खुले सिरों वाला सिनेमा और व्याख्याकार की दुविधा

Gangs-of-Wasseypur

प्रेमचंद की अंतिम कहानियों में से एक ’कफ़न’, जितनी प्रसिद्ध कथा है उतनी ही विवादास्पद भी रही है। मूलरूप से विवाद की जड़ में रहा है कहानी के मुख्य दलित पात्रों ’धीसू’ और ’माधव’ का चित्रण। अपनी मरती हुई पत्नी और बहु के कफ़न के पैसों को उड़ा नाच रहे इन कथापात्रों को ’शोषित’ के रूप में देख पाना बहुत से पाठकों को कठिन लगता है। “क्या ’कफ़न’ एक दलित विरोधी कथा है?” यह सवाल साहित्य की समकालीन बहसों से अछूता नहीं। दरअसल यह इस कथा तक सीमित सवाल नहीं। यह गल्प को, उसके पात्रों को और उसके परिवेश को समझने की दो भिन्न आलोचना दृष्टियों से जुड़ा सवाल है। यह भेद तब और बढ़ जाता है जब इस कहानी की तुलना प्रेमचंद की ही कुछ पुरानी कहानियों से की जाती है जहाँ कथाकार अपने पात्रों से इतना निरपेक्ष नहीं और उनसे उसका ही नहीं पाठकों का भी एक भावनात्मक रिश्ता सा जुड़ जाता है। ’कफ़न’ जैसे इन पूर्व कथाओं की नेगेटिव है। उसके पात्र ’शोषित’ होते हुए भी भोले नहीं। आधुनिक आलोचना की भाषा में कहूँ तो उनमें ’ग्रे’ शेड्स दिखाई देते हैं। लेकिन क्या ’घीसू’ और ’माधव’ के चित्रण को आधार बनाकर प्रेमचंद की सामाजिक प्रतिबद्धता को खारिज किया जा सकता है।

यही तमाम बहस के मुद्दे पिछले दिनों आई कुछ फ़िल्मों और उनपर चली विस्तृत बहसों के संदर्भ में रह-रहकर याद आते रहे।

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सिनेमा का नमक

phalke at work

बीते महीने हमारा सिनेमा अपने सौंवे साल में प्रवेश कर गया। यह मौका उत्सव का है। किसी भी विधा के इतना जल्दी, जीवन में इतना गहरे समाहित हो जाने के उदाहरण विरले ही मिलते हैं। सिनेमा हमारे ’लोक’ का हिस्सा बना और इसीलिए उसमें सदा आम आदमी को अपना अक्स नज़र आता रहा। कथाएं चाहे अन्त में समझौते की बातें करती रही हों, और व्यवस्था के हित वाले नतीजे सुनाती रही हों, उन कथाओं में मज़लूम के विद्रोह को आवाज़ मिलती रही। लेकिन इस उत्सवधर्मी माहौल में हमें उस नमक को नहीं भूलना चाहिए जिसे इस सिनेमा के अंधेरे विस्तारों में रहकर इसके सर्जकों ने बहाया। के आसिफ़ जैसे निर्देशक जिनका सपना उनकी ज़िन्दगी बन गया और उस एक चहेते सपने का साथ उन्होंने नाउम्मीदी के अकेले रास्तों में भी नहीं छोड़ा। शंकर शैलेन्द्र जैसे निर्माता जिन्होंने अपने प्यारे सपने को खुद तिनका-तिनका जिया और उसके असमय टूटने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

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’शांघाई’ के सर्वहारा

shanghai

हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी महिला चाहती हैं कि स्पीकर पर बज रहे फ़िल्म के गाने की आवाज़ थोड़ी बढ़ा दी जाए। लेकिन अब विश्वविद्यालय के अपने कायदे हैं और प्रकाश उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। वे महिला चाहती हैं कि दिबाकर और टीम जब आएं ठीक उस वक़्त अगर “भारत माता की जय” बज रहा हो और वो भी बुलन्द आवाज में तो कितना अच्छा हो। मैं यह बात हेमंत को बताता हूँ तो वह कहता है कि समझो, वे पीआर से हैं, यही उनका ’वन पॉइंट एजेंडा’ है। हेमन्त, जिनकी ’शटलकॉक बॉयज़’ प्रदर्शन के इन्तज़ार में है, जेएनयू के लिए नए हैं। मैं हेमन्त को कहता हूँ कि ये सामने जो तुम सैंकड़ों की भीड़ देख रहे हो ना, ये भी भीड़ भर नहीं। यहाँ भी हर आदमी अपने में अलग किरदार है और हर एक का अपना अलग एजेंडा है।

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जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर

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“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को दैगो?”


’पान सिंह तोमर’
अपने दद्दा से जवाब माँग रहा है. इरफ़ान ख़ान की गुरु-गम्भीर आवाज़ पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है. मैं उनकी बोलती आँखें पढ़ने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता. नहीं, ’बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं. पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है. पान सिंह को झटका लगता है. वो बुलन्द आवाज़ में चीख रहा है, “हमारो जवाब पूरो ना भयो.”

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सिनेमाई संगीत में प्रामाणिकता की तलाश

“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.”

पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं में हिस्सेदारी करते हुए यह मैंने आम सुना. इसे आलोचना की तरह से सुनाया जाता था और इस आलोचना के समर्थन में सर हिलाने वाले दोस्त भी बहुत थे.

aitbaarहिन्दी सिनेमा और सिनेमाई संगीत के बारे में दो भिन्न तरह की बातें पिछले दिनों मैंने अलग-अलग मंचों से कही जाती सुनीं, जिनका यूं तो आपस में सीधा कोई लेना-देना नहीं दिखता लेकिन दोनों को साथ रखकर पढ़ने से उनके गहरे निहितार्थ खुलते हैं. पहली बात को हमने ऊपर उद्धृत किया. लेकिन इससे बिल्कुल इतर दूसरी बात समकालीन सिनेमा और नए निर्देशकों के बारे में है जिनके सिनेमा बारे में आम समझ यह बन रही है कि यह अपने परिवेश की प्रामाणिकता पर गुरुतर ध्यान देता है और इसे फ़िल्म की मूल कथा के संप्रेषण के मुख्य साधन के बतौर चिह्नित करता है. दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप, चंदन अरोड़ा और कुछ हद तक इम्तियाज़ अली जैसे निर्देशक अपने सिनेमा में इस ओर विशेष ध्यान देते पाए गए हैं.

अगर मैं कहूँ कि इस आलेख के सबसे पहले जो कथन मैंने उद्धृत किया, खुद मैं भी उससे काफ़ी हद तक सहमत हूँ, तो? लेकिन साथ ही यह भी कि मैं उसे आलोचना नहीं मानता. हम दरअसल इन दो भिन्न लगती बातों को साथ रखकर नहीं देख पा रहे हैं. देखें तो समझ आएगा कि पहली बात के सूत्र दूसरे सकारात्मक बदलाव में छिपे हैं.

