“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के लिए” : दि लंचबॉक्स

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“हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, अगर हमारे पास कोई होता नहीं उन्हें बताने के लिए”

स्थापत्यकार राहुल महरोत्रा समकालीन मुम्बई शहर की विरोधाभासी संरचना को केन्द्र बनाकर लिखे गए अपने चर्चित निबंध में शहर की संरचना को दो हिस्सों में विभाजित कर उन्हें ‘स्टेटिक सिटी’ तथा ‘काइनैटिक सिटी’ का नाम देते हैं। वे लिखते हैं, “अाज के भारतीय शहर दो हिस्सों से मिलकर बनते हैं, जो एक ही भौतिक स्पेस के भीतर मौजूद हैं। इनमें पहली अौपचारिक नगरी है जिसे हम ‘स्टेटिक सिटी’ कह सकते हैं। ज़्यादा स्थायी सामग्री जैसे कंक्रीट, स्टील अौर ईंटों द्वारा निर्मित यह शहर का हिस्सा शहर के पारम्परिक नक्शों पर द्विअायामी जगह घेरता है अौर अपनी स्मारकीय उपस्थिति दर्ज करवाता है। दूसरा शहर, शहर का अनधिकृत या कहें अनौपचारिक हिस्सा है जिसे हम ‘काइनैटिक सिटी’ कह सकते हैं। इसे द्विअायामी सांचे में बाँधकर समझना असंभव है। यह सदा गतिमान शहर है – जिसका निर्माण शहर में बढ़ती हुई वैकासिक त्रिअायामी गतिविधियों द्वारा होता है।”[1] काइनैटिक सिटी अपने स्वभाव में ज़्यादा अस्थायी अौर गतिमान होती है अौर यह निरंतर खुद में सुधार करती रहती है अौर खुद को बदलती रहती है। काइनैटिक सिटी शहर के स्थापत्य में नहीं है। यह तो निरंतर बदलती शहरी ज़िन्दगियों की अार्थिक, साँस्कृतिक अौर सामाजिक गतिविधियों में निवास करती है।

इस काइनैटिक सिटी का उदाहरण गिनाते हुए महरोत्रा मुम्बई की मशहूर डब्बावाला संस्कृति को शहर के इन दो हिस्सों − स्टेटिक सिटी अौर काइनैटिक सिटी के मध्य संबंध के सबसे प्रतिनिधि उदाहरण के रूप में याद करते हैं। वे लिखते हैं कि मुम्बई के डिब्बावाले शहर के इन दो हिस्सों, स्टेटिक सिटी अौर काइनैटिक सिटी के मध्य, अौपचारिक अौर अनौपचारिक शहर के मध्य संबंध का सबसे बेहतर उदाहरण हैं। यह टिफिनसेवा शहर के मध्य यातायात के लिए मुम्बई की लोकल ट्रेन सेवा पर निर्भर रहती है अौर अपने ग्राहक को अौसतन महीने का 200 रुपया खर्चे की पड़ती है। इसके महीने का टर्नअोवर तक़रीबन पाँच करोड़ रुपये तक का हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार तक़रीबन 4,500 डिब्बेवाले शहर में रोज़ 2 लाख से ज़्यादा खाने के डिब्बों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम करते हैं।[2]

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कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को, ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

Gulzar

वो मेरी जवानी का पहला प्रेम था. मैं उसे आज भी मेरी ज़िन्दगी की ’हेट्टी केली’ [1] कहकर याद करता हूँ. उस रोज़ उसका जन्मदिन था. मैं उसे कुछ ख़ास देना चाहता था. लेकिन अभी कहानी अपनी शुरुआती अवस्था में थी और मेरे भीतर भी ’पहली बार’ वाली हिचक थी इसलिए कुछ समझ न आता था. आख़िर कई दिनों की गहरी उधेड़बुन के बाद मैं तोहफ़ा ख़रीद पाया. लेकिन अब एक और बड़ा सवाल सामने था. तोहफ़ा तो मेरे मन की बात कहेगा नहीं, तो उसके लिए कोई अलग जुगत भिड़ानी होगी.

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रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था

पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक एक बार देखे जाने लायक है, देख आएं. फिर साथ मिल चर्चा-ए-आम होगी.

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Rockstar2011बीस के सालों में जब अंग्रेज़ी रियासत द्वारा स्थापित ’नई दिल्ली योजना समिति’ के सदस्य जॉन निकोल्स ने पहली बार एक सर्पिलाकार कुंडली मारे बैठे शॉपिंग प्लाज़ा ’कनॉट प्लेस’ का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, उस वक़्त वह पूरा इलाका कीकर के पेड़ों से भरा बियाबान जंगल था. ’कनॉट सर्कस’ के वास्तुकार रॉबर्ट रसैल ने इन्हीं विलायती बबूल के पेड़ों की समाधि पर अपना भड़कीला शाहकार गढ़ा.

इम्तियाज़ अली की ’रॉकस्टार’ में इसी कनॉट प्लेस के हृदयस्थल पर खड़े होकर जनार्दन जाखड़ उर्फ़ ’जॉर्डन’ जब कहता है,

“जहाँ तुम आज खड़े हो, कभी वहाँ एक जंगल था. फिर एक दिन वहाँ शहर घुस आया. सब कुछ करीने से, सलीके से. कुछ पंछी थे जो उस जंगल के उजड़ने के साथ ही उड़ गए. वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए. मैं उन्हीं पंछियों को पुकारता हूँ. बोलो, तुमने देखा है उन्हें कहीं?”

तो मेरे लिए वो फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पल है. एक संवाद जिसके सिरहाने न जाने कितनी कहानियाँ अधलेटी सी दिखाई देती हैं. तारीख़ को लेकर वो सलाहियत जिसकी जिसके बिना न कोई युद्ध पूरा हुआ है, न प्यार. लेकिन ऐसे पल फिर फ़िल्म में कम हैं. क्यों, क्योंकि फ़िल्म दिक-काल से परे जाकर कविता हो जाना चाहती है. जब आप सिनेमा में कहानी कहना छोड़कर कोलाज बनाने लगते हैं तो कई बार सिनेमा का दामन आपके हाथ से छूट जाता है. यही वो अंधेरा मोड़ है, मेरा पसन्दीदा निर्देशक शायद यहीं मात खाता है.

