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	<title>आवारा हूँ... &#187; अकेलापन</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Mar 2012 21:48:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><em>“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को दैगो?”</em></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
’पान सिंह तोमर’</strong> अपने दद्दा से जवाब माँग रहा है. इरफ़ान ख़ान की गुरु-गम्भीर आवाज़ पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है. मैं उनकी बोलती आँखें पढ़ने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता. नहीं, ’बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं. पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है. पान सिंह को झटका लगता है. वो बुलन्द आवाज़ में चीख रहा है,<em> “हमारो जवाब पूरो ना भयो.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1040" title="Paan-Singh-Tomar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-207x300.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar" width="207" height="300" /></a>अचानक सिनेमा हाल की सार्वजनिकता गायब हो जाती है और पान सिंह की यह पुकार सीधे किसी फ़्लैश की तरह आँखों के पोरों में आ गड़ती है. हाँ, इस कथा में ’दद्दा’ मुख्य विलेन नहीं, गौण किरदार हैं. दरअसल यह कथा सीधे बीहड़ के किसान पान सिंह तोमर की भी नहीं, वह तो इस कथा को कहने का इंसानी ज़रिया बने हैं. यह कथा है उस महान संस्था की जिसके<em> ’संगे-संगे’ </em>पान सिंह तोमर की कहानी शुरु होती है और अगले पैंतीस साल किसी समांतर कथा सी चलती है. भारतीय राज्य, नेहरूवियन आधुनिकता को धारण करने वाली वो एजेंसी जिसके सहारे आधुनिकता का यह वादा समुदायगत पहचानों को सर्वोपरि रखने वाले हिन्दुस्तानी नागरिक के जीवन-जगत में पहुँचाया गया, यह उसके द्वारा दिखाए गए ध्वस्त सपनों की कथा है. उन मृगतृष्णाओं की कथा जिनके भुलावे में आकर पान सिंह तोमर का, सफ़लताओं की गाथा बना शुरुआती जीवन हमेशा के लिए पल्टी खा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह अस्सी के दशक की शुरुआत है. गौर कीजिए, स्थानीय पत्रकार (सदा मुख्य सूचियों से बाहर रहे, गज़ब के अभिनेता ब्रिजेन्द्र काला) पूछता है सूबेदार से डकैत बने पान सिंह से,<em> “बन्दूक आपने पहली बार कब उठाई?”</em> और पान सिंह का जवाब है,<em> “अंगरेज़ भगे इस मुल्क से. बस उसके बाद. पन्डित जी परधानमंत्री बन गए, और नवभारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण शुउ भओ.” </em>गौर कीजिए, अपने पहले ही संवाद में पान सिंह इस आधुनिकता के पितामह का ना सिर्फ़ नाम लेता है, उनके दिखाए स्वप्न ’नवभारत’ के साथ अपनी गहरी समानता भी स्थापित करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर तैयार किया ख़ास भारतीय आधुनिकता का मॉडल, जिसमें मिलावटी रसायन के तौर पर यहाँ की सामन्ती व्यवस्था चली आती है. यह अर्ध सामन्ती – अर्ध पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य संस्था की कथा है जिसकी बदलती तस्वीर ’पान सिंह तोमर’ में हर चरण पर नज़र आती है. मुख्य नायक खुद पान सिंह तोमर इसी पुरानी सामन्ती व्यवस्था से निकलकर आया है और आप उसके शुरुआती संवादों में समुदायगत पहचानों के लिए वफ़ादारियाँ साफ़ पढ़ सकते हैं. अफ़सर द्वारा पूछे जाने पर कि क्या देश के लिए जान दे सकते हो, उसका जवाब है,<em> “हा साब, ले भी सकते हैं. देस-ज़मीन तो हमारी माँ होती है. माँ पे कोई उँगली उठाए तो का फिर चुप बैठेंगे?” </em>और यहीं उसके जवाबों में आप नवस्वतंत्र देश के नागरिकों की उन शुरुआती उलझनों को भी पढ़ सकते हैं जो राज्य संस्था, उसके अधिकार क्षेत्र और उसकी भूमिका को ठीक से समझ पाने में अभी तक परेशानी महसूस कर रहे थे. पूछा जाता है पान सिंह से कि क्या वो सरकार में विश्वास रखता है, और उसका दो टूक जवाब है,<em> “ना साब. सरकार तो चोर है. जेई वास्ते तो हम सरकार की नौकरी न कर फ़ौज की नौकरी में आए हैं.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">स्पष्ट है कि पान सिंह के लिए राज्य द्वारा स्थापित किए जा रहे आधुनिकता के इस विचार की आहट नई है. लेकिन यह विचार सुहावना भी है. अपने समय और समाज के किसी प्रतिनिधि उदाहरण की तरह वो जल्द ही इसकी गिरफ़्त में आ जाता है. और इसी वजह से आप उसके विचारों और समझदारी में परिवर्तन देखते हैं. यह पान सिंह का सफ़र है,<em> “हमारे यहाँ गाली के जवाब में गोली चल जाती है कोच सरजी” </em>से शुरु होकर यह उस मुकाम तक जाता है जहाँ गाँव में विपक्ष से लेकर अपने पक्ष वाले भी उसका बन्दूक न उठाने और बार-बार कार्यवाही के लिए पुलिस के पास भागे चले जाने का मज़ाक उड़ा रहे हैं. अपने-आप में यह पूरा बदलाव युगान्तकारी है. और फ़िल्म के इस मुकाम तक यह उस नागरिक की कथा है जो आया तो हिन्दुस्तान के देहात की पुरातन सामन्ती व्यवस्था से निकलकर है, लेकिन जिसको आधुनिकता के विचार ने अपने मोहपाश में बाँध लिया है. जिसका आधुनिक ’राज्य’ की संस्था द्वारा अपने नागरिक से किए वादे में यकीन है. वह उससे उम्मीद करता है और व्यवस्था की स्थापना का हक सिर्फ़ उसे देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">विचारक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ashis_Nandy" target="_blank">आशिस नंदी</a></strong> भारतीय राष्ट्र-राज्य संस्था पर बात करते हुए लिखते हैं, “स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ’विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गई थी. चूंकि हमारा अभिजात्य वर्ग राज्य के इस विचार में निहित समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए उसने भारत की तथाकथित अभागी और आदम विविधताओं के साथ समझौता करके थोड़ा मिलावटी विचार विकसित किया.” यही वो मिलावटी विचार है जहाँ आधुनिकता के संध्याकाल में वही पुराना सामन्ती ढांचा फिर से सर उठाता है और ठीक यहीं किसी गठबंधन के तहत राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इसीलिए, फ़िल्म में सबसे निर्णायक क्षण वो है जहाँ पान सिंह के बुलावे पर गाँव आया कलेक्टर यह कहकर वापस लौट जाता है,<em> “देखो, ये है चम्बल का खून. अपने आप निपटो.” </em>यह आधुनिकता द्वारा दिखाए उस सपने की मौत है जिसके सहारे नवस्वतंत्र देश के नागरिक पुरातन व्यवस्था की गैर-बराबरियों के चंगुल से निकल जाने का मार्ग तलाश रहे थे. फिर आप राज्य की एक दूसरी महत्वपूर्ण संस्था ’पुलिस’ को भी ठीक इसी तरह पीछे हटता पाते हैं. यहीं हिन्दुस्तानी राष्ट्र-राज्य संस्था और उसके द्वारा निर्मित ख़ास आधुनिकता के मॉडल का वो पेंच खुलकर सामने आता है जिसके सहारे मध्यकालीन समाज की तमाम गैर-बराबरियाँ इस नवीन व्यवस्था में ठाठ से घुसी चली आती हैं. पहले यह सामाजिक वफ़ादारियों को राज्य के प्रति वफ़ादारी में बदलने के लिए स्थापित गैर-बराबरीपूर्ण व्यवस्थाओं का अपने फ़ायदे में भरपूर इस्तेमाल करता है और इसीलिए बाद में उन्हें कभी नकार नहीं पाता. जाति जैसे सवाल इसमें प्रमुख हैं. नेहरूवियन आधुनिकता में मौजूद यह फ़ांक ही जाति व्यवस्था को कहीं गहरे पुन:स्थापित करती है. पान सिंह की उम्मीद राज्य रूपी संस्था और उसके द्वारा किए आधुनिकता के वादे से सदा बनी रहती है. वह खुद बन्दूक उठाता है लेकिन अपने बेटे को कभी उस रास्ते पर नहीं आने देता. वह दिल से चाहता है कि राज्य का यह आधुनिक सपना जिये. लेकिन राज्य उसके सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह ऐतिहासिक रूप से भी सच्चाई के करीब है. अगर आप फ़िल्म में देखें तो यह अस्सी के दशक तक कहानी का वो हिस्सा सुनाती है जिसमें अगड़ी जाति के लोग ज़मीन पर कब्ज़े के लिए लड़ रहे हैं और राज्य संस्था इसे पारिवारिक अदावत घोषित कर इसे सुलझाने से अपने हाथ खींच लेती है. दरअसल आधुनिक राज्य संस्था ने स्थानीय स्तर पर उन सामन्ती शक़्तियों से समझौता कर लिया था जिनके खिलाफ़ उसे लड़ना चाहिए था. यह नवस्वतंत्र मुल्क़ में शासन स्थापित करने और अपनी वैधता स्थापित करने का एक आसान रास्ता था. ऐसे में ज़रूरत पड़ने पर भी वह उनकी गैरबराबरियों के खिलाफ़ कभी बोली नहीं. बन्दूक उठाने वाले यहीं से पैदा होते हैं. वे आधुनिक राज्य द्वारा किए उन वादों के भग्नावशेषों पर खड़े हैं जिनमें समता और समानता की स्थापना और समाज से तमाम गैर-बराबर पुरातन व्यवस्थाओं को खदेड़ दिए जाने की बातें थीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जय अर्जुन सिंह फ़िल्म पर <a href="http://jaiarjun.blogspot.in/2012/03/loneliness-of-long-distance-baaghi.html" target="_blank"><strong>अपने आलेख में</strong></a> इस बात का उल्लेख करते हैं कि फ़िल्म के अन्त में आया नर्गिस की मौत की खबर वाला संदर्भ इसे कल्ट फ़िल्म ’मदर इंडिया’ से जोड़ता है और यह उन नेहरूवियन आदर्शों की मौत है जिनकी प्रतिनिधि फ़िल्म हिन्दी सिनेमा इतिहास में ’मदर इंडिया’ है. मुझे यहाँ उन्नीस सौ सड़सठ में आई मनोज कुमार की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Upkar" target="_blank">’उपकार’</a></strong> याद आती है. एक सेना का जवान जो किसान भी है, ठीक पान सिंह की तरह, और जिसकी सामुदायिक वफ़ादारियाँ इस आधुनिक राष्ट्र राज्य के मिलावटी विचार के साथ एकाकार हो जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया की ’पान सिंह तोमर’ इस आदर्श राज्य व्यवस्था की स्थापना वाली भौड़ी ’उपकार’ की पर्फ़ेक्ट एंटी-थिसिस है. यहाँ भी एक सेना का जवान है, जो मूलत: किसान है, लेकिन आधुनिकता का महास्वप्न अब एक छलावा भर है. इस जवान-किसान की भी वफ़ादारी में कोई कमी नहीं, उसने देश के लिए सोने के तमगे जीते हैं. लेकिन देखिए, वह पूछने पर मजबूर हो जाता है कि,<em> “देश के लिए फ़ालतू भागे हम?” </em>अन्त में वह व्यवस्था द्वारा बहिष्कृत समाज के हाशिए पर खड़ा है और उसके हाथ में बन्दूक थमा दी गई है. वह जवाब मांग रहा है कि उसके हाथ में थमाई गई इस बन्दूक के लिए ज़िम्मेदार कौन है, और कौन उन्हें सज़ा देगा?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">गौर करने की बात है कि ’पान सिंह तोमर’ में मारे जाने वाले गुर्जर हैं जिनका स्थान सामाजिक पदक्रम में अगड़ी जातियों से नीचे आता है. और यह तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है. आज यही गुर्जर राजस्थान में अपने हक की जायज़-नाजायज़ मांग करते निरन्तर आन्दोलनरत हैं. और इस जाति व्यवस्था के आधुनिकता के बीच भी काम करने का सबसे अच्छा उदाहरण खुद फ़िल्म में ही देखा जा सकता है. वहाँ देखिए जहाँ इंस्पेक्टर (सदा सर्वोत्कृष्ठ ज़ाकिर हुसैन) गोपी के ससुराल मिलने आए हैं. यह सामाजिक पदक्रम में नीचे खड़ा परिवार है. पुलिसिया थानेदार का उद्देश्य पान सिंह तोमर के गिरोह की टोह लेना है और वह कहते हैं,<em> “जात पात कछू न होत कक्का. इंसान-इंसान के काम आनो चहिए. और जिसके हाथ के खाए हुवे थे धरम भरष्ट हो जावे, ऐसे धरम को तो भरष्ट ही हो जानो चहिए.” </em>वे पानी पीने को भी मंगाते हैं. गौर कीजिए कि तमाम सूचनाएं निकलवा लेने के बाद किस चालाकी से वह बिना उनके घर का पानी पिये ही निकल जाते हैं. यही दोहरे मुखौटे वाला आधुनिक भारतीय राज्य का असल चेहरा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1045" title="Paan-Singh-Tomar-Image-580" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580-300x199.