इसे कुछ बड़े परिप्रेक्ष्य में समझें. माना जाता है कि उदारीकरण के बाद हिन्दुस्तान के बाज़ार खुलने की प्रक्रिया में हिन्दी सिनेमा के लिए ’हॉलीवुड’ की चुनौती दिन दूनी रात चौगुनी बड़ी होती गई है. बात सही भी है. लेकिन मेरा मानना है कि ’हॉलीवुड’ की चुनौती जितनी बड़ी समूचे हिन्दी सिनेमा के लिए है, उससे कहीं ज़्यादा हिन्दी सिनेमा में सदा से एक अभिन्न अंग के रूप में मौजूद रहे गीतों के लिए हैं. जिस तरह समाज पर मुख्यधारा ’हॉलीवुड’ सिनेमा का प्रभाव बढ़ रहा है, हिन्दी सिनेमा में उससे मुकाबला करने की, उसे पछाड़ने की जुगत बढ़ती जा रही है. और ऐसे में सबसे बड़ा संकट, शायद अस्तित्व का संकट सिनेमा के गीत-संगीत के लिए उत्पन्न होता है.

हिन्दी सिनेमा में नब्बे के दशक में सबसे बड़ा बदलाव लेकर आने वाले व्यक्ति का नाम है रामगोपाल वर्मा. आज सिनेमा में देखी जा रही तकनीक समर्थित नवयथार्थवादी धारा को स्थापित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. और आपको याद होगा कि उन्होंने एक समय संगीत को अपने सिनेमा से एक गैर-ज़रूरी अवयव की तरह से निकाल बाहर किया था. यह संक्रमण काल था और इस दौर में हिन्दी सिनेमा का संगीत अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था. यहाँ दो रास्ते थे उसके सामने, एक – अपनी पुरानी प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करते हुए वैसा ही बने रहना, लेकिन बदलते सिनेमा के रंग में लगातार अप्रासंगिक होते चले जाना. और दूसरा – स्वयं का पुन: अविष्कार करने की कोशिश, याने सिनेमा की बदलती भाषा के अनुसार बदलना और सबसे ऊपर फ़िल्म के भीतर अपनी प्रासंगिकता स्थापित करना.

dev dमुझे खुशी है कि कुछ निर्देशकों ने बाज़ार की परवाह न करते हुए दूसरा रास्ता चुना. और यहाँ बाज़ार की परवाह न करने जैसे वाक्य का मैं जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ. क्योंकि फ़िल्म संगीत आज अपने आप में एक वृहत उद्योग है और ऐसे में अपनी फ़िल्म में ’फ़िल्म से बाहर’ पहचाने जाने वाले गीतों का न होना एक बड़ा दुर्गुण है. ऐसे में निर्देशकों ने अपने सिनेमा में संगीत को एक किरदार के बतौर पेश किया और उससे वह काम लेने लगे जिन्हें अभिव्यक्ति के सीमित साधनों के चलते या परिस्थिति के चलते फ़िल्म में मौजूद किरदार अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे. अनुराग कश्यप की ’देव डी’ का ही उदाहरण लें. किरदारों की व्यक्तिगत अभिव्यक्तियाँ जहाँ अपनी सीमाएं तलाशने लगती हैं, फ़िल्म में संगीत आता है और संभावनाओं के असंख्य आकाश सामने उपस्थित कर देता है.

अनुराग द्वारा निर्मित और राजकुमार गुप्ता द्वारा निर्देशित ’आमिर’ का ही उदाहरण लें. फ़िल्म जो कथा कहती है वह अत्यन्त भावुक हो सकती थी, लेकिन यहीं अमित त्रिवेदी का संगीत उसे एक नितान्त ही भिन्न आयाम पर ले जाता है. उनके संगीत में एक फक्कड़पना है जिसके चलने ’आमिर’ का स्वाद अपनी पूर्ववर्ती मैलोड्रैमेटिक फ़िल्मों से बिल्कुल बदल जाता है. अमिताभ भट्टाचार्या द्वारा लिखा गीत ’चक्कर घूम्यो’ को शायद आप फ़िल्म से बाहर याद न करें, लेकिन याद करें कि फ़िल्म में एक घोर तनावपूर्ण स्थिति में आकर वही गीत कैसे आपको सोच का एक नया नज़रिया देता है. घटना को देखने का एक नया दृष्टिकोण जिसके चलने ’आमिर’ अन्य थ्रिलर फ़िल्मों से भिन्न और एक अद्वितीय स्वाद पाती है.

राजकुमार गुप्ता की ही अगली फ़िल्म ’नो वन किल्ड जेसिका’ के गीतों को देखें. क्या आपने हिन्दी सिनेमाई संगीत की कोमलकान्त पदावली में ऐसे खुरदुरे शब्द पहले सुने हैं,

“डर का शिकार हुआ ऐतबार
दिल में दरार हुआ ऐतबार
करे चीत्कार बाहें पसारकर के

नश्तर की धार हुआ ऐतबार
पसली के पार हुआ ऐतबार
चूसे है खून बड़ा खूँखार बनके

झुलसी हुई इस रूह के चिथड़े पड़े बिखरे हुए
उधड़ी हुई उम्मीद है
रौंदे जिन्हें कदमों तले बड़ी बेशरम रफ़्तार ये

no_one_killed_jessicaजल भुन के राख हुआ ऐतबार
गन्दा मज़ाक हुआ ऐतबार
चिढ़ता है, कुढ़ता है, सड़ता है रातों में”

गीत की यह उदंडता अभिव्यक्त करती है उस बेबसी को जिसे फ़िल्म अभिव्यक्त करना चाहती है. ठीक वैसे ही जैसे ’उड़ान’ के कोमल बोल उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले सोलह साल के तरुण कवि की कल्पना से जन्म लेते हैं, ’नो वन किल्ड जेसिका’ के ’ऐतबार’ और ’काट कलेजा दिल्ली’ जैसे गीत अपने भीतर वह पूरा सभ्यता विमर्श समेट लाते हैं जिन्हें फ़िल्म अपना मूल विचार बनाती है.

मुझे याद आता है जो गुलज़ार कहते हैं, कि मेरे गीत मेरी भाषा नहीं, मेरे किरदारों की भाषा बोलते हैं. और वह मेरी अभिव्यक्तियाँ नहीं है, उन फ़िल्मी परिस्थितियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जिनके लिए उन्हें लिखा जा रहा है. ऐसे में समझना यह होगा कि अगर सिनेमाई गीतों में अराजकता बढ़ रही है तो यह हमारे सिनेमा में पाए जाने वाले किरदारों और परिवेश के विविधरंगी होने का संकेत है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

’पीपली लाइव’ का संगीत इसलिए ख़ास है क्योंकि इंडियन ओशन, भदवई गांव की गीत मंडली, राम संपत, रघुवीर यादव, नगीन तनवीर और नूर मीम राशिद जैसे नामों से मिलकर बनता उनका सांगितिक संसार इस समाज की इंद्रधनुषी तस्वीर अपने भीतर समेटे है. सच है कि उस संगीत में अराजकता है और सम्पूर्ण ’एलबम’ मिलकर कोई एक ठोस स्वाद नहीं बनाता. शायद इसीलिए ’पीपली लाइव’ संगीत के बड़े पुरस्कार नहीं जीतती. लेकिन इकसार की चाह क्या ऐसी चाह है जिसके पीछे अराजकता का यह इंद्रधनुषी संसार खो दिया जाए.

dibakarदिबाकर की फ़िल्मों का संगीत कभी खबर नहीं बनता. न कभी साल के अन्त में बननेवाली ’सर्वश्रेष्ठ’ की सूचियों में ही आ पाता है. वे हमेशा कुछ अनदेखे, अनसुने नामों को अपनी फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा सौंपते हैं और कई बार फ़िल्म के गीत खुद ही लिख लेते हैं. शायद यह बात – ’फ़िल्म का संगीत फ़िल्म के बाहर नहीं’ उनकी फ़िल्मों के संगीत पर सटीक बैठती है.

