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	<title>आवारा हूँ... &#187; पहचान</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Nov 2011 11:27:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><em>पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक एक बार देखे जाने लायक है, देख आएं. फिर साथ मिल चर्चा-ए-आम होगी.</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-953" title="Rockstar2011" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011-225x300.jpg" alt="Rockstar2011" width="225" height="300" /></a>बीस के सालों में जब अंग्रेज़ी रियासत द्वारा स्थापित ’नई दिल्ली योजना समिति’ के सदस्य जॉन निकोल्स ने पहली बार एक सर्पिलाकार कुंडली मारे बैठे शॉपिंग प्लाज़ा ’कनॉट प्लेस’ का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, उस वक़्त वह पूरा इलाका कीकर के पेड़ों से भरा बियाबान जंगल था. ’कनॉट सर्कस’ के वास्तुकार रॉबर्ट रसैल ने इन्हीं विलायती बबूल के पेड़ों की समाधि पर अपना भड़कीला शाहकार गढ़ा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ अली की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rockstar_(2011_film)" target="_blank"><strong>’रॉकस्टार’</strong></a> में इसी कनॉट प्लेस के हृदयस्थल पर खड़े होकर जनार्दन जाखड़ उर्फ़ ’जॉर्डन’ जब कहता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“जहाँ तुम आज खड़े हो, कभी वहाँ एक जंगल था. फिर एक दिन वहाँ शहर घुस आया. सब कुछ करीने से, सलीके से. कुछ पंछी थे जो उस जंगल के उजड़ने के साथ ही उड़ गए. वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए. मैं उन्हीं पंछियों को पुकारता हूँ. बोलो, तुमने देखा है उन्हें कहीं?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो मेरे लिए वो फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पल है. एक संवाद जिसके सिरहाने न जाने कितनी कहानियाँ अधलेटी सी दिखाई देती हैं. तारीख़ को लेकर वो सलाहियत जिसकी जिसके बिना न कोई युद्ध पूरा हुआ है, न प्यार. लेकिन ऐसे पल फिर फ़िल्म में कम हैं. क्यों, क्योंकि फ़िल्म दिक-काल से परे जाकर कविता हो जाना चाहती है. जब आप सिनेमा में कहानी कहना छोड़कर कोलाज बनाने लगते हैं तो कई बार सिनेमा का दामन आपके हाथ से छूट जाता है. यही वो अंधेरा मोड़ है, मेरा पसन्दीदा निर्देशक शायद यहीं मात खाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे की कथा आने से पहले ही उसके अंश दिखाई देते हैं, किरदार दिखाई देते हैं. और जहाँ से फ़िल्म शुरु होती है वापस लौटकर उस पल को समझाने की कभी कोशिश नहीं करती. रॉकस्टार में ऐसे कई घेरे हैं जो अपना वृत्त पूरा नहीं करते. मैं इन्हें संपादन की गलतियाँ नहीं मानता. ख़ासकर तब जब शम्मी कपूर जैसी हस्ती अपने किरदार के विधिवत आगमन से मीलों पहले ही एक गाने में भीड़ के साथ खड़े ऑडियो सीडी का विमोचन करती दिखाई दे, यह अनायास नहीं हो सकता. ’रॉकस्टार’ यह तय ही नहीं कर पाई है कि उसे क्या होना है. वह एक कलाकार का आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन बाहर इतना शोर है कि आवाज़ कभी रूह तक पहुँच ही नहीं पाती. वह एक साथ एक कलाकृति और एक सफ़ल बॉलीवुड फ़िल्म होने की चाह करती है और दोनों जहाँ से जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ईमानदारी नहीं दिखाई देती. कैंटीन वाले खटाना भाई के रोल में कुमुद मिश्रा ने जैसे एक पूरे समय को जीवित कर दिया है. जब वो इंटरव्यू के लिए कैमरे के सामने खड़े होते हैं तो उस मासूमियत की याद दिलाते हैं जिसे हम अपने बीए पास के दिनों में जिया करते थे और वहीं अपने कॉलेज की कैंटीन में छोड़ आए हैं. अदिति राव हैदरी कहानी में आती हैं और ठीक वहीं लगता है कि इस बिखरी हुई, असंबद्ध कोलाजनुमा कहानी को एक सही पटरी मिल गई है. लेकिन अफ़सोस कि वो सिर्फ़ हाशिए पर खड़ी एक अदाकारा हैं, और जिसे इस कहानी की मुख्य नायिका के तौर चुना गया है उन्हें जितनी बार देखिए यह अफ़सोस बढ़ता ही जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ढाई-ढाई इंच लम्बे तीन संवादों के सहारे लव आजकल की ’हरलीन कौर’ फ़िल्म किसी तरह निकाल ले गई थीं, लेकिन फ़िल्म की मुख्य नायिका के तौर गैर हिन्दीभाषी नर्गिस फ़ाखरी का चयन ऐसा फ़ैसला है जो इम्तियाज़ पर बूमरैंग हो गया है. शायद उन्होंने अपनी खोज ’हरलीन कौर’ को मुख्य भूमिका में लेकर बनी ’आलवेज़ कभी कभी’ का हश्र नहीं देखा. फिर ऊपर से उनकी डबिंग इतनी लाउड है कि फ़िल्म जिस एकांत और शांति की तलाश में है वो उसे कभी नहीं मिल पाती. बेशक उनके मुकाबले रणबीर मीलों आगे हैं लेकिन फिर अचानक आता, अचानक जाता उनका हरियाणवी अंदाज़ खटकता है. फिर भी, ऐसे कितने ही दृश्य हैं फ़िल्म में जहाँ उनका भोलापन और ईमानदारी उनके चेहरे से छलकते हैं. ठीक उस पल जहाँ जनार्दन हीर को बताता है कि उसने कभी दारू नहीं पी और दोस्तों के सामने बस वो दिखाने के लिए अपने मुंह और कपड़ों पर लगाकर चला जाता है, ठीक वहीं रणबीर के भीतर बैठा बच्चा फ़िल्म को कुछ और ऊपर उठा देता है. ’वेक अप सिड’ और ’रॉकेट सिंह’ के बाद यह एक और मोती है जिसे समुद्र मंथन से बहुत सारे विषवमन के बीच रनबीर अपने लिए सलामत निकाल लाए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-955" title="rockstar_hindi_movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg" alt="rockstar_hindi_movie" width="300" height="225" /></a>फ़िल्म के कुछ सबसे खूबसूरत हिस्से इम्तियाज़ ने नहीं बल्कि ए आर रहमान, मोहित चौहान और इरशाद कामिल ने रचे हैं. तुलसी के मानस की तरह जहाँ चार चौपाइयों की आभा को समेटता पीछे-पीछे आप में सम्पूर्ण एक दोहा चला आता है, यहाँ रहमान के रूहानी संगीत में इरशाद की लिखी मानस के हंस सी चौपाइयाँ आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p>’कुन फ़ाया कुन’ में&#8230;</p>
<p>“सजरा सवेरा मेरे तन बरसे, कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ,<br />
क़तरा मिला जो तेरे दर बरसे &#8230; ओ मौला.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’नादान परिंदे’ में&#8230;<br />
कागा रे कागा रे, मोरी इतनी अरज़ तोसे, चुन चुन खाइयो मांस,<br />
खाइयो न तू नैना मोरे, खाइयो न तू नैना मोरे, पिया के मिलन की आस.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यही वो क्षण हैं जहाँ रणबीर सीधे मुझसे संवाद स्थापित करते हैं, यही वो क्षण हैं जहाँ फ़िल्म जादुई होती है. लेकिन कोई फ़िल्म सिर्फ़ गानों के दम पर खड़ी नहीं रह सकती. अचानक लगता है कि मेरे पसन्दीदा निर्देशक ने अपनी सबसे बड़ी नेमत खो दी है और जैसे उनके संवादों का जावेद अख़्तरीकरण हो गया है. और इस ’प्रेम कहानी’ में से प्रेम जाने कब उड़ जाता है पता ही नहीं चलता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सच कहूँ, इम्तियाज़ की सारी गलतियाँ माफ़ होतीं अगर वे अपने सिनेमा की सबसे बड़ी ख़ासियत को बचा पाए होते. मेरी नज़र में इम्तियाज़ की फ़िल्में उसके महिला किरदारों की वजह से बड़ी फ़िल्में बनती हैं. नायिकाएं जिनकी अपनी सोच है, अपनी मर्ज़ी और अपनी गलतियाँ. और गलतियाँ हैं तो उन पर अफ़सोस नहीं है. उन्हें लेकर ’जिन्दगी भर जलने’ वाला भाव नहीं है, और एक पल को ’जब वी मेट’ में वो दिखता भी है तो उस विचार का वाहियातपना फ़िल्म खुद बखूबी स्थापित करती है. उनकी प्रेम कहानियाँ देखकर मैं कहता था कि देखो, यह है समकालीन प्यार. जैसी लड़कियाँ मैं अपने दोस्तों में पाता हूँ. हाँ, वे दोस्त पहले हैं लड़कियाँ बाद में, और प्रेमिकाएं तो उसके भी कहीं बाद. और यही वो बिन्दु था जहाँ इम्तियाज़ अपने समकालीनों से मीलों आगे निकल जाते थे. लेकिन रॉकस्टार के पास न कोई अदिति है न मीरा. कोई ऐसी लड़की नहीं जिसके पास उसकी अपनी आवाज़ हो. अपने बोल हों. और यहाँ बात केवल तकनीकी नहीं, किरदार की है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ की फ़िल्मों ने हमें ऐसी नायिकाएं दी हैं जो सच्चे प्रेम के लिए सिर्फ़ नायक पर निर्भर नहीं हैं. किसी भी और स्वतंत्र किरदार की तरह उनकी अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगियाँ हैं जिन्हें नायक के न मिलने पर बरबाद नहीं हो जाना है. बेशक इन दुनियाओं में हमारे हमेशा कुछ कमअक़्ल नायक आते हैं और प्रेम कहानियाँ पूरी होती हैं, लेकिन फ़िल्म कभी दावे से यह नहीं कहती कि अगर यह नायक न आया होता तो इस नायिका की ज़िन्दगी अधूरी थी. इम्तियाज़ ने नायिकायों को सिर्फ़ नायक के लिए आलम्बन और उद्दीपन होने से बचाया और उन्हें खुद आगे बढ़कर अपनी दुनिया बनाने की, गलतियाँ करने की इजाज़त दी. इस संदर्भ को ध्यान रखते हुए ’रॉकस्टार’ में एक ऐसी नायिका को देखना जिसका जीवन सिर्फ़ हमारे नायक के इर्द गिर्द संचालित होने लगे, निराश करता है. और जैसे जैसे फ़िल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है नायिका अपना समूचा व्यक्तित्व खोती चली जाती है, मेरी निराशा बढ़ती चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इम्तियाज़ की फ़िल्मों में हमेशा ऐसी लड़कियों को पाया है जिनकी ज़िन्दगी ’सच्चे प्यार’ के इंतज़ार में तमाम नहीं होती. वे सदा सक्रिय अपनी पेशेवर ज़िन्दगियाँ जीती हैं. कभी दुखी हैं, लेकिन हारी नहीं हैं और ज़्यादा महत्वपूर्ण ये कि अपनी लड़ाई फिर से लड़ने के लिए किसी नायक का इंतज़ार नहीं करतीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और हाँ, पहला मौका मिलते ही भाग जाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैं खुश होता अगर इस फ़िल्म में भी नायिका ऐसा ही करती. तब यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में उस रास्ते जाती जिस रास्ते को इम्तियाज़ की पूर्ववर्ती फ़िल्मों ने बड़े करीने से बनाया है.</p>
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		<title>’राष्ट्रवाद’ का सिनेमाई उत्सवगान</title>
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		<pubDate>Mon, 09 May 2011 16:26:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“ यह दीप अकेला स्नेह भरा,
है गर्व भरा मदमाता पर,
इसको भी पंक्ति दे दो ”
- अज्ञेय
बीते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। और जैसा किसी भी ‘कल्पित [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><em>“ यह दीप अकेला स्नेह भरा,<br />
है गर्व भरा मदमाता पर,<br />
इसको भी पंक्ति दे दो ”<br />