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar-Image-580" width="300" height="199" /></a>ज़िला टोंक अपने देश में कहाँ है, ठीक-ठीक जानने के लिए शायद आप में से बहुत को आज भी नक्शे की ज़रूरत पड़े. और क्योंकि मैं उन्हीं के गृह ज़िले से आता हूँ, इसलिए अच्छी तरह जानता हूँ कि चम्बल की ही एक सहायक नदी ’बनास’ के सहारे बसा होने के बावजूद टोंक की स्थानीय बोली बीहड़ की भाषा से कितनी अलग है. और इसीलिए इरफ़ान के जिस खूबी से उस लहज़े को अपनाया है, मेरे मन में उनके भीतर के कलाकार की इज़्ज़त और बढ़ गई है. जिस तरह वे पर्लियामेंट, मिलिट्री, स्पोर्ट्स जैसे ख़ास शब्दों के उच्चारण में एकदम माफ़िक अक्षर पर विराम लेते हैं और ठीक जगह पर बलाघात देते हैं, भरतपुर-भिंड-मुरैना-ग्वालियर की समूची चम्बल बैल्ट जैसे परदे पर जी उठती है. वे दौड़ते हैं और उनका दौड़ना घटना न रहकर जल्द ही किसी बिम्ब में बदल जाता है. बीहड़ में विपक्षी को पकड़ने के लिए भागते हुए जंगल में सामने आई बाधा कैसे स्टीपलचेज़ धावक को उसका मासूम लड़कपन याद दिलाती है, देखिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस तमाम विमर्श से अलग ’पान सिंह तोमर’ कविता की हद को छूने वाली फ़िल्म है. पहली बार मैं सुनता हूँ जब कोच सर कहते हैं,<em> “ओये तू पाणी पर दौड़ेगा.” </em>और समझ खुश होता हूँ कि यह स्टीपलचेज़ जैसी दौड़ के लिए एक सुन्दर मुहावरा है. लेकिन दूसरी बार सिनेमाहाल में फ़िल्म देखते हुए अचानक समझ आता है कि इस वाक्य के कितने गहरे निहितार्थ हैं. यह संवाद पान सिंह तोमर की पूरी ज़िन्दगी की कहानी है. ज़िन्दगी भर वो बीहड़ में चम्बल के पानी पर ही तो दौड़ता रहा. सन्दीप चौटा का पार्श्वसंगीत फ़िल्म को विहंगम भाव प्रदान करता है और बेदाग़ सिनेमैटोग्राफ़ी महाकाव्य सी ऊँचाई. तिग्मांशु की अन्य फ़िल्मों की तरह ही यहाँ भी संवाद फ़िल्म की जान हैं, लेकिन सबसे विस्मयकारी वे दृश्य हैं जहाँ इरफ़ान बिना किसी संवाद वो कह देते हैं जिसे शब्दों में कहना सम्भव नहीं. मेरा पसन्दीदा दृश्य फ़िल्म के बाद के हिस्से में आया वो शॉट है जहाँ सेना के कंटोनमेंट एरिया में अपने जवान हो चुके बेटे से मिलने आए अधेड़ पान सिंह पीछे से अपने वर्दी पहने बेटे को जाता हुआ देख रहे हैं. आप सिर्फ़ उन आँखों को देखने भर के लिए यह फ़िल्म देखने जाएं. ऐसा विस्मयकारी दृश्य लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के लिए दुर्लभ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’पान सिंह तोमर’ जैसी फ़िल्में हिन्दी सिनेमा में दुर्लभ हैं और मुश्किल से नसीब होती हैं. हम इस राष्ट्र की किसी एक उपकथा के माध्यम से इस बिखरी तस्वीर के सिरे आपस में जोड़ पाते हैं. ’पान सिंह तोमर’ वह उपकथा है जिसमें आधुनिक राज्य अपना किया वादा पूरा नहीं करता और निर्णायक क्षण अपने हाथ वापस खींच लेता है. एक सामान्य नागरिक बन्दूक उठाने के लिए इसलिए मजबूर होता है क्योंकि उसके लिए दो ही विकल्प छोड़े गए हैं, पहला कि बन्दूक उठाओ या फिर दूसरा कि मारे जाओ. मरना दोनों विकल्पों में बदा है. वर्तमान में इसी राज्य द्वारा पोषित कथित ’विकास’ के अश्वमेधी घोड़े के रथचक्र में पिस रहे असहाय नागरिक द्वारा विरोध में उठाए जाते विद्रोह के झंडे को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश करें. देखें कि आखिर उसके लिए हमारी राज्य व्यवस्था ने कौन से विकल्प छोड़े हैं? और यह भी कि अगर निर्वाह के लिए वही विकल्प आपके या मेरे सामने होते तो हमारा चयन क्या होता?</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के अप्रैल अंक में प्रकाशित.</p>
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		<title>रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Nov 2011 11:27:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><em>पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक एक बार देखे जाने लायक है, देख आएं. फिर साथ मिल चर्चा-ए-आम होगी.</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-953" title="Rockstar2011" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011-225x300.jpg" alt="Rockstar2011" width="225" height="300" /></a>बीस के सालों में जब अंग्रेज़ी रियासत द्वारा स्थापित ’नई दिल्ली योजना समिति’ के सदस्य जॉन निकोल्स ने पहली बार एक सर्पिलाकार कुंडली मारे बैठे शॉपिंग प्लाज़ा ’कनॉट प्लेस’ का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, उस वक़्त वह पूरा इलाका कीकर के पेड़ों से भरा बियाबान जंगल था. ’कनॉट सर्कस’ के वास्तुकार रॉबर्ट रसैल ने इन्हीं विलायती बबूल के पेड़ों की समाधि पर अपना भड़कीला शाहकार गढ़ा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ अली की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rockstar_(2011_film)" target="_blank"><strong>’रॉकस्टार’</strong></a> में इसी कनॉट प्लेस के हृदयस्थल पर खड़े होकर जनार्दन जाखड़ उर्फ़ ’जॉर्डन’ जब कहता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“जहाँ तुम आज खड़े हो, कभी वहाँ एक जंगल था. फिर एक दिन वहाँ शहर घुस आया. सब कुछ करीने से, सलीके से. कुछ पंछी थे जो उस जंगल के उजड़ने के साथ ही उड़ गए. वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए. मैं उन्हीं पंछियों को पुकारता हूँ. बोलो, तुमने देखा है उन्हें कहीं?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो मेरे लिए वो फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पल है. एक संवाद जिसके सिरहाने न जाने कितनी कहानियाँ अधलेटी सी दिखाई देती हैं. तारीख़ को लेकर वो सलाहियत जिसकी जिसके बिना न कोई युद्ध पूरा हुआ है, न प्यार. लेकिन ऐसे पल फिर फ़िल्म में कम हैं. क्यों, क्योंकि फ़िल्म दिक-काल से परे जाकर कविता हो जाना चाहती है. जब आप सिनेमा में कहानी कहना छोड़कर कोलाज बनाने लगते हैं तो कई बार सिनेमा का दामन आपके हाथ से छूट जाता है. यही वो अंधेरा मोड़ है, मेरा पसन्दीदा निर्देशक शायद यहीं मात खाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे की कथा आने से पहले ही उसके अंश दिखाई देते हैं, किरदार दिखाई देते हैं. और जहाँ से फ़िल्म शुरु होती है वापस लौटकर उस पल को समझाने की कभी कोशिश नहीं करती. रॉकस्टार में ऐसे कई घेरे हैं जो अपना वृत्त पूरा नहीं करते. मैं इन्हें संपादन की गलतियाँ नहीं मानता. ख़ासकर तब जब शम्मी कपूर जैसी हस्ती अपने किरदार के विधिवत आगमन से मीलों पहले ही एक गाने में भीड़ के साथ खड़े ऑडियो सीडी का विमोचन करती दिखाई दे, यह अनायास नहीं हो सकता. ’रॉकस्टार’ यह तय ही नहीं कर पाई है कि उसे क्या होना है. वह एक कलाकार का आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन बाहर इतना शोर है कि आवाज़ कभी रूह तक पहुँच ही नहीं पाती. वह एक साथ एक कलाकृति और एक सफ़ल बॉलीवुड फ़िल्म होने की चाह करती है और दोनों जहाँ से जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ईमानदारी नहीं दिखाई देती. कैंटीन वाले खटाना भाई के रोल में कुमुद मिश्रा ने जैसे एक पूरे समय को जीवित कर दिया है. जब वो इंटरव्यू के लिए कैमरे के सामने खड़े होते हैं तो उस मासूमियत की याद दिलाते हैं जिसे हम अपने बीए पास के दिनों में जिया करते थे और वहीं अपने कॉलेज की कैंटीन में छोड़ आए हैं. अदिति राव हैदरी कहानी में आती हैं और ठीक वहीं लगता है कि इस बिखरी हुई, असंबद्ध कोलाजनुमा कहानी को एक सही पटरी मिल गई है. लेकिन अफ़सोस कि वो सिर्फ़ हाशिए पर खड़ी एक अदाकारा हैं, और जिसे इस कहानी की मुख्य नायिका के तौर चुना गया है उन्हें जितनी बार देखिए यह अफ़सोस बढ़ता ही जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ढाई-ढाई इंच लम्बे तीन संवादों के सहारे लव आजकल की ’हरलीन कौर’ फ़िल्म किसी तरह निकाल ले गई थीं, लेकिन फ़िल्म की मुख्य नायिका के तौर गैर हिन्दीभाषी नर्गिस फ़ाखरी का चयन ऐसा फ़ैसला है जो इम्तियाज़ पर बूमरैंग हो गया है. शायद उन्होंने अपनी खोज ’हरलीन कौर’ को मुख्य भूमिका में लेकर बनी ’आलवेज़ कभी कभी’ का हश्र नहीं देखा. फिर ऊपर से उनकी डबिंग इतनी लाउड है कि फ़िल्म जिस एकांत और शांति की तलाश में है वो उसे कभी नहीं मिल पाती. बेशक उनके मुकाबले रणबीर मीलों आगे हैं लेकिन फिर अचानक आता, अचानक जाता उनका हरियाणवी अंदाज़ खटकता है. फिर भी, ऐसे कितने ही दृश्य हैं फ़िल्म में जहाँ उनका भोलापन और ईमानदारी उनके चेहरे से छलकते हैं. ठीक उस पल जहाँ जनार्दन हीर को बताता है कि उसने कभी दारू नहीं पी और दोस्तों के सामने बस वो दिखाने के लिए अपने मुंह और कपड़ों पर लगाकर चला जाता है, ठीक वहीं रणबीर के भीतर बैठा बच्चा फ़िल्म को कुछ और ऊपर उठा देता है. ’वेक अप सिड’ और ’रॉकेट सिंह’ के बाद यह एक और मोती है जिसे समुद्र मंथन से बहुत सारे विषवमन के बीच रनबीर अपने लिए सलामत निकाल लाए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-955" title="rockstar_hindi_movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg" alt="rockstar_hindi_movie" width="300" height="225" /></a>फ़िल्म के कुछ सबसे खूबसूरत हिस्से इम्तियाज़ ने नहीं बल्कि ए आर रहमान, मोहित चौहान और इरशाद कामिल ने रचे हैं. तुलसी के मानस की तरह जहाँ चार चौपाइयों की आभा को समेटता पीछे-पीछे आप में सम्पूर्ण एक दोहा चला आता है, यहाँ रहमान के रूहानी संगीत में इरशाद की लिखी मानस के हंस सी चौपाइयाँ आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p>’कुन फ़ाया कुन’ में&#8230;</p>
<p>“सजरा सवेरा मेरे तन बरसे, कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ,<br />
क़तरा मिला जो तेरे दर बरसे &#8230; ओ मौला.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’नादान परिंदे’ में&#8230;<br />
कागा रे कागा रे, मोरी इतनी अरज़ तोसे, चुन चुन खाइयो मांस,<br />
खाइयो न तू नैना मोरे, खाइयो न तू नैना मोरे, पिया के मिलन की आस.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यही वो क्षण हैं जहाँ रणबीर सीधे मुझसे संवाद स्थापित करते हैं, यही वो क्षण हैं जहाँ फ़िल्म जादुई होती है. लेकिन कोई फ़िल्म सिर्फ़ गानों के दम पर खड़ी नहीं रह सकती. अचानक लगता है कि मेरे पसन्दीदा निर्देशक ने अपनी सबसे बड़ी नेमत खो दी है और जैसे उनके संवादों का जावेद अख़्तरीकरण हो गया है. और इस ’प्रेम कहानी’ में से प्रेम जाने कब उड़ जाता है पता ही नहीं चलता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सच कहूँ, इम्तियाज़ की सारी गलतियाँ माफ़ होतीं अगर वे अपने सिनेमा की सबसे बड़ी ख़ासियत को बचा पाए होते. मेरी नज़र में इम्तियाज़ की फ़िल्में उसके महिला किरदारों की वजह से बड़ी फ़िल्में बनती हैं. नायिकाएं जिनकी अपनी सोच है, अपनी मर्ज़ी और अपनी गलतियाँ. और गलतियाँ हैं तो उन पर अफ़सोस नहीं है. उन्हें लेकर ’जिन्दगी भर जलने’ वाला भाव नहीं है, और एक पल को ’जब वी मेट’ में वो दिखता भी है तो उस विचार का वाहियातपना फ़िल्म खुद बखूबी स्थापित करती है. उनकी प्रेम कहानियाँ देखकर मैं कहता था कि देखो, यह है समकालीन प्यार. जैसी लड़कियाँ मैं अपने दोस्तों में पाता हूँ. हाँ, वे दोस्त पहले हैं लड़कियाँ बाद में, और प्रेमिकाएं तो उसके भी कहीं बाद. और यही वो बिन्दु था जहाँ इम्तियाज़ अपने समकालीनों से मीलों आगे निकल जाते थे. लेकिन रॉकस्टार के पास न कोई अदिति है न मीरा. कोई ऐसी लड़की नहीं जिसके पास उसकी अपनी आवाज़ हो. अपने बोल हों. और यहाँ बात केवल तकनीकी नहीं, किरदार की है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ की फ़िल्मों ने हमें ऐसी नायिकाएं दी हैं जो सच्चे प्रेम के लिए सिर्फ़ नायक पर निर्भर नहीं हैं. किसी भी और स्वतंत्र किरदार की तरह उनकी अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगियाँ हैं जिन्हें नायक के न मिलने पर बरबाद नहीं हो जाना है. बेशक इन दुनियाओं में हमारे हमेशा कुछ कमअक़्ल नायक आते हैं और प्रेम कहानियाँ पूरी होती हैं, लेकिन फ़िल्म कभी दावे से यह नहीं कहती कि अगर यह नायक न आया होता तो इस नायिका की ज़िन्दगी अधूरी थी. इम्तियाज़ ने नायिकायों को सिर्फ़ नायक के लिए आलम्बन और उद्दीपन होने से बचाया और उन्हें खुद आगे बढ़कर अपनी दुनिया बनाने की, गलतियाँ करने की इजाज़त दी. इस संदर्भ को ध्यान रखते हुए ’रॉकस्टार’ में एक ऐसी नायिका को देखना जिसका जीवन सिर्फ़ हमारे नायक के इर्द गिर्द संचालित होने लगे, निराश करता है. और जैसे जैसे फ़िल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है नायिका अपना समूचा व्यक्तित्व खोती चली जाती है, मेरी निराशा बढ़ती चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इम्तियाज़ की फ़िल्मों में हमेशा ऐसी लड़कियों को पाया है जिनकी ज़िन्दगी ’सच्चे प्यार’ के इंतज़ार में तमाम नहीं होती. वे सदा सक्रिय अपनी पेशेवर ज़िन्दगियाँ जीती हैं. कभी दुखी हैं, लेकिन हारी नहीं हैं और ज़्यादा महत्वपूर्ण ये कि अपनी लड़ाई फिर से लड़ने के लिए किसी नायक का इंतज़ार नहीं करतीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और हाँ, पहला मौका मिलते ही भाग जाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैं खुश होता अगर इस फ़िल्म में भी नायिका ऐसा ही करती. तब यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में उस रास्ते जाती जिस रास्ते को इम्तियाज़ की पूर्ववर्ती फ़िल्मों ने बड़े करीने से बनाया है.</p>
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		<title>Things we lost in the fire</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Mar 2010 08:23:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; थियोडोर अडोर्नो.

जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को लव, सेक्स और धोखा की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’आश्विट्ज़ के बाद कविता संभव नहीं है.’ &#8211; <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Theodor_W._Adorno" target="_blank">थियोडोर अडोर्नो</a></strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन शब्दों में अपने समय के त्रास को अभिव्यक्ति दी थी. जिस मासूमियत को <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">लव, सेक्स और धोखा</a></strong> की उस पहली कहानी में राहुल और श्रुति की मौत के साथ हमने खो दिया है, क्या उस मासूमियत की वापसी संभव है ? क्या उस एक ग्राफ़िकल दृश्य के साथ, ’जाति’ से जुड़े किसी भी संदर्भ को बहुत दशक पहले अपनी स्वेच्छा से त्याग चुके हिन्दी के ’भाववादी प्रेम सिनेमा’ का अंत हो गया है ? क्या अब हम अपनी फ़िल्मों में बिना सरनेम वाले ’हाई-कास्ट-हिन्दू-मेल’ नायक ’राहुल’ को एक ’अच्छे-अंत-वाली-प्रेम-कहानी’ की नायिका के साथ उसी नादानी और लापरवाही से स्वीकार कर पायेंगे ? क्या हमारी फ़िल्में उतनी भोली और भली बनी रह पायेंगी जितना वे आम तौर पर होती हैं ? <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> की पहली कहानी हिन्दी सिनेमा में एक घटना है. मेरे जीवनकाल में घटी सबसे महत्वपूर्ण घटना. इसके बाद मेरी दुनिया अब वैसी नहीं रह गई है जैसी वो पहले थी. कुछ है जो श्रुति और राहुल की कहानी  ने बदल दिया है, हमेशा के लिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> के साथ आपकी सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि उसे आप ’सिनेमा’ कैसे मानें ? देखने के बाद सिनेमा हाल से बाहर निकलते बहुत ज़रूरी है कि बाहर उजाला बाकी हो. सिनेमा हाल के गुप्प अंधेरे के बाद (जहां आपके साथ बैठे गिनती के लोग वैसे भी आपके सिनेमा देखने के अनुभव को और ज़्यादा अपरिचित और अजीब बना रहे हैं) बाहर निकल कर भी अगर अंधेरा ही मिले तो उस विचार से लड़ाई और मुश्किल हो जाती है. मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में देखते हुए कई बार ऐसा अनुभव किया है, शायद राकेश शर्मा की बनाई ’फ़ाइनल सल्यूशन’. लेकिन किसी हिन्दुस्तानी मुख्यधारा की फ़िल्म के साथ तो कभी नहीं. और सिर्फ़ इस एक विचार को सिद्ध करने के लिए दिबाकर हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा ’रिस्क’ लेते हैं. तक़रीबन चालीस साल पहले ऋषिकेश मुख़र्जी ने अमिताभ को यह समझाते हुए ’गुड्डी’ से अलग किया था कि अगर धर्मेन्द्र के सामने उस ’आम लड़के’ के रोल में तुम जैसा जाना-पहचाना चेहरा (’आनंद’ के बाद अमिताभ को हर तरफ़ ’बाबू मोशाय’ कहकर पुकारा जाने लगा था.) होगा तो फ़िल्म का मर्म हाथ से निकल जायेगा. दिबाकर इससे दो कदम आगे बढ़कर अपनी इस गिनती से तीसरी फ़िल्म में एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिसके नायक &#8211; नायिका लगता है फ़िल्म की कहानियों ने खुद मौहल्ले में निकलकर चुन लिये हैं. पहली बार मैं किसी आम सिनेमा प्रेमी द्वारा की गई फ़िल्म की समीक्षा में <strong><a href="http://www.imdb.com/title/tt1608777/usercomments" target="_self">ऐसा लिखा</a></strong> पढ़ता हूँ कि ’देखो वो बैठा फ़िल्म का हीरो, अगली सीट पर अपने दोस्तों के साथ’ और इसी वजह से उन कहानियों को नकारना और मुश्किल हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले दिन से ही यह स्पष्ट है कि <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अगली <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> नहीं होने वाली है. यह ’डार्लिंग ऑफ़ द क्राउड’ नहीं है. <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Khosla_Ka_Ghosla" target="_blank">’खोसला का घोंसला’</a></strong> आपका कैथार्सिस करती है, लोकप्रिय होती है. लेकिन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> ब्रेख़्तियन थियेटर है जहाँ गोली मारने वाला नाटक में न होकर दर्शकों का हिस्सा है, आपके बीच मौजूद है. मैं पहले भी यह बात कर चुका हूँ कि हमारा लेखन (ख़ासकर भारतीय अंग्रेज़ी लेखन) जिस तरह ’फ़िक्शन’ &#8211; ’नॉन-फ़िक्शन’ के दायरे तोड़ रहा है वह उसका सबसे चमत्कारिक रूप है. ऐसी कहानी जो ’कहानी’ होने की सीमाएं बेधकर हक़ीकत के दायरे में घुस आए उसका असर मेरे ऊपर गहरा है. इसीलिए मुझे अरुंधति भाती हैं, इसिलिये पीयुष मिश्रा पसंद आते हैं. उदय प्रकाश की कहानियाँ मैं ढूंढ-ढूंढकर पढ़ता हूँ. खुद मेरे ’नॉन-फ़िक्शन’ लेखन में कथातत्व की सतत मौजूदगी इस रुझान का संकेत है. दिबाकर वही चमत्कार सिनेमा में ले आए हैं. इसलिए उनका असर गहरा हुआ है. उनकी कहानी <a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-462" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="200" height="311" /></a>सोने नहीं देती, परेशान करती है. जानते हुए भी कि हक़ीकत का चेहरा ऐसा ही वीभत्स है, मैं चाहता हूँ कि सिनेमा &#8211; ’सिनेमा’ बना रहे. मेरी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. &#8216;हम&#8217; चाहते हैं कि हमारी इस छोटी सी ’सिनेमाई दुनिया’ की मासूमियत बची रहे. हम <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> को नकारना चाहते हैं, ख़ारिज करना चाहते हैं. चाहते हैं कि उसे किसी संदूक में बंद कर दूर समन्दर में फ़ैंक दिया जाए. उसकी उपस्थिति हमसे सवाल करेगी, हमारा जीना मुहाल करेगी, हमेशा हमें परेशान करती रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> पर बात करते हुए आलोचक उसकी तुलना <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong>, और <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Black_Friday_(2004_film)" target="_blank">’ब्लैक फ़्राइडे’</a></strong> से कर रहे हैं. बेशक यह उतनी ही बड़ी घटना है हिन्दी सिनेमा के इतिहास में जितनी <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">’सत्या’</a></strong> या <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">’दिल चाहता है’</a></strong> थीं. ’माइलस्टोन’ पोस्ट नाइंटीज़ हिन्दी सिनेमा के इतिहास में. उन फ़िल्मों की तरह यह कहानी कहने का एक नया शास्त्र भी अपने साथ लेकर आई है. लेकिन मैं स्पष्ट हूँ इस बारे में कि यह इन पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह अपने पीछे कोई परिवार नहीं बनाने वाली. इस प्रयोगशील कैमरा तकनीक का ज़रूर उपयोग होगा आगे लेकिन इसका कथ्य, इसका कथ्य ’अद्वितीय’ है हिन्दी सिनेमा में. और रहेगा. यह कहानी फिर नहीं कही जा सकती. इस मायने में <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">LSD</a></strong> अभिशप्त है अपनी तरह की अकेली फ़िल्म होकर रह जाने के लिए. शायद <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Om-Dar-Ba-Dar" target="_blank">’ओम दर-ब-दर’</a></strong> की तरह. क्लासिक लेकिन अकेली.</p>
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		<title>इस रात की सुबह नहीं</title>
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		<pubDate>Tue, 23 Mar 2010 12:29:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[’लव, सेक्स और धोखा’ पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.

मैं नर्क में हूँ.
यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Sex_aur_Dhokha" target="_blank">’लव, सेक्स और धोखा’</a></strong> पर व्यवस्थित रूप से कुछ भी लिख पाना असंभव है. बिखरा हुआ हूँ, बिखरे ख्यालातों को यूं ही समेटता रहूँगा अलग-अलग कथा शैलियों में. सच्चाई सही नहीं जाती, कही कैसे जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote style="text-align: justify;"><p>मैं नर्क में हूँ.</p>
<p>यू कांट डू दिस टू मी. हाउ कैन यू शो थिंग्स लाइक दैट ? यार मैं तुम्हारी फ़िल्मों को पसंद करती थी. लेकिन तुमने मेरे साथ धोखा किया है. माना कि मेरे पिता थोड़े सख़्त हैं लेकिन मेरा स्कूल का ड्रामा देखकर तो खुश ही होते थे. यू कांट शो हिम लाइक दैट. और वो ’राहुल’&#8230; वो तो एकदम&#8230; दिबाकर मैं तुम्हें मार डालूंगी. यू डोन्ट हैव एनी राइट टू शो माई लाइफ़ लाइक दैट इन पब्लिक. अपनी इंटरप्रिटेशंस और अपनी सो-कॉल्ड रियलस्टिक एंडिंग्स तुम अपने पास रखो. हमेशा ही ’सबसे बुरा’ थोड़े न होता है. और हमारे यहाँ तो वैसे भी अब ’कास्ट-वास्ट’ को लेकर इतनी बातें कहाँ होती हैं. माना कि पापा उसे लेकर बड़े ’कॉशस’ रहते हैं लेकिन&#8230; शहरों में थोड़े न ऐसा कभी होता है. वो तो गाँवों में कभी-कभार ऐसा सुनने को मिलता है बस. और फ़िल्मों में, फ़िल्मों में तो कभी ऐसा नहीं होता. फ़िल्में ऐसी होती हैं क्या ? तुम फ़िल्म के नाम पर हमें कुछ भी नहीं दिखा सकते. यह फ़िल्म है ही नहीं. नहीं है यह फ़िल्म.</p>
<p>ठीक है, हमारे यहाँ कभी कास्ट से बाहर शादी नहीं हुई है. तो ? क्या हर चीज़ का कोई ’फ़र्स्ट’ नहीं होता ? पहले सब ऐसे ही बुरा-बुरा बोलते हैं, बाद में सब मान लेते हैं. वो निशा का याद नहीं, माना कि उसका वाला लड़का ’सेम कास्ट’ का था लेकिन थी तो ’लव मैरिज’ ना ? कैसे शादी के बाद सबने मान लिया था. दीपक के पापा ने तो पूरा दहेज भी लिया था दुबारा शादी करवाकर. देख लेना मेरा भी सब मान लेंगे. शुरु में प्रॉब्लम होगी उसकी कास्ट को लेकर लेकिन दिबाकर तुम देख लेना. और &#8216;उसे’ जानने के बाद कैसे कोई उसे नापसंद कर सकता है. पापा को मिलने तो दो, नाम-वाम सब भूल जायेंगे उससे मिलने के बाद. देख लेना  सब मान लेंगे जब मैं उन्हें सब बताऊँगी. शादी के पहले नहीं बतायेंगे, और जब शादी के बाद उनसे मिलवाऊँगी&#8230; आई प्लान्ड एवरीथिंग. बट दिबाकर, यू मेस्ड अप ऑल इन माई माइंड. नाऊ व्हाट विल आई डू, हॉऊ विल आई गैट बैक ? इट्स नॉट ए मूवी एट-ऑल. आई हेट दिस मूवी.</p>
<p style="text-align: justify;">एंड वन मोर थिंग&#8230; नोट दिस डाउन&#8230; माई सरनेम इस नॉट ’दहिया’.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1new.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-438" title="Love_sex_aur_dhokha" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/200px-Love_sex_aur_dhokha_Image1new.jpg" alt="Love_sex_aur_dhokha" width="700" height="211" /></a></p>
]]></content:encoded>
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		<title>ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9&#8242; सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 17:32:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
यह ऑस्कर भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ’अवतार’ और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा ’दि हर्ट लॉकर’ के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">यह <strong>ऑस्कर</strong> भविष्यवाणियाँ नहीं हैं. सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे <strong>’अवतार’</strong> और कैथेरीन बिग्लोव की युद्ध-कथा <strong>’दि हर्ट लॉकर’</strong> के बीच बँटने वाले हैं. मालूम है कि मेरी पसन्दीदा फ़िल्म <strong>’डिस्ट्रिक्ट 9’</strong> को शायद एक पुरस्कार तक न मिले. लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूँ. नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं. कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से&#8230;</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-412" title="avatar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/avatar-movie-poster-200x300.jpg" alt="avatar" width="200" height="300" /></a>अवतार </strong>: मेरी नज़र में इस फ़िल्म की खूबियाँ और कमियाँ दोनों एक ही विशेषता से निकली हैं. वो है इसकी युनिवर्सल अपील और लोकप्रियता. यह दरअसल जेम्स कैमेरून की ख़ासियत है. उनकी पिछली फ़िल्में ’टाइटैनिक’ और ’टर्मिनेटर 2 : जजमेंट डे’ इसकी गवाह हैं. मुझे आज भी याद है कि ’टर्मिनेटर 2’ ही वो फ़िल्म थी जिसे देखते हुए मुझे बचपन में भी ख़ूब मज़ा आया था जबकि उस वक़्त मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्में कम ही समझ आती थीं. तो ख़ूबी ये कि इसकी कहानी सरल है, आसानी से समझ आने वाली. जिसकी वजह से इसे विश्व भर में आसानी से समझा और सराहा जा रहा है. और कमी भी यही कि इसकी कहानी सरल है, परतदार कहानियों की गहराईयों से महरूम. जिसकी वजह से इसके किरदार एकायामी और सतही जान पड़ते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म की अच्छी बात तो यही कही जा सकती है कि यह नष्ट होती प्रकृति को इंसानी लिप्सा से बचाए जाने का ’पावन संदेश’ अपने भीतर समेटे है. लेकिन यह ’पावन संदेश’ ऐसा मौलिक तो नहीं जिसे सारी दुनिया एकटक देखे. सच्चाई यही है कि ’अवतार’ का असल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है. किरदारों और कहानी के उथलेपन को यह तकनीक द्वारा प्रदत्त गहराई से ढकने की कोशिश करती है. यही वजह है कि फ़िल्म की हिन्दुस्तान में प्रदर्शन तिथि को दो महीने से ऊपर बीत जाने के बावजूद कनॉट प्लेस के ’बिग सिनेमा : ओडियन’ में सप्ताहांत जाने पर हमें टिकट खिड़की से ही बाहर का मुँह देखना पड़ता है. मानना पड़ेगा, थ्री-डी अनुभव चमत्कारी तो है. पैन्डोरा के उड़ते पहाड़ और छूते ही बंद हो जाने वाले पौधे विस्मयकारी हैं. और एक भव्य क्लाईमैक्स के साथ वो मेरी उम्मीदें भी पूरी करती है. लेकिन मैं अब भी नहीं जानता हूँ कि अगर इसे एक सामान्य फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसमें कितना ’सत्त’ निकलेगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-413" title="the-hurt-locker" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/the-hurt-lacker-193x300.jpg" alt="the-hurt-locker" width="193" height="300" /></a>दि हर्ट लॉकर</strong> : बहुत उम्मीदों के साथ देखी थी शायद, इसलिए निराश हुआ. बेशक बेहतर फ़िल्म है. लेकिन ’आउट ऑफ़ दि बॉक्स’ नहीं है मेरे लिए. कुछ खास पैटर्न हैं जो इस तरह की हॉलिवुडीय ’वॉर-ड्रामा’ फ़िल्में फ़ॉलो करती हैं, हर्ट लॉकर भी वो करती है. फिर भी, मेरी समस्याएं शायद इससे हैं कि वो जो दिखा रही है, आखिर बस वही क्यों दिखा रही है? लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि वो जिस पक्ष की कहानी दिखाना चाहती है उसे असरदार तरीके से दिखा रही है. एक स्तर पर ’दि हर्ट लॉकर’ की तुलना स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ से की जा सकती है. लेकिन यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि एक महिला द्वारा निर्देशित होने के बावजूद यह बहुत ही मर्दवादी फ़िल्म है. बेशक युद्ध-फ़िल्मों में एक स्तर पर ऐसा होना लाज़मी भी है. इसका नायक एक ’सम्पूर्ण पुरुष नायकीय छवि’ वाला नायक है. तुलना के लिए बताना चाहूँगा कि ’सेविंग प्राइवेट रेयान’ में जिस तरह टॉम हैंक्स अपने किरदार में एक फ़ेमिनिस्ट अप्रोच डाल देते हैं उसका यहाँ अभाव है.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरी नज़र में हर्ट लॉकर का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है उसका ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’. और तनाव निर्माण का इससे बेहतर सांचा और क्या मिलेगा, फ़िल्म का नायक एक बम निरोधक दस्ते का सदस्य है और इराक़ में कार्यरत है. मुझे न जाने क्यों हर्ट लॉकर बार-बार दो साल पहले आई हिन्दुस्तानी फ़िल्म ’आमिर’ की याद दिला रही थी. कोई सीधा संदर्भ बिन्दु नहीं है. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों का मुख्य आधार तनाव की सफ़ल संरचना है और दोनों ही फ़िल्मों में विपक्ष का कोई मुकम्मल चेहरा कभी सामने नहीं आता. और गौर से देखें तो हर्ट लॉकर में वही अंतिम प्रसंग सबसे प्रभावशाली बन पड़ा है जहाँ अंतत: ’फ़ेंस के उधर’ मौजूद मानवीय चेहरा भी नज़र आता है. ’दि हर्ट लॉकर’ आपको बाँधे रखती है. और कुछ दूर तक बना रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-415" title="inglourious-basterds" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/inglourious-basterds-205x300.jpg" alt="inglourious-basterds" width="205" height="300" /></a>इनग्लोरियस बास्टर्ड्स</strong> : मैं मूलत: टैरेन्टीनो की कला का प्रशंसक नहीं हूँ. मेरे कुछ अज़ीज़ दोस्त उसके गहरे मुरीद हैं. इस ज़मीन पर खड़े होकर मेरी टैरेन्टीनो से बात शुरु होती है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ शुद्ध एतिहासिक संदर्भों के साथ एक शुद्ध काल्पनिक कहानी है. ख़ास टैरेन्टीनो की मोहर लगी. इस फ़िल्म को आप टैरेन्टीनो के पुराने काम के सन्दर्भ में पढ़ते हैं. ’पल्प फ़िक्शन’ के संदर्भ में पढ़ते हैं. पिछली संदर्भित फ़िल्म ’दि हर्ट लॉकर’ की तरह ही ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ भी अपनी कथा-संरचना में ’तनाव निर्माण’ और ’तनाव निर्वाह’ को अपना आधार बनाती है. फ़िल्म का शुरुआती प्रसंग ही देखें, उसमें ’तनाव निर्माण’ और उसके साथ बदलता इंसानी व्यवहार देखें. आप समझ जायेंगे कि टैरेन्टीनो इस पद्धति के साथ हमारा परिचय इंसानी व्यव्हार की कमज़ोरियों, उसकी कुरूपताओं से करवाने वाले हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">और इस शुरुआती प्रसंग के साथ ही क्रिस्टोफर वॉल्टज़ परिदृश्य में आते हैं. मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रैड पिट का काम भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वॉल्टज़ यहाँ निर्विवाद रूप से बहुत आगे हैं. उनका लोकप्रियता ग्राफ़ इससे नापिए कि अपने क्षेत्र में (सहायक अभिनेता) आई.एम.डी.बी. पर उन अकेले को जितने वोट मिले हैं वो बाक़ी चार नामांकितों को मिले कुल वोट के दुगुने से भी ज़्यादा है. ’इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ को सम्पूर्ण फ़िल्म के बजाए अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर पढ़ा जाना चाहिए. यह टैरेन्टीनो को पढ़ने का पुराना तरीका है, उन्हीं का दिया हुआ. हिंसा की अति होते हुए भी उनकी फ़िल्म कुरूप नहीं होती, बल्कि वह एक दर्शनीय फ़िल्म होती है. जैसा मैंने पहले भी कहा है, वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे हैं. यह फ़िल्म उस किताब का अगला पाठ है. कई सारे उप-पाठों में बँटा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-416" title="up in the air" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_in_the_air_poster-202x300.jpg" alt="up in the air" width="202" height="300" /></a>अप इन दि एयर</strong> : जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. जार्ज क्लूनी. और ढेर सारा स्टाइल. इस फ़िल्म का सबसे बड़ा बिन्दु मेरी नज़र में यही है. यह एक बेहतर तरीके से बनाई, सेंसिबल कहानी है जिसकी जान इसके ट्रीटमेंट में छिपी है. तुलना के लिए फ़रहान अख़्तर की फ़िल्में देखी जा सकती हैं. शहर दर शहर उड़ती इस फ़िल्म के किरदार कॉर्पोरेट में काम करने वाले मेरे दोस्तों को बहुत रिलेटेबल लग सकते हैं. फ़िल्म में बहुत से तीखे प्रसंग हैं जिन्हें कसी स्क्रिप्ट में पेश किया गया है. और वो बहन-साढू की तसवीर के साथ एयरपोर्ट-एयरपोर्ट घूमना तो बहुत ही मज़ेदार है. क्या पुरस्कार मिलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सुना है कि यह कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों की दौड़ में दूसरे नम्बर पर भाग रही है. अगर आप इस रविवार एक ’अच्छी’ फ़िल्म देखकर अपनी शाम सुकून से बिताना चाहते हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए ही बनी है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-417" title="district 9" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/district-9-poster-203x300.jpg" alt="district 9" width="203" height="300" /></a>डिस्ट्रिक्ट 9</strong> : नामांकनों की लम्बी सूची में यह सबसे चमत्कारी फ़िल्म है. जी हाँ, यह मैं बहुचर्चित ’अवतार’ थ्री-डी में देखने के बाद कह रहा हूँ. दरअसल मैं इसी फ़िल्म पर बात करना चाहता हूँ. ‘डिस्ट्रिक्ट 9’ आपको हिला कर रख देती है. ध्वस्त कर देती है. यह दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है. इस विज्ञान-फंतासी को इसका तकनीकी पक्ष नहीं, इसका विचार अद्भुत फ़िल्म बनाता है. ऐसा विचार जो आपको डराता भी है और आपकी आँखे भी खोलता है.</p>
