<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>आवारा हूँ... &#187; गुलाल</title>
	<atom:link href="http://mihirpandya.com/tag/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://mihirpandya.com</link>
	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
	<lastBuildDate>Sun, 08 Jan 2012 20:47:14 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.8.4</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<item>
		<title>देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/cinema-2009/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2010/01/cinema-2009/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 19:35:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[अनुराग कश्यप]]></category>
		<category><![CDATA[गुलाल]]></category>
		<category><![CDATA[तहलका]]></category>
		<category><![CDATA[देव डी]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://mihirpandya.com/?p=302</guid>
		<description><![CDATA[महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-308" title="luck-by-chance-wallpaper-1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1-225x300.jpg" alt="luck-by-chance-wallpaper-1" width="225" height="300" /></a>महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. <strong><a href="http://www.tehelkahindi.com/" target="_blank">’तहलका’</a></strong> से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी है और अंक जाना है इसलिए किसी एक फ़िल्म की समीक्षा कर रात तक हमें भेज दें. अगले हफ़्ते हमें <strong><a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank">गोरखपुर फ़िल्म उत्सव</a></strong> के लिए निकलना था और हम उसकी ही तैयारियों में जुटे थे. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Victory_(film)" target="_blank">’विक्टरी’</a></strong> का हश्र मैं पहले से जानता था, तय हुआ कि ज़ोया अख़्तर की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Luck_By_Chance" target="_blank">’लक बाय चांस’</a></strong> देखी जाएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आज मैं इस घटना से तक़रीबन एक साल दूर खड़ा हूँ लेकिन इस साल आए लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा पर बात शुरु करते हुए बार-बार मेरा ध्यान इसी फ़िल्म पर जाता है. हाँ यह मेरे लिए इस साल की पहली उल्लेखनीय फ़िल्म है क्योंकि रोहन सिप्पी और कुणाल रॉय कपूर की बनाई बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य कथा <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_President_Is_Coming" target="_blank">’दि प्रेसिडेंट इज़ कमिंग’</a></strong> मैं बहुत बाद में देख पाया. बहरहाल ’लक बाय चांस’ इस साल की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म नहीं है. शायद मैं इस जगह<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D" target="_blank"> ’देव डी’</a></strong> को रखूँगा. हद से हद उसे हम औसत से थोड़ा ऊपर गिन सकते हैं. लेकिन ’देव डी’ तक पहुँचने का रास्ता इसी फ़िल्म से होकर जाता है. शायद इसके माध्यम से वो कहना संभव हो पाए जिसे मैं हिन्दी सिनेमा के एक बड़े बदलाव के तौर पर चिह्नित कर रहा हूँ.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक <strong>’लक बाय चांस’</strong> को एक ख़ास मल्टीप्लेक्स-यूथ श्रंखला की फ़िल्मों वाले खांचे में फ़िट किया जा सकता है और इसकी पूर्ववर्ती फ़िल्मों में <strong>’दिल चाहता है’</strong> से <strong>’रॉक ऑन’</strong> तक सभी को गिना जाता है लेकिन एक मूल अंतर है जो ’लक बाय चांस’ को अपनी इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों से अलग बनाता है और वो है इसका अंत. जैसा मैंने अपनी समीक्षा में लिखा था,</p>
<blockquote style="text-align: justify;"><p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-317" title="zoya akhtar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1-150x150.jpg" alt="zoya akhtar" width="150" height="150" /></a>“लेकिन वो इसका अन्त है जो इसे ’दिल चाहता है’ और ’रॉक ऑन’ से ज़्यादा बड़ी फ़िल्म बनाता है. अन्त जो हमें याद दिलाता है कि बहुत बार हम एक परफ़ैक्ट एन्डिंग के फ़ेर में बाक़ी ’आधी दुनिया’ को भूल जाते हैं. याद कीजिए ’दिल चाहता है’ का अन्त जहाँ दोनों नायिकायें अपनी दुनिया खुशी से छोड़ आई हैं और तीनों नायकों के साथ बैठकर उनकी (उनकी!) पुरानी यादें जी रही हैं. या ’रॉक ऑन’ का अन्त जहाँ चारों नायकों का मेल और उनके पूरे होते सपने ही परफ़ैक्ट एन्डिंग