<strong>- अज्ञेय</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times,serif,Georgia;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/mother-india.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-817" title="mother-india" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/mother-india.jpg" alt="mother-india" width="213" height="300" /></a><span style="color: #000000;">बी</span></span>ते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है। और जैसा किसी भी ‘कल्पित समुदाय’ के निर्माण में होता है, उस दौर के लोकप्रिय जनमाध्यम का अध्ययन इस ‘राष्ट्रीय भावना’ के निर्माण को बड़े दिलचस्प अंदाज में आपके सामने रखता है। मजेदार बात यह है कि नवस्वतंत्र मुल्क में जब हमारा समाज इस विचार को अपने भीतर गहरे आत्मसात कर रहा था, सिनेमा एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह वहां मौजूद रहा। यही वो दौर है जिसे हिंदी सिनेमा के ‘सुनहरे दौर’ के तौर पर भी याद किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पारिवारिक और</strong> सामुदायिक पहचानों में अपने को तलाशते और चिह्नित करते नवस्वतंत्र मुल्क की जनता को ‘राष्ट्र-राज्य’ की वैधता और आधिपत्य का पाठ पढ़ाने का काम हमारा लोकप्रिय सिनेमा करता है। और प्रक्रिया में वह दो ऐसे काम करता है, जिन्हें समझना ‘आधुनिकता’ के भारतीय मॉडल (जिसे आप सुविधा के लिए ‘नेहरुवियन आधुनिकता’ भी कह सकते हैं) को समझने के लिए कुंजी सरीखा है। पहला तो यह कि वह व्यक्ति की पुरानी वफादारियों (पढ़ें समुदाय, परिवार) के ऊपर राज्य की सत्ता को स्थापित करने के लिए पूर्व सत्ता को विस्थापित नहीं करता, बल्कि उन पुरानी वफादारियों को ही वह ‘राष्ट्र’ के रूपक में बदल देता है। इससे सहज ही और बिना किसी मौलिक परिवर्तन के इस नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता को वैधता मिल जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसे उदाहरण के</strong> माध्यम से समझें। सुमिता चक्रवर्ती लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर अपने सर्वप्रथम अकादमिक कार्य में दो आइकॉनिक हिंदी फिल्मों को इस संदर्भ में व्याख्यायित करती हैं। सबसे पहले याद आती है, महबूब खान की अविस्मरणीय ‘मदर इंडिया’ जहां मां – देवी मां और भारत मां के बीच की सारी रेखाएं मिट जाती हैं। सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “एक विचार के तौर पर मदर इंडिया हिंदुस्तान के कई हिस्सों में पूजी जाने वाली ‘देवी मां’ के कल्ट से उधार लिया गया है।” वे आगे लिखती हैं, “यह रस्मी गौरवगान समाज में होने वाले स्त्री के सामाजिक शोषण और उसकी गैर-बराबर सामाजिक हैसियत के साथ-साथ चलता है। लेकिन हिंदुस्तानी समाज में एक ‘मां’ के रूप में स्त्री की छवि सिर्फ एक ‘स्त्री’ भर होने से कहीं ऊंची है।” यहां हिंदुस्तानी समाज में पहले से मौजूद एक धार्मिक प्रतीक को फिल्म बखूबी राष्ट्रीय प्रतीक से बदल देती है। यह संयोग नहीं है कि फिल्म की शुरुआत इन ‘भारत माता’ द्वारा एक बांध के उदघाटन से दृश्य से होती है। वैसा ही एक बांध, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था। वैसा ही एक बांध जैसे बीते साठ सालों में लाखों लोगों की समूची दुनियाओं को ‘विकास’ के नाम पर अपने पेटे में निगलते गये हैं। ‘विकास’ के नेहरुवियन मॉडल की पैरवी करती यह फिल्म अंत तक पहुंचते हुए एक ऐसी व्यवस्था की पैरवी में खड़ी हो जाती है, जहां ‘बिरजू’ जैसी अनियंत्रित (लेकिन मूल रूप से असहमत) आवाजों के लिए कोई जगह नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/raj-kapoor.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-819" title="raj kapoor" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/raj-kapoor-300x219.jpg" alt="raj kapoor" width="300" height="219" /></a>ऐसा ही एक और</strong> मजेदार उदाहरण है राज कपूर की ‘आवारा’। यह राज्य की सत्ता के सबसे चाक्षुक हिस्से – कानून व्यवस्था, को परिवार के मुखिया पुरुष पर आरोपित कर देती है और इस तरह पारिवारिक वफादारी की चौहद्दी में रहते हुए भी व्यक्ति को राज्य-सत्ता की वैधता के स्वीकार का एक आसान या कहें जाना-पहचाना तरीका सुझाती है। ‘आवारा’ के संदर्भ में बात करते हुए सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “हिंदी सिनेमा देखने वाली जनता एक नये आजाद हुए मुल्‍क की नागरिक भी थी और यह जनता एक नागरिक के रूप में अपने परिवार और समुदाय की पारंपरिक चौहद्दियों से आगे अपने उत्तरदायित्व समझने में कहीं परेशानी महसूस कर रही थी। नये संदभों में उन्हें मौजूद मुश्किल परिस्थितियों को भी समझना था और बदलाव और सुधार का वादा भी ध्यान रखना था। यह वादा अब नयी एजेंसियों द्वारा किया जा रहा था और यह एजेंसियां थीं राज्य-सत्ता और उसकी अधिकार प्रणाली। क्योंकि ‘कानून-व्यवस्था’ आम जनमानस में राज्य की सत्ता का सबसे लोकप्रिय प्रतीक है, इसलिए हिंदी सिनेमा में एक आम नागरिक के जीवन में राज्य की भूमिका दिखाने का यह सबसे माकूल प्रतीक बन गया।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>फिल्म ‘आवारा’ में</strong> जज रघुनाथ की भूमिका में कानून-व्यवस्था के प्रतीक बने पृथ्वीराज कपूर न सिर्फ फिल्म में कानून के दूसरी तरफ खड़े नायक राज (राज कपूर) के जैविक पिता हैं, बल्कि असल जीवन में भी वह राज कपूर के पिता हैं। ऐसे में इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पहले से तय सोपान और अधिकार शृंखला में बिना किसी छेड़छाड़ के यह फिल्म नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की कानून-व्यवस्था की वैधता की स्थापना आम जनमानस में करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरा यह कि</strong> इस ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ की तलाश में वह तमाम इतर पहचानों को अनुकूलित भी करता चलता है। हिंदी सिनेमा के शुरुआती सालों में ‘जाति’ के सवाल सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बनते हैं लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, हमारा सिनेमा ऐसे सवाल पूछना कम करता जाता है। हमारे नायक-नायिकाओं के पीछे से इसी ‘सार्वभौम पहचान’ के नाम पर उनकी जातिगत पहचानें गायब होती जाती हैं। इस ‘राष्ट्रवाद’ का एक दमनकारी चेहरा भी है। साल 1954 में बनी ‘जागृति’ जैसी फिल्म, जिसे ‘बच्चों की फिल्म’ कहकर आज भी देखा-दिखाया जाता है, में ‘शक्ति’ की मौत जैसे अजय के ‘शुद्धीकरण’ की प्रक्रिया में आखिरी आहूति सरीखी है। शक्ति की मौत अजय को एकदम ‘बदल’ देती है। अब वह एक ‘आदर्श विद्यार्थी’ है। किताबों में डूबा हुआ। आखिर ‘शक्ति’ की मौत ने अजय को अपने देश और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करवा ही दिया! और फिर ऊपर से ‘शेखर’ जैसे अध्यापक दृश्य में मौजूद हैं, जो फिल्म के अंत तक आते-आते एकदम नियंत्रणकारी भूमिका में आ जाते हैं। यहां भी फिल्म तमाम ‘अन्य पहचानों’ का मुख्यधारा के पक्ष में बड़ी सफाई से अनुकूलन कर देती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/jagriti.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-820" title="jagriti" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/05/jagriti.jpg" alt="jagriti" width="271" height="225" /></a>इस समूचे प्रसंग को</strong> एक प्रतीक रूप में देखें तो बड़ी क्रूर छवि उभरकर हमारे सामने आती है। सुमिता चक्रवर्ती फिल्म ‘जागृति’ पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, “यहां कमजोर की कुर्बानी दी जाती है, जिससे बलशाली आगे जिये और अपनी शक्ति को पहचाने। ‘शक्ति’ न सिर्फ शारिरिक रूप से कमजोर है, गरीब और दया के पात्र की तरह दिखाया गया है। उसे साथी बच्चों द्वारा उसकी शारीरिक अक्षमता के लिए चिढ़ाया जाता है। लेकिन वह सुशील और उच्च नैतिकता वाला बच्चा है, जिसे फिल्म अपने पवित्र विचारों के प्रगटीकरण के लिए एक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करती है। लेकिन उसे मरना होगा (दोस्ती की खातिर) उस मिथ को जिलाये रखने के लिए। एकीकृत जनता का मिथ।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अगर लोकप्रिय सिनेमा</strong> के ढांचे पर इस राष्ट्रवादी बिंब को आरोपित कर देखें, तो यह अनुकूलन बहुत दूर तक जाता है। मुख्य नायक हमेशा एक ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ लिये होता है (जो आमतौर पर शहरी-उच्चवर्ण-हिंदू-पुरुष की होती है) और उसके दोस्त या मददगार के रूप में आप किसी अन्य धार्मिक या सामाजिक पहचान वाले व्यक्ति को पाते हैं। तो ‘जंजीर’ में ईमानदार नायक ‘विजय’ की सहायता के लिए ‘शेर खान’ मौजूद रहता है और ‘लक्ष्य’ में नायक ‘करण शेरगिल’ की सहायता के लिए ‘जलाल अहमद’। फिल्म ‘तेजाब’ में तड़ीपार नायक ‘मुन्ना’ को वापस ‘महेश देशमुख’ की पहचान दिलाने की लड़ाई में ‘बब्बन’ जैसे इतर पहचान वाले दोस्त ‘कुर्बान’ हो जाते हैं, और ‘लगान’ के राष्ट्रवादी उफान में ‘इस्माइल’ से लेकर ‘कचरा’ की भूमिका हमेशा मुख्य नायक ‘भुवन’ (उच्चवर्ण हिंदू) के सहायक की ही रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>एक तय प्रक्रिया के तहत</strong> सिनेमा का यह राष्ट्रवादी विमर्श तमाम ‘इतर’ पहचानों को सहायक भूमिकाओं में चिह्नित करता जाता है और हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती। और फिर एक दिन अचानक हम ‘गदर’ या ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म को देख चौंक जाते हैं। क्यों? क्या जिस अनुकूलन की प्रक्रिया का हिंदी सिनेमा इतने सालों से पालन करता आया है, उसकी स्वाभाविक परिणिति यही नहीं थी? हम ऐसा सिनेमाई राष्ट्रवाद गढ़ते हैं, जिसमें तमाम अल्पसंख्यक पहचानें या तो सहायक भूमिकाओं में ढकेल दी जाती हैं या वह मुख्य नायक के कर्मपथ पर कहीं ‘कुर्बान’ हो जाती हैं। क्या यह पूर्व तैयारी नहीं है ‘गदर’ जैसी फिल्म की, जो अन्य धार्मिक पहचान को सीधे तौर पर खलनायक के रूप में चिह्नित करती है? ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म, जिसे इस बहुचर्चित छद्मवाक्य, “सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते, लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं” के प्रमाण-पत्र के रूप में पढ़ा जा सकता है, क्या उन फिल्मों का स्वाभाविक अगला चरण नहीं है जिनमें मुसलमान चरित्र हमेशा दोयम दर्जे की सहायक भूमिका पाने को अभिशप्त हैं?