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	<title>आवारा हूँ... &#187; चकमक</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>हवा में उड़ता जाए रे&#8230; ’अप’</title>
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		<pubDate>Wed, 02 Jun 2010 20:21:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.
*****
एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा वो है जब अपना हीरो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/06/up_poster_allchar.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-483" title="up" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/06/up_poster_allchar-202x300.jpg" alt="up" width="202" height="300" /></a>यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख <strong>’चकमक’</strong> के बच्चों से मुख़ातिब है.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा वो है जब अपना हीरो हीरोइन को अपने घर का एक कमरा किराए पर देने की जुगत भिड़ा रहा है. वो अपने घर की खूबियाँ कुछ यूं बताता है. “क्या कमरा है मेमसाहब! कमरा. कमरे के आगे टैरेस. टेरेस के आगे गार्डन. गार्डन के आगे समन्दर.” वाकई अच्छा नज़ारा है, है ना! लेकिन सोचो कि अगर इस टैरेस और गार्डन को हटाकर वहाँ एक ऊँची इमारत खड़ी कर दी जाए तो इस घर में रहने वालों को कैसा लगेगा? सीन कुछ अच्छा नहीं है, है ना.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अच्छा बताओ, अगर तुम्हें पता चले कि इस घर में रहने वाला एक बुड्ढा है और वो भी अकेला, तब? बुरा लगेगा ना उसके लिए सोचकर. यहाँ तक तो <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Up_(2009_film)" target="_blank">’अप’</a></strong> एक उदास फ़िल्म है (रोना भी आता है बार-बार) लेकिन इसके बाद वो खड़ूस बुड्ढा जो करता है वो तुममें से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. क्या बताऊँ? वो अपने घर के ऊपर ढेर सारे हीलियम से भरे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है! बताओ, है ना मज़ेदार बात! अब तुम कहोगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? अरे भई आखिर ’अप’ कार्टून फ़िल्म है और कार्टून फ़िल्म में उड़ने के लिए खुला आसमान होता है सामने. सो कुछ भी हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पिक्सार एनिमेशन की बनाई फ़िल्म ’अप’ कहानी है एक खड़ूस से दिखते बुड्ढ़े <strong>कार्ल फ़्रेडरिकसन</strong> की जिसे बचपन से ही रोमांचकारी यात्राओं पर जाने का बहुत चाव है. उसकी पत्नी और वो हमेशा साथ उस सपनीली दुनिया में जाने का सपना देखते हैं जिसका नाम है ’पैराडाइज़ फ़ॉल्स’ और जो दक्षिण अमेरिका में कहीं है. अफ़सोस कि मि. फ्रेडरिकसन की पत्नी इस सपने के पूरा होने से पहले ही उन्हें छोड़कर चली जाती हैं. अब कार्ल फ्रेडरिकस अकेले हैं और उनके घर के आस-पास बड़ी इमारतें बन रही हैं. सभी उन्हें वृद्धाआश्रम चले जाने की सलाह देते हैं. लेकिन मि. फ्रेडरिकसन अपने घर को छोड़कर नहीं जाना चाहते. और फिर होता यूँ है कि एक दिन मि. फ्रेडरिकसन उड़ जाते हैं अपने घर के साथ आसमान में. अपने सपनों की दुनिया की ओर&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन एक दिक्कत है. गलती से उनके साथ एक छोटा सा लड़का <strong>रसेल</strong> भी आ गया है. रसेल भी रोमांचकारी यात्राओं का शौकीन है. अब दोनों उड़ रहे हैं ’पैराडाइज़ फ़ॉल’ की ओर. रास्ते में आंधी-तूफ़ान है, बड़ी बाधाएं हैं. शुरुआत में मि. फ्रेडरिकसन बार-बार रसेल से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं. लेकिन धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो जाती है. मुसीबतों को पार करते वे वहाँ पहुँचते हैं और आखिर उन्हें दूर पहाड़ के दूसरे कोने पर ’पैराडाइज़ फॉल’ नज़र आता है. लेकिन उससे पहले अभी बहुत कुछ बाकी है. उन्हें एक रंग-बिरंगी, ख़ूब बड़ी सारी चिड़िया मिलती है रास्ते में. अपना नन्हा उस्ताद रसेल उसका नाम रखता है <strong>केविन</strong>. उसे चॉकलेट खिलाता है और उसका दोस्त बन जाता है. केविन तलाश में है अपने खोये हुए बच्चों की. रसेल उसकी मदद करना चाहता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">कहानी अभी और भी है. फिर उन्हें मिलता है एक बोलने वाला कुत्ता, नाम है <strong>डग</strong>. डग के गले में ऐसा पट्टा है जिससे कुत्ते भी इंसानों की आवाज़ में बोल सकते हैं. उसे ये पट्टा पहनाया है चार्ल्स मंट्स ने. पता चलता है कि चार्ल्स वही खोया हुआ हीरो है जिससे प्रभावित होकर बचपन में मि. फ्रेडरिकसन ने रोमांचकारी यात्राओं के सपने देखे थे. चार्ल्स उन्हें अपने उड़ने वाले गुब्बारेनुमा जहाज़ में दावत के लिए बुलाता है. यहाँ दावत का सारा इंतज़ाम बोलने वाले कुत्तों के हाथों में है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बातों-बातों में पता चलता है कि चार्ल्स केविन को पकड़ना चाहता है और उसे अपने साथ सबूत के तौर पर वापस ले जाना चाहता है. लेकिन रुको, मि. फ्रेडरिकसन और रसेल ऐसा नहीं होने देंगे. वो केविन को उसके बच्चों तक पहुँचायेंगे. और यहाँ से शुरु होता है आसमान में उठा-पटक का एक रोमांचकारी सफर. जिसमें एक ओर हैं चार्ल्स के बोलने वाले कुत्तों की फ़ौज और दूसरी तरफ़ है मि. फ्रेडरिकसन, रसेल, केविन और डग की चतुर चौकड़ी. ये चतुर चौकड़ी चार्ल्स को ख़ूब नाच नचाती है और आखिर में केविन अपने प्यारे बच्चों तक पहुँच जाती है. मि. फ्रेडरिकसन रसेल के साथ वापस अपनी दुनिया लौट जाते हैं और रसेल के प्यारे दादा और डग के मास्टर बन जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p>क्या तुम जानते हो?</p>
<p>-<strong> ’अप’</strong> को इस साल का सर्वश्रेष्ठ एनीमेशन फ़िल्म का ऑस्कर पुरस्कार मिला है.</p>
<p>- इसके साथ ही <strong>’अप’</strong> सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए भी नामांकित हुई थी. यह सम्मान पाने वाली ’अप’ सिर्फ़ दूसरी एनीमेशन फ़िल्म है. इस सूची का पहला नाम थी फ़िल्म <strong>’ब्यूटी एंड द बीस्ट’ </strong>जो सन 1991 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी.</p>
<p>- फ़िल्म के निर्देशक को घर के ऊपर गुब्बारे लगा घर सहित उड़ जाने वाला मज़ेदार ख़्याल दरअसल असल ज़िन्दगी की परेशानियों से ऊबकर आया था.</p>
<p>- मि. फ्रेडरिकसन का किरदार हॉलीवुड के ही मशहूर अदाकार स्पेंसर ट्रेसी जैसा दिखता है. उनकी फ़िल्म <strong>&#8216;Guess who&#8217;s coming to dinner&#8217;</strong> मेरी आल टाइम फ़ेवरेट फ़िल्म है.</p>
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		<title>बंजारा नमक लाया</title>
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		<comments>http://mihirpandya.com/2010/02/banjara-namak-laya/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 09:14:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>
		<category><![CDATA[गाँव]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>

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		<description><![CDATA[
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है.

