा मौलिक तो नहीं जिसे सारी दुनिया एकटक देखे. सच्चाई यही है कि ’अवतार’ का असल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है. किरदारों और कहानी के उथलेपन को यह तकनीक द्वारा प्रदत्त गहराई से ढकने की कोशिश करती है. यही वजह है कि फ़िल्म की हिन्दुस्तान में प्रदर्शन तिथि को दो महीने से ऊपर बीत जाने के बावजूद कनॉट प्लेस के ’बिग सिनेमा : ओडियन’ में सप्ताहांत जाने पर हमें टिकट खिड़की से ही बाहर का मुँह देखना पड़ता है. मानना पड़ेगा, थ्री-डी अनुभव चमत्कारी तो है. पैन्डोरा के उड़ते पहाड़ और छूते ही बंद हो जाने वाले पौधे विस्मयकारी हैं. और एक भव्य क्लाईमैक्स के साथ वो मेरी उम्मीदें भी पूरी करती है. लेकिन मैं अब भी नहीं जानता हूँ कि अगर इसे एक सामान्य फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसमें कितना ’सत्त’ निकलेगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-413" title="the-hurt-locker" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker-193x300.jpg" alt="the-hurt-locker" width="193" height="300" /></a>दि हर्ट लॉकर</strong> : बहुत उम्मीदों के साथ देखी थी शायद, इसलिए निराश हुआ. बेशक बेहतर फ़िल्म है. लेकिन ’आउट ऑफ़ दि बॉक्स’ नहीं है मेरे लिए. कुछ खास पैटर्न हैं जो इस तरह की हॉलिवुडीय ’वॉर-ड्रामा’ फ़िल्में फ़ॉलो करती हैं, हर्ट लॉकर भी वो करती है. फिर भी, मेरी समस्याएं शायद इससे हैं कि वो जो दिखा रही है, आखिर बस वही क्यों दिखा रही है? लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि वो जिस पक्ष की कहानी दिखाना चाहती है उसे असरदार तरीके से दिखा रही है. एक स्तर पर ’दि हर्ट लॉकर’ की तुलना स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ से की जा सकती है. लेकिन यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि एक महिला द्वारा निर्देशित होने के बावजूद यह बहुत ही मर्दवादी फ़िल्म है. बेशक युद्ध-फ़िल्मों में एक स्तर पर ऐसा होना लाज़मी भी है. इसका नायक एक ’सम्पूर्ण पुरुष नायकीय छवि’ वाला नायक है. तुलना के लिए बताना चाहूँगा कि ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ में जिस तरह टॉम हैंक्स अपने किरदार में एक फ़ेमिनिस्ट अप्रोच डाल देते हैं उसका यहाँ अभाव है.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरी नज़र में हर्ट लॉकर का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है उसका ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’. और तनाव निर्माण का इससे बेहतर सांचा और क्या मिलेगा, फ़िल्म का नायक एक बम निरोधक दस्ते का सदस्य है और इराक़ में कार्यरत है. मुझे न जाने क्यों हर्ट लॉकर बार-बार दो साल पहले आई हिन्दुस्तानी फ़िल्म ’आमिर’ की याद दिला रही थी. कोई सीधा संदर्भ बिन्दु नहीं है. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों का मुख्य आधार तनाव की सफ़ल संरचना है और दोनों ही फ़िल्मों में विपक्ष का कोई मुकम्मल चेहरा कभी सामने नहीं आता. और गौर से देखें तो हर्ट लॉकर में वही अंतिम प्रसंग सबसे प्रभावशाली बन पड़ा है जहाँ अंतत: ’फ़ेंस के उधर’ मौजूद मानवीय चेहरा भी नज़र आता है. ’दि हर्ट लॉकर’ आपको बाँधे रखती है. और कुछ दूर तक बना रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-415" title="inglourious-basterds" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds-205x300.jpg" alt="inglourious-basterds" width="205" height="300" /></a>इनग्लोरियस बास्टर्ड्स</strong> : मैं मूलत: टैरेन्टीनो की कला का प्रशंसक नहीं हूँ. मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्त उसके गहरे मुरीद हैं. इस ज़मीन पर खड़े होकर मेरी टैरेन्टीनो से बात शुरु होती है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ शुद्ध एतिहासिक संदर्भों के साथ एक शुद्ध काल्पनिक कहानी है. ख़ास टैरेन्टीनो की मोहर लगी. इस फ़िल्म को आप टैरेन्टीनो के पुराने काम के सन्दर्भ में पढ़ते हैं. ’पल्प फ़िक्शन’ के संदर्भ में पढ़ते हैं. पिछली संदर्भित फ़िल्म ’दि हर्ट लॉकर’ की तरह ही ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ भी अपनी कथा-संरचना में ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’ को अपना आधार बनाती है. फ़िल्म का शुरुआती प्रसंग ही देखें, उसमें ’तनाव निर्माण’ और उसके साथ बदलता इंसानी व्यवहार देखें. आप समझ जायेंगे कि टैरेन्टीनो इस पद्धति के साथ हमारा परिचय इंसानी व्यव्हार की कमज़ोरियों, उसकी कुरूपताओं से करवाने वाले हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">और इस शुरुआती प्रसंग के साथ ही क्रिस्टोफर वॉल्टज़ परिदृश्य में आते हैं. मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रैड पिट का काम भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वॉल्टज़ यहाँ निर्विवाद रूप से बहुत आगे हैं. उनका लोकप्रियता ग्राफ़ इससे नापिए कि अपने क्षेत्र में (सहायक अभिनेता) आई.एम.डी.