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	<title>आवारा हूँ... &#187; अनुराग कश्यप</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>सिनेमाई संगीत में प्रामाणिकता की तलाश</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Mar 2012 13:45:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.”

पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं में हिस्सेदारी करते हुए यह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं में हिस्सेदारी करते हुए यह मैंने आम सुना. इसे आलोचना की तरह से सुनाया जाता था और इस आलोचना के समर्थन में सर हिलाने वाले दोस्त भी बहुत थे.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/aitbaar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1032" title="aitbaar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/aitbaar-300x135.jpg" alt="aitbaar" width="300" height="135" /></a>हिन्दी सिनेमा और सिनेमाई संगीत के बारे में दो भिन्न तरह की बातें पिछले दिनों मैंने अलग-अलग मंचों से कही जाती सुनीं, जिनका यूं तो आपस में सीधा कोई लेना-देना नहीं दिखता लेकिन दोनों को साथ रखकर पढ़ने से उनके गहरे निहितार्थ खुलते हैं. पहली बात को हमने ऊपर उद्धृत किया. लेकिन इससे बिल्कुल इतर दूसरी बात समकालीन सिनेमा और नए निर्देशकों के बारे में है जिनके सिनेमा बारे में आम समझ यह बन रही है कि यह अपने परिवेश की प्रामाणिकता पर गुरुतर ध्यान देता है और इसे फ़िल्म की मूल कथा के संप्रेषण के मुख्य साधन के बतौर चिह्नित करता है. दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप, चंदन अरोड़ा और कुछ हद तक इम्तियाज़ अली जैसे निर्देशक अपने सिनेमा में इस ओर विशेष ध्यान देते पाए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अगर मैं कहूँ कि इस आलेख के सबसे पहले जो कथन मैंने उद्धृत किया, खुद मैं भी उससे काफ़ी हद तक सहमत हूँ, तो? लेकिन साथ ही यह भी कि मैं उसे आलोचना नहीं मानता. हम दरअसल इन दो भिन्न लगती बातों को साथ रखकर नहीं देख पा रहे हैं. देखें तो समझ आएगा कि पहली बात के सूत्र दूसरे सकारात्मक बदलाव में छिपे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इसे कुछ बड़े परिप्रेक्ष्य में समझें. माना जाता है कि उदारीकरण के बाद हिन्दुस्तान के बाज़ार खुलने की प्रक्रिया में हिन्दी सिनेमा के लिए ’हॉलीवुड’ की चुनौती दिन दूनी रात चौगुनी बड़ी होती गई है. बात सही भी है. लेकिन मेरा मानना है कि ’हॉलीवुड’ की चुनौती जितनी बड़ी समूचे हिन्दी सिनेमा के लिए है, उससे कहीं ज़्यादा हिन्दी सिनेमा में सदा से एक अभिन्न अंग के रूप में मौजूद रहे गीतों के लिए हैं. जिस तरह समाज पर मुख्यधारा ’हॉलीवुड’ सिनेमा का प्रभाव बढ़ रहा है, हिन्दी सिनेमा में उससे मुकाबला करने की, उसे पछाड़ने की जुगत बढ़ती जा रही है. और ऐसे में सबसे बड़ा संकट, शायद अस्तित्व का संकट सिनेमा के गीत-संगीत के लिए उत्पन्न होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा में नब्बे के दशक में सबसे बड़ा बदलाव लेकर आने वाले व्यक्ति का नाम है रामगोपाल वर्मा. आज सिनेमा में देखी जा रही तकनीक समर्थित नवयथार्थवादी धारा को स्थापित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. और आपको याद होगा कि उन्होंने एक समय संगीत को अपने सिनेमा से एक गैर-ज़रूरी अवयव की तरह से निकाल बाहर किया था. यह संक्रमण काल था और इस दौर में हिन्दी सिनेमा का संगीत अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था. यहाँ दो रास्ते थे उसके सामने, एक &#8211; अपनी पुरानी प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करते हुए वैसा ही बने रहना, लेकिन बदलते सिनेमा के रंग में लगातार अप्रासंगिक होते चले जाना. और दूसरा – स्वयं का पुन: अविष्कार करने की कोशिश, याने सिनेमा की बदलती भाषा के अनुसार बदलना और सबसे ऊपर फ़िल्म के भीतर अपनी प्रासंगिकता स्थापित करना.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dev-d.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1027" title="dev d" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dev-d-300x225.jpg" alt="dev d" width="300" height="225" /></a>मुझे खुशी है कि कुछ निर्देशकों ने बाज़ार की परवाह न करते हुए दूसरा रास्ता चुना. और यहाँ बाज़ार की परवाह न करने जैसे वाक्य का मैं जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ. क्योंकि फ़िल्म संगीत आज अपने आप में एक वृहत उद्योग है और ऐसे में अपनी फ़िल्म में ’फ़िल्म से बाहर’ पहचाने जाने वाले गीतों का न होना एक बड़ा दुर्गुण है. ऐसे में निर्देशकों ने अपने सिनेमा में संगीत को एक किरदार के बतौर पेश किया और उससे वह काम लेने लगे जिन्हें अभिव्यक्ति के सीमित साधनों के चलते या परिस्थिति के चलते फ़िल्म में मौजूद किरदार अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे. अनुराग कश्यप की ’देव डी’ का ही उदाहरण लें. किरदारों की व्यक्तिगत अभिव्यक्तियाँ जहाँ अपनी सीमाएं तलाशने लगती हैं, फ़िल्म में संगीत आता है और संभावनाओं के असंख्य आकाश सामने उपस्थित कर देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">अनुराग द्वारा निर्मित और राजकुमार गुप्ता द्वारा निर्देशित ’आमिर’ का ही उदाहरण लें. फ़िल्म जो कथा कहती है वह अत्यन्त भावुक हो सकती थी, लेकिन यहीं अमित त्रिवेदी का संगीत उसे एक नितान्त ही भिन्न आयाम पर ले जाता है. उनके संगीत में एक फक्कड़पना है जिसके चलने ’आमिर’ का स्वाद अपनी पूर्ववर्ती मैलोड्रैमेटिक फ़िल्मों से बिल्कुल बदल जाता है. अमिताभ भट्टाचार्या द्वारा लिखा गीत ’चक्कर घूम्यो’ को शायद आप फ़िल्म से बाहर याद न करें, लेकिन याद करें कि फ़िल्म में एक घोर तनावपूर्ण स्थिति में आकर वही गीत कैसे आपको सोच का एक नया नज़रिया देता है. घटना को देखने का एक नया दृष्टिकोण जिसके चलने ’आमिर’ अन्य थ्रिलर फ़िल्मों से भिन्न और एक अद्वितीय स्वाद पाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">राजकुमार गुप्ता की ही अगली फ़िल्म ’नो वन किल्ड जेसिका’ के गीतों को देखें. क्या आपने हिन्दी सिनेमाई संगीत की कोमलकान्त पदावली में ऐसे खुरदुरे शब्द पहले सुने हैं,</p>
<p style="text-align: justify;">“डर का शिकार हुआ ऐतबार<br />
दिल में दरार हुआ ऐतबार<br />
करे चीत्कार बाहें पसारकर के</p>
<p style="text-align: justify;">नश्तर की धार हुआ ऐतबार<br />
पसली के पार हुआ ऐतबार<br />
चूसे है खून बड़ा खूँखार बनके</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">झुलसी हुई इस रूह के चिथड़े पड़े बिखरे हुए<br />
उधड़ी हुई उम्मीद है<br />
रौंदे जिन्हें कदमों तले बड़ी बेशरम रफ़्तार ये</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/no_one_killed_jessica.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1028" title="no_one_killed_jessica" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/no_one_killed_jessica-300x208.jpg" alt="no_one_killed_jessica" width="300" height="208" /></a>जल भुन के राख हुआ ऐतबार<br />
गन्दा मज़ाक हुआ ऐतबार<br />
चिढ़ता है, कुढ़ता है, सड़ता है रातों में”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">गीत की यह उदंडता अभिव्यक्त करती है उस बेबसी को जिसे फ़िल्म अभिव्यक्त करना चाहती है. ठीक वैसे ही जैसे ’उड़ान’ के कोमल बोल उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले सोलह साल के तरुण कवि की कल्पना से जन्म लेते हैं, ’नो वन किल्ड जेसिका’ के ’ऐतबार’ और ’काट कलेजा दिल्ली’ जैसे गीत अपने भीतर वह पूरा सभ्यता विमर्श समेट लाते हैं जिन्हें फ़िल्म अपना मूल विचार बनाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे याद आता है जो गुलज़ार कहते हैं, कि मेरे गीत मेरी भाषा नहीं, मेरे किरदारों की भाषा बोलते हैं. और वह मेरी अभिव्यक्तियाँ नहीं है, उन फ़िल्मी परिस्थितियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जिनके लिए उन्हें लिखा जा रहा है. ऐसे में समझना यह होगा कि अगर सिनेमाई गीतों में अराजकता बढ़ रही है तो यह हमारे सिनेमा में पाए जाने वाले किरदारों और परिवेश के विविधरंगी होने का संकेत है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">’पीपली लाइव’ का संगीत इसलिए ख़ास है क्योंकि इंडियन ओशन, भदवई गांव की गीत मंडली, राम संपत, रघुवीर यादव, नगीन तनवीर और नूर मीम राशिद जैसे नामों से मिलकर बनता उनका सांगितिक संसार इस समाज की इंद्रधनुषी तस्वीर अपने भीतर समेटे है. सच है कि उस संगीत में अराजकता है और सम्पूर्ण ’एलबम’ मिलकर कोई एक ठोस स्वाद नहीं बनाता. शायद इसीलिए ’पीपली लाइव’ संगीत के बड़े पुरस्कार नहीं जीतती. लेकिन इकसार की चाह क्या ऐसी चाह है जिसके पीछे अराजकता का यह इंद्रधनुषी संसार खो दिया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dibakar.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1036" title="dibakar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dibakar.jpg" alt="dibakar" width="155" height="226" /></a>दिबाकर की फ़िल्मों का संगीत कभी खबर नहीं बनता. न कभी साल के अन्त में बननेवाली ’सर्वश्रेष्ठ’ की सूचियों में ही आ पाता है. वे हमेशा कुछ अनदेखे, अनसुने नामों को अपनी फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा सौंपते हैं और कई बार फ़िल्म के गीत खुद ही लिख लेते हैं. शायद यह बात &#8211; ’फ़िल्म का संगीत फ़िल्म के बाहर नहीं’ उनकी फ़िल्मों के संगीत पर सटीक बैठती है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी मैं दिबाकर की फ़िल्मों के संगीत को हिन्दी सिनेमा में बीते सालों में हुआ सबसे सनसनीखेज़ काम मानता हूँ. क्योंकि उनकी फ़िल्मों का संगीत उनकी फ़िल्मों का सबसे महत्वपूर्ण किरदार होने से भी आगे कहीं चला जाता है. ’ओये लक्की लक्की ओये’ में स्नेहा खानवलकर और दिबाकर शुरुआत में ही ’तू राजा की राजदुलारी’ लेकर आते हैं. हरियाणवी रागिनी जिसका कथातत्व भगवान शिव और पार्वती के आपसी संवाद से निर्मित होता है. देखिए कि किस तरह तरुण गायक राजबीर द्वारा गाया गया यह गीत एक पौराणिक कथाबिम्ब के माध्यम से समकालीन शहरी समाज में मौजूद class के नफ़ासत भरे भेद को उजागर कर देता है. मुझे फिर याद आते हैं आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध जिनमें वह तमाम ’सूटेड-बूटेड’ आर्य देवताओं के मध्य अकेले लेकिन दृढ़ता से खड़े दिखते फ़क्कड़, भभूतधारी और मस्तमौला अनार्य देवता शिव की भिन्नता को स्पष्ट करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी क्रम में फ़िल्म के दूसरे गीत की यह शुरुआती पंक्तियाँ देखें,</p>
<p style="text-align: justify;">“जुगणी चढदी एसी कार<br />
जुगणी रहंदी शीशे पार<br />
जुगणी मनमोहनी नार<br />
ओहदी कोठी सेक्टर चार”</p>
<p style="text-align: justify;">यह जिस &#8216;शीशे पार’ का उल्लेख फ़िल्म का यह गीत करता है, यही वो सीमा है जिसे पार कर जाने की जुगत &#8216;लक्की’ पूरी फ़िल्म में भिड़ाता रहता है. यह class का ऐसा भेद है जिसे सिर्फ़ पैसे के बल पर नहीं पाटा जा सकता. यहाँ फ़िल्म में संगीत किरदार भर नहीं, वो उस फ़िल्म के मूल विचार की अभिव्यक्ति का सबसे प्राथमिक स्रोत बनकर उभरता है. दिबाकर की ही अगली फ़िल्म &#8216;लव, सेक्स और धोखा’ का घोर दर्जे की हद तक उपेक्षित किया गया संगीत भी इसी संदर्भ में पुन: पढ़ा जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पिछले साल आई फ़िल्म &#8216;डेल्ही बेली’ में एक गीत था &#8216;स्वीट्टी स्वीट्टी स्वीट्टी तेरा प्यार चाईंदा’. जब मैंने दोस्तों को बोला कि यह मेरी लिस्ट में पिछले साल के सबसे शानदार गीतों में से एक है, तो मुझे जवाबी आश्चर्य का सामना करना पड़ा. मेरी इस राय की वजह क्या है? वजह है इस गीत की फ़िल्म के भीतर भूमिका. फ़िल्म इस गीत के साथ हमारा परिचय दिल्ली के उस उजड्ड से करवाती है जिसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति उसके हाथ में मौजूद उसकी पिस्तौल है. इस अभिव्यक्ति के लिहाज से गीत मुकम्मल है और इसीलिए महत्वपूर्ण है. यहाँ फ़िल्म का दूसरा गीत &#8216;बेदर्दी राजा’ भी देखें जो उस लंपट किरदार से आपका परिचय करवाता है जिसकी लंपटता फ़िल्म के कथासूत्र में आगे जाकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक हिन्दी सिनेमा का संगीत बदला है. लेकिन समय सिर्फ़ उसकी आलोचना का नहीं, ज़रूरत उसमें निहित सकारात्मक बदलाव देखे जाने की भी है. हम लोकप्रिय लेकिन अपनी फ़िल्म से ही पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाने वाले इकसार संगीत के मुकाबले ऐसा, कुछ नया अविष्कार करने की ज़ुर्रत करने वाला संगीत हमेशा ज़्यादा सराहेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>&#8216;कथादेश’</strong> के मार्च अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>वीडियोवाला</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Jul 2011 00:56:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[अनुराग कश्यप]]></category>