प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं प्रभात की उन कविताओं को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रभात</strong> की कविताओं की नई किताब <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> आई है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-368" title="IMG_2656" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg" alt="IMG_2656" width="306" height="501" /></a>प्रभात </strong>हमारा दोस्त है.<strong> प्रभात</strong> की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में <strong>’एकलव्य’</strong> पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं <strong>प्रभात</strong> की उन कविताओं को ख़ास नोटिस करता हूँ जहाँ वह हमारे साहित्य में ’क्रूर, हत्यारे शहर’ के बरक्स गाँव की रूमानी लेकिन एकतरफ़ा बनती छवि को तोड़ते हैं. यहाँ मेरी पसंदीदा कविता <strong>’मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में’</strong> आपके सामने है. उनका गाँव हिन्दुस्तान का जीता-जागता गाँव है, अपनी तमाम बेइंसाफ़ियों के साथ. लेकिन इससे उनका गाँव बेरंग नहीं होता, बेगंध नहीं होता. तमाम बेइंसाफ़ियों के बावजूद उसका रंग मैला नहीं होता. एक ’सत्तातंत्र’ गाँव में भी है और उसका मुकाबला भी उतना ही ज़रूरी है. <strong>प्रभात</strong> जब ’गाँव’ की बेइंसाफ़ियों पर सवाल करते हैं तो यह उस ’सत्तातंत्र’ पर सीधा सवाल है. <strong>प्रभात</strong> की कविता ’गाँव’ का पक्ष नहीं लेती, बल्कि गाँव के भीतर जाकर ’सही’ का पक्ष लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा हमारे दोस्त <strong>प्रमोद</strong> ने भूमिका में लिखा है कि ’पानी’ <strong>प्रभात</strong> की कविता का सबसे मुख्य किरदार है. होना भी चाहिए, राजस्थान पानी का कितना इंतज़ार करता है, पानी हमारे मानस का मूल तत्व हो जैसे. और उनकी कविता ’या गाँव को बंटाढार बलमा’ मैं यहाँ न समझे जाने का जोख़िम उठाते हुए भी दे रहा हूँ, ऐसा गीत विरले ही लिखा जाता है. कितना सीधा, सटीक. फिर भी कितना गहरा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और वजह से यह किताब ख़ास है. इस किताब में दोस्ती की मिठास है. कैसे एक दोस्त कविताएं लिखता है, दूसरा दोस्त उन कविताओं को एक बहुत ही ख़ूबसूरत किताब का रूप देता है और तीसरा दोस्त अपना लाड़ लड़ाता है एक प्यारी सी भूमिका लिख कर. मैंने बचपन में अपनी छोटी-छोटी, मिचमिचाई आँखों से इन दोस्तियों को बड़े होते देखा है. कभी ये सारे अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, कोई चित्रकार है तो कोई मास्टर. कोई संपादक हो गया है तो कोई बड़ा अफसर. कोई किसी अख़बार में काम करती है तो कोई दिखाई ही नहीं देता कई-कई साल तक. लेकिन फिर अचानक किसी दिन ये मिलकर <strong>’वितान’</strong> हो जाते हैं. और इन्हें जोड़ने का सबसे मीठा माध्यम हैं <strong>प्रभात</strong> की कविताएं. इन सारे दोस्तों को थोड़ा सा कुरेदो और <strong>प्रभात</strong> की एक कविता निकल आती है हरेक के भीतर से.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आप <strong>प्रभात</strong> की कविताएं पढ़ना और सहेजना चाहें तो इस सुंदर सी किताब को <strong>विश्व पुस्तक मेले</strong> में <strong>’एकलव्य’</strong> की स्टॉल <strong>(हॉल न.12A/ स्टॉल न.188)</strong> से सिर्फ़ साठ रु. देकर ख़रीद सकते हैं. यहाँ इस किताब से मेरी पसंदीदा कविताओं के अलावा मैं <strong>प्रमोद</strong> की लिखी भूमिका भी उतार रहा हूँ.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>ज़मीन की बटायी</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">सिर्फ़ चार के खाते है सैंकड़ो बीघा ज़मीन<br />
कुछ छह-छह बीघा में हैं बाकी सारे भूमिहीन<br />
भूमिहीन हैं जो मज़दूर मज़लूम हैं<br />
ज़िन्दा हैं मगर ज़िन्दगी से महरूम हैं<br />
जीना क्या है जीना दुखदायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ठसक रुपैये की किसी में ऎंठ लट्ठ की<br />
बड़ी पूछ बाबू तेरे गाँव में मुँहफट्ट की<br />
बड़ी पूछ उनकी जो कि छोटे काश्तकार हैं<br />
शामिल जो ज़मींदारों के संग अनाचार में<br />
चारों खण्ड गाँव घूमा पाया यही घूम के<br />
सबके हित एक से सब बैरी मज़लूम के<br />
दुखिया की नहीं सुनवायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में<br />
ऋण लेर सेर घी छँडायौ तो पै रामजी<br />
अन्न का दो दाणा भी तो दै रै म्हारा रामजी</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का<br />
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का<br />
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं<br />
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं<br />
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं<br />
जानेवाले जाने कैसी पीर छोड़ जाते हैं<br />
परदेसी तेरी अटारी राँय-बाँय रहती है<br />
मौत के सन्नाटे जैसी साँय-साँय रहती है<br />
ऎसी ना हो किसी की रुसवायी मेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी मेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>भाई रे</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ऋतुओं की आवाजाही रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खजूरों को लू में ही<br />
पकते हुए देखा<br />
किसानों को तब मेघ<br />
तकते हुए देखा<br />
कुँओं के जल को<br />
उतरते हुए देखा<br />
गाँवों के बन को<br />
झुलसते हुए देखा<br />
खेतों को अगनी में<br />
तपते हुए देखा<br />
बर्फ़ वाले के पैरों को<br />
जलते हुए देखा<br />
गाते हुए ठंडी-मीठी बर्फ़<br />
दूध की मलाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">जहाँ से उठी थी पुकारें<br />
वहाँ पर पड़ी हैं बौछारें<br />
बैलों ने देखा<br />
भैंस-गायों ने देखा<br />
सूखें दरख़्तों की<br />
छावों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">नीमों बबूलों से ऊँची-ऊँची घासें<br />
ऎसी ही थी इनकी गहरी-गहरी प्यासें<br />
सूखे हुए कुँए में मरी हुई मेंढकी<br />
ज़िन्दा हुई टर-टर टर्राई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आल भीगा पाल भीगा<br />
भरा हुआ ताल भीगा<br />
आकाश पाताल भीगा<br />
पूरा एक साल भीगा<br />
बरगदों में बैठे हुए<br />
मोरों का शोर भीगा<br />
आवाज़ें आई घिघियाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">गड़रियों ने देखा<br />
किसानों ने देखा<br />
ग्वालों ने देखा<br />
ऊँट वालों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बारिश की अब दूर<br />
चली गई झड़ियों को<br />
खेतों में उखड़ी<br />
पड़ी मूँगफलियों को<br />
हल्दी के रंग वाले<br />
तितली के पर वाले<br />
अरहर के फूलों को<br />
कोसों तक जंगल में<br />
ज्वार के फूलों को</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">दूध जैसे दानों से<br />
जड़े हुए देखा<br />
खड़े हुए बाजरे को<br />
पड़े हुए देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">चूहों ने देखा<br />
बिलावों ने देखा<br />
साँपों ने देखा<br />
सियारों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आते हुए जाड़े में<br />
हरेभरे झाड़ों की<br />