फिर भी मैं दिबाकर की फ़िल्मों के संगीत को हिन्दी सिनेमा में बीते सालों में हुआ सबसे सनसनीखेज़ काम मानता हूँ. क्योंकि उनकी फ़िल्मों का संगीत उनकी फ़िल्मों का सबसे महत्वपूर्ण किरदार होने से भी आगे कहीं चला जाता है. ’ओये लक्की लक्की ओये’ में स्नेहा खानवलकर और दिबाकर शुरुआत में ही ’तू राजा की राजदुलारी’ लेकर आते हैं. हरियाणवी रागिनी जिसका कथातत्व भगवान शिव और पार्वती के आपसी संवाद से निर्मित होता है. देखिए कि किस तरह तरुण गायक राजबीर द्वारा गाया गया यह गीत एक पौराणिक कथाबिम्ब के माध्यम से समकालीन शहरी समाज में मौजूद class के नफ़ासत भरे भेद को उजागर कर देता है. मुझे फिर याद आते हैं आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध जिनमें वह तमाम ’सूटेड-बूटेड’ आर्य देवताओं के मध्य अकेले लेकिन दृढ़ता से खड़े दिखते फ़क्कड़, भभूतधारी और मस्तमौला अनार्य देवता शिव की भिन्नता को स्पष्ट करते हैं.

इसी क्रम में फ़िल्म के दूसरे गीत की यह शुरुआती पंक्तियाँ देखें,

“जुगणी चढदी एसी कार
जुगणी रहंदी शीशे पार
जुगणी मनमोहनी नार
ओहदी कोठी सेक्टर चार”

यह जिस ‘शीशे पार’ का उल्लेख फ़िल्म का यह गीत करता है, यही वो सीमा है जिसे पार कर जाने की जुगत ‘लक्की’ पूरी फ़िल्म में भिड़ाता रहता है. यह class का ऐसा भेद है जिसे सिर्फ़ पैसे के बल पर नहीं पाटा जा सकता. यहाँ फ़िल्म में संगीत किरदार भर नहीं, वो उस फ़िल्म के मूल विचार की अभिव्यक्ति का सबसे प्राथमिक स्रोत बनकर उभरता है. दिबाकर की ही अगली फ़िल्म ‘लव, सेक्स और धोखा’ का घोर दर्जे की हद तक उपेक्षित किया गया संगीत भी इसी संदर्भ में पुन: पढ़ा जाना चाहिए.

पिछले साल आई फ़िल्म ‘डेल्ही बेली’ में एक गीत था ‘स्वीट्टी स्वीट्टी स्वीट्टी तेरा प्यार चाईंदा’. जब मैंने दोस्तों को बोला कि यह मेरी लिस्ट में पिछले साल के सबसे शानदार गीतों में से एक है, तो मुझे जवाबी आश्चर्य का सामना करना पड़ा. मेरी इस राय की वजह क्या है? वजह है इस गीत की फ़िल्म के भीतर भूमिका. फ़िल्म इस गीत के साथ हमारा परिचय दिल्ली के उस उजड्ड से करवाती है जिसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति उसके हाथ में मौजूद उसकी पिस्तौल है. इस अभिव्यक्ति के लिहाज से गीत मुकम्मल है और इसीलिए महत्वपूर्ण है. यहाँ फ़िल्म का दूसरा गीत ‘बेदर्दी राजा’ भी देखें जो उस लंपट किरदार से आपका परिचय करवाता है जिसकी लंपटता फ़िल्म के कथासूत्र में आगे जाकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.

बेशक हिन्दी सिनेमा का संगीत बदला है. लेकिन समय सिर्फ़ उसकी आलोचना का नहीं, ज़रूरत उसमें निहित सकारात्मक बदलाव देखे जाने की भी है. हम लोकप्रिय लेकिन अपनी फ़िल्म से ही पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाने वाले इकसार संगीत के मुकाबले ऐसा, कुछ नया अविष्कार करने की ज़ुर्रत करने वाला संगीत हमेशा ज़्यादा सराहेंगे.

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साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’ के मार्च अंक में प्रकाशित

अधूरेपन में प्रामाणिकता की तलाश

Shaitan साल ख़त्म होता है और आप अपने झोले में बेहतर फ़िल्में जुटाने फिर हालिया इतिहास में बह निकलते हैं. लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ होता यह है कि सम्भाले जाने लायक अनुभव तमाम फ़िल्मों में बिखरे मिलते हैं. आप ’स्टेनली का डब्बा’ के पार्थो को सहेजकर रखना चाहते हैं, लेकिन हद दर्जे की स्टीरियोटाइप भूमिकाओं में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अध्यापक, अध्यापिकाओं को देखकर आपका माथा ठनक जाता है. आप ’लेडीज़ वर्सेस रिक्की बहल’ की डिम्पल चढ्ढा (परिणिति चोपड़ा) को सराहते हैं लेकिन पिछले साल जिस जोड़े पर आप मर मिटे थे, उसका ऐसा भ्रष्ट ’बॉलीवुडीकरण’ होते देखना दर्द देता है. ’शैतान’ अपने चमत्कार से विस्मित करती है. लेकिन उसके भीतर कुरेदने पर हाथ कुछ नहीं आता. अनुराग को मालूम हो, मैं आज भी उस असल स्याह शैतान ’पांच’ के सार्वजनिक प्रदर्शन का इन्तज़ार करता हूँ. मुझे ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पसन्द आती है. क्योंकि यह फ़िल्म छोटे वादे करती है और उन्हें पूरा करती है.

लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि हमें कौनसी फ़िल्म देखनी चाहिए, तो मैं आपको ’अरण्य काण्डम’ देखने की सलाह दूंगा. पिछले साल की शुरुआत में आई यह तमिल फ़िल्म उन तमाम चमत्कारों को समेटे है जिन्हें आपने ’शैतान’ में देख सराहा, और उस बदलाव को भी जिसे ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ में माही गिल ने अपनी नष्ट अदाकारी से बरबाद कर दिया. और इसके ऊपर ’अरण्य काण्डम’ कहीं और भी है. बेशक इसमें वीभत्स हिंसा है, लेकिन इसकी सबसे डरावनी और भयावह कहानियाँ वे हैं जिन्हें किसी सड़क किनारे के ढाबे पर चाय के प्यालों के बीच सुनाया जा रहा है. चकित करती है, हैरत में डालती है. अगर आप कोरियन सिनेमा के प्रशंसक हैं, तो ’अरण्य काण्डम’ आपके ही लिए है. और अगर आपने हालिया कोरियन सिनेमा नहीं देखा तो ज़रूरत नहीं, सीधे ’अरण्य काण्डम’ देखिए.