आगे की कथा आने से पहले ही उसके अंश दिखाई देते हैं, किरदार दिखाई देते हैं. और जहाँ से फ़िल्म शुरु होती है वापस लौटकर उस पल को समझाने की कभी कोशिश नहीं करती. रॉकस्टार में ऐसे कई घेरे हैं जो अपना वृत्त पूरा नहीं करते. मैं इन्हें संपादन की गलतियाँ नहीं मानता. ख़ासकर तब जब शम्मी कपूर जैसी हस्ती अपने किरदार के विधिवत आगमन से मीलों पहले ही एक गाने में भीड़ के साथ खड़े ऑडियो सीडी का विमोचन करती दिखाई दे, यह अनायास नहीं हो सकता. ’रॉकस्टार’ यह तय ही नहीं कर पाई है कि उसे क्या होना है. वह एक कलाकार का आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन बाहर इतना शोर है कि आवाज़ कभी रूह तक पहुँच ही नहीं पाती. वह एक साथ एक कलाकृति और एक सफ़ल बॉलीवुड फ़िल्म होने की चाह करती है और दोनों जहाँ से जाती है.

ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ईमानदारी नहीं दिखाई देती. कैंटीन वाले खटाना भाई के रोल में कुमुद मिश्रा ने जैसे एक पूरे समय को जीवित कर दिया है. जब वो इंटरव्यू के लिए कैमरे के सामने खड़े होते हैं तो उस मासूमियत की याद दिलाते हैं जिसे हम अपने बीए पास के दिनों में जिया करते थे और वहीं अपने कॉलेज की कैंटीन में छोड़ आए हैं. अदिति राव हैदरी कहानी में आती हैं और ठीक वहीं लगता है कि इस बिखरी हुई, असंबद्ध कोलाजनुमा कहानी को एक सही पटरी मिल गई है. लेकिन अफ़सोस कि वो सिर्फ़ हाशिए पर खड़ी एक अदाकारा हैं, और जिसे इस कहानी की मुख्य नायिका के तौर चुना गया है उन्हें जितनी बार देखिए यह अफ़सोस बढ़ता ही जाता है.

ढाई-ढाई इंच लम्बे तीन संवादों के सहारे लव आजकल की ’हरलीन कौर’ फ़िल्म किसी तरह निकाल ले गई थीं, लेकिन फ़िल्म की मुख्य नायिका के तौर गैर हिन्दीभाषी नर्गिस फ़ाखरी का चयन ऐसा फ़ैसला है जो इम्तियाज़ पर बूमरैंग हो गया है. शायद उन्होंने अपनी खोज ’हरलीन कौर’ को मुख्य भूमिका में लेकर बनी ’आलवेज़ कभी कभी’ का हश्र नहीं देखा. फिर ऊपर से उनकी डबिंग इतनी लाउड है कि फ़िल्म जिस एकांत और शांति की तलाश में है वो उसे कभी नहीं मिल पाती. बेशक उनके मुकाबले रणबीर मीलों आगे हैं लेकिन फिर अचानक आता, अचानक जाता उनका हरियाणवी अंदाज़ खटकता है. फिर भी, ऐसे कितने ही दृश्य हैं फ़िल्म में जहाँ उनका भोलापन और ईमानदारी उनके चेहरे से छलकते हैं. ठीक उस पल जहाँ जनार्दन हीर को बताता है कि उसने कभी दारू नहीं पी और दोस्तों के सामने बस वो दिखाने के लिए अपने मुंह और कपड़ों पर लगाकर चला जाता है, ठीक वहीं रणबीर के भीतर बैठा बच्चा फ़िल्म को कुछ और ऊपर उठा देता है. ’वेक अप सिड’ और ’रॉकेट सिंह’ के बाद यह एक और मोती है जिसे समुद्र मंथन से बहुत सारे विषवमन के बीच रनबीर अपने लिए सलामत निकाल लाए हैं.

rockstar_hindi_movieफ़िल्म के कुछ सबसे खूबसूरत हिस्से इम्तियाज़ ने नहीं बल्कि ए आर रहमान, मोहित चौहान और इरशाद कामिल ने रचे हैं. तुलसी के मानस की तरह जहाँ चार चौपाइयों की आभा को समेटता पीछे-पीछे आप में सम्पूर्ण एक दोहा चला आता है, यहाँ रहमान के रूहानी संगीत में इरशाद की लिखी मानस के हंस सी चौपाइयाँ आती हैं.

’कुन फ़ाया कुन’ में…

“सजरा सवेरा मेरे तन बरसे, कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ,
क़तरा मिला जो तेरे दर बरसे … ओ मौला.”

’नादान परिंदे’ में…
कागा रे कागा रे, मोरी इतनी अरज़ तोसे, चुन चुन खाइयो मांस,
खाइयो न तू नैना मोरे, खाइयो न तू नैना मोरे, पिया के मिलन की आस.”

यही वो क्षण हैं जहाँ रणबीर सीधे मुझसे संवाद स्थापित करते हैं, यही वो क्षण हैं जहाँ फ़िल्म जादुई होती है. लेकिन कोई फ़िल्म सिर्फ़ गानों के दम पर खड़ी नहीं रह सकती. अचानक लगता है कि मेरे पसन्दीदा निर्देशक ने अपनी सबसे बड़ी नेमत खो दी है और जैसे उनके संवादों का जावेद अख़्तरीकरण हो गया है. और इस ’प्रेम कहानी’ में से प्रेम जाने कब उड़ जाता है पता ही नहीं चलता.