कच्ची सुगंध महमहायी रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>बंजारा नमक लाया</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">साँभर झील से भराया<br />
भैंरु मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बर्फ़ जैसी चमक<br />
चाँद जैसी बनक<br />
चाँदी जैसी ठनक<br />
अजी देसी नमक<br />
देखो ऊँटगाड़ी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कोई रोटी करती भागी<br />
कोई दाल चढ़ाती आई<br />
कोई लीप रही थी आँगन<br />
बोली हाथ धोकर आयी<br />
लायी नाज थाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">थोड़ा घर की खातिर लूँगी<br />
थोड़ा बेटी को भेजूँगी<br />
महीने भर से नमक नहीं था<br />
जिनका लिया उधारी दूँगी<br />
लेन देन की मची है धूम<br />
घर गुवाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कब हाट जाना होता<br />
कब खुला हाथ होता<br />
जानबूझ कर नमक<br />
जब ना भूल आना होता<br />
फ़ीके दिनों में नमक डाला<br />
मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>या गाँव को बंटाढार बलमा</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">याकी कबहुँ पड़े ना पार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">इसकूल कू बनबा नाय देगौ<br />
बनती इसकूल को ढाय देगौ<br />
यामैं छँट-छँट बसे गँवार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या कू एक पटैलाँई ले बैठी<br />
काँई सरपंचाई ले बैठी<br />
बोटन म लुटाया घरबार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">छोरी के बहयाव म लख देगौ<br />
छोरा के म दो लख लेगौ<br />
छोरा-छोरी कौ करै ब्यौपार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या की छोरी आगे तक रौवै है<br />
पढबा के दिनन कू खोवै है<br />
चूल्हा फूँकै झकमार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या का छोरा बिंगड़ै कोनी पढै<br />
दस्सूई सूँ आगै कोनी बढै<br />
इनकू इस्याई मिल्या संस्कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">पैलाँई कमाई कम होवै<br />
ऊपर सूँ कुरीति या ढोवै<br />
बात-बात म जिमावै बामण चार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कुटमन की काँई चलाई लै<br />
भाई कू भाई देख जलै<br />
यामै पनपै कैसे प्यार बलमा<br />
या गाँव कौ बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बनती कोई बात बनन ना दे<br />
करै भीतर घात चलन ना दे<br />
यामै कैसै सधै कोई कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">यामै म्हारी कोई हेट नहीं<br />
दिनरात खटूँ भरै पेट नहीं<br />
या गाँव म डटूँ मैं काँई खा र बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-379" title="IMG_2652" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg" alt="IMG_2652" width="247" height="430" /></a>इस किताब का नाम <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> नहीं होता तो क्या हो सकता था? शायद <strong>’प्रिय पानी’</strong> हो सकता था. इसका एक बड़ा हिस्सा है जो पानी की कथा कहता है, पानी को याद करता है. पानी वहाँ एक स्मृति है, पानी वहाँ जीवन है, पानी अपने आप में संगीत है. उसकी अपनी ध्वनियाँ हैं. गिरने की, बरसने की. फिर ऎसा क्या रहा होगा जो किताब का नाम सिर्फ़ एक गीत के नाम पर रख दिया गया होगा. दरअसल यह भी एक कहानी जैसा है कि कोई गीत अपनी ही किताब पर भारी पड़े. मगर गीत में यह वज़न आया कहाँ से है? तो वह आया है इसकी प्रसिद्धि से. दरअसल प्रभात का यह गीत लिखे जाने के दिन से ही इतना प्रसिद्ध हुआ है कि इसे नज़र अंदाज करना किसी भी किताब में किन्हीं भी गीतों के बीच मुश्किल होता. राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के जिन-जिन इलाकों में इसे किसी ने गा दिया यह तुरंत ही वहाँ के लोगों की ज़बान पर चढ़ गया और उन्होंने इसे अपनाकर प्यार देना शुरु कर दिया. यह बात इस ओर भी संकेत करती है कि उदार बाज़ारवाद के इन दिनों में इन सभी इलाकों में कहीं ना कहीं जीवन इतना ही संघर्षमय है कि उन्हें नमक जैसी चीज़ पर लिखा गया गीत अपनी ज़रूरत महसूस होता है. इस गीत की खूबसूरती है कि इसमें एक तरफ़ तो नमक के इतने सुन्दर बिम्ब हमें मिलते हैं और दूसरी तरफ़ उसी नमक के लिए ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पूरी जटिलता के साथ उपस्थित है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस किताब में दो-तीन तरह के मिजाज़ के गीत हैं. एक वे जो सीधे-सीधे प्रकृति की सुन्दरता को प्रगट करते हैं. दूसरे वे जो प्रतिरोध की आवाज़ बन जाते हैं, तीसरे वे जो जीवन को उसकी वास्तविकता में बहुत ही मार्मिक ढंग से कहते हैं और चौथे वे जो पारंपरिक मिथक कथाओं को लेकर एक ख़ास शैली में लिखे गए हैं. इस शैली को ’पद गायन’ की शैली कहते हैं और यह राजस्थान के माळ, जगरौटी इलाके (करौली, सवाईमाधोपुर व दौसा ज़िले) में मीणा व अन्य जातियों द्वारा गाए जाते हैं. यही कारण है कि किताब को इस शैली के प्रसिद्ध कवि एवं लोक गायक धवले को समर्पित किया गया है. किताब में दो भाषाएं हैं जो हमारी बहुभाषिक संस्कृति की बानगी हैं. कुछ गीत खड़ी बोली हिन्दी में हैं, कुछ उस माळ की भाषा में जो प्रभात की संवेदनात्मक ज़मीन है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह किताब इस बात की गवाह है कि काव्य किस भाषा में है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह किस चेतना के साथ है. <strong>’सीता वनवास’</strong> पद की काव्य चेतना वह सारे सवाल हमारी मनुष्य सभ्यता के सामने खड़े करती है जिनकी अपेक्षा हम आज की किसी भी कविता से करना चाहेंगे. इसी तरह चाहे वह खड़ी बोली हिन्दी में लिखा <strong>’धरती राजस्थानी है’</strong> हो या माळ की भाषा में लिखा <strong>’काळी बादळी’</strong>. दोनों में ही सूखे व अकाल की विभीषिका को व्यक्त करने वाली काव्य चेतना बहुत नज़दीक की है. इस किताब से गुज़रते हुए दो-तीन तरह की अनुभूतियाँ हो सकती हैं. एक स्थिति है जब आप नई भाषा व उसमें आए प्रकृति के नए बिम्बों के काव्य रसास्वादन से कुछ खुश व समृद्ध महसूस करते हैं. दूसरी स्थिति है जब वास्तविकता के वर्णन में काव्य की मार्मिकता आपको अन्दर तक भर देती है और आप उदास महसूस करते हैं. और तीसरी स्थिति है जब आप अपने समय पर किए जा रहे सवालों में शामिल हो जाते हैं, स्थितियों के प्रतिरोध के स्वर में शामिल हो जाते हैं, और अपने भीतर बदलाव की कोशिश करने की एक ताकत महसूस करने लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जब सपनों को सच में बदलने की ज़िद की जाती है तो वे विचार या कला की शक्ल लेते हैं. यह किताब देखे गए सपनों में से कुछ का सच में बदलना है. सपनों का वह हिस्सा जिसे आप अपने दम पर पूरा करने की कोशिश भर कर सकते हैं. <strong>&#8211;प्रमोद</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-375" title="Book cover" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg" alt="Book cover" width="650" height="495" /></a></strong></p>
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		<title>हरिश्चंद्राची फैक्टरी</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jan 2010 12:51:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.


इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे?