Aaranya kaandamदोस्तों की बनाई ’जो डूबा सो पार’ में ठीक पहलेपहल यह हीरा मिलता है. फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ दिखाई देता है,

“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण…”

मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ. करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था.

साल दो हज़ार ग्यारह का यथार्थ ’शोर इन द सिटी’ और ’धोबी घाट’ जैसी फ़िल्में गढ़ती हैं. कैसे? क्योंकि मेरा वो दोस्त जो आठवीं क्लास का टॉपर था और आज परचूने की दुकान चलाता है, उसके पिता भी वही परचूने की दुकान चलाते थे. और मैं आठवीं क्लास का एक औसत से कम विद्यार्थी, जिसे गणित के सूत्रों में मृत्यु के अक्षर दिखाई देते थे आज विश्वविद्यालय में पढ़ता-पढ़ाता हूँ. तो इसमें मेरा क्या योग है, मेरे पिता भी अपनी पूरी ज़िन्दगी एक विश्वविद्यालय में पढ़ाया करते थे. हमारे समाज में तय दायरे तोड़ना आज भी मुश्किल है. चाहे वह वर्ग हो, चाहे जाति. मुम्बई जैसे शहर में आकर उन चुनौतियों के रूप-रंग-चेहरे बदल जाते हैं. अब वो प्रत्यक्ष नहीं, नकाब ओढ़कर बड़ी नफ़ासत से शिकार करती हैं. ऊपर उल्लिखित दोनों फ़िल्में इसीलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे इस खामोश सच्चाई की ओर इशारा करती हैं.

लेकिन उम्मीदों भरी फ़िल्म ’आई एम कलाम’ में यही कोशिश है. वैसे मैं ’आई एम कलाम’ को इसलिए भी याद रखता हूँ कि यह हमें एक सामान्य वार्तालाप के माध्यम से ’आरक्षण’ जैसी प्रक्रिया का औचित्य समझा देती है.

“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”
“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”
“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”
“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”
“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”

लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है. यह कथा वहाँ ख़त्म होती है जहाँ कलाम दिल्ली पहुँचता है. लेकिन अब सिनेमाकार को भी मालूम है कि परिवर्तन दिल्ली से नहीं होता. अब यूं परिवर्तन ही नहीं होता.

यह दूसरी बार देखने पर होता है कि मैं ’तनु वेड्स मनु’ की प्रामाणिक खूबसूरती की सबसे आधारभूत वजह चिह्नित कर पाता हूँ. इस तथ्य से इतर कि कानपुर से शुरु होकर दिल्ली, कपूरथला और फिर लौटकर कानपुर जैसे लोकेल में घूमती यह फ़िल्म अपने शुरुआती बीस मिनट में हिन्दी सिनेमा को पिछले साल का सबसे प्रामाणिक शुरुआती प्रसंग देती है और अपनी भाषा, व्यवहार एवं ’मन्नु भैया’ जैसे अपनी माटी में गहरे रचे-बसे गीत के माध्यम से बाकायदा किसी उत्तर भारतीय शहर का सामुदायिक जीवन खड़ा करती है, चिह्नित यह किया जाना चाहिए कि ’तनु वेड्स मनु’ फ़िल्म के विभिन्न निर्णायक क्षणों में घर की छत का एक घटनास्थल के तौर पर किस तल्लीनता से इस्तेमाल करती है.

इतिहास में हमसे पैंतालीस साल की दूरी पर खड़े श्रीलाल शुक्ल के अविश्वसनीयता की हद तक प्रामाणिक उपन्यास ’राग दरबारी’ का शिवपालगंज याद कीजिए. कल्पना कीजिए कि इस शिवपालगंज में से अगर छतों पर घटित होने वाले प्रसंग निकाल दिए जाएं तो शेष क्या बचेगा. वो अद्वितीय प्रसंग जिसमें छत पर सोये रंगनाथ को भूलवश कन्या द्वारा कोई ’और’ समझ लिया जाता है और गलती समझ आने पर कन्या “हाय, मेरी मैया!” कहकर भाग छूटती हैं. बताते चलें कि यही वह प्रसंग है जिसमें से होकर हमारी लोकप्रिय संस्कृति के बतौर वाहक मौजूद सबसे प्रामाणिक प्रेम-पत्र का सूत्र निकलता है. वही प्रेम पत्र जिसके उद्धरण से ’लव इन साउथ एशिया’ पुस्तक में फ्रेंचस्का ऑरसीनी अपने शोध लेख ’लव लेटर्स’ की शुरुआत करती हैं.

tanu weds manu 400चौक और बरामदे तो हम इस इकसार होती जाती आधुनिक शहरी भवन निर्माण कला के हाथों पहले ही नष्ट करवा चुके थे. मकान से फ़्लैट संस्कृति में संचरण के साथ हमने अपने घर में जिस सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को खोया है वह है छत. मेरे बचपन की यादों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से अपने घर की छत पर उगते हमनाम के साए में मोरनियों के झुंड को गेंहूँ खिलाते हुए बनते हैं. लेकिन मुझसे दस साल बाद पैदा हुई पीढ़ी की यादों से यह अनुभव सिरे से गायब है.

बड़ी सी पोल वाले घर की ऊंचे खंबों पर टिकी छत पर बने ’चे गुवेरा’ की तस्वीर वाले उस बाग़ी लड़की के कमरे से शुरु होकर, जहाँ मनोज शर्मा उर्फ़ मन्नू तनुजा त्रिवेदी उर्फ़ तनु को देखने आए हैं, ’तनु वेड्स मनु’ में विभिन्न प्रसंगों में कुल-मिलाकर अठ्ठारह बार छतों का पृष्ठभूमि के तौर पर इस्तेमाल है. और अगर आप पीछे जाकर देखें तो बीते दशक में आई ’मैं, मेरी पत्नी और वो’ और ’दिल्ली 6’ से लेकर ’गुलाल’ और ’देव डी’ तक, उन तमाम फ़िल्मों में जहाँ आपको शहरों के अन्दरूनी जीवन का प्रामाणिक चित्रण मिलता है, इस ज़िन्दगी में गुंथे एक घटनाप्रधान space के बतौर छत / अटरिया / छज्जे का इस्तेमाल मिलता है. यहाँ राजशेखर के लिखे गीत ’मन्नू भैया’ की वह पंक्तियाँ भी देखी जानी चाहियें जो कहीं हाथ से निकलते कस्बाई जीवन के अवशेषों को बड़े प्रेम से समेटती चलती हैं,

“अंबिया इलाइची दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोल बाग़ के छत पर,
फिर पोस्ता पिसेगा, कलोंजी कुटेगी,
मर्तबान से अफ़वाह उठेगी.