<p style="text-align: justify;">जिस तरह पिछले साल आयी फ़िल्म ’दि डार्क नाइट’ सुपरहीरो फ़िल्मों की श्रंखला में एक पीढ़ी की शुरुआत थी उसी तरह से ’डिस्ट्रिक्ट 9’ विज्ञान-फंतासी के क्षेत्र में एक नई पीढ़ी के कदमों की आहट है. ’डार्क नाइट’ एक सामान्य सुपरहीरो फ़िल्म न होकर एक दार्शनिक बहस थी. यह उस शहर के बारे में खुला विचार मंथन थी जिसकी किस्मत एक अनपहचाने, सिर्फ़ रातों को प्रगट होने वाले, मुखौटा लगाए इंसान के हाथों में कैद है. क्या उस शहर को किसी भी अन्य सामान्य शहर की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? ठीक उसी तरह, ’डिस्ट्रिक्ट 9’ भी एक सामान्य ’एलियन फ़िल्म’ न होकर एक प्रतीक सत्ता है. हमारी धरती पर घटती एक ’एलियन कथा’ के माध्यम से यह आधुनिक इंसानी सभ्यता की कलई खोल कर रख देती है. विकास की तमाम बहसें, उसके भोक्ता, उसके असल दुष्परिणाम, हमारे शहरी संरचना के विकास की अनवरत लम्बी होती रेखा और हाशिए पर खड़ी पहचानों से उसकी टकराहट, भेदभाव, इंसानी स्वभाव के कुरूप पक्ष, सभी कुछ इसमें समाहित है. और इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अपनी उस पूर्ववर्ती की तरह ’डिस्ट्रिक्ट 9’ को भी ऑस्कर में नज़रअन्दाज़ कर दिया जाएगा. ’सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’ की दौड़ में उसका शामिल होना भी सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो पाया है कि अकादमी ने इस बार नामांकित फ़िल्मों की संख्या 5 से बढ़ाकर 10 कर दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी शुरुआत से ही ’डिस्ट्रिक्ट 9’ एक प्रामाणिक डॉक्युड्रामा का चेहरा पहन लेती है. मेरे ख़्याल से यह अद्भुत कथा तकनीक फ़िल्म के लिए आगे चलकर अपने मूल विचार को संप्रेषित करने में बहुत कारगर साबित होती है. शुरुआत से ही यह अपना मुख्य घटनास्थल (जहाँ स्पेसशिप आ रुका है) अमरीका के किसी शहर को न बनाकर जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) को बनाती है और केन्द्रीकृत विश्व-व्यवस्था के ध्रुव को हिला देती है. एलियन्स का घेट्टोआइज़ेशन और उनका शहर से उजाड़ा जाना हमारे लिए ऐसा आईना है जिसमें हमारे शहरों को अपना विकृत होता चेहरा देखना चाहिए. और इस ’रियलिटी चैक’ के बाद कहानी जो मोड़ लेती है वो आपने सोचा भी नहीं होगा. फ़िल्म का अंतिम दृश्य एक कभी न भूलने वाला, हॉन्टिंग असर मेरे ऊपर छोड़ गया है. नए, बेहतरीन कलाकारों के साथ इस फ़िल्म का चेहरा और प्रामाणिक बनता है लेकिन तकनीक में यह कोई ओछा समझौता नहीं करती.</p>
<p style="text-align: justify;">मैं आश्चर्यचकित हूँ इस बात से कि क्यों इस फ़िल्म के निर्देशक को हम इस साल के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में नहीं गिन रहे? और शार्लटो कोप्ले (Sharlto Copley) जिन्होंने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है को क्यों नहीं इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता गिना जा रहा? क्या, हिंसा की अति? इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की समूची यात्रा (फ़िल्म की शुरुआत से आखिर तक का कैरेक्टर ग्राफ़) इतनी बदलावों से भरी, अविश्वसनीय और हृदय विदारक है कि उसका सर्वश्रेष्ठ की गिनती में न होना उस सूची के साथ मज़ाक है.</p>
<p style="text-align: justify;">पोस्ट ’क्योटो’ और ’कोपनहेगन’ काल में यह कोरा संयोग नहीं है कि दो ऐसी विज्ञान फंतासियाँ सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की दौड़ में हैं जिनमें मनुष्य प्रजाति खलनायक की भूमिका निभा रही है. यह और भी रेखांकित करने लायक बात इसलिए भी बन जाती है जब पता चले कि बीते सालों में अकादमी विज्ञान-फंतासियों को लेकर आमतौर से ज़्यादा नरमदिल नहीं रही है. असल दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है कि अब ’साइंस-फ़िक्शन’ सिनेमा अपनी सही राह पहचान गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-418" title="up" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/03/up_poster_allchar-202x300.jpg" alt="up" width="202" height="300" /></a>अप </strong>: वाह, क्या फ़िल्म है. एक खडूस डोकरा (बूढ़ा) अपने घर के आस-पास फैलते जाते शहर से परेशान है. और वो अपने घर में ढेर सारे गुब्बारे लगाकर घर सहित उड़ जाता है, अपने सपनों की दुनिया की ओर! क्या कमाल की बात है कि यह एनिमेशन फ़िल्म भी हमारे यांत्रिक होते जा रहे शहरी जीवन और शहरी विकास के मॉडल पर एक तीखी टिप्पणी है. ’अप’ एनीमेशन फ़िल्म होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए नामांकित हुई है. इससे ही आप उसके चमत्कार का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ख़ास बात देखने की है कि पिछले साल की विजेता ’वॉल-ई’ की तरह ही यह भी इंसानी सभ्यता के अंधेरे मोड़ की तरफ़ जाने की एक कार्टूनीकृत भविष्यवाणी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या आपको मालूम है </strong>:</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- इस साल पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के दो सबसे बज़बूत दावेदार जेम्स कैमेरून (अवतार) और कैथेरीन बिग्लोव (दि हर्ट लॉकर) पूर्व पति-पत्नी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- तमाम अन्य पूर्ववर्ती पुरस्कार तथा सिनेमा आलोचक इस बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का मुकाबला इन्हीं दोनों पूर्व पति-पत्नी जोड़े के बीच गिन रहे हैं. लेकिन आम दर्शक के बीच आप क्वेन्टीन टैरेन्टीनो (इनग्लोरियस बास्टर्ड्स) की लोकप्रियता और प्रभाव का अन्दाज़ा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि आई.एम.डी.बी. वेबसाइट पर पब्लिक पोल में ऑस्कर की पिछली रात तक भी वे दूसरे स्थान पर चल रहे थे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- ऑस्कर के पहले मिलने वाला इंडिपेंडेंट सिनेमा का ’स्पिरिट पुरस्कार’ बड़ी मात्रा में ’प्रेशियस’ ने जीता है. कई सिनेमा आलोचक इस फ़िल्म में माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा मोनिक्यू (Mo’nique) की भूमिका को इस साल का सर्वश्रेष्ठ अदाकारी प्रदर्शन गिन रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">- अगर कैथरीन बिग्लोव ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता (और जिसकी काफ़ी संभावना है.) तो वे यह पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला होंगी. इससे पहले केवल तीन महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए नामांकित हुई हैं. लीना वार्टमुलर (Lina Wertmuller) ’सेवन ब्यूटीज़’ के लिए (1976), जेन कैम्पियन (Jane Campion) ’दि पियानो’ (1993) के लिए और बहुचर्चित ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ (2003) के लिए सोफ़िया कोपोला (Sofia Coppola).</p>
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		<title>’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 14:47:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[“प्यारे बार्नस्टीन,
तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.

एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG"><img class="alignleft size-full wp-image-281" title="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/11/The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster.JPG" alt="The_Assassination_of_Richard_Nixon_poster" width="200" height="298" /></a><strong>“प्यारे बार्नस्टीन,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” &#8211;&#8217;द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं आती. एक टेलीफ़ोन कॉल जिसकी बेल बजती रहती है और कोई उसे रिसीव नहीं करता. एक घर जिसमें अब एक कुत्ते की जगह खाली है. रिचर्ड निक्सन किसी व्यक्ति का नाम नहीं. रिचर्ड निक्सन सिर्फ़ एक विचार है, सत्ता का विचार जो तेज़ी से हमारे चारों ओर अपनी जड़ें जमा रहा है. समाज तय साचों में ढल चुका है और शक करने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. यह <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie" target="_blank">डेल कारनेगी</a></strong> को पढ़कर सफलता के सात सोपान सीखने वाले उत्साही वीरों का समय है. ऐसा समय जिसमें शंका करने वाले, चुप्पा से, ईमानदारी का अपना ही तर्जुमा जीने की चाहत रखने वाले इंसानों की कोई ज़रूरत नहीं. उन्हें अब ख़त्म हो जाना चाहिए. वे सफलता के उत्सव में बाधक हैं. ईमानदारी की नई परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं जिनकी गंगोत्री अब सफलता नामक वृहत ग्लेशियर से निकलती है. दुनिया में कहीं युद्ध नहीं है. दुनिया में कहीं भूख नहीं है. जो ऐसा बोलते है उन्हें भी अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. अब दुनिया एक ऐसा खुशियों से भरा बगीचा है जिसमें हर बिकता सामान एक नया खिलता फूल है. असल फूलों को अब नष्ट हो जाना चाहिए. उनकी अब ज़रूरत नहीं. उनके ज़्यादा अच्छे और आग्याकारी प्रतिरूप गढ़ लिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक इस वक़्त जब आप जब इस चालाक बक्से के पर्दे पर सुबह-शाम ऊधम मचाते <strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=l7LLlymgJJE&amp;feature=channel" target="_blank">’रॉकेट सिंह – सेल्समैन ऑफ़ दि इयर’</a></strong> को निरख रहे हैं मैं देख रहा हूँ दूर कहीं उन्नीस सौ तिहत्तर में बिखरते अमेरिकी सपने की राख़ में बेचैन भटकते सैमुअल बाइक को. और क्या खूब है कि इस उत्सवधर्मी समय में मुझे बार बार सैमुअल बाइक याद आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Assassination_of_Richard_Nixon" target="_blank">’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’</a></strong> हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sean_Penn" target="_blank">सीन पेन</a></strong> की सघन अदाकारी से निर्मित बेहतरीन फ़िल्म होने के साथ-साथ हमारे समाज के लिए ज़रूरी फ़िल्म भी है. यह उस जन्नत की हक़ीक़त है जिसमें हमारा समय और समाज धीरे-धीरे पैठ रहा है. यह उन लोगों की कहानी है जो सत्ता द्वारा बेचे जा रहे सफलता और समृद्धि के सपने को मनचाहे दामों पर ख़रीदने से इनकार कर देते हैं. यह बहुत गहरे अर्थों में ’नौकर की कमीज़’ के स्वर को दोहराती फ़िल्म है. सच है कि हमारे दौर के सबसे बड़े सेल्समैन हमारे नीति-नियंता हैं. वे हमें बार-बार वही सुख-समृद्धि और न्याय के सपने बेचते हैं और तय करते हैं कि वे कभी पूरे न हों जिससे उन्हें आगे फिर से उन्हीं लोगों को बेचा जा सके. वे सबसे बड़े सेल्समैन हैं क्योंकि वे उन्हीं सपनों को बार-बार बेचने में सफल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस फ़िल्म में कहानी का मूल कथ्य सैमुअल के अपने प्यारे संगीतकार बार्नस्टीन को लिखे लम्बे एकालापों से आगे बढ़ता है. यही इस कहानी का सार हैं. सैमुअल एक असफल सेल्समैन है क्योंकि वो सच बोलता है. उसके बॉस लोग उसे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Norman_Vincent_Peale" target="_blank">’दि पॉवर ऑफ़ पॉज़िटिव थिंकिंग’</a> जैसी किताबें पढ़ने के लिए देते हैं. नौकरी से निकाले जाने के बाद एक दिन वो रिवाल्वर लेकर अपने बॉस को मारने भी जाता है लेकिन उससे गोली नहीं चलाई जाती. हाँ वो असफल है. हर काम में असफल. उसकी पत्नी एक कैफ़े में नौकरी करती है जहाँ उसके मालिक उसे छोटी स्कर्ट पहनकर ड्रिंक सर्व करने के लिए कहते हैं. सैमुअल इस जैसे तमाम कैफ़े’स को जला देना चाहता है. उसे लगता है कि उसके साथ समाज नस्लवादी व्यवहार करता है. लेकिन वो किसी को यह समझा नहीं पाता कि नौकरी नाम की यह बला आवरण में लिपटी नस्लीय गुलामी है.</p>