बन जाते हैं. अपनी तमाम खूबियों और मेरी व्यक्तिगत पसंद के बावजूद ये बहुत ही मेल-शॉवनिस्टिक अन्त हैं और यहीं ’लक बाय चांस’ ख़ुद को अपनी इन पूर्ववर्तियों से बहुत सोच-समझ कर अलग करती है. ’लक बाय चांस’ इस तरह के मेल-शॉवनिस्टिक अन्त को खारिज़ करती है. फ़िल्मी भाषा में कहूं तो यह एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का महिला-प्रधान अन्त है. ज़्यादा खुला और कुछ ज़्यादा संवेदनशील. एक नायिका की भूली कहानी, उसका छूटा घर, उसके सपने, उसका भविष्य. आखिर यह उसके बारे में भी तो है. यह अन्त हमें याद दिलाता है कि बहुत दिनों बाद इस पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री में एक लड़की निर्देशक के तौर पर आई है!”</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का एक महिला-प्रधान अन्त. यहाँ एक और गौर करने की बात है, मेरी इस समीक्षा को पढ़कर एक पाठक ने टिप्पणी की थी कि जिस अन्त की आप तारीफ़ कर रहे हैं वो तो फ़िल्म में अलग से जोड़ा हुआ लगता है. कहना होगा कि ख़ामी के बावजूद यह एक ईमानदार टिप्पणी है. सच है कि फ़िल्म की बाकी कहानी से फ़िल्म का अन्त अलग है. लेकिन यही ’जोड़े हुए अन्त’ वाला तरीका हमें एक झटके के साथ समझाता है कि हमारी मुख्यधारा सिनेमा की कहानियाँ कितनी ज़्यादा पुरुष केन्द्रित होती हैं. और हम इस सांचे में इतना गहरे ढल चुके हैं कि इससे परेशानी होना तो दूर की बात है, हमें यह अजीब भी नहीं लगता. हमारे सिनेमा में बीती हुई कहानियाँ (पास्ट स्टोरीज़) सिर्फ़ नायकों के पास होती हैं, नायिकाओं के पास नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-311" title="gulaalposter" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg" alt="gulaalposter" width="140" height="200" /></a>और इसी अंत की वजह से ’लक बाय चांस’ इस साल की दो सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्मों अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gulaal" target="_blank">’गुलाल’</a></strong> और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a> </strong>की पूर्वपीठिका बनती है. पहले बात <strong>’गुलाल’</strong> की. ’गुलाल’ इतनी आसानी से हजम होनेवाली फ़िल्म नहीं है. इस पर मेरी दोस्तों से लम्बी बहसें हुई हैं. गुलाल का समाज कैसा है? उसे क्या मानकर पढ़ा जाए – यथार्थ या फंतासी? लेकिन इन सवालों से अलग शुरुआत में मेरा फ़िल्म को लेकर मुख्य आरोप यह रहा कि मुख्य किरदार के साथ-साथ चलते हुए बीच में कहीं फ़िल्म भी यह समझ खो देती है कि इस व्यवस्था की असली शिकार आखिर में स्त्री है. तो क्या ’गुलाल’ स्त्री विरोधी फ़िल्म है और <strong>मधुर भंडारकर </strong>की फ़िल्मों की तरह क्या वो भी जिस समस्या के खिलाफ़ बनाई गई है उसे ही बेचने लगती है?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे खुशी है कि मैं यहाँ गलत था. <strong>’गुलाल’</strong> की बहुत सी समस्याएं तो उसे एक फंतासी मानकर पढ़ने से हल होती हैं. इस मायने में ’गुलाल’ का पुरुष-प्रधान समाज <strong>मुक्तिबोध</strong> की कविता <strong>’अंधेरे में’</strong> के डरावने अंधेरे की याद दिलाता है. यह निरंकुश व्यवस्था का चरम है. लेकिन मेरे आरोप का जवाब यहाँ भी फ़िल्म के अन्त में छिपा है. मेरे मित्र पल्लव ने ऐसी ही किसी उत्तेजक बहस के बीच में कहा था कि ’गुलाल’ का असल अर्थ वहाँ खुलता है जहाँ फ़िल्म के आखिरी दृश्य में नायिका गुलाल पुते चेहरों की भीड़ में खड़ी है और उसके भाई की ताजपोशी हो रही है. नायिका की आँख से बह निकले एक आँसू में सम्पूर्ण ’गुलाल’ का अर्थ समाहित है. व्यवस्था परिवर्तन होता है और एक स्त्री को माध्यम बनाकर होता है लेकिन इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद इस पुरुष-प्रधान समाज का ढांचा ज़रा नहीं बदलता. माना कि ’गुलाल’ में स्त्री का दृष्टिकोण फ़िल्म में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं है लेकिन आपको गुलाल के असल अर्थ तभी समझ आयेंगे जब आप उस स्त्री के नज़रिए को अपने साथ रख फ़िल्म देखेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-304" title="dev-d" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d-200x300.jpg" alt="dev-d" width="200" height="300" /></a>अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a></strong> पारंपरिक चरित्रों की नई व्याख्या के लिए मील का पत्थर मानी जानी चाहिए. अगर देवदास उपन्यास और उस पर बनी पहले की फ़िल्में (विशेष तौर से संजय लीला भंसाली का अझेल मैलोड्रामा) सिर्फ़ देवदास की कहानी हैं तो अनुराग की ’देव डी’ देवदास के साथ-साथ चंदा और पारो की भी कहानी है. देवदास दरअसल हिन्दी सिनेमा का सतत कुंठित नायक है. उसमें एक ’शहीदी भाव’ सदा से मौजूद रहा है. कभी उसके हाथ पर ’मेरा बाप चोर है’ लिख दिया गया है (दीवार में अमिताभ) तो कभी उसके पिता को उनके ही दोस्त ने धोखे से मार दिया है (बाज़ीगर में शाहरुख़). हिन्दुस्तानी सिनेमा का महानायक हमेशा ऐसी ’पास्ट लाइफ़ स्टोरीज़’ अपने साथ रखता है जिससे उसके आनेवाले सभी कदम जस्टीफाइड साबित हों. और नायिकाएं होती हैं जिनकी कोई पिछली कहानियाँ नहीं होती. लेकिन ’देव डी’ में चंदा की भी कहानी है और पारो की भी. और यही ’अन्य कहानियाँ’ हमारी ’मुख्य कथा’ को आईना दिखाती हैं. अपनी व्याख्या को ही अकेली व्याख्या मानकर चलने वाला हमारा फ़िल्मी नायक आखिर ’ख़ामोशी के उस पार’ की आवाज़ सुन पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’देव डी’</strong> में जब चंदा देव को कहती है कि ’तुम किसी और से प्यार नहीं करते. तुम सिर्फ़ अपने आप से प्यार करते हो’ तो दरअसल वो यहाँ हिन्दुस्तानी सिनेमा के सबसे चहेते नायकीय किरदार को आईना दिखा रही है. यही अंतर है देवदास और ’देव डी’ में. अनुराग देव के पिता का किरदार इसीलिए बदल देते हैं. देव के पिता यहाँ एक नरम मिजाज़ लिबरल बाप की भूमिका में हैं ताकि कोई गलतफ़हमी न बाकी रहे. हमें यह मालूम होना चाहिए कि देव और पारो के न मिल पाने की वजह देव के पिता का सामंती व्यवहार नहीं था. देव द्वारा पारो को चाहने और उसकी याद में अपनी ज़िन्दगी जला लेने के दावे के बावजूद सच यह है कि देव के भीतर भी एक ऐसा पुरुष बैठा है जो अंत में पारो को उन्हीं कसौटियों पर कसता है जो इस सामंती और पुरुषसत्तात्मक समाज ने एक लड़की के लिए बनाई हैं. इस देवदास का थोड़ा सा हिस्सा हर हिन्दुस्तानी पुरुष के भीतर कहीं है. आपके भीतर भी, मेरे भीतर भी. जब <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Aaj_Kal" target="_blank">’लव आजकल’</a></strong> में जय, वीर सिंह से सवाल करता है कि ’अब मीरा किसी और के साथ है और जब वो किसी और के साथ है तो फिर उनके बीच ’वो सब’ भी होगा, फिर मुझे बुरा क्यों लग रहा है?’ तो यह उसके भीतर कहीं बचा रह गया वही ’देवदास’ है जिसके लिए स्त्री एक ऑबजेक्ट पहले है और बाद में कुछ और. और जब फ़िल्म के आखिर में वो वापस मीरा के पास लौटता है तो उसका एक शादीशुदा लड़की को पहले हुए ’वो सब’ के बारे में पूछे बिना प्रपोज़ करना उसी ’देवदास’ पर एक छोटी सी जीत है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमारी लड़ाई भी अपने भीतर के ’देवदासों’ से ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-318" title="Khargosh-Hindi" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg" alt="Khargosh-Hindi" width="225" height="143" /></a>मुख्यधारा से अलग हटकर मैंने दो हज़ार नौ में जो सबसे बेहतरीन फ़िल्में देखी उनमें से ज़्यादातर आपके लिए दो हज़ार दस की फ़िल्में होने वाली हैं. इन्हीं में से एक <strong>’खरगोश’</strong> को मैं हिन्दी सिनेमा के सबसे संभावनापूर्ण प्रयासों में से एक गिन रहा हूँ. <strong>’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’</strong> अपने विज़ुअल टेक्स्ट में चमत्कार पैदा करती है और इस सिनेमा माध्यम की असल विज़ुअल ताक़त का अहसास करवाती है. मराठी फ़िल्म <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishchandrachi_Factory" target="_blank">’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’</a></strong> तो अपने ऑस्कर नामांकन के साथ अभी से चर्चा में आ गई है. इस फ़िल्म में ’लगे रहो मुन्नाभाई’ की ज़िन्दादिली और ’गांधी’ की सी प्रामाणिकता एक साथ मौजूद है. उम्मीद करें कि नए साल में परेश कामदार की ’खरगोश’, अमित दत्ता की ’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’ और परेश मोकाशी की ’हरिशचंद्राची फैक्ट्री’ को बड़ा परदा नसीब हो और हमें इन फ़िल्मों को विशाल सार्वजनिक प्रदर्शन में देखकर एक बार फिर इस सिनेमा नामक जादुई माध्यम के जादू से चमत्कृत होने का मौका मिले.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: मासिक पत्रिका <strong>समकालीन जनमत </strong>के कॉलम <strong>’बायस्कोप’</strong> में प्रकाशित. <strong>जनवरी 2010</strong>.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-313" title="love-aaj-kal-saif-deepika" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg" alt="love-aaj-kal-saif-deepika" width="744" height="322" /></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2010/01/cinema-2009/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>&#8220;मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!&#8221; ~पीयूष मिश्रा.</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/06/piyush-mishra-interview/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2009/06/piyush-mishra-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 16:37:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[guest post]]></category>