अच्छा जब तक तुम अपने मन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify; "><strong>यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है.</strong></p>
<p style="text-align: justify; ">
<p style="text-align: justify; "><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/harishchandrachi-factory.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-326" title="harishchandrachi factory" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/harishchandrachi-factory-224x300.jpg" alt="harishchandrachi factory" width="224" height="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify; ">इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे?</p>
<p style="text-align: justify; ">अच्छा जब तक तुम अपने मन का जवाब सोचो तब तक मैं तुम्हें बताता हूँ कि जब ऐसे ही आज से तकरीबन सौ साल पहले धुंडीराज गोविन्द फालके को मूवी कैमरा मिला तो उन्होंने किस चीज़ का वीडियो बनाया? अब तुम पूछोगे कि ये अजीब से नाम वाले ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ कौन हुए? अरे बताऊँगा, लेकिन पहले किस्सा तो पूरा सुनो. उन्होंने पहला वीडियो बनाया एक उगते हुए पौधे का. अब तुम कहोगे कि उगते हुए पौधे का कोई वीडियो कैसे बना सकता है. अरे भई पौधा कोई एक दिन में थोड़े न उग आता है कि बस कैमरा लगाया और बन गया वीडियो. पहले बीज डालो, फिर पानी डालो और लगातार उसकी देखभाल करो. तब हफ़्तों में कहीं जाकर एक बीज से पौधा तैयार होता है.</p>
<p style="text-align: justify; ">ठीक कहा तुमने. लेकिन फालके भी इतनी आसानी से हार मानने वाले कहाँ थे. उन्होंने इसके लिए एक अद्भुत तरकीब खोजी. उन दिनों हाथ से हैंडल घुमाकर चलाने वाले फ़िल्म कैमरा आते थे. तो फालके साहब ने क्या किया कि कैमरा गमले के ठीक सामने रख दिया और बिना उसे अपनी जगह से हिलाए वो रोज़ एक तय समय पर उसका हैंडल घुमा देते थे. ऐसा उन्होंने एक महीने तक लगातार लिया. फिर उस पूरी रील को धोकर एक साथ प्रोजेक्टर पर चलाया. और चमत्कार! ऐसा लगा जैसे हमने अपनी आँखों के सामने एक पौधा उगते देखा हो.</p>
<p style="text-align: justify; ">और यही थी हिन्दुस्तान में बनी पहली चलती-फिरती फ़िल्म. और इसे बनानेवाले थे ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ या दादासाहब फालके.</p>
<p style="text-align: justify; ">मुझे भी यह सब पहले से कहाँ पता था. हिन्दुस्तान में बनी पहली फ़िल्म की यह कहानी और उसके साथ जुड़ी दादा साहब फालके की कहानी का मुझे पता चला नई मराठी फ़िल्म <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishchandrachi_Factory" target="_blank">’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ </a></strong>से. निर्देशक परेश मोकाशी की बनाई यह फ़िल्म दादा साहब फालके के जीवन पर आधारित है. दादा साहब फालके हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक थे. उन्होंने ही हिन्दुस्तान में फ़िल्म निर्माण की शुरुआत की और उन्हें हिन्दुस्तानी फ़िल्म उद्योग का पितामह माना जाता है. आज भी भारत सरकार फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदान के लिए जो सबसे बड़ा सम्मान देती है उसे ’दादा साहब फालके’ सम्मान कहा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify; ">लेकिन यह इतना आसान नहीं था. फ़िल्म बनाना तब नई-नई कला थी. हिन्दुस्तान में उस वक़्त फ़िल्म बनाने के बारे में कोई भी ठीक से नहीं जानता था. तरह तरह की अफ़वाहें फैली हुई थीं सिनेमा के बारे में. कोई कहता था यह आदमी से उसकी शक्ति छीन लेती है और कोई इसे अंग्रेज़ों का जादू-टोना बताता था. लेकिन गोविन्द फालके हमेशा से विज्ञान में रुचि रखते थे. विज्ञान से इसी गहरे लगाव के चलते उन्होंने फोटोग्राफी का व्यवसाय भी किया था और खुद जादू भी सीखा था. पहली बार अंग्रेज़ों के थियेटर में फ़िल्म देखकर वे इतने चमत्कृत हुए कि उन्होंने ऐसी ही फ़िल्म भारत में भी बनाने की ठान ली. क्योंकि यहाँ कोई इस कला के बारे में जानता नहीं था इसलिए उन्होंने अपने घर का सामान बेचा और जहाज़ से इंग्लैंड की यात्रा पर निकल पड़े. इंग्लैंड में रहकर उन्होंने फ़िल्म बनाने की पूरी कला सीखी. जब भारत वापस आये तो अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मिलकर फ़ैसला कर लिया कि हिन्दुस्तान की पहली फ़िल्म बनायेंगे. उन्हें उनके दोस्त अपनी ’घर फूँक, तमाशा देख’ प्रवृत्ति के कारण सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहते थे. तो उन्होंने भी तय किया कि पहली फ़िल्म सत्यवादी ’राजा हरिश्चन्द्र’ पर ही बनायेंगे.</p>
<p style="text-align: justify; ">फ़िल्म बनाते हुए भी बहुत सी मुश्किलें आईं. उस दौर में महिलाओं का नाटकों में काम करना बुरा माना जाता था और फ़िल्म तो वैसे भी एकदम नया माध्यम थी, कोई महिला फ़िल्म में काम करने को तैयार न हुई. ऐसे में पुरुषों को ही स्त्रियों के कपड़े पहन कर उनके रोल निभाने पड़े. और भी मुसीबतें थीं. फ़िल्म में स्त्रियों का रोल करने वाले पुरुष अपनी मूँछे मुंडवाने को तैयार नहीं थे. ऐसी मान्यता जो है कि मूँछें सिर्फ़ पिता की मौत के बाद मुंडवाते हैं. बड़ी मुश्किल से अभिनेता माने. फिर भी समाज में फ़िल्म में काम करने वालों को बुरी नज़र से देखा जाता था. इस मुश्किल के हल के लिए फालके ने कहा कि सारे लोग ये कहा करें कि वे ’फ़ैक्टरी’ में काम करते हैं, फ़िल्म बनाने वाली फ़ैक्टरी!</p>
<p style="text-align: justify; ">मई उन्नीस सौ तेरह में ’राजा हरिश्चन्द्र’ प्रदर्शित हुई और खूब सराही गई. सन उन्नीस सौ चौदह में फालके को फिर लंदन जाने का मौका मिला और वहाँ उनकी फ़िल्में बहुत सराही गईं. उन्हें वहाँ रहकर फ़िल्म बनाने के प्रस्ताव भी दिये गए लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तान में फ़िल्म उद्योग की स्थापना का जो सपना देखा था उसे पूरा करना उनका सबसे मुख्य ध्येय था. उन्होंने हिन्दुस्तान में ही रहकर सौ से ज़्यादा फ़िल्में बनाईं और भारत में फ़िल्म उद्योग की विधिवत शुरुआत की.</p>
<p style="text-align: justify; ">‘हरिश्चन्द्र फ़ैक्टरी’ के निर्देशक परेश मोकाशी ने फ़िल्म में दादा साहब फालके को एक ऐसे जुझारू इंसान के रूप में पेश किया है जिसने हर परेशानी का हँसकर सामना किया. फ़िल्म में एक घटना का ज़िक्र आता है. लगातार फ़िल्में देखते हुए एक रोज़ उन्हें आँखों में बहुत तकलीफ़ हुई और डॉक्टर को दिखाने पर उसने आँखों की रौशनी जाने की आशंका व्यक्त की. फालके यह सुनकर उदास हो गए. इसलिए नहीं कि आँखों की रौशनी चली जायेगी बल्कि इसलिए कि अगर उनकी आँखों की रौशनी चली गई तो फिर उनका फ़िल्म बनाने का सपना अधूरा जो रह जायेगा. ऐसे थे दादा साहब फालके!</p>