		<category><![CDATA[कथादेश]]></category>
		<category><![CDATA[डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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“हमारी फ़िल्में यहाँ आएंगी. जब भी हम अच्छी फ़िल्में बनायेंगे, वो आएंगी. ऐसा नहीं है कि हमारे मुल्क में अच्छे फ़िल्मकार नहीं हैं. असली वजह है निर्माताओं का न होना. मान लीजिए मैं कोई फ़िल्म बनाना चाहता हूँ. लेकिन योजना बनते ही बहुत सारी चिंताएं उसके साथ पीछे-पीछे चली आती हैं. कैसे बनेगी, पैसा कहां [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><object classid="clsid:cfcdaa03-8be4-11cf-b84b-0020afbbccfa" width="425" height="350" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/eKSkTIbaa5g" /><embed type="audio/x-pn-realaudio-plugin" width="425" height="350" src="http://www.youtube.com/v/eKSkTIbaa5g"></embed></object></p>
<p style="text-align: center;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“हमारी फ़िल्में यहाँ आएंगी. जब भी हम अच्छी फ़िल्में बनायेंगे, वो आएंगी. ऐसा नहीं है कि हमारे मुल्क में अच्छे फ़िल्मकार नहीं हैं. असली वजह है निर्माताओं का न होना. मान लीजिए मैं कोई फ़िल्म बनाना चाहता हूँ. लेकिन योजना बनते ही बहुत सारी चिंताएं उसके साथ पीछे-पीछे चली आती हैं. कैसे बनेगी, पैसा कहां से आएगा, पैसा वापस आएगा कि नहीं. यही सब लोगों के कदम पीछे ले जाता है. सच्चे अर्थों में जिसे स्वतंत्र सिनेमा कहा जा सके, ऐसा सिनेमा तो हमारे देश में बस अभी बनना शुरु ही हुआ है. ऐसी फ़िल्में जिन्हें बहुत ही कम निर्माण लागत पर बनाया जा रहा है. लेकिन अभी तो यह फ़िल्में भी निर्माताओं और वितरकों तक नहीं पहुँच पा रही हैं. एक डॉक्यूमेंट्री <strong>’वीडियोकारन’</strong>, जो आजकल हिन्दुस्तान में इंटरनेट पर चर्चा का विषय बनी हुई है, सिर्फ़ इसलिए प्रदर्शित नहीं हो पा रही क्योंकि उसके निर्देशक के पास उसमें दिखाई गई दूसरी फ़िल्मों के कुछ अंशों के अधिकार खरीदने के पैसे नहीं हैं. वो डॉक्यूमेंट्री हिन्दी सिनेमा के बारे में कहीं बेहतर बयान है और अगर आप सच में ’बॉलीवुड’ के बारे में बात करना चाहते हैं तो वही फ़िल्म है जिसे इस फ़ेस्टिवल (कांस) में दिखाया जाना चाहिए.”</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भूमध्यसागर के किनारे <strong>अनुपमा चोपड़ा</strong> के साथ बातचीत के दौरान <strong>अनुराग कश्यप</strong>.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“बीते सालों में हिन्दी सिनेमा में आया सबसे बड़ा बदलाव क्या है?”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अलग-अलग मंचों पर मुझसे यह सवाल कई बार पूछा गया है. लेकिन इसका कोई तैयार जवाब मेरे पास कभी नहीं रहा. ऐसा भी हुआ कि कई बार मैं तलाश में भटकता रहा. मंज़िल के पास से निकल गया और जिसकी चाहत थी उसकी परछाई भर दिखाई दी. क्या इसका कोई ’एक’ जवाब संभव है या फिर यह भी उन्हीं ’बहुवचन’ वाले जवाबों की फ़ेरहिस्त में आता है?</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फिर एक दिन मैंने <strong>’वीडियोकारन’</strong> देखी. हिन्दी अनुवाद करूँ तो “वीडियोवाला”. जी हाँ, यही नाम है <strong>जगन्नाथन कृष्णन</strong> की बनाई डॉक्युमेंट्री फ़िल्म का. जैसा नाम से कुछ अंदाजा होता है, पहली नज़र में यह फ़िल्म एक रेखाचित्र खींचती है किरदार <strong>सेगई राज</strong> का. सेगई राज याने हमारा नायक, हमारा ’वीडियोवाला’.  लेकिन सिर्फ़ इतना कहने से बस फ़िल्म का एक सिरा भर पकड़ में आता है. असल में सेगई राज की कहानी हमारे हिन्दुस्तानी सिनेमा को समझने के लिए एक ’माइक्रोकॉस्म’ का काम करती है. एक ऐसा प्रिज़्म जिसके सहारे हमारे सतरंगी मुख्यधारा सिनेमा के सातों रंग अलग चमकते देखे जा सकते हैं. धूसर भी, चमकीले भी. लेकिन साथ ही यह फ़िल्म उस आधारभूत परिवर्तन के ऊपर भी हाथ रखती है जिससे हिन्दी सिनेमा मेरे जीवनकाल में गुज़रा है. ऐसा परिवर्तन जिसके दुष्प्रभाव किसी गहरी खरोंच की तरह हिन्दी सिनेमा के चेहरे पर नज़र आ रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सेगई की कहानी अस्सी के दशक में हिन्दुस्तान के शहरों से लेकर धुर देहातों तक आई वीडियो क्रांति के बीच जन्म लेती है. ऐसा समाज जहाँ सिनेमा रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा है. सेगई बड़ा होकर खुद अपना वीडियो पार्लर खोलता है. जनता की मर्जी की फ़िल्में चलाता है, उन्हें पब्लिक की डिमांड के अनुसार बदलता है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें मनमाफ़िक एडिट भी करता है. और फिर इसी दुनिया में उस वीडियो पार्लर को बुलडोज़र से टूटते भी देखता है. और यह सब कहानियाँ हम खुद सेगई के मुँह से ही सुन रहे हैं. सेगई बात करता जाता है और हम जानते हैं कि सेगई ने अपनी ज़िन्दगी के कुछ सबसे ज़रूरी पाठ उस सिनेमा से सीखे हैं जिसे हम समझदार दर्शक ’नकली, अयथार्थवादी, महा’ कहकर खारिज कर देते हैं. यह शहर के हाशिए पर आबाद एक ऐसी दुनिया की कहानियाँ हैं जहाँ मौत और ज़िन्दगी के बीच फ़ासला बहुत थोड़ा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/videokaaran4.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-888" title="videokaaran4" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/videokaaran4-300x187.jpg" alt="videokaaran4" width="300" height="187" /></a>मेरे पसंदीदा निबंधकार अमिताव कुमार अपने नए निबंध में लिखते हैं कि असल में वे खुद एक ऐसे गणतंत्र के नागरिक हैं जिसे हिन्दी के मुख्यधारा सिनेमा ने रचा है. मेरी नज़र में यह एक ऐसी आँखों से ओझल सच्चाई है जिसे हमारे मुल्क के सिनेमा समाज की सबसे आधारभूत विशेषता माना जाना चाहिए. एतिहासिक रूप से हमारा सिनेमा उसे देखने वाले एक बड़े वर्ग के लिए सिर्फ़ सिनेमा भर नहीं. यह उनकी ज़िन्दगी की मुख्य संरचना है, बहुत बार जिसके आगे असलियत धुंधली पड़ जाती है. सेगई राज इसी दुनिया का प्रतिनिधि चरित्र है. बातूनी, आत्मविश्वास से भरा और खुशमिजाज़. अद्भुत तर्क श्रंखला से बनते उसके जवाब सिनेमा की नई व्याख्याएं हमारे सामने खोलते हैं. फ़िल्म के एक शुरुआती प्रसंग में अमिताभ और रजनीकांत के दो प्रशंसकों के आपसी तर्क-वितर्क हमें हिन्दी सिनेमा और तमिल सिनेमा में पाए जाने वाले नायकत्व के उन भेदों से परिचित कराते हैं जिसे साबित करने के लिए कई मोटे अकादमिक अध्ययन नाकाफ़ी साबित हों. रेल की पटरियों के सहारे चलती इन हाशिए की ज़िन्दगियों में सिनेमा उस ’लार्जर-दैन-लाइफ़’ इमेज को घोलता है जिसे आप और मैं फ़र्जी कहते हैं, खारिज करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सेगई सिर्फ़ दसवीं तक पढ़ा है. उसके दोस्तों में सबसे ज़्यादा. लेकिन वो आपको बता सकता है कि किसी नई रजनीकांत फ़िल्म के सिनेमाहाल में लगने पर पहले दिन के पहले, दूसरे, तीसरे शो की अलग-अलग ब्लैक टिकट रेट क्या होगी. या फिर यह कि थाईलैंड का कौनसा हीरो चेंबूर के इलाके में ’छोटा ब्रूस ली’ के नाम से जाना जाता है. या फिर यह कि तमिल सिनेमा में हीरो जब भी नाचता है तो उसके पीछे हमेशा पचास-साठ आदमियों की फ़ौज क्यों होती है. और यह भी कि पुलिस जब रिमांड पर लेकर ’थर्ड डिग्री’ का इस्तेमाल करे तो उससे बचने के लिए कौनसा तरीका सबसे कारगर है. सारे जवाब तार्किक (बेशक तर्क प्रणाली उसकी अपनी है) हैं और सबसे मज़ेदार बात यह है कि सारे जवाब उसने सिनेमा देखकर कमाए हैं. समझने की बात यह है कि हमारे लिए सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम हो सकता है लेकिन जिस समाज ने अपने जीने के तरीके इसी सिनेमा से कमाए हों, उसके लिए यह सिनेमा कहीं ज़्यादा बड़ी चीज़ है. और ऐसा इसलिए क्योंकि हमने समाज के इस बहुमत को वैधानिक तरीकों से ज़िन्दगी जीने का हक कभी दिया ही नहीं. पानी, बिजली, घर, नौकरी सभी कुछ तो हमारा रहा. जो और जितना कभी उनके हाथ आया भी, उसे हम संस्थागत तरीके से छीनते गए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और अब हम बड़े ही संस्थागत तरीके से उनका मनोरंजन छीन रहे हैं. यह वीडियोक्रांति अब पुराने ज़माने की बात है. सेगई का वीडियो पार्लर भी बड़े ही संस्थागत तरीके से बुलडोज़र के नीचे कुचला गया और अब सेगई अपना फ़ोटो स्टूडियो चलाता है. अब भी याद करता है उन दिनों को जब वीडियो पार्लर था, दोस्तों का साथ था, रजनीकांत की फ़िल्में थीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/videokaaran2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-894" title="videokaaran2" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/videokaaran2-300x187.jpg" alt="videokaaran2" width="300" height="187" /></a>मेरे सवाल का जवाब यहीं है. बीते सालों में हिन्दी सिनेमा में आया सबसे बड़ा बदलाव उसकी बदलती दर्शक दीर्घा में छिपा है. यह अपने आप में एक अद्भुत उदाहरण होगा जिसमें जनता की पसंद पर निर्भर एक उद्योग खुद अपना नाता जनता के बहुमत से काट लेना चाहता है. हिन्दी सिनेमा एक निरंतर चलते सचेत प्रयास के तहत अपने सबसे बड़े दर्शक वर्ग को अपने से बेदखल करने पर तुला हुआ है. हर दूसरे शहर में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल बंद हो रहे हैं. पिछले महीने मेरे बड़े भाई ने फ़ेसबुक पर खबर दी कि उदयपुर का सबसे मशहूर ’चेटक’ सिनेमाहाल बंद हो गया. मैं आज जो कुछ सिनेमा पर लिखता-पढ़ता हूँ उसकी प्राथमिक कक्षा यही ’चेटक’ सिनेमाहाल था जिसके रात के नौ से बारह वाले शो में हमने मार तमाम फ़िल्में देखीं. आज यहाँ जयपुर में देखा कि मालिक लोग ’मोतीमहल’ को शादी-पार्टी के लिए किराए पर चलाने लगे हैं. बचपन में इस सिनेमाहाल के आगे निकली कांच की दीवार मुझे अंदर चलती फ़िल्म से भी ज़्यादा आकर्षित करती थी. आज उसमें दूर से ही सुराख़ नज़र आ रहे थे. इधर मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म के टिकटों की बढ़ती कीमतें हमें किसी दूसरी पीढ़ी की ’रियलिटी बेस्ड साइंस फ़िक्शन’ फ़िल्म में होने का अहसास करवाती हैं. मेरे शहर का एक मल्टीप्लैक्स आजकल फ़िल्म दिखाने के 950 रुपए लेता है. मुझे शक है कि कहीं उस मल्टीप्लैक्स में फ़िल्म का अंत दर्शक की मर्ज़ी पूछकर तो नहीं किया जाता? “आज हीरोइन को चाहने वाले बहुत हैं, उसका मरना कैंसल. उसके बजाए क्लाईमैक्स में माँ को मार दो.” टाइप कुछ?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अरे, आप हँस रहे हैं? सच मानिए, आज ज़्यादा बड़ा डर यह है कि जिस मज़ाक पर आज हम हँस रहे हैं कल कहीं वो सच्चाई न बन जाए. यह मानना कि सिनेमा का दर्शक वर्ग बदलना उसके कथ्य पर कोई असर नहीं डालेगा, अंधेरे में जीना है. हिन्दी सिनेमा की लोकप्रियता उसे ज़्यादा जनतांत्रिक बनाती है, आम आदमी के ज़्यादा नज़दीक लेकर आती है. और यह नया बदलाव उस विशेषता को ही छीन रहा है. मल्टीप्लैक्स में ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाकर हमारा सिनेमा धनवान तो हो सकता है, समृद्ध नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यही कोई तकरीबन छ महीने पहले <strong>’रवीश की रिपोर्ट’</strong> वाले हमारे रवीश ने अपने ब्लॉग <a href="http://naisadak.blogspot.com/" target="_blank"><strong>’कस्बा’</strong></a> पर एक दिलचस्प पोस्ट लगाई थी. शीर्षक था, <a href="http://naisadak.blogspot.com/2011/01/blog-post_1840.html" target="_blank"><strong>“दस रुपए का चार सिनेमा”</strong></a>. दिल्ली की किसी पुनर्वास कॉलोनी में चलते एक वीडियो पार्लर पर. जगह का नाम उन्होंने नहीं बताया था नहीं तो अगले दिन पुलिस का छापा इस ’जनतांत्रिक जुगाड़’ को भी बंद करवा देता. सिर्फ़ एक सिफ़ारिश की थी, “आम आदमी को बाज़ार से निकाल कर बाज़ार बनाने वालों को समझ आनी चाहिए कि उनका सिनेमा मल्टीप्लेक्स से बेआबरू होकर उतरता है तो इन्हीं गलियों में मेहनत की कड़ी कमाई के दम पर सराहा जाता है. सरकार को कम लागत वाले ऐसे सिनेमा घरों को पुनर्वास कालोनियों में नियमित कर देना चाहिए. टैक्स फ्री.