सच कहूँ, इम्तियाज़ की सारी गलतियाँ माफ़ होतीं अगर वे अपने सिनेमा की सबसे बड़ी ख़ासियत को बचा पाए होते. मेरी नज़र में इम्तियाज़ की फ़िल्में उसके महिला किरदारों की वजह से बड़ी फ़िल्में बनती हैं. नायिकाएं जिनकी अपनी सोच है, अपनी मर्ज़ी और अपनी गलतियाँ. और गलतियाँ हैं तो उन पर अफ़सोस नहीं है. उन्हें लेकर ’जिन्दगी भर जलने’ वाला भाव नहीं है, और एक पल को ’जब वी मेट’ में वो दिखता भी है तो उस विचार का वाहियातपना फ़िल्म खुद बखूबी स्थापित करती है. उनकी प्रेम कहानियाँ देखकर मैं कहता था कि देखो, यह है समकालीन प्यार. जैसी लड़कियाँ मैं अपने दोस्तों में पाता हूँ. हाँ, वे दोस्त पहले हैं लड़कियाँ बाद में, और प्रेमिकाएं तो उसके भी कहीं बाद. और यही वो बिन्दु था जहाँ इम्तियाज़ अपने समकालीनों से मीलों आगे निकल जाते थे. लेकिन रॉकस्टार के पास न कोई अदिति है न मीरा. कोई ऐसी लड़की नहीं जिसके पास उसकी अपनी आवाज़ हो. अपने बोल हों. और यहाँ बात केवल तकनीकी नहीं, किरदार की है.

इम्तियाज़ की फ़िल्मों ने हमें ऐसी नायिकाएं दी हैं जो सच्चे प्रेम के लिए सिर्फ़ नायक पर निर्भर नहीं हैं. किसी भी और स्वतंत्र किरदार की तरह उनकी अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगियाँ हैं जिन्हें नायक के न मिलने पर बरबाद नहीं हो जाना है. बेशक इन दुनियाओं में हमारे हमेशा कुछ कमअक़्ल नायक आते हैं और प्रेम कहानियाँ पूरी होती हैं, लेकिन फ़िल्म कभी दावे से यह नहीं कहती कि अगर यह नायक न आया होता तो इस नायिका की ज़िन्दगी अधूरी थी. इम्तियाज़ ने नायिकायों को सिर्फ़ नायक के लिए आलम्बन और उद्दीपन होने से बचाया और उन्हें खुद आगे बढ़कर अपनी दुनिया बनाने की, गलतियाँ करने की इजाज़त दी. इस संदर्भ को ध्यान रखते हुए ’रॉकस्टार’ में एक ऐसी नायिका को देखना जिसका जीवन सिर्फ़ हमारे नायक के इर्द गिर्द संचालित होने लगे, निराश करता है. और जैसे जैसे फ़िल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है नायिका अपना समूचा व्यक्तित्व खोती चली जाती है, मेरी निराशा बढ़ती चली जाती है.

मैंने इम्तियाज़ की फ़िल्मों में हमेशा ऐसी लड़कियों को पाया है जिनकी ज़िन्दगी ’सच्चे प्यार’ के इंतज़ार में तमाम नहीं होती. वे सदा सक्रिय अपनी पेशेवर ज़िन्दगियाँ जीती हैं. कभी दुखी हैं, लेकिन हारी नहीं हैं और ज़्यादा महत्वपूर्ण ये कि अपनी लड़ाई फिर से लड़ने के लिए किसी नायक का इंतज़ार नहीं करतीं.

और हाँ, पहला मौका मिलते ही भाग जाती हैं.

मैं खुश होता अगर इस फ़िल्म में भी नायिका ऐसा ही करती. तब यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में उस रास्ते जाती जिस रास्ते को इम्तियाज़ की पूर्ववर्ती फ़िल्मों ने बड़े करीने से बनाया है.

हिन्दी सिनेमा में प्रेम की अजीब दास्तान

हिन्दी सिनेमा के पुराने पन्ने पलटते हुए कई बार मुझे ताज्जुब होता है कि क्या यही वो कहानियाँ थीं जिनके बलबूते हमारे इश्क़ पीढ़ियों परवान चढ़े? हिन्दी सिनेमा अपवादों को छोड़कर खासा यथास्थितिवादी रहा है और ऐसे में प्रेम जैसे स्वभाव से यथास्थितिवाद विरोधी मनोभाव का इसके मूल दर्शन के रूप में barsaat-ki-raat1स्थापित होना अजब ही विरोधाभास है. लेकिन यह भी कहना होगा कि हमारे बंद घरों के लड़के-लड़कियाँ इन अपवादों को देखकर नहीं भागे, उनके लिए तो मुख्यधारा सिनेमा ने ही हमेशा वो काम पूरा किया. सुनहरे दौर की फ़िल्म ’बरसात की रात’ में आई कव्वाली ’ये इश्क़-इश्क़ है’ के चरम पर नायक भारत भूषण आकर माइक सम्भाल लेते हैं और मोहम्मद रफ़ी की मदभरी आवाज़ में गाते हैं,

“जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सजके.
जान-अजान का ज्ञान भुलाके, लोक-लाज को तजके.
बन-बन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला.
दर्शन-जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला.”

और नायिका मधुबाला उन्हें रेडियो पर सुन नंगे पांव भागती हुई आती हैं. ऐसे ही कुछ जादुई सिनेमाई क्षण हर पीढ़ी के पास रहे हैं जिन्हें उसने अपने प्रेम में संदर्भ सूत्र की तरह इस्तेमाल किया है.

मुद्दा यह है कि और तमाम बातों में आगे बढ़-चढ़कर आज़ाद ख़्यालों से नाता जोड़ता हमारा मिडिल क्लास आज भी शादी-ब्याह में जाति के बंधनों को आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं दिखता. और यही प्रवृत्ति वर्तमान युवा प्रेम के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है. ऐसे में मुख्यधारा सिनेमा का यह खेल देखना बड़ा मज़ेदार है जिसमें बार-बार प्रेम कहानियां विषय के केन्द्र में हैं लेकिन जाति के संदर्भ सिरे से गायब हैं. हमारे दौर की अमर मान ली गई सिनेमाई प्रेम कहानी ’दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ का ही किस्सा लें. फ़िल्म की मुख्य अड़चन यही है कि नायक-नायिका के संबंध नायिका के पिता को स्वीकार नहीं. लेकिन इस फ़िल्म में कहीं कोई यह मानने को राज़ी नहीं दिखता कि इसकी एक वजह जाति भी हो सकती है जो दरअसल हमारे देश में तमाम प्रेम विवाहों के रास्ते में आती सबसे मूल अड़चन है.