<p style="text-align: justify; ">*****</p>
<p style="text-align: justify; ">क्या तुम जानते हो:-</p>
<ul style="text-align: justify; ">
<li><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dadasaheb-phalke1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-332" title="dadasaheb-phalke" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dadasaheb-phalke1.jpg" alt="dadasaheb-phalke" width="196" height="340" /></a>फालके ने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की थी. उन्होंने कला भवन, बड़ौदा से मूर्तिकला और फोटोग्राफी सीखी. फिर उन्होंने गुजरात के गोधरा में एक फोटोग्राफी स्टूडियो खोला. लेकिन वो चला नहीं, लोगों में यह अफ़वाह जो फैल गई थी कि फोटो खिंचवाने से आदमी की ताक़त नष्ट हो जाती है.</li>
<li>वे प्रक्षिशित जादूगर भी थे. वे ’केल्फा’ नाम से जादू दिखाते थे. केल्फा मतलब समझे? अरे उनके नाम फालके का उल्टा केल्फा!</li>
<li>उन्होंने आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए भी काम किया. फिर उन्होंने अपनी प्रिटिंग प्रेस भी खोली. यहाँ उन्होंने महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के लिए भी काम किया.</li>
<li>जो पहली फ़िल्म दादा साहब फालके ने देखी थी वो थी ’लाइफ़ ऑफ़ क्राइस्ट’ और साल था उन्नीस सौ बारह.</li>
<li>दादासहब फालके की बनाई फ़िल्म ’राजा हरिश्चन्द्र’ जो हिन्दुस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म थी प्रदर्शित हुई 3 मई 1913 को और थियेटर था कोरोनेशन थियेटर, मुम्बई.</li>
<li>आगे चलकर उन्होंने अपनी फ़िल्म निर्माण कम्पनी स्थापित की जिसका नाम रखा ’हिन्दुस्तान फ़िल्म कम्पनी’.</li>
<li>भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले धुंडीराज गोविन्द फालके के सम्मान में उनके नाम पर भारत सरकार ने सन 1969 में ’दादा साहब फालके’ पुरस्कार की शुरुआत की. यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष था. यह पुरस्कार किसी व्यक्ति को सिनेमा के क्षेत्र में जीवन भर के अविस्मरणीय योगदान के लिए प्रदान किया जाता है. पहले साल इस पुरस्कार को गृहण करने वाली अभिनेत्री थीं देविका रानी. साल 2007 के लिए यह पुरस्कार गायक मन्ना डे को दिया गया है. और इस साल गुरुदत्त की फ़िल्मों के लाजवाब सिनेमैटोग्राफर  वी. के. मूर्ति को.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify; ">*****</p>
<p style="text-align: justify; ">अरे जिस सवाल से बात शुरु की थी वो तो अधूरा ही रह गया. वही वीडियो बनाने वाला. चलो मैं तुम्हें अपने मन की बात बताता हूँ. जब मैं छोटा था तो हर बरसात के मौसम में हमारे बगीचे में एक कुतिया छोटे-छोटे पिल्ले देती थी. पहले-दूसरे दिन तो वो इतने छोटे होते कि उनके मुँह भी ठीक से नज़र नहीं आते. वे बिलकुल गुलाबी होते. मुझे उनसे बहुत ही प्यार था. फिर तेज़ी से वो बड़े होने लगते. इधर-उधर भागते. मैं उन्हें एक के ऊपर एक रख देता और वो फिसल-फिसलकर नीचे गिरते. वे अलग-अलग पहचान में आने लगते. मैं उनके अलग-अलग नाम रख देता. चिंटू, प्यारू, भूरू, कालू. उनके साथ खेलने में बहुत मज़ा आता. इस पूरे दौर में उनमें से कुछ मर भी जाते. अगर मुझे कोई उस वक़्त वीडियो कैमरा दे देता तो मैं उनकी वीडियो ज़रूर बनाता. छोटे पिल्लों से बड़े होने की यात्रा. खूब सारी मस्ती और मज़ा. कितना मज़ेदार ख्याल है न! तुम बताओ, किसका वीडियो बनाते?</p>
<p style="text-align: justify; ">**********</p>
<p style="text-align: justify; "><strong>एकलव्य की बाल-विज्ञान पत्रिका ’चकमक’ के दिसंबर अंक में प्रकाशित.</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>कितने आदमी थे! उर्फ़ हिन्दी सिनेमा का अजब-गजब संवाद लेखन</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/</link>
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		<pubDate>Thu, 10 Sep 2009 20:20:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[
यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. काश वे भी इसे पूरा पढ़ पाते&#8230;
जब हमारे दोस्त सुशील ने मुझे हिन्दी फ़िल्मों में आए मेरे पसंदीदा संवादों के बारे में लिखने के लिए कहा तो पहले तो मैं खुश हो गया. मैंने उनसे भिड़ते ही कहा.. अरे इसमें कौनसी बड़ी बात है! मैं तो एक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह लेख <a href="http://eklavya.in/go/index.php?option=com_content&amp;task=category&amp;sectionid=13&amp;id=57&amp;Itemid=84" target="_blank">’चकमक’</a> के बच्चों से मुख़ातिब है. काश वे भी इसे पूरा पढ़ पाते&#8230;</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/deewaar1.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-207" title="deewaar1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/deewaar1-150x150.jpg" alt="deewaar1" width="150" height="150" /></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/sholay-poster1.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-208" title="sholay-poster1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/sholay-poster1-150x150.jpg" alt="sholay-poster1" width="150" height="150" /></a>जब हमारे दोस्त सुशील ने मुझे हिन्दी फ़िल्मों में आए मेरे पसंदीदा संवादों के बारे में लिखने के लिए कहा तो पहले तो मैं खुश हो गया. मैंने उनसे भिड़ते ही कहा.. अरे इसमें कौनसी बड़ी बात है! मैं तो एक पूरा लेख सिर्फ़ <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Deewaar_(1975_film)" target="_blank"><strong>’दीवार’</strong></a> के संवादों पर लिख सकता हूँ. &#8220;जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ..&#8221; और &#8220;खुश तो बहुत होगे तुम..&#8221; जैसे संवादों को कौन भूल सकता है. आज भी अमिताभ को चाहनेवाले बार-बार इन्हीं संवादों को उनके मुंह से सुनने की फ़रमाइश करते हैं. और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sholay" target="_blank"><strong>’शोले’</strong></a>! वो तो क्लासिक संवादों की खान है. जो भी निकाल कर लाओ.. हीरा ही हाथ आएगा! अमजद खान को आज भी पूरे देश में अपने असल नाम से कम और ’गब्बर सिंह’ के नाम से ज़्यादा जाना जाता है. मैकमोहन ’सांबा’ के रोल में और विजू खोटे ’कालिया’ के रोल में हिन्दी सिनेमा इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए. पिछले दिनों हमारे घरों में मौजूद बुद्धू बक्से पर राजू श्रीवास्तव ने जिस तरह से शोले के संवादों की पैरोडी बनाकर नाम कमाया है उसे भी शोले के अमर संवादों की तारीफ़ में पिरोई जाती माला में एक मोती ही माना जाएगा. वैसे यह भी कहा जाता है कि जिस फ़िल्म के संवादों की सबसे ज़्यादा पैरोडी हो वही सबसे बड़ा सबूत है उन संवादों की लोकप्रियता का. शोले के संवाद तो आम जनमानस में मुहावरे की तरह प्रचलित हो गए हैं. किसी भी दोस्त पर अचानक कोई बिन बुलाई मुसीबत आ जाए तो उसे मज़ाक में &#8220;तेरा क्या होगा कालिया?&#8221; कह ही दिया जाता है. इन संवादों के पीछे सलीम-जावेद की चमत्कारिक जोड़ी थी जिसने वक़्त की नब्ज़ को पहचाना और ’एंग्री यंग मैन’ किरदार की रचना कर हिन्दी सिनेमा को बदलकर रख दिया.</p>
