“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के लिए” : दि लंचबॉक्स

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“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के लिए”

स्थापत्यकार राहुल महरोत्रा समकालीन मुम्बई शहर की विरोधाभासी संरचना को केन्द्र बनाकर लिखे गए अपने चर्चित निबंध में शहर की संरचना को दो हिस्सों में विभाजित कर उन्हें ‘स्टेटिक सिटी’ तथा ‘काइनैटिक सिटी’ का नाम देते हैं। वे लिखते हैं, “अाज के भारतीय शहर दो हिस्सों से मिलकर बनते हैं, जो एक ही भौतिक स्पेस के भीतर मौजूद हैं। इनमें पहली अौपचारिक नगरी है जिसे हम ‘स्टेटिक सिटी’ कह सकते हैं। ज़्यादा स्थायी सामग्री जैसे कंक्रीट, स्टील अौर ईंटों द्वारा निर्मित यह शहर का हिस्सा शहर के पारम्परिक नक्शों पर द्विअायामी जगह घेरता है अौर अपनी स्मारकीय उपस्थिति दर्ज करवाता है। दूसरा शहर, शहर का अनधिकृत या कहें अनौपचारिक हिस्सा है जिसे हम ‘काइनैटिक सिटी’ कह सकते हैं। इसे द्विअायामी सांचे में बाँधकर समझना असंभव है। यह सदा गतिमान शहर है – जिसका निर्माण शहर में बढ़ती हुई वैकासिक त्रिअायामी गतिविधियों द्वारा होता है।”[1] काइनैटिक सिटी अपने स्वभाव में ज़्यादा अस्थायी अौर गतिमान होती है अौर यह निरंतर खुद में सुधार करती रहती है अौर खुद को बदलती रहती है। काइनैटिक सिटी शहर के स्थापत्य में नहीं है। यह तो निरंतर बदलती शहरी ज़िन्दगियों की अार्थिक, साँस्कृतिक अौर सामाजिक गतिविधियों में निवास करती है।

इस काइनैटिक सिटी का उदाहरण गिनाते हुए महरोत्रा मुम्बई की मशहूर डब्बावाला संस्कृति को शहर के इन दो हिस्सों − स्टेटिक सिटी अौर काइनैटिक सिटी के मध्य संबंध के सबसे प्रतिनिधि उदाहरण के रूप में याद करते हैं। वे लिखते हैं कि मुम्बई के डिब्बावाले शहर के इन दो हिस्सों, स्टेटिक सिटी अौर काइनैटिक सिटी के मध्य, अौपचारिक अौर अनौपचारिक शहर के मध्य संबंध का सबसे बेहतर उदाहरण हैं। यह टिफिनसेवा शहर के मध्य यातायात के लिए मुम्बई की लोकल ट्रेन सेवा पर निर्भर रहती है अौर अपने ग्राहक को अौसतन महीने का 200 रुपया खर्चे की पड़ती है। इसके महीने का टर्नअोवर तक़रीबन पाँच करोड़ रुपये तक का हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार तक़रीबन 4,500 डिब्बेवाले शहर में रोज़ 2 लाख से ज़्यादा खाने के डिब्बों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम करते हैं।[2]

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सुंदर का स्वप्न : शिप अॉफ थिसियस