पतंग पीछे बच्चे जब आयेंगे छत पर
तन्नु की सारी बरनी जायेंगे चट चट चट चट चट चटकर
तब मन्नु भइया क्या करिहें, मन्नु भइया क्या करिहें.”

’तनु वेड्स मनु’ एक सम्पूर्ण सिनेमा अनुभव नहीं है और यह बुरी बात है कि इस फ़िल्म में भी अंतत: एक बग़ावती तेवर वाली लड़की को वृहत समुदाय द्वारा बड़ी नफ़ासत से कायदे से रहना और कायदे से ’सही’ फ़ैसले करना सिखा ही दिया जाता है, लेकिन इस फ़िल्म को उत्तर भारत के कस्बाती जीवन के अपने तीक्ष्ण निरीक्षण के लिए याद रखा जाना चाहिए.

delhi belly resizeठीक वैसे ही जैसे पूर्णा जगन्नाथन को याद रखा जाना चाहिए. करीने से सजाई गई नायिकाओं की अन्तहीन श्रंखला के बीच, जिन्हें ज़्यादातर उस विश्व सुंदरी प्रतियोगिताओं की ज़ीरॉक्स मशीन से निकाला जाता है, हिन्दी सिनेमा में मुख्य नायिका के बतौर अपनी शुरुआत कर रहीं चालीस वर्षीय पूर्णा अविश्वस्नीय लगता सकारात्मक बदलाव हैं. नायिका जो नायक द्वारा पूर्व पति के बारे में पूछे जाने पर कहती है, “वही पुरानी कहानी. जबरदस्ती शादी करा दी.” और जब नायक चिंता में पड़कर कहता है, “सच?” तो जवाब मिलता है, “नहीं. स्कूल में मेरा बॉयफ्रेंड था. भागकर शादी की थी हम दोनों ने. अपने माँ-बाप से लड़कर.” आश्चर्य यह नहीं कि यही लड़कपन का प्यार आज उनके ऊपर बीच सड़क गोलियाँ बरसा रहा है. आश्चर्य यह भी नहीं कि अलग हो जाने के बाद भी इस ’पति’ को अपनी पत्नी का किसी ’पराए मर्द’ के साथ दिखना पसन्द नहीं. सुखद आश्चर्य यह है कि इतना सब होने के बाद भी ’डेल्ही बेल्ली’ की नायिका मेनका के चेहरे पर अफ़सोस की एक लकीर नहीं.

अपनी मर्ज़ी से, परिवार और समाज से लड़कर लिए फ़ैसले के सिरे से गलत साबित हो जाने के बावजूद यहाँ एक लड़की है जो अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीना छोड़ने के लिए तैयार नहीं. समाज के प्रति, सलीके के प्रति, व्यवस्था के प्रति झुकने को तैयार नहीं. जिसके बेपरवाह अन्दाज़ को ’वक़्त के थपेड़े’ बदल नहीं पाए हैं. वो अपनी ज़िन्दगी खुद जीना चाहती है और अपने हिस्से की गलतियाँ भी खुद करना चाहती है. यह नायिका लम्बे समय से हमारे सिनेमा से अनुपस्थित रही है. इसे सम्भालिए.

उद्दंडता जनार्दन जाखड़ उर्फ़ जॉर्डन में भी है. वो खुद कभी गहरे दिल से चाही अपनी सफ़लता को क़तरा-क़तरा उड़ाता चला जाता है. लेकिन नायक में ऐसी उद्दंडता देखा जाना कम स कम हिन्दी सिनेमा के लिए नया नहीं, और बहुत सारी अन्य वजहों में एक वजह यह भी है कि मैं ’रॉकस्टार’ को एक पाथब्रेकिंग फ़िल्म नहीं मानता. लेकिन फिर भी, फ़िल्म का वह दृश्य मुझे हमेशा याद रहेगा जहाँ इस राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है,

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”

जॉर्डन में बचपना है. उद्दाम बचपना. लेकिन फ़िल्म ने उसे निभाने वाली नज़र नहीं पाई है. ठीक वैसे जैसे ’चिल्लर पार्टी’ टाइटल रोल के साथ की उस धमाकेदार शुरुआत को आगे नहीं निभा पाती है. जब हम कहते हैं कि बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, तो क्या हम यह समझते हैं कि इसी दुनिया में रहते हुए आखिर वो कौनसे औज़ार हैं जिनसे बच्चे अपनी यह ’अलग दुनिया’ बना पाते हैं? सौभाग्यशाली हैं वो जिन्हें ’चिल्लर पार्टी’ की शुरुआत में इन्हीं में से एक औज़ार साक्षात देखना नसीब हुआ. पुकारने के भिन्न नामों से बनी यह खालिस बच्चों की दुनिया है. इसमें बच्चे अपने लिए भूमिकाएं खुद चुनते हैं और खुद ही उन पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं.

“अकरम, ओये अकरम…”
“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”
“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए…”
“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”

shalaयह चर्चा वापस लौटकर आई है कि आखिर वो कौनसी उमर है जिससे हम हमारे सिनेमा में सदा क़तराकर निकल जाते हैं. हाँ, वो लड़कपन से ठीक पहले का समय है जिसे हिन्दी सिनेमा ने अपने व्याकरण में सबसे ज़्यादा उपेक्षित रखा है. मराठी सिनेमा ने बीते साल में ’विहिर’ जैसी अन्न्तिम सवालों के जवाब तलाशती, अनन्त संभावनाओं को समेटे फ़िल्म देखी और इस साल दोस्त अभी से ’शाला’ की बात कर रहे हैं. हिन्दी के पास अपनी ’खरगोश’ हो सकती थी लेकिन उस फ़िल्म से खुद उसके अपने समाज ने सौतेला व्यवहार किया. वैसे यहाँ सूचना यह भी है कि अब यह फ़िल्म सिनेमा हाल के अभेद्य बियाबान से निकलकर वैधानिक रूप से बाज़ार में खरीदे जाने के लिए उपलब्ध है. और मेरा यह दृढ़ता से मानना है कि हमारा वृहत्तर हिन्दी समाज अगर इस रंग और स्वाद की फ़िल्मों को सराहेगा, तो भविष्य में अपने लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा.

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के फ़रवरी अंक में प्रकाशित.

2011 : सिनेमा

rockstar

“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” – फ़राज़

’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’

फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”

राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है. मुझे बहुत साल पहले प्रसून जोशी की ’फिर मिलेंगे’ के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं. यहाँ अस्वीकार का साहस है. उस मासूमियत को बचाने की तड़प जिसे आप epic बन जाने को बेचैन इस पूरी फ़िल्म के दौरान सिर्फ़ रनबीर कपूर की उदंड आँखों में पढ़ पाते हैं. Continue reading

उमेश विनायक कुलकर्णी की ’देऊल’

deoolउमेश विनायक कुलकर्णी हमारे दौर के सबसे उम्मीदों से भरे निर्देशक का नाम है. मेरे लिए वह गिरीश कासरवल्ली की परम्परा में आते हैं जिन्होंने व्यंग्य को ठोस मूल्यों की धरती पर खड़े होकर परखा है और इस मायने में वे हमारे पारम्परिक रूप से बनने वाले क्षेत्रीय सिनेमा में हमेशा कुछ नया जोड़ते हैं. ख़ास बात है कि उनके रचे गांव हमारी हिन्दुस्तानी गांवो के बारे में बनी ’कृषि दर्शन’ और ’चौपाल’ वाली दूरदर्शन छाप इकहरी पहचान को तोड़ते हैं. नई बाज़ार आधारित संस्कृति का अगला ठिकाना अब हिन्दुस्तान के गांव और कस्बे हैं और इसी की कहानी है उमेश की नई फ़िल्म ’देऊल’.