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और सवाल</strong> केवल धार्मिक पहचान का ही नहीं। मैंने एक और लेख में ‘हिंदी सिनेमा में प्रेम’ पर लिखते हुए यह सवाल उठाया था कि क्या ‘शोले’ में जय और राधा की प्रेम-कहानी का अधूरा रह जाना एक संयोग भर था? क्या यह पहले से ही तय नहीं था कि जय को आखिर मरना ही है। और फर्ज करें कि अगर ‘शोले’ में यह प्रेम-कहानी, जो सामाजिक मान्यताओं के ढांचे को हिलाती है, पूर्णता को प्राप्त होती तो क्या तब भी ‘शोले’ हमारे सिनेमाई इतिहास की सबसे लोकप्रिय फिल्म बन पाती? यह सवाल मैं यहां इसीलिए जोड़ रहा हूं क्योंकि एक विधवा से शादी करने के फैसले के साथ खुद ‘जय’ भी एक अल्पसंख्यक पहचान से खुद को जोड़ता है। और उसका भी वही क्रूर अंजाम होता है, जिसकी परिणति आगे जाकर ‘राष्ट्रवादी अतिवाद’ में होती है। चाहें तो ‘राष्ट्रवाद’ का यह अतिवादी चेहरा देखने के लिए हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद की लिखी ‘क्रांति’ तक आएं, जहां एक अधपगली दिखती स्त्री की ओर इशारा कर नायक मनोज ‘भारत’ कुमार कहता है कि यह अभागी अपने पति के साथ सती हो जाना चाहती थी, इन जालिम अंगेजों ने वो भी न होने दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इन्हें भारतीय आधुनिकता के</strong> मॉडल के ‘शॉर्टकट’ कहें या ‘षड्यंत्र’, सच यही है कि इन्हीं चोर रास्तों में कहीं उन तमाम अतिवादी विचारों के बीज छिपे हैं, जिन्हें भारत ने बीते सालों में अनेक बार रूप बदल-बदल कर आते देखा है। जब हम पारिवारिक सत्ता के और धार्मिक मिथकों में ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता के बिंब को मिलाकर परोस रहे थे, उस वक्त हमने यह क्यों नहीं सोचा कि आगे कोई इस प्रक्रिया को उल्टी तरफ से भी पढ़ सकता है? और ऐसे में ‘राष्ट्र-राज्य’ और उसकी सत्ता किसी खास बहुसंख्यक पहचान के साथ जोड़ कर देखी जाएगी और लोग इसे स्वाभाविक मानकर स्वीकार कर लेंगे? आज ऐसा होते देखकर हम भले ही कितना बैचैन हों और हाथ-पांव मारें। सच्चाई यही है कि यह हमारी ‘आधुनिकता’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मॉडल की स्वाभाविक परिणिति है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #808080;"><span style="font-size: large;">और अंत में : कुछ अपनी बात, गांधी की बात</span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times,serif,Georgia;">बी</span>ते दिनों में महात्मा गांधी का नाम लौट-लौटकर संदर्भों में आता रहा। लेकिन यह जिक्र तमाम संदर्भों से गायब है कि आज भारतीय राष्ट्रवाद के पितृपुरुष घोषित किये जा रहे इस व्यक्ति को जीवन के अंतिम दिनों में इसी नवस्वतंत्र देश ने नितांत अकेला छोड़ दिया था। गांधी द्वारा उठाये जा रहे असुविधाजनक सवाल इस नवस्वतंत्र मुल्क के राष्ट्रवादी विजयरथ की राह में बाधा की तरह थे। राष्ट्र उत्सवगान में व्यस्त है, संशयवादियों के लिए उसके पास समय नहीं। जिस गांधी के नैतिक इच्छाशक्ति पर आधारित फैसलों के पीछे पूरा मुल्क आंख मूंदकर खड़ा हो जाता था, आज उसे संशय में पाकर वही मुल्क उसे कठघरे में खड़ा करता था। ठीक उस वक्त जब यह नवस्वतंत्र देश ‘नियति से साक्षात्कार’ कर रहा था, महात्मा सुदूर पूर्व में कहीं अकेले थे। अपनी नैतिकताओं के साथ, अपनी असफलताओं के साथ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सुधीर चंद्र गांधी पर</strong> अपनी नयी किताब में उस वक्त कांग्रेस के सभापति आचार्य कृपलानी के वक्तव्य, “आज गांधी खुद अंधेरे में भटक रहे हैं” को उद्धृत करते हुए एक वाजिब सवाल उठाते हैं, “कृपलानी के कहे को लेकर बड़ी बहस की गुंजाइश है। पूछा जा सकता है कि 1920 में, असहयोग आंदोलन के समय और उसके बाद क्या लोगों को गांधी की अहिंसा के कारगर होने के बारे में शक नहीं होता रहता था? कितनी बार उन तीस सालों के दौरान संकटों का सामना होने पर गांधी लंबी अनिश्चितता और आत्म संशय से गुजरने के बाद ही उपयुक्त तरीके को तलाश कर पाये थे? वैसे ही जैसे कि इस वक्त, जब कृपलानी और कांग्रेस और देश गांधी को अकेला छोड़ने पर आमादा थे।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सवाल वाजिब है</strong>। लेकिन एक बड़ा अंतर है, जो गांधी के पूर्ववर्ती अहिंसक आंदोलनों और उपवास को इस अंतिम दौर से अलगाता है। राष्ट्रवाद की जिस उद्दाम धारा पर गांधी के पूर्ववर्ती आंदोलन सवार रहे और अपार जनसमर्थन जिनके पीछे शामिल था, वह इन अंतिम दिनों में छिटक कर कहीं दूर निकल गयी थी। कभी यही ‘राष्ट्रवाद‘ उनका हथियार बना था। यह राष्ट्रवाद और अखंडता का ’पवित्र मूल्य‘ ही था, जिसके सहारे गांधी अंबेडकर से एक नाजायज बहस में ’जीते‘ थे। गांधी के आभामय व्यक्तित्त्व के आगे यह तथ्य अदृश्य रहा, लेकिन जब देश के सामने चुनने की बारी आयी, तो उसने ’राष्ट्र‘ के सामने ’राष्ट्रपिता‘ को भी पार्श्व में ढकेल दिया। कड़वा है लेकिन सच है, अपने देश के अतिवादी राष्ट्रवाद की पहली बलि खुद ’राष्ट्रपिता’ थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>‘राष्ट्रवाद’ अपने आप में</strong> कोई इकहरा विचार नहीं। इसलिए सरलीकरण का खतरा उठाते हुए कह रहा हूं कि ‘राष्ट्रवाद’ आधुनिक दौर की सबसे वर्चस्ववादी और सर्वग्राह्य विचारधारा है। इसके आगे किसी और की नहीं चलती। यह सिद्धांतत: ‘ब्लैक होल’ की तरह है, किसी भी व्यक्ति / विचार / असहमति को समूचा निगलने में सक्षम। समझ आता है कि क्यों ओरहान पामुक पिछली हिंदुस्तान यात्रा में साहित्य के बारे में बात करते हुए कह गये थे, “साहित्य मानवता की अभिव्यक्ति है। लेकिन हमें समझना होगा कि मानवता और राष्ट्रवादी मानवता दो अलग-अलग चीजें हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&#8216;कथादेश’</strong> के मई अंक में प्रकाशित</p>
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		<title>Things we lost in the fire</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Mar 2010 08:23:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; थियोडोर अडोर्नो.

जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Theodor_W._Adorno" target="_blank">थियोडोर अडोर्नो</a></strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">लव, सेक्स और धोखा</a></strong> की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस मासूमियत की वापसी संभव है ? क्या उस एक ग्राफ़िकल दृश्य के साथ, ’जाति’ से जुड़े किसी भी संदर्भ को बहुत दशक पहले अपनी स्वेच्छा से त्याग चुके हिन्दी के ’भाववादी प्रेम सिनेमा’ का अंत हो गया है ? क्या अब हम अपनी फ़िल्मों में बिना सरनेम वाले ’हाई-कास्ट-हिन्दू-मेल’ नायक ’राहुल’ को एक ’अच्छे-अंत-वाली-प्रेम-कहानी’ की नायिका के साथ उसी नादानी और लापरवाही से स्वीकार कर पायेंगे ? क्या हमारी फ़िल्में उतनी भोली और भली बनी रह पायेंगी जितना वे आम तौर पर होती हैं ? <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> की पहली कहानी हिन्दी सिनेमा में एक घटना है. मेरे जीवनकाल में घटी सबसे महत्वपूर्ण घटना. इसके बाद मेरी दुनिया अब वैसी नहीं रह गई है जैसी वो पहले थी. कुछ है जो श्रुति और राहुल की कहानी  ने बदल दिया है, हमेशा के लिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> के साथ आपकी सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि उसे आप ’सिनेमा’ कैसे मानें ? देखने के बाद सिनेमा हाल से बाहर निकलते बहुत ज़रूरी है कि बाहर उजाला बाकी हो. सिनेमा हाल के गुप्प अंधेरे के बाद (जहां आपके साथ बैठे गिनती के लोग वैसे भी आपके सिनेमा देखने के अनुभव को और ज़्यादा अपरिचित और अजीब बना रहे हैं) बाहर निकल कर भी अगर अंधेरा ही मिले तो उस विचार से लड़ाई और मुश्किल हो जाती है. मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में देखते हुए कई बार ऐसा अनुभव किया है, शायद राकेश शर्मा की बनाई ’फ़ाइनल सल्यूशन’. लेकिन किसी हिन्दुस्तानी मुख्यधारा की फ़िल्म के साथ तो कभी नहीं. और सिर्फ़ इस एक विचार को सिद्ध करने के लिए दिबाकर हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा ’रिस्क’ लेते हैं. तक़रीबन चालीस साल पहले ऋषिकेश मुख़र्जी ने अमिताभ को यह समझाते हुए ’गुड्डी’ से अलग किया था कि अगर धर्मेन्द्र के सामने उस ’आम लड़के’ के रोल में तुम जैसा जाना-पहचाना चेहरा (’आनंद’ के बाद अमिताभ को हर तरफ़ ’बाबू मोशाय’ कहकर पुकारा जाने लगा था.) होगा तो फ़िल्म का मर्म हाथ से निकल जायेगा. दिबाकर इससे दो कदम आगे बढ़कर अपनी इस गिनती से तीसरी फ़िल्म में एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिसके नायक &#8211; नायिका लगता है फ़िल्म की कहानियों ने खुद मौहल्ले में निकलकर चुन लिये हैं. पहली बार मैं किसी आम सिनेमा प्रेमी द्वारा की गई फ़िल्म की समीक्षा में <strong><a href="http://www.imdb.com/title/tt1608777/usercomments" target="_self">ऐसा लिखा</a></strong> पढ़ता हूँ कि ’देखो वो बैठा फ़िल्म का हीरो, अगली सीट पर अपने दोस्तों के साथ’ और इसी वजह से उन कहानियों को नकारना और मुश्किल हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले दिन से ही यह स्पष्ट है कि <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अगली <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> नहीं होने वाली है. यह ’डार्लिंग ऑफ़ द क्राउड’ नहीं है. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> आपका कैथार्सिस करती है, लोकप्रिय होती है. लेकिन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> ब्रेख़्तियन थियेटर है जहाँ गोली मारने वाला नाटक में न होकर दर्शकों का हिस्सा है, आपके बीच मौजूद है. मैं पहले भी यह बात कर चुका हूँ कि हमारा लेखन (ख़ासकर भारतीय अंग्रेज़ी लेखन) जिस तरह ’फ़िक्शन’ &#8211; ’नॉन-फ़िक्शन’ के दायरे तोड़ रहा है वह उसका सबसे चमत्कारिक रूप है. ऐसी कहानी जो ’कहानी’ होने की सीमाएं बेधकर हक़ीकत के दायरे में घुस आए उसका असर मेरे ऊपर गहरा है. इसीलिए मुझे अरुंधति भाती हैं, इसिलिये पीयुष मिश्रा पसंद आते हैं. उदय प्रकाश की कहानियाँ मैं ढूंढ-ढूंढकर पढ़ता हूँ. खुद मेरे ’नॉन-फ़िक्शन’ लेखन में कथातत्व की सतत मौजूदगी इस रुझान का संकेत है. दिबाकर वही चमत्कार सिनेमा में ले आए हैं. इसलिए उनका असर गहरा हुआ है. उनकी कहानी <a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-462" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="200" height="311" /></a>सोने नहीं देती, परेशान करती है. जानते हुए भी कि हक़ीकत का चेहरा ऐसा ही वीभत्स है, मैं चाहता हूँ कि सिनेमा &#8211; ’सिनेमा’ बना रहे. मेरी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. &#8216;हम&#8217; चाहते हैं कि हमारी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. हम <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> को नकारना चाहते हैं, ख़ारिज करना चाहते हैं. चाहते हैं कि उसे किसी संदूक में बंद कर दूर समन्दर में फ़ैंक दिया जाए. उसकी उपस्थिति हमसे सवाल करेगी, हमारा जीना मुहाल करेगी, हमेशा हमें परेशान करती रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> पर बात करते हुए आलोचक उसकी तुलना <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong>, और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Black_Friday_(2004_film)" target="_blank">’ब्लैक फ़्राइडे’</a></strong> से कर रहे हैं. बेशक यह उतनी ही बड़ी घटना है हिन्दी सिनेमा के इतिहास में जितनी <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong> या <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong> थीं. ’माइलस्टोन’ पोस्ट नाइंटीज़ हिन्दी सिनेमा के इतिहास में. उन फ़िल्मों की तरह यह कहानी कहने का एक नया शास्त्र भी अपने साथ लेकर आई है. लेकिन मैं स्पष्ट हूँ इस बारे में कि यह इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह अपने पीछे कोई परिवार नहीं बनाने वाली. इस प्रयोगशील कैमरा तकनीक का ज़रूर उपयोग होगा आगे लेकिन इसका कथ्य, इसका कथ्य ’अद्वितीय’ है हिन्दी सिनेमा में. और रहेगा. यह कहानी फिर नहीं कही जा सकती. इस मायने में <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अभिशप्त है अपनी तरह की अकेली फ़िल्म होकर रह जाने के लिए. शायद <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Om-Dar-Ba-Dar" target="_blank">’ओम दर-ब-दर’</a></strong> की तरह. क्लासिक लेकिन अकेली.</p>
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		<title>’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 14:47:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“प्यारे बार्नस्टीन,
तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.

एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG"><img class="alignleft size-full wp-image-281" title="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG" alt="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" width="200" height="298" /></a><strong>“प्यारे बार्नस्टीन,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी बेल बजती रहती है और कोई उसे रिसीव नहीं करता. एक घर जिसमें अब एक कुत्ते की जगह खाली है. रिचर्ड निक्सन किसी व्यक्ति का नाम नहीं. रिचर्ड निक्सन सिर्फ़ एक विचार है, सत्ता का विचार जो तेज़ी से हमारे चारों ओर अपनी जड़ें जमा रहा है. समाज तय साचों में ढल चुका है और शक करने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. यह <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie" target="_blank">डेल कारनेगी</a></strong> को पढ़कर सफलता के सात सोपान सीखने वाले उत्साही वीरों का समय है. ऐसा समय जिसमें शंका करने वाले, चुप्पा से, ईमानदारी का अपना ही तर्जुमा जीने की चाहत रखने वाले इंसानों की कोई ज़रूरत नहीं. उन्हें अब ख़त्म हो जाना चाहिए. वे सफलता के उत्सव में बाधक हैं. ईमानदारी की नई परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं जिनकी गंगोत्री अब सफलता नामक वृहत ग्लेशियर से निकलती है. दुनिया में कहीं युद्ध नहीं है. दुनिया में कहीं भूख नहीं है. जो ऐसा बोलते है उन्हें भी अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. अब दुनिया एक ऐसा खुशियों से भरा बगीचा है जिसमें हर बिकता सामान एक नया खिलता फूल है. असल फूलों को अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. उनके ज़्यादा अच्छे और आग्याकारी प्रतिरूप गढ़ लिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक इस वक़्त जब आप जब इस चालाक बक्से के पर्दे पर सुबह-शाम ऊधम मचाते <strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=l7LLlymgJJE&amp;feature=channel" target="_blank">’रॉकेट सिंह – सेल्समैन ऑफ़ दि इयर’</a></strong> को निरख रहे हैं मैं देख रहा हूँ दूर कहीं उन्नीस सौ तिहत्तर में बिखरते अमेरिकी सपने की राख़ में बेचैन भटकते सैमुअल बाइक को. और क्या खूब है कि इस उत्सवधर्मी समय में मुझे बार बार सैमुअल बाइक याद आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Assassination_of_Richard_Nixon" target="_blank">’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’</a></strong> हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sean_Penn" target="_blank">सीन पेन</a></strong> की सघन अदाकारी से निर्मित बेहतरीन फ़िल्म होने के साथ-साथ हमारे समाज के लिए ज़रूरी फ़िल्म भी है. यह उस जन्नत की हक़ीक़त है जिसमें हमारा समय और समाज धीरे-धीरे पैठ रहा है. यह उन लोगों की कहानी है जो सत्ता द्वारा बेचे जा रहे सफलता और समृद्धि के सपने को मनचाहे दामों पर ख़रीदने से इनकार कर देते हैं. यह बहुत गहरे अर्थों में ’नौकर की कमीज़’ के स्वर को दोहराती फ़िल्म है. सच है कि हमारे दौर के सबसे बड़े सेल्समैन हमारे नीति-नियंता हैं. वे हमें बार-बार वही सुख-समृद्धि और न्याय के सपने बेचते हैं और तय करते हैं कि वे कभी पूरे न हों जिससे उन्हें आगे फिर से उन्हीं लोगों को बेचा जा सके. वे सबसे बड़े सेल्समैन हैं क्योंकि वे उन्हीं सपनों को बार-बार बेचने में सफल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म में कहानी का मूल कथ्य सैमुअल के अपने प्यारे संगीतकार बार्नस्टीन को लिखे लम्बे एकालापों से आगे बढ़ता है. यही इस कहानी का सार हैं. सैमुअल एक असफल सेल्समैन है क्योंकि वो सच बोलता है. उसके बॉस लोग उसे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Norman_Vincent_Peale" target="_blank">’दि पॉवर ऑफ़ पॉज़िटिव थिंकिंग’</a> जैसी किताबें पढ़ने के लिए देते हैं. नौकरी से निकाले जाने के बाद एक दिन वो रिवाल्वर लेकर अपने बॉस को मारने भी जाता है लेकिन उससे गोली नहीं चलाई जाती. हाँ वो असफल है. हर काम में असफल. उसकी पत्नी एक कैफ़े में नौकरी करती है जहाँ उसके मालिक उसे छोटी स्कर्ट पहनकर ड्रिंक सर्व करने के लिए कहते हैं. सैमुअल इस जैसे तमाम कैफ़े’स को जला देना चाहता है. उसे लगता है कि उसके साथ समाज नस्लवादी व्यवहार करता है. लेकिन वो किसी को यह समझा नहीं पाता कि नौकरी नाम की यह बला आवरण में लिपटी नस्लीय गुलामी है.</p>
<p style="text-align: justify;">जो जितना बड़ा झूठा है वो उतना बड़ा सेल्समैन है. इस दौर का सबसे बड़ा सेल्समैन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Nixon" target="_blank">रिचर्ड निक्सन</a></strong> है. जिसने दो बार अमरीकी जनता को वियतनाम युद्ध ख़त्म होने का सपना बेचा और दोनों बार उसे पूरा किए बिना वो सत्ता में बना रहा. आखिर उससे बड़ा सेल्समैन इस दुनिया में और कौन हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">उसे समझ आता है कि यह समाज सिर्फ़ उन्हें ही याद रखता है जो अपने काम से अपना नाम रौशन करते हैं. बाकी सब इस दुनिया में रेत के दाने के बराबर हैं जिनका कोई मोल नहीं, जिनकी कोई अहमियत नहीं. हाँ वो रिचर्ड निक्सन को मार देगा. दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन को मार देगा. लेकिन वो एक असफल इंसान है. शक करने वाला और संशयवादी. ऐसे इंसानों की तक़दीर में लक्ष्य की प्राप्ति के उत्सवगान नहीं होते. वे तो सुरक्षित रख छोड़े गए हैं मज़बूत, निश्चयवादी, वसुंधरा को भोगने वाले वीरों के लिए. अंत में यह नाचीज़ रेत का दाना एक चिंगारी सा चमककर वापस समन्दर के पानी में मिल जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">सैमुअल की बेचैनियाँ हमारे दौर की बेचैनियाँ हैं. पिछले साल आई जयदीप वर्मा की आधुनिक क्लासिक <strong><a href="http://hulla.bigflix.com/" target="_blank">’हल्ला’</a></strong> की बेचैनियाँ हैं. एम.बी.ए. का गुब्बारा हमारे यहाँ क्या खूब फूल रहा है. लेकिन उसमें हवा भरते फैंफड़ों का अनवरत चलती धौंकनी बनते जाना क्यों हमारी नज़रों से ओझल है? यह फ़िल्म पुणे-बैंगलोर से गुड़गाँव-नोयडा तक विकास के जयगान में पिसती कोमल संवेदनाओं की कसक है. वैसे आत्महत्या से इतर वे रास्ते हैं जिनपर चलने वालों को हमारा समाज या तो असफलता के ठप्पे से नवाजता है या फिर उन्हें ’पागल’ श्रेणी में डाल देता है. गुड़गाँव और पुणे के संवेदनाहीन कंक्रीट के जंगलों से भागे गौरव या वरुण इसलिए बच जाते हैं क्योंकि उनके पास ’मैं’ वाला आत्मविश्वास है. लेकिन उनका क्या जिन्हें अपने होने की वजह पर ही शक हो? बताओ तो दोस्तों, क्या हमने उन अनिश्चय में घिरे, अकेले पड़े नाकुछों के लिए कोई रास्ता छोड़ा है?</p>
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		<title>&#8220;मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!&#8221; ~पीयूष मिश्रा.</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 16:37:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Piyush_Mishra" target="_blank"><strong>पीयूष मिश्रा</strong></a> से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा &#8211; परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में &#8216;पॉलिटिकली करेक्ट&#8217; रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.<br style="background-color: #cccccc;" /></p>
<p style="text-align: justify;">लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे &#8216;गुम&#8217; हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~<strong><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p>
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</p>
<p><strong>वरुण~</strong> आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>पीयूष~</strong> </span>(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.</p>
<p>लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक&#8230; उसके बाद में लेफ्ट आपको&#8230; या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ&#8230; लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ&#8230; तब आप बहुत सुखी&#8230; (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.</p>
<p>और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो&#8230; तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब&#8230; बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा&#8230; तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (&#8230;..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था&#8230; हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ हाँ लेकिन जो लोग &#8216;एक्ट वन&#8217; को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि &#8216;एक्ट वन&#8217; में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, &#8216;एक्ट वन&#8217; की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ठीक है, वो &#8216;एक्ट वन&#8217; हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने बहुत कुछ सिखाया. &#8216;एक्ट वन&#8217; (की) &#8216;सो कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने (जीना) सिखाया&#8230; &#8216;एक्ट वन&#8217; की जो &#8216;सो-कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में&#8230; फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है&#8230; सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को&#8230; सफ़दर का काम, सफ़दर का काम&#8230; क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा&#8230; ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की&#8230; खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.</p>
<p>अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये&#8230; कर तो लिया यार&#8230; अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था&#8230; शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल&#8230; उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ&#8230; उनसे ही पूछो!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर&#8230; वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> टॉक टू हिम&#8230; टॉक टू हिम!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ऐसा कुछ नहीं है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हाँ&#8230; स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो&#8230; थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.</p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं है&#8230; आज&#8230; नसीर हैं, ओम पुरी हैं&#8230; पंकज कपूर&#8230; दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं&#8230; आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. &#8216;एक्ट वन&#8217; मैंने जब छोड़ा था &#8216;95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.</p>
<p><strong>व</strong><strong>रुण</strong>~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> &#8216;झूम बराबर झूम&#8217; में काम किया, वो चल नहीं पाई. &#8216;मक़बूल&#8217; में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला&#8230; वो भी अच्छे एक्टर हैं&#8230; पर पता नहीं कुछ कारणों से, &#8216;मक़बूल&#8217; में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. &#8216;आजा नच ले&#8217; में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा&#8230; ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे&#8230; जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ गुलाल की बात करें तो&#8230; उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>एक लाइन ली है&#8230; एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं&#8230; वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था&#8230; ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> मालूम नहीं&#8230; इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को &#8216;लेजेंड ऑफ भगत सिंह&#8217; बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है&#8230; मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हूँ&#8230; हूँ&#8230; नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (&#8217;अरे रुक जा रे बँदे&#8217;)&#8230; लाइव कॉन्सर्ट करते हैं&#8230; उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो&#8230; सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत&#8230; यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना&#8230; गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक&#8230; भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं&#8230; मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.</p>