Ship Of Theseus

शायद किराये के मकानों में ऐसा अक्सर होता है। जिस घर में हम रहने अाये, उसकी दीवारों पर पिछले रहनेवालों के निशान पूरी तरह मिटे नहीं थे। ख़ासकर बच्चों की उपस्थिति के निशान। कमरे की दीवारों पर रंग बिरंगी पेंसिल की कलाकारियाँ अौर अलमारियों पर सांता क्लाज़ के स्टिकर। अौर उससे भी कमाल था बाथरूम की एक अलमारी पर अनगिनत स्टिकर से बना एक कोलाज जिसमें एक बच्चे की कल्पना की उड़ान में अानेवाली तमाम तरह की चीज़ें थीं। नए रंग रोगन ने दीवार की कलाकारियों को तो मिटा दिया। लेकिन अलमारी का कोलाज हमने उतारा नहीं। एक स्कूलबस, कुछ जोड़ी जूते, एक लम्बी दूरबीन, बहुत सारी मछलियाँ। थोड़ा सा उन अनदेखे बच्चों को वहाँ रहने दिया। अौर शायद थोड़ा खुद को। अपना बचपन भी तो मैं शहरी अाबादी से बहुत दूर एक बड़े से चौक वाले मकान के किसी शांत कोने में छोड़ अाया था किन्हीं अौर अनदेखे लोगों द्वारा संभाले जाने के लिए।

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नाम-पते वाला सिनेमा : 2012 Roundup

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फिर एक नया साल दरवाज़े पर है अौर हम इस तलाश में सिर भिड़ाए बैठे हैं कि इस बीते साल में ‘नया’ क्या समेटें जिसे अागे साथ ले जाना ज़रूरी लगे। फिर उस सदा उपस्थित सवाल का सामना कि अाखिर हमारे मुख्यधारा सिनेमा में क्या बदला?

क्या कथा बदली? इसका शायद ज़्यादा ठीक जवाब यह होगा कि यह कथ्य में पुनरागमन का दौर है। ‘पान सिंह तोमर’ देखते हुए जिस निस्संगता अौर बेचैनी का अनुभव होता है, वह अनुभव गुरुदत्त की ‘प्यासा’ के एकालाप ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’ तक जा पहुँचता है। ‘गैंग्स अॉफ वासेपुर’ की कथा में वही पुरानी सलीम-जावेद की उग्र भंगिमा है जिसके सहारे अमिताभ ने अपना अौर हिन्दी सिनेमा का सबसे सुनहरा दौर जिया। ‘विक्की डोनर’, ‘लव शव ते चिकन खुराना’, ‘अइय्या’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’ अौर ‘तलाश’ जैसी फिल्में दो हज़ार के बाद की पैदाईश फिल्मों में नई कड़ियाँ हैं जिनमें अपनी अन्य समकालीन फिल्मों की तरह कुछ गंभीर लगती बातों को भी बिना मैलोड्रामा का तड़का लगाए कहने की क्षमता है। लेकिन अगर कथा नहीं बदली अौर न ही उसे कहने का तरीका थोड़े ताम-झाम अौर थोड़े मैलोड्रामा को कम करने के बावजूद ज़्यादा बदला, तो फ़िर ऐसे में अाखिर वो क्या बात है जो हमारे इस समकालीन सिनेमा को कुछ पहले अाए सिनेमा से भिन्न अनुभव बना रही है?

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केंचुल उतारता शहर

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हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म ‘शाहिद’ के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म ‘दिल पे मत ले यार’ पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे के लिए लिखा अालेख, पिछले दिनों मैंने ‘कथादेश’ के दोस्तों से शेयर किया। वही अाज यहाँ अापके लिए। हंसल की ‘दिल पे मत ले यार’ अाज भी मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में शुमार है, अौर कहीं न कहीं इसकी भी अप्रत्यक्ष भूमिका रही है मुझे मेरे वर्तमान शोध तक पहुँचाने में।

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“रामसरन हमारी खोई हुई इन्नोसेंस है. वो इन्नोसेंस जो हम सबमें कहीं है लेकिन जिसे हमने कहीं छिपा दिया है क्योंकि मुझे एक बड़ा बंगला चाहिए, तुम्हें एक अच्छी सी नौकरी चाहिए. लेकिन रामसरन को इनमें से कुछ नहीं चाहिए. उसका काम सिर्फ़ इंसानियत से चल जाता है…

एंड फ़ॉर मी, दैट्स माय स्टोरी!” – महेश भट्ट, ’दिल पे मत ले यार’ में अपना ही किरदार निभाते हुए.