तो फिर इन सिनेमाई प्रेम-कहानियों को किस तरह व्याख्यायित किया जाए. मुझे माणिक मुल्ला याद आते हैं और उनकी दी प्रेम कहानियां लिखने संबंधी मुख्य सीख याद आती है, “कुछ पात्र लो, और एक निष्कर्ष पहले से सोच लो, जैसे… यानी जो भी निष्कर्ष निकालना हो, फिर पात्रों पर इतना अधिकार रखो, इतना शासन रखो कि वे अपने आप प्रेम के चक्र में उलझ जाएँ और अन्त में वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचें जो तुमने पहले से तय कर रखा है.” क्या हिन्दी सिनेमा को समझने की इससे अच्छी और कोई परिभाषा आपको पहले कभी मिली है. हम तय निष्कर्षों और पूर्वनिर्धारित अंत वाले सिनेमा उद्योग हैं. ऐसी फ़िल्में बनाते हैं जिनमें किरदारों को काफ़ी हद तक छूट है मनमानी करने की, लेकिन अंत में उन्हें वापस ’सही राह’ पर आकर नैतिकता की उंगली पकड़नी ही पड़ती है.

लेकिन इस मनमाने खेल में काफ़ी कुछ रह जाता है जिसे पूर्व निर्धारित नहीं किया जाता और खुला छोड़ दिया जाता है. जैसा एम. माधव प्रसाद हिन्दी सिनेमा पर अपने उत्कृष्ठ अध्ययन ’आईडियोलाजी ऑफ़ दि हिन्दी फ़िल्म’ में लिखते हैं, “लोकप्रिय सिनेमा परंपरा और आधुनिकता के मध्य परंपरागत मूल्यों का पक्ष नहीं लेता. इसका एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा निर्धारित सामाजिक बंधनों के मध्य एक उपभोक्ता संस्कृति को खपाना है. इस प्रक्रिया में यह कई बार सामाजिक संरचना को बदलने के उस यूटोपियाई विचार का प्रतिनिधित्व करने लगता है जिसका वादा एक आधुनिक- पूँजीवादी राज्य ने किया था.” और यही वो अंश हैं जिन्हें देख-देखकर कई पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े. शायद यह कहना ज़्यादा ठीक हो कि सुन-सुनकर पीढ़ियों के इश्क़ परवान चढ़े क्योंकि जब इन ’प्रेम के चक्करों में’ हमारी कहानियों के पात्र उलझ जाते हैं तो यह मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा का अलिखित नियम है कि वे गीत गाते हैं.

हिन्दी सिनेमा में आए प्रेम के हर रूप को साकार करने में गीतों की सबसे अहम भूमिका है. कई बार यह गीत फ़िल्म से बाहर निकल अपना स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण कर लेते हैं. जावेद अख़्तर हिन्दी सिनेमा में प्रेम के प्रमुख स्रोत बने गीतों की इस भूमिका पर अपनी पुस्तक ’टॉकिंग साँग्स’ में कहते हैं,

“मुझे लगता है कि गीत एक तरह की जकड़न से मुक्ति हैं. जब आप गीत गाते हैं तो अपने भीतर किसी दबाए गए भाव, चाहत या विचार को मुक्त करते हैं. गद्य में आप उत्तरदायी होते हैं लेकिन गीत में आप बिना परवाह खुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं. अगर आप पूछें, “कौन जाने ये लोग प्यार क्यों करते हैं?” तो ज़रूर कोई जवाब में पूछेगा, “आप प्यार के इतना खिलाफ़ क्यों हैं?” लेकिन अगर आप यूं एक गाना गाएं, “जाने क्यों लोग प्यार करते हैं?” तो कोई भी आपसे इसका स्पष्टीकरण नहीं माँगेगा. लोग गीत मे अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. मुझे लगता है कि जो जितना ज़्यादा दमित होगा वो उतना ही ज़्यादा गीतों में अपनी अभिव्यक्ति पाएगा.

किसी भी समाज में जितना ज़्यादा दमन होगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत मिलेंगे. यह आश्चर्य नहीं है कि हिन्दुस्तानी समाज में जहाँ औरतों पर दमन ज़्यादा है वहाँ उनके हिस्से गीत भी पुरुषों से ज़्यादा हैं. गरीब के हिस्से अमीर से ज़्यादा गीत है. लोक संगीत आख़िर निर्माण से लेकर संरक्षण तक आम आदमी का ही तो है. अगर गीत सिर्फ़ आनंद और आराम के प्रतीक भर हैं तो फिर इन्हें समृद्ध समाजों में अधिक मात्रा में मिलना चाहिए था लेकिन इनकी बहुतायत मिलती है श्रमिक और वंचित वर्ग के बीच. मुझे लगता है कि गाना एक तरह से आपकी सेक्सुअलिटी का प्रतीक है और अगर यह माना जाए तो समाज में जितना इंसान की सेक्सुअलिटी को दबाया जाएगा, दमित किया जाएगा वहाँ उतने ही ज़्यादा गीत और उन्हें गानेवाले मिलेंगे.”