<p>एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. &#8220;यह नाटक कर रहा है&#8230; लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!&#8221; अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है&#8230; दिल्ली के मुक़ाबले.</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) &#8220;नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.&#8221; एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)&#8230; प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या&#8230; डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में&#8230; दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ&#8230; सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?</p>
<p>वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य&#8230; क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने&#8230; ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का&#8230; गाली देने की इच्छा होती है.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)&#8230; एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.</p>
<p><strong>वरुण~</strong> लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते&#8230; उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है&#8230; अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक&#8230; कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.</p>
<p>आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा&#8230; बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो&#8230; ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है&#8230; मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी&#8230; कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ&#8230; कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को&#8230; अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.</p>
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		<title>नौकर की कमीज पढ़ते हुए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Apr 2009 17:40:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[क्योंकि गद्य कवियों की कसौटी है]]></category>
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विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;
यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;</strong></p>
<p>यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है.</p>
<p>मेरी आवाज़ में बहुत कमज़ोरी थी. उदाहरण के लिए एक ऐसे बीमार आदमी की कमज़ोरी जिसे बिस्तर से सहारा देकर उठाया जाता है. कई दिनों से उसे भूख नहीं लगी. चटपटी सब्जी खाने की उसकी बहुत इच्छा होती है. पर सब्जी कोई बनाता नहीं. जो भी वह खाता है, उल्टी हो जाती है. पानी पीता है. कराहता रहता है. डाक्टर को पूरी उम्मीद है कि वह बच जाएगा. इसलिए घर के लोग खुश हैं. और जितनी तकलीफ़ बीमार को है, उतना दुख उन लोगों को नहीं है, ऐसा बीमार सोचता है. जब वह अपनी तकलीफ़ की बात करता है तो उसकी पत्नी उसकी तकलीफ़ को यह कहकर कम कर देती है कि डाक्टर ने कहा है उसे कुछ नहीं होगा. जब वह कहता है कि अब वह मर जायेगा, तब उसकी माँ उसका माथा सहलाती हुई कहती है कि घबराओ नहीं, डाक्टर ने कहा है सब ठीक हो जाएगा. उसे प्यास लगती है, तो पत्नी कटोरी में दूध लेकर आती है. मजबूरी में थोड़ा दूध पी लेता है. तभी उसे कै करने की इच्छा होती है. उससे मिलने के लिए उसके दफ़्तर के लोग आते हैं. कमज़ोरी में वह किसी से बात नहीं कर सकता. गले तक चादर ओढ़े वह पड़ा रहता है. उसके बदले उसकी माँ और पत्नी मिलनेवालों से बात करती हैं. लोगों के पूछने कि पहले की तबियत कैसी है, दोनों में से कोई कहेगा कि डाक्टर ने कहा कि सब ठीक हो जाएगा. गुस्से में वह पत्नी को गाली देना चाहता है. माँ से बात करना नहीं चाहता. पर कमज़ोरी के कारण वह शांत रहता है. मरता नहीं, थककर सो जाता है.</p>
<p>हमेशा-हमेशा के लिए मैदान छोड़ने की मेरी इच्छा कभी नहीं हुई. मैं ज्यादा देर तक न तो घर से बाहर रह सकता था और न घर के अंदर. फिर भी मेरी मन:स्थिति ऐसी थी जिसमें मैं अनंत काल तक घर लौटना नहीं चाहता था. पर जब भी लौटूँ, पत्नी को उसी तरह भरी बाल्टी लिए हुए, माँ को चावल पछोरते हुए पाना चाहता था. यानी अनंतकाल के बाद भी हर चीज को बिलकुल अभी जैसी &#8212; जैसे इस घर को, गिरे हुए गिलास को, पर खपरों में लगे मकड़ी के जालों को नहीं. और उस मक्खी को भी नहीं जो मेरी पत्नी के पैर में बार-बार आकर बैठ रही थी. चाहता था कि अनंतकाल से लौटने के बाद दोनों खुश मिलें. पत्नी की आँख के नीचे जो काले धब्बे हैं, वे न हों. घर की लिपाई-पुताई हो जाए तो और भी अच्छा है.</p>
<p>किसी दिन पच्चीसों बार ऐसा होता था कि बस दु:ख ही दु:ख है. उसी दिन या दूसरे दिन कुछ ऐसी बातें भी होती थीं जिससे दु:ख नहीं होता था. कभी-कभी बहुत खुशी की बात भी होती थी. दु:ख को घटाकर महसूस करने की ताकत मुझमें नहीं थी. मैं ऐसे नाप का गिलास बन गया था कि थोड़ी तकलीफ़ में भी दु:ख से भर जाता और ज्यादा तकलीफ़ में भी यही होता. ऐसी अकलमंदी नहीं थी कि एक लकीर को बिना मिटाए छोटी करने के लिए तरीका बड़ी लकीर खींचने का है. ऐसी अकलमंदी किस काम की कि हर आनेवाला दु:ख पहले से बड़ा होता चला जाए और बीते दु:ख का संतोष हो कि बड़ा नहीं था.</p>
<p>जिंदगी के हर क्षण से पच्चीसों लाल चीटियाँ चिपकी रहती थीं, शायद पसीना इसका कारण हो. लेकिन उनको सहने की आदत पड़ गई थी. जिस क्षण से चींटी अलग होती वह क्षण भी चींटी के साथ-साथ मरकर नीचे गिर जाता. यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती. इसलिए एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता. पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है. इसलिए खास तकलीफ़ नहीं होती और गरीबी पैदाइशी रहती है. गर्दन को हिलगाए हुए सब लोग अपना काम जारी रखते हैं &#8212; यानी गर्दन कटवाने का काम.</p>
<p>मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था. यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फ़िट था. और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था. इस कटघरे में सुराख कर मैं सिनेमा देखता था, या स्वप्न. हफ़्ते-भर बाद ही मेरी फ़िल्म देखने की इच्छा हो जाती थी. फ़िल्में और लोगों की तरह मुझमें भी जीने का विश्वास बढ़ाती थीं. यह जीना यथास्थिति में जीने का था. रिक्शेवाले से एक करोड़पति की लड़की की शादी हो सकती थी तो रिक्शावाला इसी संतोष से रिक्शा चलाता रहेगा. अमीर लड़की से गरीब लड़के के प्रेम को देखकर गरीबों को कुछ वैसा ही सुख मिलता था जो अपनी चारपाई या जमीन पर सोने से ज्यादा, बढ़िया गद्देदार पलंग के नीचे झाडू लगाने में नौकर को मिलता होगा. खाना बनानेवाला नौकर ज्यादा खाना बनाएगा ताकि खाना बचे. परंतु विज्ञान से गरीबों को खास लाभ नहीं मिला था. मालकिन बचा हुआ खाना रेफ्रीजरेटर में रख देगी. नौकर को कभी-न-कभी कुछ जरूर मिलेगा क्योंकि रेफ्रीजरेटर में रखे-रखे बहुत दिनों का सामान खराब हो जाता है. ज्यादातर आदमी का स्वाद मिठाई के ढेर से थोड़ी मिठाई चुराकर चख लेने का स्वाद था. आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे. लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था. रदीपन देर तक ताजा रहेगा. अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी.</p>
<p>देवांगन बाबू 5 फुट 2 इंच के थे. उनकी ड्रार में एक डायरी थी, उसमें ऊँचाई की जगह उन्होंने 5 फुट 2 इंच लिखा था. वजन में 58 किलो लिखा था. स्कूटर, कार के नंबर की जगह साइकिल का नंबर था. ड्राइविंग लाइसेंस नंबर की जगह उनके दो लड़कों का नाम था- मदनलाल देवांगन और सोहनलाल देवांगन. टेलीफोन नंबर की जगह वल्द रामचरन देवांगन, ग्राम डोंगरगाँव था. रेडियो लाइसेंस नंबर की जगह उन्होंने रेडियो लाइसेंस का नंबर ही लिखा था. सेफ डिपाजिट व्हाल्ट की जगह उन्होंने लिखा था&#8211; हरे रंग की पेटी.</p>
<p>अपने बस में करने और अपना खरीदा गुलाम बनाने के तरीके बदल गए थे. सड़क के किनारे कोई आदमी थका हुआ सुस्ताने खड़ा रहेगा तो एक रौबदार आदमी आएगा और समझाते हुए कहेगा कि यह तुम्हारे खड़े होने लायक जगह नहीं है. वह सोचेगा जगह खड़े होने लायक क्यों नहीं है. रौबदार आदमी इशारा करके बतलाएगा कि वहाँ खड़े रहो जहाँ उसकी मोटरकार है. फिर बहुत आत्मीयता से कंधे पर हाथ रखकर उस जगह तक ले जाएगा. फिर कहेगा कि खड़े-खड़े मोटरकार ताकते रहो, वह अभी खरीदी करके आता है और आजकल पलक झपकते चोरी हो जाती है. मोटरकार कोई न ले जाए पर उस पर जमी धूल पर बदमाश लड़के उँगली से अश्लील गालियाँ लिख देते हैं. मालूम पड़ता नहीं. मोटर के साथ-साथ गंदी गालियाँ घर तक पहुँच जाती हैं जिस पर घर में लड़के, लड़की, नौकर, पत्नी सबकी नज़र पड़ती है. यह हरकत सभी मोटरकार के साथ होती है. फिर भी शंका तो होती है कि उसके साथ क्यों? कोई उससे ज़रूर चिढ़ा हुआ है जो सामने नहीं आना चाहता. छुपकर वार करने की फिराक में है. तब वह पूरी ईमानदारी से मानवता के आधार पर, जो उसे परंपरा से मिले थे, टकटकी बाँधे मोटरकार को ताकता रहेगा. यहाँ तक कि ताकते-ताकते थक जाएगा. तब उसे गृहस्थी के बहुत से ज़रूरी काम याद आएँगे. वह परेशान होकर चहल-कदमी करने लगेगा. चलकदमी करते-करते फिर थक जाएगा और सुस्ताते हुए मोटरकार ताकता रहेगा; आखिर में वह देखेगा कि मोटरकारवाला कब का मोटरकार लेकर चला गया. मोटरकार का नम्बर उसे याद नहीं रहेगा. पर मोटर के पीछे धूल में लिखी गालियाँ उसे याद रहेंगी.</p>
<p>मिट्टी के तेल की उधारी पाकर मैं बहुत संतुष्ट था. सही माने में सभी संतुष्ट थे. भिखारी को भीख मिल जाती थी. बेईमानी के साथ-साथ धर्म के काम भी बढ़ते थे. क्योंकि बेईमानी की कमाई से धर्म-पुण्य का काम होता था.</p>
<p>घर का खर्च कम नहीं होता था. फालतू खर्च क्या है, जिसमें कटौती की जाए, यह बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया. बाद में भिखमंगे को रोटी देना एक फालतू खर्च समझ में आया. तब यह रोटी घर में उपयोग होने लगी. -खर्च पूरा न बैठने के कारण दया और उदारता कम हो जाती है, यह बात समझ में जल्दी आती थी. उदारता और दया का सीधा-सीधा संबंध रुपए से है. सिर पर हाथ फिरा देना न तो उदारता होती है, न दया. बस सिर पर हाथ फिराना होता है.</p>
<p>बड़े-बड़े बँगलों के सामने रास्ता चलती गायों के पानी पीने के लिए एक-एक टाँका बना था. गर्मियों मे सेठ मारवाड़ियों के लड़के प्याऊ खोलकर बैठ जाते थे. रेलवे स्टेशन में यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने के लिए रेलगाड़ी के समय लड़के मोटरकार में बैठकर आते. यात्रियों को पानी पिलाकर पसीना पोंछते हुए घर लौट जाते थे. दोनों हाथ हिलाते चलते थे, एक हाथ से बईमानी और दूसरे हाथ से धर्म, सामाजिक और राजनैतिक कार्य इत्यादि.</p>
<p>गरीब एक स्तर के होते हुए भी एक जैसे इकट्ठे नहीं होते जैसे पचास आदमी को काटकर पचास आदमी बना देना. यदि पचास हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ पचास, एक और फिर गिनती गिनो इक्यावन.</p>