<p style="text-align: justify;">जो जितना बड़ा झूठा है वो उतना बड़ा सेल्समैन है. इस दौर का सबसे बड़ा सेल्समैन <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Nixon" target="_blank">रिचर्ड निक्सन</a></strong> है. जिसने दो बार अमरीकी जनता को वियतनाम युद्ध ख़त्म होने का सपना बेचा और दोनों बार उसे पूरा किए बिना वो सत्ता में बना रहा. आखिर उससे बड़ा सेल्समैन इस दुनिया में और कौन हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">उसे समझ आता है कि यह समाज सिर्फ़ उन्हें ही याद रखता है जो अपने काम से अपना नाम रौशन करते हैं. बाकी सब इस दुनिया में रेत के दाने के बराबर हैं जिनका कोई मोल नहीं, जिनकी कोई अहमियत नहीं. हाँ वो रिचर्ड निक्सन को मार देगा. दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन को मार देगा. लेकिन वो एक असफल इंसान है. शक करने वाला और संशयवादी. ऐसे इंसानों की तक़दीर में लक्ष्य की प्राप्ति के उत्सवगान नहीं होते. वे तो सुरक्षित रख छोड़े गए हैं मज़बूत, निश्चयवादी, वसुंधरा को भोगने वाले वीरों के लिए. अंत में यह नाचीज़ रेत का दाना एक चिंगारी सा चमककर वापस समन्दर के पानी में मिल जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">सैमुअल की बेचैनियाँ हमारे दौर की बेचैनियाँ हैं. पिछले साल आई जयदीप वर्मा की आधुनिक क्लासिक <strong><a href="http://hulla.bigflix.com/" target="_blank">’हल्ला’</a></strong> की बेचैनियाँ हैं. एम.बी.ए. का गुब्बारा हमारे यहाँ क्या खूब फूल रहा है. लेकिन उसमें हवा भरते फैंफड़ों का अनवरत चलती धौंकनी बनते जाना क्यों हमारी नज़रों से ओझल है? यह फ़िल्म पुणे-बैंगलोर से गुड़गाँव-नोयडा तक विकास के जयगान में पिसती कोमल संवेदनाओं की कसक है. वैसे आत्महत्या से इतर वे रास्ते हैं जिनपर चलने वालों को हमारा समाज या तो असफलता के ठप्पे से नवाजता है या फिर उन्हें ’पागल’ श्रेणी में डाल देता है. गुड़गाँव और पुणे के संवेदनाहीन कंक्रीट के जंगलों से भागे गौरव या वरुण इसलिए बच जाते हैं क्योंकि उनके पास ’मैं’ वाला आत्मविश्वास है. लेकिन उनका क्या जिन्हें अपने होने की वजह पर ही शक हो? बताओ तो दोस्तों, क्या हमने उन अनिश्चय में घिरे, अकेले पड़े नाकुछों के लिए कोई रास्ता छोड़ा है?</p>
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		<title>’तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं’, कमीने संगीत समीक्षा.</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Aug 2009 19:03:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया&#8230; और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की नई बनी लाइन घुमावदार उलझे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey1.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-159" title="kaminey1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey1.jpg" alt="kaminey1" width="736" height="767" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया&#8230; और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की नई बनी लाइन घुमावदार उलझे फ्लाईओवरों के ऊपर से पच्चीस डिग्री के कोण पर उन्हें नीचा दिखाती हुई सीधा चाँद की ओर निकल जाती है वहीं, बस वहीं. दूर बादलों के बीच से निकलता एक हवाईजहाज़ था जिसकी बत्ती किसी डूबते सितारे की तरह दूर जाती लग रही थी. खिड़की के शीशे पर अटकी बारिश की बूंदें थीं जिन्हें सामने से आती ट्रक की हेडलाइट रह-रहकर सुनहरे मोती में बदल देती थी. रह-रहकर पानी, रह-रहकर मोती. चमकता सा पानी, बहते से मोती. खिड़की से दीखते सामने टंगे चाँद को देखकर ये ख्याल आया था कि क्या हमारी तरह चांद भी बारिश में भीग जाता होगा? क्या घुटने जोड़कर, दोनों हाथों के बीच सर छिपाकर वो भी इस ठिठुरन भरे मौसम में अपनी जान बचाता होगा? मैंने खिड़की से ऐसा ही एक भीगा हुआ चाँद देखा. तेज़ बौछार में उसके कपड़े जब टपकते होंगे तो क्या वो उन्हें सुखाने के लिए दो उजले तारों के बीच फैलाकर लटका देता होगा? वहीं, बस वहीं मुझे अधूरेपन का अहसास हुआ. वहीं, बस वहीं मैंने एक कहानी लिखने का फ़ैसला किया. वहीं, बस वहीं मैंने भाग जाने की सोची. वहीं, बस वहीं मैंने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kaminey" target="_blank"><strong>’कमीने’</strong></a> के गीत सुने. जैसे पहली बार सुने, जैसे आखिरी बार सुने.</p>
<p><strong>&#8220;ढैन टे णे टेणे नेणे&#8221; 4:45 (सुखविंदर सिंह, विशाल डडलानी, रॉबर्ट बॉब)</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;आजा आजा दिल निचोड़े,<br />
रात की मटकी तोड़े.<br />
कोई गुडलक निकालें,<br />
आज गुल्लक तो फोड़े.&#8221;</p></blockquote>
<p>विशाल को शायद शेक्सपियर के साथ लम्बी संगत का यह गुण मिला है कि वे आदिम मनोभावों को सबसे बेहतर पहचानने लगे हैं. इसी संगत का असर है कि विशाल मुम्बइया सिनेमा की सबसे आदिम धुन खोज लाए हैं. ढैन टै णे टेणे टेणे &#8230;.. हमेशा से मौजूद हमारे बॉलीवुडीय मसाला सिनेमाई मनोभावों को अभिव्यक्त करने वाली सबसे आदिम धुन. इस धुन का बॉलीवुड के लिए वही महत्व है जो हॉलीवुड के लिए ’द गुड, द बैड एंड द अगली’ की शीर्षक धुन का था. मुझे लगता है मैं इस धुन को सालों से जानता हूँ. इस धुन के साथ सत्तर के दशक के अमिताभीय सिनेमा से अस्सी के दशक के मिथुन चक्रवर्तीय सिनेमा तक सिनेमा की एक पूरी किस्म अपने सारे फॉर्मूलों के साथ जी उठती है. यह महा (खल) नायक के दौर से आई आदिम धुन है. मारक असर वाली. सुखविंदर की हमलावर आवाज़ के साथ. हमेशा की तरह गुलज़ार बेहतर प्रयोग करते हैं. हालांकि इस गीत में कोई चमत्कारिक प्रयोग नहीं है लेकिन संगीत की बुलन्दी उसे ढक लेती है.</p>
<p>कहते हैं मुम्बई शहर कभी सोता नहीं. कहते हैं मुम्बई शहर रात का शहर है. यह गीत मुम्बई में ही होना था. यह सड़क का गाना है. रात में जागती सड़क का गाना. इसमें बहुत साल पहले जावेद अख़्तर के लिखे ’सो गया ये जहाँ’ का आवारापन घुला है. विनोद कुमार शुक्ल ने ’नौकर की कमीज़’ में लिखा था, &#8220;घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है. लौटने के लिए खुद का घर ज़रूरी होता है.&#8221; ओये लक्की लक्की ओये से कमीने तक, क्या हम नष्ट/छूटे घर की तलाश में अनवरत भटकते नायकों की कथायें रच रहे हैं.</p>
<p>&#8220;रात आई तो वो जिनके घर थे<br />
वो घर को गए सो गए<br />
रात आई तो हम जैसे आवारा<br />
फिर निकले राहों में और खो गए<br />
इस गली, उस गली<br />
इस नगर उस नगर<br />
जाएँ भी तो कहाँ<br />
जाना चाहें अगर<br />
सो गई हैं सारी मंज़िलें<br />
सो गया है रस्ता&#8221;</p>
<p><strong></strong></p>
<p><strong>&#8220;पहली बार मोहब्बत&#8221; 5:24 (मोहित चौहान)</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;याद है पीपल के जिसके घने साये थे,<br />
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाये थे.<br />
ये बरक़त उन हज़रत की है,<br />
पहली बार मोहब्बत की है.<br />
आखिरी बार मोहब्बत की है.&#8221;</p></blockquote>
<p>यह दूर पहाड़ों का गीत है. यह गाना पानी वाला गाना है. ठंडे पानी वाला गाना. रसोई के पीछे अलावघर से बुलाती उसकी आवाज़. बर्फीले पानी वाला गाना. कुड़कुड़ी वाले सर्द मौसम के बीच मिट्टी के कुल्हड़ में गरमागरम धुआँ उड़ाती चाय. कुछ है जो बहता हुआ है. नम. जैसे सुनो और भीग जाओ. देवदार. इस गाने की फ़ितरत में ठिठुरन है. कोयले की सिगड़ी जिसमें फूँक मारते ही कोयले का रँग स्याह से बदल कर सुनहरा हो जाता है. ऊना, चोप्ता, लद्दाख, दार्जिलिंग. कहते हैं कि अगर दार्जिलिंग में एड़ी के बल उचककर ऊपर को देखो तो दूर कंचनजघा दीख पड़ता है. मैं बस इस गाने को सुनने के लिये पहली बार पहाड़ों पर जाऊँ, आखिरी बार पहाड़ों पर जाऊँ.</p>
<p>मोहित चौहान को मैंने ’गुँचा कोई मेरे नाम कर दिया’ के साथ खोजा था, दुनिया ने ’तुमसे ही दिन होता है’ के साथ पाया. अब उन्हीं के लिये गीत रचे जा रहे हैं. सुनियेगा, जब ’पहली बार&#8230; मोहब्बत की है’ के साथ गीत ऊपर जाता है तो किसी चीड़ या देवदार की सी ऊँचाई का अहसास होता है. गुलज़ार फिर एकबार ’सोये वोये भी तो कम हैं’ जैसे प्रयोगों से साथ दिल जीत लेते हैं. एक सच्चे प्रेम-गीत की तरह यह भी ढेर सारी पुरानी यादों से गुँथा हुआ गीत है. घने साये वाले पीपल के नीचे खाये गिलहरी के झूठे मटर वाला किस्सा इस गीत की जान है. इस गीत का नशा धीरे धीरे चढ़ता है. ’रात के ढाई बजे’ से उलट यह गीत पहली नज़र का प्यार नहीं, साहचर्य का प्रेम है. आप पर आता ही जाता है, आता ही जाता है, आता ही जाता है.<br />
<strong></strong></p>
<p><strong>&#8220;रात के ढाई बजे&#8221; 4:31 (सुरेश वाडकर, रेखा भारद्वाज, सुनिधि चौहान, कुणाल गाँजावाला, अर्ल इ.डी.)</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;एक ही लट सुलझाने में<br />
सारी रात गुज़ारी है<br />
चाँद की गठरी सर पे ले ली<br />
आपने कैसी ज़हमत की है&#8221;</p></blockquote>
<p>यह पहली नज़र का प्यार है.</p>
<p>शुरु में ही शहनाई की बदमाश आवाज़ नोटिस करें. रैप का प्रयोग इतना उम्दा है कि हम यह भूल ही जाते हैं कि विशाल के लिये यह बिलकुल नया प्रयोग है. हमारे समय के कुछ सबसे बेहतरीन गायकों की गायकी के बीच रैप कुछ इस तरह पिरोया गया है कि अटखेली को एक और रूप तो मिलता है लेकिन गीत की तन्मयता टूटने नहीं पाती है. यह विशाल की वैरायटी है ’सपने में मिलती है’ की मासूम बदमाशी से ’कल्लू मामा’ के उज्जड्पन तक और ’छोड़ आए हम वो गलियाँ’ के नॉस्टेल्जिया से ’तुम गए सब गया’ के मृत्युबोध तक.</p>
<p>इस गीत की गायकी के बारे में कुछ बात विस्तार से. रेखा भारद्वाज और सुनिधि चैहान इस वक़्त हमारी सबसे वर्सटाइल गायिकाओं में से हैं. दोनों की आवाज़ की बदमाशी अब तो जगज़ाहिर है. अगर आप आवाज़ों की मूल प्रकृति पहचानते हैं तो जान जायेंगे कि इस गीत में सुरेश वाडकर की आवाज़ का क्या महत्व है. इस सांसारिक मोह माया में फंसे साधारण इच्छाओं के गीत को सुरेश वाडकर की आवाज़ अचानक एक ’पवित्रताबोध’ देती है, जैसे उसे कुछ ऊँचा उठा देती है. गौर करें कैसे कुणाल गाँजावाला अपनी चार लाइनों में कुछ अटखेलियाँ करते हैं और आखिर में टाऊ णाऊ भी लेकिन उन्हीं पंक्तियों को गाते हुए सुरेश वाडकर कितने सटीक हैं. सुरेश की आवाज़ चीनी घुली आवाज़ों के बीच गुड़ की मिठास है. और विशाल इसे बखूबी पहचानते हैं. तभी तो दूसरे अंतरे में पहली तीन लाइनें तो कुणाल की आवाज़ में हैं लेकिन ’भोले भाले बन्दे’ में अचानक सुरेश वाडकर की आवाज़ आती हैं और उसे कितना, कितना विश्वसनीय बनाती है. मैं कुणाल और सुनिधि का भी बड़ा पंखा हूँ लेकिन मुझे कहीं गहरे यह लगता है कि इस गीत पर पूरा हक रेखा भारद्वाज और सुरेश वाडकर का ही होना था. मैं पूरे गीत में उनकी आवाज़ का इंतज़ार करता हूँ. शायद उनके हिस्से का असल गीत अभी बाकी है. विशाल सुन रहे हैं न?</p>
<p><strong>&#8220;फटक&#8221; 5:03 (सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर)</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;ये इश्क नहीं आसाँ,<br />
अजी एड्स का खतरा है.<br />
पतवार पहन जाना,<br />
ये आग का दरिया है.&#8221;</p></blockquote>
<p>आक्रामक गाना है. हमला करता हुआ. वैसे भी सुखविंदर और कैलाश हमारी सबसे बुलन्द आवाज़ें हैं. थीम बैकग्राउंड बीट है ’फटाक’, किसी वाद्ययंत्र से नहीं कोरस आवाज़ में. टिपिकल विशाल का अंदाज़. सत्या के ’कल्लू मामा’ में भी ’ढिशक्याऊँ’ की धुन इसी अन्दाज़ में आती थी. यह यथार्थवाद का विशाल का अपना तर्जुमा है. बीच में ढोल का प्रयोग एम एम करीम से रहमान तक बहुत से और लोगों के काम की याद दिला जाता है. बहुत ही लिरिकल है, सीधे ज़बान और दिमाग़ पर चढ़ने वाला. इंस्टैंट असर के लिए. गुलज़ार के प्रयोग भी अपनी पूरी बुलन्दी पर हैं. इस बार तो सामाजिक संदेश भी साथ है. ’रात का जाया रे’ जैसे प्रयोग फिर गीत को सतह से थोड़ा गहरे ले जाते हैं.</p>
<p><strong></strong></p>
<p><strong>&#8220;कमीने&#8221; 5:57 (विशाल भारद्वाज)</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;जिसका भी चेहरा छीला, अन्दर से और निकला.<br />
मासूम सा कबूतर, नाचा तो मोर निकला.<br />
कभी हम कमीने निकले, कभी दूसरे कमीने.&#8221;</p></blockquote>
<p>सोल ऑफ़ द एलबम. पूरी तरह विशाल छाप गाना जिसमें इस बार आवाज़ भी खुद विशाल की है. इस गीत में कुल बीस बार कमीने शब्द आता है फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि यह इस दशक का सबसे मासूम गीत है. सबसे ईमानदार गीत. ऐसी ईमानदारी जो शायद आपके भीतर की उस सच्चाई को जगा दे जिसका सामना करने से आप खुद भी डरते हैं. इस गीत की प्रकृति कुछ-कुछ ’सच का सामना’ की कुर्सी पर बैठने जैसी है. यह गीत डायरी लिखने जैसा ईमानदार काम है. यह अपने ही भीतर के स्याह हिस्से की उजली तलाश है. यह गीत न्यू वेव हिन्दी सिनेमा का थीम साँग हो सकता है. यह वो सारे भाव अपने भीतर समेटे है जिसकी तलाश दिबाकर बनर्जी से अनुराग कश्यप तक अपने सिनेमा में करते रहे हैं. यह सही समय है कि एक ’पल्प फिक्शन’ हमारे यहाँ भी आए, कोई टैरेन्टीनो हमारे यहाँ भी जिन्दगी के उन स्याह हिस्सों की तलाश में निकले जिन्हें शेक्सपियर के ओथेलो से ओमकारा तक और मैकबैथ से मक़बूल तक खोजा ही जाता रहा है. विशाल, अब हम आपके इंतज़ार में है.</p>
<p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey11.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-161" title="kaminey11" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey11.jpg" alt="kaminey11" width="696" height="767" /></a></p>