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/Ravish-ki-Report.png"><img class="alignright size-full wp-image-889" title="Ravish-ki-Report" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/07/Ravish-ki-Report.png" alt="Ravish-ki-Report" width="250" height="182" /></a>यहीं दो बातें उस <a href="http://www.ndtv.com/search?q=ravish+ki+report" target="_blank"><strong>’रवीश की रिपोर्ट’</strong></a> पर भी जिसे चैनल ने एक प्रशासनिक फ़ैसले के तहत बंद कर दिया है. ’रवीश की रिपोर्ट’ को हमारे टेलीविज़न न्यूज़ के निर्धारित मानकों पर परखना मुश्किल है. ऐसी रिपोर्ट जिसमें पत्रकार खुद अपनी समूची पहचान के साथ खबर में शामिल हो जाए, बहुत को अखर सकती है. इसीलिए मेरा हमेशा से मानना रहा है कि ’रवीश की रिपोर्ट’ को डॉक्युमेंट्री सिनेमा के मानदंडों पर परखा जाना चाहिए. हर आधे घंटे के एपीसोड में बाकायदा कथाधारा रचने वाले रवीश किसी वृत्तचित्र निर्देशक की तरह हैं. और उनके कथासूत्र भी शहर के उसी हाशिए से आते हैं जिन्हें हम उसके असली रूप में पहचानते तक नहीं. जिस दिल्ली शहर में रहते, पढ़ते मुझे छ साल हुए, रवीश उसी शहर से मेरा परिचय करवाते हैं, जैसे पहली बार. मेरे घर के आगे छोले-कुलचे बेचने वाला, मेरी फ़ैकल्टी के किनारे चाय का खोमचा लगाने वाला, वो कुम्हार जिससे मैं गर्मियों की शुरुआत में छोटी सुराही खरीद लाया हूँ. क्या मैं इन्हें पहचानता हूँ. नहीं. सच यह है कि मैं इनके केवल उसी रूप को पहचानता हूँ जिसे धरकर ये मेरे सामने उपस्थित होते हैं. शहर की किस खोह से निकलकर यह मेरे सामने आते हैं और शाम ढलते ही किस खोह में वापस समा जाते हैं, यह मैं कभी न जान पाता अगर ’रवीश की रिपोर्ट’ उस अंधेरी खोह में प्रवेश न करती. मायापुरी, लोनी बॉर्डर, कापसहेड़ा, नई सीमापुरी, गांव खोड़ा, नाम अनगिनत हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">रवीश हमारे ही शहर में मौजूद लेकिन अपरिचित होती गई इन दुनियाओं के हर पहलू को खोलते हैं. इसमें मनोरंजन से बेदखल किए जाते रेहड़ी-खोमचे वालों की वो दुनिया है जिसके बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं. मुख्यधारा सिनेमा से बेदखल किए जाने पर यह जनता का बहुमत तो अपने लिए कोई नया रास्ता खोज लेगा, लेकिन इस बहुमत के बिना हमारा सिनेमा क्या अपना मूल चरित्र बचा पाएगा. सेगई की दुनिया में और रास्ते हैं, अगर न भी हुए तो वो नए रास्ते बनाएगा. सवाल अब हमारे सामने है और उसका कोई माकूल जवाब अब हमें खोजना है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सेगई कभी मिलेगा तो बताऊँगा उसे. उस लड़कपन में उलझे शाहरुख के बाद ऐसा भावप्रवण और पारदर्शी चेहरा उसका ही देखा है मैंने. सेगई, मेरा हीरो तो अब तू ही है रे.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’वीडियोकारन’ से हमारा परिचय करवाने का श्रेय मेरी ज़िन्दगी के ’रतन बाबू’ वरुण ग्रोवर को जाता है. वही थे जो किसी रैंडम फ़ेसबुक मैसेज पर इस फ़िल्म का प्रोमो देख इसकी पब्लिक स्क्रीनिंग में पहुँचे थे और हमें यह खज़ाना मिला. वरुण की लिखी फ़िल्म से जुड़ी आधारभूत पोस्ट  आप <a href="http://moifightclub.wordpress.com/2011/05/07/a-film-videokaaran-this-passionate-deserves-some-passion-from-each-and-every-film-lover-argues-varun-grover/" target="_blank"><strong>यहाँ</strong></a> पढ़ सकते हैं. तमाम जानकारियाँ भी यहाँ उपलब्ध हैं. वे और उनके साथी मिलकर इस फ़िल्म को और आगे पहुँचाने की कोशिशों में लगे हैं. कोशिश यह भी है कि इसे इंटरनेट पर उपलब्ध करवाया जा सके. जैसे ही कोई इंतज़ाम हो पाएगा, हम अपने ब्लॉग पर इस बाबत सूचना देंगे. और तब तक चाहनेवाले इस बाबत मुझे परेशान कर सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">(साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के जुलाई अंक में प्रकाशित)</p>
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		<title>हिन्दी सिनेमा में प्रेम की अजीब दास्तान</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Feb 2011 17:42:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हिन्दी सिनेमा के पुराने पन्ने पलटते हुए कई बार मुझे ताज्जुब होता है कि क्या यही वो कहानियाँ थीं जिनके बलबूते हमारे इश्क़ पीढ़ियों परवान चढ़े? हिन्दी सिनेमा अपवादों को छोड़कर खासा यथास्थितिवादी रहा है और ऐसे में प्रेम जैसे स्वभाव से यथास्थितिवाद विरोधी मनोभाव का इसके मूल दर्शन के रूप में स्थापित होना अजब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>हिन्दी सिनेमा</strong> के पुराने पन्ने पलटते हुए कई बार मुझे ताज्जुब होता है कि क्या यही वो कहानियाँ थीं जिनके बलबूते हमारे इश्क़ पीढ़ियों परवान चढ़े? हिन्दी सिनेमा अपवादों को छोड़कर खासा यथास्थितिवादी रहा है और ऐसे में प्रेम जैसे स्वभाव से यथास्थितिवाद विरोधी मनोभाव का इसके मूल दर्शन के रूप में <a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/barsaat-ki-raat11.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-723" title="barsaat-ki-raat1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/barsaat-ki-raat11.jpg" alt="barsaat-ki-raat1" width="280" height="222" /></a>स्थापित होना अजब ही विरोधाभास है. लेकिन यह भी कहना होगा कि हमारे बंद घरों के लड़के-लड़कियाँ इन अपवादों को देखकर नहीं भागे, उनके लिए तो मुख्यधारा सिनेमा ने ही हमेशा वो काम पूरा किया. सुनहरे दौर की फ़िल्म <strong>’बरसात की रात’</strong> में आई कव्वाली ’ये इश्क़-इश्क़ है’ के चरम पर नायक भारत भूषण आकर माइक सम्भाल लेते हैं और मोहम्मद रफ़ी की मदभरी आवाज़ में गाते हैं,</p>
<p><em>“जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सजके.<br />
जान-अजान का ज्ञान भुलाके, लोक-लाज को तजके.<br />
बन-बन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला.<br />
दर्शन-जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">और नायिका मधुबाला उन्हें रेडियो पर सुन नंगे पांव भागती हुई आती हैं. ऐसे ही कुछ जादुई सिनेमाई क्षण हर पीढ़ी के पास रहे हैं जिन्हें उसने अपने प्रेम में संदर्भ सूत्र की तरह इस्तेमाल किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">मुद्दा यह है कि और तमाम बातों में आगे बढ़-चढ़कर आज़ाद ख़्यालों से नाता जोड़ता हमारा मिडिल क्लास आज भी शादी-ब्याह में जाति के बंधनों को आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं दिखता. और यही प्रवृत्ति वर्तमान युवा प्रेम के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है. ऐसे में मुख्यधारा सिनेमा का यह खेल देखना बड़ा मज़ेदार है जिसमें बार-बार प्रेम कहानियां विषय के केन्द्र में हैं लेकिन जाति के संदर्भ सिरे से गायब हैं. हमारे दौर की अमर मान ली गई सिनेमाई प्रेम कहानी <strong>’दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’</strong> का ही किस्सा लें. फ़िल्म की मुख्य अड़चन यही है कि नायक-नायिका के संबंध नायिका के पिता को स्वीकार नहीं. लेकिन इस फ़िल्म में कहीं कोई यह मानने को राज़ी नहीं दिखता कि इसकी एक वजह जाति भी हो सकती है जो दरअसल हमारे देश में तमाम प्रेम विवाहों के रास्ते में आती सबसे मूल अड़चन है.</p>
<p style="text-align: justify;">तो फिर इन सिनेमाई प्रेम-कहानियों को किस तरह व्याख्यायित किया जाए. मुझे माणिक मुल्ला याद आते हैं और उनकी दी प्रेम कहानियां लिखने संबंधी मुख्य सीख याद आती है, <strong>“कुछ पात्र लो, और एक निष्कर्ष पहले से सोच लो, जैसे&#8230; यानी जो भी निष्कर्ष निकालना हो, फिर पात्रों पर इतना अधिकार रखो, इतना शासन रखो कि वे अपने आप प्रेम के चक्र में उलझ जाएँ और अन्त में वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचें जो तुमने पहले से तय कर रखा है.” </strong>क्या हिन्दी सिनेमा को समझने की इससे अच्छी और कोई परिभाषा आपको पहले कभी मिली है. हम तय निष्कर्षों और पूर्वनिर्धारित अंत वाले सिनेमा उद्योग हैं. ऐसी फ़िल्में बनाते हैं जिनमें किरदारों को काफ़ी हद तक छूट है मनमानी करने की, लेकिन अंत में उन्हें वापस ’सही राह’ पर आकर नैतिकता की उंगली पकड़नी ही पड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इस मनमाने खेल में काफ़ी कुछ रह जाता है जिसे पूर्व निर्धारित नहीं किया जाता और खुला छोड़ दिया जाता है. जैसा <strong>एम. माधव प्रसाद</strong> हिन्दी सिनेमा पर अपने उत्कृष्ठ अध्ययन ’आईडियोलाजी ऑफ़ दि हिन्दी फ़िल्म’ में लिखते हैं, “लोकप्रिय सिनेमा परंपरा और आधुनिकता के मध्य परंपरागत मूल्यों का पक्ष नहीं लेता. इसका एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा निर्धारित सामाजिक बंधनों के मध्य एक उपभोक्ता संस्कृति को खपाना है. इस प्रक्रिया में यह कई बार सामाजिक संरचना को बदलने के उस यूटोपियाई विचार का प्रतिनिधित्व करने लगता है जिसका वादा एक आधुनिक- पूँजीवादी राज्य ने किया था.&#8221; और यही वो अंश हैं जिन्हें देख-देखकर कई पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े. शायद यह कहना ज़्यादा ठीक हो कि सुन-सुनकर पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े क्योंकि जब इन ’प्रेम के चक्करों में’ हमारी कहानियों के पात्र उलझ जाते हैं तो यह मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा का अलिखित नियम है कि वे गीत गाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा में आए प्रेम के हर रूप को साकार करने में गीतों की सबसे अहम भूमिका है. कई बार यह गीत फ़िल्म से बाहर निकल अपना स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण कर लेते हैं. <strong>जावेद अख़्तर</strong> हिन्दी सिनेमा में प्रेम के प्रमुख स्रोत बने गीतों की इस भूमिका पर अपनी पुस्तक <strong>’टॉकिंग साँग्स’</strong> में कहते हैं,</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मुझे लगता है कि गीत एक तरह की जकड़न से मुक्ति हैं. जब आप गीत गाते हैं तो अपने भीतर किसी दबाए गए भाव, चाहत या विचार को मुक्त करते हैं. गद्य में आप उत्तरदायी होते हैं लेकिन गीत में आप बिना परवाह खुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं. अगर आप पूछें, &#8220;कौन जाने ये लोग प्यार क्यों करते हैं?&#8221; तो ज़रूर कोई जवाब में पूछेगा, &#8220;आप प्यार के इतना खिलाफ़ क्यों हैं?&#8221; लेकिन अगर आप यूं एक गाना गाएं, &#8220;जाने क्यों लोग प्यार करते हैं?&#8221; तो कोई भी आपसे इसका स्पष्टीकरण नहीं माँगेगा. लोग गीत मे अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. मुझे लगता है कि जो जितना ज़्यादा दमित होगा वो उतना ही ज़्यादा गीतों में अपनी अभिव्यक्ति पाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">किसी भी समाज में जितना ज़्यादा दमन होगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत मिलेंगे. यह आश्चर्य नहीं है कि हिन्दुस्तानी समाज में जहाँ औरतों पर दमन ज़्यादा है वहाँ उनके हिस्से गीत भी पुरुषों से ज़्यादा हैं. गरीब के हिस्से अमीर से ज़्यादा गीत है. लोक संगीत आख़िर निर्माण से लेकर संरक्षण तक आम आदमी का ही तो है. अगर गीत सिर्फ़ आनंद और आराम के प्रतीक भर हैं तो फिर इन्हें समृद्ध समाजों में अधिक मात्रा में मिलना चाहिए था लेकिन इनकी बहुतायत मिलती है श्रमिक और वंचित वर्ग के बीच. मुझे लगता है कि गाना एक तरह से आपकी सेक्सुअलिटी का प्रतीक है और अगर यह माना जाए तो समाज में जितना इंसान की सेक्सुअलिटी को दबाया जाएगा, दमित किया जाएगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत और उन्हें गानेवाले मिलेंगे.&#8221;</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/chameli-ki-shadi11.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-732" title="chameli ki shadi1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/chameli-ki-shadi11.jpg" alt="chameli ki shadi1" width="220" height="230" /></a>बासु चटर्जी की बनाई अद्भुत व्यंग्य फ़िल्म <strong>’चमेली की शादी’</strong> को ही देखें जो कस्बाऊ प्यार में ’फ़िल्मी गीतों’ के अहम रोल को बड़े मज़ाकिया अंदाज़ में हमारे सामने पेश करती है. यहाँ लड़कपन का अनगढ़ प्यार है. नायिका चमेली के नायक चरणदास से अंधाधुंध प्यार के सच्चे साथी रेडियो पर बजते हिन्दी के फ़िल्मी गीत हैं. नायिका की मां कहती भी हैं कि, “इन फ़िल्मी गानों ने ही इस लड़की का दिमाग़ खराब कर रखा है.” यह फ़िल्म इसलिए भी ख़ास है कि इसमें बड़े साफ़-साफ़ शब्दों में चमेली और चरणदास के प्रेम विवाह में बाधक बनते जाति और समुदाय के संदर्भ आते हैं. फ़िल्म में आए कुछ और संदर्भ भी नोट करने लायक हैं. नायिका स्कूल जाती है और पढ़ी लिखी है और इसके सामने उसके माता-पिता अनपढ़ हैं. वो दीवार पर अपने प्यार का इज़हार भी लिखती है तो नीचे ’दस्तख़त चमेली’ कर देती है. और मां के लिए दीवार पर लिखा प्रेम संदेसा भी ’चील-बिलाव’ सरीख़ा है. माता-पिता की सोच से उसकी सोच अलग होने में यह तथ्य एक महत्वपूर्ण सूत्र की तरह दिखाया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इस तरह की प्रगतिशीलता हिन्दी सिनेमा में कम ही मिलती है. ख़ासतौर पर प्रेम के सामने ऐसी ’तुच्छ बातों’ को हमेशा दरकिनार किया जाता है. <strong>’पड़ोसन’</strong> से लेकर हालिया <strong>’ब्रेक के बाद’</strong> तक, हमारी फ़िल्में अलग रास्तों से होते बार-बार इस निष्कर्ष तक पहुँचती दिखती हैं कि एक प्यार करने वाले लड़के का मिलना ही लड़की के जीवन की असल सफ़लता है. सोचने की बात है कि कहीं हम ’प्रेम’ की आड़ में एक पुरुषपरस्त समाज तो नहीं गढ़ रहे?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>असंभाव्य प्रेम कहानियों का कल्पनालोक</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><em>“प्यार भी भला कहीं किसी का पूरा होता है,<br />