<p>&#8220;मैं अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा. जो मैं पहनता हूँ उसे नौकर पहने, यह मुझे पसन्द नहीं है. मैं घर का बचा-कुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ. जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए. अगर यह हुआ तो उनमें असंतोष फैलेगा. बाद में हम लोगों की तकलीफ़ें बढ़ जाएँगी. खाना उनको वैसा ही दो, जैसा वे खाते हैं. जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो. ये पेट भरते हैं, चाहे आधा या चौथाई. स्वाद से इनको कोई मतलब नहीं. सड़क के किनारे चाट खाने वाले, चाट खाकर जो फैंकते हैं, यह मुझे गुस्सा दिलाता है. इसी के कारण आवारा गरीब लड़के पत्ते चाटकर जादुई स्वाद का पता लगा लेते हैं, जिससे चोरी, गुंडागर्दी और हक माँगनेवाली झंझटें बढ़ी हैं. स्वाद हम लोगों को संतोष नहीं दे सका तो इनको क्या देगा? अगर ये स्वाद के चक्कर में पड़ गए तो अपनी जान बचानी मुश्किल होगी.&#8221;</p>
<p>मैं अधिक देर तक नौकर की कमीज पहने हुए नहीं रह सकता था. इससे छुटकारा पाना चाहता था. कमीज से मुझे पेन्ट की गंध आ रही थी. साहब के बंगले की खिड़की-दरवाजों में अभी हाल में पेन्ट किया गया था. मैंने अपने हाथों को सूँघकर देखा, उससे भी नए पेन्ट की गंध आ रही थी. क्या मुझे भी पेन्ट किया गया है?</p>
<p>बड़े बाबू के दो लड़के और तीन लड़कियाँ थीं. एक लड़का साल भर हो गया, घर से भाग गया था. पत्नी तीन-चार साल से नहीं थी. उन्हें अपने लड़के के मिलने की उम्मीद रोज़ रहती थी. जब वह भीड़ में होते तो यह उम्मीद बढ़ जाती थी. इसलिए यदि सब्जी खरीदने गए तो खरीदते-खरीदते भीड़ में नज़र से अपने लड़के को ढूँढते. जब पिक्चर देखने जाते तो खेल खत्म होने के बाद एक तरफ़ खड़े होकर भीड़ की तरफ़ देखते रहते. सड़क पर जहाँ दस-पन्द्रह आदमी दिखाई देते तो वहाँ लड़के को ढूँढने का मन होता और एक ढूँढ़ती नज़र डालकर आगे बढ़ जाते. आते-जाते लोगों पर भी उनकी निगाह ढूँढ़ लेने की होती. किसी परिचित को भी देखेंगे, जैसे वे एकदम से मुझे संतू बाबू नहीं देखेंगे, पहले देखेंगे कि मैं उनका लड़का नहीं हूँ, फिर मुझे संतू बाबू देखेंगे.</p>
<p>छुट्टी मुझे एक ऐसी फुर्सत लगती है जिसमें एक आदमी अपना ही तमाशा देखता है.</p>
<p>कितना सुख था !</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8216;नौकर की कमीज’, लेखक- विनोद कुमार शुक्ल<br />
दूसरी आवृत्ति 2006, राजकमल प्रकाशन,<br />
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002</strong></p>
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		<title>ख़ामोशी के उस पार : विदेश</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Apr 2009 22:23:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित
**********
दीपा मेहता की ’विदेश’ परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की तमाम खूबसूरतियाँ अपने में समेटे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.tehelkahindi.com/review/films/244.html" target="_blank"><strong><strong>मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित</strong></strong></a></p>
<p>**********</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://www.teenstation.com/gallery/albums/videsh/videsh_1.jpg" alt="" width="265" height="350" /><a href="http://www.imdb.com/name/nm0576548/" target="_blank"><strong>दीपा मेहता</strong></a> की <a href="http://www.imdb.com/title/tt1146285/" target="_blank"><strong>’विदेश’</strong></a> परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की तमाम खूबसूरतियाँ अपने में समेटे एक तितली सी चंचल, झरने सी कलकल लड़की चांद <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Preity_Zinta" target="_blank"><strong>(प्रीति ज़िन्टा)</strong></a> के भोले, नादान, खूबसूरत सपने की असल ज़िन्दगी में मौजूद कुरूप यथार्थ से सीधी मुठभेड़ है. चांद के लिए यथार्थ इतना असहनीय और अप्रत्याशित है कि वो उसे सम्भाल नहीं पाती. सपना कुछ यूँ टूटता है कि चांद हक़ीक़त और फ़साने के बीच का फ़र्क खो बैठती है. आगे पूरी फ़िल्म में इस टूटे सपने की बिखरी किरचें हैं जिन्हें प्यार से रुककर समेटने वाला भी कोई नहीं. वो निपट अकेली जितना इन्हें समेटने की कोशिश करती है उतने ही अपने हाथ लहूलुहान करती है. इस फ़िल्म की मिथकीय कथा को तर्क की कसौटी पर कसकर नकार देना आसान रास्ता है लेकिन <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Yann_Martel" target="_blank"><strong>यान मारटेल</strong></a> का बहुचर्चित <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Life_of_Pi" target="_blank"><strong>’लाइफ़ ऑफ़ पाई’</strong></a> पढ़ने वाले जानते हैं कि असहनीय यथार्थ का सामना करने के लिए कथा में एक शेर ’रिचर्ड पारकर’ गढ़ लेना इंसानी मजबूरी है.</p>
<p>चांद को उसका पति बेरहमी से मारता है. अपने देश, अपनी पहचान से दूर दड़बेनुमा घर में कैद चांद की लड़ाई अपनी पहचान की लड़ाई है. पति से प्यार और अपनेपन की अथक चाह उसे एक ऐसी मिथक कथा पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर देती है जिसमें एक शेषनाग उसके पति का रूप धरकर आता है और उसे दुलारता है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Girish_Karnad" target="_blank"><strong>गिरीश कर्नाड</strong></a> के नाटक ’नागमंडलम’ से लिए गए फ़िल्म के इस दूसरे हिस्से को ’जादुई यथार्थ’ का बेजा इस्तेमाल कहकर टाला नहीं जा सकता. यह आपको असहज कर देता है. और फ़िल्म के मर्म तक पहुँचने के लिए आपको इस एहसास से जूझना होगा. चांद की कहानी कोरी घरेलू हिंसा की कहानी भर नहीं. दरअसल यह उस मनोस्थिति के बारे में है जिससे अपने ही पति द्वारा जानवरों की तरह मारी-पीटी जा रही चांद गुज़र रही है. उसका ’पगला जाना’ ऐसी त्रासदी है जिसे दीपा मेहता सिनेमा के पर्दे को बार-बार स्याह-सफ़ेद रँगकर और तीखेपन से उभारती हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Preity_Zinta" target="_blank"><strong>प्रीति</strong></a> यहाँ अपनी मुखर सार्वजनिक छवि के उलट दूर देस में फँसी एक अकेली और अपनी पहचान पाने की जद्दोज़हद में जुटी लड़की चांद के किरदार में जान फ़ूँक देती हैं और बाकी तमाम अनजान चेहरे इस फ़िल्म को अपनी नैसर्गिक अदायगी से वत्तचित्र का सा तेवर देते हैं.</p>
<p>कनाडा में रहने वाले अप्रवासी भारतीय परिवार में ब्याही गई चांद की कहानी ’विदेश’ अप्रत्यक्ष रूप से उस बदहाल हो रहे सूबे पंजाब की कहानी भी है जिसके सपने भी अब विदेशों से आती स्पॉन्सरशिप और किसी दूर देस में मौजूद अनदेखे सुनहरे भविष्य से लगाई झूठी उम्मीद के मोहताज हैं. आमतौर से स्त्री पर होती घरेलू हिंसा पर आधारित कहानियों में मुख्य खलनायक पति या घरवाले होते हैं लेकिन दीपा की ’विदेश’ यह साफ़ करती है कि व्यख्याएं हमेशा इतनी सरल नहीं होती. यहाँ बहु की पिटाई में संतुष्टि पाने वाली सास (तारीफ़ कीजिए <a href="http://www.imdb.com/name/nm0423666/" target="_blank"><strong>बलिन्दर जोहल</strong></a> के बेहतरीन काम की) में एक असुरक्षित माँ छिपी है जिसे डर है कि उसके बेटे को यह नई आई रूपवती बहु हड़प लेगी. और अपनी ही पत्नी को मारने वाला रॉकी (वंश भारद्वाज) उन एन.आर.आई. सपनों को ढोती जीती-जागती लाश है जिसे ’फ़ीलगुड सिनेमा’ के नाम पर हिन्दुस्तानी सिनेमा ने सालों से बुना है. समझ आता है कि उसे हिन्दी सिनेमा के उल्लेख भर से क्यों चिढ़ है. विदेश एक त्रासद अनुभव है. यह दीवार की ओट से आती उन बेआवाज़ सिसकियों की तरह है जिन्हें सुनने के लिए कानों की नहीं दिल की ज़रूरत होती है.</p>
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		<title>आधी दुनिया का कच्चा-’चिट्ठा’</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Mar 2009 19:10:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>
		<category><![CDATA[बनस्थली]]></category>
		<category><![CDATA[महिला दिवस]]></category>

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		<description><![CDATA[तात्कालिक आग्रह पर लिखा गया समसामयिक चर्चा से रचा आलेख. अप्रकाशित रह जाने की वजह से अपने चिट्ठे पर लगा रहा हूँ. महिला दिवस पर कहीं गहरे बनस्थली को याद करते हुए जहाँ आज भी मुझे मेरा पीछे छूटा हुआ माइक्रोकॉस्म दीखता है.
**********
&#8220;मैं दरवाज़ा थी,मुझे जितना पीटा गया,मैं उतना ही खुलती गई.&#8221; -अनामिका.

मरजेन सतरापी की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>तात्कालिक आग्रह पर लिखा गया समसामयिक चर्चा से रचा आलेख. अप्रकाशित रह जाने की वजह से अपने चिट्ठे पर लगा रहा हूँ. महिला दिवस पर कहीं गहरे बनस्थली को याद करते हुए जहाँ आज भी मुझे मेरा पीछे छूटा हुआ माइक्रोकॉस्म दीखता है.</p>
<p>**********<img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.seanax.com/wp-content/uploads/2008/01/persepolis.jpg" alt="" width="250" height="400" /></p>
<blockquote><p><strong><span style="font-style: italic;">&#8220;मैं दरवाज़ा थी,</span><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">मुझे जितना पीटा गया,</span><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">मैं उतना ही खुलती गई.&#8221;</span> -अनामिका.<br />
</strong></p></blockquote>
<p>मरजेन सतरापी की <a href="http://www.imdb.com/title/tt0808417/" target="_blank"><strong>’परसेपोलीस’</strong></a> देखते हुए मुझे कहीं गहरे ये अहसास हुआ था, ईरान की स्त्री के लिए शायद वो सिनेमा था. चारों तरफ़ से बंद दरवाज़ों वाले समाज की स्त्रियाँ इन चौहद्दियों से बाहर निकलने के लिए हमेशा नए-नए और रचनात्मक माध्यमों की तलाश करती रही हैं. हिन्दुस्तान की स्त्री जो संसद के गलियारों से सिनेमा परदे तक अभी भी हाशिए पर ही खड़ी है उसके लिए वो कौनसे रास्ते हैं जिनपर चलकर वो अपनी बात कह सकती है? गौर से देखने पर पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में अंतर्जाल की आभासी दुनिया एक ऐसा ही माध्यम बनकर उभरी है. और इसीलिए यह आश्चर्य नहीं था जब मंगलोर में ’संस्कृति के रक्षकों’ द्वारा लड़कियों पर अमानवीय कृत्य किये गये तो उनके खिलाफ़ सबसे मुखर आवाज़ इसी अंतर्जाल की आभासी दुनिया से उठाई गई. तहलका की पत्रकार निशा सुसेन और उनकी कुछ बहादुर साथियों द्वारा शुरु किया गया <a href="http://thepinkchaddicampaign.blogspot.com/" target="_blank"><strong>’पिंक चड्डी कैम्पैन’</strong></a> हो सकता है आपमें से बहुत को विरोध का अश्लील तरीका लगे लेकिन एक ऐसे समाज में जहाँ स्त्री का अपने शरीर पर हक़ जताना भी ’संस्कृति का अपमान’ मान लिया जाता हो, विरोध के तरीकों की बात करना क्या बेमानी नहीं.</p>
<p>हिंदी का ब्लॉगिंग जगत भी इस <a href="http://thepinkchaddicampaign.blogspot.com/" target="_blank"><strong>’पिंक चड्डी कैम्पेन’</strong></a> की बयार से अछूता नहीं रहा है. इस अभियान में हिंदी ब्लॉगिंग जगत की महिलाओं का हस्तक्षेप क्या और कितना है यह देखना हमें ब्लॉगिंग की इस अराजक लेकिन मारक तीखी दुनिया में प्रवेश का रास्ता भी देता है और आगे बढ़ने की दिशा भी. हिंदी जगत की जानी-मानी ब्लॉगर <a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com/" target="_blank"><strong>घुघुतीबसूती</strong></a> इस प्रसंग पर अपनी धारधार लेकिन संतुलित टिप्पणी में <a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html" target="_blank"><strong>लिखती हैं</strong></a>,</p>
