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सुंदर का स्वप्न : शिप अॉफ थिसियस

शायद किराये के मकानों में ऐसा अक्सर होता है। जिस घर में हम रहने अाये, उसकी दीवारों पर पिछले रहनेवालों के निशान पूरी तरह मिटे नहीं थे। ख़ासकर बच्चों की उपस्थिति के निशान। कमरे की दीवारों पर रंग बिरंगी पेंसिल की कलाकारियाँ अौर अलमारियों पर सांता क्लाज़ के स्टिकर। अौर ...

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July 22, 2013

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में 'नया' क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा सिनेमा में क्या बदला? क्या कथा बदली? इसका शायद ...

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January 2, 2013

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केंचुल उतारता शहर

हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म 'शाहिद' के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म 'दिल पे मत ले यार' पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे ...

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December 21, 2012

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कितने बाजू, कितने सर

एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ...

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November 30, 2012

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

पिछले दिनों रिलीज़ हुई ‘आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया था। न जाने क्या हुआ कि हमने उसके बाद सौरभ ...

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October 22, 2012

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बच्चन

वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद ...

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October 11, 2012

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’बरफ़ी’ का रेलगाड़ी वाला शहर

"हर भले आदमी की एक रेल होती है जो माँ के घर की ओर जाती है सीटी बजाती हुई धुआँ उड़ाती हुई" ~ आलोक धन्वा अनुराग बासु की ’बरफ़ी’ कुछ मायनों में चुनौतीपूर्ण फ़िल्म है और बहुत से मामलों में बहुत पारम्परिक। पारम्परिक इन मायनों में कि यह एक ख़ास समय, स्थान और ...

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September 29, 2012

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’शांघाई’ के सर्वहारा

हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी ...

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June 19, 2012

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2011 : सिनेमा

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” - फ़राज़ ’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’ फ़िल्म – ’रॉकस्टार’ “पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ ...

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December 31, 2011

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रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था

पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा ...

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November 11, 2011