प्यार का तो पहला ही अक्षर अधूरा होता है.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">इससे इतर एक और मुद्दा है जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए. पिछले दिनों हिन्दी सिनेमा के कुछ अमर प्रेम प्रसंग छांटते हुए इस ओर मेरी निगाह गई. क्या यह देखना रोचक नहीं कि ऐसे किसी भी चयन में बार-बार आपकी उंगली जहाँ ठहरती है वो एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसके पूरा होने में कोई न कोई अड़चन है. प्रेम के साथ जुड़ा यह ’शहीदी भाव’ शायद उसे ज़्यादा गहरा और कालातीत बनाता है. इस गिनती में सबसे आगे हिन्दी सिनेमा का अमर शाहकार याद आता है,<strong> ’मुग़ल-ए-आज़म’</strong>. सलीम और अनारकली का प्रेम ऐसा ही प्रेम है जिसकी राह में ’क्लास’ का अंतर बहुत बड़ा है. हिन्दुस्तान के होनेवाले शहंशाह को एक कनीज़ से प्यार हो गया है. नायिका शीशमहल में हज़ारों अक़्स के बरक़्स गाती है, “प्यार किया तो डरना क्या” और हिन्दुस्तान के सबसे महान शहंशाह अपने आप को चारों ओर से एक नाचीज़ के प्रतिबिम्ब से घिरा पाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा की निर्विवाद रूप से सबसे मशहूर फ़िल्म <strong>’शोले’</strong> भी ऐसी ही एक असंभाव्य प्रेम कहानी अपने भीतर समेटे है. जय (अमिताभ) और राधा (जया) की यह मूक प्रेम कहानी समाज की प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध है. इस प्रेम कहानी बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है. लेकिन इस फ़िल्म में भी शुरु से ही यह मान लिया गया है कि इस प्रेम कहानी का तारुण लेकिन सुविधाजनक अंत जय की मौत और राधा के विधवा रह जाने में ही है. इससे अलग कोई भी अंत इस फ़िल्म की लोकप्रियता में कैसा असर पैदा करता यह देखना बहुत ही मज़ेदार अनुभव हो सकता था.</p>
<p style="text-align: justify;">शायद इन्हीं तमाम वजहों से हिन्दी सिनेमा जाति के संदर्भों को सिरे से खारिज करने के बाद भी कहीं उन आकांक्षाओं और विश्वासों का प्रतीक बन जाता है जिसे युवा मन अपनी-अपनी प्रेम कहानियों में रोज़ बुन रहा है. हिन्दी सिनेमा का अंत उसे बार-बार ’पॉलिटिकली करेक्ट’ करने की कोशिशें करता है, लेकिन उसमें विद्रोह और परंपराओं को नकारते स्वर मिल ही जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>“अरे क्या प्रेम कहानियों के दो चार अंत होते हैं.”</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1small.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-725" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1small.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="295" height="150" /></a>फिर एक <strong>दिबाकर बनर्जी</strong> आता है और हिन्दी सिनेमा में प्रेम की इस विलक्षण थाति को नए सिरे से परिभाषित करना तय करता है. यही सुविधाजनक अंत की ओर पहुँचती प्रेम कहानियाँ उसने भी देखी हैं. उसके नायक ने भी देखी हैं. <strong>’लव, सेक्स और धोखा’ </strong>का कथा नायक राहुल आदित्य चोपड़ा का अंध भक्त है और अपनी डिप्लोमा फ़िल्म के लिए एक ऐसी ही कहानी फ़िल्मा रहा है. उन्हीं सुविधाजनक अंतों की ओर बढ़ते हुए उसकी राह में कुछ ऐसे सवाल हैं जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने कबका पूछना ही छोड़ दिया है. पत्रकार और ब्लॉगर <strong>रवीश कुमार</strong> ने अपने ब्लॉग ’कस्बा’ में इस फ़िल्म को <strong>’अ-फ़िल्म’ </strong>का नाम दिया है. यह नामकरण सिर्फ़ इस फ़िल्म की नहीं, हिन्दी सिनेमा की पुरानी सारी प्रेम कहानियों की असलियत उघाड़ता है. ’लव. सेक्स और धोखा’ प्रेम के सवाल को वापस उस धरातल पर लेकर आती है जहाँ से हमारे यथार्थ की चारदीवारी शुरु होती है. यह एक बहकी हुई बहस को वापस उसके सही ढर्रे पर लाना है. सही सवालों को फिर से पूछना है. ’राहुल’ और ’श्रुति’ की हत्या अचानक एक फ़्लैशलाइट की तरह आपको यह याद दिलाती है कि हमारे समाज में ’प्रेम’ एक रूमानी ख़्याल भर नहीं, इसके बड़े गहरे सामाजिक निहितार्थ हैं. जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने हमेशा ही ’अनुकूलित’ करने का प्रयास किया है. स्पष्ट है कि ’प्रेम’ के संदर्भ में जाति के सवाल हमेशा केन्द्र में रहे हैं. हमारा सिनेमा शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन छिपाकर उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">अनुराग कश्यप की <strong>’देव डी’</strong> के आधुनिक देवदास की समस्या पारो का न मिलना या चंद्रमुखी को न भूल पाना नहीं है. उसकी असल समस्या उसके भीतर बसा आदिम ’पवित्रताबोध’ है जो उसे न पारो का होने देता है न चंदा का. जब चंदा देव को कहती है, “यू ओनली लव योरसेल्फ़. यू कांट लव एनीवन, एक्सेप्ट दिस.” तो यह हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत का प्रस्थान बिन्दु है. ऐसा बिन्दु जहाँ हमारा नायक प्रेम के लिहाफ़ में छिपाकर अपना अहम तुष्ट नहीं कर रहा. उसकी असलियत सामने है. और कम से कम हमारी नायिका उस असलियत से परिचित है.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत <strong>’लक बाए चांस’</strong> से होती है जहाँ एक नायिका ’राह भूले’ नायक की घर वापसी से बने सुविधाजनक अंत पर फ़िल्म को ख़त्म नहीं होने देती. हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत <strong>’अस्तित्व’</strong> जैसी फ़िल्म से होती है जहाँ फ़िल्म के अंत में एक सुगढ़ गृहणी अपनी पहचान तलाशने ’घर’ की चारदीवारी को छोड़ बाहर निकलती है. अगर हमें और हमारे सिनेमा को वर्तमान पीढ़ी के ’प्रेम’ के सच्चे अर्थ समझने हैं तो उसे पहले रिश्तों की बराबरी का महत्व समझना होगा. मेरे दौर की कुछ सबसे खूबसूरत प्रेम काहनियाँ बनाने वाले निर्देशक इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की तरह उसे याद रखना होगा कि जितना हक़ एक लड़के को है गलतियाँ करने का और भूल जाने का, उतना ही हक़ एक लड़की को भी होना चाहिए. उसे भी जी भर के ’कन्फ़्यूज़’ होना चाहिए और फ़िल्म द्वारा अंत में उसके किरदार की इस रूहानी सी लगती ख़ासियत को ’अनुकूलित’ नहीं किया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">*********</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भास्कर समूह की पत्रिका &#8216;अहा! ज़िन्दगी’ के फ़रवरी ’प्रेम विशेषांक’ अंक में प्रकाशित.</strong></p>
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		<title>अभिनेता के अवसान का साल</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Jan 2011 18:27:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="425" height="350" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/coxLozzNlnk" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="425" height="350" src="http://www.youtube.com/v/coxLozzNlnk"></embed></object></p>
<p style="text-align: justify;">पिछला साल खत्म हुआ था ’थ्री ईडियट्स’ के साथ, जिसे इस साल भी लगातार हिन्दी सिनेमा की सबसे ’कमाऊ पूत’ के रूप में याद किया जाता रहा. इस साल आई ’दबंग’ से लेकर ’राजनीति’ तक हर बड़ी हिट की तुलना ’थ्री ईडियट्स’ के कमाई के आंकड़ों से की जाती रही. मेरे लिए साल 2010 के सिनेमा पर बात करते हुए इनमें से कोई फ़िल्म संदर्भ बिंदु नहीं है. होनी भी नहीं चाहिए. आमिर ख़ान के ज़िक्र से शुरुआत इसलिए क्योंकि इन्हीं आमिर ख़ान ने साल 2010 में <strong>’पीपली लाइव’</strong> जैसी फ़िल्म का होना संभव बनाया. इसलिए भी कि इस फ़िल्म के प्रमोशन से जुड़ा एक किस्सा ही हमारी इस चर्चा का शुरुआती संदर्भ बिंदु है. सिनेमाघरों और टीवी पर आए ’पीपली लाइव’ के एक शुरुआती प्रोमो में एक टीवी पत्रकार कुमार दीपक को गांव पीपली से लाइव रिपोर्ट करते दिखाया गया है. दिखाया गया है कि आमिर के असर से अब गांव पीपली में उसके ही नाम के चिप्स और बिस्किट बिक रहे हैं. मज़ेदार बात तब होती है जब ’कट’ होने के बाद भी कैमरा चालू रहता है और हम पत्रकार कुमार दीपक को कहते हुए सुनते हैं कि आमिर ख़ान पगला गया है और पागलपन में कुछ भी बना रहा है. कुमार दीपक का कहना है कि ’लगान’ जैसी फ़िल्में बार-बार नहीं बनतीं और आमिर ख़ान ’पीपली लाइव’ बनाने के चक्कर में मुँह के बल गिरेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">चाहे यह आमिर का उसके पिछले प्रयोगों के प्रति कुछ कठोर रहे मुख्यधारा मीडिया पर पलटवार हो, इसमें अनजाने ही हिन्दी सिनेमा की मान्य संरचना दरकती दिखाई देती है. फ़िल्म का एक किरदार अपनी ही फ़िल्म के निर्माता के असल फ़िल्मी जीवन पर कमेंट पास करता है. जैसे कथा कहने की पारंपरिक संरचना में छेद करता है. जैसे किरदार के लिए निर्धारित दायरे को तोड़ता है. न जाने तारीफ़ में कहते थे कि उसके काम की खोट दिखाने के लिए, लेकिन हमारे दौर के महानायक शाहरुख़ के लिए उसके सुनहरे वर्षों में बार-बार यह दोहराया जाता रहा कि वह भूमिका चाहे होई भी निभाएं, लगते हर भूमिका में ’शाहरुख़ ख़ान’ ही हैं. चोपड़ाओं और उन जैसे कई और सिनेमाई घरानों की मार्फ़त बरसों से हम सुनते आए हैं कि हिन्दुस्तानी सिनेमा दर्शक के लिए उसके सपनों का संसार रचता है और इसी तर्क की आड़ लेकर बहुत बार उस सिनेमा का रिश्ता दर्शक की असल ज़िन्दगी से बिलकुल काट दिया जाता है. हिन्दी सिनेमा हमेशा ’साधारणीकरण’ सिद्धांत का कायल रहा है और ब्रेख़्त उसे मौके-बमौके बड़ी मुश्किल से याद आते हैं. उसे यह बिलकुल पसंद नहीं कि फ़िक्शन और नॉन-फ़िक्शन के तय दायरे टूटें और परदे पर चलती कथा में दर्शक की अपनी सच्चाई का ज़रा भी घालमेल हो.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन यह होता है. बीते साल में विभिन्न स्तर पर इनमें से कई प्रवृत्तियां बदलती दिखाई देती हैं, पलटती दिखाई देती हैं. हमारे शहराती जीवनानुभव की कलई खोलती दिबाकर बनर्जी की क्रम से तीसरी फ़ीचर फ़िल्म <strong>’लव, सेक्स और धोखा’</strong> फ़िक्शन सिनेमा में वृत्तचित्र का सा असर पैदा करती है. सबसे पहले ’डार्लिंग-ऑफ़-दि-क्राउड’ ’खोसला का घोंसला’, फिर विलक्षण ’ओए लक्की, लक्की ओए’ और अब आईने में दिखती कुरूप हक़ीक़त सी ’लव, सेक्स और धोखा’. दोस्तों का कहना है कि विरले बल्लेबाज़ मोहम्मद अज़रुद्दीन की तरह दिबाकर के नाम भी अब पहले तीन मौकों पर तीन शतकों सा विरला कीर्तिमान है. फ़िल्म से पहले आई अपनी एक ब्लॉग पोस्ट में दिबाकर उस दिन का किस्सा सुनाते हैं जब फ़िल्म की निर्माता एकता कपूर फ़िल्म का रफ़ कट पहली बार देख रही थीं. ज्ञात हो कि ये वही एकता कपूर हैं जिनके नाम अपने अतिनाटकीय ’के’ धारावाहिकों की बदौलत हिन्दुस्तानी टेलीविज़न की मलिका होने का ख़िताब दर्ज है. एकता के लिए फ़िल्म की प्रामाणिकता इस हद तक कटु हो जाती है कि नाकाबिलेबर्दाश्त है. एकता चलती फ़िल्म के बीच से उठ जाती हैं, दिबाकर अपने प्रयोग में कामयाब हुए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/udaan2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-707" title="udaan" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/udaan2-300x200.jpg" alt="udaan" width="300" height="200" /></a>इन्हीं एकता कपूर द्वारा निर्मित अतिनाटकीय ’के’ धारावाहिकों से निकले दो कलाकारों को मुख्य भूमिकाओं में लेकर विक्रमादित्य मोटवाने <strong>’उड़ान’</strong> बनाते हैं. साल की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म और मज़ेदार बात है कि इसे लेकर भी कई ’पारिवारिक स्रोतों’ से वैसी ही विपरीत प्रतिक्रियाएं आईं जैसी कुछ महीने पहले ’लव, सेक्स और धोखा’ को लेकर मिली थीं. ’उड़ान’ भी हिन्दुस्तानी समाज के लिए बड़ा असहज करने वाला अनुभव था, क्योंकि वह हमारे समाज की सबसे महत्वपूर्ण ’पवित्र गाय’ में से एक मानी गई संस्था – ’परिवार’, के ध्वंसावशेष अपने भीतर समेटे थी. यह लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रचलित मॉडल जैसी नहीं थी, याने यह एक ’पारिवारिक फ़िल्म’ नहीं थी. उन दो छोटे परदे के अदाकारों के अलावा ’उड़ान’ की मुख्य भूमिकाओं में दो बिलकुल नए चेहरे थे. लेकिन ’उड़ान’ की प्रामाणिकता सिर्फ़ उसकी कास्टिंग में ही नहीं थी. इस कहानी की स्वाभाविकता उसकी जान थी. बार-बार आती कविताओं से रची-बसी यह फ़िल्म दिल और ज़बान पर कड़वाहट भर देने की हद तक सच्ची थी. इतनी सच्ची की उसकी असलियत पर ही शक होने लगे. ’ऐसा ज़ालिम पिता भला कहीं होता है’, अभी-अभी उड़ान देखकर निकले किसी परिवार के मुखिया के मुँह से यह सुनना बड़ा आसान रहा होगा. लेकिन यह कड़वाहट से भरा अस्वीकार इस बात का सबूत है कि ’भैरव सिंह’ ऐसा आईना है जिसे हमारा हिन्दुस्तानी मर्द आज भी आसानी से देखने को तैयार नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>’लव, सेक्स और धोखा’</strong> को सार्वजनिक पटल पर सिर्फ़ अतिवादी प्रतिक्रियाएं ही मिलीं. आलोचकों और दर्शकवर्ग के एक हिस्से के लिए यह साल की सबसे बेहतरीन फ़िल्म थी तो एक बड़ा दर्शकवर्ग इसे सिरे से खारिज कर देना चाहता था. बहुत से दर्शकों की परिभाषा में यह ’फ़िल्म’ होने के आधारभूत नियम ही पूरे नहीं करती. हमारे दर्शकवर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज भी सिनेमा की तय परंपरा में बंधा है और वह सिनेमा को बदलता तो देखना चाहता है लेकिन मौजूदा सिनेमाई चारदीवारी के भीतर ही. और ऐसे में ’लव, सेक्स और धोखा’ की पहली कहानी ’मोहब्बत बॉलीवुड श्टाइल’ आपके सामने है. फ़िल्म का नायक सिनेमा में और उसकी सच्चाई में दिलो-जान से यकीन करता है लेकिन कम्बख़्त सिनेमा के भीतर होते हुए भी उसकी नियति हमारे सिनेमा जैसी नहीं होती. जैसे ब्रेख़्तियन थियेटर में चलते नाटक के बीच अचानक दर्शकों में से उठकर कोई आदमी नाटक के मुख्य नायक को गोली मार देता है, ठीक वैसा ही ’अ-फ़िल्मी’ अंत राहुल और श्रुति की प्रेम-कहानी का होता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/dibakar.