chameli ki shadi1बासु चटर्जी की बनाई अद्भुत व्यंग्य फ़िल्म ’चमेली की शादी’ को ही देखें जो कस्बाऊ प्यार में ’फ़िल्मी गीतों’ के अहम रोल को बड़े मज़ाकिया अंदाज़ में हमारे सामने पेश करती है. यहाँ लड़कपन का अनगढ़ प्यार है. नायिका चमेली के नायक चरणदास से अंधाधुंध प्यार के सच्चे साथी रेडियो पर बजते हिन्दी के फ़िल्मी गीत हैं. नायिका की मां कहती भी हैं कि, “इन फ़िल्मी गानों ने ही इस लड़की का दिमाग़ खराब कर रखा है.” यह फ़िल्म इसलिए भी ख़ास है कि इसमें बड़े साफ़-साफ़ शब्दों में चमेली और चरणदास के प्रेम विवाह में बाधक बनते जाति और समुदाय के संदर्भ आते हैं. फ़िल्म में आए कुछ और संदर्भ भी नोट करने लायक हैं. नायिका स्कूल जाती है और पढ़ी लिखी है और इसके सामने उसके माता-पिता अनपढ़ हैं. वो दीवार पर अपने प्यार का इज़हार भी लिखती है तो नीचे ’दस्तख़त चमेली’ कर देती है. और मां के लिए दीवार पर लिखा प्रेम संदेसा भी ’चील-बिलाव’ सरीख़ा है. माता-पिता की सोच से उसकी सोच अलग होने में यह तथ्य एक महत्वपूर्ण सूत्र की तरह दिखाया गया है.

लेकिन इस तरह की प्रगतिशीलता हिन्दी सिनेमा में कम ही मिलती है. ख़ासतौर पर प्रेम के सामने ऐसी ’तुच्छ बातों’ को हमेशा दरकिनार किया जाता है. ’पड़ोसन’ से लेकर हालिया ’ब्रेक के बाद’ तक, हमारी फ़िल्में अलग रास्तों से होते बार-बार इस निष्कर्ष तक पहुँचती दिखती हैं कि एक प्यार करने वाले लड़के का मिलना ही लड़की के जीवन की असल सफ़लता है. सोचने की बात है कि कहीं हम ’प्रेम’ की आड़ में एक पुरुषपरस्त समाज तो नहीं गढ़ रहे?

असंभाव्य प्रेम कहानियों का कल्पनालोक

“प्यार भी भला कहीं किसी का पूरा होता है,
प्यार का तो पहला ही अक्षर अधूरा होता है.”

इससे इतर एक और मुद्दा है जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए. पिछले दिनों हिन्दी सिनेमा के कुछ अमर प्रेम प्रसंग छांटते हुए इस ओर मेरी निगाह गई. क्या यह देखना रोचक नहीं कि ऐसे किसी भी चयन में बार-बार आपकी उंगली जहाँ ठहरती है वो एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसके पूरा होने में कोई न कोई अड़चन है. प्रेम के साथ जुड़ा यह ’शहीदी भाव’ शायद उसे ज़्यादा गहरा और कालातीत बनाता है. इस गिनती में सबसे आगे हिन्दी सिनेमा का अमर शाहकार याद आता है, ’मुग़ल-ए-आज़म’. सलीम और अनारकली का प्रेम ऐसा ही प्रेम है जिसकी राह में ’क्लास’ का अंतर बहुत बड़ा है. हिन्दुस्तान के होनेवाले शहंशाह को एक कनीज़ से प्यार हो गया है. नायिका शीशमहल में हज़ारों अक़्स के बरक़्स गाती है, “प्यार किया तो डरना क्या” और हिन्दुस्तान के सबसे महान शहंशाह अपने आप को चारों ओर से एक नाचीज़ के प्रतिबिम्ब से घिरा पाते हैं.

हिन्दी सिनेमा की निर्विवाद रूप से सबसे मशहूर फ़िल्म ’शोले’ भी ऐसी ही एक असंभाव्य प्रेम कहानी अपने भीतर समेटे है. जय (अमिताभ) और राधा (जया) की यह मूक प्रेम कहानी समाज की प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध है. इस प्रेम कहानी बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है. लेकिन इस फ़िल्म में भी शुरु से ही यह मान लिया गया है कि इस प्रेम कहानी का तारुण लेकिन सुविधाजनक अंत जय की मौत और राधा के विधवा रह जाने में ही है. इससे अलग कोई भी अंत इस फ़िल्म की लोकप्रियता में कैसा असर पैदा करता यह देखना बहुत ही मज़ेदार अनुभव हो सकता था.

शायद इन्हीं तमाम वजहों से हिन्दी सिनेमा जाति के संदर्भों को सिरे से खारिज करने के बाद भी कहीं उन आकांक्षाओं और विश्वासों का प्रतीक बन जाता है जिसे युवा मन अपनी-अपनी प्रेम कहानियों में रोज़ बुन रहा है. हिन्दी सिनेमा का अंत उसे बार-बार ’पॉलिटिकली करेक्ट’ करने की कोशिशें करता है, लेकिन उसमें विद्रोह और परंपराओं को नकारते स्वर मिल ही जाते हैं.

“अरे क्या प्रेम कहानियों के दो चार अंत होते हैं.”

Love_sex_aur_dhokhaफिर एक दिबाकर बनर्जी आता है और हिन्दी सिनेमा में प्रेम की इस विलक्षण थाति को नए सिरे से परिभाषित करना तय करता है. यही सुविधाजनक अंत की ओर पहुँचती प्रेम कहानियाँ उसने भी देखी हैं. उसके नायक ने भी देखी हैं. ’लव, सेक्स और धोखा’ का कथा नायक राहुल आदित्य चोपड़ा का अंध भक्त है और अपनी डिप्लोमा फ़िल्म के लिए एक ऐसी ही कहानी फ़िल्मा रहा है. उन्हीं सुविधाजनक अंतों की ओर बढ़ते हुए उसकी राह में कुछ ऐसे सवाल हैं जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने कबका पूछना ही छोड़ दिया है. पत्रकार और ब्लॉगर रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग ’कस्बा’ में इस फ़िल्म को ’अ-फ़िल्म’ का नाम दिया है. यह नामकरण सिर्फ़ इस फ़िल्म की नहीं, हिन्दी सिनेमा की पुरानी सारी प्रेम कहानियों की असलियत उघाड़ता है. ’लव. सेक्स और धोखा’ प्रेम के सवाल को वापस उस धरातल पर लेकर आती है जहाँ से हमारे यथार्थ की चारदीवारी शुरु होती है. यह एक बहकी हुई बहस को वापस उसके सही ढर्रे पर लाना है. सही सवालों को फिर से पूछना है. ’राहुल’ और ’श्रुति’ की हत्या अचानक एक फ़्लैशलाइट की तरह आपको यह याद दिलाती है कि हमारे समाज में ’प्रेम’ एक रूमानी ख़्याल भर नहीं, इसके बड़े गहरे सामाजिक निहितार्थ हैं. जिन्हें हिन्दी सिनेमा ने हमेशा ही ’अनुकूलित’ करने का प्रयास किया है. स्पष्ट है कि ’प्रेम’ के संदर्भ में जाति के सवाल हमेशा केन्द्र में रहे हैं. हमारा सिनेमा शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन छिपाकर उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता.

