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	<title>आवारा हूँ... &#187; अनिल कुंबले</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>हम बड़े हुए, शहर बदल गए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Nov 2008 10:04:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[अनिल कुंबले]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>

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		<description><![CDATA[तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://pratilipi.in/wp-content/uploads/2008/10/bio-pic-varun-150x150.jpg" alt="" width="100" height="100" /><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://img2.orkut.com/images/milieu/1202650053/1202675342753/2076248/Z39qbxp.jpg?sig=4ovux1" alt="" width="80" height="110" />तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप के भीतर कहीं छुपी है. अपना microcosm खोजो और फिर देखो इस भरमाती दुनिया को. ये बातें करती है.</p>
<p><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON">वरुण</a> और मेरे लिए बहुत से मामलों में &#8216;एक-सा संगीत&#8217; है. हम दुनिया को देखने के लिए एक चश्मे का इस्तेमाल करते हैं शायद. क्रिकेट, सिनेमा और राजनीति.. हमारे लिए एक complex society को समझने का जरिया बनते हैं.  एक दूसरे की scrapbook में लिखकर अपनी उलझनें सुलझाना हमारा पुराना शगल है! वैसे भी Orkut  हमारे लिए ख़ास है क्योंकि हमारी मुलाकात यहीं हुई थी. वरुण के लेखन का मैं तब से फैन रहा हूँ जब वो<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Great_Indian_Comedy_Show"> &#8216;ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो&#8217; </a>लिखा करता था. हाल ही में उसमे अपनी पहली हिन्दी कहानी के प्रकाशन के साथ हिन्दी साहित्य जगत में भी धमाकेदार एंट्री ली है. आप <a href="http://pratilipi.in/2008/10/danube-ke-patthar-varun/">&#8216;डेन्यूब के पत्थर&#8217;</a> में ना जाने कितनी समकालीन परिस्थितियों की गूँज सुन सकते हैं.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anil_Kumble">अनिल कुंबले</a> के जाने से शायद हम दोनों अनमने से थे और ऐसे में ये Orkut की skrapbook वार्ता आई. आज पढ़ा तो मुझे लगा कि एक लेख लिखने से ज़्यादा खूबसूरत ख़याल इसे blog पर डाल देना होगा. कुंबले हमारे जीवन में क्या जगह रखता था इसे देखना ज़रूरी है.</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.dancewithshadows.com/ipl/wp-content/uploads/2008/03/anil-kumble.jpg" alt="" width="100" height="120" /><strong>मिहिर:~</strong> अरे यार.. मेरे हीरो ने आज यूँ अचानक अलविदा कह दिया. कुछ अच्छा नहीं लग रहा है&#8230;<br />
मालूम था कि एक दिन ये होगा लेकिन क्या करुँ यार.. मैं कुंबले के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकता&#8230;<br />
He is my childhood hero. my first cricket memory coincides with his first coming-of-age performance. 1993 Hero cup final where he took 6-12&#8230; is there a life after kumble&#8230;?</p>
<p><strong>वरुण:~</strong> यार&#8230;सच में&#8230; दोपहर से बड़ा ख़ाली-ख़ाली लग रहा है. कुंबले को जाना था, यह कब से मालूम था&#8230; लेकिन फिर भी, एक्सेप्ट करना मुश्किल ही होता है. मुझे भी हीरो कप का वो फाइनल हमेशा याद रहेगा. शायद दिवाली के एक-दो दिन बाद ही था&#8230; हमारे पास बहुत सारे पटाखे बचे हुए थे और हमने जम के फोड़े थे. कुंबले उस दिन ख़ुदा लग रहा था&#8230; और हमेशा ही लगा है जब उसकी फ्लिपर्स लोअर-आर्डर बल्लेबाजों को खड़े-खड़े उड़ा देती हैं.</p>