’देऊल’ में वर्तमान विकास की अवधारणा पर बहस बार-बार लौटकर आती है और गांव – शहर विभेद के विभिन्न आयाम भी सामने खुलते चलते हैं. फ़िल्म के एक प्रसंग में एक किरदार भाऊ दूसरे किरदार कुलकर्णी अन्ना को कहता है कि शहर तो बदल गए, गांव ही क्यों वैसे रहें जैसे वो पहले थे. भाव कुछ ऐसा है कि हम भी ’बिगड़ना’ चाहते हैं और हमें यह हक़ है. आखिर किन्हीं और लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी कष्ट में कोई नहीं बिताना चाहता. यह एक बड़ा सच है जिसे उमेश की फ़िल्म बड़ी लापरवाही से कहकर निकल जाती है. बेशक फ़िल्म विकास की वैकल्पिक अवधारणा के साथ खड़ी है जिसमें इंसान का लालच केन्द्र में न होकर प्रकृति केन्द्र में हो. लेकिन उमेश की ख़ासियत यही है कि वह स्याह सफ़ेद में बंटी कहानियां रचते हुए भी स्याह को अपनी बात कहने का पूरा मौका देते हैं.

’देऊल’ उनकी पहली फ़िल्म ’वेलू’ की तरह व्यंग्य को अपना आधार बनाती है. लेकिन यह ’विहिर’ की तरह भी है और इसने अनन्तिम सवालों की खोज करना छोड़ा नहीं है. फ़िल्म के टाइटल क्रेडिट्स जिस तरह की रचनात्मक शुरुआत फ़िल्म को देते हैं, हालिया सिनेमा में दुर्लभ है. ’विहिर’ के चाहनेवालों के लिए यह फ़िल्म कुछ ज़्यादा वाचाल है. लेकिन क्या करें कि स्वयं यथार्थ का चेहरा इतना ही बेहुदा हुआ जाता है. गांव में बनने वाले एक मंदिर के चारों ओर घूमती इसकी कहानी हमारे गांवों में घुस आते उस बाज़ार की कहानी है जिसकी सबसे सुलभ साझीदार धर्म की पताका है. यह उदारीकरण के दूसरे चरण में प्रवेश कर गए हिन्दुस्तान की कथा है, एकदम ख़ालिस.

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इसका संशोधित संस्करण साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के नवम्बर अंक में प्रकाशित.

Pina

“रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!” – ’देवदारु’ से.

pina imageजब Pina Bausch के नर्तकों की टोली रंगमंच की तय चौहद्दी से बाहर निकल शीशे की बनी ख़ाली इमारतों, फुटपाथों, सार्वजनिक परिवहन, कॉफ़ी हाउस और औद्योगिक इकाइयों को अपनी काया के छंद की गिरफ़्त में ले लेती है, मुझे आचार्य द्विवेदी याद का निबंध ’देवदारु’ याद आता है. यह जीवन रस का नृत्य रूप है. आचार्य द्विवेदी के शब्दों में, यह नृत्य ’जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न’ करता है. निरंतर एक मशीनी लय से बंधे इस समय में किताबों की याद, कविताओं की बात, कला का आग्रह.

कॉफ़ी हाउस की अनगिनत कुर्सियों के बीच अकेले खड़े दो प्रेमी एक-दूसरे को बांहों में भर लेते हैं. लेकिन व्यवस्था का आग्रह है कि उनका मिलन तय सांचों में हो. उनके प्रतिकार में छंद है, ताल है, लय है. यहाँ नृत्य जन्म लेता है. पीना बाउश के रचे नृत्यों में विचारों का विहंगम कोलाहल है. उनके रचना संसार में मनुष्य प्रकृति का विस्तार है. इसलिए उनके नृत्यों में यह दर्ज कर पाना बहुत मुश्किल है कि कहाँ स्त्री की सीमा ख़त्म होती है और कहाँ प्रकृति का असीमित वितान शुरु होता है.

वे नाचते हैं. नदियों में, पर्बतों पर, झरनों के साथ. वे नाचते हैं. शहर के बीचोंबीच. जैसे शहर के कोलाहल में राग तलाशते हैं. यह रंगमंच की चौहद्दी से बाहर निकल शहर के बीचोंबीच कला का आग्रह आज के इस एकायामी बाज़ार में खड़े होकर विचारों के बहुवचन की मांग है.

Wim Wenders का वृत्तचित्र ’पीना’ सिनेमाई कविता है. किसी तरुण मन स्त्री की कविता. उग्र, उद्दाम, उमंगों से भरी.

अराजकता के आकाश में उड़ता सिनेमा का जनतंत्र – 2

gatewayहम रीगल के बाहर खड़े थे. भीतर से ’दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ का आदमकद पोस्टर झांक रहा था. हाँ, एक और डीएसएलआर कैमरे पर बनी फ़िल्म सिनेमाघरों में आने वाली थी. बम्बई की बरसात सुबह से इस बे-छतरी दिल्लीवाले से लुका-छिपी खेल रही थी. तय हुआ लिओपोल्ड चलेंगे. पहुंचने ही वाले थे कि ठीक लिओपोल्ड के पहले बाएं हाथ को एक रास्ता खुलता दिखा समन्दर की ओर. मैं ठहर गया. सामने गेटवे था. समन्दर देख दिल्लीवाले का मन मचल गया. मैंने रास्ता बदल लिया. स्वेतलाना और जगन्नाथन दूर खड़े मुझे घूर रहे थे. लेकिन मेरे पीछे मेरा घर था जिसकी याद हमेशा मुझे पानी की ओर धकेलती है. आसमान बरसने को था और मैं अपने डीएसएलआर को पानी से बचाता इन घनेरे बादलों को समन्दर में घुल जाने से पहले अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहता था.

लेकिन पानी को कभी कोई बांध पाया है.