<p>लेकिन कुछ देर बाद ही मुझे समझ आया कि सुशील तो मुझसे मेरे पसंदीदा फ़िल्म संवाद पूछ रहा है. तो उसमें मेरा भी तो कुछ व्यक्तिगत होना चाहिए न. दीवार और शोले तो हम सबकी पसंदीदा फ़िल्में हैं ही लेकिन मैं आज तुम्हें तीन ख़ास फ़िल्मों के संवादों से रू-ब-रू करवाउँगा. इन तीन फ़िल्मों के महत्वपूर्ण संवादों में एक बात इकसार है और वही बात मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित करती है. और यह बात सिनेमा में संवादों का असल अर्थ समझने में भी कारगर है. इत्तेफ़ाक से ये तीनों ही फ़िल्में मेरे दिल के बहुत करीब हैं. आगे वही ख़ासियत तुम और फ़िल्मों में भी तलाश सकते हो. क्या पता ऐसी खूबियाँ और फ़िल्मों में भी मिल जाएँ. तो बात शुरु करते हैं&#8230;</p></blockquote>
<blockquote><p><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anand_(film)" target="_blank"></a></strong></p></blockquote>
<p><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anand_(film)" target="_blank"></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/anand_film.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-203" title="anand_film" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/anand_film-150x150.jpg" alt="anand_film" width="150" height="150" /></a>आनंद<br />
निर्देशक- ऋषिकेश मुखर्जी<br />
संवाद- गुलज़ार<br />
</strong><br />
रिषिकेश मुखर्जी की ’आनंद’ का वो अमर संवाद तो तुम्हें याद होगा. अरे इस संवाद की लोकप्रियता का आलम यह था कि लम्बे समय तक अमिताभ को उनके दोस्त और चाहनेवाले ’बाबू मोशाय’ कह कर ही बुलाते रहे थे! फ़िल्म के क्लाईमैक्स में आया यह संवाद सबको हिलाकर रख देता है, &#8220;बाबू मोशाय! ज़िन्दगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह, उसे ना तो आप बदल सकते हैं न मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपरवाले के हाथों में बंधी है. कब, कौन, कैसे उठेगा यह कोई नहीं बता सकता है. हा हा हा हा हा हा . . . . .&#8221; अगर तुमने फ़िल्म देखी हो तो तुम याद कर पाओगे कि फ़िल्म में यह संवाद तीन बार आता है. क्यों नहीं याद आया? चलो मैं याद दिलाता हूँ. दरअसल आनंद (राजेश खन्ना) के नए बने दोस्त ईसा भाई (जॉनी वाकर) एक थियेटर कंपनी चलाते हैं. आनंद वहाँ एक नाटक की रिहर्सल में यह संवाद पहली बार सुनता है. नाटक मशहूर फ़िल्म ’मुगल-ए-आज़म’ की कहानी पर आधारित है और असल में यह संवाद शहज़ादा सलीम अपने अब्बा हुज़ूर अकबर को बोल रहे हैं. आनंद को यह संवाद इतना पसंद आता है कि वो घर आकर ’बाबू मोशाय’ (अमिताभ बच्चन) के टेप रिकार्डर पर भी यही संवाद रिकॉर्ड करवाता है. इसे रिकॉर्ड करने के बाद दोनों दोस्त खूब हँसते हैं. लेकिन इस संवाद की कहानी अभी बाकी है.</p>
<p>कहानी के क्लाईमैक्स पर, आनंद की मौत के ठीक बाद यह संवाद लौटकर आता है और एक बिलकुल नया और मार्मिक रूप ग्रहण करता है. जैसे ही आनंद की साँसें रुकती हैं पीछे से आनंद की आवाज़ गूंजती है, &#8220;बाबू मोशाय!&#8221;. रिकार्डेड टेप चल पड़ा है.. &#8220;ज़िन्दगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह, उसे ना तो आप बदल सकते हैं न मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपरवाले के हाथों में बंधी है. कब, कौन, कैसे उठेगा यह कोई नहीं बता सकता है. हा हा हा हा हा हा . . . . .&#8221; ऐसा लगता है कि खुद आनंद अपनी मौत पर आँसू बहाते दोस्तों को जीवन का असल दर्शन समझा रहा है. एक ऐसा जीवन दर्शन जिसमें शामिल है कि ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं. और पीछे रह जाती है उसकी हँसी. ढेर सारी हँसी&#8230; खिलखिलाती, निश्चल हँसी. इस संवाद की असल गहराई इस वक़्त समझ आती है. देखो एक ही संवाद अलग-अलग परिस्थितियों में कैसे अपना अर्थ और गंभीरता बदल लेता है. गुलज़ार के लिखे संवाद इस फ़िल्म की असल जान है. आंनद के किरदार की तरह ही यह अपने भीतर दर्द समेटे दुनिया को खुशी बाँटने की बातें करते हैं. यह फ़िल्म मुझे सिखाती है कि बड़ी बात कहने के लिए हमेशा गंभीरता का दामन थामना ज़रूरी नहीं. इस संवाद की ताकत ही यह है कि यह ज़िन्दगी की बड़ी सच्चाई को एकदम आसानी और सहजता से आपके सामने रख देता है. एकदम आनंद की तरह.</p>
<p><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank"></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/dil_chahta_hai1.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-205" title="dil_chahta_hai1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/dil_chahta_hai1-150x150.jpg" alt="dil_chahta_hai1" width="150" height="150" /></a>दिल चाहता है</strong></p>
<p><strong>निर्देशक- फ़रहान अख़्तर<br />
संवाद- फ़रहान अख़्तर</strong><strong><a href="http://video.yahoo.com/watch/829526/3437513"></a></strong></p>
<p>’दिल चाहता है’ मेरे लिए एक खास फ़िल्म है. मैनें जब यह फ़िल्म पहली बार देखी उस वक़्त मैं सोलह बरस का था. उसके बाद मैंने इसे पचासों बार और देखा. (एक बार हमारे स्वयं प्रकाश अंकल ने मुझे चिट्ठी में लिखा था, &#8220;अब बताओ तो इसे आखिर कित्ती बार ’दिल चाहता है’ देखनी चाहिए!&#8221;) इतनी सहजता मुझे बहुत कम फ़िल्मों में देखने को मिली है. यह मेरे लिए बहुत ही व्यक्तिगत कहानी है लेकिन साथ ही इस फ़िल्म में एक अजीब सी सार्वजनिकता है, दोस्ती की सार्वजनिकता. इसे मैं अकेला भी देखूँ न तो अगले दिन यही कहता हूँ कि &#8220;हमने ’दिल चाहता है’ देखी&#8221;. इसके संवाद हम दोस्तों की साझा धरोहर हैं और बिना संदर्भ हम इसके संवादों को मुहावरों की तरह काम में लेते हैं. आज भी हम हमारे दोस्त रोहित का अभिवादन ’हे रोहित’ कहकर ही करते हैं और इस अभिवादन में ’दिल चाहता है’ का एक बहुत ही मज़ेदार संदर्भ छुपा है. ’दिल चाहता है’ के कुछ संवादों में भी ’आनंद’ जैसी दोहरी अर्थगर्भिता छिपी है. एक बार आकर वे सिर्फ़ मज़ाक हैं तो वही संवाद फ़िल्म में दुबारा बहुत ही गंभीर अर्थ के साथ लौटते हैं.</p>