बी. पर उन अकेले को जितने वोट मिले हैं वो बाक़ी चार नामांकितों को मिले कुल वोट के दुगुने से भी ज़्यादा है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ को सम्पूर्ण फ़िल्म के बजाए अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर पढ़ा जाना चाहिए. यह टैरेन्टीनो को पढ़ने का पुराना तरीका है, उन्हीं का दिया हुआ. हिंसा की अति होते हुए भी उनकी फ़िल्म कुरूप नहीं होती, बल्कि वह एक दर्शनीय फ़िल्म होती है. जैसा मैंने पहले भी कहा है, वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे हैं. यह फ़िल्म उस किताब का अगला पाठ है. कई सारे उप-पाठों में बँटा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-416" title="up in the air" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster-202x300.jpg" alt="up in the air" width="202" height="300" /></a>अप इन दि एयर</strong> : जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. और ढेर सारा स्टाइल. इस फ़िल्म का सबसे बड़ा बिन्दु मेरी नज़र में यही है. यह एक बेहतर तरीके से बनाई, सेंसिबल कहानी है जिसकी जान इसके ट्रीटमेंट में छिपी है. तुलना के लिए फ़रहान अख़्तर की फ़िल्में देखी जा सकती हैं. शहर दर शहर उड़ती इस फ़िल्म के किरदार कॉर्पोरेट में काम करने वाले मेरे दोस्तों को बहुत रिलेटेबल लग सकते हैं. फ़िल्म में बहुत से तीखे प्रसंग हैं जिन्हें कसी स्क्रिप्ट में पेश किया गया है. और वो बहन-साढू की तसवीर के साथ एयरपोर्ट-एयरपोर्ट घूमना तो बहुत ही मज़ेदार है. क्या पुरस्कार मिलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सुना है कि यह कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों की दौड़ में दूसरे नम्बर पर भाग रही है. अगर आप इस रविवार एक ’अच्छी’ फ़िल्म देखकर अपनी शाम सुकून से बिताना चाहते हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-417" title="district 9" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster-203x300.jpg" alt="district 9" width="203" height="300" /></a>डिस्ट्रिक्ट 9</strong> : नामांकनों की लम्बी सूची में यह सबसे चमत्कारी फ़िल्म है. जी हाँ, यह मैं बहुचर्चित ’अवतार’ थ्री-डी में देखने के बाद कह रहा हूँ. दरअसल मैं इसी फ़िल्म पर बात करना चाहता हूँ. ‘डिस्ट्रिक्ट 9’ आपको हिला कर रख देती है. ध्वस्त कर देती है. यह दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है. इस विज्ञान-फंतासी को इसका तकनीकी पक्ष नहीं, इसका विचार अद्भुत फ़िल्म बनाता है. ऐसा विचार जो आपको डराता भी है और आपकी आँखे भी खोलता है.</p>
<p style="text-align: justify;">जिस तरह पिछले साल आयी फ़िल्म ’दि डार्क नाइट’ सुपरहीरो फ़िल्मों की श्रंखला में एक पीढ़ी की शुरुआत थी उसी तरह से ’डिस्ट्रिक्ट 9’ विज्ञान-फंतासी के क्षेत्र में एक नई पीढ़ी के कदमों की आहट है. ’डार्क नाइट’ एक सामान्य सुपरहीरो फ़िल्म न होकर एक दार्शनिक बहस थी. यह उस शहर के बारे में खुला विचार मंथन थी जिसकी किस्मत एक अनपहचाने, सिर्फ़ रातों को प्रगट होने वाले, मुखौटा लगाए इंसान के हाथों में कैद है. क्या उस शहर को किसी भी अन्य सामान्य शहर की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? ठीक उसी तरह, ’डिस्ट्रिक्ट 9’ भी एक सामान्य ’एलियन फ़िल्म’ न होकर एक प्रतीक सत्ता है. हमारी धरती पर घटती एक ’एलियन कथा’ के माध्यम से यह आधुनिक इंसानी सभ्यता की कलई खोल कर रख देती है. विकास की तमाम बहसें, उसके भोक्ता, उसके असल दुष्परिणाम, हमारे शहरी संरचना के विकास की अनवरत लम्बी होती रेखा और हाशिए पर खड़ी पहचानों से उसकी टकराहट, भेदभाव, इंसानी स्वभाव के कुरूप पक्ष, सभी कुछ इसमें समाहित है. और इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अपनी उस पूर्ववर्ती की तरह ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को भी ऑस्कर में नज़रअन्दाज़ कर दिया जाएगा. ’सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ की दौड़ में उसका शामिल होना भी सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो पाया है कि अकादमी ने इस बार नामांकित फ़िल्मों की संख्या 5 से बढ़ाकर 10 कर दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी शुरुआत से ही ’डिस्ट्रिक्ट 9’ एक प्रामाणिक डॉक्युड्रामा का चेहरा पहन लेती है. मेरे ख़्याल से यह अद्भुत कथा तकनीक फ़िल्म के लिए आगे चलकर अपने मूल विचार को संप्रेषित करने में बहुत कारगर साबित होती है. शुरुआत से ही यह अपना मुख्य घटनास्थल (जहाँ स्पेसशिप आ रुका है) अमरीका के किसी शहर को न बनाकर जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) को बनाती है और केन्द्रीकृत विश्व-व्यवस्था के ध्रुव को हिला देती है. एलियन्स का घेट्टोआइज़ेशन और उनका शहर से उजाड़ा जाना हमारे लिए ऐसा आईना है जिसमें हमारे शहरों को अपना विकृत होता चेहरा देखना चाहिए. और इस ’रियलिटी चैक’ के बाद कहानी जो मोड़ लेती है वो आपने सोचा भी नहीं होगा. फ़िल्म का अंतिम दृश्य एक कभी न भूलने वाला, हॉन्टिंग असर मेरे ऊपर छोड़ गया है. नए, बेहतरीन कलाकारों के साथ इस फ़िल्म का चेहरा और प्रामाणिक बनता है लेकिन तकनीक में यह कोई ओछा समझौता नहीं करती.</p>
<p style="text-align: justify;">मैं आश्चर्यचकित हूँ इस बात से कि क्यों इस फ़िल्म के निर्देशक को हम इस साल के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में नहीं गिन रहे? और शार्लटो कोप्ले (Sharlto Copley) जिन्होंने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है को क्यों नहीं इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता गिना जा रहा? क्या, हिंसा की अति? इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की समूची यात्रा (फ़िल्म की शुरुआत से आखिर तक का कैरेक्टर ग्राफ़) इतनी बदलावों से भरी, अविश्वसनीय और हृदय विदारक है कि उसका सर्वश्रेष्ठ की गिनती में न होना उस सूची के साथ मज़ाक है.</p>