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-697" title="dibakar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/dibakar.jpg" alt="dibakar" width="155" height="226" /></a>दिबाकर के यहाँ प्रामाणिकता और समाज की ’मिरर इमेज’ दिखाने की यह ज़िद ही अभिनेता के अवसान का कारण बनती है. इसका अर्थ यह न समझा जाए कि <strong>’लव, सेक्स और धोखा’ </strong>में काम कर रहे कलाकार अभिनेता नहीं हैं. बेशक वे अभिनेता हैं और उनमें से कुछ तो क्या कमाल के अभिनेता हैं. हिन्दी सिनेमा में इनके काम की धमक मैं आनेवाले सालों में बारम्बार सुनने की तमन्ना रखता हूँ. इसे इस अर्थ में समझा जाए कि यहाँ अभिनेता फ़िल्म की कथा को सही और सच्चे अर्थों में आप तक पहुँचाने का माध्यम भर हैं. और शायद सच्चे सिनेमा में एक अभिनेता की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका यही हो सकती है. यहाँ अभिनेता पटकथा के आगे, उस विचार के आगे, जिसे वो अपने कांधे पर रख आगे बढ़ा रहा है, गौण हो जाता है. ’लव, सेक्स और धोखा’ ऐसा अनुभव है जिसे देख लगता है कि जैसे इन कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम करना नहीं चुना, इस फ़िल्म की तीनों कहानियों ने मोहल्ले में निकल अपने नायक-नायिका खुद चुन लिए हैं. बरसों से ’स्टार सिस्टम’ की गुलामी करते आए हिन्दी सिनेमा के लिए यह मौका देखना बड़ा विलक्षण अनुभव है. यह फ़िल्म के मूल विचार &#8211; उसकी कहानी, के माध्यम &#8211; अभिनेता पर जीत का क्षण है. एक ऐसी कहानी, ऐसा विचार जिसके आगे अभिनेता गौण हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">बेला नेगी की फ़िल्म <strong>’दायें या बायें’</strong> भी इसी श्रंखला में आती है जहाँ कथा की प्रामाणिकता न सिर्फ़ असल पहाड़ी कलाकार बढ़ाते हैं बल्कि वही असल उत्तराखंडी परिवेश फ़िल्म की कथा संरचना को पूरा करता चलता है. यह अभिनेता के ह्वास का एक और आयाम है जहाँ अभिनेताओं के साथ जैसे मुख्य कथा का भी ह्वास हो जाता है. बार-बार वह उन हाशिए की कहानियों को सुनाने लगती है जिन्हें हम मुख्य कथा के साथ बंधे-बंधे भूले ही जा रहे थे. फ़िल्म वहाँ से शुरु नहीं होती जहाँ से हम चाहते थे कि वो हो और ठीक वैसे ही फ़िल्म वहाँ ख़त्म नहीं होती जहाँ हमने सोचा था कि वो होगी. समस्या कहाँ है? हम चाहते हैं कि हमारी थाली में मुख्य कथा को कढ़ाई में छौंककर, सजा-धजा कर, मेवा-इलायची डालकर बाकायदा परोसा जाए जबकि फ़िल्म हमें अपनी पसंद का फूल चुनने बगीचे में खुला छोड़ देती है. हम सिनेमा में इस मनमानी के आदी नहीं और चिड़ियाघर के जानवर की तरह तुरन्त अपने पिंजरे में वापस घुस जाना चाहते हैं. अपनी हर भूमिका में ’शाहरुख़ ख़ान’ दिखते महानायक को धता बताते हुए हमारे दौर के सबसे प्रामाणिक अभिनेता दीपक डोबरियाल ’रमेश मजीला’ को साक्षात हमारे सामने जीवित कर देते हैं. एक अभिनेता कहानी की तरफ़ से खड़ा होकर लड़ता है और उसका साथ पाकर फ़िल्म की कथा ’नायकत्व’ के विचार को क्या ख़ूब पटखनी देती है.</p>
<p style="text-align: justify;">और ऐसा ही कुछ ओंकारदास माणिकपुरी और रघुबीर यादव नया थियेटर से आए दर्जन भर दुर्लभ अभिनेताओं के साथ जुगलबंदी कर <strong>’पीपली लाइव’ </strong>में कर दिखाते हैं. यहाँ फ़िल्म की निर्देशक अनुषा रिज़वी के साथ आमिर का भी शुक्रिया. शुक्रिया इसलिए कि उन्होंने अनुषा और महमूद को उनके मनमाफ़िक सिनेमा रचने के लिए पूरा स्पेस दिया. शुक्रिया इसलिए कि उन्होंने खुद ’नत्था’ की भूमिका निभाने का लालच नहीं किया. जी हाँ, यह होना संभव था. हिन्दी सिनेमा में ऐसा बिना किसी रोक-टोक होता आया है. अगर आमिर बेखटके ’लगान’ के ’भुवन’ हो सकते हैं और चालीस पार की उमर में एक कॉलेज जाते लड़के की भूमिका निभा सकते हैं तो क्या वे ’पीपली लाइव’ के ’नत्था’ नहीं हो सकते थे? लेकिन हमारी खुशकिस्मती कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और नतीजा यह कि उनकी फ़िल्म साल 2010 में आई ’कथ्य की जीत’ वाली फ़िल्मों की श्रंखला में एक दमकती कड़ी साबित हुई. अद्वितीय रचनात्मकता के धनी ’इंडियन ओशियन’ ने इस फ़िल्म के लिए विलक्षण संगीत रचा और रघुबीर यादव का गाया छत्तीसगढ़ी जनगीत ’महंगाई डायन’ हर नई व्याख्या के साथ फ़िल्म के दायरे से बाहर निकलता गया. हर नई व्याख्या के साथ यह वर्तमान समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर मारक टिप्पणी करता प्रतीत हुआ.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/indian_ocean.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-702" title="indian ocean" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/indian_ocean-300x147.jpg" alt="indian ocean" width="300" height="147" /></a>और इन्हीं ’इंडियन ओशियन’ के ज़िक्र के साथ इस बात का रुख़ <strong>’लीविंग होम’</strong> की तरफ़ मुड़ता है. यह ऐसी संगीतमय डॉक्यूमेंट्री थी जिसने साल 2010 में सिनेमा के कई पूर्वलिखित नियमों को बदला. न केवल यह बाकायदा देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई बल्कि हाल ही में संपन्न हुए भारत के इकतालीसवें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (गोआ) में इसे हिन्दुस्तानी पैनोरमा की उद्घाटन फ़िल्म होने का सम्मान भी दिया गया. जैसे साल भर कथा फ़िल्में प्रामाणिकता की तलाश में नित नए प्रयोग करती रहीं वैसे ही इस वृत्तचित्र के निर्देशक ने कथातत्व की तलाश में अपनी फ़िल्म से स्वयं को सदा अनुपस्थित रखा. निर्देशक जयदीप वर्मा इस प्रयोग को लेकर इतना सचेत थे कि फ़िल्म के चार किरदारों से चलती किसी आपसी बातचीत में आप कहीं उनका सवाली स्वर तक नहीं पकड़ पाते. इसके चलते यह वृत्तचित्र चार मुख्य किरदारों की ऐसी कथा-यात्रा बन जाता है जो अपने समकालीन किसी और फ़िक्शन से ज़्यादा रोचक और उतसुक्ता से भरा है. चार मुख्य किरदार जो यूँ अकेले खड़े हों तो बस इस महादेश की भीड़ का हिस्सा भर हैं, लेकिन जब मिल जाएं तो इस महादेश का सबसे सच्चा और प्रतिनिधि संगीत रचते हैं. नायकों की तलाश में निरंतर भटकते समाज को जयदीप कुछ सच्चे नायक देते हैं, और वो भी उस साल में जिसे हम सिनेमाई महानायक के अवसान का एक और अध्याय गिन रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">एक और ख़ासियत है जो इन तमाम फ़िल्मों को एक सूत्र में बांधती है. न केवल यह फ़िल्में कहानी को अभिनेता से ऊपर रखती हैं, बल्कि इनके लिए परिवेश की प्रामाणिकता भी व्यावसायिक लाभ से कहीं आगे की चीज़ है. पिछले दो-ढाई दशक से, ठीक-ठीक जब से यह ’स्विट्ज़रलैंड’ नाम की बीमारी चोपड़ा साहब हिन्दी सिनेमा में लाए हैं, लगता है जैसे हिन्दी सिनेमा ’विदेशी लोकेशनों’ का गुलाम हो गया है. हमारे फ़िल्मकार बिना संदर्भ विदेश भागते दिखते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/Udaan1.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-709" title="Udaan1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/01/Udaan1-211x300.jpg" alt="Udaan1" width="211" height="300" /></a>फिर ऐसे ही दौर में ये फ़िल्में आती हैं. ’उड़ान’ का जमशेदपुर और शिमला किसी मज़बूत किरदार सरीख़ा है. ’पीपली लाइव’ का ’पीपली’ प्रियदर्शन की फ़िल्मों के गांवों की तरह वर्तमान संदर्भों से कटा गांव नहीं है. उसमें ’लालबहाद्दुर’ टाइप मृगतृष्णा सरकारी परियोजनाएं हैं तो ’सोंमेंटो’ टाइप विदेशी बीज बेचकर हिन्दुस्तानी किसान को आत्महत्या के लिए मज़बूर करती बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के संदर्भ भी. ’दायें या बायें’ में आया प्रामाणिक बागेश्वर का पहाड़ी इलाका है जो शहर में रहते हर पहाड़ी को उसके ’रटी हुई सीढ़ियों में बंटे’ गांव की याद दिला जाता है. दिल्ली शहर में रहता मैं रोज़ सुबह अखबार खोलता हूँ और रोज़ अपने शहर को और ज़्यादा ’लव, सेक्स और धोखा’ में मौजूद शहर में बदलता पाता हूँ.</p>
<p style="text-align: justify;">इन फ़िल्मों में आई परिवेश की प्रामाणिकता मुख्यधारा सिनेमा के लिए भी चुनौती है. तभी तो ’दबंग’ जैसी साल की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफ़ल फ़िल्म भी कोशिश करती दिखती है कि इस प्रामाणिकता को किसी हद तक तो बचाया जाए. करण जौहर महानायक को लेकर ’माई नेम इज़ ख़ान’ बनाते हैं जो हैं तो अब भी विदेश में लेकिन फ़िल्म में कम से कम उनके इस ’होने’ के उचित संदर्भ मिलते हैं. एक हबीब फ़ैज़ल आते हैं जो पहले तो अद्भुत प्रामाणिकता से भरी <strong>’दो दुनी चार’</strong> बनाते हैं और फिर अपने ’खांटी दिल्लीवाला’ संवादों से यशराज की <strong>’बैंड, बाजा, बारात’</strong> में असलियत के रंग भरते हैं. बेशक यशराज अब भी वही पंजाबी शादी देख, दिखा रहा है. लेकिन सिनेमा में ये हाशिए की आवाज़ें अब उनका भी जीना मुहाल करने लगी हैं. इन फ़िल्मों की नज़र से देखें तो दिखता है, हमारा सिनेमा अपनी ’सिनेमाई’ छोड़ रहा है, असलियत की संगत पाने के लिए.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> &#8216;कथादेश’ के जनवरी अंक में प्रकाशित</strong></p>
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		<title>2010 : पहले तीन नाम</title>
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		<pubDate>Fri, 31 Dec 2010 12:35:20 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[अगर मेरी कनपटी पर बंदूक रखकर पूछोगे तो मैं सबसे पहले यही तीन नाम लूँगा.]]></description>
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</strong></h1>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>दुस्साहस</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/lsd.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-650" title="lsd" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/lsd-224x300.jpg" alt="lsd" width="224" height="300" /></a></strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>कल-कल</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/Udaan-wallpaper.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-652" title="Udaan" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/Udaan-wallpaper-225x300.jpg" alt="Udaan" width="225" height="300" /></a></strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>सच्चाई</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/peepli-live-poster.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-653" title="peepli [live]" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/peepli-live-poster-225x300.jpg" alt="peepli [live]" width="225" height="300" /></a><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>मनोरंजन का बदला चेहरा</title>
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		<pubDate>Sun, 26 Dec 2010 15:49:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[अनुराग कश्यप]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[दिबाकर बनर्जी]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[राजकुमार हिरानी]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्थान पत्रिका]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी  समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के  सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के  रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है.