<p>फ़िल्म का नायक आकाश (आमिर खान) नायिका शालिनी (प्रीति ज़िन्टा) से पहली मुलाकात में यूँ उससे अपने प्यार का इज़हार करता है, &#8220;शालिनी, मैं तुमसे और सिर्फ़ तुमसे प्यार करता हूँ. मेरी हर साँस, मेरी हर धड़कन, मेरे हर पल में तुम हो और सिर्फ़ तुम शालिनी. मुझे यकीन है कि मैं सिर्फ़ इसलिए जन्मा हूँ कि तुमसे प्यार कर सकूँ और तुम सिर्फ़ इसलिए कि एक दिन मेरी बन जाओ. तुम मेरी हो शालिनी, और अगर तुम अपने दिल से पूछोगी तो जान लोगी कि मैं सच कह रहा हूँ.&#8221; लेकिन यह भावुकतापूर्ण संवाद यहाँ सिर्फ़ शुद्ध मज़ाक है और इस मज़ाक के लिए वो मार भी खाता है. बात आई-गई हो जाती है.</p>
<p>लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं हुई है. नायिका नायक की कहानी में लौटकर आती है और उसके साथ लौटकर आता है वही संवाद. फ़िल्म के क्लाईमैक्स में नायक अपनी तमाम उलझनों पर पार पाता है और ’विरोधियों के गढ़’ में ठीक इन्हीं शब्दों में नायिका से अपने प्यार का इज़हार करता है. इसबार प्यार सच्चा है, इज़हार सच्चा है. हम देखते हैं कि संवाद के मायने ही बदल जाते हैं. यहाँ संवाद पहली बार एक पैरोडी के रूप में आता है और दूसरी बार अपने असल रूप में.<br />
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<p><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rang_De_Basanti" target="_blank"></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/rdb_poster1.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-206" title="rdb_poster1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/09/rdb_poster1-150x150.jpg" alt="rdb_poster1" width="150" height="150" /></a>रंग दे बसंती<br />
निर्देशक- राकेश ओमप्रकाश मेहरा<br />
संवाद- प्रसून जोशी, रेंसिल डिसिल्वा</strong></p>
<p>’रंग दे बसंती’ तो फ़िल्म से आगे बढ़कर एक फ़िनोमिना बन चुकी है. अगर तुम याद कर पाओ तो बताओ कि फ़िल्म के नायक करण का फ़िल्म में पहला संवाद क्या था? मैंने एक बहुत खास बात नोटिस की है, फ़िल्म में करण का पहला संवाद था &#8220;नौटंकी साला!&#8221; और गौर से देखने पर साफ़ होता है कि मौत से ठीक पहले करण का आखिरी संवाद भी यही था.. &#8220;नौटंकी साला!&#8221; दोनों बार यह संवाद डी.जे. (आमिर खान) को संबोधित था. बस अंतर यह था कि मौत से ठीक पहले डी.जे. का मज़ाक सबकी आँखों में आँसू भर देता है. लेकिन उसके दोस्त के लिए वो आज भी ’नौटंकी’ है. इतना विश्वास बहुत गहरे जुड़े होने पर ही आता है न. एक ही संवाद आपको पहले हँसाता है और अंत में रुलाता है.</p>
<p>दरअसल यह तीनों उदाहरण इस बात को समझने के लिए हैं कि संवादों का अर्थ हमेशा शब्दों के भीतर नहीं होता. फ़िल्म जैसे माध्यम में परिस्थितियाँ और उसे ज़ाहिर करने की अनेक तकनीकें संवादों का असल अर्थ रचती हैं. बहुत बार तो एक ही बात कई अर्थ अपने भीतर समेटे होती है. संवाद का अर्थ परिस्थितियों के साथ बदल जाता है. और यहीं साफ़ होता है कि ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निर्देशक की होती है. जो संवाद अपनी भावुकता से आपको रुला देता है वही संवाद खराब संपादन और निर्देशन होने पर मैलोड्रामा भी लग सकता है. और एक अच्छा निर्देशक इन दोनों ही रूपों को अपनी इच्छानुसार फ़िल्म में प्रयोग करता है.</p>
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		<title>मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर.</title>
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		<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 11:35:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह कहानी उन लड़कों की है जो &#8216;शहर&#8217; नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. कुछ है जो हम सबमें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>यह कहानी उन लड़कों की है जो &#8216;शहर&#8217; नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. कुछ है जो हम सबमें एकसा है. मुझमें और विशाल में एकसा है. आज जब मैं लौटकर अपने बचपन को देखता हूँ तो मुझे एक &#8216;रहस्यमयी-सा&#8217; अहसास होता है. जैसे बाबू देवकीनंदन खत्री की &#8216;चंद्रकांता&#8217; पढ़नी शुरू कर दी हो. हमारे बचपन और शहर के इस अलगाव का हमारे व्यक्तित्वों पर असर है. बाद में हर दोस्त इस विचार से अपनी तरह से जूझा है. बचपन किसी &#8216;राबिन्सन क्रूसो&#8217; की तरह टापू पर बिताया गया समय है. और अब हम उस टापू को साथ लेकर अपने-अपने &#8216;शहरों&#8217; में घूमते हैं. कुछ परिचित से, कुछ बेमतलब.</em></p>
<p><em>सुशील ने मुझे &#8216;चकमक&#8217; के लिए <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/A._R._Rahman" target="_blank">ए. आर. रहमान </a>पर कुछ लिखने को कहा था. और मैं रहमान पर जो लिख पाया वो ये है. यह सुशील की तारीफ ही है कि चकमक में आकर अब मेरी यह अनसुलझी कहानी हजारों बच्चों के पास पहुँचेगी. शुक्रिया सुशील.</em></p></blockquote>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/A._R._Rahman" target="_blank">ए. आर. रहमान</a> हमारे दौर के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/R_D_Burman" target="_blank">आर. डी. बर्मन</a> हैं. जब हिन्दी सिनेमा ने पंचम को खोया तो लगा था कि एक दौर ख़त्म हो गया है. उनकी <img class="alignright" style="float: right;" src="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:V4Jxsun6sO1-JM:http://www.oakparkjournal.com/stories2004/rahman-2004.jpg" alt="" width="114" height="117" />आखिरी फ़िल्म का गीत &#8216;एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा&#8217; अपने भीतर उस दौर की तमाम खूबसूरती समेटे था तो एक दूसरे गीत &#8216;रूठ न जाना&#8217; में वही शरारत थी जो आर. डी. के संगीत की ख़ास पहचान थी. लगा पंचम के संगीत की अठखेलियाँ और शरारत अब लौटकर नहीं आयेंगे. लेकिन तभी दक्षिण भारत से आई एक डब्ड फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roja" target="_blank">&#8216;रोज़ा&#8217;</a> के गीत &#8216;छोटी सी आशा&#8217; ने हमें चमत्कृत कर दिया. इस गीत में वही बदमाशी और भोलापन एकसाथ मौजूद था जो हम अबतक पंचम के संगीत में सुनते आए थे. ए. आर. रहमान के साथ हमें हमारा खोया हुआ पंचम वापिस मिल गया.</p>