<blockquote><p><span style="font-style: italic;">&#8220;चलिए हम पिंक चड्ढी वालों के विरोध के तरीके का विरोध करें। क्योंकि उनका तरीका संस्कृति के रक्षकों से अधिक खतरनाक है। हम यह ना देखें कि वे अपने वस्त्र उतारकर देने को नहीं कह रहीं, बाजार से नई या फिर अपनी अलमारी से पुरानी भेजने को कह रही हैं।(अब यदि उस ही ब्लॉग में कोई कुछ अधिक कह रहा है तो क्या किया जा सकता है? यदि वे ऐसी टिप्पणियों को नहीं छापती तो कहा जाएगा कि विरोध के स्वर वे सह नहीं सकतीं।) हमें बाध्य भी नहीं कर रहीं ऐसा करने को। वे जो कर रही हैं उसका अर्थ हम नहीं समझेंगे। वे इसे क्यों कर रही हैं यह समझने में सोचना पड़ता है, उन्हें समझना पड़ता है, उनके स्थान पर स्वयं को रखकर देखना पड़ता है। यह सोचना पड़ता है कि यदि मैं युवा होती, स्त्री होती तो ये सब परिस्थितियाँ मुझे कैसी लगतीं। वे केवल और केवल एक काम कर रही हैं, इस हास्यास्पद तरीके से कट्टरपंथियों को हास्यास्पद बना रही हैं। हाँ, शायद उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया ताकि लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें। (बहुत से लोगों ने कट्टरता के विरोध में लिखा, शायद शालीनता से ही लिखा था, मैंने भी लिखा था, परन्तु उसका कितना प्रभाव पड़ा। यह तरीका जैसा भी था ना हिंसक था ना जबर्दस्ती थी। हमें सही लगे तो ठीक न लगे तो ठीक। ) परन्तु नहीं, वे अधिक खतरनाक हैं।</span><br style="font-style: italic;" /><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">आओ, अपनी बेटियों की उनसे रक्षा करें, न कि उनसे जो उन्हें किसी भी क्षण पकड़कर पीट सकते हैं, चोटी से पकड़कर घुमा सकते हैं। वह तो एक बहुत ही मामूली सा अपराध होगा। पब में जाना आवश्यक तो नहीं है, किसी विशेषकर अन्य जाति धर्म के पुरुष से प्रेम करना आवश्यक तो नहीं है, किसी सहपाठी से पुस्तक लेने (या हो सकता है कि वह बतियाने गई हो या प्रेम की पींग चढ़ाने)आवश्यक तो नहीं है। शराब पीने को कोई भी बहुत अच्छा तो नहीं कहेगा, बहुत सी अन्य वस्तुएँ, काम, व्यवहार, यहाँ तक कि परम्पराएँ भी गलत होती हैं। हमें ना भी लगें तो किसी अन्य को लग सकती हैं। हमें जो गलत लगता है वह अपने बच्चों को बाल्यावस्था में ठीक से समझा सकते हैं। अपने मूल्य उन्हें सिखा सकते हैं। जब वे वयस्क हो जाएँगे तो वे इतने समझदार हो चुके होंगे कि अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे। या हम यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय युवा कभी वयस्क माने जाने लायक बुद्धि विकसित नहीं कर पाते? देखते जाइए कल कोई बहुत से अन्य कामों को गलत करार कर देगा। किसी को लड़कियों का लड़कों के साथ चाय पीना भी गलत लग सकता है किसी को लड़कियों का लड़कियों के साथ या अकेले भी चाय पीना गलत लग सकता है। शायद बोतल बंद पानी पीना गलत लग सकता है। शायद उनका पैदा होना ही गलत लग सकता है। हम कहाँ सीमा रेखा खींचेंगे और हम होते कौन हैं किसी का जीवन नियन्त्रित करने वाले? देखते जाइए कल आपको अपने टखने भी दिखाने होंगे जबर्दस्ती दिखाने होंगे।&#8221;</span> -<a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html" target="_blank"><strong>घुघुतीबासुती के ब्लॉग से.<br />
</strong></a></p></blockquote>
<p>घुघुतीबासूती के शब्दों में एक करारा व्यंग्य है. शायद यह बहस मंगलोर में हुई एक घटना से शुरु हुई है लेकिन हिंदी की ’चोखेरबालियाँ’ इसमें मौजूद सदियों की बेड़ियों की जकड़न महसूस कर पाती हैं. यही चर्चा <a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/" target="_blank"><strong>सुजाता</strong></a> अपने ब्लॉग <a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/" target="_blank"><strong>नोटपैड</strong></a> में <a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post.html" target="_blank"><strong>इन शब्दों के साथ</strong></a> आगे बढ़ाती हैं,</p>
<blockquote><p><span style="font-style: italic;">&#8220;जो समाज जितना बन्द होगा और जिस समाज मे जितनी ज़्यादा विसंगतियाँ पाई जाएंगी वहाँ विरोध के तरीके और रूप भी उतने ही अतिवादी रूप मे सामने आएंगे।सूसन के यहाँ अश्लील कुछ नही, लेकिन टिप्पणियों मे जो भद्र जन सूसन पर व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे हैं वे निश्चित ही अश्लील हैं।मुझे लगता है यह तय कर लेना चाहिये कि इस बहस का फोकस क्या है , सूसन या रामसेना या पिंक चड्डी या स्त्री के विरुद्ध बढती हुई पुलिसिंग और हिंसा।&#8221;</span> -<a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post.html" target="_blank"><strong>सुजाता के ब्लॉग ’नोटपैड’ से.<br />
</strong></a></p></blockquote>
<p>ऊपर उद्धृत अंश में सुजाता ने निशा सुसन की बनाई फ़ेसबुक कम्यूनिटी पर आ रही अश्लील टिप्पणियों का ज़िक्र किया. जिस तरह कुछ ही दिनों में चालीस हज़ार से ऊपर पहुँची सदस्य संख्या इस अभियान का एक चेहरा है उसी तरह ’भद्र पुरुषों’ द्वारा लगातार की गईं अभद्र टिप्प्णियाँ भी इसका एक विकृत लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण दूसरा चेहरा हैं. स्त्रियों का आभासी अंतर्जाल में कोई भी अभियान या गतिविधि इसी तरह कुछ ’भद्र पुरुषों’ की अभद्र प्रतिक्रियाओं का शिकार बनती रही है और इससे निरंतर संघर्ष और विरोध से ही हिंदी ब्लॉगिंग में महिलाओं के लेखन ने अपना अपना स्वरूप ग्रहण किया है. क्योंकि ब्लॉगिंग में हिंसा भी भाषा का चोला ओढ़कर ही आती है इसलिए भाषा, उससे जुड़ी संवेदनशीलता और उससे संबंधित तमाम बहसें महिलाओं के ब्लॉग्स पर हमेशा से एक प्रमुख चर्चा का मुद्दा रही हैं. हिंदी जगत के जाने-माने ब्लॉगर <a href="http://naisadak.blogspot.com/" target="_blank"><strong>रवीश कुमार</strong></a> जब अपने ब्लॉग <a href="http://naisadak.blogspot.com/2009/02/blog-post.html" target="_blank"><strong>’कस्बा’</strong></a> में मीडिया में प्रयोग में आती भाषा में बढ़ती हिंसक शैली का रिश्ता स्त्री के निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में न होने से जोड़ते हैं तो यह तुरंत ही <a href="http://blog.chokherbali.in/" target="_blank"><strong>’चोखेर बाली’</strong></a> जैसे महिलाओं के सामुदायिक ब्लॉग में <a href="http://blog.chokherbali.in/2009/02/blog-post_20.html" target="_blank"><strong>चर्चा का मुख्य मुद्दा</strong></a> बन जाता है. महिला ब्लॉगर इसपर सीधी प्रतिक्रिया देती हैं. और हमेशा की तरह इन ब्लॉगरों की टिप्पणियों में व्यक्तिगत अनुभव मिले हुए हैं. <a href="http://blog.chokherbali.in/2009/02/blog-post_20.html" target="_blank"><strong>दिप्ति</strong></a> टिप्प्णी करती हैं,</p>
<blockquote><p><span style="font-style: italic;">&#8220;ये तो नहीं कहा जा सकता है कि महिलाओं की लेखनी उग्र नहीं होती है या नहीं हो सकती है। लेकिन, ये सच है कि महिलाओं को लिखने लायक बहुत कम लोग मानते हैं। मेरी पहली नौकरी में ही मुझे इस बात का सामना करना पड़ था। मुझे न तो राजनीति की ख़बर लिखने दी जाता थी और न ही क्राइम की। हां कही कोई भजन कीर्तन हुआ तो वो मेरी झोली में ज़रूर गिर जाता था।&#8221;</span><br style="font-style: italic;" /></p></blockquote>
<p>और <a href="http://blog.chokherbali.in/2009/02/blog-post_20.html" target="_blank"><strong>नीलिमा सुखेजा अरोड़ा</strong></a> का कहना है,</p>
<blockquote><p><span style="font-style: italic;">&#8220;एंकर तो आपको बड़ी संख्या में महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी लेकिन जब बात का‍पी लिखने की  आती है या रिपोर्टिंग की आती है तब लड़कियां कहां खो जाती हैं।</span><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">बात बहुत सही भी है, ज्यादातर एंकर लड़कियां होंगी, इस बात पर हम सब का बस चलता भी तो कितना है, यह तो मालिक या मैनेजमेंट तय कर देता है कि एंकरों में कितनी स्त्रियां रहेंगी और कितने पुरुष।</span><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">रही कापी लिखने की बात,शायद लड़कियां कापी लिखतीं तो वो अलग ही तरह की होती। मेरा ख्याल है कि यह भाषा किसी सभ्य आदमी की हो ही नहीं सकती है कि घर में घुसकर मारो पाकिस्तान को। जब कोई सभ्य लड़का ही ऐसा भाषा को प्रयोग नहीं करता है तो लड़कियां से ऐसी आशा करना ही बेमानी है।</span><br style="font-style: italic;" /><span style="font-style: italic;">मैं भी प्रिंटर डेस्क पर ही काम करती हूं, वो भी अखबार में । जहां मैं लगभग हर रोज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तालिबान, ओसामा बिन लादेन और अमेरिका पर स्टोरीज लिखती या रीराइट करती हूं। पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने या मेरे साथियों ने कभी भी इतनी ओछी भाषा का प्रयोग किया हो। मेरा मानना है टीवी में भी यदि ज्यादातर लड़कियां स्क्रिप्ट्स लिखने लगें तो इतनी हल्की भाषा का प्रयोग तो नहीं ही होगा।&#8221;</span></p></blockquote>
<p>इस भाषाई हिंसा के अनेक रूप हैं. भाषा की इस बहस को चोखेरबाली की पहली वर्षगाँठ पर आयोजित परिचर्चा में हिंदी की कवि <a href="http://blog.chokherbali.in/2009/02/blog-post_10.html" target="_blank"><strong>अनामिका</strong></a> इस विश्लेषण द्वारा आगे बढ़ाती हैं.</p>
<blockquote><p><span style="font-style: italic;">&#8220;अभिव्यक्ति के गर्भ में ही व्यक्ति है। जहां अभिव्यक्ति नहीं है, वहां व्यक्ति औऱ व्यक्तित्व का होना संभव नहीं है। पुरुष ने वो भाषा ही नहीं सीखी कि किसी के कंधे पर हाथ रखकर बात कर सके। उसकी भाषा मुच्छड़ भाषा है, किसी मैजेस्ट्रेट की तरह की रैबदार। जबकि स्त्रियों की भाषा बतरस में प्राण पाती है। आप बसों में जाइए- देखिए कि एक स्त्री की आंख से अभी पहली ही बूंद टपकी है कि दूसरी स्त्री उसके कंधे पर हाथ रखकर कारण जानने के लिए बेचैन हो उठती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो मजदूरिन है और पूछनेवाली टीचर या और कुछ। बिना किसी कॉन्टक्सटुलाइजेशन के बात शुरु हो जाती है। ब्यूटी पार्लर औऱ दुनिया भर के इसी तरह के जो नए स्पेस बन रहे हैं, वहां ये सवाल नहीं किए जाते कि तुम्हारी पीठ पर ये नीले निशान क्यों है, उसे बर्फ से सेंक भर देते हैं। लेकिन भाषा एक उष्मा देती है, जीने का एक नया अर्थ देती है।&#8221;</span> -<a href="http://blog.chokherbali.in/2009/02/blog-post_10.html" target="_blank"><strong>अनामिका ’चोखेरबाली’ पर.</strong></a><br style="font-style: italic;" /></p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www4.uwm.edu/cie/frenchfilm/persepolis.jpg" alt="" width="400" height="220" />यूँ भी ब्लॉग जगत का लेखन हमेशा से ही बहुत व्यक्तिगत संदर्भों से युक्त रहा है. और स्त्रियों के ब्लॉग भी इस ख़ासियत से भरे हुए हैं. स्त्री के लिए समाज बदलने की लड़ाई दरअसल स्वयं के हक़ के लिए लड़ाई से शुरु होती है. उनका व्यक्तिगत लेखन कहीं न कहीं उस वृहत्तर समाज में अपनी उपस्थिति के लिए जगह बनाने की लड़ाई है जो उनकी आवाज़ को हर गैर-आभासी मंच पर कुचलता रहा है. आबादी के हर दबाए गए हिस्से की पहली अभिव्यक्ति आपबीती ही होती है. मराठी और हिंदी में दलित आत्मकथाओं की बड़ी गिनती इसका सबसे हालिया उदाहरण है. ये आत्मकथाएँ कोई व्यक्तिगत कहानियाँ नहीं, सदियों से होते अत्याचार के दस्तावेज हैं. ठीक इसी तरह स्त्रियों के ब्लॉग्स पर मिलती व्यक्तिगत कहानियों के अर्थ भी सिर्फ़ व्यक्तिगत संदर्भों तक सीमित नहीं. <a href="http://blog.chokherbali.in/" target="_blank"><strong>चोखेरबाली</strong></a> जैसे ब्लॉग पर सपना चमड़िया की लिखी <a href="http://blog.chokherbali.in/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A5%80" target="_blank"><strong>’सपना की डायरी’</strong></a> सिर्फ़ एक महिला की डायरी भर नहीं, पूरी ’आधी दुनिया’ की आपबीती का बयान हैं.</p>
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		<title>हम बड़े हुए, शहर बदल गए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Nov 2008 10:04:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
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		<description><![CDATA[तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://pratilipi.in/wp-content/uploads/2008/10/bio-pic-varun-150x150.jpg" alt="" width="100" height="100" /><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://img2.orkut.com/images/milieu/1202650053/1202675342753/2076248/Z39qbxp.jpg?sig=4ovux1" alt="" width="80" height="110" />तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप के भीतर कहीं छुपी है. अपना microcosm खोजो और फिर देखो इस भरमाती दुनिया को. ये बातें करती है.</p>