<p style="text-align: justify;">पोस्ट ’क्योटो’ और ’कोपनहेगन’ काल में यह कोरा संयोग नहीं है कि दो ऐसी विज्ञान फंतासियाँ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की दौड़ में हैं जिनमें मनुष्य प्रजाति खलनायक की भूमिका निभा रही है. यह और भी रेखांकित करने लायक बात इसलिए भी बन जाती है जब पता चले कि बीते सालों में अकादमी विज्ञान-फंतासियों को लेकर आमतौर से ज़्यादा नरमदिल नहीं रही है. असल दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है कि अब ’साइंस-फ़िक्शन’ सिनेमा अपनी सही राह पहचान गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-418" title="up" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar-202x300.jpg" alt="up" width="202" height="300" /></a>अप </strong>: वाह, क्या फ़िल्म है. एक खडूस डोकरा (बूढ़ा) अपने घर के आस-पास फैलते जाते शहर से परेशान है. और वो अपने घर में ढेर सारे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है, अपने सपनों की दुनिया की ओर! क्या कमाल की बात है कि यह एनिमेशन फ़िल्म भी हमारे यांत्रिक होते जा रहे शहरी जीवन और शहरी विकास के मॉडल पर एक तीखी टिप्पणी है. ’अप’ एनीमेशन फ़िल्म होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए नामांकित हुई है. इससे ही आप उसके चमत्कार का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ख़ास बात देखने की है कि पिछले साल की विजेता ’वॉल-ई’ की तरह ही यह भी इंसानी सभ्यता के अंधेरे मोड़ की तरफ़ जाने की एक कार्टूनीकृत भविष्यवाणी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या आपको मालूम है </strong>:</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- इस साल पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के दो सबसे बज़बूत दावेदार जेम्स कैमेरून (अवतार) और कैथेरीन बिग्लोव (दि हर्ट लॉकर) पूर्व पति-पत्नी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- तमाम अन्य पूर्ववर्ती पुरस्कार तथा सिनेमा आलोचक इस बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मुकाबला इन्हीं दोनों पूर्व पति-पत्नी जोड़े के बीच गिन रहे हैं. लेकिन आम दर्शक के बीच आप क्वेन्टीन टैरेन्टीनो (इनग्लोरियस बास्टर्ड्स) की लोकप्रियता और प्रभाव का अन्दाज़ा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि आई.एम.डी.बी. वेबसाइट पर पब्लिक पोल में ऑस्कर की पिछली रात तक भी वे दूसरे स्थान पर चल रहे थे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- ऑस्कर के पहले मिलने वाला इंडिपेंडेंट सिनेमा का ’स्पिरिट पुरस्कार’ बड़ी मात्रा में ’प्रेशियस’ ने जीता है. कई सिनेमा आलोचक इस फ़िल्म में माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा मोनिक्यू (Mo’nique) की भूमिका को इस साल का सर्वश्रेष्ठ अदाकारी प्रदर्शन गिन रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- अगर कैथरीन बिग्लोव ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता (और जिसकी काफ़ी संभावना है.) तो वे यह पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला होंगी. इससे पहले केवल तीन महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए नामांकित हुई हैं. लीना वार्टमुलर (Lina Wertmuller) ’सेवन ब्यूटीज़’ के लिए (1976), जेन कैम्पियन (Jane Campion) ’दि पियानो’ (1993) के लिए और बहुचर्चित ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ (2003) के लिए सोफ़िया कोपोला (Sofia Coppola).</p>
]]></content:encoded>
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		<title>बंजारा नमक लाया</title>
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		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 09:14:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>
		<category><![CDATA[गाँव]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>

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		<description><![CDATA[
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है.

प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं प्रभात की उन कविताओं को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रभात</strong> की कविताओं की नई किताब <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> आई है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-368" title="IMG_2656" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg" alt="IMG_2656" width="306" height="501" /></a>प्रभात </strong>हमारा दोस्त है.