दो कॉफ़ी के प्यालों और एक बियर मग के बीच, उस दीवार के एकदम नज़दीक बैठे जहां गोलियों से बने निशानों को मेडल की तरह सजाया गया है, लियोपोल्ड की उस टेबल पर जगन्नाथन मुझे बम्बई को कुछ और पास से देखने के लिए ग्रांट रोड के सिंगल स्क्रीन थियेटर्स देखने जाने की सलाह देता है और मैं उसे अपनी टूटी-फ़ूटी याद्दाश्त से वीरेन डंगवाल की कविता ’पी टी ऊषा’ सुनाता हूँ. पिछले तीन दिन से मैं उसे हम सबकी बातें सुनते, कोरे कागज़ों पर स्कैच बनाते और अनवरत जेम्स हेडली चेज़ पढ़ते देख रहा हूँ. क्या कोई मानेगा कि मेरी और जगन्नाथन की दोस्ती के पीछे जिस लड़के का हाथ है उससे मैं आजतक नहीं मिला. “सगई राज मेरी फ़िल्म का केन्द्रीय चरित्र होगा यह पहले से तय नहीं था. बल्कि वो तो मेरा सहायक कैमरामैन था.” जगन बताता है. (आप ’वीडियोकारन’ में आज भी उसका नाम ’सिनैमेटोग्राफी’ के क्रेडिट्स में पढ़ सकते हैं) पिछले दो महीने में मैं अपने कम से कम दर्जन भर दोस्तों को उस विस्मयकारी सगई राज से मिलवा चुका हूँ. मैं जगन से कहता हूँ कि जो बनाने वो निकला था, वहां से खड़े होकर देखें तो उसने अपनी फ़िल्म की नरैशन स्टाइल और मैसेज से बहुत समझौता किया है, लेकिन बदले में जो चीज़ बचाई है वो कहीं ज़्यादा कीमती है. ईमानदारी.

videokaaran4small’टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सांइसेस’ की जिस छोटी सी ग्रांट के दम पर जगन्नाथन कृष्णन ने ’वीडियोकारन’ बनाई है, आमतौर पर उसे वहां शॉर्ट फ़िल्म के लिए ही उपयुक्त माना जाता है. शायद यह भी कि यह हिन्दुस्तान में अपनी पसन्द की फ़िल्में बनाने का ज़्यादा पारम्परिक तरीका है. लेकिन एक ऐसे दौर में जहां योजनाबद्ध तरीके से तमाम संस्थानों और प्रक्रियाओं का निजीकरण ’विकास’ के नाम पर किया जा रहा हो, वहां संस्थागत मदद का सही और जनतांत्रिक मूल्यों के हक में उपयोग दरअसल इस रास्ते को वापिस ज़िन्दा करने की लड़ाई में एक कदम है. संस्थागत मदद में अपनी वाजिब हिस्सेदारी मांगना उसके ’उदारीकरण’ के नाम पर कुछ हाथों में गैर-लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सीमित होने के खतरे का जवाब भी होता है. आज भी जगन्नाथन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो अपनी डॉक्यूमेंट्री में आए तमाम फ़िल्मों के दृश्यों के अधिकार खरीद सके, और शायद इसी वजह से अनेक विदेशी फ़ेस्टिवल्स में वह प्रतियोगिता से बाहर हो जाती है. जगन अब ’वीडियोकारन’ से आगे बढ़ना चाहता है. उसके पास कहानी है लेकिन उसे बनाने के लिए पैसा नहीं. फिर एक बार फ़िल्म बनाने का संघर्ष उसे बनाने का सही आर्थिक मॉडल तलाश करने में छिपा है. लेकिन इस बार जगन को यह मालूम है कि वो अपनी दूसरी फ़िल्म बनाएगा. जल्द ही बनाएगा.

INDIANOCEAN POSTER FINALकुछ लड़ाइयां जैसे अब अनवरत हैं. पिछले दिनों जयदीप वर्मा दिल्ली में थे. राष्ट्रपति से अपनी फ़िल्म ’लीविंग होम’ के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार लेने. कुछ महीने पहले इसी कॉलम में हमने ’लीविंग होम’ की बात की थी. उनसे मुलाकात में फिर वो सारी कहानियां याद हो आईं जिनसे होकर यह दुर्लभ फ़िल्म यहां तक पहुँची है. वैसे एक नज़रिया यह भी हो सकता है कि ’लीविंग होम’ को हम हिन्दुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा की सफलता की कहानी के तौर पर पढ़ें. तमाम संघर्षों के साथ बनकर तैयार हुई यह संगीतमय डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ़ सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई बल्कि साढ़े पांच घंटे के अनकट वर्ज़न के साथ अपने चाहनेवालों के घरों में, दिलों में पहुँची. राष्ट्रीय पुरस्कार इसकी कहानी को एक ’हैप्पी एंडिंग’ भी देता है. लेकिन इस नज़रिए में वो बहुत सारी पीड़ाएं कहीं छिप जाती हैं जिन्हें अब हमने एक स्वतंत्र फ़िल्मकार का भाग्य मान लिया है. उस दिन से जोड़कर जब अखबारवालों ने उनसे उनकी फ़िल्म के प्रदर्शन वाले हफ़्ते में उसकी अपने अखबार में लिस्टिंग भर के पैसे मांगे थे, उन पुरस्कारों तक जहां वाजिब हकदारों के सही नाम पुकारने में गलतियां हुईं, यह लिस्ट बहुत लम्बी है. यहां एक फ़िल्मकार है जिसे अपने काम में गुणवत्ता से ज़रा सा भी समझौता मंज़ूर नहीं, जिसकी रचनाशीलता सदा कुछ नया गढ़ती रहती है. लेकिन जिसे अपने हिस्से का पूरा मान, पूरी इज़्ज़त चाहिए. सवाल हमसे है कि क्या हम इन जैसे स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए एक ऐसा सिस्टम खड़ा कर सकते हैं जिसमें इन्हें अपना काम ईमानदारी और गुणवता के साथ पूरा करने का मौका मिले?

लेकिन हिन्दी सिनेमा में स्वतंत्र प्रयास अब एकाकी नहीं रहे. मैं कहानियों की तलाश में हूँ. आधी रात हेमंत गाबा को फोन करता हूँ. हेमंत की कहानी कुछ-कुछ ’द अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्ट’ के नायक से मिलती है. विदेश में बैठे सॉफ़्टवेयर कोड लिखते-लिखते एक दिन अचानक यह लड़का तय करता है कि इसे फ़िल्म बनानी है. बाकायदा एक फ़ीचर फ़िल्म. सच में यह दुस्साहसियों का ज़माना है. लौटकर हिन्दुस्तान आता है और मानिए या न मानिए, कैसे न कैसे कर अपनी फ़िल्म बना डालता है. इधर हेमंत अपनी कहानी सुना रहा है, वही फ़िल्म के प्रदर्शन से जुड़े ’डिस्ट्रीब्यूटर-पब्लिसिटी’ के गोरखधंधे, और मुझे उसकी बातें सुनते हुए एक पुरानी कहानी, एक पुराना दोस्त याद आता है. अचानक मैं जयदीप वर्मा की ’लीविंग होम’ का नाम लेता हूँ और हेमंत मुझे बताता है कि उसने ’लीविंग होम’ ख़ास कनॉट प्लेस के सिनेमाहॉल में इसीलिए देखी थी क्योंकि ऐसा हर स्वतंत्र प्रयास उसकी लड़ाई का हिस्सा है. अलग-अलग भाषा और परिवेश से आए यह सभी स्वतंत्र फ़िल्मकार अब साथ खड़े होने का महत्व और ज़रूरत समझ रहे हैं.

