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	<title>आवारा हूँ... &#187; इरफ़ान खान</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>बिल्लू: अब फिर से राज कपूर नहीं</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Feb 2009 14:26:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[इरफ़ान खान]]></category>
		<category><![CDATA[तहलका]]></category>
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		<description><![CDATA[मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित
*****
बहुत दिन हुए देखता हूँ कि हमारे मनमोहन सिंह जी की सरकार अपना हर काम किसी ’आम आदमी’ के लिए करती है. मैं देखता कि जब विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुजरात से कर्नाटक तक अल्पसंख्यकों को छांट-छांट कर मारा जा रहा है, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मूलत: <a href="http://www.ezinemart.com/tehelka/28022009/home.aspx" target="_blank">तहलका समाचार</a> के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित</strong></p>
<p>*****</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://img1.chakpak.com/se_images/1166566_-1_564_none/billu-barber-wallpaper.jpg" alt="" width="300" height="200" />बहुत दिन हुए देखता हूँ कि हमारे मनमोहन सिंह जी की सरकार अपना हर काम किसी ’आम आदमी’ के लिए करती है. मैं देखता कि जब विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुजरात से कर्नाटक तक अल्पसंख्यकों को छांट-छांट कर मारा जा रहा है, मंगलोर में सरेआम लड़कियों से मार-पीट होती है और वो भी ’भारतीय संस्कृति’ के नाम पर, तो फ़िर ये ’आम आदमी’ कौन है जिसके लिये ये सारा विकास और सुरक्षा का ताम-झाम हो रहा है? अमाँ मियाँ आख़िर कहाँ छुपकर जा बैठा है जो नज़र ही नहीं आता? और फ़िर आज मैंने प्रियदर्शन की <a href="http://www.imdb.com/title/tt1230448/" target="_blank"><strong><em></em>बिल्लू</strong></a> देखी. हाँ! यही है हमारे मनमोहन सिंह जी का ’आम आदमी’.. मिल गया! मिल गया! लेकिन अफ़सोस कि अब ये सिर्फ़ प्रियदर्शन की फ़िल्मों में ही बचा है और इसीलिए सरकारी योजनाओं की तरह ही इस फ़िल्म के किरदारों और परिवेश का भी असल दुनिया और उसकी वास्तविकताओं, जटिलताओं से बहुत कम लेना-देना है.</p>
<p>यह आधुनिक कृष्ण-सुदामा कथा बहुत सी समस्याओं से ग्रस्त है. सबसे बड़ी समस्या है गाँव-शहर की विपरीत जोड़ियाँ बनाने की बुरी आदत जिससे हिन्दी सिनेमा ने बहुत मुश्किल से मुक्ति पाई है. ऐसी फ़िल्मों गाँव भोले-भाले, गरीब और ईमानदार बड़े भाई के रोल में होता है और शहर अमीर, चालाक लेकिन भीतर से अकेले छोटे भाई का रोल अपना लेता है. अब दिक्कत यह है कि राज कपूर मार्का <a href="http://www.imdb.com/title/tt0048613/" target="_blank"><strong>’श्री चार सौ बीस’</strong></a> और <a href="http://www.imdb.com/title/tt0052560/" target="_blank"><strong>&#8216;अनाड़ी&#8217;</strong></a> वाला दौर ख़त्म हुआ और अब हमारे गाँव-शहर ऐसे स्याह-सफ़ैद रहे नहीं. एक ’गाँव’ उठकर शहर चला आया है तो दूसरी तरफ़ शहर ने भी अपने पाँव गाँव के भीतर तक पसार लिए हैं. नतीजा ये कि उत्तर प्रदेश के एक गाँव ’बुदबुदा’ की कहानी होते हुए भी इस फ़िल्म का गाँव एक ऐसी हवाई कल्पना बनकर रह जाता है जिसका धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं, जिसके चित्रण में कोई सच्चाई नहीं. परिवेश के चित्रण और ज़िन्दा किरदार गढ़ने के मामले में बेजोड़ <a href="http://www.imdb.com/title/tt0920464/" target="_blank"><strong>’मनोरमा सिक्स फ़ीट अन्डर’</strong></a>, <a href="http://www.imdb.com/title/tt1292703/" target="_blank"><strong>’ओये लक्की! लक्की ओये!’</strong></a> और <a href="http://www.imdb.com/title/tt1327035/" target="_blank"><strong>’देव डी’</strong></a> जैसी फ़िल्मों के दौर में बिल्लू पचास के दशक के सिनेमा की पैरोडी से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाती.</p>
<p>इस डूबते हुए जहाज़ की अकेली टिमटिमाती लौ हैं फ़िल्म के नायक.. ख़ान. नहीं साहेबान मैं यहाँ महानायक <a href="http://www.imdb.com/name/nm0451321/" target="_blank"><strong>शाहरुख़ ख़ान</strong></a> की नहीं, फ़िल्म के नायक <a href="http://www.imdb.com/name/nm0451234/" target="_blank"><strong>इरफ़ान ख़ान</strong></a> की बात कर रहा हूँ. बिलाल परदेसी (बिल्लू) का मुख्य किरदार निभाते हुए इरफ़ान ने एकबार फ़िर साबित किया है कि ढीली-ढाली पटकथा (कटिंग की कमी है!) और किसी ’बॉक्स ऑफ़िस’ नामक जीव के लिये उंडेले गए गाने पर गाने (कहें आइटम नम्बर पर आइटम नम्बर तो शायद बात ज़्यादा साफ़ हो!) के बावजूद वे अपना जलवा दिखा ही जाते हैं. इस बीच महानायक शाहरुख़ शायद इस फ़िल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं. अगर बिल्लू केश कर्तनालय की कैंची थोड़ा सा उनके नाच-गाने पर भी चल जाती तो फ़िल्म की मुख्य कथा का बड़ा भला होता! उनके भावपूर्ण सीन (जैसे ’वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी’ मार्का क्लाईमैक्स भाषण!) अब उनकी ही किसी पुरानी फ़िल्म की पैरोडी लगते हैं. वैसे अगर शाहरुख़ इस साहिर ख़ान में थोड़ा-बहुत खुद को प्ले कर रहे थे तो इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है. इस महानायक को कल्पनिक किरदार ही निभाने चाहिए क्योंकि इस महानायक की ज़िन्दगी कुल-मिलाकर एक बहुत ही बोर और मैलोड्रमैटिक फ़िल्म के प्लॉट से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाती है.</p>
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