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कितने बाजू, कितने सर

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एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ज़्यादा बातें करने वाले, हमारे तमाम जुलूसों में सबसे आगे रहने वाले उन युवाओं में गज़ब का एका था। उन दिनों पंजाब में उग्र वाम फिर से लौट रहा था और वहाँ एम-एल की छात्र इकाई सबसे मज़बूत हुआ करती थी। वे लड़के बाहर से शान्त दिखते थे, लेकिन उनका जीवट प्रदर्शनों में निकलकर आता था और उन्हें देखकर हम भी जोश से भर जाते थे। सलवार-कुरते वाली कई लड़कियाँ थीं जो हमसे कम और आपस में ज़्यादा बातें करती थीं लेकिन सार्वजनिक स्थान पर किसी भी तनावपूर्ण क्षण के आते ही सबसे आगे डटकर खड़ी हो जाती थीं और कभी नहीं हिलती थीं। उन्हीं के माध्यम से मैं जाना था कि हमारे पडौसी इस ’धान के कटोरे’ में कैसी गैर-बराबरियाँ व्यापी हैं और कैसे वहाँ के दलित अब अपने हक़ के लिए खड़े होने लगे हैं। इस राजनैतिक चेतना के प्रभाव व्यापक थे। जब शोषित अपने हिस्से का हक़ मांगता है तो पहले से चला आया गैरबराबरी वाला ढांचा चरमराता है और इससे तनाव की षृष्टि होती है। बन्त सिंह आपको याद होंगें। यह बन्त सिंह की राजनैतिक चेतना ही थी जिसने उन्हें अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया और यही बात उनके गाँव के सवर्ण बरदाश्त न कर सके। उन्होंने बन्त के हाथ-पैर काट उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। लेकिन न वो बन्त को खामोश कर पाए, न उनके क्रान्तिकारी लोकगीतों को।

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

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पिछले दिनों रिलीज़ हुई आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया था। न जाने क्या हुआ कि हमने उसके बाद सौरभ शुक्ला की लेखकीय काबिलियत को सिरे से भुला दिया और उनपर से, उनके कामपर से अपनी निगाह हटा ली।

सौरभ शुक्ला ने अपनी निर्देशकीय पारी की शुरुआत जिस फ़िल्म से की थी, वो मुझे अभी तक याद है। दो घंटे की वो टेलिफ़िल्म उन्होंने नाइन गोल्ड के ’डाइरेक्टर्स कट’ के लिए बनाई थी और नाम था ’मिस्टर मेहमान’। छोटे कस्बे के जड़ सामाजिक संस्कारों के बीच बहुत ही खूबसूरती से पुराने रिश्तों में नएपन की, आज़ादी की बात करती ’मिस्टर मेहमान’ में नायक रजत कपूर थे और वहाँ से चला आता रजत कपूर और सौरभ शुक्ला का यह साथ ’आई एम 24’ तक जारी है। लेकिन सच यह भी है कि इसके आगे सौरभ शुक्ला ने जो फ़िल्में निर्देशित कीं, उनमें किसी को भी उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता। शायद वह समय ही ऐसा था। ’सत्या’ का एक लेखक अपनी रचनात्मक प्रखरता से समझौता न करने का प्रण लिए बार-बार प्रतिबंधित होता रहा और शराब के नशे में डूब गया, और दूसरे लेखक को उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाए, ऐसा कोई मौका दे ही नहीं पाया हमारा सिनेमा।

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बच्चन

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वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद है, उनकी आवाज़ को मानक सांचों से ’भिन्न’ पाया गया था। जल्द ही उन्होंने वे ’मानक सांचे’ बदल दिए।