		<category><![CDATA[music]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[अनुराग कश्यप]]></category>
		<category><![CDATA[गुलाल]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>
		<category><![CDATA[पीयूष मिश्रा]]></category>
		<category><![CDATA[लेफ़्ट]]></category>
		<category><![CDATA[वरुण ग्रोवर]]></category>
		<category><![CDATA[शहर]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.mihirpandya.com/?p=43</guid>
		<description><![CDATA[
पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Piyush_Mishra" target="_blank"><strong>पीयूष मिश्रा</strong></a> से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा &#8211; परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में &#8216;पॉलिटिकली करेक्ट&#8217; रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.<br style="background-color: #cccccc;" /></p>
<p style="text-align: justify;">लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे &#8216;गुम&#8217; हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~<strong><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p>
<object width="607" height="455" data="http://vimeo.com/moogaloop.swf?clip_id=4452625&amp;server=vimeo.com&amp;show_title=1&amp;show_byline=1&amp;show_portrait=0&amp;color=ff9933&amp;fullscreen=1" type="application/x-shockwave-flash"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://vimeo.com/moogaloop.swf?clip_id=4452625&amp;server=vimeo.com&amp;show_title=1&amp;show_byline=1&amp;show_portrait=0&amp;color=ff9933&amp;fullscreen=1" /></object>
</p>
<p><strong>वरुण~</strong> आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>पीयूष~</strong> </span>(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.</p>
<p>लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक&#8230; उसके बाद में लेफ्ट आपको&#8230; या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ&#8230; लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ&#8230; तब आप बहुत सुखी&#8230; (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.</p>
<p>और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो&#8230; तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब&#8230; बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा&#8230; तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (&#8230;..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था&#8230; हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ हाँ लेकिन जो लोग &#8216;एक्ट वन&#8217; को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि &#8216;एक्ट वन&#8217; में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, &#8216;एक्ट वन&#8217; की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ठीक है, वो &#8216;एक्ट वन&#8217; हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने बहुत कुछ सिखाया. &#8216;एक्ट वन&#8217; (की) &#8216;सो कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने (जीना) सिखाया&#8230; &#8216;एक्ट वन&#8217; की जो &#8216;सो-कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में&#8230; फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है&#8230; सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को&#8230; सफ़दर का काम, सफ़दर का काम&#8230; क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा&#8230; ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की&#8230; खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.</p>