<strong> प्रभात</strong> की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में <strong>’एकलव्य’</strong> पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं <strong>प्रभात</strong> की उन कविताओं को ख़ास नोटिस करता हूँ जहाँ वह हमारे साहित्य में ’क्रूर, हत्यारे शहर’ के बरक्स गाँव की रूमानी लेकिन एकतरफ़ा बनती छवि को तोड़ते हैं. यहाँ मेरी पसंदीदा कविता <strong>’मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में’</strong> आपके सामने है. उनका गाँव हिन्दुस्तान का जीता-जागता गाँव है, अपनी तमाम बेइंसाफ़ियों के साथ. लेकिन इससे उनका गाँव बेरंग नहीं होता, बेगंध नहीं होता. तमाम बेइंसाफ़ियों के बावजूद उसका रंग मैला नहीं होता. एक ’सत्तातंत्र’ गाँव में भी है और उसका मुकाबला भी उतना ही ज़रूरी है. <strong>प्रभात</strong> जब ’गाँव’ की बेइंसाफ़ियों पर सवाल करते हैं तो यह उस ’सत्तातंत्र’ पर सीधा सवाल है. <strong>प्रभात</strong> की कविता ’गाँव’ का पक्ष नहीं लेती, बल्कि गाँव के भीतर जाकर ’सही’ का पक्ष लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा हमारे दोस्त <strong>प्रमोद</strong> ने भूमिका में लिखा है कि ’पानी’ <strong>प्रभात</strong> की कविता का सबसे मुख्य किरदार है. होना भी चाहिए, राजस्थान पानी का कितना इंतज़ार करता है, पानी हमारे मानस का मूल तत्व हो जैसे. और उनकी कविता ’या गाँव को बंटाढार बलमा’ मैं यहाँ न समझे जाने का जोख़िम उठाते हुए भी दे रहा हूँ, ऐसा गीत विरले ही लिखा जाता है. कितना सीधा, सटीक. फिर भी कितना गहरा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और वजह से यह किताब ख़ास है. इस किताब में दोस्ती की मिठास है. कैसे एक दोस्त कविताएं लिखता है, दूसरा दोस्त उन कविताओं को एक बहुत ही ख़ूबसूरत किताब का रूप देता है और तीसरा दोस्त अपना लाड़ लड़ाता है एक प्यारी सी भूमिका लिख कर. मैंने बचपन में अपनी छोटी-छोटी, मिचमिचाई आँखों से इन दोस्तियों को बड़े होते देखा है. कभी ये सारे अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, कोई चित्रकार है तो कोई मास्टर. कोई संपादक हो गया है तो कोई बड़ा अफसर. कोई किसी अख़बार में काम करती है तो कोई दिखाई ही नहीं देता कई-कई साल तक. लेकिन फिर अचानक किसी दिन ये मिलकर <strong>’वितान’</strong> हो जाते हैं. और इन्हें जोड़ने का सबसे मीठा माध्यम हैं <strong>प्रभात</strong> की कविताएं. इन सारे दोस्तों को थोड़ा सा कुरेदो और <strong>प्रभात</strong> की एक कविता निकल आती है हरेक के भीतर से.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आप <strong>प्रभात</strong> की कविताएं पढ़ना और सहेजना चाहें तो इस सुंदर सी किताब को <strong>विश्व पुस्तक मेले</strong> में <strong>’एकलव्य’</strong> की स्टॉल <strong>(हॉल न.12A/ स्टॉल न.188)</strong> से सिर्फ़ साठ रु. देकर ख़रीद सकते हैं. यहाँ इस किताब से मेरी पसंदीदा कविताओं के अलावा मैं <strong>प्रमोद</strong> की लिखी भूमिका भी उतार रहा हूँ.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>ज़मीन की बटायी</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">सिर्फ़ चार के खाते है सैंकड़ो बीघा ज़मीन<br />
कुछ छह-छह बीघा में हैं बाकी सारे भूमिहीन<br />
भूमिहीन हैं जो मज़दूर मज़लूम हैं<br />
ज़िन्दा हैं मगर ज़िन्दगी से महरूम हैं<br />
जीना क्या है जीना दुखदायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ठसक रुपैये की किसी में ऎंठ लट्ठ की<br />
बड़ी पूछ बाबू तेरे गाँव में मुँहफट्ट की<br />
बड़ी पूछ उनकी जो कि छोटे काश्तकार हैं<br />
शामिल जो ज़मींदारों के संग अनाचार में<br />
चारों खण्ड गाँव घूमा पाया यही घूम के<br />
सबके हित एक से सब बैरी मज़लूम के<br />
दुखिया की नहीं सुनवायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में<br />
ऋण लेर सेर घी छँडायौ तो पै रामजी<br />
अन्न का दो दाणा भी तो दै रै म्हारा रामजी</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का<br />
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का<br />
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं<br />
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं<br />
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं<br />
जानेवाले जाने कैसी पीर छोड़ जाते हैं<br />
परदेसी तेरी अटारी राँय-बाँय रहती है<br />
मौत के सन्नाटे जैसी साँय-साँय रहती है<br />
ऎसी ना हो किसी की रुसवायी मेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी मेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>भाई रे</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ऋतुओं की आवाजाही रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खजूरों को लू में ही<br />
पकते हुए देखा<br />
किसानों को तब मेघ<br />
तकते हुए देखा<br />
कुँओं के जल को<br />
उतरते हुए देखा<br />
गाँवों के बन को<br />
झुलसते हुए देखा<br />
खेतों को अगनी में<br />
तपते हुए देखा<br />
बर्फ़ वाले के पैरों को<br />
जलते हुए देखा<br />
गाते हुए ठंडी-मीठी बर्फ़<br />
दूध की मलाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">जहाँ से उठी थी पुकारें<br />
वहाँ पर पड़ी हैं बौछारें<br />
बैलों ने देखा<br />
भैंस-गायों ने देखा<br />
सूखें दरख़्तों की<br />
छावों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">नीमों बबूलों से ऊँची-ऊँची घासें<br />
ऎसी ही थी इनकी गहरी-गहरी प्यासें<br />
सूखे हुए कुँए में मरी हुई मेंढकी<br />
ज़िन्दा हुई टर-टर टर्राई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आल भीगा पाल भीगा<br />
भरा हुआ ताल भीगा<br />
आकाश पाताल भीगा<br />
पूरा एक साल भीगा<br />
बरगदों में बैठे हुए<br />
मोरों का शोर भीगा<br />
आवाज़ें आई घिघियाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">गड़रियों ने देखा<br />
किसानों ने देखा<br />
ग्वालों ने देखा<br />
ऊँट वालों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बारिश की अब दूर<br />