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’शांघाई’ के सर्वहारा

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हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी महिला चाहती हैं कि स्पीकर पर बज रहे फ़िल्म के गाने की आवाज़ थोड़ी बढ़ा दी जाए। लेकिन अब विश्वविद्यालय के अपने कायदे हैं और प्रकाश उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। वे महिला चाहती हैं कि दिबाकर और टीम जब आएं ठीक उस वक़्त अगर “भारत माता की जय” बज रहा हो और वो भी बुलन्द आवाज में तो कितना अच्छा हो। मैं यह बात हेमंत को बताता हूँ तो वह कहता है कि समझो, वे पीआर से हैं, यही उनका ’वन पॉइंट एजेंडा’ है। हेमन्त, जिनकी ’शटलकॉक बॉयज़’ प्रदर्शन के इन्तज़ार में है, जेएनयू के लिए नए हैं। मैं हेमन्त को कहता हूँ कि ये सामने जो तुम सैंकड़ों की भीड़ देख रहे हो ना, ये भी भीड़ भर नहीं। यहाँ भी हर आदमी अपने में अलग किरदार है और हर एक का अपना अलग एजेंडा है।

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2011 : सिनेमा

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” – फ़राज़

’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’

फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”

राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है. मुझे बहुत साल पहले प्रसून जोशी की ’फिर मिलेंगे’ के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं. यहाँ अस्वीकार का साहस है. उस मासूमियत को बचाने की तड़प जिसे आप epic बन जाने को बेचैन इस पूरी फ़िल्म के दौरान सिर्फ़ रनबीर कपूर की उदंड आँखों में पढ़ पाते हैं.

’भूमिकाओं का बदलाव’

फ़िल्म – ‘डेल्ही बेली’

मैंने इस दृश्य की तुलना सत्यजित राय की ’चारुलता’ से की और साल की सबसे ज़्यादा गालियाँ यहीं खाईं. भूमिकाओं का यह बदलाव विस्मित करने वाला था. और इसे भूलकर भी नायक के ’नायकत्व’ का हास न समझें. सिंघमों और बॉडीगार्डों के दौर में ’डेल्ही बेली’ का ताशी दोरज़ी लहाटू लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में देखा गया सबसे मज़बूत नायकीय चरित्र है. नैतिक, ईमानदार और सच्चा. ऐसा नायक जिसका यकीन बोलने से ज़्यादा कर दिखाने में है.

’मेरिट बनाम आरक्षण’

फ़िल्म – ’आई एम कलाम’

“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”

“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”

“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”

“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”

“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”

लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है.

’कर्ता ने, कर्म को…’

फ़िल्म – ’जो डूबा सो पार’

फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ,

“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण…”

मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ.  करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था. दो हज़ार ग्यारह में यहीं मेरे लिए हिन्दी सिनेमा यथार्थ के सबसे निकट आया था.

“अकरम, ओए अकरम…”

फ़िल्म – ’चिल्लर पार्टी’

“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”

“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए…”

“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”

साल की सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग. सीधे बच्चों की दुनिया की नब्ज़ पकड़ लेती है फ़िल्म. निकनेम्स से बनी दुनिया जहाँ बड़ों की दुनिया से धकिआया हुआ बच्चा अपनी असल पहचान पाता है. वो अनजान बच्चों की दुनिया जहाँ वे अपने लिए खुद भूमिकाएं चुनते हैं और उनमें खरे उतरने के लिए बड़ों से ज़्यादा गंभीरता से प्रयासरत होते हैं.

दो हज़ार ग्यारह के नवरस : किरदार जिनकी छाप गहरी पड़ी

shor_in_the_cityपूर्णा जगन्नाथन – ’मेनका’ | फ़िल्म – ’डेल्ही बेली’

रनवीर हुड्डा – ’ललित/बबलू’ | फ़िल्म – ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’

परिणिति चोपड़ा – ’डिम्पल चड्ढ़ा’ | फ़िल्म – ’लेडीज़ वर्सेस रिकी बहल’

पित्तोबाश – ’मंडूक’ | फ़िल्म – ’शोर इन द सिटी’

नमन जैन – ’जांघिया’ | फ़िल्म – ’चिल्लर पार्टी’