अनुराग कश्यप की ’देव डी’ के आधुनिक देवदास की समस्या पारो का न मिलना या चंद्रमुखी को न भूल पाना नहीं है. उसकी असल समस्या उसके भीतर बसा आदिम ’पवित्रताबोध’ है जो उसे न पारो का होने देता है न चंदा का. जब चंदा देव को कहती है, “यू ओनली लव योरसेल्फ़. यू कांट लव एनीवन, एक्सेप्ट दिस.” तो यह हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत का प्रस्थान बिन्दु है. ऐसा बिन्दु जहाँ हमारा नायक प्रेम के लिहाफ़ में छिपाकर अपना अहम तुष्ट नहीं कर रहा. उसकी असलियत सामने है. और कम से कम हमारी नायिका उस असलियत से परिचित है.

हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत ’लक बाए चांस’ से होती है जहाँ एक नायिका ’राह भूले’ नायक की घर वापसी से बने सुविधाजनक अंत पर फ़िल्म को ख़त्म नहीं होने देती. हिन्दी सिनेमा में प्रेम के नए विमर्श की शुरुआत ’अस्तित्व’ जैसी फ़िल्म से होती है जहाँ फ़िल्म के अंत में एक सुगढ़ गृहणी अपनी पहचान तलाशने ’घर’ की चारदीवारी को छोड़ बाहर निकलती है. अगर हमें और हमारे सिनेमा को वर्तमान पीढ़ी के ’प्रेम’ के सच्चे अर्थ समझने हैं तो उसे पहले रिश्तों की बराबरी का महत्व समझना होगा. मेरे दौर की कुछ सबसे खूबसूरत प्रेम काहनियाँ बनाने वाले निर्देशक इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की तरह उसे याद रखना होगा कि जितना हक़ एक लड़के को है गलतियाँ करने का और भूल जाने का, उतना ही हक़ एक लड़की को भी होना चाहिए. उसे भी जी भर के ’कन्फ़्यूज़’ होना चाहिए और फ़िल्म द्वारा अंत में उसके किरदार की इस रूहानी सी लगती ख़ासियत को ’अनुकूलित’ नहीं किया जाना चाहिए.

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भास्कर समूह की पत्रिका ‘अहा! ज़िन्दगी’ के फ़रवरी ’प्रेम विशेषांक’ अंक में प्रकाशित.

परदे पर प्यार के यादगार लम्हें

IMG_2741हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न पाए हों लेकिन प्यार का इज़हार तो बेशक उन्हीं से सीखा है. हिन्दी सिनेमा इस मायने में भी एक अनूठी दुनिया रचता है कि यह हमारी उन तमाम कल्पनाओं को असलियत का रंग देता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के छोटे कस्बों और बीहड़ शहरों में जवान होते पूरा करना हमारे जैसों के लिए मुमकिन नहीं. सिनेमा और उसके सिखाए प्रेम के इस फ़लसफ़े का असल अर्थ पाना है तो इस महादेश के भीतर जाइए, अंदरूनी हिस्सों में. व्यवस्था के बँधनों के विपरीत जन्म लेती हर प्रेम कहानी पर सिनेमा की छाप है. किसी ने पहली मुलाकात के लिए मोहल्ले के थियेटर का पिछवाड़ा चुना है तो किसी ने एक फ़िल्मी गीत काग़ज़ पर लिख पत्थर में लपेटकर मारा है. हम सब ऐसे ही बड़े हुए हैं, थोड़े से बुद्धू, थोड़े से फ़िल्मी. पेश हैं एक चयन हिन्दी सिनेमा से, प्रेम में गुँथा. हिन्दी सिनेमा के दस प्रेम दृश्य, जिन्हें देखकर हमारी मौहब्बत की परिभाषाएं बनती- बदलती रहीं हैं. बेशक चयन है और चयन हमेशा विवादास्पद होते हैं, लेकिन साथ यहाँ कोशिश उस प्रभाव को पकड़ने की भी है जिसे हम वक़्त-बेवक़्त ’सिनेमा हमारे जीवन में’ कहकर चिह्नित करते रहे हैं…

1. प्यासा.

सिगरेट का धुआँ उड़ाते गुरुदत्त और दूर से उन्हें तकती वहीदा.

pyaasaयह एक साथ हिन्दी सिनेमा का सबसे इरॉटिक और सबसे पवित्र प्रेम-दृश्य है. अभी-अभी नायिका गुलाबो (वहीदा रहमान) को एक पुलिसवाले के चंगुल से बचाने के लिए नायक विजय (गुरुदत्त) ने अपनी पत्नी कहकर संबोधित किया है. नायिका जो पेशे से एक नाचनेवाली तवायफ़ है अपने लिए इस ’पवित्र’ संबोधन को सुनकर चकित है. न जाने किस अदृश्य बँधन में बँधी नायक के पीछे-पीछे आ गई है. नायक छ्त की रेलिंग के सहारे खड़ा सिगरेट का धुआँ उड़ा रहा है और नायिका दूर से खड़ी उसे तक रही है. कुछ कहना चाहती है शायद, कह नहीं पाती. लेकिन बैकग्राउंड में साहिर का लिखा, एस.डी. द्वारा संगीतबद्ध और गीता दत्त का गाया भजन ’आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफ़ल हो जाए’ बहुत कुछ कह जाता है. इस ’सभ्य समाज’ द्वारा हाशिए पर डाल बार-बार तिरस्कृत की गई दो पहचानें, एक कवि और दूसरी वेश्या, मिलकर हमारे लिए प्रेम का सबसे पवित्र अर्थ गढ़ते हैं.