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		<title>&#8220;मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!&#8221; ~पीयूष मिश्रा.</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/06/piyush-mishra-interview/</link>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 16:37:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Piyush_Mishra" target="_blank"><strong>पीयूष मिश्रा</strong></a> से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा &#8211; परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में &#8216;पॉलिटिकली करेक्ट&#8217; रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.<br style="background-color: #cccccc;" /></p>
<p style="text-align: justify;">लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे &#8216;गुम&#8217; हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~<strong><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p>
<object width="607" height="455" data="http://vimeo.com/moogaloop.swf?clip_id=4452625&amp;server=vimeo.com&amp;show_title=1&amp;show_byline=1&amp;show_portrait=0&amp;color=ff9933&amp;fullscreen=1" type="application/x-shockwave-flash"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://vimeo.com/moogaloop.swf?clip_id=4452625&amp;server=vimeo.com&amp;show_title=1&amp;show_byline=1&amp;show_portrait=0&amp;color=ff9933&amp;fullscreen=1" /></object>
</p>
<p><strong>वरुण~</strong> आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>पीयूष~</strong> </span>(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.</p>
<p>लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक&#8230; उसके बाद में लेफ्ट आपको&#8230; या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ&#8230; लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ&#8230; तब आप बहुत सुखी&#8230; (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.</p>
<p>और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो&#8230; तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब&#8230; बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा&#8230; तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (&#8230;..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था&#8230; हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ हाँ लेकिन जो लोग &#8216;एक्ट वन&#8217; को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि &#8216;एक्ट वन&#8217; में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, &#8216;एक्ट वन&#8217; की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ठीक है, वो &#8216;एक्ट वन&#8217; हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने बहुत कुछ सिखाया. &#8216;एक्ट वन&#8217; (की) &#8216;सो कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने (जीना) सिखाया&#8230; &#8216;एक्ट वन&#8217; की जो &#8216;सो-कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में&#8230; फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है&#8230; सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को&#8230; सफ़दर का काम, सफ़दर का काम&#8230; क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा&#8230; ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की&#8230; खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.</p>
<p>अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये&#8230; कर तो लिया यार&#8230; अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था&#8230; शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल&#8230; उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ&#8230; उनसे ही पूछो!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर&#8230; वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> टॉक टू हिम&#8230; टॉक टू हिम!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ऐसा कुछ नहीं है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हाँ&#8230; स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो&#8230; थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.</p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं है&#8230; आज&#8230; नसीर हैं, ओम पुरी हैं&#8230; पंकज कपूर&#8230; दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं&#8230; आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. &#8216;एक्ट वन&#8217; मैंने जब छोड़ा था &#8216;95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.</p>
<p><strong>व</strong><strong>रुण</strong>~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> &#8216;झूम बराबर झूम&#8217; में काम किया, वो चल नहीं पाई. &#8216;मक़बूल&#8217; में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला&#8230; वो भी अच्छे एक्टर हैं&#8230; पर पता नहीं कुछ कारणों से, &#8216;मक़बूल&#8217; में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. &#8216;आजा नच ले&#8217; में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा&#8230; ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे&#8230; जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ गुलाल की बात करें तो&#8230; उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>एक लाइन ली है&#8230; एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं&#8230; वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था&#8230; ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> मालूम नहीं&#8230; इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को &#8216;लेजेंड ऑफ भगत सिंह&#8217; बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है&#8230; मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हूँ&#8230; हूँ&#8230; नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (&#8217;अरे रुक जा रे बँदे&#8217;)&#8230; लाइव कॉन्सर्ट करते हैं&#8230; उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो&#8230; सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत&#8230; यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना&#8230; गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक&#8230; भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं&#8230; मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.</p>
<p>एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. &#8220;यह नाटक कर रहा है&#8230; लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!&#8221; अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है&#8230; दिल्ली के मुक़ाबले.</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) &#8220;नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.&#8221; एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)&#8230; प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या&#8230; डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में&#8230; दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ&#8230; सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?</p>
<p>वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य&#8230; क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने&#8230; ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का&#8230; गाली देने की इच्छा होती है.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)&#8230; एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.</p>
<p><strong>वरुण~</strong> लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते&#8230; उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है&#8230; अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक&#8230; कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.</p>
<p>आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा&#8230; बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो&#8230; ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है&#8230; मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी&#8230; कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ&#8230; कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को&#8230; अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.</p>
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		<title>नौकर की कमीज पढ़ते हुए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Apr 2009 17:40:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[क्योंकि गद्य कवियों की कसौटी है]]></category>
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		<description><![CDATA[
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;
यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;</strong></p>
<p>यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है.</p>
<p>मेरी आवाज़ में बहुत कमज़ोरी थी. उदाहरण के लिए एक ऐसे बीमार आदमी की कमज़ोरी जिसे बिस्तर से सहारा देकर उठाया जाता है. कई दिनों से उसे भूख नहीं लगी. चटपटी सब्जी खाने की उसकी बहुत इच्छा होती है. पर सब्जी कोई बनाता नहीं. जो भी वह खाता है, उल्टी हो जाती है. पानी पीता है. कराहता रहता है. डाक्टर को पूरी उम्मीद है कि वह बच जाएगा. इसलिए घर के लोग खुश हैं. और जितनी तकलीफ़ बीमार को है, उतना दुख उन लोगों को नहीं है, ऐसा बीमार सोचता है. जब वह अपनी तकलीफ़ की बात करता है तो उसकी पत्नी उसकी तकलीफ़ को यह कहकर कम कर देती है कि डाक्टर ने कहा है उसे कुछ नहीं होगा. जब वह कहता है कि अब वह मर जायेगा, तब उसकी माँ उसका माथा सहलाती हुई कहती है कि घबराओ नहीं, डाक्टर ने कहा है सब ठीक हो जाएगा. उसे प्यास लगती है, तो पत्नी कटोरी में दूध लेकर आती है. मजबूरी में थोड़ा दूध पी लेता है. तभी उसे कै करने की इच्छा होती है. उससे मिलने के लिए उसके दफ़्तर के लोग आते हैं. कमज़ोरी में वह किसी से बात नहीं कर सकता. गले तक चादर ओढ़े वह पड़ा रहता है. उसके बदले उसकी माँ और पत्नी मिलनेवालों से बात करती हैं. लोगों के पूछने कि पहले की तबियत कैसी है, दोनों में से कोई कहेगा कि डाक्टर ने कहा कि सब ठीक हो जाएगा. गुस्से में वह पत्नी को गाली देना चाहता है. माँ से बात करना नहीं चाहता. पर कमज़ोरी के कारण वह शांत रहता है. मरता नहीं, थककर सो जाता है.</p>
<p>हमेशा-हमेशा के लिए मैदान छोड़ने की मेरी इच्छा कभी नहीं हुई. मैं ज्यादा देर तक न तो घर से बाहर रह सकता था और न घर के अंदर. फिर भी मेरी मन:स्थिति ऐसी थी जिसमें मैं अनंत काल तक घर लौटना नहीं चाहता था. पर जब भी लौटूँ, पत्नी को उसी तरह भरी बाल्टी लिए हुए, माँ को चावल पछोरते हुए पाना चाहता था. यानी अनंतकाल के बाद भी हर चीज को बिलकुल अभी जैसी &#8212; जैसे इस घर को, गिरे हुए गिलास को, पर खपरों में लगे मकड़ी के जालों को नहीं. और उस मक्खी को भी नहीं जो मेरी पत्नी के पैर में बार-बार आकर बैठ रही थी. चाहता था कि अनंतकाल से लौटने के बाद दोनों खुश मिलें. पत्नी की आँख के नीचे जो काले धब्बे हैं, वे न हों. घर की लिपाई-पुताई हो जाए तो और भी अच्छा है.</p>
<p>किसी दिन पच्चीसों बार ऐसा होता था कि बस दु:ख ही दु:ख है. उसी दिन या दूसरे दिन कुछ ऐसी बातें भी होती थीं जिससे दु:ख नहीं होता था. कभी-कभी बहुत खुशी की बात भी होती थी. दु:ख को घटाकर महसूस करने की ताकत मुझमें नहीं थी. मैं ऐसे नाप का गिलास बन गया था कि थोड़ी तकलीफ़ में भी दु:ख से भर जाता और ज्यादा तकलीफ़ में भी यही होता. ऐसी अकलमंदी नहीं थी कि एक लकीर को बिना मिटाए छोटी करने के लिए तरीका बड़ी लकीर खींचने का है. ऐसी अकलमंदी किस काम की कि हर आनेवाला दु:ख पहले से बड़ा होता चला जाए और बीते दु:ख का संतोष हो कि बड़ा नहीं था.</p>
<p>जिंदगी के हर क्षण से पच्चीसों लाल चीटियाँ चिपकी रहती थीं, शायद पसीना इसका कारण हो. लेकिन उनको सहने की आदत पड़ गई थी. जिस क्षण से चींटी अलग होती वह क्षण भी चींटी के साथ-साथ मरकर नीचे गिर जाता. यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती. इसलिए एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता. पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है. इसलिए खास तकलीफ़ नहीं होती और गरीबी पैदाइशी रहती है. गर्दन को हिलगाए हुए सब लोग अपना काम जारी रखते हैं &#8212; यानी गर्दन कटवाने का काम.</p>