<p>एक बार साउथ अफ्रीका में शायद 89 रन भी बनाए थे और उस दिन मुझे बड़ा बुरा लगा था कि सेंचुरी नहीं हुई.</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.funmunch.com/celebrities/athletes/anil_kumble/enlarge/anil_kumble_09.jpg" alt="" width="100" height="130" />आज अचानक से यह ख़याल आया कि जब सचिन भी चला जायेगा और राहुल भी&#8230; तब हम क्रिकेट क्यूँ देखेंगे? शायद उनके साथ साथ हमें भी रिटायर हो जाना चाहिए. हम भी बूढे हो चले हैं शायद. ऐसा ही होता है &#8211; एक आइकन के गुज़र जाने से साथ में वो era, उस era की values/memories/motivations सब गुज़र जाती हैं. अपनी गुज़रती उम्र का एहसास करा जाती हैं.</p>
<p>यह बात वैसे हर दौर के लोग बोलते होंगे&#8230; (और बोलते हैं, यह जानते हुए भी, मैं कहूँगा) कि क्रिकेट अब वैसा नहीं रहा. और कुछ दिन बाद इस बात का भरम भी खत्म हो जायेगा &#8211; जब हम सचिन, राहुल, लक्ष्मण को भी अलविदा कह देंगे.</p>
<p>एक मज़ेदार बात याद आई. जब दुनिया में शायद किसी ने भी कुंबले का नाम &#8216;जम्बो&#8217; नहीं रखा था, तब भी मैं और मेरा छोटा भाई उसे &#8216;हाथी&#8217; ही बोलते थे. उसके बड़े पैरों की वजह से नहीं (जो कि शायद उसके निकनेम की असली वजह है) बल्कि इसलिए कि बॉलिंग एक्शन के वक्त उसके हाथ किसी हाथी की सूंड जैसे लहराते थे&#8230; मानो हाथी नारियल उठा के नमस्कार कर रहा हो.</p>
<p>फिर बाद में जब हमें पता चला कि टीम ने उसका नाम जम्बो रख दिया है तो हमें बड़ी खुशी हुई&#8230;</p>
<p><strong>मिहिर:~</strong> अगर मुझे सही याद है तो 88.. उसी पारी में अज़हर ने सेंचुरी बनायी थी और कुंबले ने उसके साथ एक लम्बी पार्टनरशिप की थी. अज़हर के आउट होते ही मुझे डर लगा था कि देखना अब कुंबले की सेंचुरी रह जायेगी और वही हुआ था. 90s की क्रिकेट तो मुझे (हमें!) ज़बानी रटी हुई है!</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://bp0.blogger.com/_MuOF0Z25zBA/R4em8fE-oeI/AAAAAAAAASg/iibVMSFZ6sM/s400/Anil+Kumble+Wallpaper.jpg" alt="" width="150" height="100" />एक दौर था जब मैं कुंबले के एक-एक विकेट को गिना करता था. मैं उसकी ही वजह से स्पिनर बना (अपनी गली क्रिकेट का ऑफ़ कोर्स!) और उसके होने से मुझे दुनिया कुछ ज्यादा आसान लगती थी. क्लास में बिना होमवर्क किए जाने के डर से कुंबले की बॉलिंग निजात दिलाती थी. संजय जी की डांट से कुंबले बचाता था (मुझे ऐसा लगता था). एक self-confidence आता था मेरे भीतर जो ये अनिल कुंबले नाम का शक़्स देता था. चाहे कुछ हो जाए.. चाहे मैच में स्कोर 200-1 हो लेकिन इसकी बॉलिंग में फर्क नहीं देखा कभी&#8230;</p>
<p>कभी कभी लगता है कि ये दौर आज नही ख़त्म हुआ है, ये दौर तो बहुत पहले जा चुका. लेकिन एक भरम हम बनाकर रखते हैं जैसा तुमने कहा. आज वो टूट गया&#8230;</p>
<p>टाईटन कप.. सहारा कप.. Independence cup.. टाईटन कप में कुंबले और श्रीनाथ की वो लास्ट पार्टनरशिप याद है! उस मैच में सचिन को मैन-ऑफ़-दी-मैच मिला था लेकिन बाद में सचिन ने कहा था कि मैं तो मैच को बिना जिताए आउट होकर आ गया था, मैच तो इन दोनों ने जिताया है. मैन-ऑफ़-दी-मैच तो इन्हें मिलना चाहिए. और सबने कहा था, मैच बंगलौर में था ना.. आख़िर शहर के लड़के ही स्टार बने हैं! और फिर वो फाइनल.. क्या दिन थे यार!</p>
<p>आज लगता है मैं बड़ा हो गया यार. बचपन ख़त्म हुआ&#8230;</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.hinduonnet.com/thehindu/2006/03/12/images/2006031203591901.jpg" alt="" width="100" height="160" /><strong>वरुण:~</strong> हाँ&#8230;मैं बचपन में बहुत मोटा था और तेज़ बॉलिंग तो कर ही नहीं सकता था. ऐसे वक्त में मुझे मेरा हीरो मिल गया था &#8211; कुंबले. दो लम्बी डींगें भरो, हाथ को हवा में ऊँचा ले जाओ, और गेंद छोड़ते समय ऊँगली से हल्का सा झटका या ट्विस्ट दो&#8230;लेग-स्पिन नहीं तो ऑफ़-स्पिन तो हो ही जाती थी.</p>
<p>और गेंद करने से पहले, हाथ में गेंद को घुमाते हुए उछालना&#8230; उस वक्त लगता था हम भी कुंबले हैं. लगता था बैट्समैन अब हमसे भी डर रहा होगा. मुझे आज तक हाथ में वैसे गेंद घुमाने का शौक है&#8230; और एक अजीब सा confidence आता है अपने अन्दर.</p>
<p>और सही कहते हो- वो वाला दौर कब का जा चुका. हम बस उसके illusion में जी रहे हैं&#8230; और वो भी टूटता जाता है.</p>
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