राहुल बोस – ’जय’ | फ़िल्म – ’आई एम’

रनबीर कपूर – ’जनार्दन जाखड़/जॉर्डन’ | फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

जिमी शेरगिल – ’आदित्य प्रताप सिंह’ | फ़िल्म – ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’

दीपक डोबरियाल – ’पप्पी’ | फ़िल्म – ’तनु वेड्स मनु’


सर्वश्रेष्ठ पांच : 2011

’डेल्ही बेली’ – फ़िल्म देखते हुए मैं बार-बार सोचता हूँ कि क्या पटकथा में यह भी लिखा गया होगा कि कौनसे दृश्य में किस पुरुष किरदार की टीशर्ट पर क्या चित्रकला होनी है. यह फ़िल्म उसी बारीकी से बनाई गई है जिस बारीकी से मेरे प्रिय योगेन्द्र यादव चुनाव नतीजों का असल मतलब समझाते हैं. ठीक वहाँ जहाँ नायक नायक अपने फांसी से लटके दोस्त को मुक्त करवाने के लिए पिस्तौल का प्रयोग करता है और फिर शायद जैसा उसने फ़िल्मों में देखा होगा, पिस्तौल को अपनी पैंट में घुसेड़ता है. हाँ, ठीक वहाँ जहाँ उसे एक अभी-अभी चली पिस्तौल की तपती नली का झटका लगता है. ठीक वहीं यह फ़िल्म अपने साथ की अन्य औसत फ़िल्मों से आगे निकल जाती है.

’शोर इन द सिटी’ – साल की सबसे उम्मीदों भरी फ़िल्म. गुरु-गंभीरता के सघन दौर में रूहानी सच्चाइयों को रागदरबारी सी बेपरवाही से कहने का साहस रखने वाली. शहर की विभिन्न लयों को अपने में समेटे, और उन तमाम ख़रोचों को भी जिन्हें हम अक्सर रूबरू देखने से बचते हैं. साथ ही ’शोर इन द सिटी’ साल का सबसे संभावनाओं से भरा किरदार अपने भीतर समेटे है. बेस्टसेलर किताबों की पाइरेसी करता ’तिलक’ जिसे अचानक ’एलकेमिस्ट’ पढ़कर लगता है कि उसके हाथ किसी खज़ाने की चाबी लग गई है. यह किरदार जैसे दो दुनियाओं को आपस में जोड़ता है. ठीक संचरण की अवस्था में इसे पढ़ना जैसे सम्पूर्ण लोकप्रिय संस्कृति को किसी इंसान में पढ़ना है. इस किरदार के द्वारा हम कामकाजी वर्ग में अदृश्य से दृश्य होने की आकांक्षा का पहला बीज अंकुरित होते देखते हैं. दुर्लभ.

’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ – कई मायनों में एक सम्पूर्ण फ़िल्म जो कुछ बड़ा कहने से बचती है. ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पूरी तरह अपने दोनों मुख्य पुरुष किरदारों के कांधों पर खड़ी है जो ’बीवी’ की भूमिका में माही गिल के अत्यन्त बचकाने अभिनय के बावजूद इसे बखूबी किनारे निकाल ले जाते हैं. काफ़ी हद तक एक प्रदर्शन आधारित फ़िल्म जिसकी ताक़त रणवीर हुड्डा और जिम्मी शेरगिल की दमदार संवाद अदायगी और अभिनय है. फ़िल्म छोटे वादे करती है लेकिन उन्हें पूरा करती है.

