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केंचुल उतारता शहर

हंसल मेहता वापस अाए हैं बड़े दिनों बाद। अपनी नई फ़िल्म 'शाहिद' के साथ, जिसकी तारीफें फ़िल्म समारोहों में देखनेवाले पहले दर्शकों से लगातार सुनने को मिल रही हैं। उनकी साल 2000 में बनाई फ़िल्म 'दिल पे मत ले यार' पर कुछ साल पहले दोस्त अविनाश के एक नए मंसूबे ...

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December 21, 2012

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कितने बाजू, कितने सर

एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ...

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November 30, 2012

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’आई एम 24’ और सौरभ शुक्ला का लेखक अवतार

पिछले दिनों रिलीज़ हुई ‘आई एम 24’ पुरानी फ़िल्म है। लेकिन इसके बहाने मैं पुन: दोहराता हूँ उस व्यक्ति के काम को जिसने कभी अनुराग कश्यप के साथ मिलकर ’सत्या’ लिखी थी और हमारे सिनेमा को सिरे से बदल दिया था। न जाने क्या हुआ कि हमने उसके बाद सौरभ ...

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October 22, 2012

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बच्चन

वे भिन्न थे। अाज से खड़े होकर देखने से चाहे भरोसा न हो, लेकिन जब वे अाए थे, तब वे सिनेमा का ’अन्य’ थे। और उन्होंने इसे ही अपनी ताक़त बनाया। उस ’सिनेमा के अन्य’ को सदा के लिए कहानी का सबसे बड़ा नायक बनाया। वो AIR वाला अस्वीकार याद ...

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October 11, 2012

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’बरफ़ी’ का रेलगाड़ी वाला शहर

"हर भले आदमी की एक रेल होती है जो माँ के घर की ओर जाती है सीटी बजाती हुई धुआँ उड़ाती हुई" ~ आलोक धन्वा अनुराग बासु की ’बरफ़ी’ कुछ मायनों में चुनौतीपूर्ण फ़िल्म है और बहुत से मामलों में बहुत पारम्परिक। पारम्परिक इन मायनों में कि यह एक ख़ास समय, स्थान और ...

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September 29, 2012

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खुले सिरों वाला सिनेमा और व्याख्याकार की दुविधा

प्रेमचंद की अंतिम कहानियों में से एक ’कफ़न’, जितनी प्रसिद्ध कथा है उतनी ही विवादास्पद भी रही है। मूलरूप से विवाद की जड़ में रहा है कहानी के मुख्य दलित पात्रों ’धीसू’ और ’माधव’ का चित्रण। अपनी मरती हुई पत्नी और बहु के कफ़न के पैसों को उड़ा नाच रहे ...

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August 11, 2012

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सिनेमा का नमक

बीते महीने हमारा सिनेमा अपने सौंवे साल में प्रवेश कर गया। यह मौका उत्सव का है। किसी भी विधा के इतना जल्दी, जीवन में इतना गहरे समाहित हो जाने के उदाहरण विरले ही मिलते हैं। सिनेमा हमारे ’लोक’ का हिस्सा बना और इसीलिए उसमें सदा आम आदमी को अपना अक्स ...

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July 25, 2012

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’शांघाई’ के सर्वहारा

हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी ...

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June 19, 2012

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सिनेमा के सौ बरस

हिन्दी सिनेमा आधुनिक भारत का सबसे प्यारा बच्चा है. उसमें आपको खिलखिलाकर हंसाने की क्षमता है तो गहरे प्यार से निकली एक पल में रुला देने वाली कुव्वत भी. और आनेवाली मई में हम इसके जन्म के सौवें साल में प्रवेश कर जायेंगे. दादासाहेब फ़ालके से दिबाकर बनर्जी तक, कैसा ...

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April 22, 2012

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जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर

“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, ...

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March 29, 2012