2. मुग़ल-ए-आज़म.

मधुबाला को टकटकी लगाकर निहारते दिलीप.

mughal-e-azam1कहते हैं कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में डाइरेक्टर से लेकर स्पॉट बॉय तक हर आदमी के पास सुनाने के लिए ’मुग़ल-ए-आज़म’ से जुड़ी एक कहानी होती है. के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म हिन्दुस्तान में बनी पहली मेगा फ़िल्म थी जिसने आगे आने वाली पुश्तों के लिए फ़िल्म निर्माण के पैमाने ही बदल दिए. लेकिन मुग़ल-ए-आज़म कोरा इतिहास नहीं, हिन्दुस्तान के लोकमानस में बसी प्रेम-कथा का पुनराख्यान है. एक बांदी का राजकुमार से प्रेम शहंशाह को नागवार है लेकिन वो प्रेम ही क्या जो बंधनों में बँधकर हो. चहुँओर से बंद सामंती व्यवस्था के गढ़ में प्रेम की खुली उद्घोषणा स्वरूप ’प्यार किया तो डरना क्या’ गाती अनारकली को कौन भूल सकता है.

यही याद बसी है हम सबके मन में. शहज़ादा सलीम (दिलीप कुमार) एक पँखुड़ी से हिन्दी सिनेमा की अनिन्द्य सुंदरी अनारकली (मधुबाला) के मुखड़े को सहला रहे हैं और बैकग्राउंड में तानसेन की आवाज़ बनकर ख़ुद उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ’प्रेम जोगन बन के’ गा रहे हैं. मुग़ल-ए-आज़म सामंती समाज में विरोध स्वरूप तन-कर खड़े ’प्रेम’ का अमर दस्तावेज़ है.

3. दिल चाहता है.

एक बार घूँसा, दूसरी बार इक़रार.

dil chahta haiएक ही डायलॉग ’दिल चाहता है’ के दो सबसे महत्वपूर्ण अंश रचता है. वो डायलॉग है एक कवितामय सा प्यार का इज़हार. पहली बार कॉलेज की पार्टी में यह फ़िल्म का सबसे हँसोड़ प्रसंग है तो दूसरी बार आने पर यह आपकी आँखें गीली कर देता है. बेशक आकाश (आमिर ख़ान) को शालिनी (प्रीटि ज़िन्टा) से प्यार है लेकिन बकौल समीर कौन जानता था कि उसे यह प्यार का इज़हार किसी दूसरे की शादी में दो सौ लोगों के सामने करना पड़ेगा! लेकिन क्या करें कि इस भागती ज़िन्दगी में रुककर प्यार जैसे मुलायम अहसास को समझने में अक़्सर ऐसी देर हो जाया करती है. ’दिल चाहता है’ ट्रेंड सैटर फ़िल्म थी. नई पीढ़ी के लिए आज भी नेशनल एंथम सरीख़ी है और यह ’इज़हार-ए-दिल’ प्रसंग उसके भीतर जड़ा सच्चा हीरा.

4. मि. एण्ड मिसेस अय्यर.

एक हनीमून की कहानी जो कभी मनाया ही नहीं गया.

mr & mrs iyerकल्पनाएं हमेशा हमारे सामने असलियत से ज़्यादा रूमानी और दिलकश मंज़र रचती हैं. ख्वाब हमेशा ज़िन्दगी से ज़्यादा दिलफ़रेब होते हैं. एक दक्षिण भारतीय गृहणी मीनाक्षी अय्यर (कोंकणा सेन) ने अपने मुस्लिम सहयात्री (राहुल बोस) की दंगाइयों से जान बचाने के लिए उन्हें अपना पति ’मि. अय्यर’ घोषित कर दिया है और अब पूरी यात्रा उन्हें इस झूठ को निबाहना है. और इसी कोशिश में ’मि. अय्यर’ साथ सफ़र कर रही लड़कियों को अपने हनीमून की कहानी सुनाते हैं. नीलगिरी के जगलों में एक पेड़ के ऊपर बना छोटा सा घर. पूरे चाँद वाली रात. यह एक फोटोग्राफ़र की आँख से देखा गया दृश्य है. और पीछे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का धीमे-धीम ऊँचा उठता संगीत. नायिका को पता ही नहीं चलता और वो इस नयनाभिराम मंज़र में डूबती जाती है. सबसे मुश्किल वक़्तों में ही सबसे मुलायम प्रेम कहानियाँ देखी जाती हैं. ’मि. एंड मिसेस अय्यर’ ऐसी ही प्रेम कहानी है.

5. स्पर्श.

प्रेम की सुगंध-आवाज़-स्पर्श का अहसास.

sparshसई परांजपे की ’स्पर्श’ इस चयन में शायद थोड़ी अजीब लगे, लेकिन उसका होना ज़रूरी है. फ़िल्म के नायक अनिरुद्ध (नसीरुद्दीन शाह) जो एक ब्लाइंड स्कूल के प्रिसिपल हैं देख नहीं सकते. वे हमारी नायिका कविता (शबाना आज़मी) से जानना चाहते हैं कि वे दिखती कैसी हैं? अब कविता उन्हें बोल-बोलकर बता रही हैं अपनी सुंदरता की वजहें. अपनी आँखों के बारे में, अपनी जुल्फ़ों के बारे में, अपने रंग के बारे में. लेकिन इसका याद रह जाने वाला हिस्सा आगे है जहाँ अनिरुद्ध बताते हैं कि यह रूप रंग तो मेरे लिए बेकार है. मेरे लिए तुम इसलिए सुंदर हो क्योंकि तुम्हारे बदन की खुशबू लुभावनी है, निषिगंधा के फूलों की तरह. तुम्हारी आवाज़ मर्मस्पर्शी है, सितार की झंकार की तरह. और तुम्हारा स्पर्श कोमल है, मख़मल की तरह. यह प्रसंग हिन्दी सिनेमा में ’प्रेम’ को एक और आयाम पर ले जाता है.