‘धोबी घाट’ – अगर ’शोर इन द सिटी’ मुम्बई का रागदरबारी तर्जुमा है तो ’धोबी घाट’ में शहर शास्त्रीयता पाता है. जैसे-जैसे इस महानगर में जगह कम होती जाती है, कहानियों को भी आपस में सटकर बैठना पड़ता है. चार कहानियों में चार भिन्न ज़िन्दगियाँ आपस में रगड़ खाती हैं. लेकिन बड़ी बात यह है कि फ़िल्म हमें चारों कहानियों के उन अंधेरे कोनों तक लेकर जाती है जहाँ इस शहर की तमाम शास्त्रीयता का मुलम्मा छूट जाता है. बड़ी बात यह है कि उन अंधेरे कोनों में भी फ़िल्म शहर को नकारती नहीं, बल्कि एक साथी की तरह कांधे पर हाथ रख कहती है कि आज भी एक रास्ता अच्छाई की ओर जाता है.

’आई एम’ – क्योंकि यह फ़िल्म एक आत्मस्वीकार है. क्योंकि यह फ़िल्म एक अनुभव है. क्योंकि खुद के साथ हुई हर नाइंसाफ़ी से जो सीख मिलती है वो यही है कि फिर कहीं किसी और काल, किसी और दुनिया में जब हम ताक़तवर हों तो अनजाने में वो ही नाइंसाफ़ी न कर बैठें. क्योंकि यह फ़िल्म गांधी की याद दिलाती है, जिन्होंने कहा था कि आँख के बदले आँख का सिद्धांत अंतत: सबको अंधा कर देगा. क्योंकि अंतत: खलनायक बाहर नहीं, खुद हमारे भीतर है जिसका मुकाबला एक निरंतर चलती प्रक्रिया है.

छोटा है लेकिन तलवार है

delhi belly vijay raazपूजा स्वरूप – ’माया’ aka फ़ोन वाली रिसेप्शनिस्ट

फ़िल्म – “दैट गर्ल इन येलो बूट्स”

कुमुद मिश्रा – ’खटाना’ aka कैंटीनवाले अंकल

फ़िल्म – “रॉकस्टार”

विजयराज – ’सोमयाज़ुलु’ aka दार्शनिक डॉन

फ़िल्म – “डेल्ही बेली”

delhi belly rahul singhस्वरा भास्कर – ’पायल’

फ़िल्म – “तनु वेड्स मनु”

राहुल सिंह – ’राजीव खन्ना’ aka Delhi boy with a gun

फ़िल्म – “डेल्ही बेली”

राजेश शर्मा – ’एन. के.’ aka दिल्ली पुलिस

फ़िल्म – “नो वन किल्ड जेसिका”

साल दो हज़ार ग्यारह का विश्व सिनेमा का सबसे विलक्षण अनुभव था ’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ जिसे कोरी फ़िल्म भर कहना मुश्किल है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ मनुष्य के भीतर पहली बार ईर्ष्याभाव जन्म लेता है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ पहली बार जीवन ’देना’ सीखता है. यह मनोभावों के जन्म की कथा है. इस फ़िल्म ने वही किया जो साल दो हज़ार ग्यारह में मेरे प्रिय राहुल द्रविड़ ने किया. साल की सबसे बेहतरीन लेखनियाँ इन्हीं दो मानसरोवरों से निकलीं. मेरे तीन सबसे पसन्दीदा ब्लॉगकार अपनी दुनियाओं में वापस गए और यह मोती निकालकर लाए –यहाँ – वरुण ग्रोवर, यहाँ – अपराजिता सरकार, यहाँ – फ़ाइट क्लब.

क्या यह व्यक्तिगत कहानियाँ भर हैं? नहीं, क्योंकि ठीक उस जगह जहाँ व्यक्तिगत राजनैतिक से मिलता है, रचना का जन्म होता है. मैं हमेशा से मानता हूँ कि गल्प और कथेतर सिर्फ़ कथा कहने के भिन्न रूप भर हैं. हमारी सच्चाईयाँ सदा इन तय खांचों से आगे निकल जाती हैं. सिनेमा हो या उपन्यास, यही चाबी है. फन्तासियों में सदा सत्य पैठा होता है. आपबीतियों से सदा सर्वोत्तम कथाएं जन्म लेती हैं.