<p>मैं अपने बचपन के दिनों में रहमान के संगीत वाली हर फ़िल्म की ऑडियो कैसेट ज़िद करके ख़रीदा करता था. यह वो समय था जब हमारे घर में नया-नया टेप रिकॉर्डर आया था. हम उसमें अपनी आवाज़ें रिकॉर्ड कर सुनते थे और वो हमें किसी और की आवाज़ें लगती थीं. हम कभी भी अपनी आवाज़ नहीं पहचान पाते थे. और हम उसमें रहमान के गाने सुनते थे. मेरा दोस्त विशाल सांगा बहुत अच्छा डाँस करता था और रहमान की धुनों पर वो एक ख़ास तरह का ब्रेक डाँस करता था जो सिर्फ़ उसे ही आता था. हम दोस्त एक दूसरे के जन्मदिन का बेसब्री से इंतज़ार करते और हर जन्मदिन की पार्टी का सबसे ख़ास आइटम होता विशाल का ब्रेक डाँस. हर बार हम विशाल से कहते कि वो हमें अपना डाँस दिखाए. पहले तो वो आनाकानी करता लेकिन हमारे मनाने पर मान जाता. हम कमरे के सारे खिड़की/दरवाज़े बंद कर लेते. हमें ये बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई और हमें देखे. मैं टेप रिकॉर्डर ऑन करता और कमरे में रहमान का &#8216;हम्मा-हम्मा&#8217; गूंजने लगता. विशाल अपना ब्रेक डाँस शुरू करता और हम बैठकर उसे निहारते. हमें लगता कि वो एकदम &#8216;प्रभुदेवा स्टाइल&#8217; में डाँस करता है. हम भी उसके जैसा डाँस करना चाहते थे. कभी-कभी वो हमें भी उस ब्रेक डाँस का कोई ख़ास स्टेप सिखा देता और हम उसे सीखकर एकदम खुश हो जाते. थोड़ी ही देर में हम सारे दोस्त खड़े हो जाते और सब एकसाथ नाचने लगते. विशाल भी कहता कि जब सब एकसाथ डाँस करते हैं तो उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आता है.</p>
<p>विशाल को भी गानों का बहुत शौक था. खासकर रहमान के गानों का. उसके पास एक वाकमैन था जिसे कान में लगाकर वो रात-रात भर गाने सुना करता था. मैं जब भी कोई नई कैसेट लेकर आता तो वो रातभर के लिए उसे मुझसे माँगकर ले जाता था. और रहमान की कैसेट तो छोड़ता ही नहीं. दिन में मैं रहमान के गाने सुनता और रात में विशाल. उसे हिन्दी ठीक से बोलनी नहीं आती थी. वो अटक अटक कर हिन्दी बोलता और बीच बीच में शब्द भूल जाता था. मेरे नए जूते देखकर कहता, &#8220;छुटकू तेरे ये तो दूसरों के ये से बहुत अच्छे हैं!&#8221; मुझे &#8216;ये&#8217; सुनकर बहुत मज़ा आता था और मैं अपने घर आकर सबको ये बात बताता. लेकिन वो संगीत में जीनियस था. मेरी और उसकी पसंद कितनी मिलती थी. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Se" target="_blank">&#8216;दिल से&#8217;</a> के एक-एक गीत को वो हजारों बार सुनता था. मुझे कहता था, &#8220;पता है छुटकू, ये रहमान की आदत ही ख़राब है. जाने क्या-क्या करता है. अब बताओ, गाने की शूटिंग ट्रेन पर होनी है तो पूरे गाने में ताल की जगह ट्रेन की आवाज़ को ही पिरो दिया. पूरे गाने में ऐसी बीट जैसे कोई लम्बी ट्रेन किसी ऊंचे पुल पर से गुज़र रही हो! कमाल है इसका भी हाँ.&#8221; हम दोनों रहमान के दीवाने थे. याद है ना.. मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर. मैं घर पर माँ से कहता. &#8220;पता है माँ, मेरे तीनों दोस्त इंजिनियर बनेंगे. गौरव और रोहित तो सादा इंजिनियर बनेंगे और विशाल बनेगा म्युज़िक इंजिनियर!&#8221;</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://www.oakparkjournal.com/stories2004/rahman-heaven-earth-2004.jpg" alt="" width="200" height="180" />अब तो कई साल हुए विशाल से मुलाकर हुए. मैं दिल्ली आगे की पढ़ाई के लिए आ गया हूँ और विशाल ने कर्नाटक में अपनी हेंडलूम फैक्ट्री शुरू कर दी है. लेकिन आज भी जब मैं कहीं रेडियो पर &#8216;हम्मा-हम्मा&#8217; सुनता हूँ तो मेरे पाँव में थिरकन होने लगती है और उस वक़्त मुझे विशाल की बहुत याद आती है. और इसीलिए रहमान हमारे दौर के आर. डी. हैं. सबका चहेता. सबसे चहेता.</p>
<p>रहमान को मालूम है कि हम आधे से ज़्यादा पानी के बने हैं. पानी की आवाज़ सबसे मधुर आवाज़ होती है. इसीलिए वो बार-बार अपने गीतों में इस आवाज़ को पिरो देते हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Saathiya" target="_blank">&#8216;साथिया&#8217;</a> में उछालते पानी का अंदाज़ हो या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lagaan" target="_blank">&#8216;लगान&#8217;</a> में गरजते बादलों की आवाज़. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Taal_(film)" target="_blank">&#8216;ताल&#8217;</a> में बूँद-बूँद टपकते पानी की थिरकन हो या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roja" target="_blank">&#8216;रोजा&#8217;</a> में बहते झरने की कलकल. रहमान की सबसे पसंदीदा धुनें सीधा प्रकृति से निकलकर आती हैं. वो नए वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में माहिर हैं और नए गायकों को मौका देने में सबसे आगे. &#8216;दिल से&#8217; के लिए उन्होंने Dobro गिटार का उपयोग किया तो &#8216;मुस्तफा-मुस्तफा&#8217; गीत के लिए Blues गिटार का. अपने गीत &#8216;टेलीफोन-टेलीफोन&#8217; के लिए उन्होंने अरबी वाद्य Ooud का प्रयोग किया.  चित्रा, हेमा सरदेसाई, मुर्तजा, मधुश्री से लेकर नरेश aiyer और मोहित चौहान तक रहमान ने हमेशा नए और उभरते गायकों को मौका दिया है. उनका संगीत लातिन अमेरिका के संगीत को हिन्दुस्तानी संगीत से और पाश्चात्य संगीत को दक्षिण भारतीय संगीत से जोड़ता है. और उनके बहुत से गीतों पर सूफि़याना प्रभाव साफ़  नज़र आता है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Se" target="_blank">&#8216;दिल से&#8217;</a> के गीतों में ये सूफि़याना प्रभाव ही था जिसने उसे रहमान का और हमारे दौर का सबसे खूबसूरत अल्बम बनाया है. ये प्रेम की तड़प को उस हद तक ले जाना है कि वो प्रार्थना में उठा हाथ बन जाए. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lagaan" target="_blank">&#8216;लगान&#8217;</a> में वे लोकसंगीत को अपनी प्रेरणा बनाते हैं और &#8216;घनन घनन&#8217; तथा &#8216;मितवा&#8217; में ढोल का खूब उपयोग मिलता है. &#8216;राधा कैसे न जले&#8217; में लोकजीवन से जुड़ी मितकथाओं का और धुन में बांसुरी का बहुत अच्छा उपयोग है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Swades" target="_blank">&#8216;स्वदेस&#8217;</a> की धुन में स्वागत में बजने वाली धुनों का इस्तेमाल एकदम मौके के माफ़िक है. रहमान के लिए धुनों में नयापन कभी समस्या नहीं रहा. पूरी दुनिया सामने पड़ी है. हर फूल-पत्ती में आवाज़ छुपी है. बस दिल से सुननेवाला चाहिए.</p>
<p><strong><a href="http://eklavya.in/go/" target="_blank">एकलव्य</a> की बाल-विज्ञान पत्रिका &#8216;चकमक&#8217; के अगस्त 2008 अंक में प्रकाशित.</strong></p>
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