<p>मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था. यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फ़िट था. और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था. इस कटघरे में सुराख कर मैं सिनेमा देखता था, या स्वप्न. हफ़्ते-भर बाद ही मेरी फ़िल्म देखने की इच्छा हो जाती थी. फ़िल्में और लोगों की तरह मुझमें भी जीने का विश्वास बढ़ाती थीं. यह जीना यथास्थिति में जीने का था. रिक्शेवाले से एक करोड़पति की लड़की की शादी हो सकती थी तो रिक्शावाला इसी संतोष से रिक्शा चलाता रहेगा. अमीर लड़की से गरीब लड़के के प्रेम को देखकर गरीबों को कुछ वैसा ही सुख मिलता था जो अपनी चारपाई या जमीन पर सोने से ज्यादा, बढ़िया गद्देदार पलंग के नीचे झाडू लगाने में नौकर को मिलता होगा. खाना बनानेवाला नौकर ज्यादा खाना बनाएगा ताकि खाना बचे. परंतु विज्ञान से गरीबों को खास लाभ नहीं मिला था. मालकिन बचा हुआ खाना रेफ्रीजरेटर में रख देगी. नौकर को कभी-न-कभी कुछ जरूर मिलेगा क्योंकि रेफ्रीजरेटर में रखे-रखे बहुत दिनों का सामान खराब हो जाता है. ज्यादातर आदमी का स्वाद मिठाई के ढेर से थोड़ी मिठाई चुराकर चख लेने का स्वाद था. आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे. लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था. रदीपन देर तक ताजा रहेगा. अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी.</p>
<p>देवांगन बाबू 5 फुट 2 इंच के थे. उनकी ड्रार में एक डायरी थी, उसमें ऊँचाई की जगह उन्होंने 5 फुट 2 इंच लिखा था. वजन में 58 किलो लिखा था. स्कूटर, कार के नंबर की जगह साइकिल का नंबर था. ड्राइविंग लाइसेंस नंबर की जगह उनके दो लड़कों का नाम था- मदनलाल देवांगन और सोहनलाल देवांगन. टेलीफोन नंबर की जगह वल्द रामचरन देवांगन, ग्राम डोंगरगाँव था. रेडियो लाइसेंस नंबर की जगह उन्होंने रेडियो लाइसेंस का नंबर ही लिखा था. सेफ डिपाजिट व्हाल्ट की जगह उन्होंने लिखा था&#8211; हरे रंग की पेटी.</p>
<p>अपने बस में करने और अपना खरीदा गुलाम बनाने के तरीके बदल गए थे. सड़क के किनारे कोई आदमी थका हुआ सुस्ताने खड़ा रहेगा तो एक रौबदार आदमी आएगा और समझाते हुए कहेगा कि यह तुम्हारे खड़े होने लायक जगह नहीं है. वह सोचेगा जगह खड़े होने लायक क्यों नहीं है. रौबदार आदमी इशारा करके बतलाएगा कि वहाँ खड़े रहो जहाँ उसकी मोटरकार है. फिर बहुत आत्मीयता से कंधे पर हाथ रखकर उस जगह तक ले जाएगा. फिर कहेगा कि खड़े-खड़े मोटरकार ताकते रहो, वह अभी खरीदी करके आता है और आजकल पलक झपकते चोरी हो जाती है. मोटरकार कोई न ले जाए पर उस पर जमी धूल पर बदमाश लड़के उँगली से अश्लील गालियाँ लिख देते हैं. मालूम पड़ता नहीं. मोटर के साथ-साथ गंदी गालियाँ घर तक पहुँच जाती हैं जिस पर घर में लड़के, लड़की, नौकर, पत्नी सबकी नज़र पड़ती है. यह हरकत सभी मोटरकार के साथ होती है. फिर भी शंका तो होती है कि उसके साथ क्यों? कोई उससे ज़रूर चिढ़ा हुआ है जो सामने नहीं आना चाहता. छुपकर वार करने की फिराक में है. तब वह पूरी ईमानदारी से मानवता के आधार पर, जो उसे परंपरा से मिले थे, टकटकी बाँधे मोटरकार को ताकता रहेगा. यहाँ तक कि ताकते-ताकते थक जाएगा. तब उसे गृहस्थी के बहुत से ज़रूरी काम याद आएँगे. वह परेशान होकर चहल-कदमी करने लगेगा. चलकदमी करते-करते फिर थक जाएगा और सुस्ताते हुए मोटरकार ताकता रहेगा; आखिर में वह देखेगा कि मोटरकारवाला कब का मोटरकार लेकर चला गया. मोटरकार का नम्बर उसे याद नहीं रहेगा. पर मोटर के पीछे धूल में लिखी गालियाँ उसे याद रहेंगी.</p>
<p>मिट्टी के तेल की उधारी पाकर मैं बहुत संतुष्ट था. सही माने में सभी संतुष्ट थे. भिखारी को भीख मिल जाती थी. बेईमानी के साथ-साथ धर्म के काम भी बढ़ते थे. क्योंकि बेईमानी की कमाई से धर्म-पुण्य का काम होता था.</p>
<p>घर का खर्च कम नहीं होता था. फालतू खर्च क्या है, जिसमें कटौती की जाए, यह बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया. बाद में भिखमंगे को रोटी देना एक फालतू खर्च समझ में आया. तब यह रोटी घर में उपयोग होने लगी. -खर्च पूरा न बैठने के कारण दया और उदारता कम हो जाती है, यह बात समझ में जल्दी आती थी. उदारता और दया का सीधा-सीधा संबंध रुपए से है. सिर पर हाथ फिरा देना न तो उदारता होती है, न दया. बस सिर पर हाथ फिराना होता है.</p>
<p>बड़े-बड़े बँगलों के सामने रास्ता चलती गायों के पानी पीने के लिए एक-एक टाँका बना था. गर्मियों मे सेठ मारवाड़ियों के लड़के प्याऊ खोलकर बैठ जाते थे. रेलवे स्टेशन में यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने के लिए रेलगाड़ी के समय लड़के मोटरकार में बैठकर आते. यात्रियों को पानी पिलाकर पसीना पोंछते हुए घर लौट जाते थे. दोनों हाथ हिलाते चलते थे, एक हाथ से बईमानी और दूसरे हाथ से धर्म, सामाजिक और राजनैतिक कार्य इत्यादि.</p>
<p>गरीब एक स्तर के होते हुए भी एक जैसे इकट्ठे नहीं होते जैसे पचास आदमी को काटकर पचास आदमी बना देना. यदि पचास हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ पचास, एक और फिर गिनती गिनो इक्यावन.</p>
<p>&#8220;मैं अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा. जो मैं पहनता हूँ उसे नौकर पहने, यह मुझे पसन्द नहीं है. मैं घर का बचा-कुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ. जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए. अगर यह हुआ तो उनमें असंतोष फैलेगा. बाद में हम लोगों की तकलीफ़ें बढ़ जाएँगी. खाना उनको वैसा ही दो, जैसा वे खाते हैं. जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो. ये पेट भरते हैं, चाहे आधा या चौथाई. स्वाद से इनको कोई मतलब नहीं. सड़क के किनारे चाट खाने वाले, चाट खाकर जो फैंकते हैं, यह मुझे गुस्सा दिलाता है. इसी के कारण आवारा गरीब लड़के पत्ते चाटकर जादुई स्वाद का पता लगा लेते हैं, जिससे चोरी, गुंडागर्दी और हक माँगनेवाली झंझटें बढ़ी हैं. स्वाद हम लोगों को संतोष नहीं दे सका तो इनको क्या देगा? अगर ये स्वाद के चक्कर में पड़ गए तो अपनी जान बचानी मुश्किल होगी.&#8221;</p>
<p>मैं अधिक देर तक नौकर की कमीज पहने हुए नहीं रह सकता था. इससे छुटकारा पाना चाहता था. कमीज से मुझे पेन्ट की गंध आ रही थी. साहब के बंगले की खिड़की-दरवाजों में अभी हाल में पेन्ट किया गया था. मैंने अपने हाथों को सूँघकर देखा, उससे भी नए पेन्ट की गंध आ रही थी. क्या मुझे भी पेन्ट किया गया है?</p>
<p>बड़े बाबू के दो लड़के और तीन लड़कियाँ थीं. एक लड़का साल भर हो गया, घर से भाग गया था. पत्नी तीन-चार साल से नहीं थी. उन्हें अपने लड़के के मिलने की उम्मीद रोज़ रहती थी. जब वह भीड़ में होते तो यह उम्मीद बढ़ जाती थी. इसलिए यदि सब्जी खरीदने गए तो खरीदते-खरीदते भीड़ में नज़र से अपने लड़के को ढूँढते. जब पिक्चर देखने जाते तो खेल खत्म होने के बाद एक तरफ़ खड़े होकर भीड़ की तरफ़ देखते रहते. सड़क पर जहाँ दस-पन्द्रह आदमी दिखाई देते तो वहाँ लड़के को ढूँढने का मन होता और एक ढूँढ़ती नज़र डालकर आगे बढ़ जाते. आते-जाते लोगों पर भी उनकी निगाह ढूँढ़ लेने की होती. किसी परिचित को भी देखेंगे, जैसे वे एकदम से मुझे संतू बाबू नहीं देखेंगे, पहले देखेंगे कि मैं उनका लड़का नहीं हूँ, फिर मुझे संतू बाबू देखेंगे.</p>
<p>छुट्टी मुझे एक ऐसी फुर्सत लगती है जिसमें एक आदमी अपना ही तमाशा देखता है.</p>
<p>कितना सुख था !</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8216;नौकर की कमीज’, लेखक- विनोद कुमार शुक्ल<br />
दूसरी आवृत्ति 2006, राजकमल प्रकाशन,<br />
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002</strong></p>
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		<title>ख़ामोशी के उस पार : विदेश</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Apr 2009 22:23:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित
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दीपा मेहता की ’विदेश’ परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की तमाम खूबसूरतियाँ अपने में समेटे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.tehelkahindi.com/review/films/244.html" target="_blank"><strong><strong>मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित</strong></strong></a></p>
<p>**********</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://www.teenstation.com/gallery/albums/videsh/videsh_1.jpg" alt="" width="265" height="350" /><a href="http://www.imdb.com/name/nm0576548/" target="_blank"><strong>दीपा मेहता</strong></a> की <a href="http://www.imdb.com/title/tt1146285/" target="_blank"><strong>’विदेश’</strong></a> परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की तमाम खूबसूरतियाँ अपने में समेटे एक तितली सी चंचल, झरने सी कलकल लड़की चांद <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Preity_Zinta" target="_blank"><strong>(प्रीति ज़िन्टा)</strong></a> के भोले, नादान, खूबसूरत सपने की असल ज़िन्दगी में मौजूद कुरूप यथार्थ से सीधी मुठभेड़ है. चांद के लिए यथार्थ इतना असहनीय और अप्रत्याशित है कि वो उसे सम्भाल नहीं पाती. सपना कुछ यूँ टूटता है कि चांद हक़ीक़त और फ़साने के बीच का फ़र्क खो बैठती है. आगे पूरी फ़िल्म में इस टूटे सपने की बिखरी किरचें हैं जिन्हें प्यार से रुककर समेटने वाला भी कोई नहीं. वो निपट अकेली जितना इन्हें समेटने की कोशिश करती है उतने ही अपने हाथ लहूलुहान करती है. इस फ़िल्म की मिथकीय कथा को तर्क की कसौटी पर कसकर नकार देना आसान रास्ता है लेकिन <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Yann_Martel" target="_blank"><strong>यान मारटेल</strong></a> का बहुचर्चित <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Life_of_Pi" target="_blank"><strong>’लाइफ़ ऑफ़ पाई’</strong></a> पढ़ने वाले जानते हैं कि असहनीय यथार्थ का सामना करने के लिए कथा में एक शेर ’रिचर्ड पारकर’ गढ़ लेना इंसानी मजबूरी है.</p>
<p>चांद को उसका पति बेरहमी से मारता है. अपने देश, अपनी पहचान से दूर दड़बेनुमा घर में कैद चांद की लड़ाई अपनी पहचान की लड़ाई है. पति से प्यार और अपनेपन की अथक चाह उसे एक ऐसी मिथक कथा पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर देती है जिसमें एक शेषनाग उसके पति का रूप धरकर आता है और उसे दुलारता है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Girish_Karnad" target="_blank"><strong>गिरीश कर्नाड</strong></a> के नाटक ’नागमंडलम’ से लिए गए फ़िल्म के इस दूसरे हिस्से को ’जादुई यथार्थ’ का बेजा इस्तेमाल कहकर टाला नहीं जा सकता. यह आपको असहज कर देता है. और फ़िल्म के मर्म तक पहुँचने के लिए आपको इस एहसास से जूझना होगा. चांद की कहानी कोरी घरेलू हिंसा की कहानी भर नहीं. दरअसल यह उस मनोस्थिति के बारे में है जिससे अपने ही पति द्वारा जानवरों की तरह मारी-पीटी जा रही चांद गुज़र रही है. उसका ’पगला जाना’ ऐसी त्रासदी है जिसे दीपा मेहता सिनेमा के पर्दे को बार-बार स्याह-सफ़ेद रँगकर और तीखेपन से उभारती हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Preity_Zinta" target="_blank"><strong>प्रीति</strong></a> यहाँ अपनी मुखर सार्वजनिक छवि के उलट दूर देस में फँसी एक अकेली और अपनी पहचान पाने की जद्दोज़हद में जुटी लड़की चांद के किरदार में जान फ़ूँक देती हैं और बाकी तमाम अनजान चेहरे इस फ़िल्म को अपनी नैसर्गिक अदायगी से वत्तचित्र का सा तेवर देते हैं.</p>
<p>कनाडा में रहने वाले अप्रवासी भारतीय परिवार में ब्याही गई चांद की कहानी ’विदेश’ अप्रत्यक्ष रूप से उस बदहाल हो रहे सूबे पंजाब की कहानी भी है जिसके सपने भी अब विदेशों से आती स्पॉन्सरशिप और किसी दूर देस में मौजूद अनदेखे सुनहरे भविष्य से लगाई झूठी उम्मीद के मोहताज हैं. आमतौर से स्त्री पर होती घरेलू हिंसा पर आधारित कहानियों में मुख्य खलनायक पति या घरवाले होते हैं लेकिन दीपा की ’विदेश’ यह साफ़ करती है कि व्यख्याएं हमेशा इतनी सरल नहीं होती. यहाँ बहु की पिटाई में संतुष्टि पाने वाली सास (तारीफ़ कीजिए <a href="http://www.imdb.com/name/nm0423666/" target="_blank"><strong>बलिन्दर जोहल</strong></a> के बेहतरीन काम की) में एक असुरक्षित माँ छिपी है जिसे डर है कि उसके बेटे को यह नई आई रूपवती बहु हड़प लेगी. और अपनी ही पत्नी को मारने वाला रॉकी (वंश भारद्वाज) उन एन.आर.आई. सपनों को ढोती जीती-जागती लाश है जिसे ’फ़ीलगुड सिनेमा’ के नाम पर हिन्दुस्तानी सिनेमा ने सालों से बुना है. समझ आता है कि उसे हिन्दी सिनेमा के उल्लेख भर से क्यों चिढ़ है. विदेश एक त्रासद अनुभव है. यह दीवार की ओट से आती उन बेआवाज़ सिसकियों की तरह है जिन्हें सुनने के लिए कानों की नहीं दिल की ज़रूरत होती है.</p>
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