<p>अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये&#8230; कर तो लिया यार&#8230; अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था&#8230; शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल&#8230; उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ&#8230; उनसे ही पूछो!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर&#8230; वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> टॉक टू हिम&#8230; टॉक टू हिम!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ऐसा कुछ नहीं है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हाँ&#8230; स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो&#8230; थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.</p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं है&#8230; आज&#8230; नसीर हैं, ओम पुरी हैं&#8230; पंकज कपूर&#8230; दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं&#8230; आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. &#8216;एक्ट वन&#8217; मैंने जब छोड़ा था &#8216;95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.</p>
<p><strong>व</strong><strong>रुण</strong>~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> &#8216;झूम बराबर झूम&#8217; में काम किया, वो चल नहीं पाई. &#8216;मक़बूल&#8217; में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला&#8230; वो भी अच्छे एक्टर हैं&#8230; पर पता नहीं कुछ कारणों से, &#8216;मक़बूल&#8217; में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. &#8216;आजा नच ले&#8217; में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा&#8230; ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे&#8230; जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ गुलाल की बात करें तो&#8230; उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>एक लाइन ली है&#8230; एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं&#8230; वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था&#8230; ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> मालूम नहीं&#8230; इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को &#8216;लेजेंड ऑफ भगत सिंह&#8217; बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है&#8230; मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हूँ&#8230; हूँ&#8230; नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (&#8217;अरे रुक जा रे बँदे&#8217;)&#8230; लाइव कॉन्सर्ट करते हैं&#8230; उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो&#8230; सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत&#8230; यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना&#8230; गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक&#8230; भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं&#8230; मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.</p>
<p>एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. &#8220;यह नाटक कर रहा है&#8230; लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!&#8221; अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है&#8230; दिल्ली के मुक़ाबले.</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) &#8220;नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.&#8221; एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)&#8230; प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या&#8230; डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में&#8230; दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ&#8230; सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?</p>
<p>वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य&#8230; क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने&#8230; ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का&#8230; गाली देने की इच्छा होती है.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)&#8230; एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.</p>
<p><strong>वरुण~</strong> लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते&#8230; उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है&#8230; अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक&#8230; कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.</p>
<p>आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा&#8230; बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो&#8230; ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है&#8230; मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी&#8230; कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ&#8230; कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को&#8230; अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2009/06/piyush-mishra-interview/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>24</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