चली गई झड़ियों को<br />
खेतों में उखड़ी<br />
पड़ी मूँगफलियों को<br />
हल्दी के रंग वाले<br />
तितली के पर वाले<br />
अरहर के फूलों को<br />
कोसों तक जंगल में<br />
ज्वार के फूलों को</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">दूध जैसे दानों से<br />
जड़े हुए देखा<br />
खड़े हुए बाजरे को<br />
पड़े हुए देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">चूहों ने देखा<br />
बिलावों ने देखा<br />
साँपों ने देखा<br />
सियारों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आते हुए जाड़े में<br />
हरेभरे झाड़ों की<br />
कच्ची सुगंध महमहायी रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>बंजारा नमक लाया</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">साँभर झील से भराया<br />
भैंरु मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बर्फ़ जैसी चमक<br />
चाँद जैसी बनक<br />
चाँदी जैसी ठनक<br />
अजी देसी नमक<br />
देखो ऊँटगाड़ी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कोई रोटी करती भागी<br />
कोई दाल चढ़ाती आई<br />
कोई लीप रही थी आँगन<br />
बोली हाथ धोकर आयी<br />
लायी नाज थाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">थोड़ा घर की खातिर लूँगी<br />
थोड़ा बेटी को भेजूँगी<br />
महीने भर से नमक नहीं था<br />
जिनका लिया उधारी दूँगी<br />
लेन देन की मची है धूम<br />
घर गुवाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कब हाट जाना होता<br />
कब खुला हाथ होता<br />
जानबूझ कर नमक<br />
जब ना भूल आना होता<br />
फ़ीके दिनों में नमक डाला<br />
मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>या गाँव को बंटाढार बलमा</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">याकी कबहुँ पड़े ना पार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">इसकूल कू बनबा नाय देगौ<br />
बनती इसकूल को ढाय देगौ<br />
यामैं छँट-छँट बसे गँवार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या कू एक पटैलाँई ले बैठी<br />
काँई सरपंचाई ले बैठी<br />
बोटन म लुटाया घरबार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">छोरी के बहयाव म लख देगौ<br />
छोरा के म दो लख लेगौ<br />
छोरा-छोरी कौ करै ब्यौपार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या की छोरी आगे तक रौवै है<br />
पढबा के दिनन कू खोवै है<br />
चूल्हा फूँकै झकमार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या का छोरा बिंगड़ै कोनी पढै<br />
दस्सूई सूँ आगै कोनी बढै<br />
इनकू इस्याई मिल्या संस्कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">पैलाँई कमाई कम होवै<br />
ऊपर सूँ कुरीति या ढोवै<br />
बात-बात म जिमावै बामण चार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कुटमन की काँई चलाई लै<br />
भाई कू भाई देख जलै<br />
यामै पनपै कैसे प्यार बलमा<br />
या गाँव कौ बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बनती कोई बात बनन ना दे<br />
करै भीतर घात चलन ना दे<br />
यामै कैसै सधै कोई कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">यामै म्हारी कोई हेट नहीं<br />
दिनरात खटूँ भरै पेट नहीं<br />
या गाँव म डटूँ मैं काँई खा र बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-379" title="IMG_2652" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg" alt="IMG_2652" width="247" height="430" /></a>इस किताब का नाम <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> नहीं होता तो क्या हो सकता था? शायद <strong>’प्रिय पानी’</strong> हो सकता था. इसका एक बड़ा हिस्सा है जो पानी की कथा कहता है, पानी को याद करता है. पानी वहाँ एक स्मृति है, पानी वहाँ जीवन है, पानी अपने आप में संगीत है. उसकी अपनी ध्वनियाँ हैं. गिरने की, बरसने की. फिर ऎसा क्या रहा होगा जो किताब का नाम सिर्फ़ एक गीत के नाम पर रख दिया गया होगा. दरअसल यह भी एक कहानी जैसा है कि कोई गीत अपनी ही किताब पर भारी पड़े. मगर गीत में यह वज़न आया कहाँ से है? तो वह आया है इसकी प्रसिद्धि से. दरअसल प्रभात का यह गीत लिखे जाने के दिन से ही इतना प्रसिद्ध हुआ है कि इसे नज़र अंदाज करना किसी भी किताब में किन्हीं भी गीतों के बीच मुश्किल होता. राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के जिन-जिन इलाकों में इसे किसी ने गा दिया यह तुरंत ही वहाँ के लोगों की ज़बान पर चढ़ गया और उन्होंने इसे अपनाकर प्यार देना शुरु कर दिया. यह बात इस ओर भी संकेत करती है कि उदार बाज़ारवाद के इन दिनों में इन सभी इलाकों में कहीं ना कहीं जीवन इतना ही संघर्षमय है कि उन्हें नमक जैसी चीज़ पर लिखा गया गीत अपनी ज़रूरत महसूस होता है. इस गीत की खूबसूरती है कि इसमें एक तरफ़ तो नमक के इतने सुन्दर बिम्ब हमें मिलते हैं और दूसरी तरफ़ उसी नमक के लिए ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पूरी जटिलता के साथ उपस्थित है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस किताब में दो-तीन तरह के मिजाज़ के गीत हैं. एक वे जो सीधे-सीधे प्रकृति की सुन्दरता को प्रगट करते हैं. दूसरे वे जो प्रतिरोध की आवाज़ बन जाते हैं, तीसरे वे जो जीवन को उसकी वास्तविकता में बहुत ही मार्मिक ढंग से कहते हैं और चौथे वे जो पारंपरिक मिथक कथाओं को लेकर एक