मज़ेदार बात है कि  बीते दशक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><em>पिछले हफ़्ते रामकुमार ने कहा कि बीते दशक में बदलते हिन्दुस्तानी  समाज की विविध धाराओं को एक अंक में समेटने की कोशिश है. आप पिछले दशक के  सिनेमा पर टिप्पणी लिखें. ख़्याल मज़ेदार था. लिखा हुआ आज की पत्रिका के  रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुआ है.</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/maqbool.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-644" title="maqbool" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/12/maqbool-300x300.jpg" alt="maqbool" width="300" height="300" /></a>मज़ेदार बात है </strong>कि  बीते दशक में सिनेमा जगत में आए पहले सबसे बड़े बदलाव की शुरुआत सत्तर एमएम  के परदे से नहीं, हमारे घर में रखे ’बुद्धू बक्से’ से होती है. एक अस्त  होता हुआ महानायक अपने डूबते फ़िल्मी करियर और कम्पनी को बचाने छोटे परदे पर  अवतरित होता है और जैसे सारी बिसात ही पलट जाती है. साल 2000 में अमिताभ  के ’कौन बनेगा करोड़पति’ में आने के साथ ही हमारे फ़िल्मी सितारों के ’मल्टी  अपीयरेंस’ जीवन की शुरुआत होती है. इस दशक में टीवी सरताज है और सितारों से  लेकर सिनेमा तक सब उसके गुलाम हैं, उसकी शरण में हैं. यह ’सिनेमा निर्माण  उद्योग’ में खुद ’सिनेमा’ के गौण हो जाने का दशक है और अब फ़िल्म के प्रचार  का बजट उसके निर्माण से सवाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>पिछले दशक की</strong> तरह यहाँ भी शुरुआत में शाहरुख़ इस खेल के बादशाह बन उभरते हैं. हर कायदे  के मौके पर पहले से मौजूद सितारा. ट्विटर पर अपनी हाज़िर जवाबी से सबको कायल  करते हैं और बहुत तराशी हुई इमेज के साथ एक ’सदा उपलब्ध’ सितारे बन जाते  हैं. लेकिन दशक के अंतिम साल में दो और ख़ान उनका सितारा डुबोते से दिखाई  देते हैं. इस बीच आमिर जैसे एक तय परियोजना के तहत आगे बढ़ते रहते हैं और  दशक के अंतिम कुछ सालों में तो जैसे उनमें छूकर सोना कर देने वाला गुण आ  जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>लेकिन जो बेहतर</strong> बदलाव हमारे  सिनेमा ने पिछले दशक में देखा है वो है परिवेश की प्रामाणिकता का आग्रह.  इसकी गूँज ’सत्या’ में ही सुनाई दी थी. और नब्बे के दशक में जिन बड़जात्याओं  की हवेलियों और चोपड़ाओं की स्विस वादियों में हिन्दी सिनेमा फंस गया था  उनसे निज़ात ज़रूरी भी थी. बदलाव का असर ऐसा हुआ कि दशक का अंत आते आते  उद्योग के सबसे बड़े बैनर यशराज को भी अपनी कहानियों में असलियत के रंग  चढ़ाने की ज़रूरत महसूस हुई. जयदीप साहनी के वहाँ होने का असर दिखता है.  ’रॉकेट सिंह’ से ’चक दे’ तक और हालिया ’बैंड, बाजा, बरात’ इस प्रामाणिकता  के आग्रह की बानगी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>यहाँ हर निर्देशक का</strong> अपना रास्ता है. एक अनुराग कश्यप हैं जिनकी फ़िल्मों का सच शुरुआत के सालों  में इतना कड़वा था कि हमसे हजम ही नहीं हुआ. एक के बाद एक उनकी फ़िल्में बैन  होती गईं. एक दिबाकर हैं जिन्होंने शुरुआत तो की हिन्दुस्तानी मिडिल-क्लास  की ’डार्लिंग ऑफ़ दि क्राउड’ ’खोसला का घोंसला’ बनाकर, लेकिन इस परिवेश की  प्रामाणिकता की खोज में अपनी नई फ़िल्म में नए कलाकारों और डिजिटल कैमरे के  साथ कैसे साहसिक प्रयोग कर दिखाए. विशाल ने ’मक़बूल’ से लेकर ’ओमकारा’ तक  सदियों पुराने शेक्सपियर को नितांत हिन्दुस्तानी परिवेश में पुनर्जीवित  किया, जैसे चमत्कार किया. राजकुमार हीरानी और इम्तियाज़ अली जैसे निर्देशक  एक ही कहानी हमें पूरे दशक रूप बदल-बदलकर सुनाते रहे. हमने हर बार उनकी  कहानी की ईमानदारी देखी, हर बार उन्हें सर आँखों पर बिठाया. इस ख़ूबी को और  गाढ़ा करना होगा. यही असलियत का रंग निरंतर बड़ी होती हॉलीवुड की चुनौती का  जवाब है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>The ugliness of the indian male : Udaan</title>
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		<pubDate>Fri, 23 Jul 2010 17:35:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[अनुराग कश्यप]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[अगर आप भी मेरी तरह ’तहलका’ के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ’स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज़ ऑन इंडियन मैन’ नाम की उस सीरीज़ पर ज़रूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ़्ते के अंतर से आती है और किसी ख़ास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिन्दुस्तानी मर्द का एक रफ़ सा, थोड़ा मज़ाकिया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/Udaan-wallpaper.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-547" title="Udaan wallpaper" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/Udaan-wallpaper-207x300.jpg" alt="Udaan wallpaper" width="207" height="300" /></a>अगर आप भी मेरी तरह <a href="http://www.tehelka.com/" target="_blank"><strong>’तहलका’ </strong></a>के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ’<strong>स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज़ ऑन इंडियन मैन’</strong> नाम की उस सीरीज़ पर ज़रूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ़्ते के अंतर से आती है और किसी ख़ास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिन्दुस्तानी मर्द का एक रफ़ सा, थोड़ा मज़ाकिया ख़ाका हमारे सामने खींचती है. वो बाहरी पहचानों से मिलाकर एक स्कैच तैयार करती है, मैं भीतर की बात करता हूँ&#8230; ’हिन्दुस्तानी मर्द’. आखिर क्या अर्थ होते हैं एक ’हिन्दुस्तानी मर्द’ होने के? क्या अर्थ होते हैं अपनी याद्दाश्त की शुरुआत से उस मानसिकता, उस सोच को जीने के जिसे एक हिन्दुस्तानी मर्द इस समाज से विरासत में पाता है. सोचिए तो, हमने इस पर कितनी कम बात की है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सही है, इस पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री होना एक सतत चलती लड़ाई है, एक असमाप्त संघर्ष. और हमने इस निहायत ज़रूरी संघर्ष पर काफ़ी बातें भी की हैं. लेकिन क्या हमने कभी इस पर बात की है कि इस पुरुषसत्तात्मक समाज में एक पुरुष होना कैसा अनुभव है? और ख़ास तौर पर तब जब वक़्त के एक ख़ास पड़ाव पर आकर वो पुरुष महसूस करे कि इस निहायत ही एकतरफ़ा व्यवस्था के परिणाम उसे भी भीतर से खोखला कर रहे हैं, उसे भी इस असमानता की दीवार के उस तरफ़ होना चाहिए. इंसानी गुणों का लिंग के आधार पर बँटवारा करती इस व्यवस्था ने उससे भी बहुत सारे विकल्प छीन लिए हैं. क्या कोई कहेगा कि जैसे बचपन में एक लड़की के हाथ में गुड़िया दिया जाना उसके मूल चुनाव के अधिकार का हनन है ठीक वैसे ही लड़के के हाथ में दी गई बंदूक भी अंतत: उसे अधूरा ही करती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और फिर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Udaan_(2010_film)" target="_blank"><strong>’उड़ान’</strong></a> आती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसी ’आम राय’ बनाई जा रही है, मैं उसे नकारता हूँ. <strong>’उड़ान’</strong> पीढ़ियों के अंतर (जैनरेशन गैप) के बारे में नहीं है. यह एक ज़ालिम, कायदे के पक्के, परंपरावादी पिता और अपने मन की उड़ान भरने को तैयार बैठे उसके लड़के के बीच पनपे स्वाभाविक तनाव की कहानी नहीं है जैसा इसका प्रचार संकेत करता रहा. किसी भी महिला की सक्रिय उपस्थिति से रहित यह फ़िल्म मेरे लिए एक नकार है, नकार लड़कपन की दहलीज़ पर खड़े एक लड़के का उस मर्दवादी अवधारणा को जिसे हमारा समाज एक नायकीय आवरण पहनाकर सदियों से तमाम लोकप्रिय अभिव्यक्ति माध्यमों में बेचता आया है. नकार उस खंडित विरासत का जिसे लेकर उत्तर भारत का हर औसत लड़का पैदा होता है. विरासत जो कहती है कि वीरता पुरुषों की जागीर है और सदा पवित्र बने रहना स्त्रियों का गहना. पैसा कमाकर लाना पुरुषों का काम है और घर सम्भालना स्त्रियों की ज़िम्मेवारी.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">उड़ान एक सफ़र है. <strong>निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने</strong> के रचे किरदार, सत्रह साल के एक लड़के <strong>’रोहन’ </strong>का सफ़र. जिसे त्रिआयामी बनाते हैं फ़िल्म में मौजूद दो और पुरुष किरदार, <strong>’भैरव सिंह’ </strong>और <strong>’अर्जुन’</strong>. शुरुआत से नोटिस कीजिए. जैसे भैरव सिंह रोहन पर अपना दबदबा स्थापित करते हैं ठीक वैसे ही रोहन सिंह अर्जुन पर अपना दबदबा स्थापित करता है. अर्जुन के घर की सीढ़ियों पर बार-बार ऊपर नीचे होने के वो दृश्य कौन भूल सकता है. वो अभी छोटा है, दो ’मर्दों’ के बीच अपनी मर्दानगी दिखाने का ज़रिया, एक शटल-कॉक. बेटा सीढ़ियों पर बैठा अपने पिता को इंतज़ार करवाता है और पिता अपने हिस्से की मर्दानगी भरा गुस्सा दिखाता उन्हें पीछे छोड़ अकेला ही गाड़ी ले जाता है. नतीजा, बेचारा बीमार अर्जुन पैदल स्कूल जाता है. रास्ते में वो रोहन का हाथ थामने की कोशिश करता है. वो अकेला बच्चा सिर्फ़ एक नर्म-मुलायम अहसास की तलाश में है. लेकिन रोहन कोई उसकी ’माँ’ तो नहीं, वो उसे झिड़क देता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन फिर धीरे से किरदार का ग्राफ़ घूमने लगता है. जहाँ एक ओर भैरव सिंह अब एक खेली हुई बाज़ी हैं, तमाम संभावनाओं से चुके, वहीं रोहन में अभी अपार संभावनाएं बाक़ी हैं. इस लड़के की ’एड़ी अभी कच्ची है’. बदलाव का पहिया घूमने लगता है. हम एक मुख़र मौन दृश्य में रोहन और अर्जुन के किरदारों को ठीक एक सी परिस्थिति में खड़ा पाते हैं. शायद फ़िल्म पहली बार वहीं हमें यह अहसास करवाती है. अर्जुन का किरदार अनजाने में ही रोहन के भीतर छिपे उस ज़रा से ’भैरव सिंह’ को हमारे सामने ले आता है जिसे एक भरा-पूरा ’भैरव सिंह’ बनने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगने वाला. लेकिन शायद तभी&#8230; किसी अदृश्य कोने में छिपा रोहन भी ये दृश्य देख लेता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">चक्का घूम रहा है. रोहन लगातार तीन दिन तक अर्जुन की तीमारदारी करता है. उसे कविताएँ सुनाता है. उसके लिए नई-नई कहानियाँ गढ़ता है. उसे अपना प्यारा खिलौना देता है और खूब सारी किताबें भी. उससे दोस्तों के किस्से सुनता है, उसे दोस्तों के किस्से सुनाता है. उसके बदन पर जब चमड़े की मार के निशान देखता है तो पलटकर बच्चे से कोई सवाल नहीं करता. सवाल मारनेवाले से करता है और तनकर-डटकर करता है. पहचानिए, यह वही रोहन है जो ’कोई उसकी माँ तो नहीं’ था.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मध्यांतर के ठीक पहले एक लम्बे और महत्वपूर्ण दृश्य में भैरव सिंह रोहन को धिक्कारता है, धिक्कारता है बार-बार ’लड़की-लड़की’ कहकर. धिक्कारता है ये कहकर कि ’थू है, एक बार सेक्स भी नहीं किया.’ यह भैरव सिंह के शब्दकोश की गालियाँ हैं. एक ’मर्द’ की दूसरे ’मर्द’ को दी गई गालियाँ. लेकिन हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा की उम्मीदों से उलट, फ़िल्म का अंत दो और दो जोड़कर चार नहीं बनाता. रोहन इन गालियों का जवाब क्लाइमैक्स में कोई ’मर्दों’ वाला काम कर नहीं देता. या शायद यह कहना ज़्यादा अच्छा हो कि उसके काम को ’असली मर्दों’ वाला काम कहना उसके आयाम को कहीं छोटा करना होगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक विशुद्ध काव्यात्मक अंत की तलाश में भटकती फ़िल्मों वाली इंडस्ट्री से होने के नाते तो उड़ान को वहीं ख़त्म हो जाना चाहिए था जहाँ अंतत: रोहन के सब्र का बाँध टूट जाता है. वो पलटकर अपने पिता को उन्हीं की भाषा में जवाब देता है. और फिर एक अत्यंत नाटकीय घटनाक्रम में उन्हें उस ’जैसे-सदियों-से-चली-आती-खानदानी-दौड़’ में हराता हुआ उनकी पकड़ से बचकर दूर निकल जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/udaan-wallpaper2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-551" title="udaan wallpaper" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/udaan-wallpaper2-300x200.jpg" alt="udaan wallpaper" width="300" height="200" /></a>लेकिन नहीं, ऐसा नहीं होता. फ़िल्म का अंत यह नहीं है, हो भी नहीं सकता. रोहन वापस लौटता है. ठीक अंत से पहले, पहली बार फ़िल्म में एक स्त्री के होने की आहट है. वो स्त्री जिसका अक़्स पूरी फ़िल्म में मौजूद रहा. पहली बार उस स्त्री का चेहरा दिखाई देता है. वो स्त्री जो रोहन के भीतर मौजूद है. अंत जो हमें याद दिलाता है कि हर हिन्दुस्तानी मर्द के DNA का आधा हिस्सा उसे एक स्त्री से मिलता है. और ’मर्दानगी’ की हर अवधारणा उस भीतर बसी स्त्री की हत्या पर निर्मित होती है. यह अंत उस स्त्री की उपस्थिति का स्वीकार है. न केवल स्वीकार है बल्कि एक उत्सवगान है. क्या आपको याद है फ़िल्म का वो प्रसंग जहाँ अर्जुन और रोहन अपनी माँओं के बारे में बात करते हैं. रोहन उसे बताता है कि मम्मी के पास से बहुत अच्छी खुशबू आती थी, बिलकुल मम्मी वाली. अर्जुन उस अहसास से महरूम है, उसने अपनी माँ को नहीं देखा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमें पता नहीं कि रोहन ने उन तसवीरों में क्या देखा. लेकिन अब हम जानते हैं कि रोहन वापस आता है और अर्जुन को अपने साथ ले जाता है. उस रौबीली शुरुआत से जहाँ रोहन ने अर्जुन से बात ही ’सुन बे छछूंदर’ कहकर की थी, इस ’माँ’ की भूमिका में हुई तार्किक परिणिति तक, रोहन के लिए चक्का पूरा घूम गया है. एक लड़के ने अपने भीतर छिपी उस ’स्त्री’ को पहचान लिया जिसके बिना हर मर्द का ’मर्द’ होना कोरा है, अधूरा है. फ़िल्म के अंतिम दृश्य में रास्ता पार करते हुए रोहन अर्जुन का हाथ थाम लेता है. गौर कीजिए, इस स्पर्श में दोस्ती का साथ है, बराबरी है. बड़प्पन का रौब और दबदबा नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अंत में रोहन की भैरव सिंह को लिखी वो चिठ्ठी बहुत महत्वपूर्ण है. आपने गौर किया – वो अर्जुन को अपने साथ ले जाने की वजह ये नहीं लिखता कि “नहीं तो आप उसे मार डालेंगे”, जैसा स्वाभाविक तौर पर उसे लिखना चाहिए. वो लिखता है कि “नहीं तो आप उसे भी अपने जैसा ही बना देंगे. और इस दुनिया में एक ही भैरव सिंह काफ़ी हैं, दूसरा बहुत हो जाएगा.” क्या आपने सोचा कि वो ऐसा क्यों लिखता है? दरअसल खुद उसने अभी-अभी, शायद सिर्फ़ एक ही रात पहले वो लड़ाई जीती है. ’वो लड़ाई’&#8230; ’भैरव सिंह’ न होने की लड़ाई. अब वो फ़ैंस के दूसरी तरफ़ खड़ा होकर उस किरदार को बहुत अच्छी तरह समझ पा रहा है जो शायद कल को वो खुद भी हो सकता था, लेकिन जिसे उसने नकार दिया. वो अर्जुन को एक भरपूर बचपन देगा. जैसा शायद उसे मिलना चाहिए था. और बीते कल में शायद कहीं भैरव सिंह को भी.