6. सोचा न था.

ईमानदार दुविधाओं से निकलकर इज़हार-ए-इश्क.

socha na thaआज की पीढ़ी के पसंदीदा ’लव गुरु’ इम्तियाज़ अली की वही अकेली प्रेम-कहानी को अपने सबसे प्रामाणिक और सच्चे फ़ॉर्म में आप उनकी पहली फ़िल्म ’सोचा न था’ में पाते हैं. नायक आधी रात नायिका की बालकनी फाँदकर उसके घर में घुस आया है और पूछ रहा है, “आखिर क्या है मेरे-तुम्हारे बीच अदिति?” दरअसल यह वो सवाल है जो उस रात वीरेन (अभय देओल) और अदिति (आयशा टाकिया) एक-दूसरे से नहीं, अपने आप से पूछ रहे हैं. और जब उस निर्णायक क्षण उन्हें अपने दिल से वो सही जवाब मिल जाता है तो देखिए कैसे दोनों सातवें आसमान पर हैं! इस इज़हार-ए-मोहब्बत के पहले नायिका जितनी मुख़र है, बाद में उतनी ही ख़ामोश. बरबस ’मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ याद आती है. इम्तियाज़ की प्रेम-कहानियों में प्यार को लेकर वही संशय भाव मिलता है जिसे हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ’कसप’ में पाते हैं. उनकी इन दुविधाग्रस्त लेकिन हद दर्जे तक ईमानदार प्रेम-कहानियों ने हमारे समय में ’प्रेम’ के असल अर्थ को बचाकर रखा है.

7. दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे.

पलट…

ddlj“राज, अगर ये तुझे प्यार करती है तो पलट के देखेगी. पलट… पलट…” और बनती है मेरे दौर की सबसे चहेती प्रेम कहानी. उस पूरे दौर को ही ’डीडीएलजे’ हो गया था जैसे. हमारी प्रेमिकाओं के कोडनेम ’सिमरन’ होने लगे थे और हमारी पीढ़ी ने अपना बिगड़ैल नायक पा लिया था. हम लड़कपन की देहरी पर खड़े थे और अपनी देहभाषा से ख़ुद को अभिव्यक्त करने वाला शाहरुख़ हमारे लिए प्यार के नए फ़लसफ़े गढ़ रहा था. हर दौर की अपनी एक प्रेम-कहानी होती है. परियों वाली प्रेम-कहानी. मेरे समय ने अपनी ’परियों वाली प्रेम कहानी’ शाहरुख़ की इस एक ’पलट’ के साथ पाई.

8. दिल से.

ढाई मिनट की प्रेम कहानी.

dil seहिन्दी सिनेमा में आई सबसे छोटी प्रेम-कहानी. नायक (शाहरुख़ ख़ान) रेडियो पर नायिका (मनीषा कोईराला) से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा एक गीतों भरी कहानी में पिरोकर सुना रहा है और नायिका अपने कमरे में बैठी उस किस्से को सुन रही है, समझ रही है कि ये उसके लिए ही है. इस किस्से में सब-कुछ है, अकेली रात है, बरसात है, सुनसान प्लेटफ़ॉर्म है, दौड़ते हुए घोड़े हैं, बिखरते हुए मोती हैं. यही वो दृश्य है जिसके अंत में रहमान और गुलज़ार द्वारा रचा सबसे खूबसूरत और हॉन्टिंग गीत ’ए अजनबी’ आता है. नायक अभी नायिका का नाम तक नहीं जानता है लेकिन ये कमबख़्त इश्क कब नाम पूछकर हुआ है भला.

9. तेरे घर के सामने.

कुतुब के भीतर ’दिल का भँवर करे पुकार’.

tere ghar ke samneदिल्ली की कुतुब मीनार के भीतर नूतन देव आनंद से पूछती हैं कि क्या तुम्हें ख़ामोशी की आवाज़ सुनाई देती है? और देव आनंद अपने चुहल भरे अंदाज़ में नूतन से कहते हैं कि हमें तो बस एक ही आवाज़ सुनाई देती है, ’दिल की आवाज़’. और हसरत जयपुरी का लिखा तथा एस. डी. बर्मन का रचा गीत आता है ’दिल का भँवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो’. यह आज़ाद भारत की सपने देखती नई युवा पीढ़ी है. बँधनों और रूढ़ियों से मुक्त. इस प्रसंग में आप एक साथ दो प्रेम कहानियों को बनता पायेंगे. और गौर से देखें तो ये दोनों ही प्रेम-कहानियाँ सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली हैं. नए-नए आज़ाद हुए मुल्क की नई बनती राजधानी इस प्रेम का घटनास्थल है और कुतुब से देखने पर इस प्यार का कद थोड़ा और ऊँचा उठ जाता है.

10. शोले.

माउथॉरगन बजाते अमिताभ और लैम्प बुझाती जया.

sholayक्या ’शोले’ के बिना लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से जुड़ा कोई भी चयन पूरा हो सकता है? वीरू और बसंती की मुँहफट और मुख़र प्रेमकहानी के बरक़्स एक साइलेंट प्रेमकहानी है जय और राधा की जिसके बैकग्राउंड में जय के माउथॉरगन का संगीत घुला है. हिन्दी सिनेमा की सबसे ख़ामोश प्रेमकहानी. अमिताभ नीचे बरामदे में बैठे माउथॉरगन बजा रहे हैं और जया ऊपर एक-एक कर लैम्प बुझा रही हैं. आज भी शोले का यह आइकॉनिक शॉट हिन्दुस्तानी जन की स्मृतियों में ज़िन्दा है.

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मूलत: नवभारत टाइम्स के संडे ’स्पेशल स्टोरी’ में प्रकाशित. चौदह फरवरी 2010 याने वैलेंटाइन डे के दिन.