ख़ास शैली में लिखे गए हैं. इस शैली को ’पद गायन’ की शैली कहते हैं और यह राजस्थान के माळ, जगरौटी इलाके (करौली, सवाईमाधोपुर व दौसा ज़िले) में मीणा व अन्य जातियों द्वारा गाए जाते हैं. यही कारण है कि किताब को इस शैली के प्रसिद्ध कवि एवं लोक गायक धवले को समर्पित किया गया है. किताब में दो भाषाएं हैं जो हमारी बहुभाषिक संस्कृति की बानगी हैं. कुछ गीत खड़ी बोली हिन्दी में हैं, कुछ उस माळ की भाषा में जो प्रभात की संवेदनात्मक ज़मीन है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह किताब इस बात की गवाह है कि काव्य किस भाषा में है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह किस चेतना के साथ है. <strong>’सीता वनवास’</strong> पद की काव्य चेतना वह सारे सवाल हमारी मनुष्य सभ्यता के सामने खड़े करती है जिनकी अपेक्षा हम आज की किसी भी कविता से करना चाहेंगे. इसी तरह चाहे वह खड़ी बोली हिन्दी में लिखा <strong>’धरती राजस्थानी है’</strong> हो या माळ की भाषा में लिखा <strong>’काळी बादळी’</strong>. दोनों में ही सूखे व अकाल की विभीषिका को व्यक्त करने वाली काव्य चेतना बहुत नज़दीक की है. इस किताब से गुज़रते हुए दो-तीन तरह की अनुभूतियाँ हो सकती हैं. एक स्थिति है जब आप नई भाषा व उसमें आए प्रकृति के नए बिम्बों के काव्य रसास्वादन से कुछ खुश व समृद्ध महसूस करते हैं. दूसरी स्थिति है जब वास्तविकता के वर्णन में काव्य की मार्मिकता आपको अन्दर तक भर देती है और आप उदास महसूस करते हैं. और तीसरी स्थिति है जब आप अपने समय पर किए जा रहे सवालों में शामिल हो जाते हैं, स्थितियों के प्रतिरोध के स्वर में शामिल हो जाते हैं, और अपने भीतर बदलाव की कोशिश करने की एक ताकत महसूस करने लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जब सपनों को सच में बदलने की ज़िद की जाती है तो वे विचार या कला की शक्ल लेते हैं. यह किताब देखे गए सपनों में से कुछ का सच में बदलना है. सपनों का वह हिस्सा जिसे आप अपने दम पर पूरा करने की कोशिश भर कर सकते हैं. <strong>&#8211;प्रमोद</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-375" title="Book cover" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg" alt="Book cover" width="650" height="495" /></a></strong></p>
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		<title>एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 09:23:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[चेतन भगत]]></category>
		<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[राजकुमार हिरानी]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-290" title="3-idiots" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots-207x300.jpg" alt="3-idiots" width="207" height="300" /></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-297" title="fivepoint1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11-182x300.jpg" alt="fivepoint1" width="182" height="300" /></a>यूँ देखें तो मेरा <strong>राजकुमार हीरानी</strong> के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा लड़की को उसका जीवन साथी चुनने में मदद करते हैं. ये ’आम आदमी’ के गांधी हैं. यहाँ ज़ोर उनके एतिहासिक व्यक्तित्व पर नहीं उनके जीवन जीने के तरीके पर है. ’गांधीगिरी’ यहीं से निकली. राजू की फ़िल्म उन्हें इतिहास के ’महावृतांतों’ की कैद से आज़ाद करवाती है. कई मायनों में मुन्नाभाई श्रृंखला की फ़िल्में जेनर डिफ़ाइनिंग फ़िल्में हैं क्योंकि वे हिन्दी सिनेमा से ते़ज़ी से गायब होते जा रहे तत्व ’स्वस्थ्य हास्य’ को सिनेमा में सफलता के साथ वापस लेकर आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन कहना होगा कि यहाँ वे गलती पर हैं. और अगर मैं अब तक के उनके सिनेमा को थोड़ा भी समझ पाया हूँ तो उसी तर्क पद्धति का सहारा लेकर कहूँगा कि यहाँ मेरे लिए सिर्फ़ दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं. एक यह कि उनकी फ़िल्म एक लेखक की किताब पर आधारित है और दूसरा यह कि उन्होंने उसी लेखक का नाम ले जाकर सबसे कोने में कहीं पटक दिया है. काग़ज़, पैसा, कितने प्रतिशत कहानी किसकी, किसने कब क्या बोला, ये सारे सवाल बाद में आते हैं. सबसे बड़ा सवाल है अच्छाई, बड़प्पन और ईमानदारी जो हमने उनकी ही रची ’गांधीगिरी’ से सीखी हैं. यह तो वे भी नहीं कह रहे कि उनकी फ़िल्म का <strong>चेतन भगत</strong> के उपन्यास से कोई लेना-देना नहीं. बाकायदा उपन्यास के अधिकार खरीदे गए हैं और कुल-मिलाकर ग्यारह लाख रु. का भुगतान भी हुआ है. तकनीकी रूप से उनपर इतनी बाध्यता थी कि वे फ़िल्म के क्रेडिट रोल में चेतन भगत का नाम दें और फ़िल्म के आखिर में उनकी किताब का नाम देकर उन्होंने उसे पूरा भी कर दिया है. लेकिन सहायकों, तकनीशियनों और स्पॉट बॉयज़ की भीड़ में कहीं (मैं तो तलाश भी नहीं पाया) चेतन का नाम छिपाकर उन्होंने अपनी ईमानदारी खो दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“हमारी फ़िल्म एक उपन्यास पर आधारित है.” यह कहने से आपकी फ़िल्म छोटी नहीं होती है. मेरी नज़र में तो उसकी इज़्ज़त कुछ और बढ़ जाती है. विधु विनोद चोपड़ा ने चेतन भगत के सामने अभिजात जोशी को खड़ा करने की कोशिश की है और कहा है कि वे फ़िल्म के असल लेखकों का हक़ मारना चाहते हैं. यह छद्म प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना है. चेतन भगत ने कभी भी फ़िल्म की पटकथा पर अपना हक़ नहीं जताया जिसे अभिजात जोशी और राजू हीरानी ने मिलकर काफ़ी मेहनत से तैयार किया है. ’थ्री इडियट्स’ की पटकथा इस साल आए सिनेमा की सबसे बेहतरीन और कसी हुई पटकथाओं में से एक है जिसमें हर कथा सूत्र अपने मुकम्मल अंजाम तक पहुँचता है चाहे वो एक छोटा सा फ़ाउंटन पेन ही क्यों न हो. इस कसी हुई पटकथा के लिए उन्हें भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के पटकथा लेखक साइमन बुफॉय को ऑस्कर से नवाज़ कर दिया गया था. सवाल तो विधु विनोद चोपड़ा से पूछा जाना चाहिए जो कहानी लेखन में दो लेखकों का नाम पहले से होते ’को-राइटर’ के तौर पर अलग से फ़िल्म के टाइटल्स में नज़र आते हैं. और सवाल उन सभी निर्देशकों से पूछा जाना चाहिए जो अपनी फ़िल्म में लेखक का नाम पहले से मौजूद होते शान से अपने नाम के आगे ’लेखक और निर्देशक’ की पदवी लगाते हैं. सलीम-जावेद के हाथ में पेंट का डब्बा लेकर अपनी फ़िल्मों के पोस्टरों पर अपना ही नाम लिखते घूमने के किस्से इसी सिनेमा जगत के हैं. चेतन सिर्फ़ फ़िल्म की शुरुआत में अपनी किताब का नाम चाहते हैं. इसके अलावा वो अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी करते हों, मुझे उससे मतलब नहीं. इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूँ. यहाँ सवाल व्यक्ति का नहीं, सही और गलत का है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और बात है. एक व्यापक संदर्भ में हमारे लिए यह खतरे की घंटी है. इस प्रसंग में ’सबका फ़ायदा हुआ’ कहने वाले यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस सारे ’मीडिया हाइप्ड’ प्रसंग के गर्भ में एक अदृश्य लेखक छिपा है. डरा, सहमा सा. वो लेखक न तो चेतन की तरह मीडिया का चहेता लेखक है और न ही उसकी भाषा इतनी ताक़तवर है कि सत्ता के बड़े प्रतिष्ठान उसकी किसी भी असहमति पर ध्यान दें. उसके पास बस उसके शब्द हैं, उसकी कहानियाँ. उसकी क़लम, उसकी रचनात्मकता जिससे वह इस बहरूपिए वर्तमान के मुखौटे की सही पहचान करता है. अपने जीवन की तमाम ऊर्जा को बाती में तेल की तरह जलाकर इस समय और समाज की उलझी जटिलताओं को अपने पाठकों के लिए थोड़ा और गम्य बनाता है. हिन्दुस्तान की क्षेत्रीय भाषाओं का यही ईमानदार लेकिन गुमनाम लेखक है जिसका इस सारे तमाशे में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यहाँ सबसे मुख्य बिन्दु यह है कि आज भी हिन्दी सिनेमा किसी किताब से, रचना से अपना नाम जोड़कर कोई खुशी, कोई गर्व नहीं महसूस करता. यहाँ तो जिस किताब का ज़िक्र है वो अंग्रेज़ी भाषा की एक बेस्टसेलर पुस्तक है. यहाँ यह हाल है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों का क्या हाल होगा जिनके नाम के साथ चेतन भगत के नाम जैसा कोई ग्लैमर भी नहीं जुड़ा है. अगर हमारे सिनेमा का अपने देश के साहित्य और कला से ऐसा और इतना ही जुड़ाव रहा तो हिन्दी सिनेमा विदेशी सिनेमा (पढ़ें हॉलीवुड) की घटिया नकल बनकर रह जाएगा जिसके पास अपना मौलिक कुछ नहीं बचेगा. अपनी ज़मीन के कला-साहित्य से जुड़ाव से सिनेमा माध्यम हमेशा समृद्ध होता है. मल्टीपलैक्स का दौर आने के बाद से मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा वैसे भी अपने देश के गांव-देहात से, उसके आम जनमानस से कटता जा रहा है. ऐस में उसका अपने देश के लेखन और ललित कलाओं से भी असहज संबंध खुद सिनेमा के लिए भी अच्छा नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आपको ऐसी कितनी हिन्दी फ़िल्में याद हैं जिनकी शुरुआत में किसी किताब का नाम शान से लिखा आता हो? मैं ऐसी फ़िल्मों का इंतज़ार करता हूँ. राजकुमार हीरानी से मुझे इसकी उम्मीद थी. <strong>’थ्री इडियट्स’</strong> हमारे लिए वो फ़िल्म होनी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो क्या यह भविष्य के लिए सभी उम्मीदों का अंत है? क्या यह साहित्य सर्जक के लिए सिनेमा माध्यम में बंद होते दरवाजों में आखिरी दरवाजा था?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">नहीं, कुछ छोटे-छोटे टिमटिमाते तारे हैं. कुछ मुख्यधारा में और कुछ हाशिए पर कहीं. एक <strong>परेश कामदार</strong> हैं जो अपनी फ़िल्म <strong>(खरगोश)</strong> के पीछे मौजूद मूल कहानी के लेखक को फ़िल्म के पहले सार्वजनिक शो पर मुख्य अतिथि की तरह ट्रीट करते हैं और उनके साथ आए तमाम दोस्तों को अपनी जेब से कॉफ़ी पिलवाते हैं. एक <strong>विशाल भारद्वाज</strong> हैं जो अपनी नई फ़िल्म <strong>(कमीने)</strong> में टाइटल्स की शुरुआत होते ही पहले किन्हीं केजतान बोए साहब का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने युगांडा की एक फ़िल्म वर्कशॉप में उन्हें पहली बार यह स्टोरी आइडिया सुनाया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा राजू हीरानी ने ’लगे रहो मुन्नाभाई’ में बताया था, एक-एक गांधी हम सबके भीतर हैं. बस हमारे आँखें बंद करने की देर है.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: <strong>’डेली न्यूज़’</strong> के <strong>’हम लोग’ </strong>में प्रकाशित. <strong>10 जनवरी 201</strong><strong>0<span style="font-weight: normal;">.</span></strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 14:47:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“प्यारे बार्नस्टीन,
तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.

एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG"><img class="alignleft size-full wp-image-281" title="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG" alt="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" width="200" height="298" /></a><strong>“प्यारे बार्नस्टीन,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी बेल बजती रहती है और कोई उसे रिसीव नहीं करता. एक घर जिसमें अब एक कुत्ते की जगह खाली है. रिचर्ड निक्सन किसी व्यक्ति का नाम नहीं. रिचर्ड निक्सन सिर्फ़ एक विचार है, सत्ता का विचार जो तेज़ी से हमारे चारों ओर अपनी जड़ें जमा रहा है. समाज तय साचों में ढल चुका है और शक करने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. यह <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie" target="_blank">डेल कारनेगी</a></strong> को पढ़कर सफलता के सात सोपान सीखने वाले उत्साही वीरों का समय है. ऐसा समय जिसमें शंका करने वाले, चुप्पा से, ईमानदारी का अपना ही तर्जुमा जीने की चाहत रखने वाले इंसानों की कोई ज़रूरत नहीं. उन्हें अब ख़त्म हो जाना चाहिए. वे सफलता के उत्सव में बाधक हैं. ईमानदारी की नई परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं जिनकी गंगोत्री अब सफलता नामक वृहत ग्लेशियर से निकलती है. दुनिया में कहीं युद्ध नहीं है. दुनिया में कहीं भूख नहीं है. जो ऐसा बोलते है उन्हें भी अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. अब दुनिया एक ऐसा खुशियों से भरा बगीचा है जिसमें हर बिकता सामान एक नया खिलता फूल है. असल फूलों को अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. उनके ज़्यादा अच्छे और आग्याकारी प्रतिरूप गढ़ लिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक इस वक़्त जब आप जब इस चालाक बक्से के पर्दे पर सुबह-शाम ऊधम मचाते <strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=l7LLlymgJJE&amp;feature=channel" target="_blank">’रॉकेट सिंह – सेल्समैन ऑफ़ दि इयर’</a></strong> को निरख रहे हैं मैं देख रहा हूँ दूर कहीं उन्नीस सौ तिहत्तर में बिखरते अमेरिकी सपने की राख़ में बेचैन भटकते सैमुअल बाइक को. और क्या खूब है कि इस उत्सवधर्मी समय में मुझे बार बार सैमुअल बाइक याद आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Assassination_of_Richard_Nixon" target="_blank">’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’</a></strong> हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sean_Penn" target="_blank">सीन पेन</a></strong> की सघन अदाकारी से निर्मित बेहतरीन फ़िल्म होने के साथ-साथ हमारे समाज के लिए ज़रूरी फ़िल्म भी है. यह उस जन्नत की हक़ीक़त है जिसमें हमारा समय और समाज धीरे-धीरे पैठ रहा है. यह उन लोगों की कहानी है जो सत्ता द्वारा बेचे जा रहे सफलता और समृद्धि के सपने को मनचाहे दामों पर ख़रीदने से इनकार कर देते हैं. यह बहुत गहरे अर्थों में ’नौकर की कमीज़’ के स्वर को दोहराती फ़िल्म है. सच है कि हमारे दौर के सबसे बड़े सेल्समैन हमारे नीति-नियंता हैं. वे हमें बार-बार वही सुख-समृद्धि और न्याय के सपने बेचते हैं और तय करते हैं कि वे कभी पूरे न हों जिससे उन्हें आगे फिर से उन्हीं लोगों को बेचा जा सके. वे सबसे बड़े सेल्समैन हैं क्योंकि वे उन्हीं सपनों को बार-बार बेचने में सफल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म में कहानी का मूल कथ्य सैमुअल के अपने प्यारे संगीतकार बार्नस्टीन को लिखे लम्बे एकालापों से आगे बढ़ता है. यही इस कहानी का सार हैं. सैमुअल एक असफल सेल्समैन है क्योंकि वो सच बोलता है. उसके बॉस लोग उसे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Norman_Vincent_Peale" target="_blank">’दि पॉवर ऑफ़ पॉज़िटिव थिंकिंग’</a> जैसी किताबें पढ़ने के लिए देते हैं. नौकरी से निकाले जाने के बाद एक दिन वो रिवाल्वर लेकर अपने बॉस को मारने भी जाता है लेकिन उससे गोली नहीं चलाई जाती. हाँ वो असफल है. हर काम में असफल. उसकी पत्नी एक कैफ़े में नौकरी करती है जहाँ उसके मालिक उसे छोटी स्कर्ट पहनकर ड्रिंक सर्व करने के लिए कहते हैं. सैमुअल इस जैसे तमाम कैफ़े’स को जला देना चाहता है. उसे लगता है कि उसके साथ समाज नस्लवादी व्यवहार करता है. लेकिन वो किसी को यह समझा नहीं पाता कि नौकरी नाम की यह बला आवरण में लिपटी नस्लीय गुलामी है.</p>
<p style="text-align: justify;">जो जितना बड़ा झूठा है वो उतना बड़ा सेल्समैन है. इस दौर का सबसे बड़ा सेल्समैन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Nixon" target="_blank">रिचर्ड निक्सन</a></strong> है. जिसने दो बार अमरीकी जनता को वियतनाम युद्ध ख़त्म होने का सपना बेचा और दोनों बार उसे पूरा किए बिना वो सत्ता में बना रहा. आखिर उससे बड़ा सेल्समैन इस दुनिया में और कौन हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">उसे समझ आता है कि यह समाज सिर्फ़ उन्हें ही याद रखता है जो अपने काम से अपना नाम रौशन करते हैं. बाकी सब इस दुनिया में रेत के दाने के बराबर हैं जिनका कोई मोल नहीं, जिनकी कोई अहमियत नहीं. हाँ वो रिचर्ड निक्सन को मार देगा. दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन को मार देगा. लेकिन वो एक असफल इंसान है. शक करने वाला और संशयवादी. ऐसे इंसानों की तक़दीर में लक्ष्य की प्राप्ति के उत्सवगान नहीं होते. वे तो सुरक्षित रख छोड़े गए हैं मज़बूत, निश्चयवादी, वसुंधरा को भोगने वाले वीरों के लिए. अंत में यह नाचीज़ रेत का दाना एक चिंगारी सा चमककर वापस समन्दर के पानी में मिल जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">सैमुअल की बेचैनियाँ हमारे दौर की बेचैनियाँ हैं. पिछले साल आई जयदीप वर्मा की आधुनिक क्लासिक <strong><a href="http://hulla.bigflix.com/" target="_blank">’हल्ला’</a></strong> की बेचैनियाँ हैं. एम.बी.ए. का गुब्बारा हमारे यहाँ क्या खूब फूल रहा है. लेकिन उसमें हवा भरते फैंफड़ों का अनवरत चलती धौंकनी बनते जाना क्यों हमारी नज़रों से ओझल है? यह फ़िल्म पुणे-बैंगलोर से गुड़गाँव-नोयडा तक विकास के जयगान में पिसती कोमल संवेदनाओं की कसक है. वैसे आत्महत्या से इतर वे रास्ते हैं जिनपर चलने वालों को हमारा समाज या तो असफलता के ठप्पे से नवाजता है या फिर उन्हें ’पागल’ श्रेणी में डाल देता है. गुड़गाँव और पुणे के संवेदनाहीन कंक्रीट के जंगलों से भागे गौरव या वरुण इसलिए बच जाते हैं क्योंकि उनके पास ’मैं’ वाला आत्मविश्वास है. लेकिन उनका क्या जिन्हें अपने होने की वजह पर ही शक हो? बताओ तो दोस्तों, क्या हमने उन अनिश्चय में घिरे, अकेले पड़े नाकुछों के लिए कोई रास्ता छोड़ा है?</p>
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