<p><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON">वरुण</a> और मेरे लिए बहुत से मामलों में &#8216;एक-सा संगीत&#8217; है. हम दुनिया को देखने के लिए एक चश्मे का इस्तेमाल करते हैं शायद. क्रिकेट, सिनेमा और राजनीति.. हमारे लिए एक complex society को समझने का जरिया बनते हैं.  एक दूसरे की scrapbook में लिखकर अपनी उलझनें सुलझाना हमारा पुराना शगल है! वैसे भी Orkut  हमारे लिए ख़ास है क्योंकि हमारी मुलाकात यहीं हुई थी. वरुण के लेखन का मैं तब से फैन रहा हूँ जब वो<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Great_Indian_Comedy_Show"> &#8216;ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो&#8217; </a>लिखा करता था. हाल ही में उसमे अपनी पहली हिन्दी कहानी के प्रकाशन के साथ हिन्दी साहित्य जगत में भी धमाकेदार एंट्री ली है. आप <a href="http://pratilipi.in/2008/10/danube-ke-patthar-varun/">&#8216;डेन्यूब के पत्थर&#8217;</a> में ना जाने कितनी समकालीन परिस्थितियों की गूँज सुन सकते हैं.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anil_Kumble">अनिल कुंबले</a> के जाने से शायद हम दोनों अनमने से थे और ऐसे में ये Orkut की skrapbook वार्ता आई. आज पढ़ा तो मुझे लगा कि एक लेख लिखने से ज़्यादा खूबसूरत ख़याल इसे blog पर डाल देना होगा. कुंबले हमारे जीवन में क्या जगह रखता था इसे देखना ज़रूरी है.</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.dancewithshadows.com/ipl/wp-content/uploads/2008/03/anil-kumble.jpg" alt="" width="100" height="120" /><strong>मिहिर:~</strong> अरे यार.. मेरे हीरो ने आज यूँ अचानक अलविदा कह दिया. कुछ अच्छा नहीं लग रहा है&#8230;<br />
मालूम था कि एक दिन ये होगा लेकिन क्या करुँ यार.. मैं कुंबले के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकता&#8230;<br />
He is my childhood hero. my first cricket memory coincides with his first coming-of-age performance. 1993 Hero cup final where he took 6-12&#8230; is there a life after kumble&#8230;?</p>
<p><strong>वरुण:~</strong> यार&#8230;सच में&#8230; दोपहर से बड़ा ख़ाली-ख़ाली लग रहा है. कुंबले को जाना था, यह कब से मालूम था&#8230; लेकिन फिर भी, एक्सेप्ट करना मुश्किल ही होता है. मुझे भी हीरो कप का वो फाइनल हमेशा याद रहेगा. शायद दिवाली के एक-दो दिन बाद ही था&#8230; हमारे पास बहुत सारे पटाखे बचे हुए थे और हमने जम के फोड़े थे. कुंबले उस दिन ख़ुदा लग रहा था&#8230; और हमेशा ही लगा है जब उसकी फ्लिपर्स लोअर-आर्डर बल्लेबाजों को खड़े-खड़े उड़ा देती हैं.</p>
<p>एक बार साउथ अफ्रीका में शायद 89 रन भी बनाए थे और उस दिन मुझे बड़ा बुरा लगा था कि सेंचुरी नहीं हुई.</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.funmunch.com/celebrities/athletes/anil_kumble/enlarge/anil_kumble_09.jpg" alt="" width="100" height="130" />आज अचानक से यह ख़याल आया कि जब सचिन भी चला जायेगा और राहुल भी&#8230; तब हम क्रिकेट क्यूँ देखेंगे? शायद उनके साथ साथ हमें भी रिटायर हो जाना चाहिए. हम भी बूढे हो चले हैं शायद. ऐसा ही होता है &#8211; एक आइकन के गुज़र जाने से साथ में वो era, उस era की values/memories/motivations सब गुज़र जाती हैं. अपनी गुज़रती उम्र का एहसास करा जाती हैं.</p>
<p>यह बात वैसे हर दौर के लोग बोलते होंगे&#8230; (और बोलते हैं, यह जानते हुए भी, मैं कहूँगा) कि क्रिकेट अब वैसा नहीं रहा. और कुछ दिन बाद इस बात का भरम भी खत्म हो जायेगा &#8211; जब हम सचिन, राहुल, लक्ष्मण को भी अलविदा कह देंगे.</p>
<p>एक मज़ेदार बात याद आई. जब दुनिया में शायद किसी ने भी कुंबले का नाम &#8216;जम्बो&#8217; नहीं रखा था, तब भी मैं और मेरा छोटा भाई उसे &#8216;हाथी&#8217; ही बोलते थे. उसके बड़े पैरों की वजह से नहीं (जो कि शायद उसके निकनेम की असली वजह है) बल्कि इसलिए कि बॉलिंग एक्शन के वक्त उसके हाथ किसी हाथी की सूंड जैसे लहराते थे&#8230; मानो हाथी नारियल उठा के नमस्कार कर रहा हो.</p>
<p>फिर बाद में जब हमें पता चला कि टीम ने उसका नाम जम्बो रख दिया है तो हमें बड़ी खुशी हुई&#8230;</p>
<p><strong>मिहिर:~</strong> अगर मुझे सही याद है तो 88.. उसी पारी में अज़हर ने सेंचुरी बनायी थी और कुंबले ने उसके साथ एक लम्बी पार्टनरशिप की थी. अज़हर के आउट होते ही मुझे डर लगा था कि देखना अब कुंबले की सेंचुरी रह जायेगी और वही हुआ था. 90s की क्रिकेट तो मुझे (हमें!) ज़बानी रटी हुई है!</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://bp0.blogger.com/_MuOF0Z25zBA/R4em8fE-oeI/AAAAAAAAASg/iibVMSFZ6sM/s400/Anil+Kumble+Wallpaper.jpg" alt="" width="150" height="100" />एक दौर था जब मैं कुंबले के एक-एक विकेट को गिना करता था. मैं उसकी ही वजह से स्पिनर बना (अपनी गली क्रिकेट का ऑफ़ कोर्स!) और उसके होने से मुझे दुनिया कुछ ज्यादा आसान लगती थी. क्लास में बिना होमवर्क किए जाने के डर से कुंबले की बॉलिंग निजात दिलाती थी. संजय जी की डांट से कुंबले बचाता था (मुझे ऐसा लगता था). एक self-confidence आता था मेरे भीतर जो ये अनिल कुंबले नाम का शक़्स देता था. चाहे कुछ हो जाए.. चाहे मैच में स्कोर 200-1 हो लेकिन इसकी बॉलिंग में फर्क नहीं देखा कभी&#8230;</p>
<p>कभी कभी लगता है कि ये दौर आज नही ख़त्म हुआ है, ये दौर तो बहुत पहले जा चुका. लेकिन एक भरम हम बनाकर रखते हैं जैसा तुमने कहा. आज वो टूट गया&#8230;</p>
<p>टाईटन कप.. सहारा कप.. Independence cup.. टाईटन कप में कुंबले और श्रीनाथ की वो लास्ट पार्टनरशिप याद है! उस मैच में सचिन को मैन-ऑफ़-दी-मैच मिला था लेकिन बाद में सचिन ने कहा था कि मैं तो मैच को बिना जिताए आउट होकर आ गया था, मैच तो इन दोनों ने जिताया है. मैन-ऑफ़-दी-मैच तो इन्हें मिलना चाहिए. और सबने कहा था, मैच बंगलौर में था ना.. आख़िर शहर के लड़के ही स्टार बने हैं! और फिर वो फाइनल.. क्या दिन थे यार!</p>
<p>आज लगता है मैं बड़ा हो गया यार. बचपन ख़त्म हुआ&#8230;</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.hinduonnet.com/thehindu/2006/03/12/images/2006031203591901.jpg" alt="" width="100" height="160" /><strong>वरुण:~</strong> हाँ&#8230;मैं बचपन में बहुत मोटा था और तेज़ बॉलिंग तो कर ही नहीं सकता था. ऐसे वक्त में मुझे मेरा हीरो मिल गया था &#8211; कुंबले. दो लम्बी डींगें भरो, हाथ को हवा में ऊँचा ले जाओ, और गेंद छोड़ते समय ऊँगली से हल्का सा झटका या ट्विस्ट दो&#8230;लेग-स्पिन नहीं तो ऑफ़-स्पिन तो हो ही जाती थी.</p>
<p>और गेंद करने से पहले, हाथ में गेंद को घुमाते हुए उछालना&#8230; उस वक्त लगता था हम भी कुंबले हैं. लगता था बैट्समैन अब हमसे भी डर रहा होगा. मुझे आज तक हाथ में वैसे गेंद घुमाने का शौक है&#8230; और एक अजीब सा confidence आता है अपने अन्दर.</p>
<p>और सही कहते हो- वो वाला दौर कब का जा चुका. हम बस उसके illusion में जी रहे हैं&#8230; और वो भी टूटता जाता है.</p>
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		<title>ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 10:37:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त को दिख जाते हैं. मेरी चिट्ठियाँ राह भटक जाती हैं. लेकिन मुझे भरोसा है कि इस वक्त वो आयेंगे और मुझे संभाल लेंगे. वो जहाँ कहीं भी हैं, सोचेंगे और उनका सोचना ही काफ़ी है. डर हैं, और डर किस मन में नहीं होते लेकिन मैं सपने देखना नहीं छोडूंगा. सपनों में उन्हें देखना नहीं छोडूंगा. एक कुतुबनुमा मेरे पास भी है&#8230;</em></p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://tbn1.google.com/images?q=tbn:2HnxjxCChyu_XM:http://www.photofloue.net/blog/wp-content/uploads/2007/05/filename.jpg" alt="" width="125" height="91" />&#8220;हम सबका एक &#8216;घर&#8217; होता है. बहुत प्यारा, संपूर्ण, सुरक्षित और स्वस्तिदायक&#8230; फिर हम &#8216;बड़े&#8217; होते हैं और घर &#8216;छोटा&#8217; होता जाता है, छूट जाता है. ज़िंदगीभर हम उसी की तलाश में भटकते रहते हैं. कभी सोच में, कभी सपनों में, कभी रचनाओं में, भौतिक उपलब्धियों में, प्रशस्तियों में, विद्रोह और समझौतों में, कभी निष्क्रियाताओं में तो कभी कर्म की दुनिया में&#8230; मगर उम्र का, स्थान का, विश्वासों का, मूल्य और मान्यताओं का, भावनाओं और सुरक्षाओं का वह घर हमें कभी नहीं मिलता. लौटकर जाएँ तो भी पीछे छूटा हुआ न तो घर वही रह जाता है, न हम&#8230; जो कुछ मिलता है वह &#8216;अपना घर&#8217; नहीं होता और हम सोचते हैं : कहीं कोई घर होता भी है? इस सच्चाई का सामना करने से भी हम डरते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि सचमुच कोई घर हो ही नहीं और हम एक भ्रम को जीते रहे हों&#8230; क्या है यह &#8216;घर&#8217; का भ्रम जो हमेशा खींचता रहता है? यह भी तो तय करना मुश्किल है कि घर की तलाश आगे की ओर है या पीछे की ओर? यह स्मृति है या स्वप्न? विज़न या नास्टेल्जिया? या फैलकर बेहतर दुनिया के लिए आस्था? कभी भी अधूरी छूट जाने के लिए अभिशप्त एक अंतहीन यात्रा ही क्या हमारी नियति है? उपलब्धियों के नाम पर कुछ पड़ाव, कुछ नखलिस्तान&#8230; चंद तसवीरें&#8230; अनेक पात्रों के नाम से की जानेवाली कुछ आत्म-स्वीकृतियां.</p>
<p>कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या दुनिया की सारी सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ उन्हीं लोगों ने तो नहीं रचीं जो विस्थापित थे और पीछे छूटे घर की याद में निरंतर वर्तमान और भविष्य की रचना करते रहे? हमें ऐसे वर्तमान में फेंक दिया गया है जो लगातार हमें भविष्य में धकेल रहा है ओर हर &#8216;है&#8217; को अनुक्षण अतीत बना रहा है. इस प्रक्रिया में हम अपने &#8216;अब&#8217; को सिर्फ़ &#8216;था&#8217; में बदलते जाने के निमित्तभर नहीं हैं? जो &#8216;था&#8217; वो कभी नहीं &#8216;होगा&#8217;, मगर हम उसे ही याद करेंगे, यानी उस स्मृति के किसी न किसी अंश को अपना सपना बनाते रहेंगे&#8230; वर्तमान और भविष्य चाहे जितने समृद्ध, संपन्न और महान बन जाएँ, मगर हमें हमेशा लगेगा कि जो बात पीछे थी वो आज नहीं है. होगी भी नहीं. शव पर चढ़े या सिंहासन पर, गले में हों या शीश पर, फूल तो हम पीछे छूटे हुए किसी पेड़ के ही हैं. हम आज जहाँ हैं वहाँ के हैं नहीं, बिलोंग कहीं और करते हैं. -कहाँ, यह भी हमें पता नहीं. एक भटका हुआ बच्चा जिसे अपने घर-बार, माँ-बाप किसी का नाम पता मालूम नहीं. मगर रोता उन्हीं के लिए है और हम समझाते हैं कि जहाँ हम उसे ले जा रहे हैं वहीं उसके घर-बार, माँ-बाप सभी हैं. इस झूठ की रचना या पीछे छूटे हुए को वापस दे देने के आश्वासन का नाम ही सभ्यता-संस्कृति नहीं है? तब फ़िर हम क्या ऐसे शाश्वत-शिशु ही हैं जो हर कहीं, हर किसी में अपना घर देखता है. बहुत कुछ बनाता और तोड़ता है और हर समय जानता रहता है कि यह उसका घर नहीं है.</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://farm3.static.flickr.com/2152/2023586442_ee026b9e8b.jpg?v=0" alt="" width="280" height="180" />कहते हैं आदमी हर क्षण अपने पीछे छूटे हुए किसी &#8216;स्वर्ग&#8217; में लौटना चाहता है जहाँ वह सुरक्षित और सुखी था. व्यक्तिगत स्तर पर माँ के गर्भ में लौटने की ललक है. छूटा हुआ असली &#8216;घर&#8217; तो वही था. मगर वह यह भी जानता है कि वहाँ या किसी भी स्वर्ग में वह कभी नहीं लौटेगा. उसे अपना स्वर्ग ख़ुद बनाना पड़ता है. इकबाल की तरह या स्वर्ग से निष्कासित नहुष की तरह; किसी विश्वामित्र के मंत्रों पर सवार होकर&#8230; हमारी उस बैचनी को समझकर न जाने कितने विश्वमित्रों ने हमें &#8216;घर&#8217; या स्वर्ग देने के आश्वासन दिए हैं, सपने दिखाए हैं और वहाँ जाकर हमने पाया है कि न तो वह हमारा घर है, न वायदे का स्वर्ग. इस विश्वासघात से क्षुब्ध हम स्वयं उस घर और स्वर्ग को तोड़ते हैं. फ़िर से नए सपने के निर्माण के लिए. कितना थका देनेवाला, लेकिन कितना अनिवार्य है यह सिलसिला. हर बार किसी पैगम्बर, किसी गुरु या अवतार के दिए हुए सपनों का हिस्सा बनने की छलना, वहाँ पहुँचकर फ़िर एक नए नरक में पहुँचने का अहसास और फ़िर एक नए अवतार की प्रतीक्षा. फ़िर इस दुष्चक्र में धर्म, राजनीति या विज्ञान, तकनीक के नए-नए सम्प्रदायों को बनाते चले जाना, जो इसमें बाधक हैं उन्हें हटाते या समाप्त करते चले जाना ताकि अपने सपने को साकार किया जा सके. यानि सब मिलाकर हमेशा एक उम्मीद, संक्रमण, और यात्रा में बने रहने की नियति&#8230; युग-युग धावित यात्री. किंतु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं&#8230; चरैवेति&#8230; चरैवेति&#8230;&#8221;</p>
<p><strong>राजेंद्र यादव. &#8220;अभी दिल्ली दूर है&#8221; की भूमिका से.</strong></p>
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