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/udaan-wallpaper1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-552" title="udaan wallpaper1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/07/udaan-wallpaper1-300x200.jpg" alt="udaan wallpaper1" width="300" height="200" /></a>रोहन उस चिठ्ठी के साथ वो खानदानी घड़ी भी भैरव सिंह को लौटा जाता है. परिवार के एक मुखिया पुरुष से दूसरे मुखिया पुरुष के पास पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचती ऐसी अमानतों का वो वारिस नहीं होना चाहता. यह उसकी परंपरा नहीं. होनी भी नहीं चाहिए. यह उसका अंदाज़ है इस पुरुषवर्चस्व वाली व्यवस्था को नकारने का. वो और उसकी पीढ़ी अपने लिए रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ेगी. ऐसे रिश्ते जिनमें संबंधों का धरातल बराबरी का होगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">किसी भी महिला किरदार की सचेत अनुपस्थिति से पूरी हुई उड़ान हमारे समय की सबसे फ़िमिनिस्ट फ़िल्म है. <strong>अनुराग कश्यप </strong>की पिछ्ली फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev_D" target="_blank"><strong>’देव डी’ </strong></a>के बारे में लिखते हुए मैंने यह कहा था – दरअसल मेरे जैसे (उत्तर भारत के भी किसी शहर, गाँव कस्बे के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास से निकलकर आया) हर लड़के की असल लड़ाई तो अपने ही भीतर कहीं छिपे ’देवदास’ से है. अगर हम इस दुनिया की बाकी आधी आबादी से बराबरी का रिश्ता चाहते हैं तो पहले हमें अपने भीतर के उस ’देवदास’ को हराना होगा जिसे अपनी बेख़्याली में यह अहसास नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था कहीं और से नहीं, उसकी सोच से शुरु होती है. ’उड़ान’ के रोहन के साथ हम इस पूरे सफ़र को जीते हैं. यह एक त्रिआयामी सफ़र है जिसके एक सिरे पर भैरव सिंह खड़े हैं और दूसरे पर एक मासूम सा बच्चा. रोहन के ’भैरव सिंह’ होने से इनकार में दरअसल एक स्वीकार छिपा है. स्वीकार उस आधी आबादी के साथ समानता के रिश्ते की शुरुआत का जिससे रोहन भविष्य के किसी मोड़ पर टकराएगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और सिर्फ़ रोहन ही क्यों. जैसा मैंने पहले लिखा था, “उड़ान हमारे वक़्तों की फ़िल्म है. आज जब हम अपने-अपने चरागाहों की तलाश में निकलने को तैयार खड़े हैं, ’उड़ान’ वो तावीज़ है जिसे हमें अपने बाज़ू पर बाँधकर ले जाना होगा. याद रखना होगा.” ठीक, याद रखना कि हम सबके भीतर कहीं एक ’लड़की’ है, और उसे कभी मिटने नहीं देना है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>देवदास को आईना दिखाती चंदा और पारो : साल दो हज़ार नौ में हिन्दी सिनेमा</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/cinema-2009/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2010/01/cinema-2009/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 19:35:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[तहलका]]></category>
		<category><![CDATA[देव डी]]></category>
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		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. ’तहलका’ से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-308" title="luck-by-chance-wallpaper-1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/luck-by-chance-wallpaper-1-225x300.jpg" alt="luck-by-chance-wallpaper-1" width="225" height="300" /></a>महीना था जनवरी का और तारीख़ थी उनत्तीस. <strong><a href="http://www.tehelkahindi.com/" target="_blank">’तहलका’</a></strong> से मेरे पास फ़ोन आया. तक़रीबन एक हफ़्ता पहले मैंने उन्हें अपने ब्लॉग का यूआरएल मेल किया था. ’आप हमारे लिए सिनेमा पर लिखें’. ’क्या’ के जवाब में तय हुआ कि कल शुक्रवार है, देखें कौनसी फ़िल्म प्रदर्शित होने वाली है. क्योंकि कल तीस तारीख़ भी है और अंक जाना है इसलिए किसी एक फ़िल्म की समीक्षा कर रात तक हमें भेज दें. अगले हफ़्ते हमें <strong><a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank">गोरखपुर फ़िल्म उत्सव</a></strong> के लिए निकलना था और हम उसकी ही तैयारियों में जुटे थे. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Victory_(film)" target="_blank">’विक्टरी’</a></strong> का हश्र मैं पहले से जानता था, तय हुआ कि ज़ोया अख़्तर की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Luck_By_Chance" target="_blank">’लक बाय चांस’</a></strong> देखी जाएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आज मैं इस घटना से तक़रीबन एक साल दूर खड़ा हूँ लेकिन इस साल आए लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा पर बात शुरु करते हुए बार-बार मेरा ध्यान इसी फ़िल्म पर जाता है. हाँ यह मेरे लिए इस साल की पहली उल्लेखनीय फ़िल्म है क्योंकि रोहन सिप्पी और कुणाल रॉय कपूर की बनाई बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य कथा <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_President_Is_Coming" target="_blank">’दि प्रेसिडेंट इज़ कमिंग’</a></strong> मैं बहुत बाद में देख पाया. बहरहाल ’लक बाय चांस’ इस साल की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म नहीं है. शायद मैं इस जगह<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D" target="_blank"> ’देव डी’</a></strong> को रखूँगा. हद से हद उसे हम औसत से थोड़ा ऊपर गिन सकते हैं. लेकिन ’देव डी’ तक पहुँचने का रास्ता इसी फ़िल्म से होकर जाता है. शायद इसके माध्यम से वो कहना संभव हो पाए जिसे मैं हिन्दी सिनेमा के एक बड़े बदलाव के तौर पर चिह्नित कर रहा हूँ.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक <strong>’लक बाय चांस’</strong> को एक ख़ास मल्टीप्लेक्स-यूथ श्रंखला की फ़िल्मों वाले खांचे में फ़िट किया जा सकता है और इसकी पूर्ववर्ती फ़िल्मों में <strong>’दिल चाहता है’</strong> से <strong>’रॉक ऑन’</strong> तक सभी को गिना जाता है लेकिन एक मूल अंतर है जो ’लक बाय चांस’ को अपनी इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों से अलग बनाता है और वो है इसका अंत. जैसा मैंने अपनी समीक्षा में लिखा था,</p>
<blockquote style="text-align: justify;"><p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-317" title="zoya akhtar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/29slide1-150x150.jpg" alt="zoya akhtar" width="150" height="150" /></a>“लेकिन वो इसका अन्त है जो इसे ’दिल चाहता है’ और ’रॉक ऑन’ से ज़्यादा बड़ी फ़िल्म बनाता है. अन्त जो हमें याद दिलाता है कि बहुत बार हम एक परफ़ैक्ट एन्डिंग के फ़ेर में बाक़ी ’आधी दुनिया’ को भूल जाते हैं. याद कीजिए ’दिल चाहता है’ का अन्त जहाँ दोनों नायिकायें अपनी दुनिया खुशी से छोड़ आई हैं और तीनों नायकों के साथ बैठकर उनकी (उनकी!) पुरानी यादें जी रही हैं. या ’रॉक ऑन’ का अन्त जहाँ चारों नायकों का मेल और उनके पूरे होते सपने ही परफ़ैक्ट एन्डिंग बन जाते हैं. अपनी तमाम खूबियों और मेरी व्यक्तिगत पसंद के बावजूद ये बहुत ही मेल-शॉवनिस्टिक अन्त हैं और यहीं ’लक बाय चांस’ ख़ुद को अपनी इन पूर्ववर्तियों से बहुत सोच-समझ कर अलग करती है. ’लक बाय चांस’ इस तरह के मेल-शॉवनिस्टिक अन्त को खारिज़ करती है. फ़िल्मी भाषा में कहूं तो यह एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का महिला-प्रधान अन्त है. ज़्यादा खुला और कुछ ज़्यादा संवेदनशील. एक नायिका की भूली कहानी, उसका छूटा घर, उसके सपने, उसका भविष्य. आखिर यह उसके बारे में भी तो है. यह अन्त हमें याद दिलाता है कि बहुत दिनों बाद इस पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री में एक लड़की निर्देशक के तौर पर आई है!”</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">एक पुरुष-प्रधान फ़िल्म का एक महिला-प्रधान अन्त. यहाँ एक और गौर करने की बात है, मेरी इस समीक्षा को पढ़कर एक पाठक ने टिप्पणी की थी कि जिस अन्त की आप तारीफ़ कर रहे हैं वो तो फ़िल्म में अलग से जोड़ा हुआ लगता है. कहना होगा कि ख़ामी के बावजूद यह एक ईमानदार टिप्पणी है. सच है कि फ़िल्म की बाकी कहानी से फ़िल्म का अन्त अलग है. लेकिन यही ’जोड़े हुए अन्त’ वाला तरीका हमें एक झटके के साथ समझाता है कि हमारी मुख्यधारा सिनेमा की कहानियाँ कितनी ज़्यादा पुरुष केन्द्रित होती हैं. और हम इस सांचे में इतना गहरे ढल चुके हैं कि इससे परेशानी होना तो दूर की बात है, हमें यह अजीब भी नहीं लगता. हमारे सिनेमा में बीती हुई कहानियाँ (पास्ट स्टोरीज़) सिर्फ़ नायकों के पास होती हैं, नायिकाओं के पास नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-311" title="gulaalposter" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/gulaalposter1.jpg" alt="gulaalposter" width="140" height="200" /></a>और इसी अंत की वजह से ’लक बाय चांस’ इस साल की दो सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्मों अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gulaal" target="_blank">’गुलाल’</a></strong> और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a> </strong>की पूर्वपीठिका बनती है. पहले बात <strong>’गुलाल’</strong> की. ’गुलाल’ इतनी आसानी से हजम होनेवाली फ़िल्म नहीं है. इस पर मेरी दोस्तों से लम्बी बहसें हुई हैं. गुलाल का समाज कैसा है? उसे क्या मानकर पढ़ा जाए – यथार्थ या फंतासी? लेकिन इन सवालों से अलग शुरुआत में मेरा फ़िल्म को लेकर मुख्य आरोप यह रहा कि मुख्य किरदार के साथ-साथ चलते हुए बीच में कहीं फ़िल्म भी यह समझ खो देती है कि इस व्यवस्था की असली शिकार आखिर में स्त्री है. तो क्या ’गुलाल’ स्त्री विरोधी फ़िल्म है और <strong>मधुर भंडारकर </strong>की फ़िल्मों की तरह क्या वो भी जिस समस्या के खिलाफ़ बनाई गई है उसे ही बेचने लगती है?