SB_Poster 2हेमंत बताता है कि उसकी फ़िल्म बनकर तैयार है लेकिन किसी भी किस्म का वितरक उसके प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं. उन्हें पैसा चाहिए. उसे ’आपकी पैंतीस लाख की फ़िल्म में हम अपना सत्तर लाख क्यों डालें’ जैसे जवाब इस संघर्ष की बहुत शुरुआत में ही मिल चुके हैं. वो उस दिन को याद करता है जब एक बड़ी फ़िल्म प्रोसेसिंग लैब ने उसकी बरसों की मेहनत को लगभग नष्ट करने के बाद उससे पहला सवाल यही पूछा था कि कहीं आप किसी फ़िल्मी खानदान से तो नहीं? इन्हीं सारे वितरण से जुड़े झमेलों को याद कर वो लिखता है,

“अब तो यह जाना-पहचाना तथ्य है कि आज फ़िल्म बनाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल उसका वितरण है. मुझे यह फ़िल्म ’शटलकॉक ब्वॉयज़’ पूरा करने में दो साल से ज़्यादा लगे हैं और अब भी मुझे यह नहीं पता कि आखिर कब यह फ़िल्म इसके असल दर्शकों तक पहुँचेगी. वितरकों से तो मिलना ही मुश्किल है, शायद इसलिए कि मैं इस इंडस्ट्री के लिए एक बाहरी व्यक्ति हूँ और मेरे पीछे कोई फ़िल्मी बैकग्राउंड नहीं. लगातार प्रयास के बाद जिन कुछ मीडिया कॉर्पोरेट्स से मैं मिल पाया, उन्होंने भी बड़ी विनम्रता से मेरी कोशिश को यह कहकर किनारे कर दिया कि न तो इसमें कोई स्टार है और न ही सिर्फ़ पैंतीस लाख में बनी फ़िल्म के वितरण में पैसा डालना कोई समझदारी है. स्वतंत्र वितरक भी चाहते हैं कि प्रिंट और पब्लिसिटी का पैसा मैं खुद करूं, जो इन हालातों में मेरे लिए संभव नहीं. तो हाल-फ़िलहाल फ़िल्म को एक सीमित स्तर पर भी प्रदर्शित कर पाने की लड़ाई जारी है.” हेमंत अपनी अमरीका की नौकरी से जो कुछ बचाकर लाया था वो तो इस फ़िल्म में लगा दिया. दोस्तो, घरवालों का भी मन और धन यहां अटका है. लेकिन वो कोई धन कुबेर नहीं. उसका अगली फ़िल्म बनाने का सपना पूरी तरह इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर टिका है.

ऐसे में देश भर में होने वाले तमाम छोटे-बड़े फ़िल्म महोत्सव हेमंत के लिए उम्मीद की किरण हैं. और ऐसे फ़िल्मोत्सवों की संख्या हिन्दी की लघु पत्रिकाओं की तरह लगातार बढ़ रही है. यहां उसकी फ़िल्म को अपने दर्शक मिल सकते हैं. बेशक यहां पैसा नहीं है लेकिन यहां दर्शक फ़िल्म देखेगा और पसन्द करेगा तो उससे फ़िल्म का नाम और आगे जाएगा. रास्ते ऐसे ही निकलते हैं. फिर हमें समझ आता है कि फ़िल्म दिखाने का कोई ठीक-ठाक मॉडल खड़ा कर पाना हिन्दुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा के भविष्य की राह में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है. वो हिमाचल का ज़िक्र करता है, यमुनानगर में फ़िल्म फ़ेस्टिवल की बात बता आश्चर्य मिश्रित खुशी ज़ाहिर करता है. मैं उसे गोरखपुर का पता बताता हूँ. दोस्तियां कुछ और गाढ़ी होती हैं. कुछ हंसी-ठठ्ठों भर में हम फ़िल्म को उसके दर्शक तक पहुँचाने के इस अनवरत चलते संघर्ष को साझा लड़ाई में बदल देते हैं.

Delhi film archiveडॉक्यूमेंट्री वाले इसका रास्ता अब वितरण भी अपने हाथ में लेकर निकाल रहे हैं. ’डेल्ही फ़िल्म आर्काइव’ जैसा प्रयास दिल्ली के वृत्तचित्र निर्देशकों का एक ऐसा ही सम्मिलित प्रयास है जो सिनेमा की शहर में उपलब्धता सुनिश्चित करने का माध्यम है. ’मैजिक लैंटर्न फ़ाउंडेशन’ भी ’अंडर कंस्ट्रक्शन’ के बैनर तले सिनेमा के वितरण का काम शुरु कर चुकी है. खुद गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल की टीम के पास अब पचास से ज़्यादा फ़िल्मों के वितरण अधिकार हैं. अब तो फ़िल्मस डिविजन भी अपने अधिकार की फ़िल्मों का वितरण करने लगा है. कई दुर्लभ फ़िल्में फिर सामने आई हैं. मान्य धारणा है कि हिन्दुस्तान में डॉक्यूमेंट्री में जो पैसा है वो बनाने के पहले है, बनाने के बाद उसे दिखाकर कोई पैसा नहीं कमाया जा सकता. शायद इस कारण भी यहां नए वितरण तंत्र को खड़ा करना मुश्किल तो है लेकिन जटिल नहीं. यह नए प्रयास अब इस प्रचलित धारणा को कुछ अंशों में बदल भी रहे हैं. लेकिन फ़ीचर फ़िल्म का सिनेमाघरों में प्रदर्शन आज भी टेढ़ी खीर है. वहां खेल बड़े पैसे और पहचान का है. और इसके बिना कोई सेटेलाइट राइट्स भी खरीदने को तैयार नहीं. कई अच्छी फ़िल्में जैसे ’खरगोश’, ’कबूतर’ सिनेमाघरों का कभी मुंह नहीं देख पाईं. और ’दाएं या बाएं’, ’हल्ला’ जैसी फ़िल्में सही प्रचार और शो टाइमिंग न मिलने के अभाव में किस अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं ये हम सब जानते हैं.

यह अनेक संभावनाओं वाला समय है. बहुवचन समय. यहां नकारात्मक बंजर ज़मीनों पर ज़िन्दगी और सिनेमा को चाहनेवाले उम्मीदों के पौधे लगा रहे हैं. उन्हें बढ़ने के लिए खाद-पानी की ज़रूरत है. और उस पानी का सोता हम दर्शकों से होकर गुज़रता है. तो आएं, अपने-अपने डीएसएलआर कैमरे निकालें और शाश्वत नियमों को झुठलाएं और इस कलकल पानी को उम्मीदों की क्यारियों में कैद करना शुरु करें.

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साहित्यिक पत्रिका ’कथादेश’ के अक्टूबर अंक में प्रकाशित. इस आलेख की पहली किश्त आप यहाँ पढ़ सकते हैं. फ़िल्मकार हेमंत गाबा से मोहल्ला लाइव के लिए की गई मेरी विस्तृत बातचीत आप यहाँ पढ़ सकते हैं.