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे खुशी है कि मैं यहाँ गलत था. <strong>’गुलाल’</strong> की बहुत सी समस्याएं तो उसे एक फंतासी मानकर पढ़ने से हल होती हैं. इस मायने में ’गुलाल’ का पुरुष-प्रधान समाज <strong>मुक्तिबोध</strong> की कविता <strong>’अंधेरे में’</strong> के डरावने अंधेरे की याद दिलाता है. यह निरंकुश व्यवस्था का चरम है. लेकिन मेरे आरोप का जवाब यहाँ भी फ़िल्म के अन्त में छिपा है. मेरे मित्र पल्लव ने ऐसी ही किसी उत्तेजक बहस के बीच में कहा था कि ’गुलाल’ का असल अर्थ वहाँ खुलता है जहाँ फ़िल्म के आखिरी दृश्य में नायिका गुलाल पुते चेहरों की भीड़ में खड़ी है और उसके भाई की ताजपोशी हो रही है. नायिका की आँख से बह निकले एक आँसू में सम्पूर्ण ’गुलाल’ का अर्थ समाहित है. व्यवस्था परिवर्तन होता है और एक स्त्री को माध्यम बनाकर होता है लेकिन इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद इस पुरुष-प्रधान समाज का ढांचा ज़रा नहीं बदलता. माना कि ’गुलाल’ में स्त्री का दृष्टिकोण फ़िल्म में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं है लेकिन आपको गुलाल के असल अर्थ तभी समझ आयेंगे जब आप उस स्त्री के नज़रिए को अपने साथ रख फ़िल्म देखेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-304" title="dev-d" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/dev-d-200x300.jpg" alt="dev-d" width="200" height="300" /></a>अनुराग कश्यप की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dev.D">’देव डी’</a></strong> पारंपरिक चरित्रों की नई व्याख्या के लिए मील का पत्थर मानी जानी चाहिए. अगर देवदास उपन्यास और उस पर बनी पहले की फ़िल्में (विशेष तौर से संजय लीला भंसाली का अझेल मैलोड्रामा) सिर्फ़ देवदास की कहानी हैं तो अनुराग की ’देव डी’ देवदास के साथ-साथ चंदा और पारो की भी कहानी है. देवदास दरअसल हिन्दी सिनेमा का सतत कुंठित नायक है. उसमें एक ’शहीदी भाव’ सदा से मौजूद रहा है. कभी उसके हाथ पर ’मेरा बाप चोर है’ लिख दिया गया है (दीवार में अमिताभ) तो कभी उसके पिता को उनके ही दोस्त ने धोखे से मार दिया है (बाज़ीगर में शाहरुख़). हिन्दुस्तानी सिनेमा का महानायक हमेशा ऐसी ’पास्ट लाइफ़ स्टोरीज़’ अपने साथ रखता है जिससे उसके आनेवाले सभी कदम जस्टीफाइड साबित हों. और नायिकाएं होती हैं जिनकी कोई पिछली कहानियाँ नहीं होती. लेकिन ’देव डी’ में चंदा की भी कहानी है और पारो की भी. और यही ’अन्य कहानियाँ’ हमारी ’मुख्य कथा’ को आईना दिखाती हैं. अपनी व्याख्या को ही अकेली व्याख्या मानकर चलने वाला हमारा फ़िल्मी नायक आखिर ’ख़ामोशी के उस पार’ की आवाज़ सुन पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’देव डी’</strong> में जब चंदा देव को कहती है कि ’तुम किसी और से प्यार नहीं करते. तुम सिर्फ़ अपने आप से प्यार करते हो’ तो दरअसल वो यहाँ हिन्दुस्तानी सिनेमा के सबसे चहेते नायकीय किरदार को आईना दिखा रही है. यही अंतर है देवदास और ’देव डी’ में. अनुराग देव के पिता का किरदार इसीलिए बदल देते हैं. देव के पिता यहाँ एक नरम मिजाज़ लिबरल बाप की भूमिका में हैं ताकि कोई गलतफ़हमी न बाकी रहे. हमें यह मालूम होना चाहिए कि देव और पारो के न मिल पाने की वजह देव के पिता का सामंती व्यवहार नहीं था. देव द्वारा पारो को चाहने और उसकी याद में अपनी ज़िन्दगी जला लेने के दावे के बावजूद सच यह है कि देव के भीतर भी एक ऐसा पुरुष बैठा है जो अंत में पारो को उन्हीं कसौटियों पर कसता है जो इस सामंती और पुरुषसत्तात्मक समाज ने एक लड़की के लिए बनाई हैं. इस देवदास का थोड़ा सा हिस्सा हर हिन्दुस्तानी पुरुष के भीतर कहीं है. आपके भीतर भी, मेरे भीतर भी. जब <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Aaj_Kal" target="_blank">’लव आजकल’</a></strong> में जय, वीर सिंह से सवाल करता है कि ’अब मीरा किसी और के साथ है और जब वो किसी और के साथ है तो फिर उनके बीच ’वो सब’ भी होगा, फिर मुझे बुरा क्यों लग रहा है?’ तो यह उसके भीतर कहीं बचा रह गया वही ’देवदास’ है जिसके लिए स्त्री एक ऑबजेक्ट पहले है और बाद में कुछ और. और जब फ़िल्म के आखिर में वो वापस मीरा के पास लौटता है तो उसका एक शादीशुदा लड़की को पहले हुए ’वो सब’ के बारे में पूछे बिना प्रपोज़ करना उसी ’देवदास’ पर एक छोटी सी जीत है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमारी लड़ाई भी अपने भीतर के ’देवदासों’ से ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-318" title="Khargosh-Hindi" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/Khargosh-Hindi1.jpg" alt="Khargosh-Hindi" width="225" height="143" /></a>मुख्यधारा से अलग हटकर मैंने दो हज़ार नौ में जो सबसे बेहतरीन फ़िल्में देखी उनमें से ज़्यादातर आपके लिए दो हज़ार दस की फ़िल्में होने वाली हैं. इन्हीं में से एक <strong>’खरगोश’</strong> को मैं हिन्दी सिनेमा के सबसे संभावनापूर्ण प्रयासों में से एक गिन रहा हूँ. <strong>’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’</strong> अपने विज़ुअल टेक्स्ट में चमत्कार पैदा करती है और इस सिनेमा माध्यम की असल विज़ुअल ताक़त का अहसास करवाती है. मराठी फ़िल्म <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishchandrachi_Factory" target="_blank">’हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’</a></strong> तो अपने ऑस्कर नामांकन के साथ अभी से चर्चा में आ गई है. इस फ़िल्म में ’लगे रहो मुन्नाभाई’ की ज़िन्दादिली और ’गांधी’ की सी प्रामाणिकता एक साथ मौजूद है. उम्मीद करें कि नए साल में परेश कामदार की ’खरगोश’, अमित दत्ता की ’आदमी की औरत तथा अन्य कहानियाँ’ और परेश मोकाशी की ’हरिशचंद्राची फैक्ट्री’ को बड़ा परदा नसीब हो और हमें इन फ़िल्मों को विशाल सार्वजनिक प्रदर्शन में देखकर एक बार फिर इस सिनेमा नामक जादुई माध्यम के जादू से चमत्कृत होने का मौका मिले.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: मासिक पत्रिका <strong>समकालीन जनमत </strong>के कॉलम <strong>’बायस्कोप’</strong> में प्रकाशित. <strong>जनवरी 2010</strong>.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-313" title="love-aaj-kal-saif-deepika" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/love-aaj-kal-saif-deepika.jpg" alt="love-aaj-kal-saif-deepika" width="744" height="322" /></a></p>
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		<title>&#8220;मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!&#8221; ~पीयूष मिश्रा.</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 16:37:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Piyush_Mishra" target="_blank"><strong>पीयूष मिश्रा</strong></a> से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा &#8211; परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में &#8216;पॉलिटिकली करेक्ट&#8217; रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.<br style="background-color: #cccccc;" /></p>
<p style="text-align: justify;">लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे &#8216;गुम&#8217; हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~<strong><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p>
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</p>
<p><strong>वरुण~</strong> आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>पीयूष~</strong> </span>(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.</p>
<p>लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक&#8230; उसके बाद में लेफ्ट आपको&#8230; या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ&#8230; लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ&#8230; तब आप बहुत सुखी&#8230; (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.</p>
<p>और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो&#8230; तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब&#8230; बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा&#8230; तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (&#8230;..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था&#8230; हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ हाँ लेकिन जो लोग &#8216;एक्ट वन&#8217; को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि &#8216;एक्ट वन&#8217; में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, &#8216;एक्ट वन&#8217; की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ठीक है, वो &#8216;एक्ट वन&#8217; हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने बहुत कुछ सिखाया. &#8216;एक्ट वन&#8217; (की) &#8216;सो कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने (जीना) सिखाया&#8230; &#8216;एक्ट वन&#8217; की जो &#8216;सो-कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में&#8230; फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है&#8230; सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को&#8230; सफ़दर का काम, सफ़दर का काम&#8230; क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा&#8230; ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की&#8230; खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.</p>
<p>अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये&#8230; कर तो लिया यार&#8230; अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था&#8230; शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल&#8230; उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ&#8230; उनसे ही पूछो!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर&#8230; वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> टॉक टू हिम&#8230; टॉक टू हिम!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ऐसा कुछ नहीं है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हाँ&#8230; स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो&#8230; थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.</p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं है&#8230; आज&#8230; नसीर हैं, ओम पुरी हैं&#8230; पंकज कपूर&#8230; दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं&#8230; आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. &#8216;एक्ट वन&#8217; मैंने जब छोड़ा था &#8216;95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.</p>
<p><strong>व</strong><strong>रुण</strong>~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> &#8216;झूम बराबर झूम&#8217; में काम किया, वो चल नहीं पाई. &#8216;मक़बूल&#8217; में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला&#8230; वो भी अच्छे एक्टर हैं&#8230; पर पता नहीं कुछ कारणों से, &#8216;मक़बूल&#8217; में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. &#8216;आजा नच ले&#8217; में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा&#8230; ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे&#8230; जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ गुलाल की बात करें तो&#8230; उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>एक लाइन ली है&#8230; एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं&#8230; वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था&#8230; ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> मालूम नहीं&#8230; इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को &#8216;लेजेंड ऑफ भगत सिंह&#8217; बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है&#8230; मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हूँ&#8230; हूँ&#8230; नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (&#8217;अरे रुक जा रे बँदे&#8217;)&#8230; लाइव कॉन्सर्ट करते हैं&#8230; उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो&#8230; सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत&#8230; यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना&#8230; गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक&#8230; भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं&#8230; मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.</p>
<p>एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. &#8220;यह नाटक कर रहा है&#8230; लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!&#8221; अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है&#8230; दिल्ली के मुक़ाबले.</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) &#8220;नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.&#8221; एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)&#8230; प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या&#8230; डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में&#8230; दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ&#8230; सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?</p>
<p>वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य&#8230; क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने&#8230; ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का&#8230; गाली देने की इच्छा होती है.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)&#8230; एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.</p>
<p><strong>वरुण~</strong> लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते&#8230; उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है&#8230; अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक&#8230; कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.</p>
<p>आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा&#8230; बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो&#8230; ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है&#8230; मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी&#8230; कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ&#8230; कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को&#8230; अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.</p>
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